
इस अध्याय में पुलस्त्य ऋषि राजाओं को उपदेश देते हुए प्रभास-खण्ड के “उमा–महेश्वर” तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। यह तीर्थ परम पुण्यदायक और श्रेष्ठ कहा गया है। इसकी स्थापना धुन्धुमार नामक भक्त द्वारा हुई—जिससे यह भाव प्रकट होता है कि भक्ति की शक्ति से ही भू-प्रदेश भी पावन बनता है। विधि सरल है: यात्री को उमा–महेश्वर के स्थान पर जाकर दिव्य दम्पति शिव-पार्वती की श्रद्धा-भक्ति से पूजा करनी चाहिए। फलश्रुति में कहा गया है कि ऐसा उपासक सात जन्मों तक दुर्भाग्य से बचा रहता है और निरन्तर शुभता प्राप्त करता है।
Verse 1
पुलस्त्य उवाच । उमामाहेश्वरं गच्छेत्ततो राजन्सुपुण्यदम् । स्थापितं भक्तियुक्तेन धुन्धुमारेण यत्पुरा
पुलस्त्य बोले—तत्पश्चात्, हे राजन्, महापुण्य-प्रद उमामाहेश्वर के दर्शन को जाना चाहिए, जिसे पूर्वकाल में भक्तियुक्त धुन्धुमार ने स्थापित किया था।
Verse 2
दांपत्यं पूजयेद्भक्त्या यस्तत्र मनुजाधिप । सप्त जन्मांतराण्येव न स दौर्भाग्यमाप्नुयात
हे मनुजाधिप! जो वहाँ भक्तिभाव से दिव्य दम्पति का पूजन करता है, वह सात जन्मों तक भी दुर्भाग्य को प्राप्त नहीं होता।
Verse 58
इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्ड उमामाहेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनंनामाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
इस प्रकार श्रीस्कन्द महापुराण की एकाशीतिसाहस्री संहिता के सप्तम प्रभासखण्ड के तृतीय अर्बुदखण्ड में ‘उमा-माहेश्वर तीर्थ-माहात्म्य-वर्णन’ नामक अट्ठावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ।