Adhyaya 44
Prabhasa KhandaArbudha KhandaAdhyaya 44

Adhyaya 44

इस अध्याय ‘गजतीर्थ-प्रभाव-वर्णन’ में पुलस्त्य ऋषि राजा को ‘अनुत्तर’ तीर्थ गजतीर्थ की यात्रा का उपदेश देते हैं। वे पूर्ववृत्त बताते हैं कि प्राचीन काल में दिग्गज—संयमी और शुद्ध आचरण वाले—यहीं तपस्या करते थे; ऐरावत आदि लोकधारक गजों सहित उनके आचरण से इस तीर्थ की महिमा प्रमाणित हुई। अध्याय का केंद्र विधिपूर्वक स्नान है। जो भक्त श्रद्धा से गजतीर्थ में सम्यक् स्नान करता है, उसे गजदान के समान पुण्यफल प्राप्त होता है। इस प्रकार यह अध्याय तीर्थ-भूगोल, आदर्श तपस्या और पुण्य-समता के सिद्धान्त को जोड़कर तीर्थधर्म का संक्षिप्त मार्ग दिखाता है।

Shlokas

Verse 1

पुलस्त्य उवाच । ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ गजतीर्थमनुत्तमम् । यत्र पूर्वं तपस्तप्तं दिग्गजैर्भावितात्मभिः

पुलस्त्य बोले—हे नृपश्रेष्ठ, इसके बाद अनुपम गजतीर्थ को जाना चाहिए, जहाँ पूर्वकाल में संयतचित्त दिग्गजों ने तपस्या की थी।

Verse 2

भूभारधरणैश्चान्यैरैरावणमुखैर्नृप । तत्र स्नातो नरः सम्यग्गजदानफलं लभेत्

हे राजन्, ऐरावत आदि पृथ्वीभार-धारक अन्य गजों से पूजित उस तीर्थ में जो मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करता है, वह गजदान के समान पुण्यफल पाता है।

Verse 44

इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखंडे तृतीयेऽर्बुदखण्डे गजतीर्थप्रभाववर्णनंनाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः

इस प्रकार श्रीस्कन्द महापुराण की एकाशीतिसाहस्री संहिता के सप्तम प्रभासखण्ड के तृतीय अर्बुदखण्ड में ‘गजतीर्थ-प्रभाव-वर्णन’ नामक चवालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।