
Purva Ardha
Pūrvārdha functions as the opening arc of the Kāśīkhaṇḍa’s Kāśī-centered sacred geography. It establishes the textual frame for interpreting the city as a tīrtha-system—where rivers, mountains, shrines, and routes become carriers of theological meaning and ethical guidelines. In Chapter 1, the narrative temporarily shifts from Kāśī to a broader Indic landscape (notably the Narmadā region and the Vindhya range), using that setting to introduce themes of sanctity, humility, and the limits of pride—preparatory motifs for understanding why certain places are revered and how seekers should approach them.
50 chapters to explore.

Kāśī-stuti, Nārada–Vindhya-saṃvāda, and the Ethics of Humility
अध्याय का आरम्भ मंगलाचरण से होता है—गणेश को प्रणाम और काशी की महान स्तुति, उसे पाप-नाशिनी तथा मोक्ष से जुड़ी नगरी के रूप में बताया गया है। कथा-परम्परा का संकेत भी आता है कि यह पुराणिक प्रवाह व्यास-वचन और सूत के कथन-प्रसंग में प्रतिष्ठित है। इसके बाद नारद नर्मदा में स्नान कर ओंकारेश्वर का पूजन करते हैं और यात्रा में विन्ध्य पर्वत को देखते हैं। वन, फल-फूल, लताएँ और पशु-पक्षियों का विस्तृत काव्यात्मक वर्णन विन्ध्य को एक जीवित पवित्र पर्यावरण के रूप में स्थापित करता है। विन्ध्य नारद का अर्घ्य आदि से सत्कार कर हर्ष प्रकट करता है, पर भीतर की चिंता बताता है—पर्वतों में मेरु की प्रधानता के सामने अपनी प्रतिष्ठा को लेकर उसे गर्वजन्य असुरक्षा है। नारद विचार करते हैं कि गर्व का संग सच्ची महानता नहीं देता; वे ऐसा उत्तर देते हैं जिससे विन्ध्य का आत्माभिमान और बढ़ जाता है। नारद के चले जाने पर विन्ध्य व्याकुल होकर ‘चिन्ता-ज्वर’ को देह और धर्म दोनों को गलाने वाला बताता है और समाधान हेतु विश्वेश्वर की शरण लेने का निश्चय करता है; किंतु प्रतिस्पर्धा से प्रेरित होकर वह बढ़ने लगता है और सूर्य के मार्ग में बाधा डालता है। अध्याय का अंत संघर्ष, संयम, और शक्ति-प्रदर्शन के सामाजिक दुष्परिणामों पर नीति-उपदेश के साथ होता है।

सूर्यगति-स्तम्भनम्, देवस्तुति-प्रसङ्गः, काशी-माहात्म्य-उपदेशः (Solar Obstruction, Hymn of the Devas, and Instruction on Kāśī’s Merit)
इस अध्याय में सूर्य का उदय धर्म और यज्ञ-काल का नियामक रूप में बताया गया है, जिससे अर्घ्य, होम और नित्यकर्म का क्रम चलता है। फिर विन्ध्य के गर्व से ऊँचा उठ जाने पर सूर्य की गति रुक जाती है; दिन-रात का भेद बिगड़ता है, यज्ञ-विधियाँ टूटती हैं और जगत् में व्याकुलता फैल जाती है। इस ब्रह्माण्डीय अव्यवस्था से भयभीत देवगण ब्रह्मा के पास जाकर दीर्घ स्तुति करते हैं—वेदों को परम तत्त्व का प्राण, सूर्य को दिव्य नेत्र और समस्त विश्व को उसका देह-रूप कहकर वर्णन करते हैं। ब्रह्मा उस स्तुति को फलदायी घोषित करते हैं और नियमपूर्वक पाठ करने पर समृद्धि, रक्षा और विजय का वर बताते हैं। इसके बाद ब्रह्मा धर्म-उपदेश देते हैं—सत्य, संयम, व्रत, दान, विशेषतः ब्राह्मणों को दान तथा गौ की पवित्रता और संरक्षण का महत्त्व बताते हैं। अंत में काशी-माहात्म्य प्रकट होता है: वाराणसी में स्नान-दान, मणिकर्णिका में स्नान और ऋतु-सम्बन्धी कर्म दिव्य लोकों में दीर्घ निवास देते हैं; और विश्वेश्वर की कृपा से निश्चित मोक्ष प्राप्त होता है। अविमुक्त क्षेत्र में किया गया छोटा-सा पुण्य भी जन्म-जन्मान्तर में मुक्तिदायक कहा गया है।

Agastya’s Āśrama and the Moral Ecology of Kāśī (देवागस्त्याश्रमप्रभाव-वर्णनम्)
यह अध्याय प्रश्नोत्तर-रूप में आगे बढ़ता है। सूत पूछते हैं कि देवता काशी पहुँचकर क्या करते हैं और अगस्त्य के पास कैसे गए। पराशर बताते हैं कि देवता पहले मणिकर्णिका में विधिपूर्वक स्नान करते हैं, संध्या-वंदन आदि आचार निभाते हैं और पितरों के लिए तर्पण करते हैं। इसके बाद दान का विस्तृत विधान आता है—अन्न, धान्य, वस्त्र, धातु, पात्र, शय्या, दीप, गृह-उपयोगी वस्तुएँ; साथ ही मंदिर-सेवा के लिए जीर्णोद्धार, संगीत-नृत्य अर्पण, पूजा-सामग्री, तथा ऋतु के अनुसार लोक-कल्याण के उपक्रम। अनेक दिनों के व्रत-अनुष्ठान और बार-बार विश्वनाथ-दर्शन के पश्चात देवता अगस्त्य-आश्रम जाते हैं, जहाँ अगस्त्य लिंग-प्रतिष्ठा कर शतरुद्रीय आदि का तीव्र जप करते हुए तपोतेज से दीप्त दिखते हैं। फिर काशी-क्षेत्र के प्रभाव का विशेष वर्णन है—आश्रम में पशु-पक्षियों की स्वाभाविक शत्रुता शांत हो जाती है, मानो प्रकृति भी अहिंसा में स्थिर हो। आगे नीति-उपदेश में मांस और मद्य के आसक्त जीवन को शिव-भक्ति के प्रतिकूल कहा गया है। अंत में विश्वेश्वर की महिमा बताते हुए कहा जाता है कि काशी में मृत्यु के समय दिव्य उपदेश से जीव का उद्धार संभव है; और काशी-निवास तथा विश्वेश्वर-दर्शन धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों पुरुषार्थों में अद्वितीय फल देने वाले हैं।

Pātivratya-śikṣā (Teaching on Pativratā-Dharma) | पतिव्रतधर्म-उपदेशः
इस अध्याय में सूत–व्यास की कथाव्यवस्था के भीतर, अगस्त्य के प्रश्न-प्रसंग के बाद देवगण अगस्त्य की स्तुति कर पतिव्रता-धर्म का विस्तृत उपदेश देते हैं। लोपाामुद्रा को आदर्श मानकर उत्तम पत्नी के आचार बताए गए हैं—पति की आवश्यकताओं में तत्परता, वाणी और व्यवहार में संयम, अनावश्यक मेल-जोल से दूरी, कुछ सार्वजनिक तमाशों/दृश्यों से परहेज़, पति की अनुमति के बिना कठोर व्रत-तप न करना, और सेवा-भाव को ही धर्म-रूप साधना मानना। फिर फल-प्रधान वर्णन आता है—पतिव्रता-आचरण की रक्षाशक्ति, मृत्यु-दूतों का भय न होना, तथा पीढ़ियों तक पुण्य-प्रभाव का विस्तार कहा गया है। इसके विपरीत आचरण करने वालों के लिए निन्दित पुनर्जन्म आदि चेतावनी-रूप उदाहरण दिए गए हैं। आगे वैधव्य-धर्म का विधान है—आहार-नियम, तप, नित्य अर्पण/दान, तथा पति को भक्ति-केन्द्र मानकर विष्णु-पूजन; साथ ही वैशाख, कार्तिक और माघ में स्नान, दान, दीप-दान और संयमित व्रतों का निर्देश है। अंत में श्रवण-फल बताया गया है कि इस उपदेश को सुनने से पाप नष्ट होते हैं और शुभ लोक, विशेषतः शक्र-लोक की प्राप्ति होती है।

अविमुक्तमहिमा, विंध्यनिग्रहः, तथा महालक्ष्मीस्तुति-वरदानम् (Avimukta’s Supremacy, the Humbling of Vindhya, and Mahālakṣmī’s Boon)
इस अध्याय में काशी के ‘अविमुक्त’ क्षेत्र की अद्वितीय पवित्रता का गूढ़ विवेचन है। पराशर लोपामुद्रा से कहते हैं कि जगत् में उठे विघ्न को देखकर यह प्रश्न स्वाभाविक है कि नियन्ता देवता उसे क्यों नहीं रोकते; पर इसका कारण काशी का विशेष भाग्य है—यहाँ रहने वालों के लिए कुछ बाधाएँ अनिवार्य भी होती हैं। काशी का त्याग घोर भूल बताया गया है; अविमुक्त को क्षेत्र, लिंग और मोक्ष-गति में अनुपम कहा गया है। वरुणा–पिंगला और सुषुम्ना जैसी नाड़ी-सीमा की प्रतीक-व्याख्या तथा मृत्यु के समय शिव द्वारा दिए जाने वाले ‘तारक’ उपदेश से काशी में शिव की मुक्तिदायिनी कृपा प्रतिपादित होती है। फिर कथा अगस्त्य के प्रस्थान और काशी-वियोग की तीव्र वेदना की ओर मुड़ती है। अगस्त्य विंध्य पर्वत का दर्प दबाकर उसे नीचा रहने का आदेश देते हैं—जब तक वे लौटें नहीं—और इस प्रकार विश्व-संतुलन पुनः स्थापित होता है। आगे अगस्त्य को महालक्ष्मी के दर्शन होते हैं; वे विस्तृत स्तुति करते हैं, और देवी लोपामुद्रा के लिए आश्वासन व अलंकरण प्रदान करती हैं। अगस्त्य वर माँगते हैं कि उन्हें पुनः वाराणसी की प्राप्ति हो तथा स्तुति-पाठकों को रोग-शोक और दरिद्रता से मुक्ति, निरन्तर समृद्धि और वंश-परम्परा की वृद्धि मिले। इस प्रकार अध्याय तीर्थ-महिमा, काशी न छोड़ने की नीति, तारक-मोक्ष और भक्तिपूर्ण आदर्श-कथा को एक साथ पिरोता है।

Agastya–Lopāmudrā-saṃvāda: Mānasa-tīrtha-lakṣaṇa and the Hierarchy of Mokṣa-kṣetras (Śrīśaila–Prayāga–Avimukta)
इस अध्याय में पराशर सूत से कहते हैं कि केवल बाह्य कर्मकाण्ड से मिलने वाला पुण्य नहीं, बल्कि परोपकार और परहित-चिन्ता ही श्रेष्ठ धर्म है। फिर अगस्त्य–लोपामुद्रा संवाद आता है। श्रीशैल (त्रिपुरान्तक शिव से सम्बद्ध) को देखकर यह मत प्रकट होता है कि उसके शिखर का दर्शन मात्र पुनर्जन्म का नाश कर देता है। लोपामुद्रा पूछती हैं—यदि ऐसा है तो फिर काशी की खोज क्यों? अगस्त्य अनेक मोक्षदायक क्षेत्रों और तीर्थों का वर्गीकरण करते हुए भारत के प्रसिद्ध तीर्थों का स्मरण कराते हैं। इसके बाद वे ‘मानस तीर्थ’ बताते हैं—सत्य, क्षमा, इन्द्रिय-निग्रह, दया, आर्जव, दान, दम, सन्तोष, ब्रह्मचर्य, प्रिय-वाणी, ज्ञान, धृति और तप। वे समझाते हैं कि लोभ, क्रूरता, निन्दा, कपट और आसक्ति से मलिन मन को केवल जल-स्नान शुद्ध नहीं कर सकता; वास्तविक तीर्थ मन की शुद्धि और वैराग्य है। अध्याय में तीर्थयात्रा की मर्यादा भी आती है—पूर्व उपवास, गणेश-पूजन, पितृ-तर्पण, ब्राह्मण व साधुओं का सम्मान, तीर्थस्थल पर भोजन के नियम, श्राद्ध-तर्पण की विधियाँ, तथा भाव और यात्रा-प्रकार के अनुसार तीर्थफल के ‘भाग’ का निर्धारण। अंत में मोक्ष-क्षेत्रों की तुलना की जाती है—श्रीशैल और केदार मोक्षदायक हैं, पर प्रयाग उनसे श्रेष्ठ है, और प्रयाग से भी ऊपर अविमुक्त काशी है, जो मुक्ति-भूगोल में सर्वोपरि मानी गई है। श्रद्धापूर्वक श्रवण/पाठ से पापक्षय, मनःशुद्धि और पुनर्जन्म-निवारण का फल कहा गया है।

Śivaśarmā’s Ethical Self-Audit, Tīrtha-Itinerary, and the Turn to Kāśī (Agastya Narration)
इस अध्याय में अगस्त्य मथुरा के एक विद्वान ब्राह्मण के पुत्र शिवशर्मा का वर्णन करते हैं। शिवशर्मा वेद, धर्मशास्त्र, पुराण, न्याय, मीमांसा, आयुर्वेद, कलाएँ, राजनीति और भाषाएँ—सबमें निपुण हो जाता है; फिर भी धन-परिवार और प्रतिष्ठा के बीच वृद्धावस्था का बोध उसे भीतर से व्याकुल कर देता है। वह कठोर आत्म-परीक्षण करता है और अपनी उपेक्षाएँ गिनाता है—शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य, देवी की पर्याप्त पूजा न करना; यज्ञ, अतिथि-सत्कार, ब्राह्मण-भोजन, वृक्षारोपण, स्त्रियों को वस्त्र-आभूषण देना; भूमि-सुवर्ण-गोदान, जलाशय-निर्माण, यात्रियों की सहायता, विवाह-व्यय में सहयोग, शुद्धि-व्रत, तथा मंदिर/लिंग-प्रतिष्ठा जैसे पुण्यकर्मों में कमी। परम कल्याण के लिए वह तीर्थ-यात्रा को ही उपाय मानकर शुभ तिथि में प्रस्थान करता है। अयोध्या और विशेषतः प्रयाग पहुँचकर त्रिवेणी-संगम की महिमा सुनता है—जहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों की सिद्धि तथा महान शुद्धि का प्रतिपादन है। वहाँ निवास कर स्नान-दानादि के बाद वह वाराणसी आता है, द्वार पर देहलीविनायक की पूजा करता है, मणिकर्णिका में स्नान कर देवों और पितरों को अर्घ्य-तर्पण देता है, और विश्वेश्वर के दर्शन कर काशी की अनुपम महत्ता पर विस्मित होता है। फिर भी काशी की महिमा जानकर भी उसका आगे महाकालपुरी (उज्जयिनी) की ओर गमन वर्णित है—जहाँ पाप-नाश, यम-भय-हरण, असंख्य लिंगों का क्षेत्र और महाकाल-स्मरण की तारक शक्ति बताई गई है। अंत में तीव्र संकट के बाद दिव्य, आकाश-मार्ग से समाधान का संकेत भी आता है।

शिवशर्मा–लोकदर्शनम्: धर्मराजदर्शनं च (Śivaśarmā’s Vision of Worlds and the Encounter with Dharmarāja)
यह अध्याय संवाद-रूप में आगे बढ़ता है। लोपामुद्रा पवित्र नगरों से जुड़ी “पुण्य-कथा” सुनने की उत्कंठा प्रकट करती हैं; तब अगस्त्य यह समझाने हेतु कि केवल प्रसिद्ध “मोक्ष-नगरों” के संसर्ग मात्र से स्वतः मुक्ति सुनिश्चित नहीं होती, ब्राह्मण शिवशर्मा का उपदेशात्मक इतिहासन सुनाते हैं। शिवशर्मा को दो दिव्य सेवक—पुण्यशील और सुशील—मिलते हैं, जो उसे विभिन्न लोकों का दर्शन कराते हैं। लोकों का क्रम नैतिक आचरण के अनुसार दिखाया जाता है—पिशाच-लोक अल्प पुण्य और पश्चात्तापयुक्त दान का फल है; गुह्यक-लोक सत्योपार्जित धन, समाज में बाँटने की वृत्ति और अद्रोह स्वभाव से जुड़ा है; गन्धर्व-लोक में संगीत-कौशल और दान का पुण्य तब बढ़ता है जब धन ब्राह्मणों को अर्पित हो और भक्ति-स्तुति हो; विद्याधर-लोक शिक्षण, रोगियों की सेवा-सहायता और विद्या-ग्रहण में विनय से शोभित है। फिर धर्मराज धर्मात्माओं के लिए अप्रत्याशित रूप से सौम्य होकर प्रकट होते हैं और शिवशर्मा की विद्या, गुरु-भक्ति तथा देह-जीवन के धर्ममय उपयोग की प्रशंसा करते हैं। इसके बाद अध्याय में पापों और दण्डों का भयावह पक्ष भी आता है—कामाचार-दोष, परनिन्दा, चोरी, विश्वासघात, अपवित्रता/देवद्रव्य-अपहरण, सामाजिक हानि आदि अपराधों के लिए कठोर आज्ञाएँ और फल-निर्धारण सूची की तरह बताए जाते हैं। अंत में बताया जाता है कि यम किसे भयानक और किसे शुभदर्शी लगते हैं; धर्मराज की सभा में आदर्श राजाओं का उल्लेख होता है, और शिवशर्मा एक अप्सरा-नगर का दर्शन करता है—जिससे कथा का आगे बढ़ना सूचित होता है।

Apsaroloka–Sūryaloka Varṇana and Gayatrī–Sūryopāsanā Vidhi (अप्सरोलोक–सूर्यलोकवर्णनं तथा गायत्री–सूर्योपासनाविधिः)
इस अध्याय में शिवशर्मा अत्यन्त सुन्दर, आभूषणों से सुसज्जित दिव्य स्त्रियों के विषय में पूछते हैं। गण बताते हैं कि वे अप्सरा-सदृश हैं—गान, नृत्य, मधुर वाणी और कलाओं में निपुण—और अप्सरोलोक में निवास के कारण भी समझाते हैं: व्रत-नियमों का पालन, भाग्यवश कभी संयम में हल्की चूक, तथा काम्य-व्रतों से प्राप्त दिव्य भोग। आगे नाम सहित अप्सराओं का वर्णन, उनके दिव्य अलंकार, और सूर्य-संक्रमण के अवसर पर पुण्यकर्म, भोगदान तथा मंत्रयुक्त अर्पण की विधियाँ आती हैं। फिर सूर्य-तत्त्व और विशेषतः गायत्री मंत्र की सर्वोच्चता प्रतिपादित होती है। ज्ञान-परम्परा में गायत्री को सर्वश्रेष्ठ मंत्र कहा गया है और त्रिकाल संध्या-उपासना का समय-नियम अनिवार्य बताया गया है। शुद्ध ताँबे के पात्र से जल, पुष्प, कुश/दूर्वा, अक्षत सहित प्रातः-सायं अर्घ्य, मंत्रोच्चार और सूर्य के अनेक नामों की स्तुति का विधान है; इससे आरोग्य, समृद्धि आदि तथा मृत्यु के बाद सूर्यलोक-प्राप्ति का फल कहा गया है। अंत में श्रवण-फल की प्रशंसा और अगस्त्य द्वारा कथा के नैतिक व शुद्धिकर महत्व की पुष्टि होती है।

Amarāvatī–Agni-loka Praśaṃsā and the Narrative of Viśvānara’s Attainment (Jyotiṣmatī Purī)
अध्याय का आरम्भ शिवशर्मा के आश्चर्य से होता है, जब वह एक तेजस्वी और सुखद नगरी को देखता है। गण उसे बताते हैं कि यह महेन्द्र (इन्द्र) से सम्बद्ध दिव्य अमरावती है—प्रकाशमय भवन, कामना-पूर्ति करने वाली समृद्धि, तथा दिव्य अश्व-गज आदि के प्रतीक-रत्न; यह वर्णन कर्मफल और लोक-व्यवस्था के धर्ममय संकेत देता है। फिर प्रसंग अग्नि-तत्त्व की ओर मुड़ता है। अग्नि (जातवेद) को पवित्र करने वाला, अन्तर्यामी साक्षी और यज्ञ का आधार कहा गया है; अग्निहोत्र की रक्षा, अग्निकर्मों में निर्धनों की सहायता, समिधा व यज्ञोपकरण देना, तथा संयमित आचरण—इनसे अग्निलोक की प्राप्ति बताई गई है। इसके बाद गण शाण्डिल्य-वंश के ऋषि विश्वानर की कथा कहते हैं। वह चारों आश्रमों पर विचार कर गृहस्थ-धर्म की विशेष महिमा बताता है; पत्नी शुचिष्मती महेश के समान पुत्र की प्रार्थना करती है। विश्वानर वाराणसी जाकर तीर्थ-परिक्रमा, लिंग-दर्शन, स्नान-दान, पूजन और तपस्वियों का सत्कार करता है; शीघ्र सिद्धि हेतु काशी के अनेक लिंगों में से विचार कर सिद्धिदायक पीठ पर नियमपूर्वक उपासना करता है। अंत में निर्दिष्ट स्तुति/व्रत को नियत अवधि तक करने से पुत्र-प्राप्ति सहित इच्छित फल मिलने की फलश्रुति दी गई है।

गृहपति-नामकरणम् तथा पुत्रलक्षण-परिक्षा (Naming of Gṛhapati and the Examination of the Child’s Marks)
अगस्त्य काशी-केन्द्रित धर्म-तत्त्व का उपदेश सुनाते हैं। विश्वानर और शुचिष्मती के गृहस्थ जीवन से कथा आरम्भ होकर गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्त, जन्मोत्सव और नामकरण आदि संस्कार क्रम से बताए जाते हैं। वैदिक-शैली के मंत्र-प्रमाण के साथ बालक का नाम “गृहपति” रखा जाता है; जन्मोत्सव में ऋषि और दिव्यगणों की विशाल सभा आकर उसकी शुभता को सार्वजनिक धर्म-व्यवस्था में प्रतिष्ठित करती है। फिर गृहस्थ-आश्रम में संतान के महत्व, पुत्रों के प्रकार और वंश-परम्परा की रक्षा को धर्म का विषय बताया जाता है। नारद आते हैं, माता-पिता की आज्ञापालन को नीति-नियम के रूप में समझाते हैं और देह-लक्षण तथा हस्तरेखा/चिह्नों की परीक्षा करके राज्य-लक्ष्मी और सौभाग्य के संकेत बताते हैं, साथ ही कहते हैं कि भाग्य गुणों को उलट भी सकता है। बारहवें वर्ष के आसपास बिजली/अग्नि से संकट की भविष्यवाणी सुनकर माता-पिता शोक करते हैं; बालक उन्हें ढाढ़स बँधाकर मृत्युञ्जय (शिव) की आराधना से संकट-निवारण का व्रत लेता है, और कथा फिर भक्ति, संरक्षण तथा काशी के शैव-उद्धार-क्षितिज पर स्थिर हो जाती है।

नैरृत-वरुण-लोकवर्णनम् तथा वरुणेश-लिङ्ग-प्रतिष्ठा (Description of the Nairṛta and Varuṇa realms; establishment of Varuṇeśa Liṅga)
इस अध्याय में दिशा-तत्त्व और नीति-धर्म का संयुक्त उपदेश है। पहले नैरृत दिशा और वहाँ के निवासियों का वर्णन आता है—यह बताया गया है कि जन्म से चाहे कोई उपेक्षित हो, यदि वह श्रुति-स्मृति के अनुसार आचरण करे, अहिंसा, सत्य, संयम और द्विजों के प्रति आदर रखे, तो वह ‘पुण्य-मार्गी’ माना जाता है। आत्म-हिंसा को कठोरता से निषिद्ध कर उसे आध्यात्मिक हानि का कारण कहा गया है। फिर दृष्टान्त रूप में पिङ्गाक्ष नामक पल्लिपति की कथा है, जो नियंत्रित ‘मृगया-धर्म’ का पालन करते हुए यात्रियों की रक्षा करता और सहायता देता है। लोभी संबंधी की हिंसा तथा पिङ्गाक्ष की अंतिम भावना से कर्मफल का सिद्धान्त स्पष्ट होता है और अंततः उसे नैरृत-लोक का अधिपत्य प्राप्त होता है। इसके बाद वरुण-लोक का वर्णन और लोक-कल्याणकारी दानों की सूची दी गई है—कुएँ, तालाब, जल-वितरण, छाया-शालाएँ, यात्रियों को पार उतारना, भय-निवारण आदि—ये पुण्य और सुरक्षा देने वाले बताए गए हैं। अंत में वरुण की उत्पत्ति-कथा है: ऋषि-पुत्र शुचिष्मान को जलचर उठा लेता है; शिव की कृपा और भक्ति से बालक लौट आता है। आगे वाराणसी में तप से शिव का वर पाकर वह जलों का स्वामी बनता है और काशी में वरुणेश-लिंग की प्रतिष्ठा करता है; इसके पूजन से जल-सम्बन्धी भय और कष्टों से रक्षा का फल कहा गया है।

Pavaneśvara/Pavamāneśvara Liṅga Māhātmya and the Devotee Narrative (पवनेश्वर/पवमानेश्वर-लिङ्गमाहात्म्य)
अध्याय 13 में पवनेश्वर/पवमानेश्वर लिंग का माहात्म्य, काशी के पवित्र भू-भाग का वर्णन और भक्त-कथा एक साथ आती है। गण एक सुगंधित पुण्य-क्षेत्र का परिचय देते हैं और वायु (प्रभंजन) से संबद्ध लिंग का स्थान बताते हैं; वे कहते हैं कि श्रीमहादेव की आराधना से वायु को दिक्पाल का पद प्राप्त हुआ। फिर वाराणसी में पूतात्मा के दीर्घ तप और उसके द्वारा शुद्धि देने वाले इस लिंग की स्थापना का प्रसंग आता है, जहाँ केवल दर्शन से भी पाप-क्षय और नैतिक-यागिक रूपांतरण की बात कही गई है। इसके बाद स्तोत्र-खंड में शिव की परात्परता और सर्वव्यापकता का गान है; शिव-शक्ति के भेद (ज्ञान, इच्छा, क्रिया शक्तियाँ) और विश्व-देह के रूप में वर्ण-आश्रम तथा पंचतत्त्व आदि का दिव्य मानचित्र प्रस्तुत होता है। अध्याय व्यावहारिक निर्देश भी देता है—लिंग वायु-कुंड के निकट और ज्येष्ठेश के पश्चिम में स्थित है; सुगंधित स्नान और गंध-पुष्प-धूप आदि अर्पण करने का विधान है। अंत में अलका-सदृश वैभव से जुड़ी एक और कथा में भक्त की उन्नति (आगे चलकर राजत्व के संकेत सहित) कही जाती है, और फलश्रुति में आश्वासन मिलता है कि इस कथा का श्रवण पापों का नाश करता है।

चंद्रेश्वर-माहात्म्य तथा चंद्रोदक-तीर्थश्राद्ध-विधि (Candreśvara Māhātmya and the Candrodaka Tīrtha Śrāddha Protocol)
इस अध्याय में शिव के गण संवाद के रूप में पहले अलका के ‘अग्र-प्रदेश’ के निकट एक पवित्र क्षेत्र का वर्णन करते हैं और फिर काशी की ईशान्य दिशा की विशेष पावनता बताते हैं। रुद्र-भक्तों तथा एकादश रुद्र-रूपों को रक्षक और उपकारक मानकर स्थान-रक्षा की धर्म-व्यवस्था स्थापित की जाती है; आगे ईशानेश की प्रतिष्ठा और उसके पुण्य का निरूपण होता है। फिर चंद्र-कथा आती है—अत्रि के तप से सोम की उत्पत्ति, सोम का पतन, ब्रह्मा द्वारा विधिपूर्वक संस्कार, और उससे जगत्-धारक औषधियों का प्रादुर्भाव। सोम अविमुक्त क्षेत्र में आकर चंद्रेश्वर लिंग की स्थापना करता है। महादेव अष्टमी/चतुर्दशी पूजन, पूर्णिमा-विधि, तथा अमावस्या-सोमवार के उपवास, रात्रि-जागरण, ‘चंद्रोदक’ जल से स्नान और चंद्रोदक-कुंड में श्राद्ध की विधि—पितरों के नामोच्चार सहित—निर्धारित करते हैं। फलश्रुति में गया-श्राद्ध के तुल्य पितृ-तृप्ति, ऋणत्रय से मुक्ति, पाप-समूह का शमन और सोमलोक-प्राप्ति कही गई है। अंत में चंद्रेश्वर के निकट सिद्धयोगीश्वरी पीठ का गुह्य वर्णन है, जहाँ संयमी साधक दर्शन-प्रमाण और सिद्धि पाते हैं; नास्तिकों और श्रुति-निंदकों के लिए निषेध भी बताया गया है।

बुधेश्वर-नक्षत्रेश्वर-माहात्म्य (Budheśvara and Nakṣatreśvara: Shrine-Etiology and Merit)
इस अध्याय में संवाद-परंपरा से कथा आगे बढ़ती है। अगस्त्य लोपामुद्रा से कहते हैं कि शिव के गणों ने शिवशर्मा को जो वृत्तांत सुनाया था, वही यहाँ प्रकट होता है। पहले गण बताते हैं कि दक्ष की कन्याएँ, जो नक्षत्रों के रूप में प्रसिद्ध हैं, काशी में कठोर तप करती हैं और संगमेश्वर के निकट वाराणसी-तट पर ‘नक्षत्रेश्वर’ नामक लिंग की स्थापना करती हैं। तब शिव उन्हें वर देते हैं—ज्योतिष-चक्र में प्रमुखता, राशियों से संबंध, अलग ‘नक्षत्र-लोक’ की प्राप्ति, और काशी में नक्षत्र-व्रत तथा पूजन करने वालों की रक्षा। फिर कथा बुध (मर्करी) के माहात्म्य की ओर मुड़ती है। तारा–सोम–बृहस्पति प्रसंग से उत्पन्न बुध काशी में घोर तप कर ‘बुधेश्वर’ लिंग स्थापित करता है; शिव के दर्शन से उसे वर मिलता है—नक्षत्र-लोक से ऊपर श्रेष्ठ लोक, ग्रहों में विशेष सम्मान, और यह कि बुधेश्वर-पूजन से बुद्धि बढ़ती है तथा दुर्बुद्धि/भ्रम दूर होता है। अंत में फलश्रुति है कि चन्द्रेश्वर के पूर्व स्थित बुधेश्वर के दर्शन से बुद्धि का पतन नहीं होता; आगे शुक्रम्बंधी लोक-वर्णन की भूमिका बनती है।

Śukra and the Mṛtasañjīvinī Vidyā: Austerity in Kāśī, Boon from Śiva, and the War-Episode with Andhaka
अध्याय 16 में गणों द्वारा भृगुवंशी कवि शुक्राचार्य का वर्णन है। उन्होंने काशी में अत्यन्त कठोर तप किया—हज़ार वर्षों तक ‘कणधूम’ का आहार लेकर भी नियम निभाया—और शिव की कृपा से मृतसञ्जीविनी विद्या प्राप्त की। शिव प्रत्यक्ष होकर वर देते हैं, और शुक्र बताते हैं कि यह विद्या उन्होंने धर्म-हित के लिए पाई है। अन्धक–शिव संग्राम के प्रसंग में अन्धक, दैत्यगुरु शुक्र की स्तुति कर, गिरे हुए दैत्यों को जिलाने हेतु विद्या चलाने का अनुरोध करता है। शुक्र एक-एक दैत्य को पुनर्जीवित करने लगते हैं, जिससे युद्ध का उत्साह दैत्यों की ओर बढ़ता है। तब गण महेश को समाचार देते हैं; नन्दी को शुक्र को पकड़ने भेजा जाता है, और शिव स्वयं शुक्र को निगलकर उस पुनर्जीवन-योजना को निष्फल कर देते हैं। शिव के भीतर शुक्र बाहर निकलने का मार्ग खोजते हुए अनेक लोकों का दर्शन करते हैं; शाम्भव-योग से उन्हें मुक्त किया जाता है और उसी उद्गम के कारण शिव उन्हें ‘शुक्र’ नाम देते हैं। अंत में काशी-यात्रा का वृत्तान्त आता है—शिवलिंग की स्थापना, कुआँ खोदना, दीर्घ पूजा, पुष्प व पंचामृत अर्पण, तथा चरम व्रत—जिससे शिव प्रसन्न होकर वर देते हैं। अध्याय का संदेश है कि विद्या और वर महान शक्ति देते हैं, पर उनके नैतिक व ब्रह्माण्डीय परिणामों का नियमन परमेश्वर ही करते हैं।

Aṅgārakeśvara and Bṛhaspatīśvara: Kāśī Shrines, Graha-Protection, and Vācaspati’s Consecration
यह अध्याय संवाद-रूप में दो मुख्य प्रसंगों को प्रकट करता है। पहले शिवशर्मा गणों से पूछते हैं कि शुद्ध और शोक-हरने वाला क्षेत्र कौन-सा है। गण बताते हैं कि दक्षायणी-वियोग के समय शम्भु के स्वेद-बिन्दु से लोहिताङ्ग (माहेय) उत्पन्न हुए; उन्होंने उग्रपुरी में कठोर तप किया और ‘अङ्गारकेश्वर’ नामक लिङ्ग की स्थापना की। शिव-कृपा से वे अङ्गारक के रूप में प्रसिद्ध हुए और ग्रहों में उच्च पद को प्राप्त हुए। फिर अङ्गारक-चतुर्थी के व्रत-नियम बताए जाते हैं—विशेषतः उत्तरवाहिनी जल में स्नान, पूजन, तथा दान-जप-होम का अक्षय फल। अङ्गारक-संयोग में किए गए श्राद्ध से पितरों की तृप्ति कही गई है; इसी व्रत से गणेश-जन्म का संबंध भी जोड़ा गया है, और वाराणसी में भक्तिपूर्वक निवास को मृत्यु के बाद उन्नत गति देने वाला बताया गया है। दूसरे भाग में काशी की ही दूसरी कथा आती है—अङ्गिरा के पुत्र ने लिङ्ग-पूजन और वायव्य-स्तोत्र द्वारा शिव को प्रसन्न कर बृहस्पति/जीव/वाचस्पति की उपाधियाँ पाईं। शिव ने शुद्ध वाणी का वर दिया, ग्रहजन्य पीड़ाओं से रक्षा का आश्वासन दिया और ब्रह्मा को आदेश किया कि वे उन्हें देवताओं के आचार्य रूप में अभिषिक्त करें। अंत में काशी में बृहस्पतीश्वर का स्थान-निर्देश, कलियुग में गुप्त परंपरा का संकेत, और इस अध्याय के श्रवण से ग्रह-पीड़ा व विघ्न-नाश की फलश्रुति—विशेषतः काशीवासियों के लिए—कही गई है।

Saptarṣi-Liṅga-Pratiṣṭhā in Avimukta and the Arundhatī Pativratā Discourse (Chapter 18)
इस अध्याय में बताया गया है कि मुक्तिपुरी काशी में स्नान करके मथुरा के ब्राह्मण शिवशर्मा देहांत के बाद वैष्णव लोक की ओर बढ़ते हैं। मार्ग में वे एक तेजस्वी, मंगलमय लोक देखकर आश्चर्य करते हैं; तब दो गण-सेवक बताते हैं कि सृष्टिकर्ता की आज्ञा से सप्तर्षि—मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, अंगिरा और वसिष्ठ—काशी में निवास करते हैं और प्रजा-उत्पत्ति के हेतु तप करते हैं; उनकी पत्नियाँ जगन्माताएँ कही गई हैं। सर्वजन-मोक्ष के लिए वे अविमुक्त क्षेत्र में आते हैं, जिसे क्षेत्रज्ञ-निवासयुक्त बताया गया है, और अपने-अपने नाम वाले लिंगों की प्रतिष्ठा करते हैं। उनके तपोबल से तीनों लोक धारण होते हैं। फिर तीर्थ-सूची दी जाती है—गोकर्णेश के जल के पास अत्रीश्वर; मरीचि-कुंड और मरीचीश्वर; स्वर्गद्वार के निकट पुलह-पुलस्त्य; हरिकेशव वन में अंगिरसेश्वर; तथा वरुणा तट पर वासिष्ठमेश्वर और क्रत्वीश्वर—जिनके दर्शन-स्नान से तेज, पुण्य और लोक-प्राप्ति का फल कहा गया है। अंत में अरुंधती की अनुपम पतिव्रता-धर्म में प्रशंसा की गई है; कहा गया है कि उनका स्मरण भी गंगा-स्नान के समान पुण्य देता है, और काशी के पवित्र भू-दृश्य में उन्हें आदर्श रूप में स्थापित किया गया है।

ध्रुवोपाख्यानम् — Dhruva’s Resolve, Instruction, and Turn toward Vāsudeva
इस अध्याय में ध्रुव का उपाख्यान संवाद और दृष्टान्त के रूप में प्रकट होता है। एक तेजस्वी, अचल पुरुष के विषय में प्रश्न उठता है, मानो वह जगत् का आधार और माप हो; तब गण ध्रुव का वृत्तान्त कहते हैं। वह स्वायम्भुव मनु के वंश में राजा उत्तानपाद का पुत्र है; रानियों सुनीति और सुरुचि के बीच गृहस्थ-क्रम में भेद है, और सभा में सुरुचि के वचन से ध्रुव को राज-अंक/आसन से सार्वजनिक रूप से वंचित किया जाता है। इसके बाद सुनीति धर्मयुक्त उपदेश देती हैं—मान और अपमान पूर्वकर्म के फल हैं, संचित पुण्य से ही प्रतिष्ठा मिलती है; इसलिए क्रोध-शोक को रोककर धैर्य से परिणाम स्वीकार करना चाहिए। ध्रुव तपस्या-प्रधान दृढ़ निश्चय करता है और केवल माता की अनुमति व आशीर्वाद लेकर वन को चला जाता है। वन में उसे सप्तर्षि मिलते हैं। कारण पूछने पर ध्रुव अपना दुःख कहता है; तब अत्रि उसे भक्ति की ओर मोड़ते हैं—गोविन्द/वासुदेव के चरणों का आश्रय और नाम-जप ही वह साधन है जिससे लौकिक तथा पारलौकिक दोनों सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। ऋषि प्रस्थान करते हैं और ध्रुव वासुदेव-परायण होकर तप में प्रवृत्त होता है; इस प्रकार अध्याय सामाजिक चोट से अनुशासित आध्यात्मिक संकल्प तक की यात्रा दिखाता है।

Dhruva’s Tapas, Viṣṇu-Nāma Contemplation, and the Testing of Steadfast Devotion
इस अध्याय में ध्रुव नदी-तट के निकट एक पवित्र उपवन में पहुँचकर उसे परम पावन दिव्य-स्थान मानते हैं और वहीं वासुदेव का जप तथा ध्यान आरम्भ करते हैं। हरि को दिशाओं में, किरणों में, पशु-पक्षियों और जलचर रूपों में, तथा अनेक रूपों वाले एक परमात्मा के रूप में सर्वत्र व्याप्त बताया गया है; ध्रुव उसी भाव से विष्णु-नाम का निरन्तर स्मरण करते हैं। फिर इन्द्रियों का एकाग्र पुनर्नियोजन दिखाया गया है—वाणी केवल विष्णु-नामों में, दृष्टि भगवान के चरणों में, श्रवण गुण-कीर्तन में, घ्राण दिव्य सुगन्ध में, स्पर्श सेवा-भाव में और मन पूर्णतः नारायण में स्थिर हो जाता है। ध्रुव के तप की तेजस्विता से देवगण विचलित होकर ब्रह्मा के पास जाते हैं; ब्रह्मा उन्हें आश्वस्त करते हैं कि सच्चा भक्त किसी का अहित नहीं करता और विष्णु ही सबके उचित स्थानों की रक्षा करेंगे। इन्द्र विघ्न डालने हेतु भयानक प्राणी और मायिक दृश्य भेजते हैं; ध्रुव की माता के समान एक आकृति भी उन्हें रोकने की विनती करती है। पर ध्रुव अडिग रहते हैं और सुदर्शन की रक्षा से सुरक्षित रहते हैं। अंत में नारायण प्रकट होकर वर माँगने और अत्यधिक तप छोड़ने को कहते हैं; ध्रुव भगवान के प्रकाशमय स्वरूप का दर्शन कर स्तुति करते हैं—यह परीक्षा में सिद्ध हुई दृढ़ भक्ति की पराकाष्ठा है।

ध्रुवस्तुतिḥ (Dhruva’s Hymn) and Viṣṇu’s Instruction on Dhruva-pada and Kāśī
इस अध्याय में ध्रुव भगवान विष्णु की दीर्घ स्तुति करते हैं। वे सृष्टि‑स्थिति‑प्रलय के कर्ता, शंख‑चक्र‑गदा धारी, तथा वेद, नदियाँ, पर्वत, तुलसी, शालग्राम और काशी‑प्रयाग जैसे तीर्थों में व्याप्त रूप से अनेक नामों द्वारा प्रणाम करते हैं। आगे नाम‑कीर्तन और स्मरण को रोग‑शमन, पाप‑क्षय और मन की स्थिरता का साधन बताया गया है; तुलसी‑पूजन, शालग्राम‑सेवा, गोपीचंदन धारण और शंख‑संबद्ध स्नान आदि को भक्ति के रक्षक चिह्न कहा गया है। भगवान विष्णु ध्रुव की अंतःभावना जानकर उन्हें ध्रुव‑पद का वर देते हैं—वे समस्त ग्रह‑नक्षत्र मंडल के घूमते तंत्र के स्थिर आधार बनकर एक कल्प तक शासन करेंगे। फलश्रुति में त्रिकाल स्तोत्र‑पाठ से पाप घटने, समृद्धि‑स्थैर्य, कुल‑मंगल, संतान‑धन और भक्ति की वृद्धि का वर्णन है। फिर प्रसंग काशी का आता है: विष्णु शुभ वाराणसी जाने की इच्छा बताते हैं जहाँ विश्वेश्वर मोक्ष के कारण हैं; पीड़ित के कान में तारक‑मंत्र का उपदेश और काशी को संसार‑दुःख की अद्वितीय औषधि कहा गया है। विशेष तिथि पर विश्वेश्वर‑दर्शन, काशी/ब्रह्मपुरी में दान‑धर्म के पुण्य और ध्रुव‑चरित के स्मरण का महाफल अंत में कहा गया है।

लोक-क्रमवर्णनम्, तीर्थराज-प्रयागमाहात्म्यम्, अविमुक्त-काशी-परमोत्कर्षः (Cosmic Realms, Prayāga as Tīrtharāja, and the Supremacy of Avimukta-Kāśī)
इस द्वाविंश अध्याय में शिवशर्मा नामक ब्राह्मण को शिव के गण एक तीव्र विमान में बैठाकर क्रमशः ऊर्ध्व लोकों की यात्रा कराते हैं। वे महर्लोक का परिचय देते हैं जहाँ दीर्घायु तपस्वी रहते हैं, जो तप से शुद्ध और विष्णु-स्मरण से पोषित हैं; फिर जनलोक आता है, जो ब्रह्मा के मानस-पुत्रों (सनन्दन आदि) और अडिग ब्रह्मचारियों का धाम कहा गया है। तपोलोक में तपस्याओं का विस्तृत विधान मिलता है—उष्ण-शीत सहन, उपवास, प्राण-निग्रह, अचल-स्थित रहना आदि—जिससे तप को शुद्धि और स्थैर्य की अनुशासित साधना के रूप में दिखाया गया है। इसके बाद सत्यलोक में ब्रह्मा दर्शन देते हैं और धर्म का मानक उपदेश करते हैं: भारतवर्ष कर्मभूमि है, जहाँ श्रुति-स्मृति-पुराण पर आधारित धर्म और सत्पुरुषों के आचरण से इन्द्रियों तथा लोभ, काम, क्रोध, अहंकार, मोह, प्रमाद जैसे दोषों पर विजय पाई जा सकती है। फिर अध्याय पवित्र-भूगोल की तुलना करता है—स्वर्ग और पाताल भोगों के लिए प्रशंसित हैं, पर मोक्ष-प्रभाव में भारत और उसके विशिष्ट क्षेत्र-तीर्थ श्रेष्ठ ठहरते हैं। प्रयाग को तीर्थराज कहकर अत्यन्त पावन बताया गया है, नाम-स्मरण से भी शुद्धि का फल कहा गया; पर चरम निष्कर्ष यह है कि विश्वेश्वर के अधीन अविमुक्त काशी में मृत्यु के समय मोक्ष सबसे सीधे प्राप्त होता है। साथ ही चेतावनी है कि हिंसा, शोषण, परपीड़ा और विश्वेश्वर-द्रोह काशी-वास के अयोग्य बनाते हैं; काशी यम के अधिकार से रक्षित है और अपराधियों का नियमन कालभैरव करते हैं।

लोकपरिस्थिति-वर्णनम् तथा हर-हरि-ऐक्योपदेशः (Cosmic Levels and the Instruction on the Non-difference of Śiva and Viṣṇu)
इस अध्याय में ब्राह्मण शिवशर्मा सत्यलोक में ब्रह्मा से प्रश्न करता है। ब्रह्मा उसकी जिज्ञासा स्वीकार कर विषय को विष्णु के गणों के पास भेजते हैं और उनके सर्वज्ञत्व का वर्णन करते हैं। वैकुण्ठ की ओर जाते हुए वे गण शिवशर्मा के प्रश्नों का उत्तर देते हैं और सप्तपुरी—अयोध्या, मथुरा, मायापुरी (हरिद्वार), काशी, कांची, अवंती और द्वारावती—का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि मोक्ष विशेष रूप से काशी में क्यों प्रतिष्ठित है। फिर लोक-व्यवस्था का तकनीकी निरूपण आता है—भूर्लोक से भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यलोक तक; सत्यलोक के ऊपर वैकुण्ठ और उससे परे कैलास का स्थान बताया जाता है। इसी क्रमबद्ध ब्रह्माण्ड में काशी की तारक-भूमि के रूप में महिमा स्थापित होती है। आगे तत्त्वोपदेश में शिव को स्वेच्छाधीश परमेश्वर, वाणी-मन से परे ब्रह्म, और साथ ही साकार रूप में प्रकट बताया गया है। मुख्य सिद्धान्त यह है कि हरि और हर में वास्तविक भेद नहीं—हरि-हरि ऐक्य ही सत्य है। अंत में शिव, विष्णु का राजाभिषेक कर उन्हें इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति तथा माया प्रदान करते हैं और शासन-कार्य सौंपते हैं। फलश्रुति में इस पाठ को उत्सव, विवाह, अभिषेक, गृहप्रवेश, अधिकार-प्रदान आदि शुभ कर्मों में उपयोगी बताकर संतान, धन, रोग-निवारण, बंधन-मुक्ति और अमंगल-शमन का फल कहा गया है।

अध्याय २४ — वृद्धकालेश्वरलिङ्ग-माहात्म्य एवं कालोदककूप-प्रभाव (Vṛddhakāleśvara Liṅga and the Power of the Kālōdaka Well)
इस अध्याय में कर्मफल, आदर्श राजधर्म और काशी-केन्द्रित मोक्ष-तत्त्व का क्रमबद्ध वर्णन है। आरम्भ में एक भक्त की मृत्यु के बाद वैष्णव लोक में उन्नति, दिव्य भोग, और शेष पुण्य के कारण पुनर्जन्म लेकर नन्दिवर्धन में धर्मपरायण राजा बनना बताया गया है; राज्य में सत्य, नीति और प्रजाहित की आदर्श स्थिति का चित्रण भी आता है। फिर कथा काशी की ओर मुड़ती है। राजा वृद्धकाल अपनी रानी सहित काशी जाकर अनेक दान करता है और एक लिङ्ग तथा उससे सम्बद्ध कूप की स्थापना करता है। मध्याह्न में एक वृद्ध तपोधन आकर पूछता है कि यह तीर्थ किसने बनाया और लिङ्ग का नाम क्या है; वह उपदेश देता है कि अपने पुण्यकर्म का प्रचार नहीं करना चाहिए, क्योंकि आत्म-प्रशंसा से पुण्य घटता है। राजा कूप से जल लाकर उसे पिलाता है; जल पीते ही तपोधन युवा हो जाता है—कूप की शक्ति प्रकट हो जाती है। तपोधन लिङ्ग को “वृद्धकालेश्वर” और कूप को “कालोदक” नाम देता है तथा दर्शन, स्पर्शन, पूजन, श्रवण और उस जल के सेवन के फल बताता है—विशेषतः बुढ़ापे और रोगों से राहत। वह पुनः प्रतिपादित करता है कि काशी ही परम मुक्ति का स्थल है, चाहे किसी की मृत्यु अन्यत्र हुई हो। अंत में तपोधन लिङ्ग में लीन हो जाता है; “महाकाल” नाम-जप की महिमा और शिवशर्मा की गति तथा काशी-पूजन की कथा सुनने से शुद्धि व उच्च ज्ञान की फलश्रुति कही गई है।

अविमुक्तमाहात्म्यप्रकरणम् — Avimukta Māhātmya and the Dialogue of Skanda with Agastya
अध्याय 25 में व्यास सूत से कहते हैं कि वे कुम्भज ऋषि अगस्त्य से जुड़ी एक परम पावन कथा सुनाएँगे। अगस्त्य अपनी पत्नी सहित एक पर्वत की प्रदक्षिणा करके स्कन्द-वन के मनोहर प्रदेश में पहुँचते हैं—जहाँ नदियाँ, सरोवर, तपोवन और कैलास-खण्ड के समान अद्भुत लोहितगिरि तपस्या के लिए उपयुक्त बताया गया है। वहीं वे षडानन स्कन्द/कार्त्तिकेय के दर्शन करते हैं, दण्डवत् प्रणाम कर वैदिक-स्वर वाले स्तोत्र से उनके विश्वव्यापी गुणों और तारक-वध आदि विजय का गान करते हैं। स्कन्द उत्तर देते हैं कि महाक्षेत्र में अविमुक्त धाम शिव (त्र्यम्बक/विरूपाक्ष) द्वारा रक्षित है, तीनों लोकों में अनुपम है और केवल कर्म-संचय से नहीं, मुख्यतः ईश-कृपा से प्राप्त होता है। वे नीति बताते हैं—मृत्यु का स्मरण, अत्यधिक अर्थ-चिन्ता का त्याग, धर्म को प्रधान रखना और काशी को सर्वोच्च आश्रय मानना। योग, तीर्थ, व्रत, तप, पूजा आदि अनेक साधनों का उल्लेख करके भी अविमुक्त को सहज मुक्तिदायक स्थान के रूप में श्रेष्ठ ठहराते हैं। अविमुक्त में निवास के क्रमिक फल बताए गए हैं—क्षणभर की भक्ति से लेकर आजीवन वास तक, महापापों की शुद्धि और पुनर्जन्म की निवृत्ति। विशेष सिद्धान्त यह है कि काशी में मृत्यु के समय जब स्मृति साथ नहीं देती, तब स्वयं शिव तारक-ब्रह्म का उपदेश देकर जीव को मोक्ष प्रदान करते हैं। अंत में अविमुक्त की अवर्णनीय महिमा और काशी की पवित्रता के स्पर्श-मात्र की भी वांछनीयता प्रतिपादित होती है।

अविमुक्तक्षेत्रप्रादुर्भावः तथा मणिकर्णिकामाहात्म्यम् (Origin of Avimukta and the Glory of Maṇikarṇikā)
अगस्त्य स्कन्द से पूछते हैं कि पृथ्वी पर अविमुक्त क्षेत्र का आरम्भ कैसे हुआ, वह मोक्ष देने वाला क्षेत्र कैसे प्रसिद्ध हुआ, मणिकर्णिका की उत्पत्ति क्या है, और काशी/वाराणसी/रुद्रावास/आनन्दकानन/महाश्मशान आदि नामों की व्युत्पत्ति क्या है। स्कन्द पूर्व में हुए दिव्य उपदेश का वर्णन करते हैं—महाप्रलय में सब कुछ अव्यक्त-सा हो जाता है, फिर शिव-शक्ति के तत्त्वों (प्रकृति, माया, बुद्धि-तत्त्व आदि) के माध्यम से सृष्टि-शक्ति प्रकट होती है। अविमुक्त को पाँच क्रोश परिमाण का क्षेत्र बताया गया है, जिसे प्रलय में भी शिव और शक्ति कभी नहीं छोड़ते; इसलिए इसका नाम ‘अविमुक्त’ है। फिर आनन्दवन में विष्णु के प्राकट्य, कठोर तप, चक्रपुष्करिणी नामक पवित्र सरोवर के उत्खनन और शिव की कृपा-प्राप्ति का प्रसंग आता है। मणिकर्णिका का माहात्म्य इस कथा से समझाया गया है कि शिव के कान का मणि-कुण्डल एक गति से गिर पड़ा, जिससे वह तीर्थ ‘मणिकर्णिका’ कहलाया। अध्याय काशी में किए गए स्नान, दान, जप, व्रत और सदाचार आदि कर्मों के असाधारण फल का वर्णन करता है—अल्प संपर्क, यहाँ तक कि नगर का नाम लेने मात्र से भी पुण्य बढ़ता है, और तुलनात्मक फल-वचनों से काशी की श्रेष्ठता प्रतिपादित होती है।

Gaṅgā-Māhātmya in Kāśī: Theological Discourse on Snāna, Smaraṇa, and Liṅga-Pūjā (Chapter 27)
अध्याय 27 में स्कन्द बताते हैं कि काशी क्यों प्रसिद्ध है और उसका ‘आनन्द-कानन’ स्वरूप देवदेव के उपदेश से कैसे समझा जाए। फिर ईश्वर विष्णु से भागीरथ-प्रसंग कहते हैं—कपिल के क्रोधाग्नि से सगर-पुत्रों का दग्ध होना, पितरों का संकट, और गंगा को प्रसन्न करने हेतु भागीरथ का कठोर तप करने का संकल्प। कथा आगे तत्त्वचर्चा बन जाती है: गंगा को परम, शिव-स्वरूपिणी जलमूर्ति, अनेक लोक-व्यवस्थाओं की आधार, तथा तीर्थों, धर्मों और यज्ञ-शक्तियों की सूक्ष्म निधि कहा गया है। कलियुग में गंगा को प्रधान तारक आश्रय बताया गया है; दर्शन, स्पर्श, स्नान, ‘गंगा’ नाम-जप और तट-निवास को बार-बार पवित्र करने वाला कहा गया है। फलश्रुति में महायज्ञों के तुल्य पुण्य, गंगा-तट पर लिंग-पूजा से मोक्ष, गंगाजल में पिण्ड-तर्पण आदि से पितरों का हित, और गंगा की ओर जाते हुए मार्ग में मृत्यु होने पर भी शुभगति का आश्वासन मिलता है। साथ ही अविश्वास, अपमान और यात्रियों को रोकने जैसे दोषों की चेतावनी देकर अंत में विस्तृत पुण्य-गणना, मंत्र/विधि-संकेत और गंगा की रक्षक व रोग-शमन शक्ति की स्तुतियाँ दी गई हैं।

Gaṅgā-Māhātmya and Pitṛ-Tarpaṇa in Kāśī (Pūrvārdha, Adhyāya 28)
अध्याय 28 काशी-परिप्रेक्ष्य में त्रिपथगा/जाह्नवी/भागीरथी गंगा की पावन-शक्ति का गहन विवेचन करता है। आरम्भ में भूत–भविष्य–वर्तमान के भेद पर संवादात्मक स्पष्टीकरण आता है, फिर गंगा-माहात्म्य का प्रतिपादन होता है। कहा गया है कि गंगा-तट पर विधिपूर्वक किया गया एक बार का भी पिण्डदान और तर्पण पितरों को, यहाँ तक कि कठिन परिस्थितियों में मरे हुए पितरों को भी, कुल-परम्परा के पार तक लाभ पहुँचाता है। इसके बाद उपदेशात्मक दृष्टान्त में विष्णु शिव से पूछते हैं कि जो व्यक्ति आचरण से पतित हो, उसके शरीर का अंश यदि शुद्ध गंगा में गिर जाए तो उसकी गति क्या होती है। शिव वाहीक नामक ब्राह्मण की कथा सुनाते हैं, जो संस्कारों की उपेक्षा और अनैतिक कर्मों के कारण दण्ड भोगता है, पर दैवयोग से उसके शरीर का एक टुकड़ा गंगा में पड़ जाने से अंततः उसका उद्धार और ऊर्ध्वगति होती है। अंत में शुद्धि-साधनों की तुलना करते हुए गंगा-दर्शन, स्पर्श, पान और स्नान तथा काशी की नदी-सम्बन्धी पवित्रता को कलियुग में विशेष रूप से निर्णायक और मोक्षाभिमुख करने वाला बताया गया है।

गङ्गानामसहस्रस्तोत्रम् (Ganga-nāma-sahasra Stotra) and the doctrine of snāna-phala by japa
अगस्त्य एक व्यावहारिक और धर्म-संबंधी प्रश्न उठाते हैं—जब गंगा-स्नान को अद्वितीय फल देने वाला कहा गया है, तो जो दुर्बल हैं, चल नहीं सकते, आलसी हैं या दूर रहते हैं, वे समान फल कैसे पाएँ? (1–5)। स्कन्द उत्तर देते हैं कि सभी तीर्थ और जल पूज्य हैं, पर गंगा का विशेष महात्म्य अनन्य है—शिव द्वारा धारण किए जाने और पाप-हरण की शक्ति के कारण। जैसे अंगूर का स्वाद अंगूर में ही मिलता है, वैसे ही गंगा-स्नान का पूर्ण फल गंगा में ही यथार्थ रूप से प्राप्त होता है (6–10)। फिर वे एक “अत्यन्त गुप्त” विकल्प बताते हैं—गंगा-नाम-सहस्र का स्तोत्र-जप, जिसे केवल योग्य भक्तों (शिवभक्त, विष्णु-भक्ति-परायण, शांत, श्रद्धालु, आस्तिक) को ही देना चाहिए। शुद्धि, अक्षरों की स्पष्टता, मन ही मन जप और प्रयत्नपूर्वक पुनरावृत्ति की विधि कही गई है (11–16)। अध्याय में गंगा के अनेक नामों की विस्तृत माला (17 से आगे) और अंत में फलश्रुति आती है—एक बार पाठ से भी बड़ा पुण्य, निरंतर जप से अनेक जन्मों के पापों का क्षय, गुरु-सेवा में वृद्धि तथा परलोक में शुभ भोग। यह स्तोत्र-जप स्नान की इच्छा रखने वालों के लिए “गंगा-स्नान का प्रतिनिधि” बताया गया है (170–210)।

मणिकर्णिकागङ्गावतरण-प्रवेशानुज्ञा-काशीमाहात्म्य (Maṇikarṇikā, Gaṅgā’s Arrival, Authorized Entry, and the Māhātmya of Kāśī)
स्कन्द अगस्त्य से कहते हैं कि भगीरथ ने तीनों लोकों के कल्याण हेतु गंगा को पृथ्वी पर उतारा, और अंततः काशी की मणिकर्णिका में गंगा का पावन संबंध स्थापित हुआ। इस अध्याय में अविमुक्त-क्षेत्र का महात्म्य तीव्र रूप से प्रकट होता है—काशी को शिव कभी नहीं छोड़ते; शिव-कृपा से यहाँ सामान्य दार्शनिक साधनाओं के बिना भी मोक्ष सुलभ बताया गया है, क्योंकि मृत्यु के समय शिव ‘तारक’ उपदेश देकर जीव का उद्धार करते हैं। फिर क्षेत्र की रक्षात्मक भूगोल-व्यवस्था और नियंत्रित प्रवेश का वर्णन है। देवताओं की रक्षक संस्थाएँ स्थापित होती हैं, असी और वरुणा नामक सीमा-नदियाँ निर्धारित होकर ‘वाराणसी’ नाम का कारण बनती हैं। शिव प्रवेश-नियमन हेतु गणों और एक विनायक को भी नियुक्त करते हैं; विश्वेश्वर की अनुमति बिना आए हुए लोग न टिक पाते हैं, न क्षेत्र-फल के अधिकारी होते हैं। दृष्टांत में मातृभक्त व्यापारी धनंजय अपनी माता के अवशेष लेकर चलता है; वाहक की चोरी और अनधिकृत गमन की कथा से यह सिद्ध किया जाता है कि क्षेत्र का फल केवल अनुज्ञापूर्वक प्रवेश और उचित भाव-समर्पण से मिलता है। अंत में वाराणसी की अनुपम मोक्षदायिनी महिमा का दीर्घ स्तवन है—अनेक प्रकार के प्राणी भी वहाँ देह त्यागकर शिव की देखरेख में श्रेष्ठ गति प्राप्त करते हैं।

कालभैरवप्रादुर्भावः — Origin and Jurisdiction of Kālabhairava in Kāśī
इस अध्याय में संवाद के रूप में अगस्त्य मुनि काशी में स्थित भैरव के तत्त्व, स्वरूप, कार्य, नाम तथा किन शर्तों में वे साधकों को शीघ्र सिद्धि देते हैं—इनका संक्षिप्त किन्तु सुनिश्चित विवरण माँगते हैं। स्कन्द इस वृत्तान्त को काशी-वास के फल को स्थिर करने वाला और पाप-शोधन करने वाला बताकर विस्तार से कहने का वचन देते हैं। फिर एक सिद्धान्त-प्रसंग में दैवी माया और स्वघोषित अधिकार की सीमा दिखाई जाती है। ब्रह्मा और क्रतु-रूप (नारायणांश) के बीच श्रेष्ठता-विवाद होता है; वेदों को प्रमाण मानकर पूछने पर चारों वेद रुद्र/शिव को एकमात्र परम तत्त्व घोषित करते हैं। फिर भी मोहग्रस्त होकर वे शिव के तपस्वी, श्मशान-निवासी रूप पर शंका करते हैं। तब प्रणव (ॐ) साक्षात् प्रकट होकर बताता है कि शिव की लीला उनकी स्वशक्ति से अभिन्न है। महान तेज प्रकट होता है, उग्र शिव-रूप से कालभैरव उत्पन्न होते हैं और काशी के नित्य अधिपति तथा धर्म-दण्डधारी नियामक के रूप में नियुक्त किए जाते हैं। भैरव के नाम उनके कार्यों से जोड़े जाते हैं—‘भरण’ करने से भैरव, काल को भी भयभीत करने वाले, और अधर्म का दण्ड देने वाले। वे ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काटते हैं और लोक-शिक्षा हेतु प्रायश्चित्त का आदर्श दिखाने के लिए कापालिक व्रत (कपाल धारण) करने का आदेश पाते हैं। ब्रह्महत्या देवी उनका पीछा करती है, पर वाराणसी पहुँचने पर उसका प्रवेश रुक जाता है। आगे भैरव का विष्णु-धाम जाना, विष्णु का शिव-आचरण पर प्रश्न, और व्रत का उपदेशात्मक प्रयोजन बताया गया है। अंत में शिव-नाम और भक्ति की पाप-नाशक शक्ति, काशी की विशेष पावनता, तथा काल-जल में स्नान और पितृ-उद्धारक अर्पण आदि कर्मों का संकेत मिलता है।

हरिकेशोपाख्यानम् (Harikeśa Upākhyāna) — The Account of Harikeśa and the Call of Vārāṇasī
अगस्त्य मुनि स्कन्द से पूछते हैं कि हरिकेश कौन है—उसकी वंश-परंपरा, तपस्या, और वह कैसे भगवान को प्रिय होकर दण्डनायक/दण्डपाणि जैसे लोक-प्रशासन के संकेतों से जुड़ता है। स्कन्द गन्धमादन के यक्ष-वंश का वर्णन करते हैं—रत्नभद्र और उसके पुत्र पूर्णभद्र। पूर्णभद्र ऐश्वर्यवान होते हुए भी संतान-हीनता से दुखी है; वह कहता है कि ‘गर्भरूप’ उत्तराधिकारी के बिना धन और प्रासाद-वैभव भी खोखले हैं। तब उसकी पत्नी कनककुण्डला धर्मयुक्त सलाह देती है—पुरुषार्थ और पूर्वकर्म साथ चलते हैं, पर निर्णायक उपाय शंकर की शरण है; शिव-भक्ति से लौकिक फल भी मिलते हैं और परम कल्याण भी। मृत्युञ्जय, श्वेतकेतु, उपमन्यु आदि उदाहरण देकर शिव-सेवा की प्रभावशीलता बताई जाती है। पूर्णभद्र नादेश्वर/महादेव की आराधना करता है और उसे हरिकेश नाम का पुत्र प्राप्त होता है। बालक की पहचान अनन्य शिव-निष्ठा से होती है—वह धूलि-लिंग बनाता, शिव-नाम जपता और त्रिनेत्र प्रभु के सिवा कुछ नहीं मानता। पिता उसे गृहस्थ-धर्म और धन-प्रबंधन सिखाना चाहता है; इससे व्यथित होकर हरिकेश घर छोड़ देता है। ‘जिसका कोई आश्रय नहीं, उसका आश्रय काशी है’ यह वचन स्मरण कर वह वाराणसी जाता है। काशी को आनन्दवन/आनन्दकानन के रूप में, तथा वहाँ देह त्याग से मुक्ति के सिद्धान्त सहित वर्णित किया गया है; शिव पार्वती से काशी की तारक महिमा—एक जन्म में मोक्ष, और क्षेत्र-त्यागियों के लिए विघ्नों से रक्षा—कहते हैं। इस प्रकार अध्याय भक्ति-चरित, नीति और काशी की मोक्षदायिनी भूगोल-धारणा को जोड़कर आगे हरिकेश के दण्डपाणि/दण्डनायक-सम्बन्ध की भूमिका बनाता है।

ज्ञानवापी-ज्ञानोदतीर्थमाहात्म्य (Jñānavāpī and Jñānoda Tīrtha Māhātmya)
इस अध्याय में अगस्त्य मुनि स्कन्द से पूछते हैं कि स्कन्दज्ञानोद-तीर्थ की महिमा क्या है और ज्ञानवापी की प्रशंसा देवगण भी क्यों करते हैं। स्कन्द प्राचीन कथा सुनाते हैं—एक युग में ईशान (रुद्र-रूप) काशी-क्षेत्र में आए, सिद्धों, योगियों, गन्धर्वों और गणों द्वारा पूजित तेजस्वी महालिङ्ग को देखकर उसे शीतल जल से स्नान कराने का संकल्प किया। उन्होंने त्रिशूल से एक कुण्ड खोदा, भूमिगत जलराशि प्रकट की और सहस्रों धाराओं व घटों से बार-बार अभिषेक किया। शिव प्रसन्न हुए और वर दिया। ईशान ने प्रार्थना की कि यह अनुपम तीर्थ शिव के नाम से प्रसिद्ध हो। शिव ने इसे परम ‘शिव-तीर्थ’ घोषित कर ‘शिवज्ञान’ को दिव्य महिमा से द्रवित ज्ञान बताकर इसका नाम ‘ज्ञानोद’ स्थापित किया। केवल दर्शन से शुद्धि, स्पर्श व आचमन से महान यज्ञों के तुल्य फल, तथा यहाँ श्राद्ध-पिण्डदान से गया, पुष्कर, कुरुक्षेत्र आदि की अपेक्षा भी बढ़ा हुआ पितृ-फल बताया गया है। अष्टमी/चतुर्दशी का उपवास और एकादशी को नियत आचमन सहित व्रत करने से अंतर्लिङ्ग-साक्षात्कार का फल कहा गया है। शिव-तीर्थ के जल के दर्शन से बाधक भूत-प्रेत और रोग शांत होते हैं, और ज्ञानोद जल से लिङ्गाभिषेक करना समस्त तीर्थों के जल से अभिषेक के समान माना गया है। आगे ज्ञानवापी से जुड़ा इतिहासनुमा प्रसंग आता है—एक ब्राह्मण परिवार की अत्यंत धर्मपरायण कन्या, उसका नित्य स्नान व मंदिर-सेवा, विद्यााधर द्वारा अपहरण-प्रयत्न, राक्षस से संघर्ष, मृत्यु और कर्म-परिणाम, तथा आगे के जन्मों में विभूति-रुद्राक्ष और लिङ्ग-पूजा को आभूषणों से श्रेष्ठ मानकर भक्ति में स्थिर होना। अंत में काशी के कुछ तीर्थों/देवालयों का क्रमवार उल्लेख कर उनके फल बताए गए हैं, जिससे अध्याय काशी की पवित्र-भूगोल-रचना को भी पुष्ट करता है।

Maṇikarṇikā as Mokṣabhū and Jñānavāpī as Jñānadā (Liberation-Field and Knowledge-Well)
अध्याय 34 काशी के मोक्षदायी भू-दृश्य का दो भागों में निरूपण करता है। पहले भाग में मणिकर्णिका को प्रतीकात्मक स्वर्गद्वार के निकट स्थित बताकर वहाँ शंकर की मुक्तिदायी भूमिका का वर्णन है—संसार से पीड़ित जीवों को शिव ‘ब्रह्मस्पर्शी’ श्रुति का उपदेश देकर तारते हैं। मणिकर्णिका की ‘मोक्षभूमि’ के रूप में श्रेष्ठता प्रतिपादित है; योग, सांख्य या व्रत-आधारित अन्य उपायों से भी परे, यहाँ मोक्ष सहज उपलब्ध बताया गया है, और यह स्थान एक साथ ‘स्वर्गभूमि’ तथा ‘मोक्षभूमि’ कहा गया है। इसके बाद व्यापक सामाजिक-धार्मिक दृष्टि आती है—वेदाध्ययन और यज्ञ में लगे ब्राह्मण, याग करने वाले राजा, पतिव्रता स्त्रियाँ, धर्मार्जित धन वाले व्यापारी, सदाचार-मार्गी शूद्र, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा एकदंडी/त्रिदंडी संन्यासी—सभी निःश्रेयस के लिए मणिकर्णिका की ओर आते हैं। दूसरे भाग में श्री विश्वेश्वर के पास ज्ञानवापी का प्रसंग है। कलावती ज्ञानवापी को देखकर (चित्र में भी) और स्पर्श करके तीव्र भावात्मक व शारीरिक परिवर्तन से गुजरती है—मूर्छा, आँसू, देह-कंपन; फिर होश में आकर उसे पूर्वजन्म का ज्ञान (भवांतर-ज्ञान) प्रकट होता है। सेवक उसे शांत करने के उपाय करते हैं, पर ग्रंथ इसे स्थान-शक्ति से उत्पन्न जागरण मानता है। कलावती काशी में ब्राह्मण-कन्या के रूप में पूर्वजन्म, फिर अपहरण, संघर्ष, शाप-मोचन और अंततः राजकन्या के रूप में पुनर्जन्म का वृत्तांत कहती है—जिससे ज्ञानवापी की ‘ज्ञानदायिनी’ महिमा सिद्ध होती है। अंत में फलश्रुति है कि ज्ञानवापी की शुभ कथा का पाठ, जप या श्रवण करने से शिवलोक में मान प्राप्त होता है।

अविमुक्तमहात्म्य–सदाचारविधि (Avimukta’s Supremacy and the Discipline of Sadācāra)
इस अध्याय में कुम्भयोनि (अगस्त्य) अविमुक्त-काशी की महिमा गाते हैं और उसे समस्त तीर्थों व मोक्ष-क्षेत्रों से श्रेष्ठ बताते हैं। वे गङ्गा, विश्वेश्वर और काशी—इस त्रय को विशेष तारक-संयोग के रूप में प्रस्तुत करते हैं। फिर वे प्रश्न उठाते हैं कि कलि/तिष्य युग में इन्द्रियाँ अस्थिर हैं और तप, योग, व्रत, दान आदि की शक्ति घट गई है—तो मुक्ति का लाभ व्यवहार में कैसे सुलभ हो? स्कन्द उत्तर देते हैं कि असाधारण तपस्या के स्थान पर सदाचार ही धर्म का मूल ‘उपाय’ है। वे प्राणियों और ज्ञाताओं की श्रेणियाँ बताते हुए अनुशासित ब्राह्मण-आचरण को समाज-धर्म का आधार मानते हैं और सदाचार को धर्म की जड़ कहते हैं। फिर यम (सत्य, क्षमा, अहिंसा आदि) और नियम (शौच, स्नान, दान, स्वाध्याय, उपवास) गिनाकर काम-क्रोध आदि आन्तरिक शत्रुओं पर विजय का उपदेश देते हैं तथा यह दृढ़ करते हैं कि मृत्यु के बाद केवल धर्म ही साथ जाता है। इसके बाद नित्य शुद्धि और प्रातःकर्म का विस्तृत विधान आता है—मलोत्सर्ग में दिशा-नियम व गोपनीयता, मिट्टी-जल से शुद्धि की गणना, आचमन की विधि व निषेध, दन्तधावन के नियम (कुछ चन्द्र-तिथियों में निषेध सहित), मंत्र-सम्बद्ध प्रातःस्नान की प्रशंसा, तथा प्रातःसन्ध्या, तर्पण, होम और भोजन-सम्बन्धी मर्यादाएँ। अंत में इसे ‘नित्यतम’ साधन बताकर धार्मिक जीवन को स्थिर करने वाला मार्ग कहा गया है।

Sadācāra and Brahmacarya Regulations (सदाचार–ब्रह्मचर्यविधान)
स्कन्द कुम्भज (अगस्त्य) से कहते हैं कि वे सदाचार का और अधिक स्पष्ट निरूपण करेंगे, जिससे बुद्धिमान साधक अज्ञान के अन्धकार में न गिरे। अध्याय में द्विज-व्यवस्था बताई गई है—माता से जन्म और उपनयन से “दूसरा जन्म”—और गर्भाधान आदि वैदिक संस्कारों से लेकर बाल्य-क्रियाओं तथा वर्णानुसार समय पर होने वाले उपनयन तक का संक्षिप्त क्रम दिया गया है। फिर ब्रह्मचारी के नियम—शौच, आचमन, दन्तधावन, मन्त्रपूर्वक स्नान, सन्ध्या-उपासना, अग्निकार्य, नमस्कार-विधि, तथा गुरु और वृद्धों की सेवा—विस्तार से बताए गए हैं। भिक्षा का आचार, मितभाषण, संयमित भोजन, और अतिभोग, हिंसा, निन्दा, तथा अशुद्ध/इन्द्रियासक्त संसर्ग से बचने की आज्ञा दी गई है। मेखला, यज्ञोपवीत, दण्ड और अजिन के पदार्थ व प्रमाण वर्णभेद से बताए गए हैं, तथा उपकुर्वाण और नैष्ठिक—इन दो प्रकार के ब्रह्मचारियों का वर्णन है। आश्रम-धर्म की अनिवार्यता पर बल देकर कहा गया है कि आश्रम-आधार के बिना किए गए व्रत-कर्म निष्फल होते हैं। वेदाध्ययन की महिमा, प्रणव और व्याहृतियों सहित गायत्री-जप, तथा वाचिक, उपांशु और मानसिक जप के फल-भेद का प्रतिपादन किया गया है। आचार्य, उपाध्याय और ऋत्विज के स्थान-क्रम के साथ माता-पिता-गुरु—इन तीनों की तुष्टि को परम तप कहा गया है। शुद्ध ब्रह्मचर्य और विश्वेश्वर की कृपा से काशी-प्राप्ति, ज्ञान और निर्वाण की सिद्धि बताकर, आगे स्त्री-लक्षण और विवाह-योग्यता के विचार की ओर प्रसंग बढ़ाया गया है।

Strī-lakṣaṇa-vicāra (Examination of Women’s Physical Marks) | Chapter 37
इस अध्याय में स्कन्द गृहस्थ-जीवन के हित हेतु स्त्रियों के शुभ-अशुभ शारीरिक लक्षणों का उपदेश देते हैं। कहा गया है कि ‘लक्षणवती’ पत्नी से गृह-सुख, समृद्धि और कल्याण बढ़ता है, इसलिए विवाह-चयन में लक्षणों की परीक्षा आवश्यक है। यहाँ आठ आधार बताए गए हैं—देह-आकृति, आवर्त/घुमाव, गन्ध, छाया, तेज/स्वभाव, स्वर, चाल और वर्ण। फिर पाँव से सिर तक क्रमशः पाद, उँगलियाँ, नख, टखने, पिंडली, घुटने, जाँघ, कटि, नितम्ब, गुप्तांग, उदर, नाभि, पार्श्व, वक्ष, स्तन, कंधे, भुजाएँ, हाथ व हस्तरेखाएँ, कंठ, मुख, ओष्ठ, दाँत, नेत्र, केश आदि के लक्षणों का वर्णन कर उनके फल—धन, प्रतिष्ठा, संतान, या विपत्ति—निमित्त-शैली में बताए गए हैं। हथेली और तलवे पर कमल, शंख, चक्र, स्वस्तिक आदि चिह्नों तथा रेखा-विन्यास के फल भी विशेष रूप से समझाए गए हैं। अंत में विवेकी जन को ‘दुर्लक्षण’ से बचकर शुभ-लक्षणयुक्त कन्या का वरण करने की सलाह दी जाती है और आगे विवाह-प्रकारों की चर्चा का संकेत दिया जाता है।

Adhyāya 38 — Vivāha-bheda, Gṛhastha-ācāra, Atithi-sevā, and Nitya-karma (Marriage Types, Householder Ethics, Hospitality, Daily Duties)
इस अध्याय में स्कन्द द्वारा गृहस्थ-धर्म का संक्षिप्त किन्तु गहन धर्म-नीति उपदेश दिया गया है। आरम्भ में विवाह के आठ भेद बताए गए हैं—ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य को धर्म्य माना गया है, और आसुर, गान्धर्व, राक्षस, पैशाच को निन्दित या हीन; साथ ही प्रत्येक के शुद्धि-लाभ या दोष-परिणाम का संकेत किया गया है। फिर गृहस्थ-आचार का विस्तार होता है—ऋतु-काल में ही दाम्पत्य-समागम, अनुचित समय-स्थान में सावधानी, शौच-पवित्रता, वाणी-संयम, इन्द्रिय-निग्रह और सामाजिक व्यवहार के नियम। विशेष रूप से पञ्चयज्ञ, वैश्वदेव और अतिथि-सेवा का महत्त्व बताया गया है; अतिथि का सत्कार पुण्यदायक और उपेक्षा दोषकारक कही गई है। दान के फल, अनध्याय (अध्ययन-निषेध) की स्थितियाँ, सत्य किन्तु हितकारी वचन, तथा हानिकारक संगति से बचने जैसी नीतियाँ भी दी गई हैं। अंत में काशी-केन्द्रित प्रसंग की ओर संकेत करते हुए अविमुक्त क्षेत्र की आगामी महिमा-वर्णना की भूमिका बनती है।

Avimukta-Kāśī: Accelerated Merit, Avimukteśvara Liṅga, and a Royal-Mythic Etiology
अध्याय 39 में स्कन्द अगस्त्य को अविमुक्त-काशी में स्थित एक पाप-नाशक आख्यान सुनाते हैं। आरम्भ में काशी-क्षेत्र का वर्णन परम ब्रह्म के रूप में होता है—कल्पना से परे, निराकार, अव्यक्त—और कहा जाता है कि वही परम तत्त्व काशी में विशेष रूप से मोक्षदायक ढंग से व्याप्त है। फिर साधना का तुलनात्मक उपदेश आता है: जो फल अन्य स्थानों में कठोर योग, महान दान या दीर्घ तप से मिलता है, वह काशी में पुष्प-पत्र-फल-जल के छोटे अर्पण, थोड़ी देर की ध्यान-स्थिरता, गंगा-स्नान और अन्न/भिक्षा-दान से भी ‘महान’ फल के रूप में प्राप्त होता है, क्योंकि स्थान की महिमा उसे बढ़ा देती है। इसके बाद एक कारण-कथा दी जाती है: प्राचीन युग में दीर्घ सूखे और समाज-व्यवस्था के टूटने पर ब्रह्मा राजा रिपुञ्जय (दिवोदास) को धर्म-स्थापना हेतु नियुक्त करते हैं; रुद्र/शिव, मन्दर पर्वत और देवताओं के स्थान-परिवर्तन व संवाद के प्रसंगों के बीच यह सिद्ध होता है कि शिव काशी में लिङ्ग-रूप से निरन्तर विराजमान रहते हैं। अंत में अविमुक्तेश्वर को ‘आदि-लिङ्ग’ कहा गया है—उसका दर्शन, स्मरण, स्पर्श, पूजन और नाम-श्रवण भी शीघ्र पाप-क्षय कर कर्म-बन्धन ढीला करता है; साथ ही अन्य लिङ्गों के समय-समय पर संगम, तथा नियमयुक्त जप और भक्ति की विशेष प्रशंसा की गई है।

Avimukteśvara–Kṣetra-prāpti, Gṛhastha-dharma, and Ethical Regulations (अविमुक्तेश्वर-क्षेत्रप्राप्ति तथा गृहस्थधर्म-नियमाः)
इस अध्याय में प्रश्नोत्तर रूप से धर्म-उपदेश होता है। अगस्त्य मुनि अविमुक्तेश के माहात्म्य के विषय में और अधिक जानना चाहते हैं तथा पूछते हैं कि अविमुक्तेश्वर-लिंग और अविमुक्त-क्षेत्र की ‘प्राप्ति’ या सम्यक् उपासना कैसे की जाए। स्कन्द स्तुति से आगे बढ़कर नियम और आचार की ओर ले जाते हैं और काशी-क्षेत्र में फल चाहने वालों के लिए आचरण-संहिता बताते हैं। यहाँ निषिद्ध भोजन, भोजन-व्यवहार, हिंसा का नैतिक भार—विशेषतः मांसाहार और सीमित वैदिक/याज्ञिक प्रसंगों में उसके अपवाद—का विवेचन है। धर्म को सुख और उच्च पुरुषार्थों का कारण बताकर गृहस्थ-धर्म में दान की शुद्ध विधि, अतिथि-सत्कार, आश्रितों का पालन, पञ्च-यज्ञ और नित्य कर्तव्यों का निर्देश दिया गया है। साथ ही विवाह-उचितता, शौच-शुद्धि के नियम, स्त्रियों के संदर्भ में शुद्धता-विचार, कटु/हानिकारक वाणी का निषेध तथा शोषणकारी आर्थिक व्यवहार पर रोक कही गई है। अंत में यह प्रतिपादित होता है कि काशी में संयमित जीवन स्वयं एक पूर्ण साधना-पथ है और काशी-सेवा पुण्य का परम शिखर है।

वनाश्रम–परिव्राजकधर्मः तथा षडङ्गयोग–प्राणायामविधिः (Forest-Dweller and Renunciant Ethics; Six-Limbed Yoga and Prāṇāyāma Method)
इस अध्याय में स्कन्द तृतीय और चतुर्थ आश्रम के धर्म का क्रमबद्ध उपदेश देते हैं। गृहस्थ से वानप्रस्थ बनने पर ग्राम्य भोजन का त्याग, परिग्रह का संयम, पञ्चयज्ञ का पालन, शाक‑मूल‑फल आदि से तपस्वी जीवन, अन्न के शोधन‑संग्रह के व्यावहारिक उपाय तथा निषिद्ध पदार्थों से बचने की शिक्षा दी गई है। फिर परिव्राजक/यति का आदर्श बताया गया है—एकाकी भ्रमण, अनासक्ति, समभाव, वाणी का संयम, अहिंसा में अत्यन्त सावधानी (ऋतु‑नियम सहित), न्यूनतम उपकरण (धातु‑पात्रों से विरति, सरल दण्ड‑वस्त्र), और इन्द्रिय‑विषयों में फँसने की चेतावनी। इसके बाद मोक्षोपदेश आता है: आत्मज्ञान को निर्णायक कहा गया है, योग को उसका साधन, और अभ्यास को सिद्धि का मार्ग। योग की परिभाषाओं का विचार कर मन‑इन्द्रियों का निग्रह करके चेतना को क्षेत्रज्ञ/परमात्मा में स्थिर करने का विधान बताया गया है। षडङ्गयोग—आसन, प्राणसंरोध (प्राणायाम), प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि—का क्रम, सिद्धासन/पद्मासन/स्वस्तिक आदि आसन, उपयुक्त स्थान, प्राणायाम की मात्रा‑क्रम, बलपूर्वक साधना के जोखिम, नाड़ी‑शुद्धि के लक्षण और नियमन के फल वर्णित हैं। अंत में योगस्थैर्य से कर्म‑बाध्यता की निवृत्ति और मुक्ति, तथा योगयुक्त साधक के लिए काशी में कैवल्य की विशेष सुलभता कही गई है।

कालचिह्नवर्णनम् (Signs of Approaching Death and the Turn to Kāśī)
इस अध्याय में संवाद के रूप में अगस्त्य मुनि कुमार (स्कन्द) से पूछते हैं कि मृत्यु का समय निकट आने पर देहधारियों में कौन-कौन से चिह्न प्रकट होते हैं और उन्हें कैसे पहचाना जाए। कुमार नासिका से श्वास-प्रवाह के असामान्य रूप, इन्द्रियों की भ्रान्ति, शरीर का सूखना व रंग-परिवर्तन, छाया/प्रतिबिम्ब में विकार तथा अशुभ स्वप्नों के संकेत बताते हैं; कई लक्षणों के साथ वे शेष आयु का अनुमान भी दिन-मास के रूप में बताते हैं। फिर चर्चा निदान से उपदेश की ओर मुड़ती है—काल को कोई छल नहीं सकता; इसलिए योग-साधना और संयम अपनाना चाहिए, अथवा काशी की शरण लेनी चाहिए। विशेष रूप से विश्वेश्वर को निर्णायक आश्रय कहा गया है। अंतिम भाग में काशी-माहात्म्य को दृढ़ करते हुए बताया गया है कि वाराणसी में निवास, विश्वेश्वर का पूजन-दर्शन-स्पर्श और नगर की तारक महिमा कलि, काल, जरा और पाप-भय को भी दबा देती है। अंत में जरा को पतन का प्रमुख चिह्न मानकर यह व्यावहारिक प्रेरणा दी जाती है कि दुर्बलता आने से पहले ही काशी का आश्रय ग्रहण कर लेना चाहिए।

दिवोदास-राज्यवर्णनम् तथा वैश्वानरमूर्त्यपसारणम् (Divodāsa’s Rule in Kāśī and the Withdrawal of the Vaiśvānara Form)
अगस्त्य मुनि स्कन्द से पूछते हैं कि त्रिलोचन शिव ने काशी क्यों छोड़ी और मन्दर पर्वत क्यों गए, तथा राजा दिवोदास का राज्य कैसे स्थापित हुआ। स्कन्द बताते हैं कि ब्रह्मा के वचन का मान रखकर शिव मन्दर चले गए; उनके साथ अन्य देवता भी अपने-अपने पवित्र स्थानों को त्यागकर वहाँ चले गए। दिव्य सभाएँ हट जाने पर दिवोदास का राज्य निर्विघ्न हो गया; उन्होंने वाराणसी को स्थिर राजधानी बनाकर प्रजा-धर्म के अनुसार न्यायपूर्वक शासन किया। अध्याय में आदर्श नगर-जीवन का चित्र है—वर्णाश्रम-धर्म का पालन, विद्या और अतिथि-सत्कार की वृद्धि, अपराध और शोषण का अभाव, तथा वेद-पाठ, संगीत और मंगलध्वनियों से भरा सार्वजनिक वातावरण। देवता राजा की नीति-व्यवस्था (षाड्गुण्य, चतुरुपाय आदि) में कोई दुर्बलता न पाकर गुरु से परामर्श करते हैं और परोक्ष उपाय चुनते हैं। इन्द्र, अग्नि (वैश्वानर) को आदेश देते हैं कि वह अपनी स्थापित मूर्ति/स्थिति को राजा के क्षेत्र से हटा ले; अग्नि के हटते ही रसोई और यज्ञ-हवन में बाधा पड़ती है, राजपाकशाला में अग्नि लुप्त हो जाती है। दिवोदास इसे दैवी चाल समझते हैं—अध्याय दिखाता है कि श्रेष्ठ शासन के साथ भी सामाजिक-यज्ञीय व्यवस्था पर अतिमानवीय दबाव पड़ सकता है।

काशीवियोगज्वरः, मणिकर्णिकामाहात्म्यस्तुति, दिवोदासवियोजनार्थं योगिन्यादेशः (Kāśī-Viyoga Fever; Praise of Maṇikarṇikā; Commissioning the Yoginīs regarding Divodāsa)
अध्याय 44 में कथा तीन चरणों में आगे बढ़ती है। (1) स्कन्द शिव का दिव्य रत्नमय धाम में वर्णन करते हैं, पर वे ‘काशी-वियोगज्वर’ से तप्त दिखते हैं। विष से अचेतन न होने वाले नीलकण्ठ शिव का चन्द्रकिरणों से ‘तपना’ एक विरोधाभास है—यह शारीरिक रोग नहीं, काशी की मोक्षदायिनी महिमा को उभारने का कथात्मक संकेत है। (2) पार्वती शिव को आश्वस्त करती हैं और काशी, विशेषतः मणिकर्णिका, की स्तुति करती हैं—उसके समान कोई लोक नहीं; वहाँ भय और पुनर्जन्म का नाश होता है; काशी में त्याग/मरण से मुक्ति सहज है, केवल तप, कर्मकाण्ड या विद्या से वैसी सिद्धि दुर्लभ है। (3) शिव लौटने को उद्यत होते हैं, पर धर्म-नीति का बंधन सामने आता है—ब्रह्मा की आज्ञा से दिवोदास काशी का धर्मपूर्वक शासन कर रहा है, अतः शिव उसे बलपूर्वक हटाना नहीं चाहते। वे योगिनियों को आदेश देते हैं कि योगमाया से दिवोदास का काशी में रहने का मोह शिथिल हो, ताकि वह स्वयं हटे और धर्म का उल्लंघन किए बिना वाराणसी का पुनर्नवीकरण हो।

योगिनीवृन्दप्रवेशः, नामजपफलम्, पूजाकालविधानम् (Yoginī Host’s Entry, Fruits of Name-Recitation, and Worship Timing)
इस अध्याय में स्कन्द बताते हैं कि योगिनियों का एक समूह माया से छिपकर काशी में प्रवेश करता है। वे अलग-अलग सामाजिक रूप और विशेष कौशल धारण कर घरों और सार्वजनिक स्थानों में बिना पहचाने विचरती हैं, जिससे काशी की सूक्ष्म शक्ति-व्यवस्था और सतर्कता का संकेत मिलता है। वे विचार करती हैं कि स्वामी अप्रसन्न हों तब भी काशी को छोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि यह चारों पुरुषार्थों की सिद्धि देने वाली और शम्भु का अद्वितीय शक्ति-क्षेत्र है। फिर संवादात्मक रूप में व्यास योगिनियों के नाम, काशी में उनके भजन का फल, उत्सव-काल और पूजाविधि पूछते हैं। स्कन्द योगिनियों के नामों की रक्षात्मक सूची देते हैं और फलश्रुति कहते हैं कि दिन में तीन बार नाम-जप करने से उपद्रव शांत होते हैं तथा शत्रु-भूतादि से होने वाले कष्ट नष्ट हो जाते हैं। अंत में धूप-दीप, नैवेद्य आदि की व्यवस्था, शरद्-काल की महापूजा, आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी-प्रधान क्रम, कृष्णपक्ष की रात्रि-क्रियाएँ, निर्दिष्ट द्रव्यों सहित होम-संख्या, और चित्र कृष्ण प्रतिपदा की वार्षिक यात्रा द्वारा क्षेत्र-विघ्न-शांति का विधान आता है; मणिकर्णिका में नमस्कार को विघ्न-रक्षा का परम साधन कहा गया है।

लोळार्क-आदित्यप्रादुर्भावः (Manifestation and Glory of Lolārka Āditya at Asisaṃbheda)
इस अध्याय में स्कन्द बताते हैं कि योगिनी-प्रसंग के बाद भगवान् सूर्य (अंशुमाली/रवि) को शुभ वाराणसी भेजते हैं कि वे देखें—धर्ममूर्ति राजा दिवोदास को क्या अधर्म-विरोध के द्वारा विचलित किया जा सकता है। साथ ही चेतावनी दी जाती है कि धर्म-प्रतिष्ठित नरेश की निन्दा महादोष है, और काशी में धर्म-निश्चय स्थिर रहने पर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मात्सर्य और अहंकार जैसे विकार विजय नहीं पा सकते। रवि काशी-दर्शन की लालसा से एक वर्ष तक अनेक वेश धारण करते हैं—तपस्वी, भिक्षुक, नये कर्मकाण्ड का प्रवर्तक, मायावी, विद्वान, गृहस्थ, संन्यासी—परन्तु राजा के राज्य में कोई नैतिक दोष नहीं पाते। कार्य सिद्ध न होने के भय से वे काशी में ही रहने का विचार करते हुए उसके अनुपम माहात्म्य का गुणगान करते हैं कि वह प्रवेश करने वालों के दोषों को भी शान्त कर देती है। तब वे काशी में द्वादश-आदित्य रूप से सूर्य-प्रतिष्ठा करते हैं, जिनमें ‘लोळार्क’ विशेष है—काशी को देखने की तीव्र लोलता के कारण। लोळार्क का स्थान दक्षिण दिशा में असिसम्भेद बताया गया है। मार्गशीर्ष के आसपास वार्षिक यात्रा, विशेषतः षष्ठी/सप्तमी तिथि और रविवार को, गङ्गा–असि संगम में स्नान, श्राद्ध-विधि, दान और कर्मों के फल की विशेष वृद्धि—विशेषकर सूर्यग्रहण में—इन व्रत-तीर्थों का वर्णन है, जो प्रसिद्ध तीर्थों से भी श्रेष्ठ फल देने वाले कहे गये हैं। अंत में इसे केवल प्रशंसा नहीं, सत्य कथन बताकर, वेद-धर्म के विरोधी निन्दकों के प्रति निषेध किया गया है।

Uttarārka–Barkarīkuṇḍa Māhātmya (The Glory of Uttarārka and the Origin of Barkarī Kuṇḍa)
इस अध्याय में काशी के उत्तर दिशा में स्थित सूर्य-तीर्थ का वर्णन है। वहाँ ‘अर्ककुण्ड’ नामक परम पवित्र सरोवर है, जिसके अधिष्ठाता तेजस्वी देव ‘उत्तरार्क’ हैं—वे काशी के रक्षक और कष्ट-निवारक माने गए हैं। स्कन्द आगे इसकी उत्पत्ति-कथा कहते हैं। आत्रेय वंश के प्रियव्रत नामक ब्राह्मण, जो सदाचारी और अतिथि-सेवी थे, अपनी गुणी व कुशल पुत्री के लिए योग्य वर न मिलने की चिंता में ‘चिन्ता-ज्वर’ से ग्रस्त होकर देह त्याग देते हैं। उनकी पत्नी पतिव्रता धर्म के अनुसार उनके साथ ही प्राण त्याग देती है और पुत्री अनाथ हो जाती है। वह दृढ़ ब्रह्मचर्य धारण कर उत्तरार्क के समीप कठोर तप करती है; प्रतिदिन एक बकरी (अजा) उसके तप की शांत साक्षी बनकर आती है। शिव पार्वती सहित उसकी तपस्या देखकर, देवी की प्रेरणा से वर देते हैं। तपस्विनी पहले अपने लिए नहीं, उस बकरी के लिए कृपा माँगती है—परहित की भावना का आदर्श प्रस्तुत करती हुई। देव दम्पति कहते हैं कि धन-संचय टिकता नहीं, पर दूसरों का उपकार स्थायी फल देता है। पार्वती वर देती हैं कि वह उनकी प्रिय सखी बनेगी, दिव्य गुणों से विभूषित होगी; साथ ही वह काशी की राजकन्या के रूप में प्रसिद्ध होकर सांसारिक समृद्धि और परम मुक्ति पाएगी। अध्याय में विधान है कि पुष्य मास के रविवार को उत्तरार्क/अर्ककुण्ड में शांत, शीतल-चित्त होकर प्रातः स्नान सहित वार्षिक व्रत किया जाए। परंपरा से अर्ककुण्ड ‘बर्करीकुण्ड’ कहलाता है और वहाँ उस कन्या की प्रतिमा-पूजा का निर्देश है। अंत में फलश्रुति है कि लोलार्क-उत्तरार्क प्रसंग सहित यह कथा सुनने से रोग और दरिद्रता दूर होती है।

Adhyāya 48: Sāmbasya Śāpaḥ, Vārāṇasī-yātrā, and the Māhātmya of Sāmbāditya and Sāmbakuṇḍa (Samba’s Curse and Solar Worship in Kāśī)
इस अध्याय में स्कन्द द्वारका की कथा कहते हैं। नारद मुनि भव्य नगर में आते हैं और श्रीकृष्ण उनका सत्कार करते हैं; परन्तु अपने सौन्दर्य के गर्व में डूबा कृष्णपुत्र साम्ब उन्हें उचित प्रणाम नहीं करता। नारद एकान्त में साम्ब के इस आचरण और उसके सामाजिक-नैतिक दुष्परिणाम—विशेषतः युवावस्था के सौन्दर्य से स्त्रियों के चित्त का विचलित होना—कृष्ण को बताते हैं। तब कृष्ण विचार करके स्त्रियों की सभा के बीच अपने अन्तःपुर में साम्ब को बुलाते हैं और अनुशासन-शोधन हेतु उसे कुष्ठ (कोढ़) का शाप देते हैं। फिर उपचार का मार्ग बताया जाता है—कृष्ण साम्ब को काशी भेजते हैं, जहाँ विश्वेश्वर के अधीन शैव-क्षेत्र और पवित्र तीर्थजल प्रायश्चित्त व शुद्धि में समर्थ हैं। काशी में साम्ब सूर्यदेव (अंशुमाली/आदित्य) की आराधना करता है, साम्बकुण्ड से सम्बद्ध होता/उसकी स्थापना करता है और स्नान-पूजन से अपना स्वाभाविक रूप व स्वास्थ्य पुनः प्राप्त करता है। फलश्रुति में कहा है कि रविवार प्रातः साम्बकुण्ड में स्नान, साम्बादित्य का पूजन तथा माघ शुक्ल सप्तमी (रवि-सप्तमी) के व्रत से रोग-निवारण, शोक-हरण और कल्याण प्राप्त होता है; अंत में प्रसंग द्रौपदादित्य की ओर बढ़ता है।

द्रौपदी-आदित्य-माहात्म्य तथा मयूखादित्य-गभस्तीश्वर-प्रतिष्ठा (Draupadī’s Āditya Māhātmya and the Mayūkhāditya–Gabhastīśvara Foundation Narrative)
अध्याय सूत–व्यास–स्कन्द की परम्परागत कथा-शैली में आरम्भ होता है। इसमें पाण्डवों को रुद्र-स्वरूप धर्म-स्थापन के साधन और नारायण को कृष्ण-रूप में नीति व मर्यादा के स्थिरकर्ता के रूप में बताया गया है। विपत्ति के समय द्रौपदी ब्रध्न/सविता रूप सूर्य की कठोर भक्ति करती हैं और सूर्यदेव उन्हें अक्षय-स्थालिका प्रदान करते हैं, जिससे अतिथि-सत्कार और अन्नाभाव की समस्या दूर होती है। फिर यह वरदान काशी की पवित्र भूगोल में स्थापित होता है—विश्वेश्वर के दक्षिण में सूर्य-पूजा व दर्शन करने वालों को भूख, रोग, भय, शोक-अन्धकार और वियोग से रक्षा का आश्वासन दिया जाता है। दूसरे भाग में सूर्य का पञ्चनद तीर्थ पर घोर तप, गभस्तीश्वर लिङ्ग की प्रतिष्ठा और मङ्गला/गौरी देवी की उपासना वर्णित है। शिव प्रकट होकर तप की प्रशंसा करते हैं; शिव-स्तोत्रों तथा मङ्गला-गौरी स्तुति के बाद वे उपदेश देते हैं कि ‘चौंसठ-नाम’ अष्टक और मङ्गला-गौरी अष्टक का पाठ नित्य पाप-शोधन करता है और दुर्लभ काशी-प्राप्ति का साधन है। चैत्र शुक्ल तृतीया के मङ्गला-व्रत में उपवास, रात्रि-जागरण, पूजन, कन्या-भोजन, होम और दान का विधान है, जिससे कल्याण और अमंगल-निवारण होता है। अंत में मयूखादित्य नाम का कारण, विशेषतः रविवार को पूजा से रोग-दारिद्र्य-नाश, तथा इस कथा-श्रवण से नरकगति-निवारण की फलश्रुति कही गई है।

खखोल्कादित्य-प्रादुर्भावः (The Manifestation and Merit of Khakholka Āditya)
इस अध्याय में स्कन्द वाराणसी में स्थित सूर्य-रूपों (आदित्यों) का वर्णन करते हुए ‘खखोल्का आदित्य’ नामक विशेष प्रादुर्भाव का परिचय देते हैं, जिसे दुःख-पीड़ा हरने वाला कहा गया है। इसके बाद कथा कद्रू और विनता के प्राचीन प्रसंग से जुड़ती है—उच्चैःश्रवस के रंग को लेकर हुई शर्त में कद्रू अपने सर्प-पुत्रों से छल करवाती है और विनता दासी बन जाती है। माता की दयनीय अवस्था देखकर गरुड़ मुक्ति का उपाय पूछते हैं; सर्पगण विनता की रिहाई के बदले अमृत (सुधा) लाने की शर्त रखते हैं। विनता गरुड़ को धर्म-विवेक सिखाती हैं—विशेषकर निषादों में ब्राह्मण की पहचान के चिह्न बताकर यह सावधान करती हैं कि अज्ञानवश ब्राह्मण-हिंसा महापाप है। गरुड़ का अमृत-प्राप्ति-कार्य स्वार्थ नहीं, मातृ-मोचन हेतु कर्तव्य-पालन के रूप में प्रस्तुत है। अंत में प्रसंग काशी में पुनः स्थापित होता है—शंकर और भास्कर काशी में कृपालु सन्निधि के रूप में वर्णित हैं। फलश्रुति कहती है कि निर्दिष्ट तीर्थ पर खखोल्का आदित्य के दर्शन मात्र से शीघ्र रोग-निवारण, अभीष्ट-पूर्ति तथा इस कथा के श्रवण से पवित्रता प्राप्त होती है।
It establishes a method for reading place as doctrine: sacred sites are presented as pedagogical terrains where devotion, ritual order, and liberation-claims are narrated through exemplary episodes and praises.
Merit is framed as arising from reverent approach—listening to the discourse, honoring sacred rivers and deities, and cultivating disciplined humility—rather than from mere physical travel alone.
Chapter 1 highlights an instructive episode involving Nārada and the Vindhya mountain, using dialogue and moral reflection to critique pride and to motivate refuge in the supreme deity (Viśveśa/Śiva).