Adhyaya 33
Kashi KhandaPurva ArdhaAdhyaya 33

Adhyaya 33

इस अध्याय में अगस्त्य मुनि स्कन्द से पूछते हैं कि स्कन्दज्ञानोद-तीर्थ की महिमा क्या है और ज्ञानवापी की प्रशंसा देवगण भी क्यों करते हैं। स्कन्द प्राचीन कथा सुनाते हैं—एक युग में ईशान (रुद्र-रूप) काशी-क्षेत्र में आए, सिद्धों, योगियों, गन्धर्वों और गणों द्वारा पूजित तेजस्वी महालिङ्ग को देखकर उसे शीतल जल से स्नान कराने का संकल्प किया। उन्होंने त्रिशूल से एक कुण्ड खोदा, भूमिगत जलराशि प्रकट की और सहस्रों धाराओं व घटों से बार-बार अभिषेक किया। शिव प्रसन्न हुए और वर दिया। ईशान ने प्रार्थना की कि यह अनुपम तीर्थ शिव के नाम से प्रसिद्ध हो। शिव ने इसे परम ‘शिव-तीर्थ’ घोषित कर ‘शिवज्ञान’ को दिव्य महिमा से द्रवित ज्ञान बताकर इसका नाम ‘ज्ञानोद’ स्थापित किया। केवल दर्शन से शुद्धि, स्पर्श व आचमन से महान यज्ञों के तुल्य फल, तथा यहाँ श्राद्ध-पिण्डदान से गया, पुष्कर, कुरुक्षेत्र आदि की अपेक्षा भी बढ़ा हुआ पितृ-फल बताया गया है। अष्टमी/चतुर्दशी का उपवास और एकादशी को नियत आचमन सहित व्रत करने से अंतर्लिङ्ग-साक्षात्कार का फल कहा गया है। शिव-तीर्थ के जल के दर्शन से बाधक भूत-प्रेत और रोग शांत होते हैं, और ज्ञानोद जल से लिङ्गाभिषेक करना समस्त तीर्थों के जल से अभिषेक के समान माना गया है। आगे ज्ञानवापी से जुड़ा इतिहासनुमा प्रसंग आता है—एक ब्राह्मण परिवार की अत्यंत धर्मपरायण कन्या, उसका नित्य स्नान व मंदिर-सेवा, विद्यााधर द्वारा अपहरण-प्रयत्न, राक्षस से संघर्ष, मृत्यु और कर्म-परिणाम, तथा आगे के जन्मों में विभूति-रुद्राक्ष और लिङ्ग-पूजा को आभूषणों से श्रेष्ठ मानकर भक्ति में स्थिर होना। अंत में काशी के कुछ तीर्थों/देवालयों का क्रमवार उल्लेख कर उनके फल बताए गए हैं, जिससे अध्याय काशी की पवित्र-भूगोल-रचना को भी पुष्ट करता है।

Shlokas

Verse 1

अगस्त्य उवाच । स्कंदज्ञानोदतीर्थस्य माहात्म्यं वद सांप्रतम् । ज्ञानवापीं प्रशंसंति यतः स्वर्गौकसोप्यलम्

अगस्त्य बोले—अब स्कन्द-ज्ञानोद तीर्थ का माहात्म्य कहिए। क्योंकि ज्ञानवापी की ऐसी प्रशंसा होती है कि स्वर्गवासी भी उसे अत्यन्त सराहते हैं।

Verse 2

स्कंद उवाच । घटोद्भव महाप्राज्ञ शृणु पापप्रणोदिनीम् । ज्ञानवाप्याः समुत्पत्तिं कथ्यमानां मयाधुना

स्कन्द बोले—हे घटोद्भव महाप्राज्ञ! सुनिए, मैं अब पाप-नाशिनी ज्ञानवापी की उत्पत्ति का वर्णन करता हूँ।

Verse 3

अनादिसिद्धे संसारे पुरा देवयुगे मुने । प्राप्तः कुतश्चिदीशानश्चरन्स्वैरमितस्ततः

हे मुने! इस अनादि-सिद्ध संसार में, प्राचीन देवयुग में, ईशान कहीं से आ पहुँचे और स्वेच्छा से इधर-उधर विचरने लगे।

Verse 4

न वर्षंति यदाभ्राणि न प्रावर्तंत निम्रगाः । जलाभिलाषो न यदा स्नानपानादि कर्मणि

जब मेघ वर्षा नहीं करते और नदियाँ बहना छोड़ देती हैं—जब स्नान, पान आदि कर्मों के लिए भी जल की इच्छा तक नहीं रहती—तब जगत् घोर क्लेश में पड़ जाता है।

Verse 5

क्षारस्वादूदयोरेव यदासीज्जलदर्शनम् । प्रथिव्यां नरसंचारे वतर्माने क्वचित्क्वचित्

जब पृथ्वी पर मनुष्यों के विचरण के बीच जल का दर्शन केवल कहीं-कहीं होता था, और वह भी या तो खारा या मीठा ही—तब जल की दुर्लभता स्पष्ट हो गई।

Verse 6

निर्वाणकमलाक्षेत्रं श्रीमदानंदकाननम् । महाश्मशानं सर्वेषां बीजानां परमूषरम्

यह निर्वाण का कमल-क्षेत्र है, आनंद का श्रीमय कानन है; यह सब बीजों (कर्मबीजों) के लिए महाश्मशान और परम ऊसर-भूमि है।

Verse 7

महाशयनसुप्तानां जंतूनां प्रतिबोधकम् । संसारसागरावर्त पतज्जंतुतरंडकम्

यह महाशय्या पर सोए हुए जीवों को जगाने वाला है; यह संसार-सागर के भँवरों में गिरते प्राणियों के लिए जीवन-नौका है।

Verse 8

यातायातातिसंखिन्न जंतुविश्राममंडपम । अनेकजन्मगुणित कर्मसूत्रच्छिदाक्षुरम्

यह निरंतर आवागमन से अत्यन्त थके जीवों के लिए विश्राम-मंडप है; यह अनेक जन्मों में गुंथे कर्म-सूत्र को काटने वाली तीक्ष्ण धार है।

Verse 9

सच्चिदानंदनिलयं परब्रह्मरसायनम् । सुखसंतानजनकं मोक्षसाधनसिद्धिदम्

यह सच्चिदानन्द का निलय है, परब्रह्म का अमृत-रस है; यह सुख की अविच्छिन्न परम्परा उत्पन्न करता और मोक्ष-साधनों की सिद्धि प्रदान करता है।

Verse 10

प्रविश्य क्षेत्रमेतत्स ईशानो जटिलस्तदा । लसत्त्रिशूलविमलरश्मिजालसमाकुलः

तब जटाधारी ईशान इस पवित्र क्षेत्र में प्रविष्ट हुए—अपने दीप्तिमान त्रिशूल से निकलती निर्मल किरणों के जाल से सर्वत्र आलोकित।

Verse 11

आलुलोके महालिंगं वैकुंठपरमेष्ठिनोः । महाहमहमिकायां प्रादुरास यदादितः

उन्होंने उस महालिङ्ग का दर्शन किया, जो वैकुण्ठनाथ और परमेष्ठी (ब्रह्मा) के ‘मैं-मैं’ के महान् अहंकार-युद्ध में आद्यतः प्रकट हुआ था।

Verse 12

ज्योतिर्मयीभिर्मालाभिः परितः परिवेष्टितम् । वृंदैर्वृंदारकर्षीणां गणानां च निरंतरम्

वह ज्योतिर्मयी मालाओं से चारों ओर घिरा था, और देवसमूहों तथा शिवगणों के वृन्द निरन्तर उसकी सेवा में उपस्थित थे।

Verse 13

सिद्धानां योगिनां स्तोमैरर्च्यमानं निरंतरम् । गीयमानं च गंधर्वैः स्तूयमानं च चारणैः

वह सिद्धों और योगियों के समुदायों द्वारा निरन्तर अर्चित होता, गन्धर्वों द्वारा गाया जाता और चारणों द्वारा स्तुत किया जाता था।

Verse 14

अंगहारैरप्सरोभिः सेव्यमानमनेकधा । नीराज्यमानं सततं नागीभिर्मणिदीपकैः

अप्सराएँ अनेक प्रकार के ललित अंगहारों से उसकी सेवा कर रही थीं, और नागिनियाँ मणि-दीपों से निरन्तर उसकी आरती उतार रही थीं।

Verse 15

विद्याधरीकिन्नरीभिस्त्रिकालं कृतमंडनम् । अमरीचमरीराजि वीज्यमानमितस्ततः

विद्याधरियाँ और किन्नरियाँ त्रिकाल उसका शृंगार करती थीं, और दिव्य स्त्रियों की उज्ज्वल चँवर-श्रेणियाँ चारों ओर से उसे झलती थीं।

Verse 16

अस्येशानस्य तल्लिंगं दृष्ट्वेच्छेत्यभवत्तदा । स्नपयामि महल्लिंगं कलशैः शीतलैर्जलैः

ईशान का वह लिंग देखकर उसी क्षण यह इच्छा हुई—“मैं इस महालिंग को शीतल जल से भरे कलशों द्वारा स्नान कराऊँगा।”

Verse 17

चखान च त्रिशूलेन दक्षिणाशोपकंठतः । कुंडं प्रचंडवेगेन रुद्रोरुद्रवपुर्धरः

तब रुद्र ने—रुद्र-स्वरूप धारण करके—दक्षिण दिशा की ओर, समीप ही, अपने त्रिशूल से प्रचण्ड वेग से एक कुंड खोद डाला।

Verse 18

पृथिव्यावरणांभांसि निष्क्रांतानि तदा मुने । भूप्रमाणाद्दशगुणैर्यैरियं वसुधावृता

तब, हे मुने, पृथ्वी को आवृत करने वाले वे जल बाहर फूट पड़े—जिनसे यह वसुधा ढकी है, जो पृथ्वी के प्रमाण से दसगुने हैं।

Verse 19

तैर्जलैः स्नापयांचक्रे त्वत्स्पृष्टैरन्यदेहिभिः । तुषारैर्जाड्यविधुरैर्जंजपूकौघहारिभिः

उन जलों से उसने स्नान कराया—जो अन्य देहधारियों के लिए अस्पृश्य थे; पर तुम्हारे स्पर्श से वे शीतल तुषार-बिंदुओं के समान बन गए, जड़ता को दूर करने वाले और मच्छरों के झुंड को भगाने वाले।

Verse 20

सन्मनोभिरिवात्यच्छैरनच्छैर्व्योमवर्त्मवत् । ज्योत्स्नावदुज्ज्वलच्छायैः पावनैः शंभुनामवत्

वे जल अत्यन्त निर्मल थे—सत्-मन के समान; आकाश-पथ की भाँति निष्कलंक; चाँदनी की तरह उज्ज्वल छाया वाले, और शम्भु के नामों की तरह पावन।

Verse 21

पीयूषवत्स्वादुतरैः सुखस्पर्शैर्गवांगवत् । निष्पापधीवद्गंभीरैस्तरलैः पापिशर्मवत्

वे जल अमृत से भी अधिक मधुर थे; गौ के अंगों की भाँति सुखद स्पर्श वाले; निष्पाप बुद्धि की तरह गम्भीर, और कोमल प्रवाह से पापियों को भी शान्ति देने वाले।

Verse 22

विजिताब्जमहागंधैः पाटलामोदमोदिभिः । अदृष्टपूर्वलोकानां मनोनयनहारिभिः

वे जल कमलों की महान सुगन्ध को भी जीतने वाले थे; पाटला-पुष्प की सुवास से आनन्दित करने वाले; और जिन्हें पहले कभी न देखा था ऐसे लोकों के मन और नेत्रों को हर लेने वाले।

Verse 23

अज्ञानतापसंतप्त प्राणिप्राणैकरक्षिभिः । पंचामृतानां कलशैः स्नपनातिफलप्रदैः

अज्ञान की तपिश से संतप्त प्राणियों के प्राणों की रक्षा करने वाले, पञ्चामृत के कलशों से उसने स्नान कराया—जो स्नपन से अत्यन्त महान फल देने वाले थे।

Verse 24

श्रद्धोपस्पर्शि दृदयलिंग त्रितयहेतुभिः । अज्ञानतिमिरार्काभैर्ज्ञानदान निदायकैः

श्रद्धा से स्पर्शित कर्मों—त्रिविध पवित्र-चिह्नों के कारण—और अज्ञान-तम को सूर्य-सा हरने वाले ज्ञान-दानरूपी अर्घ्यों से।

Verse 25

विश्वभर्तुरुमास्पर्शसुखातिसुखकारिभिः । महावभृथसुस्नान महाशुद्धिविधायिभिः

विश्व-धारक प्रभु को उमा-स्पर्श से परम सुख देने वाले कर्मों से, तथा महान् अवभृथ-स्नान से—जो महाशुद्धि प्रदान करता है।

Verse 26

सहस्रधारैः कलशैः स ईशानो घटोद्भव । सहस्रकृत्वः स्नपयामास संहृष्टमानसः

हे घटोद्भव (अगस्त्य)! तब हर्षित-चित्त ईशान ने सहस्र धाराओं वाले कलशों से (भगवान् को) बार-बार—सहस्र बार—स्नान कराया।

Verse 27

ततः प्रसन्नो भगवान्विश्वात्मा विश्वलोचनः । तमुवाच तदेशानं रुद्रं रुद्रवपुर्धरम्

तब विश्वात्मा, विश्वलोचन भगवान् प्रसन्न हुए और उस ईशान से बोले—जो रुद्र थे, रुद्र-स्वरूप धारण किए हुए।

Verse 28

तव प्रसन्नोस्मीशान कर्मणानेन सुव्रत । गुरुणानन्यपूर्वेण ममातिप्रीतिकारिणा

‘ईशान! इस कर्म से मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, हे सुव्रत; गुरु-तुल्य ऐसी सेवा, जो पहले कभी न हुई, उसने मुझे अत्यन्त प्रसन्न किया है।’

Verse 29

ततस्त्वं जटिलेशान वरं ब्रूहि तपोधन । अदेयं न तवास्त्यद्य महोद्यमपरायण

अतः हे जटाधारी ईशान, हे तपोधन, अपना वर कहिए। आज आपके लिए कुछ भी अदेय नहीं है, हे महोद्यम में तत्पर।

Verse 30

ईशान उवाच । यदि प्रसन्नो देवेश वरयोग्योस्म्यहं यदि । तदेतदतुलं तीर्थं तव नाम्नास्तु शंकर

ईशान बोले— हे देवेश, यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मैं वर के योग्य हूँ, तो हे शंकर, यह अतुल तीर्थ आपके नाम से प्रसिद्ध हो।

Verse 31

विश्वेश्वर उवाच । त्रिलोक्यां यानि तीर्थानि भूर्भुवःस्वः स्थितान्यपि । तेभ्योखिलेभ्यस्तीर्थेभ्यः शिवतीर्थमिदं परम्

विश्वेश्वर बोले— त्रिलोक में जो-जो तीर्थ पृथ्वी, भुवः और स्वर्ग में स्थित हैं, उन सब तीर्थों से यह शिवतीर्थ परम है।

Verse 32

शिवज्ञानमिति ब्रूयुः शिवशब्दार्थचिंतकाः । तच्च ज्ञानं द्रवीभूतमिह मे महिमोदयात्

जो ‘शिव’ शब्द के अर्थ का चिंतन करते हैं, वे उसे ‘शिव-ज्ञान’ कहते हैं। और वही ज्ञान मेरे महिमा-उदय से यहाँ द्रवीभूत-सा होकर प्रकट हुआ है।

Verse 33

अतो ज्ञानोद नामैतत्तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । अस्य दर्शनमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते

इसलिए यह तीर्थ ‘ज्ञानोद’ नाम से त्रैलोक्य में विख्यात है। इसके मात्र दर्शन से ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

Verse 34

ज्ञानोदतीर्थसंस्पर्शादश्वमेधफलं लभेत् । स्पर्शनाचमनाभ्यां च राजसूयाश्वमेधयोः

ज्ञानोद तीर्थ का केवल स्पर्श करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। और उसके स्पर्श तथा आचमन से राजसूय और अश्वमेध—दोनों का फल प्राप्त होता है।

Verse 35

फल्गुतीर्थे नरः स्नात्वा संतर्प्य च पितामहान् । यत्फलं समवाप्नोति तदत्र श्राद्धकर्मणा

फल्गु तीर्थ में स्नान करके और पितरों को तृप्त करके मनुष्य जो फल पाता है, वही फल यहाँ श्राद्धकर्म करने से प्राप्त होता है।

Verse 36

गुरुपुष्यासिताष्टम्यां व्यतीपातो यदा भवेत् । तदात्र श्राद्धकरणाद्गयाकोटिगुणं भवेत्

जब गुरु और पुष्य के योग में कृष्णपक्ष की अष्टमी को व्यतीपात योग हो, तब यहाँ श्राद्ध करने से गया के फल से भी करोड़ गुना अधिक फल होता है।

Verse 37

यत्फलं समवाप्नोति पितॄन्संतर्प्य पुष्करे । तत्फलं कोटिगुणितं ज्ञानतीर्थे तिलोदकैः

पुष्कर में पितरों को तृप्त करके जो फल मिलता है, वही फल ज्ञानतीर्थ में तिलोदक (तिल-मिश्रित जल) से करोड़ गुना होकर प्राप्त होता है।

Verse 38

सन्निहत्यां कुरुक्षेत्रे तमोग्रस्ते विवस्वति । यत्फलं पिंडदानेन तज्ज्ञानोदे दिने दिने

कुरुक्षेत्र में सन्निहत्या के अवसर पर, जब सूर्य तमोग्रस्त (ग्रहणग्रस्त) हो, तब पिंडदान से जो फल मिलता है—वही फल ज्ञानोद में प्रतिदिन प्राप्त होता है।

Verse 39

पिंडनिर्वपणं येषां ज्ञानतीर्थे सुतैः कृतम् । मोदंते शिवलोके ते यावदाभूतसंप्लवम्

जिनके पुत्रों ने ज्ञानतीर्थ में पिण्ड-निर्वपण किया है, वे शिवलोक में प्रलय-पर्यन्त आनन्दित रहते हैं।

Verse 40

अष्टम्यां च चतुर्दश्यामुपवासी नरोत्तमः । प्रातः स्नात्वाथ पीतांभस्त्वंतर्लिंगमयो भवेत्

अष्टमी और चतुर्दशी को श्रेष्ठ पुरुष उपवास करे। प्रातः स्नान करके फिर उस जल का पान करे; वह भीतर से लिङ्गमय (शिवमय) हो जाता है।

Verse 41

एकादश्यामुपोष्यात्र प्राश्नाति चुलुकत्रयम् । हृदये तस्य जायंते त्रीणि लिंगान्यसंशयम्

यहाँ एकादशी को उपवास करके वह तीन चुलुक (अंजलि-भर) जल पीए। उसके हृदय में निःसंदेह तीन लिङ्ग प्रकट होते हैं।

Verse 42

ईशानतीर्थे यः स्नात्वा विशेषात्सोमवासरे । संतर्प्य देवर्षि पितॄन्दत्त्वा दानम स्वशक्तितः

जो ईशानतीर्थ में—विशेषतः सोमवार को—स्नान करके देवों, ऋषियों और पितरों को तृप्त करे तथा अपनी शक्ति के अनुसार दान दे,

Verse 43

ततः समर्च्य श्रीलिंगं महासंभारविस्तरैः । अत्रापि दत्त्वा नानार्थान्कृतकृत्योभवेन्नरः

फिर महान् सामग्री-विस्तार सहित श्रीलिङ्ग की विधिवत् पूजा करके, और यहाँ भी नाना प्रकार के दान देकर, मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।

Verse 44

उपास्य संध्यां ज्ञानोदे यत्पापं काललोपजम् । क्षणेन तदपाकृत्य ज्ञानवाञ्जायते द्विजः

ज्ञानोदे में संध्या-उपासना करने से समय-लोप से उत्पन्न जो भी पाप होता है, वह क्षणभर में नष्ट हो जाता है और द्विज सच्चे ज्ञान से युक्त हो जाता है।

Verse 45

शिवतीर्थमिदं प्रोक्तं ज्ञानतीर्थमिदं शुभम् । तारकाख्यमिदं तीर्थं मोक्षतीर्थमिदं धुवम्

यह शिव-तीर्थ कहा गया है; यह शुभ ज्ञान-तीर्थ है। यह तीर्थ ‘तारक’ नाम से प्रसिद्ध है और निश्चय ही मोक्ष देने वाला तीर्थ है।

Verse 46

स्मरणादपि पापौघो ज्ञानोदस्य क्षयेद्ध्रुवम् । दर्शनात्स्पर्शनात्स्नानात्पानाद्धर्मादिसंभवः

ज्ञानोद का स्मरण मात्र करने से भी पापों का प्रवाह निश्चय ही क्षीण हो जाता है। उसके दर्शन, स्पर्श, स्नान और जल-पान से धर्म आदि शुभ फल उत्पन्न होते हैं।

Verse 47

डाकिनीशाकिनी भूतप्रेतवेतालराक्षसाः । ग्रहाः कूष्मांडझोटिंगाः कालकर्णी शिशुग्रहाः

डाकिनियाँ, शाकिनियाँ, भूत-प्रेत, वेताल और राक्षस; दुष्ट ग्रह; कूष्माण्ड और झोटिंग; कालकर्णी तथा शिशु-ग्रह—

Verse 48

ज्वरापस्मारविस्फोटद्वितीयकचतुर्थकाः । सर्वे प्रशममायांति शिवर्तार्थजलेक्षणात्

ज्वर, अपस्मार, विस्फोट तथा दूसरे और चौथे दिन लौटने वाले ज्वर—ये सब शिवर्तार्थ के जल के दर्शन से शांत हो जाते हैं।

Verse 49

ज्ञानोदतीर्थपानीयैर्लिंगं यः स्नापयेत्सुधीः । सर्वतीर्थोदकैस्तेन ध्रुवं संस्नापितं भवेत्

जो बुद्धिमान भक्त ज्ञानोदा-तीर्थ के जल से शिवलिंग का स्नान कराता है, वह निश्चय ही समस्त तीर्थों के जल से उसका अभिषेक कर देता है।

Verse 50

ज्ञानरूपोह मेवात्र द्रवमूर्तिं विधाय च । जाड्यविध्वंसनं कुर्यां कुर्यां ज्ञानोपदेशनम्

‘मैं स्वयं ज्ञानस्वरूप हूँ; यहाँ द्रवरूप धारण करके मैं जड़ता का विनाश करूँगा और सत्य-ज्ञान का उपदेश प्रदान करूँगा।’

Verse 51

इति दत्त्वा वराञ्छंभुस्तत्रैवांतरधीयत । कृतकृत्यमिवात्मानं सोप्यमंस्तत्रिशूलभृत्

इस प्रकार वरदान देकर शम्भु वहीं अंतर्धान हो गए; त्रिशूलधारी ने अपने को मानो कृतकृत्य समझा।

Verse 52

ईशानो जटिलो रुद्रस्तत्प्राश्य परमोदकम् । अवाप्तवान्परं ज्ञानं येन निर्वृतिमाप्तवान्

जटाधारी रुद्र ईशान ने उस परम जल का पान करके परम ज्ञान प्राप्त किया, जिससे उन्होंने पूर्ण शान्ति पाई।

Verse 53

स्कंद उवाच । कलशोद्भव चित्रार्थमितिहासं पुरातनम् । ज्ञानवाप्यां हि यद्वृत्तं तदाख्यामि निशामय

स्कन्द बोले— ‘हे कलशोद्भव! सुनो। ज्ञानवापी में जो घटित हुआ, उस प्राचीन और अद्भुत वृत्तान्त को मैं कहता हूँ।’

Verse 54

हरिस्वामीति विख्यातः काश्यामासीद्विजः पुरा । तस्यैका तनया जाता रूपेणाऽप्रतिमा भुवि

प्राचीन काल में काशी में हरिस्वामी नाम से विख्यात एक ब्राह्मण रहते थे। उनकी एक पुत्री हुई जो पृथ्वी पर रूप में अनुपम थी।

Verse 55

न समा शीलसंपत्त्या तस्या काचन भूतले । कलाकलापकुशला स्वरेणजितकोकिला

शील और गुणों की संपत्ति में पृथ्वी पर उसके समान कोई नहीं थी। वह समस्त कलाओं में कुशल थी और अपने स्वर से कोयल को भी जीत लेती थी।

Verse 56

न नारी तादृगस्तीह ना भरी किन्नरी न च । विद्याधरी न नो नागी गंधर्वी नासुरी न च

वैसी नारी यहाँ कोई नहीं है, न किन्नरी, न विद्याधरी, न नागकन्या, न गंधर्व स्त्री और न ही कोई आसुरी उसके समान है।

Verse 57

निर्वाणनरसिंहोयं भक्तनिर्वाणकारणम् । मणिप्रदीपनागोयं महामणिविभूषणः

यह निर्वाण-नरसिंह हैं, जो भक्तों की मुक्ति (निर्वाण) का कारण हैं। यह मणिप्रदीप नाग हैं, जो महामणियों से विभूषित हैं।

Verse 58

तदास्य शरणं यातो मन्ये दर्शभयाच्छशी । दिवापि न त्यजेत्तां तु त्रस्तश्चंडमरीचितः

मुझे लगता है कि अमावस्या (क्षय) के भय से चंद्रमा ने उसके मुख की शरण ली है। सूर्य की प्रचंड किरणों से भयभीत होकर वह दिन में भी उसका साथ नहीं छोड़ता।

Verse 59

तद्भ्रूर्भ्रमरराजीव गंडपत्रलतांतरे । उदंचन्न्यंचदुड्डीन गतेरभ्यासभाजिनी

उसकी भौंहें गालों की पत्रलता के बीच भ्रमर की भांति ऊपर-नीचे उड़ने का अभ्यास कर रही थीं।

Verse 60

तच्चारुलोचनक्षेत्रे विचरंतौ च खंजनौ । सदैव शारदीं प्रीतिं निर्विशेते निजेच्छया

उसके सुंदर नेत्र रूपी क्षेत्र में विचरण करते हुए दो खंजन पक्षी सदैव अपनी इच्छा से शरद ऋतु के आनंद का अनुभव करते हैं।

Verse 61

सुदत्या रदनश्रेणी छेदेषु विषमेषुणा । विहिता कांचनी रेखा क्वेंदावेतावती कला

उस सुंदरी की दंतपंक्ति के अंतरालों में कामदेव द्वारा खींची गई स्वर्ण रेखा जैसी प्रतीत होती है; चंद्रमा में ऐसी कला कहाँ?

Verse 62

प्रायो मदन भूपाल हर्म्य रत्नांतरे शुभे । जितप्रवालसुच्छाये तस्या रदनवाससी

हे राजन! उसके अधर प्रवाल (मूंगा) की कांति को भी जीतने वाले हैं, मानो कामदेव रूपी राजा का रत्नजड़ित महल हो।

Verse 63

स्वर्गे मर्त्ये च पाताले नैषा रेखा क्वचित्स्त्रियाम् । तत्कंठरेखात्रितय व्याजेन शपते स्मरः

स्वर्ग, मर्त्य और पाताल में किसी स्त्री में ऐसी रेखा नहीं है; उसके कंठ की तीन रेखाओं के बहाने कामदेव यही शपथ लेते हैं।

Verse 64

शंके चित्त भुवो राज्ञो लसत्पटकुटीद्वयम् । अनर्घ्यरत्नकोशाढ्यं तम्या वक्षोरुहद्वयम्

मुझे शंका होती है कि कामराज का अपना भवन ही यह चमकते वस्त्र-पवेलियन-से दो कुटीर बन गया है—उसके दोनों स्तन—मानो अनमोल रत्नों के कोशों से परिपूर्ण।

Verse 65

अनंगभू नियमतोऽदृश्ये मध्ये नतभ्रुवः । रोमालीलक्षिकामूर्ध्वामिव यष्टिं विधिर्व्यधात्

संयमपूर्वक विधाता ने उसका मध्य इतना सूक्ष्म रचा कि वह प्रायः अदृश्य-सा लगे—मानो एक पतली यष्टि; और ऊपर रोमावली की रेखा उसे चिह्न-सी अंकित करती है।

Verse 66

तस्या नाभीदरीं प्राप्य कंदर्पोऽनंगता गतः । पुनः प्राप्तुमिवांगानि तप्यते परमं तपः

उसकी नाभि-गुहा को पाकर कंदर्प फिर ‘अनंग’ हो गया; मानो अपने अंग पुनः पाने के लिए वह परम तप का आचरण करता है।

Verse 67

गुरुणैतन्नितंबेन महामन्मथ दीक्षया । भुवि के के युवानो न स्वाधीना प्रापितादृशाम्

उसके भारी नितंब—मानो महा-मन्मथ की दीक्षा—के प्रभाव से, पृथ्वी पर कौन-सा युवा ऐसा है जो ऐसी छवि पाकर वश में न आ जाए?

Verse 68

ऊरुस्तंभेन चैतस्याः स्तंभवत्कस्यनो मनः । तस्तंभेन मुने वापि सुवृत्तेन सुवर्तनम्

उसके स्तंभ-सदृश दृढ़ ऊरुओं से किसका मन स्तब्ध न हो? उस सुगठित ‘स्तंभ’ से तो मुनि का भी सुवर्तन डगमगा जाए।

Verse 69

पादांगुष्ठनखज्योतिः प्रभया कस्य न प्रभा । विवेकजनिताऽध्वंसि मुने तस्या मृगीदृशः

उसके पादाङ्गुष्ठ के नख की ज्योति से किसकी प्रभा न दब जाए? हे मुने, उस मृगनयनी का विवेकजनित संकल्प सब मोहों का नाश कर देता है।

Verse 70

सा प्रत्यहं ज्ञानवाप्यां स्नायं स्नायं शिवालये । संमार्जनादि कर्माणि कुरुतेऽनन्यमानसा

वह प्रतिदिन ज्ञानवापी में बार-बार स्नान करती है और शिवालय में झाड़ू-बुहार आदि सेवाकर्म अनन्यचित्त होकर करती है।

Verse 71

तत्पादप्रतिबिंबेषु रेखा शष्पांकुरं चरन् । नान्यद्वनांतरं याति काश्यां यूनां मनोमृगः

उसके चरण-प्रतिबिम्बों में दिखती रेखाओं के कोमल अंकुर चरता हुआ, काशी के युवकों का ‘मन-मृग’ किसी अन्य वन-पथ में नहीं जाता।

Verse 72

तदास्य पंकजं हित्वा यूनां नेत्रालिमालया । न लतांतरमासेवि अप्यामोदप्रसूनयुक्

उसके मुख-कमल को छोड़कर युवकों के नेत्ररूपी भौंरों की माला किसी अन्य लता का आश्रय नहीं लेती, चाहे वह सुगंधित पुष्पों से युक्त ही क्यों न हो।

Verse 73

सुलोचनापि सा कन्या प्रेक्षेतास्यं न कस्यचित् । सुश्रवा अपि सा बाला नादत्ते कस्यचिद्वचः

सुलोचना होते हुए भी वह कन्या किसी का मुख नहीं देखती; सुश्रवा होते हुए भी वह बाला किसी के प्रणय-वचन स्वीकार नहीं करती।

Verse 74

सुशीला शीलसंपन्ना रहस्तद्विरहातुरैः । प्रार्थितापि सुरूपाढ्यैर्नाभिलाषं बबंध सा

सुशीला गुण-शील से संपन्न थी। एकांत में विरह से व्याकुल सुन्दर युवक भी उसे बार-बार प्रार्थना करते रहे, पर उसने किसी पर भी अपना अनुराग नहीं बाँधा।

Verse 75

धनैस्तस्याजनेतापि युवभिः प्रार्थितो बहु । नाशकत्तां सुलीलां सदातुं शीलोर्जितश्रियम्

धन देने वाले अनेक युवकों ने बार-बार उसके पिता से विनती की, फिर भी वह उस सुललित कन्या को किसी को न दे सका; उसकी शोभा धन से नहीं, शील-धर्म से उपजी थी।

Verse 76

ज्ञानोदतीर्थभजनात्सा सुशीला कुमाग्किा । बहिरंतस्तदाऽद्राक्षीत्सर्वलिंगमयं जगत

ज्ञानोद तीर्थ का भजन-पूजन करने से वह कुमारी सुशीला ने तब भीतर और बाहर—समस्त जगत को शिव के लिङ्ग-स्वरूप से व्याप्त देखा।

Verse 77

कदाचिदेकदा तां तु प्रसुप्तां सदनांगणे । मोहितो रूपसंपत्त्या कश्चिद्विद्याधरोऽहरत्

एक बार वह अपने घर के आँगन में सो रही थी; उसकी रूप-सम्पदा से मोहित एक विद्याधर उसे उठा ले गया।

Verse 78

व्योमवर्त्मनितां रात्रौ यावन्मलयपर्वतम् । स निनीषति तावच्च विद्युन्माली समागतः

रात में आकाश-मार्ग से उसे ले जाते हुए वह उसे मलय पर्वत तक ले जाना चाहता था; तभी उसी क्षण विद्युन्माली आ पहुँचा।

Verse 79

राक्षसो भीषणवपुः कपालकृतकुंडलः । वसारुधिरलिप्तांगः श्मश्रुलः पिंगलोचनः

भयानक रूप वाला एक राक्षस प्रकट हुआ—कपालों से बने कुण्डल धारण किए, वसा और रक्त से लिप्त अंगों वाला, दाढ़ीदार और पिंगल नेत्रों वाला।

Verse 80

राक्षस उवाच । ममदृग्गोचरं यातो विद्याधरकुमारक । अद्य त्वामेतया सार्धं प्रेषयामि यमालयम्

राक्षस बोला—“हे विद्याधरकुमार! तू मेरी दृष्टि के क्षेत्र में आ गया है। आज मैं तुझे इस स्त्री सहित यमलोक भेज दूँगा।”

Verse 81

इति श्रुत्वाथ सा वाक्यं व्याघ्राघ्राता मृगी यथा । चकंपेऽतीव संभीता कदलीदलवन्मुहुः

यह वचन सुनकर वह अत्यन्त भयभीत होकर काँप उठी—जैसे बाघ द्वारा सूँघी गई हिरणी; और बार-बार केले के पत्ते की भाँति थरथराने लगी।

Verse 82

निजघान त्रिशूलेन रक्षो विद्याधरं च तम् । विद्याधरकुमारोपि नितरां मधुराकृतिः

उस राक्षस ने त्रिशूल से उस विद्याधर को आघात किया; और अत्यन्त मधुर व मनोहर आकृति वाला वह विद्याधरकुमार भी युद्ध में उतर पड़ा।

Verse 83

तद्भीषणत्रिशूलेन भिन्नोस्को महाबलः । जघान मुष्टिघातेन वज्रपातोपमेन तम्

उस भयानक त्रिशूल से वक्ष भेदे जाने पर भी वह महाबली, वज्रपात के समान मुष्टि-प्रहार से उसे मारने लगा।

Verse 84

नरमांसवसामत्तं विद्युन्मालिनमाहवे । चूर्णितो मुष्टिपातेन सोऽपतद्वसुधातले

रण में नरमांस और वसा से उन्मत्त विद्युन्मालि एक ही मुष्टि-प्रहार से चूर्ण हो गया और पृथ्वी-तल पर गिर पड़ा।

Verse 85

राक्षसो मृत्युवशगो वज्रेणेव महीधरः । विद्याधरोपि तच्छूलघातेन विकलीकृतः

मृत्यु के वश में आया वह राक्षस वज्र से आहत पर्वत की भाँति ढह पड़ा; और वह विद्याधर भी उस शूल-प्रहार से विकलांग हो गया।

Verse 86

उवाच गद्गदं वाक्यं विघूर्णित विलोचनः । प्रिये मुधा समानीता सुशित्यर्धोक्तिमुच्चरन्

नेत्र व्याकुल होकर वह गद्गद वाणी में बोला, टूटे-फूटे शब्द उच्चारता हुआ— “प्रिये, व्यर्थ ही यहाँ लाई गई…”

Verse 87

जहौ प्राणान्रणे वीरस्तां प्रियां परितः स्मरन्

रणभूमि में वह वीर चारों ओर अपनी प्रिया का स्मरण करता हुआ प्राण त्याग गया।

Verse 88

अनन्यपूर्वसंस्पर्श सुखं समनुभूय सा । तमेव च पतिं मत्वा चक्रे शोकाग्निसात्तनुम्

अपूर्व स्पर्श-सुख का अनुभव कर, उसी को एकमात्र पति मानकर, उसने अपने शरीर को शोकाग्नि में आहुति कर दिया।

Verse 89

लिंगत्रयशरीरिण्यास्तस्याः सान्निध्यतः स हि । दिव्यं वपुः समासाद्य राक्षसस्त्रिदिवं ययौ

उस त्रिशरीरिणी देवी के मात्र सान्निध्य से वह राक्षस दिव्य देह को प्राप्त कर त्रिदिव—स्वर्गलोक—को चला गया।

Verse 90

रणे पणीकृतप्राणो विद्याधरसुतोपि सः । अंते प्रियां स्मरन्प्राप जनुर्मलयकेतुतः

रण में प्राणों को दाँव पर लगाने वाला वह विद्याधर-पुत्र भी अंत में अपनी प्रिया का स्मरण करते हुए मलयकेतु के द्वारा जन्म को प्राप्त हुआ।

Verse 91

ध्यायंती सापि तं बाला विद्याधरकुमारकम् । विरहाग्नौ विसृष्टासुः कर्णाटे जन्मभागभूत्

वह बाला भी उस विद्याधर-कुमार का ध्यान करती रही; विरह की अग्नि में प्राण त्यागकर कर्णाट में जन्म की भागिनी बनी।

Verse 92

सुतो मलयकेतोस्तां कालेन परिणीतवान् । माल्यकेतुरनंगश्रीः पित्रा दत्तां कलावतीम्

कालांतर में मलयकेतु के पुत्र—अनंगश्री से दीप्त माल्यकेतु—ने पिता द्वारा प्रदत्त कलावती से विवाह किया।

Verse 93

सापि प्राग्वासनायोगाल्लिंगार्चनरता सती । हित्वा मलयजक्षोदं विभूतिं बह्वमंस्त वै

पूर्वजन्म-संस्कार के योग से वह सती भी लिंग-पूजन में रत रही; चंदन-चूर्ण को त्यागकर उसने विभूति को ही अत्यंत अमूल्य माना।

Verse 94

मुक्ता वैदूर्य माणिक्य पुष्परागेभ्य एव सा । मेने रुद्राक्षनेपध्यमनर्घ्यं गर्भसुंदरी

गर्भसुन्दरी ने मोती, वैदूर्य, माणिक्य और पुष्पराग से भी बढ़कर रुद्राक्ष-माला के आभूषण को अनमोल माना।

Verse 95

कलावती माल्यकेतुं पतिं प्राप्य पतिव्रता । अपत्यत्रितयं लेभे दिव्यभोगसमृद्धिभाक्

कलावती ने माल्यकेतु को पति पाकर पतिव्रता रही; उसने तीन संतानों को जन्म दिया और दिव्य-भोगों जैसी समृद्धि भोगी।

Verse 96

एकदा कश्चिदौदीच्यो माल्यकेतुं नरेश्वरम् । चित्रकृच्चित्रपटिकां चित्रां दर्शितवानथ

एक बार उत्तरदेश का एक चित्रकार राजा माल्यकेतु को एक अद्भुत चित्रित पटिका दिखाने लगा।

Verse 97

सर्वसौंदर्यनिलया सर्वलक्षणसत्खनिः । अधिशेते ध्रुवं ध्वांतं तन्मौलिं ब्रध्न साध्वसात्

वह—समस्त सौंदर्य की निवास-स्थली, शुभ-लक्षणों की सच्ची खान—उसके मुकुट पर स्थिर अंधकार देखकर सहसा भयभीत हो उठी।

Verse 98

मुहुर्मुहुः प्रपश्यंती रहसि प्राणदेवताम् । विसस्मार स्वमपि च समाधिस्थेव योगिनी

एकांत में अपने प्राणों के देवता को बार-बार देखते हुए वह स्वयं को भी भूल गई—मानो समाधि में स्थित योगिनी हो।

Verse 99

क्षणमुन्मील्य नयने कृत्वा नेत्रातिथिं पटीम् । तर्जन्यग्रमथोत्क्षिप्य स्वात्मानं समबोधयत्

उसने क्षणभर नेत्र खोलकर चित्रित पट को अपनी दृष्टि का अतिथि बनाया। फिर तर्जनी का अग्र उठाकर अपने-आप को चेतना में स्थिर किया।

Verse 100

संभेदोयमसे रम्य उपलोलार्कमग्रतः । उपश्रीकेशवपदं वरणैषा सरिद्वरा

यह रमणीय संगम है, जिसके जल में चंचल सूर्य प्रतिबिम्बित हो रहा है। यह केशव का शोभामय ‘पदचिह्न’ है, और यह श्रेष्ठ नदी ‘वरणा’ कहलाती है।

Verse 110

तृणीकृत्य निजं देहं यत्र राजर्षिसत्तमः । हरिश्चंद्रः सपत्नीको व्यक्रीणाद्भूरयं हि सा

यही वह स्थान है जहाँ राजर्षियों में श्रेष्ठ हरिश्चन्द्र ने—पत्नी सहित—अपने देह को तृणवत् मानकर स्वयं को बेच दिया था।

Verse 120

एषा मत्स्योदरी रम्या यत्स्नातो मानवोत्तमः । मातुर्जातूदरदरीं न विशेदेष निश्चयः

यह रमणीय तीर्थ ‘मत्स्योदरी’ है। यहाँ स्नान करने वाला पुरुषोत्तम फिर कभी माता के गर्भ की दरार में प्रवेश नहीं करता—यह निश्चय है।

Verse 130

चतुर्वेदेश्वरश्चैष चतुर्वेदधरो विधिः । लभेद्यद्वीक्षणाद्विप्रो वेदाध्ययनजं फलम्

यह ही चतुर्वेदों के ईश्वर—चतुर्वेदधारी विधाता ब्रह्मा हैं। इनके दर्शन मात्र से ब्राह्मण को वेदाध्ययन से उत्पन्न फल प्राप्त होता है।

Verse 140

वैरोचनेश्वरश्चैष पुरः प्रह्लादकेशवात् । बलिकेशवनामासावेष नारदकेशवः

यह पवित्र स्थल वैरोचनेश्वर है। प्रह्लाद-केशव के सामने यह केशव ‘बलि-केशव’ नाम से स्थित है और यहाँ ‘नारद-केशव’ के नाम से भी प्रसिद्ध है।

Verse 150

बिंदुमाधवभक्तो यस्तं यमोपि नमस्यति । प्रणवात्मा य एकोऽस्ति नादबिंदु स्वरूपधृक्

जो बिंदु-माधव का भक्त है, उसे यम भी नमस्कार करता है। क्योंकि वहाँ वह एक परम तत्त्व—प्रणव (ॐ) स्वरूप—नाद और बिंदु का रूप धारण करके विराजमान है।

Verse 160

यस्यार्चनाल्लभेज्जंतुः प्रियत्वं सर्वजन्तुषु । इदमायतनं श्रेष्ठं मणिमाणिक्यनिर्मितम्

जिसकी अर्चना से प्राणी समस्त जीवों में प्रिय हो जाता है। यह श्रेष्ठ आयतन मणि-माणिक्य से निर्मित है।

Verse 170

कालेश्वरकपर्दीशौ चरणावतिनिर्मलौ । ज्येष्ठेश्वरो नितंबश्च नाभिर्वै मध्यमेश्वरः

चरणों पर निर्मल रक्षक कालेश्वर और कपर्दीश हैं। नितंब-प्रदेश में ज्येष्ठेश्वर हैं और नाभि में निश्चय ही मध्यमेश्वर हैं।

Verse 180

अशोकाख्यमिदं तीर्थं गंगाकेशव एष वै । मोक्षद्वारमिदं श्रेष्ठं स्वर्ग द्वारमिदं विदुः

‘अशोक’ नाम का यह तीर्थ ही गंगा-केशव है। यह श्रेष्ठ स्थान ‘मोक्ष-द्वार’ है; इसे ‘स्वर्ग-द्वार’ भी जानते हैं।