Adhyaya 35
Kashi KhandaPurva ArdhaAdhyaya 35

Adhyaya 35

इस अध्याय में कुम्भयोनि (अगस्त्य) अविमुक्त-काशी की महिमा गाते हैं और उसे समस्त तीर्थों व मोक्ष-क्षेत्रों से श्रेष्ठ बताते हैं। वे गङ्गा, विश्वेश्वर और काशी—इस त्रय को विशेष तारक-संयोग के रूप में प्रस्तुत करते हैं। फिर वे प्रश्न उठाते हैं कि कलि/तिष्य युग में इन्द्रियाँ अस्थिर हैं और तप, योग, व्रत, दान आदि की शक्ति घट गई है—तो मुक्ति का लाभ व्यवहार में कैसे सुलभ हो? स्कन्द उत्तर देते हैं कि असाधारण तपस्या के स्थान पर सदाचार ही धर्म का मूल ‘उपाय’ है। वे प्राणियों और ज्ञाताओं की श्रेणियाँ बताते हुए अनुशासित ब्राह्मण-आचरण को समाज-धर्म का आधार मानते हैं और सदाचार को धर्म की जड़ कहते हैं। फिर यम (सत्य, क्षमा, अहिंसा आदि) और नियम (शौच, स्नान, दान, स्वाध्याय, उपवास) गिनाकर काम-क्रोध आदि आन्तरिक शत्रुओं पर विजय का उपदेश देते हैं तथा यह दृढ़ करते हैं कि मृत्यु के बाद केवल धर्म ही साथ जाता है। इसके बाद नित्य शुद्धि और प्रातःकर्म का विस्तृत विधान आता है—मलोत्सर्ग में दिशा-नियम व गोपनीयता, मिट्टी-जल से शुद्धि की गणना, आचमन की विधि व निषेध, दन्तधावन के नियम (कुछ चन्द्र-तिथियों में निषेध सहित), मंत्र-सम्बद्ध प्रातःस्नान की प्रशंसा, तथा प्रातःसन्ध्या, तर्पण, होम और भोजन-सम्बन्धी मर्यादाएँ। अंत में इसे ‘नित्यतम’ साधन बताकर धार्मिक जीवन को स्थिर करने वाला मार्ग कहा गया है।

Shlokas

Verse 1

कुंभयोनिरुवाच । अविमुक्तं महाक्षेत्रं परनिर्वाणकारणम् । क्षेत्राणां परमं क्षेत्रं मंगलानां च मंगलम्

कुंभयोनि (अगस्त्य) बोले— ‘अविमुक्त महाक्षेत्र है, परम निर्वाण (मोक्ष) का कारण है; वह समस्त क्षेत्रों में परम क्षेत्र और समस्त मंगलों में भी परम मंगल है।’

Verse 2

श्मशानानां च सर्वेषां श्मशानं परमं महत् । पीठानां परमं पीठमूषराणां महोषरम्

‘समस्त श्मशानों में यह परम और महान श्मशान है; समस्त पीठों में यह परम पीठ है; और समस्त ऊसर भूमियों में यह महाऊसर (अतिशय ऊसर) है।’

Verse 3

धर्माभिलाषिबुद्धीनां धर्मराशिकरं परम् । अर्थार्थिनां शिखिरथ परमार्थ प्रकाशकम्

धर्म की अभिलाषा रखने वाली बुद्धियों के लिए यह परम पुण्य-राशि का कारण है; और धन चाहने वालों के लिए, हे शिखिरथ, यह परमार्थ का प्रकाशक है।

Verse 4

कामिनां कामजननं मुमुक्षूणां च मोक्षदम् । श्रूयते यत्र यत्रैतत्तत्र तत्र परामृतम्

कामियों के लिए यह इच्छित भोगों को उत्पन्न करता है और मुमुक्षुओं को मोक्ष देता है। जहाँ-जहाँ यह सुना जाता है, वहीं-वहीं परम अमृत है।

Verse 5

क्षेत्रैकदेशवर्तिन्या ज्ञानवाप्याः कथां पराम् । श्रुत्वेमामिति मन्येहं गौरीहृदयनंदन

इस पवित्र क्षेत्र के एक भाग में स्थित ‘ज्ञान-वापी’ की इस परम कथा को सुनकर, हे गौरी-हृदय-नन्दन, मैं ऐसा ही मानता हूँ।

Verse 6

अणुप्रमाणमपि या मध्ये काशिविकासिनी । मही महीयसी ज्ञेया सा सिद्ध्यै न मुधा क्वचित्

जो काशी के मध्य में प्रकाशमान वह (स्थान) अणु-प्रमाण भी हो, तो भी उसे पृथ्वी से भी महान जानना चाहिए; वह सिद्धि के लिए है, कहीं भी व्यर्थ नहीं।

Verse 7

कियंति संति तीर्थानि नेह क्षोणीतलेऽखिले । परं काशीरजोमात्र तुलासाम्यं क्व तेष्वपि

इस समस्त पृथ्वी-तल पर कितने ही तीर्थ हैं; पर उनमें कहाँ काशी की धूल के एक कण के तुला-सम्य भी बराबरी है?

Verse 8

कियंत्यो न स्रवंत्योत्र रत्नाकर मुदावहाः । परं स्वर्गतरंगिण्याः काश्यां का साम्यमुद्वहेत्

यहाँ कितनी ही आनंददायिनी नदियाँ बहकर रत्नाकर को भरती हैं; पर स्वर्ग-तरंगिणी गंगा के समान काशी में कौन हो सकती है?

Verse 9

कियंति संति नो भूम्यां मोक्षक्षेत्राणि षण्मुख । परं मन्येऽविमुक्तस्य कोट्यंशोपि न तेष्वहो

हे षण्मुख! पृथ्वी पर मोक्ष-क्षेत्र कितने ही हैं; पर मैं मानता हूँ कि उनमें से कोई भी अविमुक्त का कोट्यंश भी नहीं—हाय।

Verse 10

गंगा विश्वेश्वरः काशी जागर्ति त्रितयं यतः । तत्र नैःश्रेयसी लक्ष्मीर्लभ्यते चित्रमत्र किम्

क्योंकि वहाँ गंगा, विश्वेश्वर और काशी—यह त्रय सदा जाग्रत रहता है, इसलिए वहाँ नैःश्रेयस-लक्ष्मी प्राप्त होती है; इसमें आश्चर्य ही क्या?

Verse 11

कथमेषा त्रयी स्कंद प्राप्यते नियतं नरैः । तिष्ये युगे विशेषेण नितरां चंचलेंद्रियैः

हे स्कन्द! यह त्रयी मनुष्यों द्वारा निश्चयपूर्वक कैसे प्राप्त की जाए—विशेषकर तिष्य-युग में, जब इन्द्रियाँ अत्यन्त चंचल हैं?

Verse 12

तपस्तादृक्क्व वा तिष्ये तिष्ये योगः क्व तादृशः । क्व वा व्रतं क्व वा दानं तिष्ये मोक्षस्त्वतः कुतः

तिष्य-युग में वैसी तपस्या कहाँ? तिष्य में वैसा योग कहाँ? वैसे व्रत और वैसे दान कहाँ? फिर तिष्य में उन साधनों से मोक्ष कैसे होगा?

Verse 13

विनापि तपसा स्कंद विनायोगेन षण्मुख । विना व्रतैर्विना दानैः काश्यां मोक्षस्त्वयेरितः

हे स्कन्द, हे षण्मुख! बिना तप के, बिना योग के, बिना व्रतों के और बिना दान के भी—तुमने कहा है कि काशी में मोक्ष प्राप्त होता है।

Verse 14

किं किमाचरता स्कंद काशी प्राप्येत तद्वद । मन्ये विना सदाचारं न सिद्ध्येयुर्मनोरथाः

हे स्कन्द! बताओ—कौन-सा आचरण और कौन-सी साधना करने से काशी की प्राप्ति होती है? मेरा मानना है कि सदाचार के बिना मनोकामनाएँ सिद्ध नहीं होतीं।

Verse 15

आचारः परमो धर्म आचारः परमं तपः । आचाराद्वर्धते ह्यायुराचारात्पापसंक्षयः

सदाचार ही परम धर्म है, सदाचार ही परम तप है। सदाचार से आयु बढ़ती है और सदाचार से पापों का क्षय होता है।

Verse 16

आचारमेव प्रथमं तस्मादाचक्ष्व षण्मुख । देवदेवो यथा प्राह तवाग्रे त्वं तथा वद

इसलिए, हे षण्मुख! सबसे पहले सदाचार का ही वर्णन करो। देवों के देव ने तुम्हारे सामने जैसा कहा था, वैसा ही तुम मुझसे कहो।

Verse 17

स्कंद उवाच । मित्रावरुणजाख्यामि सदाचारं सतां हितम् । यदाचरन्नरो नित्यं सर्वान्कामानवाप्नुयात्

स्कन्द बोले—हे मित्र-वरुण के पुत्र! मैं सदाचार का वर्णन करूँगा, जो सत्पुरुषों के हित में है; जिसे नित्य आचरण करने से मनुष्य सभी शुभ कामनाएँ प्राप्त करता है।

Verse 18

स्थावराः कृमयोऽब्जाश्च पक्षिणः पशवो नराः । क्रमेण धार्मिकास्त्वेते ह्येतेभ्यो धार्मिकाः सुराः

स्थावर, कृमि, जलज, पक्षी, पशु और मनुष्य—ये क्रमशः धर्म-समर्थता में बढ़ते जाते हैं; और इन सबसे भी अधिक धर्म-समर्थ देवगण माने गए हैं।

Verse 19

सहस्रभागः प्रथमा द्वितीयोनुक्रमात्तथा । सर्व एते महाभागा यावन्मुक्ति समाश्रयाः

पहली अवस्था का भाग सहस्रगुण है; दूसरी का भी क्रमशः वैसा ही। ये सब महाभाग्यशाली श्रेणियाँ क्रम-क्रम से मुक्ति के आश्रय तक बनी रहती हैं।

Verse 20

चतुर्णामपि भूतानां प्राणिनोऽतीव चोत्तमाः । प्राणिभ्यामपि मुने श्रेष्ठाः सर्वे बुद्ध्युपजीविनः

चारों भूत-प्रकारों में प्राणी निश्चय ही श्रेष्ठ हैं; और प्राणियों में भी, हे मुनि, जो बुद्धि के आधार पर जीते हैं, वे सर्वश्रेष्ठ हैं।

Verse 21

मतिमद्भ्यो नराः श्रेष्ठास्तेभ्यः श्रेष्ठास्तु वाडवाः । विप्रेभ्योपि च विद्वांसो विद्वद्भ्यः कृतबुद्धयः

बुद्धिमानों में मनुष्य श्रेष्ठ हैं; उनसे भी श्रेष्ठ संयमी-सदाचारी हैं; ब्राह्मणों में भी विद्वान ऊँचे हैं; और विद्वानों से भी वे श्रेष्ठ हैं जिनकी बुद्धि कृतार्थ और स्थिर हो गई है।

Verse 22

कृतधीभ्योपि कर्तारः कर्तृभ्यो ब्रह्मतत्पराः । न तेषामर्चनीयोऽन्यस्त्रिषु लोकेषु कुंभज

कृतधी जनों से भी ऊँचे धर्म के कर्ता हैं; कर्ताओं से भी ऊँचे वे हैं जो ब्रह्म में पूर्णतया तत्पर हैं। हे कुंभज, तीनों लोकों में उनके लिए अन्य कोई आराध्य नहीं।

Verse 23

अन्योन्यमर्चकास्ते वै तपोविद्याऽविशेषतः । ब्राह्मणो ब्रह्मणा सृष्टः सर्वभूतेश्वरो यतः

वे परस्पर के पूजक हैं, तप और विद्या में समान। ब्रह्मा द्वारा सृजित ब्राह्मण इसलिए समस्त प्राणियों में ईश्वरवत् मान्य है।

Verse 24

अतो जगत्स्थितं सर्वं ब्राह्मणोऽर्हति नापरः । सदाचारो हि सर्वार्हो नाचाराद्विच्युतः पुनः । तस्माद्विप्रेण सततं भाव्यमाचारशीलिना

इसलिए समस्त जगत् की स्थिति के हेतु ब्राह्मण ही सम्मान का अधिकारी है, अन्य नहीं। सदाचार सर्वथा पूज्य है; आचार से गिरा हुआ फिर पूज्य नहीं। अतः ब्राह्मण को सदा आचारशील होना चाहिए।

Verse 25

विद्वेष रागरहिता अनुतिष्ठंति यं मुने । विद्वांसस्तं सदाचारं धर्ममूलं विदुर्बुधाः

हे मुने, जिसे विद्वान् द्वेष और राग से रहित होकर आचरित करते हैं, उसी सदाचार को बुद्धिमान लोग धर्म का मूल जानते हैं।

Verse 26

लक्षणैः परिहीनोपि सम्यगाचारतत्परः । श्रद्धालुरनसूयुश्च नरो जीवेत्समाः शतम

बाह्य लक्षणों से रहित भी यदि कोई सम्यक् आचार में तत्पर, श्रद्धावान् और अनसूय (दोषदृष्टि से रहित) हो, तो वह मनुष्य सौ वर्ष जी सकता है।

Verse 27

श्रुतिस्मृतिभ्यामुदितं स्वेषु स्वेषु च कर्मसु । सदाचारं निषेवेत धर्ममूलमतंद्रितः

श्रुति और स्मृति में जैसा कहा गया है, अपने-अपने कर्मों में धर्म के मूल सदाचार का आलस्यरहित होकर निरन्तर सेवन करना चाहिए।

Verse 28

दुराचाररतो लोके गर्हणीयः पुमान्भवेत् । व्याधिभिश्चाभिभूयेत सदाल्पायुः सुदुःखभाक्

जो पुरुष दुराचार में रत रहता है, वह संसार में निंदनीय होता है; वह रोगों से दब जाता है, सदा अल्पायु रहता है और महान दुःख का भागी बनता है।

Verse 29

त्याज्यं कर्म पराधीनं कायमात्मवशं सदा । दुःखी यतः पराधीनः सदैवात्मवशः सुखी

जो कर्म पराधीन बनाता है, उसे त्याग देना चाहिए; अपने जीवन को सदा अपने वश में रखना चाहिए। क्योंकि पराधीन व्यक्ति दुःखी होता है, और आत्मवशी सदा सुखी।

Verse 30

यस्मिन्कर्मण्यंतरात्मा क्रियमाणे प्रसीदति । तदेव कर्म कर्तव्यं विपरीतं न च क्वचित्

जिस कर्म के करते समय अंतरात्मा प्रसन्न और शांत हो, वही कर्म करना चाहिए; उसके विपरीत कर्म कभी नहीं।

Verse 31

प्रथमं धर्मसर्वस्वं प्रोक्ता यन्नियमा यमाः । अतस्तेष्वेव वै यत्नः कर्तव्यो धर्ममिच्छता

धर्म का सर्वस्व—सबसे पहले—यम और नियम कहे गए हैं; इसलिए जो धर्म चाहता है, उसे इन्हीं में विशेष प्रयत्न करना चाहिए।

Verse 32

सत्यं क्षमार्जवं ध्यानमानृशंस्यमहिंसनम् । दमः प्रसादो माधुर्यं मृदुतेति यमा दश

सत्य, क्षमा, सरलता, ध्यान, करुणा, अहिंसा, दम (इंद्रिय-संयम), प्रसन्नता, माधुर्य और मृदुता—ये दस यम हैं।

Verse 33

शौचं स्नानं तपो दानं मौनेज्याध्ययनं व्रतम् । उपोषणोपस्थ दंडौ दशैते नियमाः स्मृताः

शौच, स्नान, तप, दान, मौन, पूजा, शास्त्र-अध्ययन, व्रत, उपवास और उपस्थ-निग्रह—ये दस नियम स्मरण किए गए हैं।

Verse 34

कामं क्रोधं मदं मोहं मात्सर्यं लोभमेव च । अमून्षड्वै रिणो जित्वा सर्वत्र विजयी भवेत्

काम, क्रोध, मद, मोह, मात्सर्य और लोभ—इन छह शत्रुओं को जीतकर मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है।

Verse 35

शनैः शनैः स चिनुयाद्धर्मं वल्मीक शृंगवत् । परपीडामकुर्वाणः परलोकसहायिनम्

वल्मीक की चोटी की भाँति, धान्य-कणों से जैसे ढेर बढ़ता है, वैसे ही धीरे-धीरे धर्म का संचय करे; और परपीड़ा न करते हुए उस धर्म को बढ़ाए जो परलोक में सहायक हो।

Verse 36

धर्म एव सहायी स्यादमुत्र न परिच्छदः । पितृ मातृ सुत भ्रातृ योषिद्बंधुजनादिकः

परलोक में धर्म ही सहायक होता है, वस्त्र-आभूषण आदि परिग्रह नहीं; वहाँ न पिता, न माता, न पुत्र, न भाई, न पत्नी, न बंधुजन साथ जाते हैं।

Verse 37

जायते चैकलः प्राणी प्रम्रियेत तथैकलः । एकलः सुकृतं भुंक्ते भुंक्ते दुष्कृतमेकलः

प्राणी अकेला जन्म लेता है और अकेला ही मरता है; अकेला ही सुकृत का फल भोगता है और अकेला ही दुष्कृत का फल भोगता है।

Verse 38

देहं पंचत्वमापन्नं त्यक्त्वा कौ काष्ठलोष्ठवत् । बांधवा विमुखा यांति धर्मो यांतमनुव्रजेत्

जब देह पंचतत्त्व में लीन हो जाती है, तब उसे काष्ठ या मिट्टी के ढेले की भाँति त्याग दिया जाता है। बंधुजन विमुख होकर चले जाते हैं, पर प्रस्थान करने वाले के साथ धर्म ही चलता है।

Verse 39

कृती संचिनुयाद्धर्मं ततोऽमुत्र सहायिनम् । धर्मं सहायिनं लब्द्ध्वा संतरेद्दुस्तरं तमः

इसलिए बुद्धिमान को धर्म का संचय करना चाहिए, क्योंकि वही परलोक में सहायक है। धर्म को साथी बनाकर मनुष्य दुस्तर अंधकार को पार कर जाता है।

Verse 40

संबंधानाचरेन्नित्यमुत्तमैरुत्तमैः सुधीः । अधमानधमांस्त्यक्त्वा कुलमुत्कर्षतां नयेत्

विवेकी पुरुष को सदा श्रेष्ठ जनों में श्रेष्ठ के साथ संगति करनी चाहिए। नीच और अतिनीच को त्यागकर अपने कुल को उत्कर्ष की ओर ले जाना चाहिए।

Verse 41

उत्तमानुत्तमानेव गच्छन्हीनांश्च वर्जयन् । ब्राह्मणः श्रेष्ठतामेति प्रत्यवाये न शूद्रताम्

उत्तम और अतिउत्तम जनों की ही संगति करते हुए, और हीन जनों से बचते हुए, ब्राह्मण श्रेष्ठता को प्राप्त होता है; पर विपरीत आचरण से वह उन्नति नहीं पाता, अधोगति को प्राप्त होता है।

Verse 42

अनध्ययनशीलं च सदाचारविलंघिनम् । सालसं च दुरन्नादं ब्राह्मणं बाधतेंऽतकः

जो ब्राह्मण अध्ययन से विमुख है, सदाचार का उल्लंघन करता है, आलसी है और अशुद्ध/दुष्ट अन्न का सेवन करता है—उसे अंतक (मृत्यु) आ दबोचता है।

Verse 43

ततोऽभ्यसेत्प्रयत्नेन सदाचारं सदा द्विजः । तीर्थान्यप्यभिलष्यंति सदाचारिसमागमम्

अतः द्विज को सदा प्रयत्नपूर्वक सदाचार का पालन करना चाहिए। तीर्थस्थल भी सदाचारी जनों के संग और सान्निध्य की अभिलाषा करते हैं।

Verse 44

रजनीप्रांतयामार्धं बाह्मः समय उच्यते । स्वहितं चिंतयेत्प्राज्ञस्तस्मिंश्चोत्थाय सवर्दा

रात्रि के अंतिम प्रहर का उत्तरार्ध ‘ब्रह्ममुहूर्त’ कहलाता है। उस समय बुद्धिमान अपने परम हित का चिंतन करे और उठकर सदा उसी में तत्पर रहे।

Verse 45

गजास्यं संस्मरेदादौ तत ईशं सहांबया । श्रीरंगं श्रीसमेतं तु ब्रह्माण्या कमलोद्भवम्

पहले गजास्य (गणेश) का स्मरण करे, फिर अम्बा सहित ईश (शिव) का। तत्पश्चात् श्री सहित श्रीरंग (विष्णु) का और फिर ब्रह्माणी सहित कमलोद्भव (ब्रह्मा) का स्मरण करे।

Verse 46

इंद्रादीन्सकलान्देवान्वसिष्ठादीन्मुनीनपि । गंगाद्याः सरितः सर्वाः श्रीशैलाद्यखिलान्गिरीन्

इन्द्र आदि समस्त देवों का, वसिष्ठ आदि मुनियों का भी स्मरण करे; गंगा आदि सभी नदियों का तथा श्रीशैल आदि समस्त पर्वतों का स्मरण करे।

Verse 47

क्षीरोदादीन्समुद्रांश्च मानसादि सरांसि च । वनानि नंदनादीनि धेनूः कामदुघादिकाः

क्षीरसागर आदि समस्त समुद्रों का, मानस आदि सरोवरों का; नंदन आदि वनों का तथा कामधेनु आदि कामदुघा गौओं का स्मरण करे।

Verse 48

कल्पवृक्षादि वृक्षांश्च धातून्कांचनमुख्यतः । दिव्यस्त्रीरुर्वशीमुख्या गरुडादीन्पतत्त्रिणः

कल्पवृक्ष आदि दिव्य वृक्षों का, धातुओं में सुवर्ण का, अप्सराओं में उर्वशी का और पक्षियों में गरुड़ आदि का स्मरण करे।

Verse 49

नागाश्च शेषप्रमुखान्गजानैरावतादिकान् । अश्वानुच्चैःश्रवो मुख्यान्कौस्तुभादीन्मणीञ्छुभान्

नागों में शेष, गजों में ऐरावत, अश्वों में उच्चैःश्रवा और शुभ मणियों में कौस्तुभ आदि का स्मरण करे।

Verse 50

स्मरेदरुंधतीमुख्याः पतिव्रतवतीर्वधूः । नैमिषादीन्यरण्यानि पुरीः काशीपुरीमुखाः

अरुंधती आदि पतिव्रता वधुओं का, नैमिष आदि पवित्र अरण्यों का और काशीपुरी आदि पुण्य नगरियों का स्मरण करे।

Verse 51

विश्वेशादीनि लिंगानि वेदानृक्प्रमुखानपि । गायत्रीप्रमुखान्मंत्रान्योगिनः सनकादिकान्

विश्वेश आदि लिंगों का, ऋग्वेद आदि वेदों का, गायत्री आदि मंत्रों का और सनक आदि योगियों का स्मरण करे।

Verse 52

प्रणवादिमहाबीजं नारदादींश्च वैष्णवान् । शिवभक्तांश्च बाणादीन्प्रह्लादादीन्दृढव्रतान्

प्रणव (ॐ) आदि महाबीज का, नारद आदि वैष्णवों का, बाण आदि शिवभक्तों का और प्रह्लाद आदि दृढ़व्रतियों का स्मरण करे।

Verse 53

वदान्यांश्च दधीच्यादीन्हरिश्चंद्रादि भूपतीन् । जननी चरणौ स्मृत्वा सर्वतीर्थोत्तमोत्तमौ

हृदय में माता के परम पावन चरणों का स्मरण करे—जो समस्त तीर्थों में भी सर्वोत्तम माने गए हैं—और साथ ही दधीचि आदि महान दानवीरों तथा हरिश्चन्द्र आदि आदर्श राजाओं का भी स्मरण करे।

Verse 54

पितरं च गुरूंश्चापि हृदि ध्यात्वा प्रसन्नधीः । ततश्चावश्यकं कर्तुं नैरृतीं दिशमाश्रयेत्

प्रसन्न बुद्धि से हृदय में पिता और गुरुओं का ध्यान करके, फिर आवश्यक कर्म करने हेतु नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा का आश्रय ले।

Verse 55

ग्रामाद्धनुःशतं गच्छेन्नगराच्च चतुर्गुणम् । तृणैराच्छाद्य वसुधां शिरः प्रावृत्य वाससा

गाँव से सौ धनुष (दूरी) दूर जाए और नगर से उसका चार गुना। भूमि को तृण से ढँककर और सिर को वस्त्र से आच्छादित करके, यथाविधि आगे बढ़े।

Verse 56

कर्णोपवीत्युदग्वक्त्रो दिवसे संध्ययोरपि । विण्मूत्रे विसृजेन्मौनी निशायां दक्षिणामुखः

दिन में—और दोनों संध्याओं में भी—कर्णोपवीत धारण कर उत्तरमुख होकर, मौन रहकर मल-मूत्र का त्याग करे। रात्रि में दक्षिणमुख हो।

Verse 57

न तिष्ठन्नाप्सु नो विप्र गो वह्न्यनिल संमुखः । न फालकृष्टे भूभागे न रथ्यासेव्यभूतले

हे विप्र, जल में खड़े होकर नहीं, न गौ, अग्नि या वायु के सम्मुख होकर; न हल से अभी-अभी जोती हुई भूमि पर, और न सड़क या लोगों के आवागमन वाले स्थान पर वह कर्म करे।

Verse 58

नालोकयेद्दिशोभागाञ्ज्योतिश्चक्रं नभोमलम् । वामेन पाणिना शिश्नं धृत्वोत्तिष्ठेत्प्रयत्नवान्

दिशाओं की ओर न देखे, न ही ज्योतियों के मंडल या निर्मल आकाश को निहारे। बाएँ हाथ से उपस्थ को थामकर, यत्नपूर्वक और सावधानी से उठे।

Verse 59

अथो मृदं समादाय जंतुकर्करवर्जिताम् । विहाय मूषकोत्खातां शौचोच्छिष्टां च नाकुलाम्

फिर कीड़े और कंकड़ से रहित मिट्टी ले। चूहे द्वारा खोदी हुई, शौच में पहले से प्रयुक्त, तथा नेवले के बिल की मिट्टी को त्याग दे।

Verse 60

गुह्ये दद्यान्मृदं चैकां पायौ पंचांबुसां तराः । दश वामकरे चापि सप्त पाणिद्वये मृदः

गुप्तांग पर एक बार मिट्टी लगाए, और गुदा पर जल सहित पाँच बार। फिर बाएँ हाथ पर दस बार, और दोनों हाथों पर सात बार मिट्टी लगाए।

Verse 61

एकैकां पादयोर्दद्यात्तिस्रः पाण्योर्मृदस्तथा । इत्थं शौचं गृही कुर्याद्गंधलेपक्षयावधि

प्रत्येक पाँव पर एक-एक बार मिट्टी लगाए, और हाथों पर इसी प्रकार तीन-तीन बार। गृहस्थ इस प्रकार शौच करे, जब तक दुर्गंध और लेप पूर्णतः न मिट जाए।

Verse 62

क्रमाद्द्वैगुण्यमेतस्माद्ब्रह्मचर्यादिषु त्रिषु । दिवाविहित शौचस्य रात्रावर्धं समाचरेत्

इस शौच-मान का क्रमशः ब्रह्मचर्य आदि तीन आश्रमों में द्विगुण करना चाहिए। और रात्रि में, दिन के लिए विहित शौच का आधा ही आचरित करे।

Verse 63

रुज्यर्धं च तदर्धं च पथि चौरादि बाधिते । तदर्धं योषितां चापि सुस्थे न्यूनं न कारयेत्

रोग होने पर, या सामर्थ्य का आधा भी घट जाने पर, अथवा मार्ग में चोर आदि से बाधा होने पर, नियम का केवल आधा आचरण किया जा सकता है। स्त्रियों के लिए भी आधा विधान स्वीकार है; परन्तु स्वस्थ होने पर निर्धारित से कम नहीं करना चाहिए।

Verse 64

अपि सर्वनदीतोयैर्मृत्कूटैश्चापि गोमयैः । आपादमाचरच्छौचं भावदुष्टो न शुद्धिभाक्

सब नदियों के जल से, मिट्टी के ढेलों से और गोबर से भी यदि कोई पाँव तक शौच करे, तो भी जिसका भाव दूषित है वह सच्ची शुद्धि का अधिकारी नहीं होता।

Verse 65

अर्चितः सविता सूते सुतान्पशु वसूनि च । व्याधीन्हरेद्ददात्यायुः पूरयेद्वांछितान्यपि

पूजित होने पर सविता (सूर्य) पुत्र, पशु और धन प्रदान करते हैं; वे रोगों का नाश करते, दीर्घायु देते और इच्छित कामनाओं को भी पूर्ण करते हैं।

Verse 66

आर्द्रधात्रीफलोन्माना मृदः शौचे प्रकीर्तिताः । सर्वाश्चाहुतयोप्येवं ग्रासाश्चांद्रायणेपि च । प्रागास्य उदगास्योवा सूपविष्टः शुचौ भुवि । उपस्पृशेद्विहीनायां तुषांगारास्थिभस्मभिः

शौच में मिट्टी की मात्रा ताज़े धात्री (आँवला) फल के बराबर कही गई है। यही मात्रा सब आहुतियों में तथा चान्द्रायण-व्रत के ग्रासों में भी मानी जाए। शुद्ध भूमि पर ठीक से बैठकर, पूर्वमुख या उत्तरमुख होकर उपस्पर्शन/आचमन करे; और यदि (उचित साधन) न हों तो भूसी, कोयला, अस्थि-भस्म या भस्म से भी कर ले।

Verse 67

अनुष्णाभिरफेनाभिरद्भिर्हृद्गाभिरत्वरः । ब्राह्मणो ब्राह्मतीर्थेन दृष्टिपूताभिराचमेत्

ब्राह्मण को बिना उतावली के, न अधिक गरम, झाग-रहित और हृदय तक पहुँचने वाले जल से—ब्राह्म-तीर्थ (हाथ की विधि) द्वारा, दृष्टि से पवित्र किए हुए जल का आचमन करना चाहिए।

Verse 68

कंठगाभिर्नृपः शुद्ध्येत्तालुगाभिस्तथोरुजः । स्त्रीशूद्रावास्य संस्पर्शमात्रेणापि विशुद्ध्यतः

कंठ तक जल लेने से राजा शुद्ध होता है; तालु तक जल लेने से जंघा/गुप्त-रोगी शुद्ध होता है। स्त्री और शूद्र तो केवल मुख-स्पर्श मात्र से भी शुद्ध माने जाते हैं।

Verse 69

शिरः प्रावृत्य कंठं वा जले मुक्तशिखोऽपि च । अक्षालितपदद्वंद्व आचांतोप्यशुचिर्मतः

यदि कोई सिर या कंठ को जल में डुबो दे, और केश खुले भी हों, फिर भी यदि दोनों पाँव न धोए गए हों तो आचमन करने पर भी वह अशुद्ध माना जाता है।

Verse 70

त्रिः पीत्वांबु विशुद्ध्यर्थं ततः खानि विशोधयेत् । अंगुष्ठमूलदेशेन द्विर्द्विरोष्ठाधरौ स्पृशेत्

शुद्धि के लिए तीन बार जल पिए; फिर इन्द्रियों/छिद्रों को शुद्ध करे। अंगूठे के मूल भाग से ऊपर और नीचे के ओठों को दो-दो बार स्पर्श करे।

Verse 71

अंगुलीभिस्त्रिभिः पश्चात्पुनरास्यं स्पृशेत्सुधीः । तर्जन्यंगुष्ठकोट्या च घ्राणरंध्रे पुनः पुनः

इसके बाद बुद्धिमान व्यक्ति तीन उँगलियों से फिर मुख का स्पर्श करे; और तर्जनी तथा अंगूठे की नोक से नासाछिद्रों को बार-बार स्पर्श करे।

Verse 72

अंगुष्ठानामिकाग्राभ्यां चक्षुः श्रोत्रे पुनः पुनः । कनिष्ठांगुष्ठयोगेन नाभिरंध्रमुपस्पृशेत्

अंगूठे और अनामिका की नोक से नेत्रों और कर्णों को बार-बार स्पर्श करे; और कनिष्ठा तथा अंगूठे के संयोग से नाभि-रन्ध्र को स्पर्श करे।

Verse 73

स्पृष्ट्वा तलेन हृदयं समस्ताभिः शिरः स्पृशेत् । अंगुल्यग्रैस्तथा स्कंधौ सांबु सर्वत्र संस्पृशेत्

हथेली से हृदय का स्पर्श करें, फिर सभी अंगुलियों से सिर का स्पर्श करें। अंगुलियों के अग्रभाग से कंधों का और जल से सभी अंगों का स्पर्श करें।

Verse 74

आचांतः पुनराचामेत्कृते रथ्योपसर्पणे । स्नात्वा भुक्त्वा पयः पीत्वा प्रारंभे शुभकर्मणाम्

आचमन करने के बाद यदि सड़क पर जाएं तो पुनः आचमन करें। स्नान करके, भोजन करके, दूध पीकर और शुभ कार्यों के आरंभ में भी आचमन करें।

Verse 75

सुप्त्वा वासः परीधाय तथा दृष्ट्वाप्यमंगलम् । प्रमादादशुचिं स्पृष्ट्वा द्विराचांतः शुचिर्भवेत्

सोकर उठने पर, वस्त्र पहनने पर, अमंगल दर्शन होने पर, या भूल से अशुद्ध वस्तु छू जाने पर दो बार आचमन करने से शुद्धि होती है।

Verse 76

अथो मुखविशुद्ध्यर्थं गृह्णीयाद्दंतधावनम् । आचांतोप्यशुचिर्यस्मादकृत्वा दंतधावनम्

इसके पश्चात मुख की शुद्धि के लिए दातुन करना चाहिए, क्योंकि दातुन किए बिना आचमन करने पर भी मनुष्य अशुद्ध ही रहता है।

Verse 77

प्रतिपद्दर्शषष्ठीषु नवम्यां रविवासरे । दंतानां काष्ठसंयोगो दहेदासप्तमं कुलम्

प्रतिपदा, अमावस्या, षष्ठी, नवमी और रविवार को दातुन (काष्ठ) का प्रयोग सात पीढ़ियों तक के कुल का नाश कर देता है।

Verse 78

अलाभे दंतकाष्ठानां निषिद्धे वाथ वासरे । गंडूषा द्वादश ग्राह्या मुखस्य परिशुद्धये

जब दंतकाष्ठ उपलब्ध न हो, या जिस दिन उसका निषेध हो, तब मुख की पूर्ण शुद्धि के लिए बारह बार गण्डूष (कुल्ला) करना चाहिए।

Verse 79

कनिष्ठाग्र परीमाणं सत्वचं निर्व्रणं ऋजुम् । द्वादशांगुलमानं च सार्धं स्याद्दंतधावनम्

दंतधावन की टहनी कनिष्ठा के अग्रभाग जितनी मोटी हो, छाल सहित, बिना घाव के और सीधी हो; तथा उसकी लंबाई साढ़े बारह अङ्गुल होनी चाहिए।

Verse 80

एकैकांगुलह्रासेन वर्णेष्वन्येषु कीर्तितम् । आम्राम्रातक धात्रीणां कंकोल खदिरोद्भवम्

अन्य वर्णों के लिए (लंबाई में) प्रत्येक के लिए एक-एक अङ्गुल की कमी बताई गई है। (उपयुक्त दंतकाष्ठ) आम, अम्रातक, धात्री (आँवला), तथा कंकोल और खदिर वृक्ष से प्राप्त होते हैं।

Verse 81

शम्यपामार्गखर्जूरीशेलुश्रीपर्णिपीलुजम् । राजादनं च नारंगं कषायकटुकंटकम्

शमी, अपामार्ग, खर्जूरी, शेलु, श्रीपर्णी और पीलु से भी (दंतकाष्ठ) लेना चाहिए; तथा राजादन और नारंग भी—जो कषाय (कसैले), कटु (तीखे) और कण्टकयुक्त हों।

Verse 82

क्षीरवृक्षोद्भवं वापि प्रशस्तं दंतधावनम् । जिह्वोल्लेखनिकां चापि कुर्याच्चापाकृतिं शुभाम्

क्षीरवृक्ष से प्राप्त दंतधावन भी उत्तम और प्रशंसनीय है। बुद्धिमान को जिह्वा-उल्लेखनी (जीभ खुरचनी) भी बनानी चाहिए और उसे शुभ आकार में गढ़ना चाहिए।

Verse 83

अन्नाद्याय व्यूहध्वं सोमोराजाय मा गमत् । समे मुखं प्रमार्क्ष्यते यशसा च भगेन च

अन्न और पोषण की सिद्धि के लिए इस कर्म की व्यवस्था करो; सोमराज देवता से विमुख मत हो। जब मुख समभाव से शुद्ध किया जाता है, तब वह यश और सौभाग्य से युक्त हो जाता है।

Verse 84

आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशु वसूनि च । ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वन्नो देहि वनस्पते

हे वनस्पति-नाथ! हमें आयु, बल, यश और तेज; संतान, पशु और धन भी प्रदान करो। तथा ब्रह्म-ज्ञान, प्रज्ञा, मेधा और बुद्धि भी हमें दो।

Verse 85

मंत्रावेतौ समुच्चार्य यः कुर्याद्दंतधावनम् । वनस्पतिगतः सोमस्तस्य नित्यं प्रसीदति

जो इन दोनों मंत्रों का सम्यक् उच्चारण करके दंतधावन करता है, वनस्पतियों में स्थित सोम उसके प्रति सदा प्रसन्न रहता है।

Verse 86

मुखे पर्युषिते यस्माद्भवेदशुचिभाग्नरः । ततः कुर्यात्प्रयत्नेन शुद्ध्यर्थं दंतधावनम्

क्योंकि रात्रि भर मुख के पर्युषित हो जाने पर मनुष्य अशुचिता का भागी बनता है, इसलिए शुद्धि के लिए प्रयत्नपूर्वक दंतधावन करना चाहिए।

Verse 87

उपवासेपि नो दुष्येद्दंतधावनमंजनम् । गंधालंकारसद्वस्त्रपुष्पमालानुलेपनम्

उपवास में भी दंतधावन और अंजन लगाना दोष नहीं माना जाता; वैसे ही सुगंध, आभूषण, स्वच्छ वस्त्र, पुष्पमाला और अनुलेपन भी (दोषरहित हैं)।

Verse 88

प्रातःसंध्यां ततः कुर्याद्दंतधावनपूर्विकाम् । प्रातःस्नानं चरित्वा च शुद्धे तीर्थे विशेषतः

फिर दाँत साफ करके पूर्वक प्रातः-संध्या करे; और प्रातः-स्नान भी करे—विशेषतः किसी शुद्ध तीर्थ-घाट पर।

Verse 89

प्रातःस्नानाद्यतःशुद्ध्येत्कायोयं मलिनः सदा । छिद्रितो नवभिश्छिद्रैः स्रवत्येव दिवानिशम्

प्रातः-स्नान आदि शुद्धियों से यह शरीर शुद्ध होता है; क्योंकि यह सदा मलिन है, नौ छिद्रों से छिद्रित होकर दिन-रात निरन्तर स्रवता रहता है।

Verse 90

उत्साह मेधा सौभाग्य रूप संपत्प्रवर्तकम् । मनः प्रसन्नताहेतुः प्रातःस्नानं प्रशस्यते

प्रातः-स्नान की प्रशंसा की गई है—यह उत्साह, मेधा, सौभाग्य, रूप और संपत्ति को बढ़ाने वाला तथा मन की प्रसन्नता का कारण है।

Verse 91

प्रस्वेद लालाद्याक्लिन्नो निद्राधीनो यतो नरः । प्रातःस्नानात्ततोर्हः स्यान्मंत्रस्तोत्रजपादिषु

क्योंकि मनुष्य पसीने और लार आदि से आर्द्र रहता है और निद्रा के वश में होता है; इसलिए प्रातः-स्नान के बाद वह मंत्र, स्तोत्र, जप आदि में योग्य होता है।

Verse 92

प्रातःप्रातस्तु यत्स्नानं संजाते चारुणोदये । प्राजापत्यसमं प्राहुस्तन्महाघविघातकृत्

जो स्नान प्रतिदिन प्रातः, सुंदर अरुणोदय होने पर किया जाता है, उसे प्राजापत्य-व्रत के समान कहा गया है; वह महान पापों का नाश करता है।

Verse 93

प्रातःस्नानं हरेत्पापमलक्ष्मीं ग्लानिमेव च । अशुचित्वं च दुःस्वप्नं तुष्टिं पुष्टिं प्रयच्छति

प्रातःकाल का स्नान पाप, अलक्ष्मी और ग्लानि को हर लेता है; वह अशुचिता और दुःस्वप्नों का नाश कर तुष्टि तथा पुष्टि प्रदान करता है।

Verse 94

नोपसर्पंति वै दुष्टाः प्रातःस्नायिजन क्वचित् । दृष्टादृष्टफलं यस्मात्प्रातःस्नानं समाचरेत्

जो प्रातः स्नान करता है, उसके पास दुष्ट लोग कभी नहीं आते; क्योंकि प्रातःस्नान से दृष्ट और अदृष्ट दोनों फल मिलते हैं, इसलिए इसका आचरण करना चाहिए।

Verse 95

प्रसंगतः स्नानविधिं वक्ष्यामि कलशोद्भव । विधिस्नानं यतः प्राहुः स्नानाच्छतगुणोत्तरम्

अब प्रसंगवश, हे कलशोद्भव, मैं स्नान की विधि कहूँगा; क्योंकि नियमपूर्वक किया गया स्नान, अन्य स्नान की अपेक्षा सौ गुना अधिक फल देने वाला कहा गया है।

Verse 96

विशुद्धां मृदमादाय बर्हींषि तिल गोमयम् । शुचौ देशे परिस्थाप्य त्वाचम्य स्नानमाचरेत्

शुद्ध मिट्टी, कुश, तिल और गोबर लेकर, उन्हें पवित्र स्थान में रखकर, आचमन करे और फिर स्नान करे।

Verse 97

उपग्रही बद्धशिखो जलमध्ये समाविशेत् । उरुं हीति मंत्रेण तोयमावर्त्य सृष्टितः

ऊपरी वस्त्र धारण कर, शिखा बाँधकर, जल के मध्य में प्रवेश करे; ‘उरुं हीति’ मंत्र से विधिपूर्वक जल को आवर्तित (घुमाए) करे।

Verse 98

ये ते शतं ततो जप्त्वा तोयस्यामंत्रणाय च । सुमित्रिया नो मंत्रेण पूर्वं कृत्वा जलांजलिम् । क्षिपेद्द्वेष्यं समुद्दिश्य जपन्दुर्मित्रिया इति

जल के आमंत्रण/अभिषेक हेतु ‘ये ते शतं’ का सौ बार जप करके, पहले ‘सुमित्रिया नो’ मंत्र से जल की अंजलि बनाकर, शत्रु का संकेत करते हुए ‘दुर्मित्रिया’ का जप करते-करते उस जल को दूर फेंके।

Verse 99

इदं विष्णुरिमं जप्त्वा लिंपेदंगानि मृत्स्नया । मृदैकया शिरः क्षाल्य द्वाभ्यां नाभेस्तथोपरि

‘इदं विष्णुः’ मंत्र का जप करके शुद्धि-भूमि (मिट्टी) से अंगों का लेपन करे; एक भाग मिट्टी से सिर धोए, और दो भाग से नाभि तथा उसके ऊपर का प्रदेश शुद्ध करे।

Verse 100

नाभेरधस्तु तिसृभिः पादौ षड्भिर्विशोधयेत् । मज्जेत्प्रवाहाभिमुख आपो अस्मानिमं जपन्

नाभि के नीचे तीन भाग मिट्टी से शुद्धि करे और पैरों को छह भाग से विशुद्ध करे। फिर प्रवाह की ओर मुख करके ‘आपो अस्मान्’ मंत्र का जप करते हुए जल में डुबकी लगाए।

Verse 110

प्रणवं त्रिर्जपेद्वापि विष्णुं वा संस्मरेत्सुधीः । स्नात्वेत्थं वस्त्रमापीड्य गृह्णीयाद्धौतवाससी । आचम्य च ततः कुर्यात्प्रातःसंध्यां कुशान्विताम् । यो न संध्यामुपासीत ब्राह्मणो हि विशेषतः

बुद्धिमान् पुरुष प्रणव का तीन बार जप करे, अथवा विष्णु का स्मरण करे। इस प्रकार स्नान करके वस्त्र निचोड़कर धुले हुए वस्त्र धारण करे। फिर आचमन करके कुश सहित प्रातः-संध्या करे। विशेषतः ब्राह्मण जो संध्या-उपासना नहीं करता, वह कर्तव्य से च्युत होता है।

Verse 120

एकं संभोज्य विधिवद्ब्राह्मणं यत्फलं लभेत् । प्राणायामैर्द्वादशभिस्तत्फलं श्रद्धयाप्यते

विधिपूर्वक एक ब्राह्मण को भोजन कराने से जो फल मिलता है, वही फल श्रद्धा सहित किए गए बारह प्राणायामों से भी प्राप्त होता है।

Verse 130

गृहाद्बहुगुणा यस्मात्संध्या बहिरुपासिता । गायत्र्यभ्यासमात्रोपि वरं विप्रो जितेंद्रियः

क्योंकि घर के भीतर की अपेक्षा घर के बाहर की गई संध्या-उपासना अनेक गुना अधिक फल देती है, इसलिए जितेन्द्रिय ब्राह्मण के लिए गायत्री का मात्र अभ्यास भी श्रेष्ठ है।

Verse 140

नक्तं दिनं निमज्ज्याप्सु कैवर्ताः किमु पावनाः । शतशोपि तथा स्नाता न शुद्धा भावदूषिता

यदि मछुवारे रात-दिन जल में डुबकी लगाते हुए भी शुद्ध नहीं होते, तो अन्य लोग कैसे पवित्र होंगे? मन का भाव दूषित हो तो सौ बार स्नान करने पर भी शुद्धि नहीं होती।

Verse 150

इमं मंत्रं ततश्चोक्त्वा कुर्यादाचमनं द्विजः । आचार्याः केचिदिच्छंति शाखाभेदेन चापरे

इस मंत्र का उच्चारण करके द्विज को आचमन करना चाहिए। कुछ आचार्य इसे इसी प्रकार मानते हैं, और कुछ अन्य वेद-शाखा के भेद के अनुसार भिन्न विधि बताते हैं।

Verse 160

सहस्रकृत्वो गायत्र्याः शतकृत्वोथवा पुनः । दशकृत्वोथ देव्यैव कुर्यात्सौरीमुपस्थितिम्

गायत्री का सहस्र बार—या सौ बार, अथवा फिर दस बार—जप करके, उसी देवी (गायत्री) को साधन मानकर सूर्य की उपस्थिति-उपासना (सौरी उपस्थिति) करनी चाहिए।

Verse 170

अन्वारब्धेन सव्येन तर्पयेत्षड्विनायकान् । ब्रह्मादीनखिलान्देवान्मरीच्यादींस्तथा मुनीन्

सव्योपवीत की विधि से (यज्ञोपवीत को बाईं ओर उचित प्रकार धारण करके) छह विनायकों को तर्पण दे; तथा ब्रह्मा आदि समस्त देवों को और मरीचि आदि मुनियों को भी तर्पण करे।

Verse 180

उदीरतामगिंरस आयंतुन इतीष्यते । ऊर्जं वहंती पितृभ्यः स्वधायिभ्यस्ततः पठेत्

तदनन्तर विधि के अनुसार ‘उदीरताम्…’ से आरम्भ होने वाला वैदिक मन्त्र जपे; फिर स्वधा-भागी पितरों के लिए ‘ऊर्जं वहन्ती…’ मन्त्र का पाठ करे।

Verse 190

अध्यापयेच्छुचीञ्शिष्यान्हितान्मेधासमन्वितान् । उपेयादीश्वरं चैव योगक्षेमादि सिद्धये

शुद्ध, हितैषी और बुद्धिसम्पन्न शिष्यों को अध्यापन कराए; तथा योग, क्षेम (रक्षा) आदि सिद्धियों की प्राप्ति हेतु ईश्वर की शरण/समीप जाए।

Verse 200

ओंभूर्भुवःस्वःस्वाहेति विप्रो दद्यात्तथाहुतिम् । तथा देवकृतस्याद्या जुहुयाच्च षडाहुतीः

‘ॐ भूर्भुवःस्वः स्वाहा’ का उच्चारण करके ब्राह्मण आहुति दे; तथा ‘देवकृत’ विधि में निर्दिष्ट प्रथम आहुति से आरम्भ कर छह आहुतियाँ प्रदान करे।

Verse 210

प्रतिगृह्णंत्विमं पिंडं काका भूमौ मयार्पितम् । द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ

भूमि पर मेरे द्वारा अर्पित इस पिण्ड को काक ग्रहण करें; तथा वैवस्वत (यम) कुल में उत्पन्न श्याम और शबल—वे दोनों श्वान तृप्त हों।

Verse 220

विधायान्नमनग्नं तदुपरिष्टादधस्तथा । आपोशनविधानेन कृत्वाश्नीयात्सुधीर्द्विजः

अग्नि से अथवा दोष से अकलुषित (शुद्ध) अन्न को विधि के अनुसार ऊपर-नीचे व्यवस्थित करके, बुद्धिमान द्विज ‘आपोशन’ विधि सम्पन्न कर तब भोजन करे।

Verse 230

अंगुष्ठमात्रः पुरुषस्त्वंगुष्ठं च समाश्रितः । ईशः सर्वस्य जगतः प्रभुः प्रीणाति विश्वभुक्

अंगूठे के प्रमाण वाला वह पुरुष, जो अंगूठे में ही स्थित कहा गया है—वही समस्त जगत् का ईश्वर, स्वामी और विश्व का पालनकर्ता, ऐसे स्मरण और साधना से प्रसन्न होता है।

Verse 240

अग्निश्चेति च मंत्रेण विधायाचमने सुधीः । पश्चिमास्यो जपेत्तावद्यावन्नक्षत्रदर्शनम्

‘अग्निश्च…’ से आरम्भ होने वाले मंत्र द्वारा आचमन करके, बुद्धिमान साधक पश्चिममुख होकर तब तक जप करे, जब तक नक्षत्रों का दर्शन न हो जाए।

Verse 243

उद्देशतः समाख्यातो ह्येष नित्यतमो विधिः । इत्थं समाचरन्विप्रो नावसीदति कर्हिचित्

यह अत्यन्त नित्य नियम संक्षेप से बताया गया है। जो ब्राह्मण इस प्रकार आचरण करता है, वह कभी भी विपत्ति में नहीं पड़ता।