Adhyaya 232
Vana ParvaAdhyaya 232140 Versesदेवताओं के पक्ष में निर्णायक रूप से पलटता है; स्कन्द के नेतृत्व में दानव-बल टूटता है।

Adhyaya 232

Duryodhana’s Śaraṇāgati and the Pāṇḍavas’ Resolve (Gandharva Encounter)

Upa-parva: Gandharva–Kaurava Saṃkaṭa (Duryodhana’s Capture Episode)

This chapter presents a structured ethical argument by Yudhiṣṭhira addressed primarily to Bhīma (Vṛkodara) in response to the Kauravas’ distressed approach. He distinguishes ordinary intra-kin discord from the unacceptable prospect of an external party harming or humiliating the Kuru lineage. Yudhiṣṭhira frames the rescue as both refuge-protection (śaraṇa-prapanna-trāṇa) and kula-preservation, urging immediate readiness and specifying the responders (Arjuna, the twins, and Bhīma). He prescribes a graduated strategy: attempt conciliation first, then apply controlled force if necessary, and finally employ all means to secure release if softer measures fail—while restraining disruptive actors. Vaiśaṃpāyana then reports Arjuna’s acceptance of the directive as a vow: if peaceful means do not succeed, he will compel the Gandharva leader through martial capacity. The Kauravas, hearing Arjuna’s truthful pledge, regain confidence. The chapter’s thematic center is āpaddharma applied to adversarial kin: duty to protect a suppliant and safeguard lineage reputation overrides immediate enmity.

Chapter Arc: रुद्र-गणों की भाँति तमोमय स्कन्दग्रहों का उद्भव और उनका मनुष्यों को कष्ट देना—देव-लोक में भय और जिज्ञासा एक साथ उठती है। → स्वाहा अपनी दुर्लभ ‘प्रीति’ की याचना करती है और स्कन्द उससे पूछते हैं—“किस प्रकार की प्रीति?”; इसी के साथ देव-दानव संघर्ष का कर्दम (मांस-शोणित) फैलता दिखता है और युद्ध का विराट विस्तार सामने आता है। → महिष नामक दानव विशाल पर्वत उठाकर देवताओं पर टूट पड़ता है; देव-सेना, रुद्र-शक्ति और दिव्य आयुधों की प्रचण्ड धारा के बीच रणभूमि रक्त-कर्दम से भर जाती है—यही अध्याय का उग्र शिखर है। → स्कन्द शत्रुओं का नाश कर महेश्वर के पास लौटते हैं; पुरंदर (इन्द्र) महासेन को आलिंगन कर विजय का घोष करते हैं, तूर्य-नाद गूँजता है और दैत्यों के छिन्न-भिन्न शरीर धरती पर बादलों-से गिरते हैं। → विजय-त्रिशूल, दण्ड आदि रुद्र-सम्बद्ध शक्तियों का अनुक्रमण और देव-सेना की आगे बढ़ती गति संकेत देती है कि यह संहार-धारा अगले प्रसंग में और व्यापक रूप लेगी।

Shlokas

Verse 1

हि >> आय न (हुक है 7 7 > मनुष्योंको कष्ट देनेवाले ये तामस स्कन्दग्रह भगवान्‌ रुद्रके भूत-प्रेतादि गणोंकी भाँति कुमार स्कन्दके शरीरसे उत्पन्न तमोमय कुमारके साथी माने जाते हैं। इन ग्रहोंसे रक्षा पानेके लिये भगवान्‌ महेश्वरकी भक्ति करनी चाहिये। भय दिखाकर भी भगवानकी भक्ति करानेमें हेतुभूत होनेके कारण इन ग्रहोंका वर्णन यहाँ किया गया है। भगवानके भक्तोंको ये ग्रह छू भी नहीं सकते। तमोगुणी प्रजापर ही सब तामस ग्रहोंका बल काम करता है। और वही इनकी पूजा-अर्चना किया करते हैं। एकत्रिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट-यात्रा, देवासुर-संग्राम, महिषासुर- वध तथा स्कनन्‍्दकी प्रशंसा मार्कण्डेय उवाच यदा स्कन्देन मातृणामेवमेतत्‌ प्रियं कृतम्‌ । अथैनमब्रवीत्‌ स्वाहा मम पुत्रस्त्॒वमौरस:,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! जब स्कन्दने इस प्रकार मातृगणोंका यह प्रिय मनोरथ पूर्ण किया, तब स्वाहाने आकर उनसे कहा--“तुम मेरे औरस पुत्र हो

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira! Ketika Skanda telah memenuhi hasrat yang sangat dicintai para Ibu itu, maka Svāhā datang dan berkata kepadanya, ‘Engkau adalah putraku sendiri, putra sejati dari rahimku.’”

Verse 2

इच्छाम्यहं त्वया दत्तां प्रीतिं परमदुर्लभाम्‌ । तामब्रवीत्‌ ततः स्कन्द: प्रीतिमिच्छसि कीदृशीम्‌,“अतः मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे परम दुर्लभ प्रीति प्रदान करो।” तब स्कन्दने पूछा --'माँ तुम कैसी प्रीति पानेकी अभिलाषा रखती हो?”

Svāhā berkata, “Aku menginginkan darimu anugerah kasih (prīti) yang amat langka.” Lalu Skanda bertanya, “Kasih seperti apakah yang engkau kehendaki?”

Verse 3

स्वाह्मोवाच दक्षस्याहं प्रिया कन्या स्वाहा नाम महाभुज । बाल्यात्प्रभृति नित्यं च जातकामा हुताशने,स्वाहा बोली--महाबाहो! मैं प्रजापति दक्षकी प्रिय पुत्री हूँ, मेरा नाम स्वाहा है। मैं बचपनसे ही सदा अग्निदेवके प्रति अनुराग रखती आयी हूँ

Svāhā berkata, “Wahai yang berlengan perkasa, aku adalah putri kesayangan Dakṣa, bernama Svāhā. Sejak masa kanak-kanak, aku senantiasa memendam hasrat dan keterikatan yang mendalam kepada Hutāśana (Dewa Agni).”

Verse 4

नस मां कामिनी पुत्र सम्यक्‌ जानाति पावक: । इच्छामि शाश्रतं वासं वस्तुं पुत्र सहाग्निना,पुत्र! परंतु अग्निदिवको इस बातका अच्छी तरह पता नहीं है कि मैं उन्हें चाहती हूँ। बेटा! मेरी यह हार्दिक अभिलाषा है कि मैं नित्य-निरन्तर अग्निदेवके ही साथ निवास करूँ

Mārkaṇḍeya berkata: “Anakku, perempuan yang tergila-gila itu tidak sungguh mengenal diriku; dan Pāvaka (Agni) pun belum sepenuhnya memahami hasratku. Keinginan terdalamku ialah: tinggal untuk selama-lamanya bersama Dewa Api.”

Verse 5

स्कन्द उवाच हव्यं कव्यं च यत्किंचिद्‌ द्विजानां मन्त्रसंस्तुतम्‌ । होष्यन्त्यग्नौ सदा देवि स्वाहेत्युक्त्वा समुद्धूतम्‌,स्कन्द बोले--देवि! आजसे सन्मार्गपर चलने-वाले सदाचारी धर्मात्मा मनुष्य देवताओं तथा पितरोंके लिये हव्य और कव्यके रूपमें उठाकर ब्राह्मणोंद्वारा उच्चारित वेदमन्त्रोंके साथ अग्निमें जो कुछ आहुति देंगे, वह सब स्वाहाका नाम लेकर ही अर्पण करेंगे। शोभने! इस प्रकार तुम्हारे साथ निरन्तर अग्निदेवका निवास बना रहेगा

Skanda berkata: “Wahai Dewi, apa pun persembahan yang ada—baik havya bagi para dewa maupun kavya bagi para leluhur—yang dipuji dan disucikan oleh mantra-mantra Weda yang diucapkan para dvija, semuanya akan senantiasa dicurahkan ke dalam api sambil mengucap ‘svāhā’ ketika diangkat dan dipersembahkan. Dengan demikian, melalui laku yang benar, kehadiran Agni akan tetap teguh bersamamu.”

Verse 6

अद्यप्रभृति दास्यन्ति सुवृत्ता: सत्पथे स्थिता: | एवमन्निस्त्वया सार्थ सदा वत्स्यति शोभने,स्कन्द बोले--देवि! आजसे सन्मार्गपर चलने-वाले सदाचारी धर्मात्मा मनुष्य देवताओं तथा पितरोंके लिये हव्य और कव्यके रूपमें उठाकर ब्राह्मणोंद्वारा उच्चारित वेदमन्त्रोंके साथ अग्निमें जो कुछ आहुति देंगे, वह सब स्वाहाका नाम लेकर ही अर्पण करेंगे। शोभने! इस प्रकार तुम्हारे साथ निरन्तर अग्निदेवका निवास बना रहेगा

Skanda berkata: “Mulai hari ini, mereka yang berkelakuan baik dan teguh di jalan benar akan mempersembahkan oblasinya dengan menyebut ‘Svāhā’. Wahai yang elok, dengan demikian Agni akan selalu tinggal bersamamu.”

Verse 7

मार्कण्डेय उवाच एवमुक्ता ततः स्वाहा तुष्टा स्कन्देन पूजिता । पावकेन समायुक्ता भर्त्रा स्कन्दमपूजयत्‌,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! स्कन्दके इस प्रकार कहने और आदर देनेपर स्वाहा बहुत संतुष्ट हुई। अपने स्वामी अग्निदेवका संयोग पाकर उसने भी स्कन्दका पूजन किया

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, setelah diperlakukan demikian, Svāhā pun sangat puas karena dihormati oleh Skanda. Setelah bersatu kembali dengan Pāvaka (Agni), suaminya, ia pun membalas dengan memuja Skanda.”

Verse 8

ततो ब्रह्मा महासेन॑ प्रजापतिरथाब्रवीत्‌ | अभिगच्छ महादेवं पितरं त्रिपुरार्दनम्‌

Kemudian Brahmā, Sang Prajāpati, berkata kepada Mahāsena: “Pergilah dan menghadap Mahādeva—ayahmu, sang penghancur Tripura.”

Verse 9

तदनन्तर प्रजापति ब्रह्माजीने महासेनसे कहा--'वत्स! अब तुम अपने पिता त्रिपुरविनाशक महादेवजीसे मिलो ।। रुद्रेणाग्निं समाविश्य स्वाहामाविश्य चोमया । हितार्थ सर्वलोकानां जातस्त्वमपराजित:,“भगवान्‌ रुद्रने अग्निमें और भगवती उमाने स्वाहामें प्रवेश करके समस्त लोकोंके हितके लिये तुम-जैसे अपराजित वीरको उत्पन्न किया है

Sesudah itu Prajāpati Brahmā berkata kepada Mahāsena: “Anakku, kini pergilah menemui ayahmu, Mahādeva—pemusnah Tripura. Karena Rudra memasuki Agni dan Umā memasuki Svāhā, engkau telah dilahirkan sebagai pahlawan tak terkalahkan demi kesejahteraan semua dunia.”

Verse 10

उमायोन्यां च रुद्रेण शुक्रं सिक्त महात्मना । अस्मिन्‌ गिरौ निपतितं मिज्जिकामिज्जिकं यतः,“महात्मा रुद्रने उमाके गर्भमें जिस वीर्यकी स्थापना की थी, उसका कुछ भाग इसी पर्वतपर गिर पड़ा था, जिससे मिंजिका-मिंजिक नामक जोड़ेकी उत्पत्ति हुई। शेष शुक्रका कुछ अंश लोहित-सागरमें, कुछ सूर्यकी किरणोंमें, कुछ पृथ्वीपर और कुछ वृक्षोंपर गिर पड़ा। इस प्रकार वह पाँच भागोंमें विभक्त होकर गिरा था। उसीसे ये तुम्हारे विभिन्न आकृतिवाले, मांसभक्षी एवं भयंकर पार्षद प्रकट हुए हैं; जिन्हें मनीषी पुरुष ही जान पाते हैं!

Mārkaṇḍeya berkata: “Benih yang ditanamkan Rudra yang berhati luhur ke dalam rahim Umā—sebagian darinya jatuh di gunung ini. Dari jatuhnya itu lahirlah sepasang yang dikenal sebagai Mijjikā dan Mijjika.”

Verse 11

सम्भूतं लोहितोदे तु शुक्रशेषमवापतत्‌ । सूर्यरश्मिषु चाप्यन्यदन्यच्चैवापतद्‌ भुवि,“महात्मा रुद्रने उमाके गर्भमें जिस वीर्यकी स्थापना की थी, उसका कुछ भाग इसी पर्वतपर गिर पड़ा था, जिससे मिंजिका-मिंजिक नामक जोड़ेकी उत्पत्ति हुई। शेष शुक्रका कुछ अंश लोहित-सागरमें, कुछ सूर्यकी किरणोंमें, कुछ पृथ्वीपर और कुछ वृक्षोंपर गिर पड़ा। इस प्रकार वह पाँच भागोंमें विभक्त होकर गिरा था। उसीसे ये तुम्हारे विभिन्न आकृतिवाले, मांसभक्षी एवं भयंकर पार्षद प्रकट हुए हैं; जिन्हें मनीषी पुरुष ही जान पाते हैं!

Dari benih yang telah terwujud itu, sisa bagiannya jatuh ke perairan Lohita; sebagian lain jatuh ke dalam sinar-sinar Matahari, dan sebagian lagi jatuh ke bumi.

Verse 12

आसक्तमन्यद्‌ वृक्षेषु तदेवं पज्चधापतत्‌ | तत्र ते विविधाकारा गणा ज्ञेया मनीषिशभि: | तव पारिषदा घोरा य एते पिशिताशिन:,“महात्मा रुद्रने उमाके गर्भमें जिस वीर्यकी स्थापना की थी, उसका कुछ भाग इसी पर्वतपर गिर पड़ा था, जिससे मिंजिका-मिंजिक नामक जोड़ेकी उत्पत्ति हुई। शेष शुक्रका कुछ अंश लोहित-सागरमें, कुछ सूर्यकी किरणोंमें, कुछ पृथ्वीपर और कुछ वृक्षोंपर गिर पड़ा। इस प्रकार वह पाँच भागोंमें विभक्त होकर गिरा था। उसीसे ये तुम्हारे विभिन्न आकृतिवाले, मांसभक्षी एवं भयंकर पार्षद प्रकट हुए हैं; जिन्हें मनीषी पुरुष ही जान पाते हैं!

Sebagian lagi melekat pada pepohonan. Demikianlah ia jatuh terbagi menjadi lima. Dari sana tampaklah para gaṇa beraneka rupa—yang hanya dapat dikenali oleh orang bijak; merekalah para pengiringmu yang mengerikan, para pemakan daging.

Verse 13

एवमस्त्विति चाप्युक्त्वा महासेनो महेश्वरम्‌ । अपूजयदमेयात्मा पितरं पितृवत्सल:,तब अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न एवं पितृभक्त कुमार महासेनने “एवमस्तु' कहकर अपने पिता भगवान्‌ महेश्वरका पूजन किया

Mārkaṇḍeya berkata: Setelah menjawab, “Demikianlah,” Mahāsena—berjiwa tak terukur dan berbakti kepada ayahnya—memuja Maheśvara, menghormati beliau sebagai seorang putra kepada ayahnya.

Verse 14

मार्कण्डेय उदाच अर्कपुष्पैस्तु ते पजच गणा: पूज्या धनार्थिभि: | व्याधिप्रशमनार्थ च तेषां पूजां समाचरेत्‌,मार्कण्डेयजी कहते हैं-राजन्‌! धनार्थी पुरुषोंको आकके फूलोंसे उन पाँचों गणोंकी सेवा करनी चाहिये। रोगोंकी शान्तिके लिये भी उनका पूजन करना उचित है

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Raja, kelima gaṇa (rombongan pengiring) itu hendaknya dipuja oleh mereka yang menginginkan kekayaan, dengan bunga tanaman arka. Dan untuk meredakan penyakit pun, pemujaan kepada mereka patut dilakukan dengan tata cara yang semestinya.”

Verse 15

मिज्जिकामिज्जिकं चैव मिथुन रुद्रसम्भवम्‌ । नमस्कार्य सदैवेह बालानां हितमिच्छता,मिंजिका-मिंजकका जोड़ा भी भगवान्‌ शंकरसे उत्पन्न हुआ है। अतः बालकोंके हितकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा इस जोड़ेको नमस्कार करें

“Miñjikā dan Miñjika—pasangan ini lahir dari Rudra (Śiva). Karena itu, siapa pun yang menghendaki kesejahteraan anak-anak hendaknya, di dunia ini, senantiasa memberi salam hormat kepada pasangan tersebut.”

Verse 16

स्त्रियो मानुषमांसादा वृद्धिका नाम नामत: । वृक्षेषु जातास्ता देव्यो नमस्कार्या: प्रजार्थिभि:,वृक्षोंपरसे गिरे हुए शुक्रसे 'वृद्धिका' नामवाली स्त्रियाँ उत्पन्न हुई हैं, जो मनुष्यका मांस भक्षण करनेवाली हैं। संतानकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको इन देवियोंके आगे मस्तक झुकाना चाहिये

“Ada perempuan-perempuan pemakan daging manusia yang dikenal dengan nama ‘Vṛddhikā’. Mereka lahir di atas pepohonan dan dipandang sebagai daya-daya ilahi; mereka yang menginginkan keturunan hendaknya bersujud memberi hormat kepada para dewi itu.”

Verse 17

एवमेते पिशाचानामसंख्येया गणा: स्मृता: । घण्टाया: सपताकाया: शृणु मे सम्भवं नृप,इस प्रकार ये पिशाचोंके असंख्य गण बताये गये हैं। राजन! अब तुम मुझसे स्कन्दके घण्टे और पताकाकी उत्पत्तिका वृत्तान्त सुनो

“Demikianlah rombongan Piśāca yang tak terhitung itu telah disebutkan. Sekarang, wahai raja, dengarkan dariku kisah asal-usul lonceng dan panji (yang berkaitan dengan Skanda).”

Verse 18

ऐरावतस्य घण्टे द्वे वैजयन्त्याविति श्रुते । गुहस्य ते स्वयं दत्ते क्रमेणानाय्य धीमता,इन्द्रके ऐरावत हाथीके उपयोगमें आनेवाले जो दो “वैजयन्ती” नामसे विख्यात घण्टे थे, उन्हें बुद्धिमान इन्द्रने क्रमश: ले आकर स्वयं कुमार कार्तिकेयको अर्पण कर दिया

Mārkaṇḍeya berkata: “Konon Airāvata memiliki dua lonceng yang termasyhur dengan nama ‘Vaijayantī’. Indra yang bijaksana membawanya, satu demi satu, lalu mempersembahkannya sendiri kepada Guha (Kārttikeya).”

Verse 19

एका तत्र विशाखस्य घण्टा स्कन्दस्य चापरा | पताका कार्तिकेयस्य विशाखस्य च लोहिता,उनमेंसे एक घण्टा विशाखने ले लिया और दूसरा स्कन्दके पास रह गया। कार्तिकेय और विशाख दोनोंकी पताकाएँ लाल रंगकी हैं

Di sana, satu lonceng menjadi milik Viśākha, sedangkan yang lain tetap bersama Skanda. Panji Kārtikeya dan Viśākha—keduanya berwarna merah.

Verse 20

यानि क्रीडनकान्यस्य देवैर्दत्तानि वै तदा । तैरेव रमते देवो महासेनो महाबल:

Mainan-mainan yang dahulu para dewa anugerahkan kepadanya—dengan itulah semata dewa perkasa Mahāsena, yang berhulu kekuatan besar, bersenang hati.

Verse 21

उस समय देवताओंने जो खिलौने इन्हें दिये थे, उन्हींसे महाबली महासेन खेलते और मन बहलाते हैं ।। स संवृतः पिशाचानां गणैदेवगणैस्तथा । शुशुभे काउ्चने शैले दीप्यमान: श्रिया वृत:,राजन्‌! अदभुत शोभासे सम्पन्न और कान्तिमान्‌ कुमार कार्तिकेय उस समय उस स्वर्णमय शिखरपर पिशाचों और देवताओंके समूहसे घिरकर बड़ी शोभा पा रहे थे

Pada waktu itu, Mahāsena yang mahaperkasa menghibur diri dengan bermain memakai mainan yang dahulu para dewa berikan kepadanya. Dikelilingi rombongan Piśāca dan juga bala para dewa, ia tampak bersinar di puncak gunung keemasan—bercahaya, diselubungi kemuliaan. Wahai raja, sang muda Kārtikeya, elok menakjubkan dan cemerlang, berdiri di puncak emas itu, dilingkari para pengiringnya, memancarkan wibawa yang luar biasa.

Verse 22

तेन वीरेण शुशुभे स शैल: शुभकानन: । आदित्येनेवांशुमता मन्दरश्वलारुकन्दर:,जैसे अंशुमाली सूर्यके उदयसे मनोहर कन्दरावाले मन्दराचलकी शोभा होती है, उसी प्रकार वीरवर स्कन्दके निवाससे सुन्दर वनवाले उस श्वेतगिरिकी शोभा बढ़ गयी थी

Karena kehadiran sang pahlawan itu, gunung yang berhutan suci itu tampak kian berseri. Seperti Mandara yang berliang-liang indah menjadi cemerlang saat matahari berkas-berkas terbit, demikian pula keindahan Śvetagiri bertambah ketika Skanda menjadikannya tempat bersemayam.

Verse 23

संतानकवनै: फुल्लैः करवीरवनैरपि । पारिजातवनैश्वलैव जपाशोकवनैस्तथा,वहाँ कहीं फूलोंसे भरे हुए कल्पवृक्षके वन और कहीं कनेरके कानन सुशोभित होते थे। कहीं पारिजातके वन थे तो कहीं जपा और अशोकके उपवन शोभा पाते थे। कहीं कदम्ब नामक वृक्षोंके समूह लहलहा रहे थे तो कहीं दिव्य मृगगण विचर रहे थे। सब ओर दिव्य पक्षियोंके समुदाय कलरव कर रहे थे। इन सबसे उस श्वेत पर्वतकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी

Di sana tampak aneka rimbun: di satu tempat hutan santānaka yang sedang mekar, di tempat lain belukar karavīra; di beberapa bagian rimba pārijāta, dan di bagian lain taman japā serta aśoka. Oleh tumbuh-tumbuhan surgawi itu, kemegahan gunung putih kian bertambah.

Verse 24

कदम्बतरुषण्डैश्व दिव्यैर्मुगगणैरपि । दिव्यै: पक्षिगणैश्वैव शुशुभे श्वेतपर्वत:,वहाँ कहीं फूलोंसे भरे हुए कल्पवृक्षके वन और कहीं कनेरके कानन सुशोभित होते थे। कहीं पारिजातके वन थे तो कहीं जपा और अशोकके उपवन शोभा पाते थे। कहीं कदम्ब नामक वृक्षोंके समूह लहलहा रहे थे तो कहीं दिव्य मृगगण विचर रहे थे। सब ओर दिव्य पक्षियोंके समुदाय कलरव कर रहे थे। इन सबसे उस श्वेत पर्वतकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी

Gunung Putih tampak gemilang—dihiasi rumpun-rumpun pohon kadamba, didatangi kawanan rusa surgawi, dan di segala penjuru dipenuhi kelompok burung ilahi. Kehadiran serta kicau merdu mereka menambah keindahan gunung itu dari segala arah.

Verse 25

तत्र देवगणा: सर्वे सर्वे देवर्षयस्तथा । मेघतूर्यरवाश्वैव क्षुब्धोदधिसमस्वना:,वहाँ सम्पूर्ण देवता तथा देवर्षिगण आकर विराजमान हो गये। क्षुब्ध महासागरकी गम्भीर गर्जनाके समान मेघों और दिव्य वाद्योंका तुमुल घोष सब ओर गूँजने लगा

Di sana seluruh bala para dewa, demikian pula para resi ilahi, berkumpul dan duduk dalam kemegahan. Lalu dari segala penjuru bergema gemuruh dahsyat: gelegar awan dan tiupan alat musik surgawi, berat dan dalam laksana suara samudra yang teraduk.

Verse 26

तत्र दिव्याश्व गन्धर्वा नृत्यन्तेडप्सरसस्तथा । ह्ृष्टानां तत्र भूतानां श्रूयते निनदो महान्‌,“वहाँ दिव्य गन्धर्व और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। हर्षमें भरे हुए प्राणियोंका महान्‌ कोलाहल सुनायी देने लगा

Di sana para Gandharva surgawi dan para Apsaras mulai menari. Di tengah sukacita makhluk-makhluk yang berkumpul, terdengar gemuruh besar suara perayaan.

Verse 27

एवं सेन्द्रं जगत्‌ सर्व श्वेतपर्वतसंस्थितम्‌ । प्रहृष्ट प्रेक्षते स्कन्द॑ न च ग्लायति दर्शनात्‌,इस प्रकार इन्द्रसहित सम्पूर्ण जगत्‌ बड़ी प्रसन्नताके साथ श्वेत पर्वतपर विराजमान कुमार कार्तिकेयका दर्शन करने लगा। उनके दर्शनसे किसीका जी नहीं भरता था

Demikianlah seluruh jagat, bersama Indra, menetap di Gunung Putih dan memandang Skanda dengan sukacita; namun tiada seorang pun merasa puas oleh semata-mata memandangnya.

Verse 28

मार्कण्डेय उवाच यदाभिषिक्तो भगवान्‌ सैनापत्येन पावकि: । तदा सम्प्रस्थित: श्रीमान्‌ हृष्टो भद्रवर्ट हर:,मार्कण्डेयजी कहते हैं-राजन्‌! जब अग्निनन्दन भगवान्‌ स्कन्दका सेनापतिके पदपर अभिषेक हो गया, तब श्रीमान्‌ भगवान्‌ शिव देवी पार्वतीके साथ सूर्यके समान रथपर आखरूढ हो प्रसन्नतापूर्वक भद्रवटकी ओर प्रस्थित हुए। उस समय इन्द्र आदि सब देवता उनके पीछे-पीछे चले। भगवान्‌ शिवके उस उत्तम रथमें एक हजार सिंह जुते हुए थे

Markandeya berkata: “Wahai raja, ketika putra Agni, Bhagavan Skanda, telah ditahbiskan pada jabatan panglima bala, saat itu Sang Hara (Siwa) yang mulia, dipenuhi sukacita, berangkat menuju Bhadravaṭa.”

Verse 29

रथेनादित्यवर्णेन पार्वत्या सहित: प्रभु: । (अनुयात: सुरै: सर्व: सहस्राक्षपुरोगमै:) सहस्र॑ तस्य सिंहानां तस्मिन्‌ युक्त रथोत्तमे,मार्कण्डेयजी कहते हैं-राजन्‌! जब अग्निनन्दन भगवान्‌ स्कन्दका सेनापतिके पदपर अभिषेक हो गया, तब श्रीमान्‌ भगवान्‌ शिव देवी पार्वतीके साथ सूर्यके समान रथपर आखरूढ हो प्रसन्नतापूर्वक भद्रवटकी ओर प्रस्थित हुए। उस समय इन्द्र आदि सब देवता उनके पीछे-पीछे चले। भगवान्‌ शिवके उस उत्तम रथमें एक हजार सिंह जुते हुए थे

Mārkaṇḍeya berkata: Setelah Skanda, putra Agni, ditahbiskan sebagai panglima bala para dewa, Sang Penguasa Paśupati—Śiva—bersama Pārvatī menaiki kereta yang bercahaya laksana matahari dan berangkat menuju Bhadravaṭa dengan hati gembira serta pertanda yang baik. Semua dewa mengikuti di belakangnya, dipimpin Indra yang bermata seribu. Pada kereta agung itu terpasang seribu singa sebagai penariknya.

Verse 30

उत्पपात दिवं शुभ्र॑ कालेनाभिप्रचोदितम्‌ । ते पिबन्त इवाकाशं त्रासयन्तश्नराचरान्‌

Mārkaṇḍeya berkata: Didorong oleh daya Kala (Waktu), yang bercahaya itu melesat ke angkasa. Mereka seakan-akan meneguk langit itu sendiri, membuat gentar semua makhluk—yang bergerak maupun yang tak bergerak.

Verse 31

तस्मिन्‌ रथे पशुपति: स्थितो भात्युमया सह

Di atas kereta itu berdiri Paśupati, Śiva, bersinar gemilang bersama Umā.

Verse 32

विद्युता सहित: सूर्य: सेन्द्रचापे घने यथा । उस रथपर भगवती उमाके साथ बैठे हुए भगवान्‌ शिव इस प्रकार शोभित हो रहे थे, मानो इन्द्रधनुषयुक्त मेघोंकी घटामें विद्युतके साथ भगवान्‌ सूर्य प्रकाशित हो रहे हों ।। ३१६ || अग्रतस्तस्य भगवान्‌ धनेशो गुह्म॒ुकैः सह

Di atas kereta itu, Bhagavān Śaṅkara duduk bersama Dewi Umā, berkilau laksana matahari yang memancar di tengah gumpalan awan pekat berhias pelangi Indra dan disinari kilat. Di hadapannya tampak Dhanesha, Kubera, beserta para Guhyaka.

Verse 33

ऐरावतं समास्थाय शक्रश्नापि सुरै:ः सह

Menunggang Airāvata, Śakra (Indra) pun maju bersama para dewa untuk melaksanakan upacara pemandian suci (abhiseka).

Verse 34

जृम्भकैर्यक्षरक्षोति: स्रग्विभि: समलड्कृत:

Ia dijaga oleh para Yakṣa dan Rākṣasa, serta dihiasi untaian karangan bunga—sepenuhnya berperhiasan.

Verse 35

तस्य दक्षिणतो देवा बहवद्चित्रयोधिन:

Di sisi kanannya berdiri banyak dewa—para kesatria dengan daya dan kepahlawanan yang menakjubkan serta beraneka ragam.

Verse 36

यमश्न मृत्युना सार्थ सर्वतः परिवारित:

Yama, bersama Maut, berdiri dikepung dari segala penjuru.

Verse 37

यमस्य पृष्ठतश्चैव घोरस्त्रेशिखर: शित:

Dan di belakang Yama berdiri sebuah senjata yang tajam dan mengerikan—puncaknya laksana ujung yang menyala.

Verse 38

तमुग्रपाशो वरुणो भगवान्‌ सलिलेश्वर:

Kemudian hadir Varuṇa yang mulia, penguasa samudra dan segala perairan, termasyhur dengan jeratnya yang dahsyat.

Verse 39

पृष्ठतो विजयस्यापि याति रुद्रस्य पट्टिश:

Bahkan ketika kemenangan tampak pasti, paṭṭiśa milik Rudra tetap mengikuti dari belakang.

Verse 40

पट्टिशं त्वन्वगाद्‌ राजऊछत्र रौद्र महाप्रभम्‌

Lalu sang raja maju mengejarnya, membawa paṭṭiśa—mengerikan rupanya dan menyala dengan daya yang agung.

Verse 41

तस्य दक्षिणतो भाति दण्डो गच्छन्‌ श्रिया वृत:

Di sisi kanannya tampak sebuah tongkat berjalan menyertai, diselubungi kemuliaan yang membawa pertanda baik.

Verse 42

एषां तु पृष्ठतो रुद्रो विमले स्यन्दने स्थित:

Namun di belakang mereka berdiri Rudra, bertempat di atas kereta yang tak bernoda.

Verse 43

ऋषयश्चापि देवाश्न गन्धर्वा भुजगास्तथा,रुद्रदेवके पीछे ऋषि, देवता, गन्धर्व, नाग, नदियाँ, गहरे जलाशय, समुद्र, अप्सराएँ, नक्षत्र, ग्रह तथा देवकुमार चल रहे थे

Para resi, para dewa, demikian pula para Gandharva dan para naga, turut bergerak dalam arak-arakan agung itu.

Verse 44

नद्यो हदा: समुद्राश्न तथैवाप्सरसां गणा: । नक्षत्राणि ग्रहाश्वैव देवानां शिशवश्ष ये,रुद्रदेवके पीछे ऋषि, देवता, गन्धर्व, नाग, नदियाँ, गहरे जलाशय, समुद्र, अप्सराएँ, नक्षत्र, ग्रह तथा देवकुमार चल रहे थे

Mārkaṇḍeya berkata: “Sungai-sungai, telaga yang dalam, dan samudra; demikian pula rombongan Apsarā; gugusan bintang dan planet-planet, serta anak-anak para dewa—semuanya bergerak maju bersama.”

Verse 45

स्त्रियश्व विविधाकारा यान्ति रुद्रस्य पृष्ठत: । सृजन्त्य: पुष्पवर्षाणि चारुरूपा वराड़ना:,मनोहर रूप और भाँति-भाँतिकी आकृति धारण करनेवाली बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियाँ फूलोंकी वर्षा करती हुई भगवान्‌ रुद्रके पीछे-पीछे जा रही थीं

Mārkaṇḍeya berkata: “Banyak wanita jelita, mengambil rupa yang beraneka, berjalan di belakang Rudra sambil menurunkan hujan bunga.”

Verse 46

पर्जन्यश्वाप्पनुययौ नमस्कृत्य पिनाकिनम्‌ । छत्र॑ च पाण्डुरं सोमस्तस्य मूर्थन्यधारयत्‌,पिनाकधारी भगवान्‌ शंकरको नमस्कार करके पर्जन्यदेव भी उनके पीछे-पीछे चले। चन्द्रमाने उनके मस्तकपर श्वेत छत्र लगा रखा था

Mārkaṇḍeya berkata: “Setelah bersujud hormat kepada Sang Dewa pemegang Pināka, Parjanya pun mengikuti di belakang-Nya. Dan Soma, Sang Bulan, menatang payung putih di atas kepala Śaṅkara.”

Verse 47

चामरे चापि वायुश्न गृहीत्वाग्निश्व धिष्ठितौ । शक्रश्न पृष्ठतस्तस्य याति राजज्छ़्िया वृत:

“Dengan membawa kipas chāmar, Vāyu berdiri melayani; Agni pun siap siaga. Śakra (Indra) berjalan di belakang-Nya, dan Ia maju dikelilingi kemuliaan serta semarak kerajaan.”

Verse 48

सह राजर्षिश्रि: सर्वे: स्तुवानो वृषकेतनम्‌ । राजन! वायु और अग्नि चँवर लेकर दोनों ओर खड़े थे। तेजस्वी इन्द्र समस्त राजर्षियोंके साथ भगवान्‌ वृषभध्वजकी स्तुति करते हुए उनके पीछे-पीछे जा रहे थे || ४७ * गौरी विद्याथ गान्धारी केशिनी मित्रसाह्नया,गौरी, विद्या, गान्धारी, केशिनी, मित्रा और सावित्री--ये सब पार्वतीदेवीके पीछे-पीछे चल रही थीं। विद्वानोंद्वारा प्रकाशित सम्पूर्ण विद्याएँ भी उन्हींके साथ थीं

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Raja, semua raja-ṛṣi memuji Vṛṣaketu, Sang Dewa berpanji lembu; Vāyu dan Agni berdiri di kedua sisi sambil memegang kipas chāmar sebagai tanda bakti. Indra yang bercahaya pun mengikuti di belakang, tekun melantunkan pujian. Di belakang Pārvatī berjalan Gaurī, Vidyā, Gāndhārī, Keśinī, Mitrā, dan Sāvitrī; dan bersama beliau turut bergerak segala cabang pengetahuan yang dimanifestasikan oleh para bijak.”

Verse 49

सावित्र्या सह सर्वास्ता: पार्वत्या यान्ति पृष्ठतः । तत्र विद्यागणा: सर्वे ये केचित्‌ कविभि: कृता:,गौरी, विद्या, गान्धारी, केशिनी, मित्रा और सावित्री--ये सब पार्वतीदेवीके पीछे-पीछे चल रही थीं। विद्वानोंद्वारा प्रकाशित सम्पूर्ण विद्याएँ भी उन्हींके साथ थीं

Bersama Sāvitrī, Gaurī, Vidyā, Gāndhārī, Keśinī, dan Mitrā—semuanya berjalan mengikuti di belakang Dewi Pārvatī. Seluruh gugus pengetahuan yang telah diungkapkan para kawi dan pandita pun hadir menyertai mereka.

Verse 50

तस्य कुर्वन्ति वचन सेन्द्रा देवा श्वमूमुखे । गृहीत्वा तु पताकां वै यात्यग्रे राक्षसो ग्रह:,इन्द्र आदि देवता सेनाके मुहानेपर उपस्थित हो भगवान्‌ शिवके आदेशका पालन करते थे। एक राक्षस ग्रह सेनाका झंडा लेकर आगे-आगे चलता था

Di barisan terdepan pasukan, para dewa—Indra dan yang lainnya—melaksanakan titahnya. Dan seorang rākṣasa bernama Graha, setelah menggenggam panji pasukan, berjalan mendahului semuanya.

Verse 51

व्यापृतस्तु श्मशाने यो नित्यं रुद्रस्य वै सखा । पिड़लो नाम यक्षेन्द्रो लोकस्यानन्ददायक:,भगवान्‌ रुद्रका सखा यक्षराज पिंगलदेव जो सदा श्मशानमें ही (उसकी रक्षाके लिये) निवास करता और सम्पूर्ण जगत्‌को आनन्द देनेवाला था, उस यात्रामें भगवान्‌ शिवके साथ था

Pingala, raja para yakṣa—sahabat abadi Rudra, yang senantiasa berdiam di tanah kremasi (sebagai penjaga), pembawa sukacita bagi dunia—ikut menyertai Bhagavān Śiva dalam perjalanan itu.

Verse 52

एभिश्न सहितो देवस्तत्र याति यथासुखम्‌ । अग्रतः पृष्ठतश्चैव न हि तस्य गतिर्धुुवा,इन सबके साथ महादेवजी सुखपूर्वक भद्गवटकी यात्रा कर रहे थे। वे कभी सेनाके आगे रहते और कभी पीछे। उनकी कोई निश्चित गति नहीं थी

Disertai semuanya itu, Sang Dewa (Mahādeva) melangkah ke sana dengan tenteram. Kadang ia berada di depan bala, kadang di belakang; geraknya tidak tetap.

Verse 53

रुद्रं सत्कर्मभिर्मत्या: पूजयन्तीह दैवतम्‌ । शिवमित्येव य॑ प्राहुरीशं रुद्रे पितामहम्‌

Di dunia ini, manusia memuja Rudra sebagai daya ilahi melalui perbuatan luhur. Dialah yang mereka sebut ‘Śiva’—Īśa, Tuhan Yang Mahatinggi—bahkan sebagai Pitāmaha (sumber mula) yang bersemayam dalam Rudra.

Verse 54

देवसेनापतिस्त्वेवं देवसेनाभिरावृत: । अनुगच्छति देवेशं ब्रह्मुण्य: कृत्तिकासुत:,इसी प्रकार ब्राह्मणहितैषी, देवसेनापति, कृत्तिका-नन्दन स्कन्द भी देवताओंकी सेनासे घिरे हुए देवेश्वर भगवान्‌ शिवके पीछे-पीछे जा रहे थे

Demikianlah Skanda, putra para Kṛttikā—panglima bala para dewa, pelindung tatanan brahmana—mengiringi Dewa Agung Śiva, Tuhan para dewa, sementara ia dikelilingi pasukan surgawi.

Verse 55

अथाब्रवीन्महासेनं महादेवो बृहद्‌ वच: । सप्तमं मारुतस्कन्धं रक्ष नित्यमतन्द्रित:,तदनन्तर महादेवजीने कुमार महासेनसे यह उत्तम बात कही--“बेटा! तुम सदा सावधानीके साथ मारुतस्कन्ध नामक देवताओं के सातवें व्यूहकी रक्षा करना”

Kemudian Mahādeva berkata kepada Kumāra Mahāsena dengan kata-kata yang berat: “Jagalah senantiasa, tanpa kelengahan, formasi ketujuh para dewa yang disebut Māruta-skandha.”

Verse 56

स्कन्द उवाच सप्तमं मारुतस्कन्ध॑ पालयिष्याम्यहं प्रभो । यदन्यदपि मे कार्य देव तद्‌ वद माचिरम्‌

Skanda berkata: “Wahai Tuhan, aku akan menjaga dengan semestinya divisi ketujuh para Marut, Māruta-skandha. Jika ada tugas lain bagiku juga, wahai dewa, katakanlah tanpa menunda.”

Verse 57

स्कन्द बोले--प्रभो! मैं सातवें व्यूह मारुतस्कन्धकी अवश्य रक्षा करूँगा। देव! इसके सिवा और भी मेरा जो कुछ कर्तव्य हो, उसके लिये आप शीघ्र आज्ञा दीजिये ।। रुद्र वाच कार्येष्वहं त्वया पुत्र संद्रष्टव्य: सदैव हि । दर्शनान्मम भव्त्या च श्रेय: परमवाप्स्यसि,रुद्रने कहा--पुत्र! काम पड़नेपर तुम सदा मुझसे मिलते रहना। मेरे दर्शनसे तथा मुझमें भक्ति करनेसे तुम्हारा परम कल्याण होगा

Skanda berkata: “Wahai Tuhan, aku pasti akan melindungi formasi ketujuh, Māruta-skandha. Wahai dewa, bila masih ada kewajiban lain bagiku, perintahkanlah segera.” Rudra menjawab: “Anakku, bila tugas-tugas muncul, engkau harus selalu datang menemuiku. Dengan memandangku dan dengan berbakti kepadaku, engkau akan meraih kesejahteraan tertinggi.”

Verse 58

मार्कण्डेय उवाच इत्युक्त्वा विससर्जैनं परिष्वज्य महेश्वर: | विसर्जिते ततः स्कन्दे बभूवौत्पातिकं महत्‌,मार्कण्डेयजी कहते हैं--राजन्‌! ऐसा कहकर भगवान्‌ महेश्वरने कार्तिकेयको हृदयसे लगाकर बिदा किया। स्कन्दके बिदा होते ही बड़ा भारी उत्पात होने लगा

Mārkaṇḍeya berkata: “Setelah berkata demikian, Maheśvara memeluknya lalu melepasnya pergi. Begitu Skanda berangkat, timbullah keguncangan besar yang sarat pertanda buruk.”

Verse 59

] न सहसैव महाराज देवान्‌ सर्वान्‌ प्रमोहयत्‌ । जज्वाल खं सनक्षत्रं प्रमूढ भुवनं भूशम्‌,महाराज! सहसा समस्त देवताओंको मोहमें डालता हुआ नक्षत्रोंसलहित आकाश प्रज्वलित हो उठा। समस्त संसार अत्यन्त मूढ़-सा हो गया

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai raja agung, itu bukan sekadar sekejap yang membuat semua dewa terperangah; langit bertabur bintang pun menyala-nyala. Dan, wahai penguasa bumi, seluruh dunia seakan terpaku dan terbius—ditelan kedahsyatan guncangan yang datang tiba-tiba itu.”

Verse 60

चचाल व्यनदच्चोर्वी तमोभूतं जगद्‌ बभौ । ततस्तद्‌ दारुणं दृष्टवा क्षुभित: शड्करस्तदा

Bumi berguncang dan mengaum; seluruh jagat tampak terselubung kegelapan. Melihat pertanda yang mengerikan itu, Śaṅkara (Śiva) pun terguncang gelisah saat itu juga.

Verse 61

उमा चैव महाभागा देवाश्व समहर्षय: । पृथ्वी हिलने लगी। उसमें गड़गड़ाहट पैदा हो गयी। सारा जगत्‌ अन्धकारमें मग्न-सा जान पड़ता था। उस समय यह दारुण उत्पात देखकर भगवान्‌ शंकर, महाभागा उमा, देवगण तथा महर्षिगण क्षुब्ध हो उठे ।। ततस्तेषु प्रमूढेषु पर्वताम्बुदसंनिभम्‌

Ummā yang mulia, para dewa, dan para maharṣi pun turut terguncang. Lalu ketika mereka semua masih terbenam dalam kebingungan, tampaklah (sesuatu) laksana gunung dan gumpalan awan.

Verse 62

नानाप्रहरणं घोरमदृश्यत महद्‌ बलम्‌ | तद्‌ वै घोरमसंख्येयं गर्जच्च विविधा गिर:

Tampaklah sebuah bala tentara besar dan mengerikan, bersenjata aneka macam senjata. Sungguh ia menakutkan dan tak terhitung jumlahnya, mengaum dengan pekik dalam berbagai bahasa.

Verse 63

जिस समय वे सब लोग मोहग्रस्त हो रहे थे, उसी समय पर्वतों और मेघमालाओंके समान दैत्योंकी विशाल एवं भयंकर सेना दिखायी दी। वह नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थी। उसके सैनिकोंकी संख्या गिनी नहीं जा सकती थी। वह भयंकर वाहिनी अनेक प्रकारकी बोली बोलती हुई भीषण गर्जना कर रही थी ।। अभ्यद्रवद्‌ रणे देवान्‌ भगवन्तं च शड्करम्‌ | तैर्विसृष्टान्यनीकेषु बाणजालान्यनेकश:,उसने रणभूमिमें आकर देवताओं तथा भगवान्‌ शंकरपर धावा बोल दिया। दैत्योंने देवताओंके सैनिकोंपर कई बार बाण-वर्षा की

Lalu di medan laga ia menerjang para dewa dan bahkan Bhagavān Śaṅkara. Para Dānava berulang kali melepaskan jalinan anak panah yang rapat ke barisan pasukan para dewa.

Verse 64

पर्वताक्ष शतघ्न्यक्ष प्रासासिपरिघा गदा: । निपतद्धिश्व तैघेरिदेवानीकं महायुधै:

Mārkaṇḍeya berkata: “Kemudian, oleh hujan senjata besar—batu-batu laksana gunung, śataghnī, tombak, pedang, gada-besi, dan pemukul—pasukan para dewa dihantam dari segala penjuru.”

Verse 65

निकृत्तयोधनागाश्चं कृत्तायुधमहारथम्‌

Dan tampak gajah-gajah perang yang para penunggangnya telah ditebas; serta seorang mahāratha yang senjata-senjatanya telah dipatahkan.

Verse 66

असुरैर्वध्यमानं तत्‌ पावकैरिव काननम्‌

Pemandangan itu bagaikan rimba dilalap api—demikianlah ia (pasukan itu) dirusak oleh para Asura.

Verse 67

अपतदू दग्धभूयिष्ठं महाद्रुमवनं यथा । जैसे आग समूचे वनको जला देती है, उसी प्रकार असुरोंने देवताओंकी सेनामें भारी मार-काट मचा दी। बड़े-बड़े वृक्षोंसे भरे हुए वनका अधिकांश भाग जल जानेपर उसकी जैसी दुरवस्था दिखायी देती है, उसी प्रकार दैत्योंकी अस्त्राग्निमें अधिकांश सैनिकोंके दग्ध हो जानेके कारण वह देवसेना धराशायिनी हो रही थी ।। ते विभिन्नशिरोदेहा: प्राद्रवन्तो दिवौकस:

Seperti rimba besar yang dipenuhi pepohonan raksasa runtuh setelah sebagian besar terbakar, demikian pula pasukan para dewa roboh, karena banyak prajurit hangus oleh api senjata para daitya. Dan para penghuni surga, dengan kepala dan tubuh tercerai, lari tunggang-langgang.

Verse 68

न नाथमधिगच्छन्ति वध्यमाना महारणे । उस महासमरमें असुरोंकी मार खाकर वे सब देवता भागते हुए कहीं कोई रक्षक नहीं पा रहे थे। किन्हींके सिर फट गये थे तो किन्हींके सब अंगोंमें गहरे घाव हो गये थे ।। ६७ ई || अथ तद्‌ दिद्रुतं सैन्यं दृष्टवा देव: पुरंदर:,तदनन्तर बलासुरविनाशक देवराज इन्द्रने अपनी उस सेनाको दानवोंसे पीड़ित होकर भागती देख उसे आश्वासन देते हुए कहा--'शूरवीरो! भय त्याग दो, इससे तुम्हारा मंगल होगा। हथियार उठाओ और पराक्रममें मन लगाओ। तुम्हें किसी प्रकार व्यथित नहीं होना चाहिये। इन भयंकर दिखायी देनेवाले दुराचारी दानवोंको जीतो। तुम्हारा कल्याण हो। तुम सब लोग मेरे साथ इन महाकाय दैत्योंपर टूट पड़ो।' इन्द्रकी यह बात सुनकर देवताओंको बड़ी सान्त्वना मिली

Dalam pertempuran besar itu, ketika mereka dibantai, mereka tak menemukan pelindung sedikit pun. Melihat bala tentara yang lari kocar-kacir, Indra—Purandara, penguasa para dewa—berkata untuk meneguhkan hati: “Wahai para pahlawan, buanglah takut; itu demi kebaikan kalian. Angkat senjata, teguhkan batin pada keberanian. Jangan gentar sedikit pun. Taklukkan para dānava durhaka ini, meski tampak mengerikan. Semoga kalian selamat. Bersamaku, terjanglah para daitya raksasa itu!” Mendengar kata-kata Indra, para dewa pun sangat terhibur.

Verse 69

आश्वासयजन्नुवाचेदं बलभिद्‌ दानवार्दितम्‌ । भयं त्यजत भद्रं व: शूरा: शस्त्राणि गृह्नत,तदनन्तर बलासुरविनाशक देवराज इन्द्रने अपनी उस सेनाको दानवोंसे पीड़ित होकर भागती देख उसे आश्वासन देते हुए कहा--'शूरवीरो! भय त्याग दो, इससे तुम्हारा मंगल होगा। हथियार उठाओ और पराक्रममें मन लगाओ। तुम्हें किसी प्रकार व्यथित नहीं होना चाहिये। इन भयंकर दिखायी देनेवाले दुराचारी दानवोंको जीतो। तुम्हारा कल्याण हो। तुम सब लोग मेरे साथ इन महाकाय दैत्योंपर टूट पड़ो।' इन्द्रकी यह बात सुनकर देवताओंको बड़ी सान्त्वना मिली

Mārkaṇḍeya berkata: Lalu Indra, sang pemusnah Bala, melihat pasukannya terdesak oleh para Dānava dan lari dalam kepanikan; ia menenangkan mereka dan berseru, “Buanglah rasa takut—semoga kalian sejahtera. Wahai para pahlawan, angkatlah senjata kalian.”

Verse 70

कुरुध्व॑ विक्रमे बुद्धि मा व: काचिद्‌ व्यथा भवेत्‌ । जयतैनान सुदुर्वत्तान्‌ दानवान्‌ घोरदर्शनान्‌,तदनन्तर बलासुरविनाशक देवराज इन्द्रने अपनी उस सेनाको दानवोंसे पीड़ित होकर भागती देख उसे आश्वासन देते हुए कहा--'शूरवीरो! भय त्याग दो, इससे तुम्हारा मंगल होगा। हथियार उठाओ और पराक्रममें मन लगाओ। तुम्हें किसी प्रकार व्यथित नहीं होना चाहिये। इन भयंकर दिखायी देनेवाले दुराचारी दानवोंको जीतो। तुम्हारा कल्याण हो। तुम सब लोग मेरे साथ इन महाकाय दैत्योंपर टूट पड़ो।' इन्द्रकी यह बात सुनकर देवताओंको बड़ी सान्त्वना मिली

“Teguhkan pikiran pada keberanian; jangan biarkan duka sedikit pun timbul dalam diri kalian. Taklukkan para Dānava yang bejat dan berwajah mengerikan itu.”

Verse 71

अभिद्रवत भद्रं वो मया सह महासुरान्‌ । शक्रस्य वचन श्रुत्वा समा श्वस्ता दिवौकस:,तदनन्तर बलासुरविनाशक देवराज इन्द्रने अपनी उस सेनाको दानवोंसे पीड़ित होकर भागती देख उसे आश्वासन देते हुए कहा--'शूरवीरो! भय त्याग दो, इससे तुम्हारा मंगल होगा। हथियार उठाओ और पराक्रममें मन लगाओ। तुम्हें किसी प्रकार व्यथित नहीं होना चाहिये। इन भयंकर दिखायी देनेवाले दुराचारी दानवोंको जीतो। तुम्हारा कल्याण हो। तुम सब लोग मेरे साथ इन महाकाय दैत्योंपर टूट पड़ो।' इन्द्रकी यह बात सुनकर देवताओंको बड़ी सान्त्वना मिली

“Semoga kalian sejahtera; serbulah para Asura perkasa itu bersamaku.” Mendengar kata-kata Śakra, para dewa penghuni surga pun kembali tenteram.

Verse 72

दानवानू्‌ प्रत्ययुध्यन्त शक्रं कृत्वा व्यपाश्रयम्‌ । ततस्ते त्रिदशा: सर्वे मरुतक्ष महाबला:

Para Dānava pun melawan balik, menjadikan Śakra sebagai tumpuan utama pertempuran. Maka bangkitlah semua dewa Tridaśa yang perkasa, beserta para Marut, dalam segenap kekuatan.

Verse 73

तैर्विसृष्टान्यनीकेषु क्रुद्धैः शस्त्राणि संयुगे

Dalam pertempuran, para pejuang yang murka melemparkan senjata; semuanya melesat dan menghantam barisan-barisan lawan.

Verse 74

शराश्ष दैत्यकायेषु पिबन्ति रुधिरं बहु । उन्होंने संग्राममें कुपित होकर दैत्योंकी सेनाओंके ऊपर जो अस्त्र-शस्त्र और बाण चलाये, वे उनके शरीरोंमें घुसकर प्रचुर मात्रामें रक्त पीने लगे || ७३ $ ।। तेषां देहान्‌ विनिर्भिद्य शरास्ते निशितास्तदा

Anak-anak panah itu menembus tubuh para Dānava dan seakan meneguk darah mereka dengan deras. Dalam amarah pertempuran, batang-batang panah yang tajam itu merobek anggota-anggota mereka hingga tembus.

Verse 75

तानि दैत्यशरीराणि निर्भिन्नानि सम सायकै:

Tubuh-tubuh para Dānava itu tertembus dan terbelah oleh hujan anak panah.

Verse 76

ततस्तद्‌ दानवं सैन्यं सर्वैर्देवगणैर्युधि

Kemudian, di medan laga, pasukan Dānava itu dihadapi dan diperangi oleh seluruh golongan para dewa.

Verse 77

अथोत्द्ुष्टं तदा हृष्टे: सर्वेर्देवेरदायुधै:

Lalu pada saat itu, semua dewa bersukacita, mengangkat senjata, dan maju memerangi si durjana.

Verse 78

एवमन्योन्यसंयुक्त युद्धमासीत्‌ सुदारुणम्‌,तथा हि दानवा घोरा विनिध्नन्ति दिवौकस: । इस प्रकार देवताओं और दानवोंमें परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध हो रहा था। रक्त और मांससे वहाँकी भूमिपर कीचड़ जम गयी थी। फिर सहसा बाजी पलट गयी। देवलोककी पराजय दिखायी देने लगी। भयंकर दानव देवताओंको मारने लगे

Demikianlah, saling bertaut dalam pertempuran, berkobarlah perang yang amat mengerikan. Sungguh, para Dānava yang dahsyat itu menumbangkan para penghuni surga; arus perang mendadak berbalik, dan kekalahan mulai tampak bagi para dewa.

Verse 79

देवानां दानवानां च मांसशोणितकर्दमम्‌ | अनयो देवलोकस्य सहसैवाभ्यदृश्यत

Mārkaṇḍeya berkata: Seketika tampak di alam para dewa lumpur menjijikkan dari daging dan darah, milik para dewa maupun Dānava.

Verse 80

ततस्तूर्यप्रणादा श्व भेरीणां च महास्वन:

Lalu terdengarlah gemuruh dahsyat: dentang alat musik perang dan gelegar besar genderang.

Verse 81

अथ दैत्यबलाद्‌ घोरान्निष्पपात महाबल:

Kemudian, didorong oleh kekuatan mengerikan para Daitya, sang perkasa melompat maju seketika.

Verse 82

ते तं घनैरिवादित्यं दृष्टवा सम्परिवारितम्‌

Mereka melihatnya terkepung rapat, laksana matahari yang tertutup awan pekat.

Verse 83

अथाभिद्रुत्य महिषो देवांश्षिक्षेप तं गिरिम्‌,परंतु महिषासुरने देवताओंका पीछा करके उनके ऊपर वह पहाड़ पटक दिया। युधिष्ठि!! उस भयानक पर्वतके गिरनेसे देवसेनाके दस हजार योद्धा कुचलकर धरतीपर गिर पड़े

Mārkaṇḍeya berkata: “Lalu Mahīṣāsura menerjang dan melemparkan gunung itu ke arah para dewa. Wahai Yudhiṣṭhira, ketika puncak mengerikan itu menghantam, sepuluh ribu prajurit pasukan dewa remuk dan jatuh ke bumi.”

Verse 84

पतता तेन गिरिणा देवसैन्यस्य पार्थिव । भीमरूपेण निहतमयुतं प्रापतद्‌ भुवि,परंतु महिषासुरने देवताओंका पीछा करके उनके ऊपर वह पहाड़ पटक दिया। युधिष्ठि!! उस भयानक पर्वतके गिरनेसे देवसेनाके दस हजार योद्धा कुचलकर धरतीपर गिर पड़े

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai raja, ketika gunung itu menghantam pasukan para dewa, sepuluh ribu prajurit mereka—tertimpa wujudnya yang mengerikan—tergilas dan roboh ke bumi.”

Verse 85

अथ तैददनिवै: सार्थ महिषस्त्रासयन्‌ सुरान्‌ अभ्यद्रवद्‌ रणे तूर्ण सिंह: क्षुद्रमूगानिव,तदनन्तर जैसे सिंह छोटे मृगोंको डराता हुआ उनपर टूट पड़ता है, उसी प्रकार महिषासुरने अपने दानव-सैनिकोंके साथ रणभूमिमें समस्त देवताओंको भयभीत करते हुए उनपर शीघ्र ही प्रबल आक्रमण किया

Kemudian Mahiṣāsura, bersama pasukan dānava-nya, menerjang cepat ke medan laga. Ia membuat para dewa gentar dan menyerbu dengan daya yang dahsyat—laksana singa menerkam binatang-binatang kecil yang penakut.

Verse 86

कार्तिकेयके द्वारा महिषासुरका वध तमापततन्तं महिषं दृष्टवा सेन्द्रा दिवौकस: । व्यद्रवन्त रणे भीता विकीर्णायुधकेतना:,उस महिषासुरको आते देख इन्द्र आदि सब देवता भयभीत हो अपने अस्त्र-शस्त्र और ध्वजा फेंककर युद्धभूमिसे भागने लगे

Mārkaṇḍeya berkata: Melihat sang raksasa-kerbau menerjang ke arah mereka, para dewa—dengan Indra di depan—dilanda ketakutan. Di tengah pertempuran mereka lari, menebarkan senjata dan menjatuhkan panji-panji mereka.

Verse 87

ततः स महिष: क्रुद्धस्तूर्ण रुद्ररथं ययौ | अभिद्र॒ुत्य च जग्राह रुद्रस्य रथकूबरम्‌,तब क्रोधमें भरा हुआ महिषासुर तुरंत ही भगवान्‌ रुद्रके रथकी ओर दौड़ा और पास जाकर उनके रथका कूबर- पकड़ लिया

Lalu sang raksasa-kerbau, menyala oleh amarah, segera melesat menuju kereta Rudra. Ia menerjang mendekat dan merenggut palang/yoke kereta Rudra.

Verse 88

यदा रुद्ररथं क्रुद्धो महिष: सहसा गत: । रेसतू रोदसी गाढं मुमुहुश्च महर्षय:,जब क्रोधमें भरे हुए महिषासुरने सहसा भगवान्‌ रुद्रके रथपर आक्रमण किया, उस समय पृथ्वी और आकाशमें भारी कोलाहल मच गया और महर्षिगण भी घबरा गये

Mārkaṇḍeya berkata: Ketika sang raksasa-kerbau, diliputi amarah, tiba-tiba menerjang kereta Rudra, bumi dan langit bergemuruh oleh hiruk-pikuk yang dahsyat, dan para maharṣi pun terguncang oleh rasa gentar.

Verse 89

अनदंश्ष॒ महाकाया दैत्या जलधरोपमा: । आसीच्च निश्चितं तेषां जितमस्माभिरित्युत,इधर विशालकाय दैत्य मेघोंके समान गम्भीर गर्जना करने लगे। उन्हें यह निश्चय हो गया कि “हमारी जीत होगी”

Para Dāitya bertubuh raksasa, berwujud laksana awan hujan dan tanpa taring, mulai mengaum seperti guruh yang dalam. Dalam hati mereka mantap: “Kemenangan pasti milik kami.”

Verse 90

तथाभूते तु भगवान्‌ नावधीन्महिषं रणे । सस्मार च तदा स्कनदं मृत्युं तस्य दुरात्मन:,उस अवस्थामें भी भगवान्‌ रुद्रने युद्धमें महिषासुरको स्वयं नहीं मारा किंतु उस दुरात्मा दानवकी मृत्यु जिनके हाथोंसे होनेवाली थी, उन कुमार कार्तिकेयका स्मरण किया

Bahkan dalam keadaan demikian, Sang Bhagavān (Rudra) tidak membunuh Mahiṣa sendiri di medan perang. Saat itu ia mengingat Skanda—yang telah ditetapkan sebagai maut bagi si durjana itu.

Verse 91

महिषो<पि रथं दृष्ट्वा रौद्रो रुद्रस्य चानदत्‌ । देवान्‌ संत्रासयंश्वापि दैत्यांश्षापि प्रहर्षयन्‌,भयानक महिषासुर रुद्रके रथको देखकर देवताओंको त्रास और दैत्योंको हर्ष प्रदान करता हुआ बार-बार सिंहनाद करने लगा

Mahiṣa yang garang itu pun, melihat kereta Rudra, mengaum berulang-ulang. Dengan raungan mengerikannya ia menebar gentar pada para dewa, sekaligus membangkitkan sorak kegirangan di pihak para Dāitya.

Verse 92

ततस्तस्मिन्‌ भये घोरे देवानां समुपस्थिते । आजगाम महासेन: क्रोधात्‌ सूर्य इव ज्वलन्‌,देवताओंके लिये वह घोर भयका अवसर उपस्थित था। इसी समय जगमगाते हुए सूर्यकी भाँति कुमार महासेन क्रोधमें भरे हुए वहाँ आ पहुँचे

Kemudian, ketika bahaya yang mengerikan menimpa para dewa, Kumāra Mahāsena datang ke sana—menyala oleh amarah, berkilau laksana matahari.

Verse 93

लोहिताम्बरसंवीतो लोहितस्रग्विभूषण: । लोहिताश्वो महाबाहुर्हिरण्यकवच: प्रभु:,उन्होंने अपने शरीरको लाल वस्त्रोंस आच्छादित कर रखा था। उनके हार और आभूषण भी लाल रंगके ही थे। उनके घोड़ेका रंग भी लाल था। उन महाबाहु भगवान्‌ स्कन्दने सुवर्णमय कवच धारण किया था

Ia berselimut kain merah, berhias kalung dan perhiasan merah. Kuda-kudanya pun merah. Sang Penguasa, Skanda yang berlengan perkasa itu mengenakan zirah keemasan.

Verse 94

रथमादित्यसंकाशमास्थित: कनकप्रभम्‌ | त॑ दृष्टवा दैत्यसेना सा व्यद्रवत्‌ सहसा रणे,वे सूर्यके समान तेजस्वी रथपर विराजमान थे। उनकी अंगकान्ति भी सुवर्णके समान ही उद्धासित हो रही थी। उन्हें सहसा संग्राममें उपस्थित देख दैत्योंकी सेना रणभूमिसे भाग चली

Ia tampil di medan laga menaiki kereta yang bercahaya laksana matahari dan berkilau dengan sinar keemasan. Baru terlihat olehnya saja, bala Dānava seketika buyar dan lari tunggang-langgang karena panik.

Verse 95

सचापितां प्रज्वलितां महिषस्य विदारिणीम्‌ । मुमोच शक्ति राजेन्द्र महासेनो महाबल:,राजेन्द्र! महाबली महासेनने महिषासुरपर एक प्रज्वलित शक्ति चलायी, जो उसके शरीरको विदीर्ण करनेवाली थी

Wahai raja, Mahāsena yang perkasa melemparkan tombak-sakti yang menyala—mampu merobek tubuh Mahīṣāsura.

Verse 96

सा मुक्ता भ्यहरत्‌ तस्य महिषस्य शिरो महत्‌ | पपात भिन्ने शिरसि महिषस्त्यक्तजीवित:,कुमारके हाथसे छूटते ही उस शक्तिने महिषासुरके महान्‌ मस्तकको काट गिराया। सिर कट जानेपर महिषासुर प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा

Begitu dilepaskan dari tangan sang bocah, senjata-sakti itu menebas jatuh kepala besar sang siluman kerbau. Saat kepalanya terpenggal, Mahīṣa pun kehilangan nyawa dan roboh ke bumi.

Verse 97

पतता शिरसा तेन द्वारं षोडशयोजनम्‌ | पर्वताभेन पिहितं तदागम्यं ततो5भवत्‌,उसके पर्वत-सदृश विशाल मस्तकने गिरकर (उत्तर-पूर्व देशके) सोलह योजन लम्बे द्वारको बंद कर दिया। अत: वह देश सर्वसाधारणके लिये अगम्य हो गया

Kepala raksasa itu, sebesar gunung, jatuh dan menutup gerbang sepanjang enam belas yojana. Sejak saat itu, wilayah tersebut menjadi tak terjangkau bagi orang kebanyakan.

Verse 98

उत्तरा: कुरवस्तेन गच्छन्त्यद्य यथासुखम्‌ | क्षिप्ताक्षिप्ता तु सा शक्ति्त्वा शत्रूनू सहस्रश:

Mārkaṇḍeya berkata, “Karena perbuatan itu, orang-orang Kuru Utara kini hidup tenteram dan bebas bergerak. Namun tombak-sakti itu—sekali dilempar lalu dilemparkan lagi—menumbangkan musuh hingga ribuan.”

Verse 99

प्राय: शरैविनिहता महासेनेन धीमता,परम बुद्धिमान्‌ महासेनने अपने बाणोंद्वारा अधिकांश दैत्योंको समाप्त कर दिया, बचे- खुचे भयंकर दैत्य भी भयभीत हो साहस खो चुके थे। स्कन्ददेवके दुर्धर्ष पार्षद उन सहस्रों दैत्योंको मारकर खा गये

Mārkaṇḍeya berkata: Hampir seluruh para daitya telah dijatuhkan oleh Mahāsena yang bijaksana dengan anak-anak panahnya. Mahāsena yang berakal luhur itu memusnahkan sebagian besar daitya dengan panahnya; bahkan para daitya yang tersisa, betapa pun ganasnya, gemetar ketakutan dan kehilangan keberanian. Lalu para pengiring Skanda yang tak tertandingi membantai mereka beribu-ribu dan melahapnya.

Verse 100

शेषा दैत्यगणा घोरा भीतास्त्रस्ता दुरासदै: । स्कन्दपारिषदेर्हत्वा भक्षिताश्व॒ सहस्रश:,परम बुद्धिमान्‌ महासेनने अपने बाणोंद्वारा अधिकांश दैत्योंको समाप्त कर दिया, बचे- खुचे भयंकर दैत्य भी भयभीत हो साहस खो चुके थे। स्कन्ददेवके दुर्धर्ष पार्षद उन सहस्रों दैत्योंको मारकर खा गये

Sisa pasukan daitya yang mengerikan itu ketakutan dan gemetar, seakan tak tersentuh; namun para pengiring Skanda membunuh mereka dan melahapnya beribu-ribu.

Verse 101

दानवान्‌ भक्षयन्तस्ते प्रपिबन्तश्न शोणितम्‌ | क्षणान्निर्दानिवं सर्वमकार्षु्भुशहर्षिता:,उन सबने अत्यन्त हर्षमें भरकर दानवोंको खाते और उनके रक्त पीते हुए क्षणभरमें सारी रणभूमिको दानवोंसे खाली कर दिया

Mereka bersorak dalam kegirangan yang buas, melahap para dānava dan meneguk darah mereka; dalam sekejap seluruh medan perang pun mereka jadikan bersih dari pasukan dānava.

Verse 102

तमांसीव यथा सूर्यो वृक्षानग्निर्घनान्‌ खग: । तथा स्कन्दो5जयच्छत्रून्‌ स्वेन वीर्येण कीर्तिमान्‌,जैसे सूर्य अन्धकार मिटा देते हैं, आग वृक्षोंको जला डालती है और आकाशचारी वायु बादलोंको छिजन्न-भिन्न कर देती है, वैसे ही कीर्तिशाली कुमार कार्तिकेयने अपने पराक्रमद्वारा समस्त शत्रुओंको नष्ट करके उनपर विजय पायी

Sebagaimana matahari menghalau kegelapan, api melalap pepohonan, dan angin yang melintas di angkasa mengoyak awan—demikianlah Skanda yang termasyhur, dengan daya kepahlawanannya sendiri, membinasakan musuh-musuhnya dan meraih kemenangan.

Verse 103

सम्पूज्यमानस्त्रिदशैरभिवाद्य महेश्वरम्‌ । शुशुभे कृत्तिकापुत्र: प्रकीर्णाशुरिवांशुमान्‌,उस समय देवतालोग कृत्तिकानन्दन स्कन्ददेवकी स्तुति और पूजा करने लगे। कुमार स्कन्द अपने पिता महेश्वरको प्रणाम करके सब ओर किरणें बिखेरनेवाले अंशुमाली सूर्यकी भाँति शोभा पाने लगे

Ketika para dewa memujanya dengan pemujaan, Skanda putra Kṛttikā terlebih dahulu menunduk hormat kepada Maheśvara. Lalu ia tampak bersinar—laksana matahari cemerlang yang menebarkan sinarnya ke segala penjuru.

Verse 104

नष्टशत्रुर्यदा स्कन्द: प्रयातस्तु महेश्वरम । तदाब्रवीन्महासेनं परिष्वज्य पुरंदर:,शत्रुओंका नाश करके जब कुमार कार्तिकेय भगवान्‌ महेश्वरके पास पहुँचे, उस समय इन्द्रने उनको हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा--

Ketika Skanda, setelah membinasakan musuh-musuhnya, pergi menghadap Maheśvara (Śiva), Purandara (Indra) memeluk panglima agung itu dengan kasih yang tulus, lalu berkata demikian.

Verse 105

ब्रह्मदत्तवर: स्कन्द त्वयायं महिषो हतः । देवास्तृणसमा यस्य बभूवुर्जयतां वर,“विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ स्कन्‍्द! इस महिषासुरको ब्रह्माजीने वरदान दिया था, जिसके कारण इसके सामने सब देवता तिनकोंके समान हो गये थे। आज तुमने इसे मार गिराया है। महाबाहो! यह देवताओंके लिये बड़ा भारी काँटा था, जिसे तुमने निकाल फेंका है। यही नहीं, आज रणभूमिमें इस महिषके समान पराक्रमी एक सौ देवद्रोही दानव और तुम्हारे हाथसे मारे गये हैं, जो पहले हमें बहुत कष्ट दे चुके हैं। तुम्हारे पार्षद भी सैकड़ों दानवोंको खा गये हैं

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Skanda, raksasa kerbau ini—yang kuat karena anugerah Brahmā—telah kau tewaskan. Di hadapannya para dewa pernah menjadi laksana sehelai rumput; wahai yang terbaik di antara para pemenang, hari ini engkau menjatuhkannya.”

Verse 106

सो<यं त्वया महाबाहो शमितो देवकण्टक: । शतं महिषतुल्यानां दानवानां त्वया रणे,“विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ स्कन्‍्द! इस महिषासुरको ब्रह्माजीने वरदान दिया था, जिसके कारण इसके सामने सब देवता तिनकोंके समान हो गये थे। आज तुमने इसे मार गिराया है। महाबाहो! यह देवताओंके लिये बड़ा भारी काँटा था, जिसे तुमने निकाल फेंका है। यही नहीं, आज रणभूमिमें इस महिषके समान पराक्रमी एक सौ देवद्रोही दानव और तुम्हारे हाथसे मारे गये हैं, जो पहले हमें बहुत कष्ट दे चुके हैं। तुम्हारे पार्षद भी सैकड़ों दानवोंको खा गये हैं

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai yang berlengan perkasa, duri bagi para dewa ini telah kau jinakkan. Dan di medan laga engkau pun menewaskan seratus Dānava, masing-masing setara kegagahannya dengan si raksasa kerbau.”

Verse 107

निहतं देवशत्रूणां यैर्वयं पूर्वतापिता: । तावकैर्भक्षिताक्षान्ये दानवा: शतसड्घश:,“विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ स्कन्‍्द! इस महिषासुरको ब्रह्माजीने वरदान दिया था, जिसके कारण इसके सामने सब देवता तिनकोंके समान हो गये थे। आज तुमने इसे मार गिराया है। महाबाहो! यह देवताओंके लिये बड़ा भारी काँटा था, जिसे तुमने निकाल फेंका है। यही नहीं, आज रणभूमिमें इस महिषके समान पराक्रमी एक सौ देवद्रोही दानव और तुम्हारे हाथसे मारे गये हैं, जो पहले हमें बहुत कष्ट दे चुके हैं। तुम्हारे पार्षद भी सैकड़ों दानवोंको खा गये हैं

Mereka, musuh-musuh para dewa yang dahulu menyiksa kami, telah terbunuh. Dan ratusan gerombolan Dānava lainnya telah dilahap oleh para pengikutmu sendiri.

Verse 108

अजेयस्त्वं रणेडरीणामुमापतिरिव प्रभु: । एतत्‌ ते प्रथमं देव ख्यातं कर्म भविष्यति

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai dewa, di medan perang engkau tak terkalahkan oleh musuh, berdaulat laksana Umāpati (Śiva). Inilah yang akan menjadi karya pertamamu yang termasyhur.”

Verse 109

त्रिषु लोकेषु कीर्तिश्व तवाक्षय्या भविष्यति । वशगाश्च भविष्यन्ति सुरास्तव महाभुज

Mārkaṇḍeya berkata: “Di tiga dunia, kemasyhuranmu akan tak pernah sirna. Bahkan para dewa pun akan berada di bawah kuasamu, wahai yang berlengan perkasa.”

Verse 110

“देव! तुम भगवान्‌ शंकरके समान ही युद्धमें शत्रुओंके लिये अजेय हो। यह तुम्हारा प्रथम पराक्रम सर्वत्र विख्यात होगा। तुम्हारी अक्षय कीर्ति तीनों लोकोंमें फैल जायगी। महाबाहो! सब देवता तुम्हारे वशमें रहेंगे” ।। एवमुक्त्वा महासेनं निवृत्त: सह दैवतै: । अनुज्ञातो भगवता त्र्यम्बकेण शचीपति:

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai yang ilahi! Dalam pertempuran engkau akan tak terkalahkan bagi musuh-musuhmu, laksana Śaṅkara yang mulia sendiri. Inilah mahaperkasa pertamamu yang akan termasyhur di mana-mana. Kemasyhuranmu yang abadi akan menjalar ke tiga dunia. Wahai yang berlengan perkasa! Semua dewa pun akan berada di bawah kuasamu.” Setelah berkata demikian, Indra—suami Śacī—bersama para dewa, setelah memperoleh izin dari Tryambaka yang mulia (Śiva), menarik diri dari bala tentara besar itu.

Verse 111

महासेनसे ऐसा कहकर शचीपति इन्द्र भगवान्‌ शंकरकी आज्ञा ले देवताओंके साथ स्वर्गलोकको लौट गये ।। गतो भद्रवर्ट रुद्रो निवृत्ताश्न दिवौकस: । उक्ताक्ष देवा रुद्रेण स्कन्दं पश्यत मामिव,भगवान्‌ रुद्र भद्रवटके समीप गये और देवता अपने-अपने स्थानको लौटने लगे। उस समय भगवान्‌ शंकरने देवताओंसे कहा--“तुम सब लोग कुमार कार्तिकेयको मेरे ही समान मानना”

Setelah berkata demikian kepada Mahāsena, Indra—suami Śacī—setelah menerima perkenan Bhagavān Śaṅkara, kembali ke Svarga bersama para dewa. Rudra pergi ke Bhadravaṭa, dan para dewa pulang ke kediaman masing-masing. Lalu Rudra bersabda kepada mereka: “Pandanglah Skanda sebagaimana kalian memandang Aku; anggaplah dia setara dengan-Ku.”

Verse 112

स हत्वा दानवगणान्‌ पूज्यमानो महर्षिभि: । एकाह्लैवाजयत्‌ सर्व त्रैलोक्य वल्विनन्दन:,अग्निनन्दन स्कन्दने सब दानवोंको मारकर महर्षियोंसे पूजित हो एक ही दिनमें समूची त्रिलोकीको जीत लिया

Mārkaṇḍeya berkata: Setelah membinasakan gerombolan Dānava dan dimuliakan oleh para maharsi, putra Valvī—Skanda, putra Agni—menaklukkan seluruh tiga dunia hanya dalam satu hari.

Verse 113

स्कन्दस्य य इदं विप्र: पठेज्जन्म समाहित: । स पुष्टिमिह सम्प्राप्य स्कन्दसालोक्यमाप्नुयात्‌

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai brāhmaṇa, siapa pun yang dengan pikiran terpusat melantunkan kisah kelahiran Skanda ini, akan memperoleh kesejahteraan dan kemakmuran di dunia ini; dan pada akhirnya mencapai sālokya Skanda—berdiam di alam Skanda.”

Verse 230

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगरें मनुष्योंको कष्ट देनेवाले ग्रहोंके वर्णनये सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-230 dari Vana Parva dalam Śrī Mahābhārata, di bagian Markandeya Samasya, pada konteks kisah Āṅgirasa—yang berkaitan dengan uraian tentang planet-planet yang pengaruhnya mendatangkan kesukaran bagi manusia.

Verse 231

जो ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो स्कन्ददेवके इस जन्मवृत्तान्तका पाठ करता है, वह संसारमें पुष्टिको प्राप्त हो अन्तमें भगवान्‌ स्कन्दके लोकमें जाता है ।। इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आज्धिरसे स्कनन्‍्दोत्पत्तौ महिषासुरवधे एकत्रिंशदधिकद्विशततमो<ध्याय:

Mārkaṇḍeya berkata: “Seorang brāhmaṇa yang dengan pikiran terpusat melantunkan kisah kelahiran Dewa Skanda ini akan memperoleh keteguhan, kesejahteraan, dan kemakmuran di dunia; dan pada akhirnya ia pergi ke alam (loka) Bhagavān Skanda.”

Verse 303

सिंहा नभस्यगच्छन्त नदन्तश्षारुकेसरा: । साक्षात्‌ काल उस रथका संचालन कर रहा था। उसकी प्रेरणासे वह शुभ्र रथ आकाशमें उड़ चला। मनोहर केसरोंसे सुशोभित वे सिंह चराचर प्राणियोंको भयभीत करते और दहाड़ते हुए आकाशमें इस प्रकार चलने लगे, मानो उसे पी जायँगे

Mārkaṇḍeya berkata: “Singa-singa berumbai surai keemasan, mengaum, bergerak melintasi langit. Seakan-akan Kala (Waktu) sendiri yang mengemudikan kereta itu; oleh dorongannya kereta putih cemerlang itu terangkat dan melesat di angkasa. Singa-singa yang berhias surai indah itu membuat gentar segala makhluk—yang bergerak maupun yang diam—dan sambil mengaum mereka melaju di langit seolah hendak meneguknya.”

Verse 326

आस्थाय रुचिरं याति पुष्पकं नरवाहन: । उनके आगे-आगे गुह्मकोंसहित नरवाहन धनाध्यक्ष भगवान्‌ कुबेर मनोहर पुष्पक विमानपर बैठकर जा रहे थे

Mārkaṇḍeya berkata: “Naravāhana menaiki Puṣpaka yang elok dan melanjutkan perjalanan. Di hadapannya, Bhagavān Kubera—penguasa kekayaan—bergerak bersama para Guhyaka, duduk di Puṣpaka yang menawan.”

Verse 336

पृष्ठतोडनुययौ यान्तं वरदं वृषभध्वजम्‌ । देवताओंसहित इन्द्र भी ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो (भद्रवटको) जाते हुए वरदायक भगवान्‌ वृषभध्वजके पीछे-पीछे चल रहे थे

Mārkaṇḍeya berkata: “Ketika Sang Pemberi Anugerah, Tuhan yang berpanji lembu, melanjutkan perjalanan, Indra pun—bersama para dewa dan menunggang gajah Airāvata—mengikuti dari belakang menuju Bhadravaṭaka.”

Verse 343

यात्यमोघो महायक्षो दक्षिणं पक्षमास्थित: । मालाधारी जृम्भकगण, यक्ष तथा राक्षसोंसे सुशोभित महायक्ष अमोघ भगवान्‌ शंकरके दाहिने भागमें रहकर चल रहा था

Mārkaṇḍeya berkata: Yakṣa agung bernama Amogha maju dengan mengambil tempat di sisi kanan. Berkalungkan untaian bunga dan tampak gemilang diiringi rombongan Jṛmbhaka, Yakṣa, serta Rākṣasa, sang Mahāyakṣa Amogha berjalan terus sambil tetap berada di sebelah kanan Bhagavān Śaṅkara.

Verse 356

गच्छन्ति वसुभि: सार्ध रुद्रैश्न सह सड़ता: । उसके दाहिने भागमें विचित्र प्रकारके युद्ध करनेवाले बहुत-से देवता वसुओं तथा रुद्रोंके साथ संगठित होकर चल रहे थे

Mārkaṇḍeya berkata: Mereka maju bersama—terhimpun sebagai satu pasukan—bersama para Vasu dan para Rudra. Di sayap kanannya, banyak dewa yang mahir dalam ragam perang yang menakjubkan bergerak dalam formasi teratur, berdampingan dengan Vasu dan Rudra.

Verse 363

घोरैव्याधिशतैर्याति घोररूपवपुस्तथा । मृत्युस॒हित यमराज अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके देवताओंके साथ यात्रा कर रहे थे। उन्हें सैकड़ों भयानक रोगोंने मूर्तिमानू होकर चारों ओरसे घेर रखा था

Mārkaṇḍeya berkata: Yamarāja, bersama Maut itu sendiri, bergerak maju dengan wujud yang amat mengerikan. Ia menempuh perjalanan dalam rombongan para dewa, sementara ratusan penyakit yang ngeri—seakan menjelma bertubuh—mengepungnya dari segala arah.

Verse 383

परिवार्य शनैर्याति यादोभिववविधैर्वृत: । जलके स्वामी भगवान्‌ वरुण हाथमें भयंकर पाश लिये उस त्रिशूलको सब ओरसे घेरकर धीरे-धीरे चल रहे थे। उनके साथ नाना प्रकारकी आकृतिवाले जलजन्तु भी थे

Mārkaṇḍeya berkata: Mengitari dari segala sisi, Bhagavān Varuṇa—penguasa samudra dan segala perairan—maju perlahan sambil menggenggam jerat yang mengerikan. Ia bergerak mengelilingi trisula itu dengan langkah terukur, dan bersamanya turut serta makhluk-makhluk air dengan rupa yang beraneka ragam.

Verse 393

गदामुसलशतक्त्यद्यर्व॒तः प्रहरणोत्तमै: । विजयके पीछे भगवान्‌ रुद्रका पट्टिश नामक शस्त्र जा रहा था, जिसे गदा, मुसल और शक्ति आदि उत्तम आयुधोंने घेर रक्खा था

Mārkaṇḍeya berkata: Di belakang Vijaya bergerak senjata suci Rudra yang bernama Paṭṭiśa, dikepung dari segala sisi oleh persenjataan terbaik—gada, alu, tombak-lempar, dan berbagai senjata unggul lainnya.

Verse 403

कमण्डलुश्नाप्यनु तं॑ महर्षिगणसेवित: । राजन! पट्टिशके पीछे भगवान्‌ रुद्रका अत्यन्त प्रभापूर्ण छत्र जा रहा था और उसके पीछे महर्षियोंद्वारा सेवित कमण्डलु यात्रा कर रहा था

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Raja, mengiringinya bergerak sebuah kamaṇḍalu yang suci, dilayani oleh rombongan para maharsi. Di belakangnya, pada sebuah tongkat, melaju payung kebesaran yang amat bercahaya, milik Bhagavān Rudra. Demikianlah arak-arakan itu maju, bertanda laku tapa dan penghormatan para resi.”

Verse 423

याति संहर्षयन्‌ सर्वास्तेजसा त्रिदिवौकस: । इन सबके पीछे उज्ज्वल रथपर आरुढ़ हो रुद्रदेव यात्रा करते थे, जो अपने तेजसे सम्पूर्ण देवताओंका हर्ष बढ़ा रहे थे

Mārkaṇḍeya berkata: “Ia melaju, menggembirakan semua penghuni tiga surga dengan sinarnya.” Di belakang rombongan itu, Rudradeva menempuh perjalanan dengan menaiki kereta yang berkilau, dan dengan pancaran-Nya menambah sukacita para dewa.

Verse 533

भावैस्तु विविधाकारै: पूजयन्ति महेश्वरम्‌ मरणधर्मा मनुष्य इस संसारमें सत्कर्मोद्वारा रुद्रदेवकी ही पूजा करते हैं। इन्हींको शिव, ईश, रुद्र और पितामह कहते हैं। लोग नाना प्रकारके भावोंसे भगवान्‌ महेश्वरकी पूजा करते हैं

Mārkaṇḍeya berkata: “Dengan beragam sikap batin dan bentuk pemujaan, orang-orang menyembah Maheśvara. Manusia yang fana di dunia ini, melalui perbuatan benar, sesungguhnya memuja Rudra semata. Dialah yang juga disebut Śiva, Īśa, Rudra, dan Pitāmaha. Demikianlah, dengan aneka bhāva, orang memuliakan Bhagavān Maheśvara.”

Verse 643

क्षणेन व्यद्रवत्‌ सर्व विमुखं चाप्यदृश्यत । शिलाखण्ड, शतष्नी (तोप), प्रास, खड्ग, परिघ और गदाओंके लगातार प्रहार हो रहे थे। इन भयंकर महान्‌ अस्त्रोंकी मारसे देवताओंकी सारी सेना क्षणभरमें (पीठ दिखाकर) भाग चली। सारे सैनिक युद्धसे विमुख दिखायी देते थे

Mārkaṇḍeya berkata: “Dalam sekejap seluruh bala tentara tercerai-berai dan lari; tampak berpaling dari pertempuran.” Hujan pukulan tak putus-putus—pecahan batu, senjata seperti halilintar (śataghni), tombak, pedang, gada besi, dan pemukul berat—menghantam mereka. Oleh serangan mahāstra yang mengerikan itu, pasukan para dewa seketika lari dengan punggung menghadap musuh; semua prajurit tampak enggan bertempur.

Verse 653

दानवैरर्दितं सैन्यं देवानां विमुखं बभौ । बहुत-से योद्धा, हाथी और घोड़े काट डाले गये। असंख्य आयुध और बड़े-बड़े रथ टूक-टूक कर दिये गये। इस प्रकार दानवोंद्वारा पीड़ित हुई देवताओंकी सेना युद्धसे विमुख हो गयी

Mārkaṇḍeya berkata: Pasukan para dewa, yang dihimpit dan dihancurkan oleh para Dānava, menjadi berpaling dari pertempuran. Banyak prajurit, gajah, dan kuda ditebas jatuh; tak terhitung senjata serta kereta-kereta besar remuk berkeping-keping. Demikianlah, di bawah gempuran para raksasa itu, bala dewa kehilangan keteguhan dan mundur.

Verse 726

प्रत्युद्ययुर्महा भागा: साध्याश्व वसुभि: सह । उन्होंने इन्द्रको अपना आश्रय बनाकर दानवोंके साथ पुनः युद्ध प्रारम्भ किया। तत्पश्चात्‌ वे सभी देवता महाबली मरुद्गण तथा वसुओं एवं महाभाग साध्यगण-सहित युद्धभूमिमें आगे बढ़ने लगे

Para Sādhya yang mulia, bersama para Vasu, bangkit kembali untuk menyongsong musuh. Menjadikan Indra sebagai perlindungan dan berhimpun di bawah kepemimpinannya, mereka memperbarui perang melawan para Dānava. Sesudah itu seluruh dewa—bersama pasukan Marut yang perkasa, para Vasu, dan para Sādhya yang termasyhur—maju ke medan laga, bertekad menegakkan dharma dengan daya juang yang bersatu dan keberanian yang tertib.

Verse 743

निपतन्तो<भभ्यदृश्यन्त नगेभ्य इव पन्नगा: । वे तीखे बाण उस समय दैत्योंके शरीरोंको विदीर्ण कर रणभूमिमें इस प्रकार गिरते दिखायी देते थे, मानो वृक्षोंसे सर्प गिर रहे हों

Mereka tampak berjatuhan—laksana ular yang meluncur jatuh dari pegunungan. Pada saat itu, anak-anak panah yang tajam merobek tubuh para daitya, dan para pejuang ambruk di medan laga seperti ular yang terlepas dari puncak-puncak batu dan terjun ke bawah.

Verse 766

त्रासितं विविधैर्बाणै: कृतं चैव पराड्मुखम्‌ । तदनन्तर समस्त देवताओंने उस युद्धमें दानवसेनाको अपने विविध बाणोंके प्रहारसे भयभीत करके रणभूमिसे विमुख कर दिया

Dihantam dan dikejar oleh berbagai jenis anak panah, bala tentara Dānava diliputi ketakutan dan dipaksa berpaling. Setelah itu, dalam pertempuran itu, semua dewa dengan rentetan panah yang beraneka ragam membuat pasukan Dānava panik dan mundur dari medan laga.

Verse 776

संहतानि च तूर्याणि प्रावाद्यन्त हुनेकश: । फिर तो उस समय हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र उठाये सम्पूर्ण देवता हर्षमें भरकर कोलाहल करने लगे और अनेक प्रकारके विजय-वाद्य एक साथ बज उठे

Lalu berbagai alat musik perang dibunyikan serentak. Saat itu seluruh dewa, mengangkat senjata, dipenuhi sukacita dan bersorak gemuruh; aneka bunyi kemenangan pun meledak bersama dalam satu koor yang menggetarkan.

Verse 793

तथा हि दानवा घोरा विनिध्नन्ति दिवौकस: । इस प्रकार देवताओं और दानवोंमें परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध हो रहा था। रक्त और मांससे वहाँकी भूमिपर कीचड़ जम गयी थी। फिर सहसा बाजी पलट गयी। देवलोककी पराजय दिखायी देने लगी। भयंकर दानव देवताओंको मारने लगे

Sungguh, para Dānava yang mengerikan sedang menumbangkan para penghuni surga. Di sana perang yang amat dahsyat berkobar antara dewa dan dānava; tanah pun seakan menjadi lumpur oleh darah dan daging. Lalu tiba-tiba keadaan berbalik—kekalahan mulai membayang bagi alam para dewa; para dānava yang mengerikan menekan maju, membantai para dewa.

Verse 806

बभूवुर्दानवेन्द्राणां सिंहनादाश्न दारुणा: । उस समय दानवेन्द्रोंके भयंकर सिंहनाद सुनायी पड़ते थे। उनके रणवाद्यों तथा भेरियोंका गम्भीर घोष सब ओर गूँज उठा

Saat itu raungan singa yang mengerikan dari para penguasa Dānava pun bangkit. Dari segala penjuru, gemuruh berat alat-alat perang dan genderang besar mereka menggema.

Verse 813

दानवो महिषो नाम प्रगृह् विपुलं गिरिम्‌ इतनेहीमें दैत्योंकी भयंकर सेनासे महाबली दानव “महिष' हाथोंमें एक विशाल पर्वत लिये निकला और देवताओंपर टूट पड़ा

Saat itu, dari tengah pasukan Daitya yang mengerikan, Dānava perkasa bernama Mahiṣa muncul sambil menggenggam sebuah gunung besar di tangannya, lalu menerjang dan menyerbu para dewa.

Verse 826

तमुद्यतगिरिं राजन्‌ व्यद्रवन्त दिवौकस: । राजन! बादलोंसे घिरे हुए सूर्यकी भाँति पर्वत उठाये हुए उस दानवको देखकर सब देवता भाग चले

Wahai Raja, ketika para dewa melihat raksasa itu maju dengan gunung terangkat—laksana matahari terselubung awan—mereka pun lari ketakutan.

Verse 986

स्कन्दहस्तमनुप्राप्ता दृश्यते देवदानवै: । उत्तर कुरुके निवासी अब उस मार्गसे सुखपूर्वक आते-जाते हैं। देवताओं और दानवोंने देखा, कुमार कार्तिकेय बार-बार शत्रुओंपर शक्तिका प्रहार करते हैं और वह सहस्रों योद्धाओंको मारकर पुनः उनके हाथमें लौट आती है

Tombak-śakti itu, yang kembali ke tangan Skanda, terlihat oleh para dewa dan Dānava. Kumāra Kārtikeya berulang kali melemparkan śakti-nya ke arah musuh; setelah menewaskan ribuan prajurit, ia kembali lagi ke tangannya. Karena itu, penduduk Uttara-Kuru dapat melintasi jalan itu dengan tenteram dan aman.

Verse 3736

विजयो नाम रुद्रस्थ याति शूल: स्वलड्कृत: । यमराजके पीछे-पीछे भगवान्‌ शंकरका विजय नामक भयंकर त्रिशूल जा रहा था, जो तीन शिखरोंसे सुशोभित और तीक्ष्ण था। उस त्रिशूलको सिन्दूर आदिसे भलीभाँति सजाया गया था

Di belakang Yamarāja bergeraklah trisula mengerikan bernama Vijaya, milik Rudra (Śiva): tajam, bermahkota tiga ujung, dan dihias indah dengan sindūra serta tanda-tanda keberuntungan lainnya.

Verse 4136

भग्वज्धिरोभि: सहितो दैवतैश्वानुपूजित: । कमण्डलुके दाहिने भागमें जाते हुए तेजस्वी दण्डकी बड़ी शोभा हो रही थी। उसके साथ भूगु और अंगिरा आदि महर्षि थे और देवता भी बार-बार उसका पूजन करते थे

Mārkaṇḍeya berkata: Ditemani para maharṣi yang mulia dan berulang kali dihormati oleh para dewa, Daṇḍakī yang bercahaya melangkah maju, membawa kamandalu di sisi kanannya. Bersamanya hadir para resi agung seperti Bhṛgu dan Aṅgiras; para dewa pun berkali-kali menunduk memberi hormat dan memujanya.

Verse 7536

अपतन्‌ भूतले राजंश्छिन्ना भ्राणीव सर्वश: । राजन! देवताओंके बाणोंसे विदीर्ण हुए वे दैत्योंके शरीर सब प्रकारसे छिन्न-भिन्न हुए बादलोंके समान धरतीपर गिरने लगे

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Raja, para Daitya itu—terkoyak oleh anak panah para dewa—jatuh ke bumi. Tubuh mereka hancur dan tercerai-berai ke segala arah, menghantam tanah bagaikan gumpalan awan.”

Frequently Asked Questions

Whether to assist a rival (Duryodhana) who is nonetheless a distressed suppliant and a member of the same lineage; Yudhiṣṭhira resolves it by prioritizing refuge-protection and preventing external disgrace to the clan.

Dharma is situationally prioritized: internal hostility does not cancel obligations to protect the vulnerable, uphold collective integrity, and employ proportionate means—beginning with conciliation—before escalation.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is narrative-ethical, showing how vows, truthful speech, and graded conduct operationalize dharma during crisis within the epic’s broader moral architecture.