
Dvaraka Mahatmya
This section is anchored in the western coastal-sacred geography associated with Dvārakā and its wider Yādava/Vaiṣṇava memory field, extending to Prabhāsa as an epic-afterlife locus. It uses the sea, submerged city motifs, and pilgrimage networks to connect Krishna-centric narrative history with tīrtha practice and ethical reflection in Kali-yuga.
44 chapters to explore.

कलियुगे विष्णुप्राप्त्युपायः — Seeking Viṣṇu in the Age of Kali
अध्याय का आरम्भ शौनक के प्रश्न से होता है—मतभेदों से व्याकुल कलियुग में साधक मधुसूदन विष्णु के निकट कैसे पहुँचे? सूत उत्तर में भगवान जनार्दन के अवतार-चरित का संक्षिप्त क्रम बताते हैं: व्रज में पूतना, तृणावर्त, कालिय आदि का दमन; फिर मथुरा में कुवलयापीड़ तथा राज-विरोधियों का वध; और आगे जरासंध-संघर्ष तथा राजसूय प्रसंग। इसके बाद प्रभास में यादवों का परस्पर विनाश, श्रीकृष्ण का लोक से निवर्तन, और द्वारका का समुद्र में डूब जाना वर्णित है। इस पतन-परिदृश्य में वनवासी ऋषि कलियुग में धर्म-क्षय, आचार और यज्ञ-व्यवस्था की शिथिलता देखकर ब्रह्मा से मार्ग पूछते हैं। ब्रह्मा स्वीकार करते हैं कि विष्णु के परम स्वरूप का पूर्ण ज्ञान दुर्लभ है, और वे ऋषियों को सुतल-लोक में स्थित महान भक्त प्रह्लाद के पास भेजते हैं, जो हरि-प्राप्ति का प्रमाण मार्ग बता सकते हैं। ऋषि सुतल पहुँचकर बलि द्वारा सत्कृत होते हैं और प्रह्लाद के सम्मुख बिना कठिन साधनों के गोपनीय उपाय की याचना करते हैं—यहीं से अगले उपदेश की भूमिका बनती है।

द्वारकाक्षेत्रप्रशंसा तथा दुर्वासोपाख्यानम् | Praise of Dvārakā and the Durvāsā Episode
अध्याय का आरम्भ प्रह्लाद के वचनों से होता है। वे ऋषियों से कहते हैं कि द्वारका/द्वारावती गोमती-तट पर स्थित समुद्र-समीप पवित्र नगरी है, जो कलियुग में भी भगवान का परम धाम और मोक्ष देने वाली गति मानी गई है। तब ऋषि प्रश्न उठाते हैं—जब यादव वंश का अंत हो गया और द्वारका के जलमग्न होने का वर्णन मिलता है, तो कलियुग में वहाँ भगवान की महिमा कैसे कही जाती है? कथा उग्रसेन की सभा में पहुँचती है, जहाँ समाचार आता है कि गोमती के पास चक्रतीर्थ में दुर्वासा मुनि निवास कर रहे हैं। श्रीकृष्ण रुक्मिणी सहित उनका स्वागत करने जाते हैं और बताते हैं कि अतिथि-सत्कार धर्म का बंधन है तथा उसके कर्मफल होते हैं। दुर्वासा नगर के विस्तार, घरों और आश्रितों के विषय में पूछते हैं; कृष्ण समुद्र-प्रदत्त भूमि, स्वर्ण-प्रासादों और विशाल गृह-परिवार-व्यवस्था का वर्णन करते हैं, जिससे दिव्य माया और अनंत सामर्थ्य पर विस्मय होता है। दुर्वासा विनय की परीक्षा लेते हैं—कृष्ण और रुक्मिणी को रथ पर उन्हें ढोने का आदेश देते हैं। मार्ग में प्यास से व्याकुल रुक्मिणी दुर्वासा की अनुमति बिना जल पी लेती हैं; वे उन्हें सदा की प्यास और कृष्ण-वियोग का शाप देते हैं। कृष्ण रुक्मिणी को समझाते हैं कि जहाँ उनका दर्शन है वहीं रुक्मिणी की भी उपस्थिति मानी जाए, और भक्ति में सावधानी का उपदेश देते हैं। अंत में कृष्ण विधिपूर्वक पाद्य, अर्घ्य, गोदान, मधुपर्क और भोजन आदि से दुर्वासा का पूजन-सत्कार कर उन्हें प्रसन्न करते हैं, और अतिथि-धर्म की आदर्श मर्यादा स्थापित करते हैं।

Durvāsā-śāpa, Rukmiṇī-vilāpa, and the Sanctification of Rukmiṇī-vana (दुर्वासशाप-रुक्मिणीविलाप-रुक्मिणीवनमाहात्म्य)
इस अध्याय में ऋषि श्रीकृष्ण की अद्भुत क्षमा और मुनि-वाणी के सत्यबल पर आश्चर्य करते हैं। प्रह्लाद बताते हैं कि दुर्वासा के शाप से पीड़ित रुक्मिणी अपने निष्पाप होने पर भी विरह-दुःख में विलाप करती हैं और शाप की न्यायसंगति पर प्रश्न उठाती हैं; शोक की तीव्रता से वे मूर्छित हो जाती हैं। तब समुद्र देव प्रकट होकर उन्हें शीतल जल से संजीवित करते हैं और नारद उन्हें धैर्य देते हुए समझाते हैं कि कृष्ण और रुक्मिणी अविभाज्य तत्त्व हैं—पुरुषोत्तम और शक्ति/माया—और यह प्रतीत होने वाला वियोग लोक-शिक्षा हेतु मानुष-सा आवरण मात्र है। समुद्र नारद की बात की पुष्टि कर रुक्मिणी की महिमा कहते हैं और भागीरथी गंगा के आगमन की घोषणा करते हैं, जिससे प्रदेश शोभित और पवित्र हो जाता है; दिव्य रुक्मिणी-वन प्रकट होता है और द्वारका के निवासी वहाँ आकृष्ट होते हैं। रमणीय परिणाम देखकर भी दुर्वासा पुनः क्रुद्ध होकर शाप को तीव्र कर देते हैं, जिससे भूमि और जल पर विपत्ति बढ़ती है। रुक्मिणी मृत्यु का संकल्प करती हैं, पर श्रीकृष्ण शीघ्र आकर उन्हें रोकते हैं और अद्वैत तथा शाप-शक्ति की सीमा का उपदेश देते हैं। दुर्वासा पश्चात्ताप कर क्षमा माँगते हैं; कृष्ण मुनि-वचन की मर्यादा रखते हुए मेल का विधान करते हैं। अंत में फलश्रुति है—अमावस्या/पूर्णिमा को संगम-स्नान शोक हरता है, और विशेष तिथियों में रुक्मिणी-दर्शन से अभीष्ट सिद्धि होती है; यह तीर्थ दुःख-निवारक माना गया है।

Varadāna-tīrtha and Dvārakā-yātrā: Pilgrimage Ethics, Gomati-saṅgama, and Cakratīrtha Phala
इस अध्याय में सूत के माध्यम से प्रह्लाद का उपदेश आता है, जिसमें द्वारका की पुण्य-व्यवस्था और तीर्थ-महिमा का क्रमबद्ध वर्णन है। आरम्भ में श्रीकृष्ण और ऋषि दुर्वासा के परस्पर वरदान-विनिमय से ‘वरदान-तीर्थ’ की स्थापना होती है; गोमती और समुद्र के संगम पर स्नान तथा दोनों की पूजा को विशेष फलदायी बताया गया है। फिर यह अध्याय यात्रा-नीति का व्यावहारिक मार्गदर्शन देता है—द्वारका जाने का संकल्प भी पुण्य है, और नगर की ओर बढ़ा प्रत्येक कदम महान यज्ञों के फल के समान माना गया है। यात्रियों को आश्रय, मधुर वचन, भोजन, वाहन, पादुका, जल-पात्र और पैरों की सेवा देना उच्च भक्ति-सेवा है; इसके विपरीत यात्रियों में बाधा डालना घोर पाप और दुष्परिणाम का कारण कहा गया है। बृहस्पति द्वारा इन्द्र को कलियुग के पतन-धर्म का उपदेश देकर सिद्धान्त स्पष्ट होता है कि द्वारका कलिदोष-विवर्जित शरणस्थली है। चक्रतीर्थ, गोमती-स्नान और रुक्मिणी-ह्रद की महिमा बताई गई है—अनायास स्पर्श भी मोक्षदायक और कुल-उद्धारक है। अंत में गणेश-पूजन, साष्टांग प्रणाम और श्रद्धापूर्वक प्रवेश जैसी मर्यादाएँ बताकर द्वारका-यात्रा को भक्ति, सामाजिक धर्म और विधि-निष्ठा का समन्वय कहा गया है।

गोमती-प्रादुर्भावः तथा चक्रतीर्थ-माहात्म्यम् (Origin of the Gomati and the Glory of Chakratirtha)
इस अध्याय में प्रह्लाद तीर्थयात्रा करने वाले द्विजश्रेष्ठों को गोमती के पास जाने का उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि गोमती का दर्शन पवित्र करने वाला है और उसका जल पूज्य है—जो पापों का नाश करता और शुभ कामनाएँ पूर्ण करता है। तब ऋषि पूछते हैं: गोमती कौन है, उसे कौन लाया, और वह वरुणालय समुद्र तक किस हेतु पहुँची? प्रह्लाद सृष्टिकथा सुनाते हैं—प्रलय के बाद विष्णु की नाभि-कमल से ब्रह्मा प्रकट होकर सृष्टि आरम्भ करते हैं। सनकादि मानसपुत्र प्रजासृष्टि से विरक्त होकर भगवद्रूप-दर्शन के लिए तप करते हैं और नदीश्वर के समीप तेजस्वी सुदर्शन चक्र का दर्शन करते हैं। आकाशवाणी उन्हें अर्घ्य की तैयारी कर दिव्य आयुध की आराधना करने को कहती है; ऋषि स्तुतियों से सुदर्शन को नमस्कार करते हैं। ब्रह्मा हरि के प्रयोजन से गंगा को पृथ्वी पर उतरने की आज्ञा देते हैं—वह ‘गोमती’ नाम से प्रसिद्ध होगी, वसिष्ठ के पीछे चलेगी और लोक में उसकी ‘पुत्री’ के रूप में जानी जाएगी। वसिष्ठ पश्चिम समुद्र की ओर अग्रसर होते हैं, गंगा उनके साथ चलती है; लोग श्रद्धा से उसका सम्मान करते हैं। ऋषियों के स्थान पर चतुर्भुज विष्णु प्रकट होकर पूजा स्वीकारते और वर देते हैं; जहाँ जल को चीरकर सुदर्शन प्रथम बार प्रकट हुआ, वह स्थान ‘चक्रतीर्थ’ कहलाता है—वहाँ अनायास किया गया स्नान भी मोक्षदायक है। गोमती हरि के चरण धोकर समुद्र में प्रवेश करती है और महान पापनाशिनी नदी बनती है, परम्परा में ‘पूर्व गंगा’ भी कही जाती है।

गोमतीतीर्थविधानम् (Gomatī Tīrtha: Ritual Procedure and Vow-Observances)
इस अध्याय में ऋषि प्रह्लाद की स्तुति करके उनसे गोमती-तट पर, चक्रतीर्थ के निकट जहाँ भगवान का सान्निध्य माना गया है, तीर्थयात्रा की विधि पूछते हैं। प्रह्लाद क्रमबद्ध विधान बताते हैं—नदी के पास जाकर प्रणाम, शौच-आचमन, कुश धारण, और गोमती को वसिष्ठ की पुत्री तथा पापहरिणी मानकर मंत्रपूर्वक अर्घ्य देना। फिर विष्णु के वराह-कार्य से जुड़े मंत्र के साथ पवित्र मृत्तिका का लेपन कर पूर्वदोष-नाश की प्रार्थना, विधिवत स्नान और वैदिक शैली के स्नान-मंत्रों का जप, तथा देवों, पितरों और मनुष्यों के लिए तर्पण। इसके बाद श्राद्ध-विधान आता है—वेदज्ञ ब्राह्मणों का आमंत्रण, विश्वेदेवों का पूजन, श्रद्धा से श्राद्ध, और सुवर्ण-रजत, वस्त्र, आभूषण, अन्न आदि की दक्षिणा; साथ ही दीन-दुखियों को अतिरिक्त दान। ‘पाँच गकार’ दुर्लभ साधन बताए गए हैं—गोमती, गोमय-स्नान, गो-दान, गोपीचंदन, और गोपीनाथ-दर्शन। कार्तिक मास में नियम-स्नान और नित्य-पूजा, तथा बोध-दिवस पर पंचामृत-अभिषेक, चंदन-लेपन, तुलसी-पुष्पार्चन, गान-पाठ, रात्रि-जागरण, ब्राह्मण-भोजन, रथ-पूजा आदि करके गोमती-सागर संगम पर व्रत-समापन कहा गया है। माघ में स्नान, तिल-हिरण्य अर्पण, नित्य होम और अंत में गरम वस्त्र, पादुका आदि का दान बताया गया है। फलश्रुति में गोमती-विधि को कुरुक्षेत्र-प्रयाग-गया-श्राद्ध और अश्वमेध-फल के तुल्य बताकर, महापापों की शुद्धि, पितरों की तृप्ति और कृष्ण-सान्निध्य में स्नान मात्र से विष्णुलोक-प्राप्ति का प्रतिपादन है।

Cakratīrtha-māhātmya (Theological Discourse on the Glory of Cakra Tīrtha)
इस अध्याय में प्रह्लाद विद्वान् तीर्थयात्रियों (द्विज-श्रेष्ठों) को समुद्रतट पर स्थित चक्रतीर्थ/रथाङ्ग की महिमा और विधि बताते हैं। चक्र-चिह्नित शिलाओं को मोक्षदायिनी कहा गया है, और भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन-संबंध से इस तीर्थ की प्रामाणिकता स्थापित कर इसे परम पाप-नाशक क्षेत्र बताया गया है। यात्री निकट जाकर पाँव-हाथ-मुख धोते हैं, दण्डवत् प्रणाम करते हैं, फिर पञ्चरत्न तथा पुष्प, अक्षत, गन्ध, फल, स्वर्ण, चन्दन आदि से अर्घ्य तैयार कर विष्णु-चक्र विषयक मन्त्र का जप करते हैं। इसके बाद स्नान, देवताओं और तत्त्वों का स्मरण, पवित्र मृत्तिका का लेपन, देव-पितृ तर्पण और फिर श्राद्ध का विधान कहा गया है। फलश्रुति में बताया गया है कि केवल स्नान से भी महायज्ञों और प्रयाग आदि प्रसिद्ध तीर्थों के समान पुण्य मिलता है। अन्नदान, वाहन/पशु-दान तथा रथ-संबंधी दान को जगत्पति को प्रसन्न करने वाला कहा गया है; अंत में पूर्वजों का उद्धार, विष्णु-सामीप्य की प्राप्ति और वाणी-कर्म-मन से किए पापों का नाश प्रतिपादित है।

गोमत्युदधिसंगम-माहात्म्य एवं चक्रतीर्थ-प्रशंसा (Glory of the Gomati–Ocean Confluence and Cakra-tīrtha)
इस अध्याय में प्रह्लाद द्विजों को उपदेश देते हैं कि अन्य प्रसिद्ध नदियों के तीर्थों में भटकने के बजाय गोमती–समुद्र संगम में आना चाहिए, क्योंकि यहाँ के स्नान-दान आदि का फल अत्यन्त श्रेष्ठ है। संगम की पाप-नाशक महिमा का वर्णन है और समुद्र-स्वामी तथा नदी गोमती को भक्तिपूर्ण वचनों सहित अर्घ्य देने की विधि बताई गई है। स्नान की दिशा-नियमावली के बाद पितृतर्पण और श्राद्ध का विधान, दक्षिणा का महत्व तथा विशेष दानों—विशेषतः सुवर्ण—की प्रशंसा की गई है। आगे तुलापुरुष, भूमिदान, कन्यादान, विद्यादान और प्रतीक ‘धेनु’ दान आदि दानों के प्रकार और उनके फल बताए गए हैं। श्राद्धपक्ष की अमावस्या तथा अन्य शुभ कालों में फल-वृद्धि का विशेष कथन है; यहाँ तो दोषयुक्त श्राद्ध भी पूर्ण माना जाता है। विविध प्रेतावस्थाओं में पड़े जीवों को भी यहाँ स्नान से उद्धार मिलने की बात कही गई है। अंत में चक्रतीर्थ की विशिष्ट महिमा—चक्र-चिह्नित शिलाओं के 1 से 12 तक भेद, उनसे भोग-मोक्ष के फल, तथा दर्शन-स्पर्श और मृत्यु-समय हरि-स्मरण से शुद्धि व मुक्ति—का आश्वासन दिया गया है।

रुक्मिणीह्रद-माहात्म्य (Rukmiṇī Hrada: Glory of the Sacred Lake and Prescribed Rites)
इस अध्याय में प्रह्लाद के उपदेश-रूप में तीर्थयात्रियों को प्रसिद्ध पवित्र जलों, विशेषतः ‘सात कुण्डों’ के दर्शन-स्नान का निर्देश दिया गया है। ये जल पाप-मल को हरने वाले तथा समृद्धि और विवेक बढ़ाने वाले बताए गए हैं। प्रसंग में दिव्य दर्शन का स्मरण है—भगवान हरि प्रकट होते हैं, ऋषिगण लक्ष्मी सहित उनकी स्तुति करते हैं और ‘सुरगंगा’ के जल से उनका पूजन किया जाता है। सनक आदि ब्रह्मज ऋषियों ने देवी के लिए अलग-अलग सरोवर बनाए और स्नान किया; ये ‘लक्ष्मी-ह्रद’ कहलाए, जो आगे काल-चक्र में कलियुग में ‘रुक्मिणी-ह्रद’ नाम से प्रसिद्ध होते हैं; भृगु से जुड़ा एक अन्य तीर्थ-नाम भी स्मृत किया गया है। फिर विधि-क्रम बताया गया है—शुद्ध होकर पहुँचना, पाँव धोना, आचमन करना, कुश लेना, पूर्वमुख होना, फल-पुष्प-अक्षत सहित पूर्ण अर्घ्य बनाना, सिर पर रजत रखना, पाप-नाश और रुक्मिणी-प्रसन्नता हेतु रुक्मिणी-ह्रद को अर्घ्य-मंत्र अर्पित करना और फिर स्नान करना। स्नान के बाद देवताओं, मनुष्यों और विशेषतः पितरों को तर्पण, आमंत्रित ब्राह्मणों से श्राद्ध, रजत-स्वर्ण सहित दक्षिणा, रसदार फलों का दान, दम्पति को मधुर भोजन कराना तथा ब्राह्मणी और अन्य स्त्रियों का सामर्थ्यानुसार वस्त्रों (लाल वस्त्र सहित) से सम्मान करने का विधान है। फलश्रुति में कामनापूर्ति, विष्णुलोक-प्राप्ति, घर में लक्ष्मी का नित्य वास, आरोग्य, मनःसंतोष, उद्वेग-निवारण, पितरों की दीर्घ तृप्ति, स्थिर संतान, दीर्घायु, धन-समृद्धि, वैर-शोक का अभाव और पुनः-पुनः संसार-भ्रमण से मुक्ति बताई गई है।

नृगतीर्थ–कृकलासशापमोचनम् (Nṛga Tīrtha and the Release from the Lizard-Curse)
यह अध्याय संवाद-शैली में एक तीर्थ-गाथा प्रस्तुत करता है। प्रह्लाद प्रभास-क्षेत्र के प्रसिद्ध कৃकलास/नृग-तीर्थ का वर्णन करते हैं और धर्मपरायण, पराक्रमी राजा नृग का चरित्र बताते हैं, जो प्रतिदिन विधिपूर्वक ब्राह्मणों को गोदान और सत्कार करता था। एक बार जैमिनि को दी गई गाय भागकर चली गई और बाद में वही गाय सोमशर्मा को दान हो गई; दोनों ब्राह्मणों के विवाद में राजा समय पर समाधान न कर सका, जिससे क्रुद्ध होकर उन्होंने शाप दिया कि नृग कৃकलास (छिपकली) बनेगा। मृत्यु के बाद यमराज ने कर्मफल भोगने के क्रम का विकल्प दिया; छोटे दोष के कारण नृग को अनेक वर्षों तक छिपकली-देह धारण करनी पड़ी। द्वापर के अंत में देवकीसुत श्रीकृष्ण प्रकट हुए; यदुवंश के राजकुमारों ने जलाशय में स्थिर पड़ी छिपकली को देखा, और कृष्ण के स्पर्श से नृग शापमुक्त हो गया। मुक्त नृग ने भगवान की स्तुति कर वर माँगा कि वह कूप/वापी उसके नाम से प्रसिद्ध हो और जो वहाँ श्रद्धा से स्नान कर पितृतर्पण-श्राद्ध करें, वे विष्णुलोक को प्राप्त हों। अंत में आचरण-विधि बताई गई है—पुष्प व चंदन सहित अर्घ्य देना, मिट्टी से स्नान करना, पितृ-देव-मनुष्य के लिए तर्पण करना, श्राद्ध में ब्राह्मण-भोजन व दक्षिणा देना। अलंकृत बछड़े सहित गाय तथा शय्या-उपकरण का दान श्रेष्ठ कहा गया है, और स्थानीय दीनों को दान करते रहने से महान तीर्थफल व यात्रा-सिद्धि का फल बताया गया है।

विष्णुपदोद्भवतीर्थ-माहात्म्य (Glory of the Tīrtha Originating from Viṣṇu’s Footprint)
इस अध्याय में प्रह्लाद विद्वान ब्राह्मणों को ‘विष्णुपदोद्भव’ नामक तीर्थ के सेवन का विधान बताते हैं। यह विष्णु के पदचिह्न से उत्पन्न पवित्र जलस्रोत है, जिसे गंगा/वैष्णवी परंपरा से जोड़ा गया है; इसके दर्शन मात्र से गंगास्नान का पुण्य मिलता है। तीर्थ की उत्पत्ति का स्मरण कर उसकी स्तुति करने से, स्मरण और पाठ द्वारा पाप का नाश बताया गया है। फिर नदी-देवी को नमस्कार सहित अर्घ्य अर्पित कर, पूर्वमुख होकर संयमपूर्वक स्नान, तथा तीर्थ-मिट्टी का लेपन करने का निर्देश है। तिल और अक्षत से देवों, पितरों और मनुष्यों के लिए तर्पण करके ब्राह्मणों को आमंत्रित किया जाए और यथाविधि श्राद्ध किया जाए; स्वर्ण-रजत आदि की दक्षिणा, तथा दीन-दुखियों को दान भी कहा गया है। पादुका, कमंडलु, नमकीन दही-चावल (साग व जीरा सहित) जैसे उपयोगी दान, और रुक्मिणी-संबद्ध वस्त्र-दान करके अंत में ‘विष्णु प्रसन्न हों’—ऐसी भक्ति-भावना से संकल्प करने को कहा गया है। फलश्रुति में कहा है कि कर्ता कृतकृत्य होता है; पितरों को गया-श्राद्ध के समान दीर्घ तृप्ति मिलती है और वे वैष्णव लोक को प्राप्त होते हैं। भक्त को समृद्धि और देव-कृपा मिलती है; इस अध्याय का श्रवण भी पापों से मुक्त करता है।

गोप्रचारतीर्थ-मयसरः-माहात्म्यं तथा श्रावणशुक्लद्वादशी-स्नानविधिः (Goprachāra Tīrtha and Maya-sarovara: Glory and the Śrāvaṇa Śukla Dvādaśī Bathing Rite)
इस अध्याय में प्रह्लाद ‘गोप्रचार’ नामक तीर्थ का वर्णन करते हैं, जहाँ श्रद्धापूर्वक स्नान करने से गोदान के समान पुण्य प्राप्त होता है। ऋषि उस तीर्थ की उत्पत्ति और उस स्थान का नाम पूछते हैं जहाँ जगन्नाथ ने स्नान किया था। तब प्रह्लाद कंस-वध के बाद की कथा कहते हैं—कृष्ण का राज्य स्थापित होना, उद्धव का गोकुल जाना, यशोदा-नंद से भेंट, और फिर व्रज-गोपियों का तीव्र विरह-विलाप तथा दूत से प्रश्न; उद्धव उन्हें सांत्वना देकर उनकी भक्ति की अद्वितीय महिमा प्रकट करते हैं। इसके बाद कथा द्वारका के निकट ‘मयसर’ पर आती है, जिसे प्रसिद्ध दैत्य मय ने बनाया बताया गया है। वहाँ कृष्ण के आने पर गोपियाँ मूर्छित होकर त्याग का आरोप लगाती हैं; तब कृष्ण सर्वव्यापक परमात्मा के रूप में अपनी उपस्थिति और जगत्-कारणत्व का उपदेश देकर विरह को असत्य-सा नहीं, परंतु परम सत्य में अभेद के भीतर स्थित बतलाते हैं। अंत में श्रावण मास, शुक्ल पक्ष, द्वादशी के लिए स्नान और श्राद्ध की विधि दी जाती है—भक्ति से स्नान, कुश और फल सहित अर्घ्य, निर्दिष्ट अर्घ्य-मंत्र, दक्षिणा सहित श्राद्ध, तथा पायस में शर्करा, मक्खन, घी, छत्र, कंबल, मृगचर्म आदि का दान। फलश्रुति में गंगा-स्नान के तुल्य पुण्य, विष्णुलोक-प्राप्ति, तीन पीढ़ियों तक पितरों का उद्धार, समृद्धि और अंततः हरि-धाम की प्राप्ति कही गई है।

Gopī-saras-udbhavaḥ (Origin and Merit of Gopī-saras) / गोपीसर-उद्भवः
अध्याय 13 में प्रह्लाद के कथन के रूप में एक सुव्यवस्थित संवाद आता है। श्रीकृष्ण के वचन सुनकर गोपियाँ माया-संबद्ध प्राचीन सरोवर में स्नान करती हैं और भक्ति-उत्कर्ष का अनुभव करती हैं। वे श्रीकृष्ण से प्रार्थना करती हैं कि उनके लिए एक श्रेष्ठ सरोवर बनाया जाए और ऐसा वार्षिक नियम-व्रत स्थापित हो जिससे उन्हें नियत रूप से प्रभु-सान्निध्य प्राप्त हो। तब श्रीकृष्ण उसी के निकट एक नया, अत्यन्त रमणीय सरोवर प्रकट करते हैं—निर्मल गम्भीर जल, कमल, पक्षी, तथा मुनि-सिद्ध और यादव-समुदाय की उपस्थिति का वर्णन होता है। यह सरोवर गोपियों के कारण ‘गोपी-सरस’ कहलाता है और ‘गो’ शब्द के अर्थ-संबंध व सहचर्य से ‘गोप्र-चार’ नाम-तर्क भी बताया जाता है। इसके बाद विधि-विधान का उपदेश है—विशिष्ट मंत्र से अर्घ्य, स्नान, पितरों और देवताओं का तर्पण, श्राद्ध, तथा क्रमशः दान—गाय, वस्त्र, आभूषण और दीन-दुखियों की सहायता। फलश्रुति में इस स्नान का पुण्य महादानों के तुल्य कहा गया है; मनोकामना-पूर्ति, पुत्र-लाभ, पवित्रता और उत्तम लोक-प्राप्ति का आश्वासन मिलता है। अंत में गोपियाँ विदा लेती हैं और श्रीकृष्ण उद्धव सहित अपने धाम को लौट जाते हैं।

ब्रह्मकुण्डादि-तीर्थप्रतिष्ठा तथा पञ्चनद-माहात्म्य (Brahmakūṇḍa and Associated Tīrtha Installations; Pañcanada Māhātmya)
प्रह्लाद ब्राह्मणों से द्वारका-सम्बद्ध तीर्थों का संक्षिप्त वर्णन करते हुए स्नान, तर्पण, श्राद्ध और दान की विधि बताते हैं। कृष्ण के वृष्णियों सहित द्वारका आगमन के बाद ब्रह्मा आदि देव दर्शन और अपने-अपने प्रयोजन सिद्ध करने हेतु आते हैं। ब्रह्मा पापहर और मंगलदायक ब्रह्मकुण्ड की प्रतिष्ठा करते हैं तथा उसके तट पर सूर्य-प्रतिष्ठा भी करते हैं; ब्रह्मा की प्रधानता से यह स्थान ‘मूलस्थान’ कहा गया है। इसके बाद चन्द्रमा पाप-विनाशक सरोवर बनाते हैं। इन्द्र एक प्रभावशाली लिङ्ग की स्थापना कर इन्द्रपद/इन्द्रेश्वर तीर्थ को प्रसिद्ध करते हैं और शिवरात्रि तथा सूर्य-संक्रान्ति आदि विशेष पूजन-काल बताते हैं। शिव महादेव-सरोवर और पार्वती गौरी-सरोवर की रचना करती हैं, जिनका फल स्त्रियों के कल्याण और गृह-शुभता से जुड़ा है। वरुण वरुणपद और कुबेर (धनेश) यक्षाधिप-सरोवर की स्थापना करते हैं, जहाँ श्राद्ध, नैवेद्य, अर्पण और दान का विशेष महत्त्व कहा गया है। अन्त में पञ्चनद तीर्थ का माहात्म्य आता है—पाँच नदियों का आवाहन ऋषियों के साथ किया जाता है, अर्घ्य-मन्त्र दिया जाता है और स्नान-तर्पण-श्राद्ध-दान का क्रम निर्धारित होता है। फलश्रुति में समृद्धि, विष्णुलोक-प्राप्ति और पितरों का उद्धार बताया गया है; सुनने मात्र से शुद्धि और परम गति का वचन देकर अध्याय समाप्त होता है।

Siddheśvara–Ṛṣitīrtha Māhātmya (Installation of Siddheśvara and the Glory of Ṛṣitīrtha)
इस अध्याय में संवाद के माध्यम से एक धर्म-आचार-क्रम बताया गया है। प्रह्लाद कहते हैं कि ब्रह्मा जी आते हैं; सनक आदि ऋषि उनका सत्कार करते हैं। ब्रह्मा उन्हें आशीर्वाद देकर बताते हैं कि उनकी भक्ति सफल हुई है, पर पहले अपरिपक्व समझ के कारण कुछ सीमा रह गई थी। फिर सिद्धान्त कहा जाता है—यदि नीलकण्ठ शिव का सम्मान न हो तो केवल कृष्ण-पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती; इसलिए पूर्ण प्रयत्न से शिव-पूजन करना चाहिए, वही भक्ति को सिद्ध करता है। योगसिद्ध ऋषि मंदिर के सामने शिवलिंग की स्थापना करते हैं और स्नान हेतु एक कूप बनाते हैं, जिसके निर्मल, अमृत-तुल्य जल की प्रशंसा होती है। ब्रह्मा नाम और लोक-मान्यता प्रदान करते हैं—लिंग ‘सिद्धेश्वर’ और कूप ‘ऋषितीर्थ’ कहलाता है। कहा गया है कि श्रद्धा से केवल स्नान करने मात्र से भी मनुष्य पितरों सहित उद्धार पा सकता है; झूठ बोलना और नित्य निंदा जैसे दोष भी शुद्ध होते हैं। विषुव, मन्वादि पर्व, कृतयुगादि, माघ मास आदि स्नान-काल बताए गए हैं; सिद्धेश्वर में शिवरात्रि-व्रत को विशेष महाफलदायक कहा गया है। विधि में अर्घ्य, भस्म-धारण, सावधानी से स्नान, पितृ-देव-मनुष्य तर्पण, श्राद्ध, कपट-रहित दक्षिणा तथा धान्य, वस्त्र, सुगंध आदि दान का निर्देश है। फल के रूप में पितरों की तृप्ति, समृद्धि, संतान, पाप-नाश, पुण्य-वृद्धि, अभीष्ट-सिद्धि और श्रद्धालु श्रोता की उत्तम गति का वर्णन है।

Tīrtha-Parikramā of Dvārakā: Hidden and Manifest Pilgrimage Waters (गदातीर्थादि-तीर्थवर्णनम्)
इस अध्याय में प्रह्लाद विद्वान ब्राह्मणों को द्वारका के चारों ओर स्थित तीर्थों की क्रमबद्ध परिक्रमा, विधि और फल बताते हैं। आरम्भ गदातीर्थ से होता है—भक्ति से स्नान, पितृ‑देवताओं का तर्पण, तथा वराह‑रूप विष्णु की पूजा करने से विष्णुलोक की प्राप्ति कही गई है। फिर नागतीर्थ, भद्रतीर्थ और चित्रातीर्थ का वर्णन है, जहाँ तिल‑धेनु और घृत‑धेनु जैसे दानों के तुल्य पुण्य बताया गया है; साथ ही कहा गया कि द्वारावती के जलप्लावन से अनेक तीर्थ गुप्त हो गए। चन्द्रभागा में स्नान पापहर और वाजपेय‑यज्ञ के समान फलदायक कहा गया है। कौमारिका/यशोदानन्दिनी देवी के दर्शन से मनोवांछित सिद्धि मिलती है। महीष‑तीर्थ और मुक्तिद्वार को शुद्धि के द्वार के रूप में बताया गया है। गोमती‑महात्म्य में वसिष्ठ‑सम्बन्ध और वरुणलोक की कथा के साथ अश्वमेध‑तुल्य पुण्य कहा गया; भृगु के तप और अम्बिका की स्थापना से शाक्त‑शैव रंग भी जुड़ता है और अनेक लिंगों का उल्लेख आता है। इसके बाद कालीन्दी‑सर, साम्बतीर्थ, शाङ्करतीर्थ, नागसर, लक्ष्मी‑नदी, कंबु‑सर, कुशतीर्थ, द्युम्नतीर्थ, जालतीर्थ (जालेश्वर सहित), चक्रस्वामी‑सुतीर्थ, जरत्कारु‑कृत तीर्थ और खञ्जनक तीर्थ आदि का विधान—स्नान, तर्पण, श्राद्ध, दान—और उनके फल—नागलोक, शिवलोक, विष्णुलोक, सोमलोक—बताए गए हैं। अंत में इसे कलियुग के लिए संक्षिप्त तीर्थ‑विस्तार कहकर, भक्तिपूर्वक श्रवण को भी पावन कर्म मानते हुए विष्णुलोक‑प्राप्ति का उपसंहार किया गया है।

Dvārakā-dvārapāla-pūjākramaḥ (Ritual Sequence of Dvārakā’s Gate-Guardians and the Approach to Kṛṣṇa)
इस अध्याय में प्रह्लाद कलियुग में द्वारका-पूजा का क्रमबद्ध विधान बताते हैं। तीर्थ-स्नान करके और यथोचित दक्षिणा/दान देकर भक्त पहले नगर के द्वारों और सीमाओं पर स्थित रक्षकों को प्रणाम-पूजन करता है, फिर देवकीनन्दन श्रीकृष्ण के सन्निकट जाता है। ऋषि संक्षेप में, पर पूर्ण रूप से, यह जानना चाहते हैं कि किस दिशा में कौन-सा द्वारपाल है तथा आगे-पीछे कौन स्थित है। प्रह्लाद पूर्व द्वार पर जयन्त के नेतृत्व से आरम्भ कर आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और ऐशान्य दिशाओं के रक्षकों का क्रम से वर्णन करते हैं—देव, विनायक, राक्षस, नाग, गन्धर्व, अप्सरा और ऋषि आदि। प्रत्येक दिशा के साथ ‘राजवृक्ष’ भी बताए गए हैं—जैसे न्यग्रोध, शाल, अश्वत्थ, प्लक्ष—जिससे एक पूर्ण ‘रक्षात्मक मानचित्र’ बनता है। फिर एक प्रतीत होने वाली विसंगति उठती है कि कृष्ण-द्वार पर ‘रुक्मी’ नामक गणेश का पूजन सबसे पहले क्यों होता है, जबकि रुक्मिणी-प्रसंग में रुक्मी कृष्ण-विरोधी था। प्रह्लाद बताते हैं कि संघर्ष के बाद रुक्मी का अपमान हुआ, फिर उसे मुक्त किया गया; रुक्मिणी की चिंता का मान रखते हुए और विघ्न-निवारण की स्थापना हेतु श्रीकृष्ण ने रुक्मी को द्वार-संबद्ध प्रमुख गणेश-रूप में नियुक्त किया। अध्याय का निष्कर्ष यह है कि द्वारपाल (रुक्मी-गणेश) की तुष्टि प्रभु-तुष्टि की पूर्वशर्त है—यही मंदिर-शिष्टाचार, नैतिक मर्यादा और पूजा-क्रम की आधारशिला है।

त्रिविक्रम-दर्शन-समफलत्व-प्रशंसा तथा दुर्वाससो मुक्तितीर्थ-प्रसङ्गः (Trivikrama Darśana and the Durvāsā at the Mokṣa-Tīrtha Episode)
इस अध्याय में प्रह्लाद पहले गणनाथ, रुक्मिणी तथा रुक्मी-संबद्ध देव-स्वरूपों, दुर्वासा, श्रीकृष्ण और बलभद्र का भक्तिपूर्वक स्मरण करते हुए पूज्य विषयों का वर्णन करते हैं। फिर वे एक मूल्य-नियम बताते हैं—महायज्ञों का पूर्ण दक्षिणा सहित फल, कुएँ-तालाब बनवाने का पुण्य, प्रतिदिन गौ-भूमि-स्वर्ण दान, जप-ध्यान सहित प्राणायाम, तथा जाह्नवी आदि महातीर्थों में स्नान—इन सबको बार-बार एक ही कर्म के समान फलदायक कहा गया है: देवेश श्रीकृष्ण का दर्शन। ऋषि पूछते हैं कि पृथ्वी पर त्रिविक्रम का प्राकट्य कैसे हुआ, श्रीकृष्ण से ‘त्रिविक्रम-रूप’ का संबंध कैसे जुड़ा, और दुर्वासा का प्रसंग क्या है। प्रह्लाद वामन-त्रिविक्रम की कथा सुनाते हैं—तीन पगों से त्रिलोकी का आच्छादन, और भक्त से संतुष्ट होकर विष्णु का बलि के द्वारपाल रूप में स्थिर रहना। इसी के साथ दुर्वासा मोक्ष की इच्छा से गोमती-सागर संगम पर चक्रतीर्थ को पहचानकर स्नान की तैयारी करते हैं, पर वहाँ के दैत्य उन्हें मारते-अपमानित करते हैं। व्रत के टूटने की आशंका से व्याकुल होकर वे विष्णु की शरण लेते हैं। दैत्यराज के भवन में प्रवेश कर द्वार पर स्थित त्रिविक्रम को देखकर वे करुण विलाप करते, रक्षा माँगते और अपने घाव दिखाते हैं, जिससे भगवान का रोष जाग उठता है। फिर वे स्नान में बाधा का निवेदन कर गोविंद से स्नान-सिद्धि और व्रत-पूर्णता की प्रार्थना करते हैं तथा आगे धर्मपूर्वक भ्रमण का संकल्प करते हैं।

Durvāsā–Bali–Viṣṇu Saṃvāda at the Gomatī–Ocean Confluence (गोमती-उदधि-संगम)
इस अध्याय में व्रत-पालन की मर्यादा, भक्ति के अधीन भगवान की लीला, और बाध्यता में भी धर्मसम्मत ‘इन्कार’ की नीति का सुगठित संवाद आता है। प्रह्लाद बताता है कि स्नान-व्रत की पूर्ति और प्राण-रक्षा के लिए दुर्वासा मुनि गोमती–समुद्र-संगम पर विष्णु के सान्निध्य की याचना करते हैं। भगवान विष्णु कहते हैं कि वे भक्ति से बँधे हैं और बलि के निर्देश में रहते हैं; इसलिए मुनि को बलि से अनुमति माँगने को कहते हैं। बलि दुर्वासा की प्रशंसा करते हुए भी केशव को भेजने से मना कर देता है। वह वराह, नरसिंह और वामन/त्रिविक्रम के उपकारों का स्मरण कर कहता है कि भगवान से उसका संबंध अनन्य और अविनिमेय है। दुर्वासा स्नान के बिना भोजन न करने और विष्णु न भेजे जाने पर आत्म-त्याग का संकल्प लेकर विवाद को तीव्र कर देते हैं। तब करुणामय विष्णु स्वयं हस्तक्षेप कर संगम-स्थल पर विघ्नों को बलपूर्वक हटाकर स्नान-व्रत सिद्ध कराने का वचन देते हैं। बलि भगवान के चरणों में शरणागति का संकेत करता है; फिर विष्णु दुर्वासा के साथ, सङ्कर्षण (अनन्त/बलभद्र) सहित, पाताल-मार्ग से चलकर संगम पर प्रकट होते हैं। वहाँ देवगण मुनि को स्नान का आदेश देते हैं; दुर्वासा शीघ्र स्नान कर आवश्यक कर्म पूर्ण करते हैं और प्राण-रक्षा के साथ विधि-व्यवस्था पुनः स्थापित हो जाती है।

गोमती-उदधि-संगमे तीर्थरक्षणम् — Protection of the Gomati–Ocean Confluence Tīrtha
इस अध्याय में प्रह्लाद के वृत्तांत के रूप में युद्धकथा आती है। ब्रह्मघोष सुनाई देने पर दैत्य दुर्मुखा तपस्वी दुर्वासा पर आक्रमण करता है, तब जगन्नाथ विष्णु चक्र से उसका शिरच्छेद कर मुनि की रक्षा करते हैं। इसके बाद नामोल्लेखित दैत्य-समूह और विशाल सेना अस्त्र-शस्त्रों से विष्णु और संकर्षण को घेरकर युद्ध करती है। बार-बार यह मर्यादा बताई गई है कि प्रातःकर्म पूर्ण कर चुके तपस्वी को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए और मोक्षदायी गोमती–समुद्र संगम-तीर्थ को पापाचरण से बाधित नहीं करना चाहिए। फिर अनेक द्वंद्व होते हैं—गोलक दुर्वासा को प्रहार करता है, पर संकर्षण के मुशल से मारा जाता है; कूर्मपृष्ठ विद्ध होकर पराजित होता है। दैत्यराज कुश विशाल बल जुटाकर, व्यर्थ संघर्ष से बचने की सलाह मानने से इनकार कर युद्ध करता है। विष्णु उसके सिर काट देते हैं, किंतु शिव के वरदान से अमरत्व पाकर वह बार-बार जीवित हो उठता है और दंड-व्यवस्था में बाधा बनता है। दुर्वासा कारण बताते हैं कि शिव-प्रसाद से कुश मृत्यु से अछूता है। तब विष्णु दमन की नई नीति अपनाते हैं—कुश के शरीर को एक गड्ढे में रखकर उसके ऊपर लिंग की स्थापना कर देते हैं। इस प्रकार तीर्थ-रक्षा, शिव-वरदान की मर्यादा और पवित्र व्यवस्था की पुनर्स्थापना एक तीर्थ-केन्द्रित समाधान में संपन्न होती है।

गोमतीतीरस्थ-क्षेत्रस्थ-भगवत्पूजा-माहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Worship of the Lord at the Gomati River Sacred Field)
इस अध्याय में संवाद, क्षेत्र-कथा और पूजा-विधान का सुंदर समन्वय है। आरम्भ में प्रह्लाद शिव-लिंग से जुड़े पूर्व प्रसंग और उसमें हुई मर्यादा-भंग की बात श्रीकृष्ण से कहते हैं। विष्णु उनकी भक्ति की प्रशंसा कर शिव-भक्ति से संयुक्त पराक्रम-आधारित वर देते हैं। कुश यह सिद्धान्त रखता है कि महादेव और हरि एक ही तत्त्व हैं, दो रूपों में प्रकट; और वह प्रार्थना करता है कि भगवान द्वारा स्थापित लिंग “कुशेश्वर” नाम से प्रसिद्ध हो, जिससे क्षेत्र की कीर्ति स्थायी रहे। फिर तीर्थ-भूगोल का वर्णन आता है—माधव अन्य दानवों को भेजते हैं; कुछ रसातल जाते हैं, कुछ विष्णु के समीप आते हैं; वहाँ अनन्त और विष्णु का निवास बताया गया है। दुर्वासा उस स्थान को मोक्षदायक मानकर उसे गोमती, चक्रतीर्थ और त्रिविक्रम-उपस्थिति से जोड़ते हैं। कलियुग तक इस क्षेत्र की पवित्रता बनी रहने और भगवान के कृष्ण-रूप में प्रकट होने का संकेत भी मिलता है। उत्तरार्ध में द्वारका में मधुसूदन की पूजा-विधि दी गई है—स्नान, अभिषेक/अनुलेपन, गन्ध, वस्त्र, धूप, दीप, नैवेद्य, आभूषण, ताम्बूल, फल, आरती, प्रणाम; तथा रात्रि भर दीपदान और जागरण, जप-पाठ, कीर्तन व वाद्य के साथ—जिससे अभीष्ट सिद्ध होते हैं। नभस में पवित्रारोपण, कार्तिक में प्रबोध-दिवस, अयन-संधि तथा विशेष मासों/द्वादशियों के व्रत पितृ-तृप्ति, विष्णुलोक-प्राप्ति और शोक-रहित “निर्मल लोक” का फल देते हैं, विशेषतः गोमती-सागर संगम पर।

रुक्मिणीपूजाविधिः — Ritual Protocols and Merit of Worshiping Rukmiṇī with Kṛṣṇa
इस अध्याय में श्रीप्रह्लाद ब्राह्मणों को जगन्नाथ/कृष्ण तथा विशेषतः रुक्मिणी—कृष्णप्रिया, कृष्णवल्लभा—की पूजा की क्रमबद्ध विधि बताते हैं। पहले देवस्नान, सुगंध-लेपन, तुलसी-पूजन, नैवेद्य, नीराजन और अनन्त-वैनतेय आदि का भक्तिपूर्वक सम्मान कहा गया है; फिर कपट-रहित दान और आश्रित/निर्धन जनों को भोजन कराने का विधान आता है। आगे रुक्मिणी-दर्शन और पूजन का माहात्म्य बताया गया है कि कलियुग में कृष्ण की प्रिया के दर्शन-पूजन से ग्रहपीड़ा, रोग, भय, दरिद्रता, दुर्भाग्य और गृहकलह जैसे दुःख टिक नहीं पाते। दही, दूध, मधु, शर्करा, घृत, सुगंध-द्रव्य, गन्ने का रस और तीर्थ-जल से अभिषेक; श्रीखण्ड, कुंकुम, मृगमद का अनुलेपन; पुष्प, धूप (अगुरु-गुग्गुल), वस्त्र और आभूषण अर्पण का विस्तार है। ‘विदर्भाधिप-नन्दिनी’ मंत्र से अर्घ्य, आरती तथा पवित्र जल के विधिपूर्वक ग्रहण का निर्देश भी है। इसके साथ ब्राह्मणों व उनकी पत्नियों का पूजन, अन्न-ताम्बूल का दान, द्वारपाल ‘उन्मत्त’ की बलि-प्रधान पूजा, योगिनियों, क्षेत्रपाल, वीरूपस्वामिनी, सप्तमातृकाओं तथा सत्यभामा-जाम्बवती आदि कृष्ण की आठ रानियों की वंदना का विधान बताया गया है। फलश्रुति में द्वारका में रुक्मिणी सहित कृष्ण के दर्शन-पूजन को यज्ञ-व्रत-दान से भी श्रेष्ठ कहा गया है और दीपोत्सव चतुर्दशी, माघ शुक्ल अष्टमी, चैत्र द्वादशी, ज्येष्ठ अष्टमी, भाद्रपद-पूजा, कार्तिक द्वादशी आदि तिथियों पर समृद्धि, आरोग्य, निर्भयता और मोक्ष का फल घोषित किया गया है। अंत में कलियुग में द्वारका की विशेष तारकता और पुराण-परंपरा का संकेत दिया गया है।

Dvārakā-Māhātmya: Kṛṣṇa-darśana, Gomati-tīrtha, and Dvādaśī-vedha Ethics (Chapter 23)
इस अध्याय में मार्कण्डेय मुनि राजा इन्द्रद्युम्न को कलियुग में द्वारका की अद्भुत तीर्थ-शक्ति और मोक्षदायिनी महिमा बताते हैं। वे कहते हैं कि थोड़े समय का निवास, वहाँ जाने का संकल्प, और एक दिन का श्रीकृष्ण-दर्शन भी बड़े-बड़े तीर्थों की यात्रा और दीर्घ तपस्या के समान फल देने वाला है। फिर श्रीकृष्ण के स्नान-उत्सव के समय मंदिर-केंद्रित सेवा का वर्णन आता है—दूध, दही, घी, मधु और सुगंधित जल से अभिषेक; देव-विग्रह का पोंछना, माला अर्पण, शंख-वाद्य, नाम-सहस्र का पाठ, भजन-कीर्तन, नृत्य, आरती, प्रदक्षिणा, साष्टांग प्रणाम; तथा दीप, नैवेद्य, फल, ताम्बूल, जलपात्र आदि अर्पण। धूप, ध्वज, मंडप, चित्रकारी, छत्र और चंवर जैसी निर्माण व अलंकरण-सेवाएँ भी पुण्यदायी कही गई हैं। इसके बाद द्वादशी तिथि और ‘वेध’ दोष आदि की शुद्धता पर धर्म-न्याय का प्रसंग आता है। चन्द्रशर्मा के स्वप्न में पीड़ित पितरों के दर्शन से तिथि-पालन का महत्व स्पष्ट होता है। अंत में कहा गया है कि सोमनाथ की यात्रा द्वारका में श्रीकृष्ण-दर्शन से पूर्ण होती है और संप्रदाय-आधारित एकांतिकता से बचना चाहिए। गोमती-स्नान, श्राद्ध-तर्पण और तुलसी-माला व पत्र-सेवा को कलियुग में रक्षक और पावन साधन बताया गया है।

चन्द्रशर्मा-द्वारकादर्शनं, त्रिस्पृशा-द्वादशीव्रत-प्रशंसा, पितृमोक्षोपदेशश्च (Chandraśarmā’s Dvārakā Darśana, Praise of Trispr̥śā Dvādaśī, and Instruction on Ancestral Liberation)
मार्कण्डेय बताते हैं कि ब्राह्मण चन्द्रशर्मा द्वारका पहुँचता है—सिद्धों और दिव्य जनों से सेवित, मोक्षदायिनी नगरी, जहाँ प्रवेश और दर्शन मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं। वह द्वारका-दर्शन की आध्यात्मिक पर्याप्तता की प्रशंसा करता है, मानो अन्य तीर्थ-यात्राएँ उसके बाद गौण हो जाती हों। फिर वह गोमती-तट पर स्नान, पितृ-तर्पण करता है; चक्रतीर्थ से चक्रांकित शिलाएँ लेकर पुरुषसूक्त से उनका पूजन करता है, तत्पश्चात शिव-पूजा और विधिपूर्वक पिण्ड-उदक दान करता है—विलेपन, वस्त्र, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, नीराजन, प्रदक्षिणा, नमस्कार आदि उपचारों सहित। रात्रि-जागरण में वह श्रीकृष्ण से प्रार्थना करता है कि द्वादशी-व्रत में दशमी-वेध का दोष दूर हो और प्रेत-स्थिति में पड़े पितरों का उद्धार हो। कृष्ण भक्ति की महिमा बताते हुए मुक्त पितरों को ऊपर उठते दिखाते हैं। पितर ससल्य (दोषयुक्त) द्वादशी, विशेषकर दशमी-वेध वाली, को पुण्य और भक्ति का नाश करने वाली बताकर तिथि-शुद्धि और व्रत-रक्षा का उपदेश देते हैं। कृष्ण कहते हैं कि वैशाख में त्रिस्पृशा द्वादशी का एक भी सम्यक् उपवास, द्वारका-दर्शन के साथ, उपेक्षित व्रतों की पूर्ति कर देता है; और चन्द्रशर्मा के लिए वैशाख में त्रिस्पृशा-बुध-योग पर देहांत की भविष्यवाणी करते हैं। अंत में मार्कण्डेय फलश्रुति कहते हैं कि इस द्वारका-माहात्म्य का श्रवण, पठन, लेखन या प्रचार करने से प्रतिज्ञात पुण्य प्राप्त होता है।

द्वारकायाः माहात्म्यवर्णनम् | The Glory of Dvārakā and Comparative Tīrtha-Merit
इस अध्याय में राजा इन्द्रद्युम्न मुनि मार्कण्डेय से पूछते हैं कि कलियुग में कौन-सा शुद्ध, पाप-नाशक तीर्थ है और उसका विस्तार से वर्णन करें। मुनि उत्तर देते हैं कि कलियुग में तीन श्रेष्ठ नगर विशेष रूप से पूज्य हैं—मथुरा, द्वारका और अयोध्या—जहाँ हरि/कृष्ण और श्रीराम की दिव्य उपस्थिति मानी गई है। फिर द्वारका की महिमा तुलनात्मक पुण्य-गणना के रूप में कही जाती है—द्वारका में क्षणभर निवास, उसका स्मरण या श्रवण भी, काशी, प्रयाग, प्रभास और कुरुक्षेत्र आदि में दीर्घ तप या यात्राओं से बढ़कर फल देता है। कृष्ण-दर्शन, कीर्तन और द्वादशी की रात्रि-जागरण को मुख्य साधना बताया गया है; गोमती तट पर पिण्डदान तथा कृष्ण-सन्निधि में दान-पूजन से शुद्धि, मुक्ति और पितरों का कल्याण कहा गया है। अध्याय में द्वारका से जुड़ी गोपीचन्दन और तुलसी को ‘चलित तीर्थ’ की तरह बताया गया है, जो घर-गृहस्थी में भी पवित्रता फैलाते हैं। अंत में यह दृढ़ किया गया है कि कृष्ण-जागरण के समय किया गया दान अनेक गुना फल देता है और कलियुग में द्वादशी-जागरण उच्चतम धर्म-भक्ति का साधन है।

हरिजागरण-प्रशंसा (Praise of Hari Night-Vigil) / Dvādāśī Jāgaraṇa and Its Fruits
अध्याय के आरम्भ में मार्कण्डेय प्रह्लाद को विद्वान, संयमी और वैष्णव-आचार्य के रूप में बताते हैं। ऋषि उनसे बिना कठिन साधनों के परम पद पाने का संक्षिप्त उपदेश माँगते हैं। प्रह्लाद “गुह्य से भी गुह्य” पुराण-सार का संकेत करते हैं, जो लोक-कल्याण और मोक्ष—दोनों देने वाला है। फिर संवाद स्कन्द (षण्मुख) और ईश्वर के बीच आता है। स्कन्द दुःख-निवारण और मुक्ति का सरल उपाय पूछते हैं। ईश्वर हरि-जागरण का विधान बताते हैं, विशेषतः द्वादशी के वैष्णव व्रत में—रात्रि में वैष्णव शास्त्र-पाठ, कीर्तन, भगवान का दर्शन, गीता/नाम-सहस्र आदि का जप-पाठ, तथा दीप-धूप-नैवेद्य और तुलसी से पूजन। बार-बार फल-श्रुति कही गई है—संचित पापों का शीघ्र नाश, बड़े यज्ञों और महादानों के तुल्य या उनसे भी श्रेष्ठ पुण्य, कुल और पितरों का कल्याण, और निष्ठावान साधक के लिए पुनर्जन्म का निरोध। साथ ही, जागरण का आदर करने वाले भक्तों की प्रशंसा और जनार्दन के प्रति उपेक्षा/द्वेष की निन्दा करके आचार-सीमा भी स्पष्ट की गई है।

द्वादशी-जागरणस्य सर्वतोवरेण्यत्ववर्णनम् (The Supreme Excellence of the Dvādaśī Vigil)
इस अध्याय में ईश्वर द्वादशी की रात्रि-जागरण का परम माहात्म्य बताते हैं। जो भक्त द्वादशी-जागरण में हरि/विष्णु की पूजा करता और भागवत का श्रवण करता है, उसका पुण्य बड़े-बड़े वैदिक यज्ञों से भी अनेक गुना बढ़कर होता है; उसके बंधन कटते हैं और वह श्रीकृष्ण के धाम को प्राप्त होता है। भागवत-श्रवण और विष्णु-जागरण से भारी पाप-संचय भी शांत हो जाता है तथा सूर्य-मंडल की सीमा के पार जाने जैसी मुक्ति-छवि द्वारा मोक्ष का संकेत दिया गया है। कैलेंडर की शुद्धता पर भी बल है—जब एकादशी द्वादशी में प्रवेश करे, तथा शुभ संयोग हों, तब जागरण और उपासना विशेष फलदायी मानी गई है। द्वादशी को विष्णु तथा पितरों के लिए दिया गया दान ‘मेरु-तुल्य’ बताया गया है। महानदी/बड़ी नदी के तट पर तर्पण और श्राद्ध करने से पितरों को दीर्घकाल तक तृप्ति और वर प्राप्ति होती है। अध्याय द्वादशी-जागरण के फल को सत्य, शौच, संयम, क्षमा आदि धर्मों, महादानों और प्रसिद्ध तीर्थ-कर्मों के समान बताकर इसे संक्षिप्त साधन-समुच्चय के रूप में प्रतिष्ठित करता है। नारद के वचन से यह भी कहा गया है कि एकादशी के समान कोई व्रत नहीं; उसकी उपेक्षा से दुःख बना रहता है, और उसका पालन कलियुग में भक्तिमार्ग का श्रेष्ठ उपचार है।

हरिजागरण-माहात्म्य (The Glory of the Viṣṇu/Kṛṣṇa Night Vigil)
इस अध्याय में मार्कण्डेय उपदेशात्मक संवाद के रूप में हरि-जागरण का माहात्म्य बताते हैं, विशेषतः एकादशी के उपवास और द्वादशी की रात्रि-जागरण के संदर्भ में। वे कहते हैं कि इसका पुण्य कठोर शुद्धि-विधानों पर निर्भर नहीं है; बिना स्नान, अशौच या पूर्व-तैयारी वाले, यहाँ तक कि तिरस्कृत और हाशिये पर पड़े लोग भी, हरि-स्मरण और जागरण में सम्मिलित होकर शुद्धि तथा उत्तम लोक प्राप्त करते हैं। फलश्रुति में जागरण के फल की तुलना अश्वमेध जैसे महायज्ञों, पुष्कर-पान, संगम-स्नान, तीर्थ-सेवा और महान दानों से की गई है, और बार-बार कहा गया है कि हरि-जागरण इन सब से बढ़कर है। इसे महापापों के नाश और भारी नैतिक कलुषों के प्रायश्चित्त के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है। जागरण के लिए सामूहिक भक्ति—कथा-कीर्तन, भजन, नृत्य, वीणा-वादन—को धर्म्य उपाय बताया गया है। कहा गया है कि उस जागरण में देवता, नदियाँ और समस्त पवित्र जल एकत्र होते हैं; जो इसे नहीं करते, उन्हें प्रतिकूल फल की चेतावनी दी गई है। निष्कर्षतः कलियुग में गरुडध्वज का स्मरण, एकादशी को अन्न-त्याग और दृढ़ जागरण—अल्प साधन में महाफल देने वाली सरल साधना है।

गौतमी-तीर्थसमागमः—द्वारकाक्षेत्रप्रशंसा (Gautamī Tīrtha Assembly and the Praise of Dvārakā Kṣetra)
इस अध्याय में प्रह्लाद के कथन के रूप में बहुवाणी धर्म-चर्चा आती है। नारद सिंह-राशि में गुरु के शुभ योग को देखकर गौतमी (गोदावरी) के तट पर अद्भुत समागम देखते हैं—महातीर्थ, नदियाँ, क्षेत्र, पर्वत, शास्त्र, सिद्ध और देवगण वहाँ एकत्र होकर उस स्थान की पवित्रता और तेज से विस्मित होते हैं। मूर्तिमती गौतमी व्यथा प्रकट करती हैं कि दुष्ट जनों के संसर्ग से वे थक गई हैं और मानो जल रही हैं; अपनी शांत, निर्मल अवस्था की पुनः स्थापना हेतु उपाय पूछती हैं। नारद और समस्त पावन सत्ता विचार करती हैं; तभी गौतम ऋषि आते हैं और महादेव का ध्यानपूर्वक आवाहन करते हैं। तब आकाशवाणी समागम को उत्तर-पश्चिम समुद्रतट की ओर मोड़कर द्वारका को परम शुद्धिक्षेत्र बताती है—जहाँ गोमती समुद्र से मिलती है और जहाँ विष्णु पश्चिमाभिमुख विराजते हैं; वह क्षेत्र अग्नि की भाँति पाप को भस्म कर देता है। अंत में सब द्वारका की स्तुति करते हैं, गोमती-स्नान, चक्रतीर्थ-स्नान और कृष्ण-दर्शन की उत्कट अभिलाषा करते हैं; साथ ही यह नीति उभरती है कि सत्संग से पवित्रता बढ़ती है और दुर्जन-संग से क्षीण होती है।

Dvārakā-yātrā-vidhiḥ (Procedure and Ethics of the Pilgrimage to Dvārakā)
इस अध्याय में प्रह्लाद बताते हैं कि तीर्थ, क्षेत्र, ऋषि और देवता सभी श्रीकृष्ण-दर्शन हेतु द्वारावती/कुशस्थली जाने को उत्सुक हैं। नारद और गौतम का दिखाई देना मानो किसी महान उत्सव-सी तीर्थयात्रा के निकट आने का संकेत है। तब ऋषि, योगियों के परम मार्गदर्शक कहे गए नारद से यात्रा-विधि, आवश्यक नियम, वर्जनीय आचरण, मार्ग में क्या सुनना-पढ़ना-स्मरण करना चाहिए, और कौन-से उत्सव उचित हैं—यह सब पूछते हैं। नारद उत्तर देते हैं कि पहले स्नान-पूजन किया जाए, सामर्थ्य अनुसार वैष्णवों और ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए, विष्णु की अनुमति लेकर ही प्रस्थान हो, और मन में श्रीकृष्ण-भक्ति स्थिर रहे। यात्रा में शांति, संयम, शुद्धता, ब्रह्मचर्य, भूमि पर शयन और इंद्रिय-निग्रह का पालन हो। नाम-जप (सहस्रनाम आदि), पुराण-पाठ/श्रवण, दयालु व्यवहार, सत्पुरुषों की सेवा तथा विशेषतः अन्नदान को श्रेष्ठ बताया गया है; थोड़े दान का भी बड़ा फल कहा गया है। झगड़ालू वाणी, निंदा, छल और सामर्थ्य होते हुए दूसरों के अन्न पर निर्भर रहना निषिद्ध है। अंत में प्रह्लाद मार्ग की भक्ति-छवि दिखाते हैं—विष्णु-कथा सुनना, नाम-कीर्तन, गीत-वाद्य, ध्वजों सहित उत्सवी जुलूस, और नदियों व प्रसिद्ध तीर्थों का प्रतीकात्मक सहभागी होना। दूर से ही कृष्ण-धाम के दर्शन होते हैं और यह यात्रा सामूहिक उपासना के साथ नैतिक साधना का रूप ले लेती है।

Dvārakā as Tīrtha-Saṅgama: Darśana of Kṛṣṇa’s Ālaya and the Gomatī Māhātmya (द्वारकाक्षेत्रमहिमा तथा गोमतीमाहात्म्य)
इस अध्याय में द्वारका की भक्ति-प्रधान पवित्रता और तीर्थ-संगम का वर्णन है। प्रह्लाद नगर की दिव्य ज्योति बताता है जो अंधकार और भय को दूर करती है, तथा ध्वज-पताकाओं से उसकी विजय-छवि प्रकट होती है। विष्णु/कृष्ण के आलय को दिव्य चिह्नों से सुशोभित देखकर समस्त जन साष्टांग प्रणाम करते हैं और हर्षाश्रुओं सहित भाव-विभोर हो उठते हैं। इसके बाद अनेक अखिल-भारतीय तीर्थ, नदियाँ, क्षेत्र और प्रसिद्ध नगर गिनाए जाते हैं—वाराणसी, कुरुक्षेत्र, प्रयाग, गंगा/जाह्नवी, यमुना, नर्मदा, सरस्वती, गोदावरी, गया, शालग्राम-क्षेत्र, पुष्कर, अयोध्या, मथुरा, अवंती, कांची, पुरुषोत्तम, प्रभास आदि—यह दिखाने के लिए कि त्रिलोकी का पवित्र भू-दृश्य मानो द्वारका के संबंध में उपस्थित हो जाता है। ऋषि जय-जयकार और नमस्कार करते हुए आनंदित होते हैं। नारद कहते हैं कि यह दर्शन संचित पुण्य का फल है; दृढ़ भक्ति और द्वारका पहुँचने का संकल्प छोटे तप से नहीं मिलता। द्वारका को क्षेत्र-तीर्थ-राजों में सूर्य के समान तेजस्वी बताया गया है। फिर संगीत, नृत्य, ध्वज और स्तुतियों के साथ यात्रा गोमती की ओर बढ़ती है। नारद नदियों को संबोधित कर गोमती को श्रेष्ठ बताते हैं; उसका स्नान मोक्षदायक और पितरों तक को लाभ देने वाला कहा गया है। स्नान के बाद सब द्वारका-द्वार पर पहुँचकर नगर-देवी को राजसी, उज्ज्वल रूप में—श्वेतवर्ण, अलंकृत, शंख-चक्र-गदा धारण किए—देखते हैं और सामूहिक प्रणाम करते हैं।

द्वारकायाः सर्वतीर्थ-समागमः, देवसमागमश्च (Dvārakā as the Convergence of All Tīrthas and the Assembly of Devas)
इस अध्याय में नारद हरि-प्रिया द्वारका की परम पावनता को क्रमशः प्रकट करते हैं। वे वर्णन करते हैं कि प्रयाग, पुष्कर, गौतमी, भागीरथी-गंगा, नर्मदा, यमुना, सरस्वती, सिंधु; तथा वाराणसी, कुरुक्षेत्र, मथुरा, अयोध्या; और मेरु, कैलास, हिमालय, विंध्य जैसे प्रसिद्ध तीर्थ, नदियाँ, क्षेत्र और पर्वत द्वारका में आकर उसके चरणों में प्रणाम करते हैं। फिर दिव्य वाद्य-ध्वनि और जयघोष उठते हैं; ब्रह्मा, महेश (भवानी सहित), इंद्र आदि देव और ऋषिगण प्रकट होकर द्वारका को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ बताते हैं तथा चक्रतीर्थ और चक्र-चिह्नित शिला की महिमा गाते हैं। ब्रह्मा और महेश श्रीकृष्ण के दर्शन की प्रार्थना करते हैं; द्वारका उन्हें द्वारकेश्वर के पास ले जाती है। गोमती और समुद्र में स्नान, पंचामृत-भाव से अभिषेक, तुलसी-धूप-दीप-नैवेद्य अर्पण, तथा गीत-नृत्य-वादन सहित उत्सव होता है; इससे भगवान प्रसन्न होकर वर देते हैं—उनके चरणों में स्थिर, स्नेहपूर्ण भक्ति। अंत में ब्रह्मा और ईशान द्वारा स्वयं द्वारका का राजाभिषेक-सा अभिषेक किया जाता है; विष्णु के पार्षद (जैसे विश्वक्सेन, सुनंद) भी प्रकट होते हैं। उपसंहार में कहा गया है कि जिनका पूजन विधिपूर्वक होता है, उनके हृदय में द्वारका आने की प्रेरणा जागती है—यह दैवी अनुग्रह का चिह्न है।

द्वारकायां सर्वतीर्थक्षेत्रादिकृतनिवासवर्णनम् (Residence of All Tīrthas and Kṣetras at Dvārakā)
इस अध्याय में प्रह्लाद, विष्णु के पार्षदों से द्वारका का माहात्म्य सुनकर, उसका विस्तृत वर्णन पूछते हैं। तब ब्रह्मा और महेश कहते हैं कि द्वारका समस्त तीर्थों और मोक्षदायक क्षेत्रों की राजधानी-सी श्रेष्ठ है; प्रयाग और काशी जैसे प्रसिद्ध तीर्थों की अपेक्षा भी उसकी महिमा विशेष रूप से गाई गई है। फिर दिशानुसार क्रम से बताया गया है कि असंख्य (कोटि-कोटि) नदियाँ और तीर्थ द्वारका के चारों ओर निवास करते हैं, भक्तिभाव से सेवा करते हैं और बार-बार श्रीकृष्ण के दर्शन करते हैं। इसके बाद वाराणसी, अवन्ती, मथुरा, अयोध्या, कुरुक्षेत्र, पुरुषोत्तम, भृगुक्षेत्र/प्रभास, श्रीरंग आदि प्रमुख क्षेत्रों का, तथा शाक्त, सौर और गाणपत्य स्थलों का उल्लेख आता है; साथ ही कैलास, हिमालय, श्रीशैल आदि पर्वत भी द्वारका को घेरकर स्थित बताए गए हैं। अंत में कहा गया है कि यह समागम श्रद्धा और भक्ति के कारण होता है; और जब गुरु कन्या-राशि में होता है तब देवता और ऋषि आनंदपूर्वक दर्शन हेतु द्वारका आते हैं। इस प्रकार द्वारका को समन्वयकारी, सर्वतीर्थ-संगम रूप तीर्थ-विश्व के केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

Vajralepa-vināśaḥ — The Dissolution of Hardened Wrongdoing through Dvārakā-Pathika Darśana
इस अध्याय में प्रह्लाद ऋषियों से द्वारका की अद्भुत पावन-शक्ति का वर्णन करते हैं और फिर एक प्राचीन संवाद सुनाते हैं—राजा दिलीप और महर्षि वसिष्ठ का। दिलीप पूछते हैं कि वह कौन-सा क्षेत्र है जहाँ पाप “फिर से अंकुरित” नहीं होता, विशेषकर यह सुनकर कि काशी ‘वज्र-लेप’ नामक कठोर नैतिक मल को भी शांत कर देती है। वसिष्ठ काशी में रहने वाले एक संन्यासी की चेतावनीपूर्ण कथा कहते हैं, जो अधर्म में गिरकर निषिद्ध आचरण करता है और फिर भारी पापों के कारण अनेक योनियों में दीर्घ दुःख भोगता है। काशी तत्काल नरक-फल को रोक देती है, पर वज्र-लेप शेष रहकर लंबे समय तक पीड़ा का कारण बनता है। फिर कथा का मोड़ आता है—द्वारका-मार्ग का एक पथिक, जो गोमती-स्नान से शुद्ध और श्रीकृष्ण-दर्शन से चिह्नित है, एक राक्षस से मिलता है। उस पथिक के केवल दर्शन से ही राक्षस का वज्र-लेप भस्म हो जाता है। राक्षस द्वारका जाकर गोमती तट पर देह त्यागता है और वैष्णव पद प्राप्त करता है, जिसे देवगण सराहते हैं। अंत में द्वारका को ‘क्षेत्र-राज’ कहकर पुनः स्थापित किया जाता है—जहाँ पाप पुनः नहीं उठता; और दिलीप भी तीर्थयात्रा कर श्रीकृष्ण की उपस्थिति से सिद्धि पाते हैं।

Dvārakā-kṣetra-māhātmya: Darśana, Dāna, Gomati-snānaphala, and Vaiṣṇava-nindā-doṣa (द्वारकाक्षेत्रमाहात्म्य—वैष्णवनिन्दादोषः)
इस अध्याय में संवाद के रूप में प्रह्लाद द्वारका-क्षेत्र की अद्भुत पवित्रता का गुणगान करते हैं। वे कहते हैं कि वहाँ के चतुर्भुज वैष्णव भक्तों और निवासियों का दर्शन मन को बदल देता है; द्वारका की महिमा इतनी व्यापक है कि देवगण भी उसे प्रत्यक्ष देखते हैं। यहाँ तक कि पत्थर, धूल और छोटे जीव भी मुक्ति के साधन कहे गए हैं। फिर नैतिक अनुशासन आता है—द्वारका के वैष्णवों की निन्दा (वैष्णव-निन्दा) महादोष है। जयन्त के दण्ड-प्रसंग से बताया गया है कि ऐसी निन्दा करने वाला घोर दुःख भोगता है। इसके बाद द्वारका में श्रीकृष्ण की सेवा, भक्ति सहित निवास और अल्प-दान तक को भी अन्य तीर्थों के बड़े कर्मों से अधिक फलदायी कहा गया है—जैसे कुरुक्षेत्र के दान या गोदावरी के पुण्य से भी बढ़कर। गुरु के सिंह राशि में स्थित होने पर गोमती-स्नान का विशेष फल और कुछ मासों में पुण्य की वृद्धि का उल्लेख है। अंत में लोकहित का धर्म बताया गया—छत्रशाला, जल-व्यवस्था, धर्मशाला, तालाब-कुएँ की मरम्मत और विष्णु-प्रतिमा की स्थापना—इनसे क्रमशः स्वर्गीय सुख और अंततः विष्णुलोक की प्राप्ति होती है; और प्रश्न उठता है कि द्वारका में पुण्य शीघ्र बढ़ता और पाप का अंकुर क्यों रुक जाता है।

द्वारकाक्षेत्रवैभववर्णनम् / Theological Praise of Dvārakā and its Pilgrimage Fruits
सूत राजसभा के संवाद का वर्णन करते हैं—प्रह्लाद के वचनों से प्रेरित होकर बलि द्वारकाक्षेत्र के वैभव और फल के विषय में पूछते हैं। प्रह्लाद क्रमबद्ध माहात्म्य कहते हैं: द्वारका की ओर बढ़ाए गए प्रत्येक कदम से पुण्य बढ़ता है और वहाँ जाने का संकल्प मात्र भी शुद्धि देता है। कलियुग के भारी दोष भी श्रीकृष्ण के सान्निध्य को प्राप्त व्यक्ति को नहीं लगते—विशेषतः चक्रतीर्थ और कृष्णपुरी की महिमा के साथ। अन्य पवित्र नगरों की तुलना में, कृष्ण-रक्षित द्वारका के दर्शन से उसकी सर्वोच्चता प्रतिपादित होती है। फिर निवास, दर्शन, गोमती-स्नान और रुक्मिणी-दर्शन की दुर्लभता बताई जाती है। गृहस्थ के लिए भी द्वारका-स्मरण और केशव-पूजन का विधान, तथा त्रिस्पृशा-द्वादशी आदि व्रतों का काल-नियम समझाया जाता है। कलियुग में उपवास, जागरण, कीर्तन-नृत्य आदि के फल की वृद्धि—विशेषकर द्वारका में कृष्ण के समीप—कही गई है। गोमती-सागर संगम, चक्रांकित शिलाओं की पवित्रता, अन्य तीर्थों के समकक्ष/अधिक फल, तथा कृष्ण की रानियों के पूजन से संतान-कल्याण, भय-अमंगल नाश का वर्णन है। अंत में यह दृढ़ फलश्रुति है कि द्वारका-यात्रा में आई विपत्ति भी अपुनरावृत्ति का कारण बनती है।

Sudarśana–Cakra-cihna-aṅkita-pāṣāṇa Māhātmya (Glory of Chakra-Marked Stones at Dvārakā)
यह अध्याय द्वारका-क्षेत्र में सुदर्शन-चक्र-चिह्नित पाषाणों की महिमा का क्रमबद्ध वर्णन करता है। प्रह्लाद कलियुग में नाम-जप को सर्वोपरि बताते हैं—“कृष्ण” नाम का निरंतर जप मन की शुद्धि, महान पुण्य और अद्भुत फल देने वाला कहा गया है। फिर एकादशी-द्वादशी के व्रतों में तिथि-विशेषों का सूक्ष्म विधान आता है—उन्मीलिनी आदि स्थितियाँ, रात्रि-जागरण का बढ़ा हुआ पुण्य, तथा कलियुग में दुर्लभ वञ्जुली-योग का उल्लेख। इसके बाद चक्र-तीर्थ का माहात्म्य कहा गया है—वहाँ स्नान करने से पाप-मल दूर होते हैं और साधक निर्विघ्न परम पद की ओर उन्मुख होता है; परंपरा है कि वहीं श्रीकृष्ण ने अपने चक्र को धोया था। आगे चक्र-चिह्नित शिलाओं का विवरण है—एक से बारह चक्र-चिह्नों वाली शिलाएँ विभिन्न दिव्य रूपों से जोड़ी गई हैं और उनके फल क्रमशः स्थिरता-समृद्धि से लेकर राज्य-ऐश्वर्य तथा अंततः निर्वाण/मोक्ष तक बताए गए हैं। अंत में फलश्रुति दृढ़ रूप से प्रतिपादित है—चक्र-चिह्नित पाषाण का स्पर्श या पूजन भी महापापों का क्षय करता है, और मृत्यु-काल में उसका स्मरण तारक माना गया है। गोमती-संगम और भृगु-तीर्थ में स्नान को भी घोर अशौच/अपवित्रता का शमन करने वाला कहा गया है; मिश्र भाव से की गई भक्ति को भी शास्त्र सात्त्विक शुद्धि की ओर उठाता है।

Dvārakā-Māhātmya: Dvādaśī-Jāgaraṇa, Gomati–Cakratīrtha Merit, and Service to Vaiṣṇavas
इस अध्याय में प्रह्लाद उपदेश देते हैं कि द्वारका श्रीकृष्ण की सन्निधि से अत्यन्त पुण्य-प्रधान क्षेत्र है, जहाँ छोटे-से कर्म का भी बड़ा फल होता है। द्वारका-माहात्म्य का श्रवण और कीर्तन मोक्ष का साधन बताया गया है। महँगे दानों—जैसे विद्वान ब्राह्मणों को बार-बार गोदान—के समान फल गोमती में स्नान से, विशेषकर मधुसूदन से सम्बद्ध तिथियों में, प्राप्त हो सकता है; इससे धर्म-फल का आधार व्यय से हटकर तीर्थ और काल पर प्रतिष्ठित होता है। आगे नैतिक बल दिया गया है कि द्वारका में एक ब्राह्मण को भोजन कराना भी महान पुण्य है, और यतियों/संन्यासियों तथा वैष्णवों को अन्न-वस्त्र देना सर्वोपरि सेवा है, जो जहाँ भी हों, करनी चाहिए। वैशाख शुक्ल द्वादशी का व्रत, कृष्ण-पूजा और रात्रि-जागरण की महिमा कही गई है; जागरण और भागवत-पाठ संचित पापों को जला देते हैं तथा दीर्घ स्वर्गवास प्रदान करते हैं—ऐसी फलश्रुति दी गई है। शुद्धि-मानचित्र भी बताया गया है: जहाँ भागवत-श्रवण, शालग्राम-पूजन और वैष्णव-व्रत नहीं, वे देश कर्मदृष्टि से हीन हैं; पर जहाँ भक्त निवास करते हैं, वहाँ की सीमांत भूमि भी पुण्यवती हो जाती है। गोपीचन्दन तिलक, शंखोद्धार की मिट्टी, तुलसी-सन्निधि और पादोदक को रक्षक-मंगलकारी चिह्न कहा गया है। अंत में कलियुग में द्वारका में कृष्ण-निवास का प्रतिपादन और गोमती–चक्रतीर्थ में एक दिन का स्नान त्रिलोकी के तीर्थ-स्नान के तुल्य फलदायक बताया गया है।

Dvādāśī-Jāgaraṇa, Dvārakā-Smaraṇa, and Vaiṣṇava Ācāra (द्वादशी-जागरण, द्वारका-स्मरण, वैष्णव-आचार)
अध्याय 39 में प्रह्लाद द्वादशी के शुभ नामों का वर्णन करते हुए बतलाते हैं कि प्रतिदिन का पुण्य हविष्-सदृश नैवेद्य अर्पण और विष्णु के जागरण से बढ़ता है, विशेषतः शालग्राम-शिला के सामने। घी के दीपक (दो बत्तियों सहित), शालग्राम को पुष्पों से ढकना, तथा चक्र-चिह्नित वैष्णव प्रतिमा का अभ्यंग-युक्त पूजन—चंदन, कपूर, कृष्णागरु और कस्तूरी आदि से—विधिपूर्वक कहा गया है। फलश्रुति में द्वादशी-जागरण का फल महान तीर्थों के पुण्य, यज्ञ-व्रत, वेदाध्ययन, पुराण-श्रवण, तप और आश्रम-धर्म के समस्त पुण्य के तुल्य बताया गया है, और यह भी कि यह उपदेश प्रमाणिक वक्ताओं की परंपरा से प्राप्त है। सूत श्रद्धा सहित इस आचरण को अपनाने की प्रेरणा देते हैं। फिर द्वारका का माहात्म्य बताया गया है—यात्रा न हो सके तो भी मन से स्मरण, जप, और घर में पाठ करने से वही फल मिलता है। वैष्णवों को दान, कथा-श्रवण, और द्वादशी की रात्रि-जागरण में विशेष पाठ की संस्तुति की गई है; निरंतर भक्ति से घर में अनेक तीर्थों और देवताओं की पवित्र उपस्थिति का भाव भी कहा गया है। अंत में वैष्णवों का अपमान, शोषणकारी कर्म, तथा पवित्र वृक्षों—विशेषतः अश्वत्थ—को हानि पहुँचाना निषिद्ध है; वहीं न्यग्रोध, धात्री और तुलसी के रोपण-रक्षण का महान पुण्य बताया गया है। कलियुग में नित्य विष्णु-पाठ और भागवत-गान को श्रेष्ठ धर्म कहा गया है; गोपीचंदन तिलक, उसका दान, द्वादशी-जागरण, और प्रतिदिन “द्वारका” नाम का उच्चारण तीर्थ-सदृश पुण्य देने वाला बताया गया है।

कार्तिके चक्रतीर्थस्नानदानश्राद्धादिमाहात्म्यवर्णनम् (Kartika Observances at Cakratīrtha: Bathing, Gifts, and Śrāddha)
इस अध्याय में प्रह्लाद श्रीकृष्ण-उपासना से जुड़े अत्यन्त पुण्यदायक विधानों और द्वारका-तीर्थ के आचार का उपदेश देते हैं। आरम्भ में पत्तों से पूजा का विधान है—अपने नाम से अंकित पत्तों द्वारा श्रीपति का पूजन, और विशेषतः श्रीवृक्ष (लक्ष्मी-संबद्ध) के पत्तों से की गई पूजा को महान फलदायी बताया गया है; अध्याय की मान्यता में इसे तुलसी से भी श्रेष्ठ कहा गया है। साथ ही रविवार से युक्त द्वादशी का विशेष प्रभाव और ‘हरि का दिन’ होने पर पुण्यों के एकत्र होने का वर्णन है। फिर द्वारका की दान-धर्म व्यवस्था आती है—यतियों/संन्यासियों को भोजन कराना, वस्त्र व आवश्यक सामग्री का दान, और यह प्रतिपादन कि अन्यत्र बड़े भोज से जो फल मिलता है, वह द्वारका में एक ही भिक्षुक को भोजन कराने से भी मिल जाता है। कृष्ण-कीर्तन की तारक शक्ति, द्वारका-निवासियों तथा आश्रित प्राणियों तक फैली रक्षा-छाया का भी उल्लेख है। कार्तिक-मास के नियम—गोमती व रुक्मिणी-ह्रद में स्नान, एकादशी उपवास, द्वादशी को चक्रतीर्थ में श्राद्ध, निर्दिष्ट अन्नों से ब्राह्मण-भोजन तथा दक्षिणा-वस्तुओं का दान—इनसे पितरों की तृप्ति और भगवान की प्रसन्नता सिद्ध होती है। अंत में फलश्रुति द्वारा कहा गया है कि तीर्थ में शुद्ध होकर कार्तिक-व्रत करने वालों को अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।

गोमतीस्नान–कृष्णपूजन–यतिभोजन–दान–श्राद्धादि सत्फलवर्णनम् (Merits of Gomatī Bathing, Kṛṣṇa Worship, Feeding Ascetics, Gifts, and Śrāddha)
इस अध्याय में प्रह्लाद द्वारा कहा गया धर्म‑संवाद है, जिसमें द्वारका और गोमती का विशेष माहात्म्य बताया गया है। गोमती में स्नान करके केतकी, तुलसी आदि अर्पित कर श्रीकृष्ण का पूजन करने वाला अत्यन्त शुभ फल पाता है, घोर संसार‑चक्र से रक्षित होता है; फलश्रुति में इसे अमृतत्व के समान पुण्य कहा गया है। केवल द्वारका का मन से स्मरण भी भूत‑वर्तमान‑भविष्य के पापों को दग्ध कर देता है, और कलियुग में द्वारका‑मुखी भाव को मनुष्य‑जीवन की सिद्धि का चिह्न बताया गया है। यह भी कहा गया है कि द्वारका में एक व्यक्ति को भोजन कराने का फल अन्यत्र असंख्य जनों को भोजन कराने से बढ़कर है; यति‑भोजन, दान आदि की महिमा भी वर्णित है। पितृगणों का द्वारका में वास माना गया है; गोमती‑स्नान के बाद तिलोदक, श्राद्ध और पिण्डदान करने से अक्षय फल होता है और पितरों को दीर्घकाल तक तृप्ति मिलती है। ग्रहण, व्यतीपात, संक्रान्ति, वैधृति तथा व्रत‑पर्व आदि काल‑विशेषों का उल्लेख कर्म‑समय के लिए किया गया है, और तीर्थ‑सूची के माध्यम से द्वारका की सर्वोच्चता स्थापित की गई है।

द्वारकाक्षेत्रे वृषोत्सर्गादिक्रियाकरण-द्वारकामाहात्म्यश्रवणादि-फलवर्णनम् (Chapter 42: Results of bull-release and related rites; fruits of hearing/reciting Dvārakā Māhātmya)
इस अध्याय में प्रह्लाद द्वारा फलश्रुति-प्रधान उपदेश दिया गया है। द्वारका में—विशेषतः वैशाख और कार्तिक में—वृषोत्सर्ग (बैल का विधिपूर्वक उत्सर्ग) करने से परलोक में उन्नति और दुर्गति से मुक्ति बताई गई है। ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी, गुरु-सम्बन्धी अपराध आदि महापातकों का उल्लेख करके यह प्रतिपादित किया गया है कि गोमती में स्नान और श्रीकृष्ण के दर्शन से दीर्घकाल से संचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं। कलियुग में भक्ति-प्रधान कर्मों का विशेष महत्त्व कहा गया है—भक्ति से रुक्मिणी-दर्शन, नगर-परिक्रमा और सहस्रनाम का जप। द्वादशी के दिन विष्णु-सन्निधि में द्वारका-माहात्म्य का पाठ करने की विधि बताकर उसके फलस्वरूप दिव्य लोकों में गमन और सम्मान की प्राप्ति का वर्णन है। इसके बाद ऐसे साधकों की प्रशंसा है जिनके विषय में कहा जाता है—“ऐसा व्यक्ति हमारे कुल में जन्म ले।” वे गोमती-सागर संगम में स्नान करते हैं, सपिण्ड-युक्त श्राद्ध करते हैं, वैष्णवों का सत्कार (गोपीचन्दन-दान सहित) करते हैं तथा माहात्म्य को पढ़ते, सुनते, लिखते और घर में सुरक्षित रखते हैं। लिखित-धारण को महादान और तप के समान पुण्यदायक, भय-नाशक और विधि-त्रुटि को शान्त करने वाला कहा गया है। अंत में द्वारका को विष्णु, समस्त तीर्थ, देव, यज्ञ, वेद और ऋषियों की सन्निधि-भूमि बताकर चेतावनी दी गई है कि माहात्म्य-श्रवण के बिना गुण निष्फल हो जाते हैं; श्रद्धापूर्वक श्रवण से निश्चित समय में समृद्धि और संतान-लाभ होता है।

तुलसीपत्रकाष्ठमहिमा तथा द्वारकायात्राविधिवर्णनम् | The Glory of Tulasī (Leaf & Wood) and the Procedure of the Dvārakā Pilgrimage
इस अध्याय में प्रह्लाद के वचनों द्वारा तुलसी-पत्र की पूजा-सेवा का महिमा बताया गया है। तुलसी-दलों से किया गया विष्णु-पूजन सर्वकाम-फलदायक कहा गया है और पूजाशेष की पवित्रता का भी विस्तार से प्रतिपादन होता है। फिर विष्णु-संबंधी पदार्थों का पुण्य-क्रम बताया जाता है—पादोदक, शंखोदक, नैवेद्य-शेष और निर्माल्य; इनके सेवन, धारण और आदर से महायज्ञों के तुल्य फल की बात कही गई है। स्नान और पूजा के समय घण्टा-वादन की विधि भी आती है, जो अन्य वाद्यों के स्थान पर भी महान पुण्य देने वाला माना गया है। आगे तुलसी-काष्ठ तथा तुलसी से बने चन्दन की शुद्धिकारक शक्ति, देव-पूजा और पितृ-तर्पण में उसके दान का महत्व, तथा दाह-संस्कार में उसके उपयोग से मुक्ति-प्रद फल और भगवान की विशेष कृपा का वर्णन है। अंत में सूत कथा को यात्रा-आचरण की ओर ले जाते हैं—द्वारका-माहात्म्य से प्रसन्न मुनि और बलि द्वारका जाते हैं, गोमती में स्नान करते हैं, श्रीकृष्ण की आराधना कर विधिपूर्वक यात्रा, दान आदि करके लौट आते हैं; इस प्रकार उपदेश को तीर्थयात्रा-नीति के रूप में दिखाया गया है।

स्कन्दमहापुराणश्रवणपठन-पुस्तकप्रदान-व्यासपूजनमाहात्म्य तथा उपसंहार (Chapter 44: Merit of Listening/Reciting, Gifting the Text, Honoring Vyāsa; Concluding Frame)
इस अध्याय में द्वारका-माहात्म्य के भीतर स्कन्दपुराण की उपसंहार-रूप फलश्रुति दी गई है। सूत पहले स्कन्द से लेकर भृगु, अङ्गिरा, च्यवन, ऋचीक आदि की अधिकृत परम्परा बताकर यह स्थापित करते हैं कि पुराण-ज्ञान का आधार प्रमाणित गुरु-शिष्य परम्परा है। फिर श्रवण और पठन के फल गिनाए जाते हैं—पापों का क्षय, आयु की वृद्धि, वर्णाश्रम-धर्म में कल्याण, पुत्र-धन-वैवाहिक-सुख की प्राप्ति, बन्धुओं से मिलन, और यहाँ तक कि श्लोक के एक पाद मात्र के श्रवण से भी शुभ गति। इसके बाद नैतिक-शिक्षात्मक बल है—पाठक/वक्ता का सम्मान ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र के पूजन के समान कहा गया है; गुरु द्वारा एक अक्षर का उपदेश भी अऋणीय है, इसलिए दान, सत्कार, अन्न-वस्त्र आदि से श्रद्धापूर्वक सेवा करनी चाहिए। अंत में व्यास-प्रसंग में ऋषि सूत की प्रशंसा करते हैं कि उन्होंने सृष्टि, प्रतिसृष्टि, वंश, मन्वन्तर, लोक-विन्यास आदि पुराण-विषयों का सम्यक् निरूपण किया; उन्हें वस्त्राभूषण देकर सम्मानित करते हैं और आशीर्वाद देकर अपने-अपने कर्मकाण्ड में लौट जाते हैं—इस प्रकार ग्रन्थ-समाप्ति, कृतज्ञता और अध्ययन-परम्परा की मर्यादा दृढ़ होती है।
It emphasizes Dvārakā as a sanctified civilizational and devotional center tied to Kṛṣṇa’s presence and legacy, with Prabhāsa functioning as a consequential sacred node where epic-era transitions are narrated and ritually remembered.
The section’s typical purāṇic logic associates merit with remembrance, recitation, and tīrtha-contact that reinforce dharma and devotion—especially framed as accessible supports when formal religious capacities are portrayed as diminished in Kali-yuga.
Key legends include Kṛṣṇa’s life-cycle recollections (from Vraja and Mathurā to Dvārakā), the Yādava lineage’s terminal events, the sea’s inundation motif around Dvārakā, and the subsequent re-siting of sacred habitation and memory.