Rudra Samhita43 Adhyayas2306 Shlokas

Sati Khanda

Satikhanda

Adhyayas in Sati Khanda

Adhyaya 1

सतीसंक्षेपचरित्रवर्णनम् — Summary Description of Satī’s Narrative

अध्याय 1 में सतीखण्ड का आरम्भ होता है। नारद, शिव के पूर्ववृत्तान्त सुनकर, सूत से शुभ शिव-कथा का अधिक विस्तृत वर्णन माँगते हैं। वे एक तात्त्विक प्रश्न उठाते हैं—निर्विकार, निरद्वन्द्व योगी शिव कैसे दैवी प्रेरणा से परम शक्ति से विवाह कर गृहस्थ बने? फिर वे वंश-सम्बन्धी समस्या रखते हैं—सती पहले दक्ष की पुत्री दाक्षायणी कही जाती हैं और बाद में हिमवान/पर्वत की पुत्री पार्वती; एक ही शक्ति दो कुलों की पुत्री कैसे, और सती पार्वती रूप में पुनः शिव को कैसे प्राप्त हुईं? सूत प्रसंग बताकर ब्रह्मा का उत्तर सुनाते हैं। ब्रह्मा इस कथा-श्रवण को ‘सफल जन्म’ देने वाला कहकर अनुमोदित करते हैं और वही शुभ कथा आरम्भ करते हैं जो पहचान-निरन्तरता का रहस्य तथा शिव के विवाह-लीला का तत्त्व स्पष्ट करती है।

46 verses

Adhyaya 2

कामप्रादुर्भावः — The Manifestation/Arising of Kāma

अध्याय 2 में नैमिषारण्य के ऋषियों से सूत कहते हैं कि पूर्व कथा सुनकर एक श्रेष्ठ ऋषि पाप-प्रणाशिनी कथा का निवेदन करता है। फिर संवाद नारद और ब्रह्मा की ओर मुड़ता है; नारद श्रद्धापूर्वक शम्भु की मंगल कथा सुनने की अतृप्त इच्छा प्रकट कर सती से जुड़े शिव के पवित्र चरित्रों का सम्यक् वर्णन माँगता है। वह क्रम से पूछता है—दक्ष-गृह में सती का जन्म, शिव का विवाह हेतु मन कैसे प्रवृत्त हुआ, दक्ष के क्रोध से सती का देह-त्याग और हिमवान की पुत्री रूप में पुनर्जन्म, पार्वती का पुनः आगमन और कठोर तप का कारण, विवाह कैसे हुआ, तथा स्मर-विनाशक शिव के साथ अर्धाङ्गिनी-भाव कैसे प्राप्त हुआ। ब्रह्मा उत्तर आरम्भ करते हुए इसे परम पावन, दिव्य और ‘रहस्यों में भी परम रहस्य’ बताते हैं। उपसंहार में अध्याय का नाम ‘कामप्रादुर्भाव’ कहा गया है, जिससे आगे कामदेव की भूमिका और शिव की प्रतिक्रिया सती–पार्वती प्रसंग में जुड़ने का संकेत मिलता है।

41 verses

Adhyaya 3

कामशापानुग्रहः (Kāmaśāpānugraha) — “The Curse and Grace Concerning Kāma”

इस अध्याय में ब्रह्मा और मुनियों के वचनों से कामदेव की उत्पत्ति, स्वरूप और जगत में उसकी स्थिति का कारण-रूप वर्णन आता है। केवल निरीक्षण से मरीचि आदि स्रष्टा नव-उदित काम-तत्त्व के लिए नाम और कार्य निश्चित करते हैं—मनमथ, काम, मदन और कन्दर्प; ये समानार्थक नहीं, बल्कि इच्छा के अलग-अलग कार्य-रूप हैं। मुनि उसे सर्वत्र प्रभावी बताते हैं और कहते हैं कि दक्ष उसे पत्नी देगा। वह पत्नी सन्ध्या नाम की सुन्दरी है, जो ब्रह्मा के मन से उत्पन्न (मनोभवा) कही गई है। शीर्षक संकेत देता है कि आगे चलकर काम पर शाप से नियंत्रण और अनुग्रह से सृष्टि-व्यवस्था में उसका समावेश होता है।

78 verses

Adhyaya 4

कामविवाहवर्णनम् / Description of Kāma’s Marriage

अध्याय 4 संवाद रूप में है। नारद, शिव के अपने धाम चले जाने के बाद की कथा ब्रह्मा से आगे पूछते हैं। ब्रह्मा बताते हैं कि पूर्व वचन स्मरण कर दक्ष ने काम (मन्मथ) को बुलाकर अपने ही शरीर से उत्पन्न, शुभ रूप-गुणों से युक्त कन्या उसे पत्नी रूप में दी। उसका नाम रति रखा गया और विधिपूर्वक विवाह सम्पन्न हुआ। रति को देखकर काम अत्यन्त प्रसन्न और मोहित हो गया; यहाँ काम को केवल विघ्नकारी आवेग नहीं, बल्कि धर्म के भीतर विवाह, वंश और स्वीकृत संघ के रूप में नियत सिद्धान्त बताया गया है। रति के सौन्दर्य और काम की आसक्ति का वर्णन आगे चलकर शिव की तपःशक्ति और जगत-नियमन से काम के संबंध का संकेत देता है।

34 verses

Adhyaya 5

संध्याचरित्रवर्णनम् (Sandhyā-caritra-varṇana) — “Account of Sandhyā’s Story”

इस अध्याय में सूत बताते हैं कि पूर्व प्रसंग सुनकर नारद ब्रह्मा से संध्या के विषय में प्रश्न करते हैं—मानसपुत्रों के अपने-अपने धाम चले जाने के बाद संध्या कहाँ गई, उसने आगे क्या किया और उसका विवाह किससे हुआ। तत्त्ववेत्ता ब्रह्मा शंकर का स्मरण कर वंश-तत्त्व की कथा आरम्भ करते हैं। वे कहते हैं कि संध्या ब्रह्मा की मानसपुत्री (मन से उत्पन्न पुत्री) थी; उसने तप किया, देह का त्याग किया और पुनर्जन्म लेकर अरुंधती बनी। इस प्रकार कथा संध्या को अरुंधती के पतिव्रता आदर्श से जोड़ती है और ब्रह्मा-विष्णु-महेश के दैवी विधान को उसका आधार बताती है।

65 verses

Adhyaya 6

संध्याचरित्रवर्णनम् (Sandhyā-caritra-varṇanam) — “Narration of Sandhyā’s Austerity and Encounter with Śiva”

ब्रह्मा विद्वान श्रोता से कहते हैं कि संध्या के महान तप का श्रवण संचित पापों का तत्काल नाश करने वाला और अत्यन्त पावन है। वसिष्ठ के घर लौट जाने पर संध्या तपस्या का मर्म और नियम समझकर बृहल्लोहित नदी के तट पर तप आरम्भ करती हैं। वसिष्ठ-उपदिष्ट मंत्र को साधन बनाकर वह एकाग्र भक्ति से शंकर की उपासना करती हैं और चतुर्युग तक शम्भु में मन स्थिर रखकर कठोर तप करती हैं। तप से प्रसन्न होकर शिव कृपा करते हैं और अपने स्वरूप का प्राकट्य करते हैं—अन्तर में, बाहर और आकाश में भी। वे उसी रूप में प्रकट होते हैं जिसका संध्या ने ध्यान किया था, जिससे ध्यान और प्रत्यक्ष दर्शन का सम्बन्ध स्पष्ट होता है। शांत, स्मितमुख प्रभु को देखकर संध्या हर्षित होकर भी श्रद्धाभाव से संकोच करती हैं; क्या और कैसे स्तुति करूँ, यह सोचकर नेत्र मूँदकर अंतर्मुखी होती हैं और स्तोत्र/आदेश-प्राप्ति के लिए तैयार हो जाती हैं।

61 verses

Adhyaya 7

संध्यायाः शुद्धिः सूर्यलोकप्रवेशश्च — Purification of Sandhyā and Her Entry into the Solar Sphere

इस अध्याय में ब्रह्मा एक मुनि को वर देकर मेधातिथि के स्थान की ओर जाते हैं। शम्भु की कृपा से संध्या किसी को पहचान में नहीं आती, पर वह उस ब्राह्मण-ब्रह्मचारी तपस्वी को स्मरण करती है जिसने उसे तप का उपदेश दिया था—यह उपदेश वसिष्ठ ने परमेिष्ठी (ब्रह्मा) की आज्ञा से दिया था। उसी गुरु को मन में रखकर संध्या उसके प्रति पतित्व-भाव धारण करती है। महायज्ञ में प्रज्वलित अग्नि के बीच वह ऋषियों से अलक्षित रहती है, शिवानुग्रह से ही जानी जाती है और यज्ञ में प्रवेश करती है। ‘पुरोडाशमयी’ देह तत्काल अग्नि में दग्ध हो जाता है; अग्नि शिवाज्ञा से शुद्ध अंश को सूर्य-मण्डल में पहुँचा देती है। सूर्य उस रूप को तीन भागों में बाँटकर पितृ और देवताओं की तृप्ति हेतु स्थापित करता है; ऊपरी भाग प्रातः-संध्या बनता है और संध्या के त्रिविध स्वरूप का लौकिक-याज्ञिक अर्थ व्यवस्थित होता है।

27 verses

Adhyaya 8

वसन्तस्वरूपवर्णनम् — Description of the Form/Nature of Vasant(a)

इस अध्याय में सूत बताते हैं कि प्रजापति ब्रह्मा के वचन सुनकर नारद ने क्या उत्तर दिया। नारद ब्रह्मा को धन्य शिवभक्त और परम सत्य के प्रकाशक कहकर स्तुति करते हैं और शिव से सम्बद्ध एक और “पवित्र”, पाप-नाशक तथा मंगलकारी कथा सुनाने का अनुरोध करते हैं। वे विशेष रूप से पूछते हैं कि काम और उसके साथी दिखाई देकर चले जाने के बाद, संध्या के समय कौन-सा तप या कर्म किया गया और उसका क्या फल निकला। फिर ब्रह्मा नारद को शुभ शिव-लीला सुनने के लिए आमंत्रित करते हैं और उनकी भक्ति-योग्यता स्वीकारते हैं। ब्रह्मा स्वीकार करते हैं कि शिव की माया और शम्भु के वचनों के प्रभाव से वे पहले मोह में पड़े, दीर्घ मनन में रहे, और उसी आवरण में शिवा (सती/शक्ति) के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न हुई; अब वे आगे की घटना कहते हैं। अध्याय का संकेत है कि आगे का वर्णन वसन्त के स्वरूप/प्रकट रूप के माध्यम से, शिव की प्रकाशक लीला के रूप में समझाया जाएगा।

53 verses

Adhyaya 9

कामप्रभावः (कामा॑स्य प्रभाववर्णनम्) — The Power of Kāma and the (Ineffective) Attempt to Delude Śiva

अध्याय 9 में ब्रह्मा मुनिश्वर को एक अद्भुत प्रसंग सुनाते हैं। मनमथ (कामदेव) अपने गणों सहित शिवधाम जाता है और मोहकारक होकर अपना प्रभाव फैलाता है; उसी समय वसंत प्रकट होकर ऋतु-शक्ति दिखाता है, वृक्ष एक साथ पुष्पित हो उठते हैं और जगत में काम-रस बढ़ता है। रति के साथ कामदेव अनेक उपायों से सामान्य जीवों को वश में कर लेता है, पर गणेश सहित शिव पर उसका प्रभाव नहीं पड़ता। अंत में शिव के सामने उसके सारे प्रयत्न निष्फल सिद्ध होते हैं; वह लौटकर ब्रह्मा के पास विनय से कहता है कि योगपरायण शिव को न काम, न कोई अन्य शक्ति मोहित कर सकती। इस अध्याय से शिव की योग-चेतना की अजेयता और काम-मोह की सीमा प्रतिपादित होती है।

63 verses

Adhyaya 10

विष्णोर्दर्शनं स्तुतिश्च (Viṣṇu’s Manifestation and Brahmā’s Hymn)

इस अध्याय में नारद के प्रश्न पर ब्रह्मा बताते हैं कि कामदेव अपने आश्रम में गणों सहित चले जाने के बाद उनके भीतर अहंकार शान्त हुआ और शङ्कर के स्वरूप पर विस्मय जागा। वे शिव के निरविकार, जितेन्द्रिय और योगनिष्ठ होने का स्मरण कर यह विचार करते हैं कि वे सामान्य दाम्पत्य आसक्ति से परे हैं। तब ब्रह्मा शिवात्मा हरि-विष्णु की शरण लेकर भक्तिपूर्वक स्तुति और प्रार्थना करते हैं। हरि शीघ्र ही चतुर्भुज, कमलनयन, पीताम्बरधारी, गदाधर, भक्तप्रिय रूप में दर्शन देकर अनुग्रह करते हैं। आगे प्रसंग में स्तोत्र-भक्ति से कृपा की प्राप्ति तथा शिव की परात्परता और उनकी लीला-शक्ति व धर्मार्थ के रहस्य का समाधान बताया जाता है।

61 verses

Adhyaya 11

देवीयोगनिद्रास्तुतिḥ तथा चण्डिकायाः प्रादुर्भावः | Hymn to Devī Yogānidrā and the Manifestation of Caṇḍikā

इस अध्याय में नारद ब्रह्मा से पूछते हैं कि विष्णु के प्रस्थान के बाद क्या हुआ और ब्रह्मा ने क्या किया। ब्रह्मा देवी की स्तुति करते हैं—उन्हें विद्या‑अविद्या की अधिष्ठात्री, शुद्धा, परब्रह्मस्वरूपिणी, जगद्धात्री, दुर्गा, शम्भुप्रिया, त्रिदेवजननी, चिति और परम आनन्दस्वरूप, परमात्मरूपा कहा जाता है। स्तुति से प्रसन्न होकर योगनिद्रा‑रूपिणी देवी ब्रह्मा के सामने चण्डिका के रूप में प्रकट होती हैं—चार भुजाएँ, सिंह वाहन, वरद मुद्रा, तेजस्वी आभूषण, चन्द्रमुख और त्रिनेत्र। ब्रह्मा पुनः प्रणाम कर उन्हें प्रवृत्ति‑निवृत्ति, सर्ग‑स्थिति आदि विश्व‑प्रक्रियाओं की नित्य शक्ति तथा चराचर जगत को मोहित व नियंत्रित करने वाली सत्ता बताते हैं; आगे देवी के उत्तर और ब्रह्मा के निवेदन का संकेत मिलता है।

51 verses

Adhyaya 12

दक्षस्य तपः तथा जगदम्बायाः प्रत्यक्षता — Dakṣa’s Austerities and the Direct Manifestation of Jagadambā

इस अध्याय में संवाद रूप से नारद ब्रह्मा से पूछते हैं कि दृढ़-व्रत और तप करके दक्ष ने वर कैसे पाया और जगदम्बा कैसे दक्षजा (दक्ष की पुत्री) बनीं। ब्रह्मा बताते हैं कि जगदम्बा को प्राप्त करने का दिव्य अनुमोदित संकल्प लेकर दक्ष ने उन्हें हृदय में स्थिर कर क्षीरोद के उत्तरी तट पर तप आरम्भ किया। तीन हजार दिव्य वर्षों तक क्रमशः मārutāśी, निराहार, जलाहार, पर्णभुक आदि कठोर नियमों तथा यम-नियम सहित दुर्गा-ध्यान किया। अंत में देवी शिवा प्रत्यक्ष होकर प्रार्थी दक्ष को दर्शन देती हैं और वह कृतकृत्य हो जाता है। आगे वरदान की शर्तें और देवी के दक्ष-पुत्री रूप में अवतरण का तात्त्विक अर्थ—तप और अनुग्रह का संबंध—संकेतित है।

37 verses

Adhyaya 13

दक्षस्य प्रजावृद्ध्युपायः — Dakṣa’s Means for Increasing Progeny

अध्याय 13 में नारद ब्रह्मा से पूछते हैं कि हर्षित होकर आश्रम लौटने के बाद दक्ष ने क्या किया। ब्रह्मा बताते हैं कि उनके आदेश से दक्ष ने संकल्प/मानसिक सर्ग द्वारा अनेक प्रकार की सृष्टि की। पर सृष्ट प्राणियों को देखकर दक्ष ब्रह्मा से कहता है कि प्रजा बढ़ नहीं रही, जैसी उत्पन्न हुई वैसी ही ठहरी है। वह प्रजावृद्धि का व्यावहारिक उपाय मांगता है। ब्रह्मा उपदेश देते हैं कि पंचजन से संबद्ध सुंदरी कन्या असिक्नी को पत्नी रूप में ग्रहण करो, ताकि मैथुन-धर्म के द्वारा प्रजासर्ग आगे बढ़े। वे कहते हैं कि इस आज्ञा के पालन से कल्याण होगा—“शिव तुम्हारा मंगल करेंगे।” तब दक्ष विवाह कर पुत्र उत्पन्न करता है और हर्यश्व वंश का आरंभ होता है। अध्याय बताता है कि प्रजनन सृष्टि-व्यवस्था में धर्मसम्मत साधन है और शुभ फल का परम आश्रय शिव हैं।

40 verses

Adhyaya 14

दक्षस्य दुहितृविवाहवर्णनम् / The Marriages of Dakṣa’s Daughters (Genealogical Allocation)

अध्याय 14 में ब्रह्मा द्वारा दक्ष प्रजापति की वंश-व्यवस्था और कन्याओं के विवाह का वर्णन है। ब्रह्मा आकर दक्ष को शांत करते हैं, फिर उसकी साठ कन्याओं की उत्पत्ति कही गई है। इन कन्याओं का विवाह धर्म, कश्यप, सोम/चन्द्र तथा अन्य ऋषि-देवताओं से कराया जाता है, जिससे त्रिलोकों में प्रजा-विस्तार और सृष्टि का विस्तार समझाया जाता है। शिवा/सती के क्रम या स्थिति में कल्पभेद का संकेत भी मिलता है। अंत में दक्ष कन्याओं के जन्म के बाद जगदम्बिका (शिवा/सती) को भक्तिभाव से मन में धारण करता है, जो आगे यज्ञाधिकार और देवी के शैव स्वरूप के बीच तनाव का पूर्वाभास देता है।

58 verses

Adhyaya 15

सतीचरिते पितृगृहे आशीर्वाद-वचनम् तथा यौवनारम्भः — Satī at her father’s house: blessings and the onset of youth

इस अध्याय में ब्रह्मा दक्ष के गृह में सती की कथा का स्मरण कराते हैं। वे सती को पिता के समीप स्थित, त्रिलोकी का सार-स्वरूप बताते हैं। दक्ष ब्रह्मा और नारद का सत्कार कर नमस्कार करता है; सती भी लोकमर्यादा के अनुसार भक्तिपूर्वक प्रणाम करती है। फिर दक्ष द्वारा दिए गए शुभ आसन पर सती विराजती है और ब्रह्मा-नारद उपस्थित रहते हैं। ब्रह्मा आशीर्वचन देते हैं कि जिसे सती चाहे और जो सती को चाहे वही उसका पति बने—वह सर्वज्ञ जगदीश्वर है, जो न कभी दूसरी पत्नी ग्रहण करता है, न करेगा; संकेततः वही शिव हैं। कुछ समय बाद दक्ष की अनुमति से ब्रह्मा और नारद प्रस्थान करते हैं। दक्ष प्रसन्न होकर सती को परमदेवी मानने लगता है। आगे सती बाल्यावस्था से निकलकर रमणीय क्रीड़ाओं सहित यौवनारम्भ में प्रवेश करती है; तप और आन्तरिक तेज से उसका सौन्दर्य निरन्तर बढ़ता है।

67 verses

Adhyaya 16

देवर्षि-प्रश्नः तथा असुर-वध-हेतुनिवेदनम् | The Devas’ Petition and the Cause for Slaying Asuras

इस अध्याय में ब्रह्मा कहते हैं कि हरि (विष्णु) आदि की स्तुति सुनकर शंकर अत्यन्त प्रसन्न होकर मंद हास्य करते हैं। ब्रह्मा-विष्णु अपनी पत्नियों सहित आते हैं; शिव उनका विधिपूर्वक सत्कार कर आगमन का कारण पूछते हैं। रुद्र देवों और ऋषियों से सत्यपूर्वक उद्देश्य बताने को कहते हैं, क्योंकि स्तुति से वे अनुग्रहशील हैं। विष्णु की प्रेरणा से ब्रह्मा निवेदन करते हैं कि आगे अनेक असुर उत्पन्न होंगे—कुछ का वध ब्रह्मा करेंगे, कुछ का विष्णु, कुछ का शिव, और कुछ का विशेषतः शिव के वीर्य से उत्पन्न पुत्र द्वारा। कुछ असुर ‘माया-वध्य’ होंगे, जिन्हें बल से नहीं, दिव्य माया/नीति से जीता जाएगा। देवों का कल्याण और जगत का स्वास्थ्य शिव की करुणा पर निर्भर है; उनके अनुग्रह से भयानक असुर नष्ट होते हैं और संसार निर्भय होता है—यही देवों की प्रार्थना का सार है।

58 verses

Adhyaya 17

नन्दाव्रत-समाप्तिः तथा शङ्करस्य प्रत्यक्ष-दर्शनम् (Completion of the Nandā-vrata and Śiva’s Direct Appearance)

अध्याय 17 में सती के नन्दाव्रत की पूर्णता का वर्णन है। देवताओं की स्तुति के बाद सती आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को उपवास, पूजन और ध्यान करती हैं। व्रत समाप्त होते ही हर प्रत्यक्ष प्रकट होते हैं—गौर-सुन्दर देह, पंचमुख, त्रिनेत्र, चन्द्रशेखर, भस्म-दीप्त, चतुर्भुज, त्रिशूलधारी, अभय-वर मुद्रा तथा मस्तक पर गंगा सहित। सती विनयपूर्वक उनके चरणों में प्रणाम करती हैं। शिव उन्हें ‘दक्षकन्या’ कहकर व्रत से प्रसन्न होते हैं और वर मांगने को कहते हैं; भीतर की इच्छा जानते हुए भी कृपा और शिक्षा हेतु सती से अभिमत प्रकट करवाते हैं। ब्रह्मा का कथन शिव की प्रभुता और उपदेश-भाव को उभारता है।

73 verses

Adhyaya 18

सतीप्राप्तिविषये ब्रह्मरुद्रसंवादः | The Brahmā–Śiva Dialogue on Attaining Satī

इस अध्याय में अंतःसंवाद रूप कथा है। नारद अपने प्रस्थान के बाद रुद्र के पास क्या हुआ, यह ब्रह्मा से पूछते हैं। ब्रह्मा हिमालय-प्रदेश में महादेव के पास जाकर देखते हैं कि शिव सती-प्राप्ति के विषय में बार-बार संशय और विरह-व्याकुलता से भीतर ही भीतर उद्विग्न हैं। शिव लोकगति के अनुसार मानो प्राकृत-सा बोलकर देवों के ज्येष्ठ ब्रह्मा से पूछते हैं कि सती के प्रयोजन हेतु क्या उपाय किए गए और मेरे काम-ताप को शांत करने वाला वृत्तांत कहिए। वे सती के प्रति एकनिष्ठता प्रकट कर अन्य विकल्पों का त्याग करते हैं और अभेद-भाव से उनकी प्राप्ति को निश्चित बताते हैं। तब ब्रह्मा उन्हें सांत्वना देते हैं, शिव-वचन को लोकाचार-संगत मानते हैं और कहते हैं कि सती मेरी पुत्री होकर आपको ही दी जाएगी—यह विवाह पहले से ही दैवी निश्चय है; आगे के श्लोक आश्वासन, विधि-क्रम और दैवी-लोकव्यवस्था की संगति बताते हैं।

36 verses

Adhyaya 19

विष्णोः स्तुतिः—शिवसतीरक्षावचनम् (Viṣṇu’s Hymn and the Petition for Śiva–Satī’s Protection)

इस अध्याय में ब्रह्मा दक्ष के भव्य दान-विधान का वर्णन करते हैं—हर (शिव) से संतुष्ट होकर उसने ब्राह्मणों को दहेज-सदृश उपहार और दक्षिणाएँ दीं। फिर गरुड़ध्वज विष्णु लक्ष्मी सहित प्रसन्न होकर आते हैं, हाथ जोड़कर शिव की स्तुति करते हैं और उन्हें देवदेव, करुणासागर कहते हैं; शिव को समस्त प्राणियों का पिता और सती को जगन्माता मानते हैं। वे दोनों को धर्मरक्षा और दुष्ट-निग्रह हेतु लीला-अवतार बताते हुए देवों-मनुष्यों की निरंतर रक्षा तथा संसार-पथिकों के लिए मंगल की प्रार्थना करते हैं, साथ ही सती के प्रति दृष्टि या श्रवण से उत्पन्न अवैध कामना के निषेध का रक्षावचन भी माँगते हैं। शिव ‘एवमस्तु’ कहकर स्वीकार करते हैं; विष्णु अपने धाम लौटकर उत्सव कराते हैं और प्रसंग को गोपनीय रखते हैं। अंत में गृह्य-विधि तथा अग्निकार्य आदि घरेलू कर्मों का विधान बताया गया है।

76 verses

Adhyaya 20

शिवानुकम्पा, ब्रह्मणो निर्भयत्वं च (Śiva’s Compassion and Brahmā’s Fearlessness)

इस अध्याय में शंकर के ब्रह्मा को हानि न पहुँचाने के बाद देवसमाज में पुनः विश्वास और शान्ति की स्थापना का वर्णन है। नारद के पूछने पर ब्रह्मा सती–शिव का पावन, सर्वपापविनाशक प्रसंग सुनाते हैं। सभा में देवगण और पार्षद हाथ जोड़कर शंकर की स्तुति करते और जय-जयकार करते हैं; ब्रह्मा भी विविध मंगल स्तोत्र अर्पित करते हैं। प्रसन्न बहुलीलाकर शिव सबके सामने ब्रह्मा को निर्भय होने की आज्ञा देते और अपने ही मस्तक को स्पर्श करने को कहते हैं। आज्ञा मानते ही वृषभध्वज से सम्बद्ध दिव्य रूप प्रकट होता है, जिसे इन्द्रादि देव देखते हैं। यह लीला आज्ञापालन, शिव-परमत्व की सार्वजनिक पुष्टि तथा भय-अहंकार के शमन द्वारा धर्म-संतुलन की पुनर्स्थापना सिखाती है।

61 verses

Adhyaya 21

शिवसतीविवाहोत्तरलीला — Post‑marital Līlā of Śiva and Satī

इस अध्याय में नारद शिव‑सती के विवाहोत्तर शुभ आचरण का विस्तार से वर्णन पूछते हैं। ब्रह्मा विवाह‑कथा से आगे बढ़कर बताते हैं कि शिव अपने गणों सहित अपने धाम लौटते हैं और भवानाचार के अनुरूप मर्यादित जीवन में रमते हैं; यहाँ दिव्य जीवन की सामाजिक‑याज्ञिक छटा उभरती है। फिर वीरूपाक्ष दाक्षायणी के पास जाकर नंदी आदि गणों को गुहा‑सरिता आदि प्राकृतिक स्थलों से बुलाकर उनकी व्यवस्था करता है, जिससे नववधू देवी के संदर्भ में गण‑समूह का पुनर्संयोजन होता है। करुणासागर शिव लौकिक शिष्टाचार के अनुसार सेवकों से संवाद करते हैं, यह दिखाते हुए कि दिव्य शासन लोकमान्य नियमों से भी प्रकट होता है। इस प्रकार विवाहोत्तर लीला, सती के चारों ओर गणों का क्रम, और सामान्य वाणी‑समाजाचार द्वारा धर्म‑व्यवस्था का उपदेश प्रतिपादित है।

46 verses

Adhyaya 22

घनागमवर्णनम् / Description of the Monsoon’s Onset (Satī’s Address to Śiva)

अध्याय 22 में ब्रह्मा के कथन से प्रसंग आरम्भ होकर सती का शिव से सीधा संवाद आता है। घनागम/जलदागम—वर्षा ऋतु का आगमन—यहाँ भावों को तीव्र करने का साधन बनता है। सती प्रेमपूर्ण भक्तिसंबोधनों से महादेव को पुकारकर ध्यान से सुनने का अनुरोध करती है। फिर मानसून का विस्तृत चित्रण होता है—रंग-बिरंगे मेघसमूह, प्रचण्ड पवन, गर्जना, बिजली, सूर्य-चन्द्र का ढँक जाना, दिन का भी रात-सा लगना और आकाश में मेघों का सर्वत्र फैलना। हवा में वृक्ष नाचते-से दिखते हैं; आकाश भय और विरह की रंगभूमि बन जाता है। यह दृश्य सती के भीतर की व्याकुलता और विरह-भाव का बाह्य रूप है। सतीखण्ड की कथा-धारा में यह तूफानी वर्णन आगे आने वाली चिंताओं का सूचक और कैलास से जुड़े धर्म-संबंधी तनावों के लिए वातावरण रचने वाला अंतराल है।

70 verses

Adhyaya 23

सतीकृतप्रार्थना तथा परतत्त्वजिज्ञासा — Satī’s Prayer and Inquiry into the Supreme Principle

अध्याय 23 में ब्रह्मा कहते हैं कि शंकर के साथ दीर्घ दिव्य-विहार के बाद सती अंतःसंतुष्ट होकर वैराग्य-भाव में आती हैं। वे एकांत में शिव के पास जाकर साष्टांग प्रणाम और अंजलि करके गहन स्तुति करती हैं—देवदेव, महादेव, करुणासागर, पीड़ितों के रक्षक; साथ ही परम पुरुष, रज-सत्त्व-तम से परे, निर्गुण-सगुण, साक्षी और अविकार ईश्वर। फिर अपने सौभाग्य का स्मरण कर वे ‘परं तत्त्व’ का उपदेश मांगती हैं, जिससे जीव सुख पाए और संसार-दुःख को सहजता से पार कर दे; विषयासक्त भी परम पद को प्राप्त कर ‘संसारी’ न रहे। यह जिज्ञासा आदिशक्ति द्वारा लोक-कल्याण हेतु है।

56 verses

Adhyaya 24

सती-शिवचरित्रप्रसङ्गः / The Account of Satī and Śiva’s Divine Conduct (Prelude to Detailed Narrative)

इस अध्याय में नारद, शिव‑सती की मंगलमय कीर्ति सुनकर उनके आगे के दिव्य आचरण और उच्चतर महिमा का विस्तृत वर्णन पूछते हैं। ब्रह्मा बताते हैं कि यह कथा लौकिकी गति—लोक-रीति के अनुसार अपनाई हुई—में घटती है; यह साधारण कारण-कार्य नहीं, भगवान की लीला है। कहीं सती के शंकर से वियोग की बात आती है, पर तुरंत वाक्‑अर्थ की भाँति उनकी अविभाज्यता बताकर वास्तविक पृथक्करण को असंगत कहा जाता है। शिक्षार्थ लोक-मार्ग का अनुसरण करते हुए सब कुछ ईश्वरीय संकल्प से होता है। फिर दक्षयज्ञ का प्रसंग आता है—दक्षकन्या सती यज्ञ में शिव के अपमान को देखकर वहीं देह त्याग देती हैं; बाद में हिमालय में पार्वती रूप से प्रकट होकर महान तप से शिव को प्राप्त करती हैं और विवाह होता है। अंत में सूत के कथन-क्रम में नारद पुनः विधाता से इस शिव‑सती चरित्र का लौकिक आचरण सहित गूढ़ अर्थ के साथ विस्तार से वर्णन माँगते हैं, जिससे आगे की कथा का आधार बनता है।

61 verses

Adhyaya 25

दिव्य-भवन-छत्र-निर्माणः तथा देवसमाह्वानम् (Divine Pavilion and Canopy; Summoning the Gods)

अध्याय 25 में राम देवी से कहते हैं कि एक बार शंभु ने अपने दिव्य लोक में महोत्सव-व्यवस्था हेतु विश्वकर्मा को बुलाया। विश्वकर्मा ने विशाल सुंदर भवन, उत्तम सिंहासन और राजाभिषेक का संकेत देने वाला मंगलरक्षक दिव्य छत्र बनाया। फिर शिव ने शीघ्र ही समस्त देवसभा एकत्र की—इन्द्रादि देव, सिद्ध-गन्धर्व-नाग आदि, ब्रह्मा अपने पुत्रों व ऋषियों सहित, तथा देवियाँ और अप्सराएँ पूजन-उत्सव की सामग्री लेकर आईं। ‘सोलह-सोलह’ शुभ कन्याओं के समूह लाए गए और वीणा, मृदंग आदि वाद्यों-गीतों से उत्सव का वातावरण बना। अभिषेक हेतु द्रव्य, औषधियाँ और तीर्थों का जल पाँच कलशों में भरा गया तथा ऊँचा ब्रह्मघोष उठा। अंत में हरि (विष्णु) वैकुण्ठ से बुलाए गए; भक्ति से प्रसन्न शिव पूर्ण तृप्त हुए और देव-सहयोग से पावन अभिषेक-भाव प्रकट हुआ।

69 verses

Adhyaya 26

प्रयागे महत्समाजः — शिवदर्शनं दक्षागमनं च (The Great Assembly at Prayāga: Śiva’s Appearance and Dakṣa’s Arrival)

अध्याय 26 में ब्रह्मा प्रयाग में विधिपूर्वक सम्पन्न हुए एक प्राचीन महायज्ञ का वर्णन करते हैं। वहाँ सनकादि सिद्ध, महर्षि, देव और प्रजापति—ब्रह्मदर्शी ज्ञानी—एक विशाल सभा में एकत्र होते हैं। ब्रह्मा अपने परिजन सहित आते हैं; निगम और आगम ‘मूर्तिमान’ तेजस्वी प्रमाणों की भाँति उपस्थित दिखाए गए हैं, जिससे शास्त्र-परम्पराओं का समन्वय सूचित होता है। विविध सभा में अनेक शास्त्रों से ज्ञानवाद का प्रवाह उठता है। तभी भवानी के गणों सहित शिव प्रकट होते हैं—त्रिलोकी के हितैषी—और उनके आगमन से सभा का क्रम बदल जाता है। ब्रह्मा सहित देव, सिद्ध और ऋषि प्रणाम व स्तुति करते हैं; शिव की आज्ञा से सब अपने-अपने स्थान पर बैठकर दर्शन से तृप्त होकर यज्ञकर्म की चर्चा करते हैं। फिर प्रजापतियों में श्रेष्ठ तेजस्वी दक्ष आते हैं, ब्रह्मा को नमस्कार करते हैं और ब्रह्मा के कहने से आसन ग्रहण करते हैं। सुर-ऋषि उनकी स्तुति व प्रणाम से सत्कार करते हैं, और आगे होने वाले मान-गर्व तथा यज्ञ में शिव-सम्मान की अनिवार्यता का संकेत प्रकट होता है।

54 verses

Adhyaya 27

दक्षयज्ञे मुनिदेवसमागमः / The Gathering of Sages and Gods at Dakṣa’s Sacrifice

इस अध्याय में ब्रह्मा दक्ष द्वारा आरम्भ किए गए भव्य यज्ञ का वर्णन करते हैं। अनेक देवर्‍षि और मुनि—अगस्त्य, कश्यप, वामदेव, भृगु, दधीचि, व्यास, भारद्वाज, गौतम आदि—औपचारिक निमंत्रण पाकर एकत्र होते हैं, जिससे यज्ञ की वैदिक प्रतिष्ठा प्रकट होती है। देवता और लोकपाल भी शिव की माया से आच्छादित होकर आते हैं; बाहरी वैभव के भीतर छिपी अव्यवस्था का संकेत मिलता है। ब्रह्मा को सत्यलोक से लाकर सम्मानित किया जाता है और विष्णु को वैकुण्ठ से सपरिवार बुलाया जाता है। दक्ष अतिथियों का सत्कार कर त्वष्टा-निर्मित दिव्य निवास प्रदान करता है; यह सभा आगे शिव के अनादर से होने वाले विघटन की भूमिका रचती है।

56 verses

Adhyaya 28

दाक्षयज्ञप्रस्थान-प्रश्नः (Satī Inquires about the Departure for Dakṣa’s Sacrifice)

इस अध्याय में ब्रह्मा कहते हैं कि देवता और ऋषि दक्ष के यज्ञोत्सव में जा रहे हैं, जबकि सती गन्धमादन में मंडप के भीतर सखियों के साथ विहार-क्रीड़ा में रहती हैं। वे चन्द्रमा को प्रस्थान करते देखकर अपनी विश्वस्त सखी विजया को रोहिणी से पूछने भेजती हैं कि चन्द्र कहाँ जा रहे हैं। विजया चन्द्र के पास जाकर यथोचित प्रश्न करती है और दक्ष-यज्ञ का समाचार तथा उनके जाने का कारण जानकर शीघ्र लौट आती है और सती को सब बताती है। सती (कालीका) यह सुनकर विस्मित होकर विचार करती हैं—दक्ष मेरे पिता और वीरीणी मेरी माता हैं, फिर भी प्रिय पुत्री होने पर भी मुझे निमंत्रण क्यों नहीं मिला? यही अपमान आगे होने वाले प्रसंग और सती की शैव-निष्ठा से जुड़ी प्रतिक्रिया का कारण बनता है।

43 verses

Adhyaya 29

दक्षयज्ञे सत्या अपमानबोधः — Satī Encounters Disrespect at Dakṣa’s Sacrifice

इस अध्याय में सती अपने पिता दक्ष के भव्य यज्ञ में पहुँचती हैं, जहाँ देव, असुर और ऋषि एकत्र हैं। यज्ञ-स्थल की शोभा देखकर वे द्वार पर उतरकर शीघ्र भीतर जाती हैं। माता असिक्नी और बहनें उनका सत्कार करती हैं, पर दक्ष जान-बूझकर सम्मान नहीं देता; अन्य लोग शिव की माया से मोहित या भय से बँधे मौन रहते हैं। सती माता-पिता को प्रणाम करती हैं, फिर भी गहरा अपमान देखती हैं—देवताओं को भाग दिए जा रहे हैं, पर शिव के लिए कोई भाग नहीं रखा गया। क्रोध में वे दक्ष से तीखे प्रश्न करती हैं कि चराचर जगत के पावनकर्ता शम्भु को क्यों नहीं बुलाया गया। वे शैव यज्ञ-तत्त्व बताती हैं कि शिव ही यज्ञ के ज्ञाता, उसके अंग, दक्षिणा और सच्चे कर्ता हैं; अतः उनके बिना यज्ञ मूलतः दोषपूर्ण है। अध्याय दिखाता है कि शिव-स्वीकृति के बिना यज्ञ का वैभव भी आध्यात्मिक वैधता खो देता है।

64 verses

Adhyaya 30

सतीदेव्याः योगमार्गेण देहत्यागः — Satī’s Yogic Abandonment of the Body

इस अध्याय में नारद और ब्रह्मा के प्रश्नोत्तर के रूप में दक्ष के अपमान के बाद सती के आचरण का वर्णन है। सती मौन होकर अंतर्मुखी होती हैं, आचमन आदि से शुद्धि कर योगासन ग्रहण करती हैं। फिर प्राण-अपान का नियमन, उदान का जागरण और नाभि से ऊपर आंतरिक केंद्रों में चेतना का आरोहण करते हुए वे शिव-स्मरण में एकाग्र होती हैं। योग-धारणा और अंतःअग्नि के द्वारा वे अपनी इच्छा से देह का त्याग करती हैं और शरीर भस्म हो जाता है। इस घटना से देवताओं व अन्य प्राणियों में विस्मय और भय का कोलाहल उठता है—शंभु की परमप्रिया को किसने ऐसा करने को विवश किया? अध्याय आगे होने वाले दैवी परिणामों की भूमिका बनता है और योग की सर्वोच्च सत्ता तथा अधर्मजन्य अपमान व कर्मकांडीय दर्प की आलोचना करता है।

31 verses

Adhyaya 31

नभोवाणी-दक्ष-निन्दा तथा सती-माहात्म्य-प्रतिपादनम् / The Celestial Voice Rebukes Dakṣa and Proclaims Satī’s Greatness

इस अध्याय में दक्ष-यज्ञ के प्रसंग में ब्रह्मा बताते हैं कि यज्ञ-मण्डप में देवताओं आदि के सामने एक नभोवाणी प्रकट होकर दक्ष को फटकारती है। वह उसके दुराचार और कपट को धर्मनाशक तथा बुद्धिभ्रमकारी बताती है, और कहती है कि उसने दधीचि आदि के उपदेश तथा शैव दृष्टि की मर्यादा नहीं मानी। ब्राह्मण के कठोर शाप देकर यज्ञ से चले जाने पर भी दक्ष का मन नहीं सुधरता—यह भी घोषित होता है। फिर वही वाणी सती को नित्य-पूज्या, त्रिलोकी-माता, शंकर की अर्धाङ्गिनी, तथा सौभाग्य, रक्षा, इच्छित वर, यश, भुक्ति और मुक्ति देने वाली माहेश्वरी के रूप में महिमामंडित करती है। अध्याय का उद्देश्य दक्ष के अपमान पर स्पष्ट नैतिक-याज्ञिक निर्णय देना और सती के सम्मान को धर्म व यज्ञ की मंगल-सिद्धि के लिए अनिवार्य ठहराना है।

38 verses

Adhyaya 32

व्योमवाणी-श्रवणं, गणानां शरणागमनं, सती-दाह-वृत्तान्तः — Hearing the Heavenly Voice; The Gaṇas Seek Refuge; Account of Satī’s Self-Immolation

अध्याय 32 में दक्ष-यज्ञ के संघर्ष के बाद की घटनाएँ आती हैं। नारद ब्रह्मा से ‘व्योमवाणी’ के परिणाम, दक्ष आदि ने क्या किया और पराजित शिव-गण कहाँ गए—यह पूछते हैं। ब्रह्मा बताते हैं कि दिव्य घोषणा सुनकर देवता और यज्ञ-सभा के लोग स्तब्ध होकर मौन रह जाते हैं। भृगु के मंत्र-बल से पीछे हटे वीर गण फिर एकत्र होते हैं और बचे हुए गण शरण के लिए भगवान शिव के पास पहुँचते हैं। वे प्रणाम कर पूरा वृत्तांत कहते हैं—दक्ष का अहंकार, सती का अपमान, शिव के यज्ञ-भाग का निषेध, कटु वचन और देवताओं द्वारा किया गया अनादर। शिव को यज्ञ से वंचित देखकर सती का क्रोध, पिता की निंदा और अपने शरीर का दाह—इनका वर्णन होता है, जो शक्ति का निर्णायक प्रसंग बनकर दर्पयुक्त कर्मकाण्ड की खोखलापन दिखाता है। अध्याय शिव-शरणागति, ईश्वर-अपमान की गंभीरता और अधर्ममय यज्ञ के कर्म-वैश्विक परिणामों पर बल देता है।

59 verses

Adhyaya 33

वीरभद्रस्य गमनप्रस्थानम् — Vīrabhadra’s Departure for Dakṣa’s Sacrifice

अध्याय 33 में दक्ष-यज्ञ की कथा आगे बढ़ती है। शिव की आज्ञा मिलते ही शिवगण तत्क्षण जुट जाते हैं। ब्रह्मा बताते हैं कि प्रसन्न और आज्ञाकारी वीरभद्र महेश्वर को प्रणाम कर शीघ्र ही दक्ष के यज्ञ-मण्डप (मख) की ओर प्रस्थान करता है। शिव ‘शोभार्थ’ असंख्य गणों को उसके साथ भेजते हैं; वे आगे-पीछे रहकर रुद्र-स्वभाव वाले गण वीरभद्र की रक्षा और शोभा बढ़ाते हैं। शिव-वेष से अलंकृत, विशाल भुजाओं वाले, सर्पाभूषण धारण किए, रथारूढ़ वीरभद्र का भयानक तेज वर्णित है। सिंह, गज, जलचर तथा मिश्र प्राणियों आदि वाहनों और रक्षकों की सूची से यह दिव्य युद्ध-यात्रा बन जाती है। कल्पवृक्षों से पुष्पवृष्टि, गणों की स्तुति और उत्सव-हर्ष शुभ संकेत हैं। यह अध्याय देवाज्ञा से यज्ञस्थल पर होने वाले संघर्ष तक का सेतु है और शिव की सत्ता, गण-शक्ति तथा शिव का अपमान करने के अनुष्ठानिक परिणाम को उभारता है।

39 verses

Adhyaya 34

उत्पातवर्णनम् / Description of Portents at Dakṣa’s Sacrifice

इस अध्याय में ब्रह्मा दक्ष के यज्ञ-मण्डप में वीरभद्र के शिवगणों सहित पहुँचने पर प्रकट हुए उत्पातों का वर्णन करते हैं। दक्ष के शरीर में कंपकंपी आदि अशुभ लक्षण, यज्ञ-स्थल पर भूकम्प, दिन में ग्रह-नक्षत्रों की विकृति, सूर्य का वर्ण बदलना और अनेक प्रभामण्डल दिखना, उल्का/अग्नि-वृष्टि, तारों की टेढ़ी व नीचे जाती गति, गिद्ध-स्याल आदि के भयावह शब्द, धूल भरी कठोर आँधियाँ, बवंडर और ज्वलनशील वस्तुओं की वर्षा—ये सब यज्ञ-विनाश के संकेत बताए गए हैं। कथा का तात्पर्य है कि नैतिक-यज्ञीय अव्यवस्था का प्रतिबिम्ब प्रकृति में उत्पात बनकर प्रकट होता है।

27 verses

Adhyaya 35

दक्षस्य विष्णुं प्रति शरणागतिḥ — Dakṣa’s Appeal to Viṣṇu and the Teaching on Disrespect to Śiva

इस अध्याय में दक्ष विष्णु को यज्ञ-रक्षक मानकर शरण लेते हैं और प्रार्थना करते हैं कि उनका यज्ञ न टूटे तथा वे स्वयं और धर्मात्मा जन सुरक्षित रहें। ब्रह्मा बताते हैं कि भय से व्याकुल दक्ष विष्णु के चरणों में गिर पड़ते हैं। विष्णु उन्हें उठाकर, शिव-तत्त्व के ज्ञाता के रूप में शंकर का स्मरण करते हुए उत्तर देते हैं। हरि का उपदेश है कि दक्ष का मूल दोष शंकर के प्रति अवज्ञा है—जो परम अन्तरात्मा और सर्वेश्वर हैं। ईश्वर की अवज्ञा से सभी कार्य निष्फल होते हैं और बार-बार विपत्ति आती है। जहाँ अयोग्य का सम्मान और योग्य का अपमान होता है, वहाँ दरिद्रता, मृत्यु और भय—ये तीन फल होते हैं। इसलिए यज्ञ-संकट केवल कर्मकाण्ड की त्रुटि नहीं, बल्कि आध्यात्मिक-नैतिक उलटफेर है; वृषध्वज शिव का पुनः आदर आवश्यक है, क्योंकि उनके अपमान से महान संकट उत्पन्न हुआ।

54 verses

Adhyaya 36

देव-गण-समरः (Devas and Śiva’s Gaṇas Engage in Battle)

अध्याय 36 में दक्ष के यज्ञ-मण्डप में बढ़ता हुआ विवाद खुली लड़ाई में बदल जाता है। ब्रह्मा बताते हैं कि अहंकारी इन्द्र देवताओं को साथ लेकर अपने-अपने वाहनों पर आते हैं—इन्द्र ऐरावत पर, यम भैंसे पर, कुबेर पुष्पक विमान में। उनकी तैयारी देखकर रक्तरंजित और क्रुद्ध दक्ष उन्हें संबोधित कर कहता है कि यह महायज्ञ तुम्हारे बल पर आरम्भ हुआ है और इसकी सिद्धि का ‘प्रमाण’ तुम्हारी शक्ति ही है। दक्ष के वचनों से प्रेरित होकर देवगण युद्ध के लिए दौड़ पड़ते हैं। फिर देवसेना और शिव के गणों में घोर संग्राम छिड़ता है; लोकपाल शिव की माया से मोहित बताए गए हैं, जिससे उनका आक्रमण धर्मरक्षा नहीं, अज्ञानजन्य उन्माद प्रतीत होता है। शूल, बाण, भाले तथा शंख-भेरी-दुन्दुभि के नाद के साथ यज्ञभूमि रणभूमि बन जाती है और शिव-वियोग से यज्ञ में उत्पन्न ब्रह्माण्डीय अव्यवस्था प्रकट होती है।

70 verses

Adhyaya 37

वीरभद्र–देवयुद्धवर्णनम् (Vīrabhadra and the Battle with the Devas)

इस अध्याय में दाक्ष-यज्ञ के पश्चात् युद्ध का विस्तार वर्णित है। ब्रह्मा बताते हैं कि वीरभद्र हृदय में विपत्तिनाशक शंकर का स्मरण कर दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर परमास्त्र सज्ज करता और सिंह-गर्जना करता है। विष्णु पाञ्चजन्य शंख बजाते हैं, जिससे पहले भागे हुए देवता फिर रणभूमि में लौट आते हैं। तब शिवगणों और लोकपालों/वसुओं/आदित्यों के बीच भयंकर द्वन्द्व-युद्ध होता है, आकाश घोषों से गूँज उठता है। नन्दी का इन्द्र से सामना होता है और अन्य देवता भी अपने-अपने प्रतिद्वन्द्वी गणनायकों से भिड़ते हैं। युद्ध में परस्पर पराक्रम और ‘एक-दूसरे का वध’ जैसा विरोधाभासी वर्णन आता है, जो साधारण मृत्यु नहीं, अपितु पुराणोक्त दिव्य-शक्ति का नाट्य है। अध्याय शिव-स्मरण को रक्षक शरण, यज्ञ-व्यवस्था की रक्षा हेतु देव-सेना के संगठित होने, तथा गणों को शिव के सुधारक क्रोध के उपकरण के रूप में स्थापित करता है।

68 verses

Adhyaya 38

दधीच-शाप-हेतु-वर्णनम् / The Cause of Dadhīca’s Curse (Explaining Viṣṇu’s Role at Dakṣa’s Sacrifice)

अध्याय 38 में नारद जी का प्रश्न है कि जब दक्ष-यज्ञ में शिव का अपमान हुआ था, तब हरि (विष्णु) वहाँ क्यों गए और शिवगणों से युद्ध कैसे किया। नारद को आश्चर्य है कि शम्भु की प्रलय-शक्ति जानते हुए भी ऐसा करना अनुचित प्रतीत होता है। ब्रह्मा कारण बताते हैं कि पहले दधीचि ऋषि के शाप से विष्णु का सम्यक् ज्ञान क्षीण हो गया था; उसी मोहावस्था में वे देवताओं सहित दक्ष-यज्ञ में पहुँचे। फिर ब्रह्मा शाप की उत्पत्ति की कथा आरम्भ करते हैं—परम्परा में प्रसिद्ध क्षुव राजा और दधीचि की निकटता, तपस्या-संबंधी प्रसंग से तीनों लोकों में फैलता विवाद, तथा वर्णों में श्रेष्ठता का प्रश्न। शिवभक्त और वेदवेत्ता दधीचि विप्र (ब्राह्मण) की श्रेष्ठता प्रतिपादित करते हैं। इस प्रकार विष्णु का दक्ष-यज्ञ में जाना शिव-विरोध नहीं, बल्कि पूर्व धर्म-विवाद से उत्पन्न दधीचि-शाप का परिणाम बताया गया है, जिससे आगे शाप की शर्तें और धर्म, गर्व व भक्ति के तात्त्विक अर्थ स्पष्ट होंगे।

63 verses

Adhyaya 39

दधीचाश्रमगमनम् — Viṣṇu’s Disguise and Dadhīca’s Fearlessness (Kṣu’s Request)

इस अध्याय में दधीचि ऋषि के आश्रम का संवाद आता है। ब्रह्मा बताते हैं कि राजा क्षु के प्रसंग में हरि/जनार्दन विष्णु ब्राह्मण-वेष धारण कर दधीचि से वर माँगने आते हैं—यह देव-चाल है। परम शैव भक्त दधीचि रुद्र-प्रसाद से त्रिकालज्ञ होकर छद्म को पहचान लेते हैं, विष्णु से कहते हैं कि छल छोड़कर अपना वास्तविक रूप धारण करो और शंकर का स्मरण करो। वे इसे भय और सत्यनिष्ठा की परीक्षा बताते हुए घोषित करते हैं कि शिव-पूजा और शिव-स्मरण के बल से वे देवों और दैत्यों के सामने भी निर्भय हैं, और अतिथि से किसी भी आशंका को सत्यपूर्वक कहने को कहते हैं। अध्याय क्षु की ‘खल-बुद्धि’ जैसी राजनीतिक चतुराई के विपरीत शैव ऋषि के ज्ञान-अभय को रखकर आगे के वर-प्रसंग की नैतिक-धार्मिक भूमिका बनाता है।

55 verses

Adhyaya 40

दक्षयज्ञोत्तरवृत्तान्तः (Post–Dakṣa-Yajña Developments and the Appeal to Viṣṇu)

अध्याय 40 में दक्ष-यज्ञ के विध्वंस के बाद की घटनाएँ आती हैं। नारद ब्रह्मा से पूछते हैं कि वीरभद्र के कैलास लौटने के बाद क्या हुआ। ब्रह्मा बताते हैं कि रुद्रगणों से पराजित और घायल देवता व मुनि ब्रह्मलोक में आकर प्रणाम करते हैं और अपना दुःख विस्तार से कहते हैं। दक्ष को ‘पुत्र’ मानने की स्मृति और यज्ञ-व्यवस्था के टूटने से ब्रह्मा शोकाकुल होकर देव-कल्याण का उपाय सोचते हैं—दक्ष को जीवित कराकर रुका हुआ यज्ञ पूरा कराया जाए, जिससे विश्व की यज्ञ-व्यवस्था स्थिर हो। समाधान न सूझने पर वे भक्तिपूर्वक विष्णु की शरण लेते हैं, समयोचित परामर्श पाते हैं और देव-ऋषियों सहित विष्णुलोक जाकर स्तुति व प्रार्थना करते हैं कि अध्वर पूर्ण हो, दक्ष फिर यजमान बने और देव-ऋषि कल्याण प्राप्त करें; इस प्रकार विष्णु को संकटोत्तर संरक्षणकर्ता- मध्यस्थ के रूप में दिखाया गया है।

46 verses

Adhyaya 41

देवस्तुतिः—शिवस्य परब्रह्मत्वं, मायाशक्तिः, कर्मफलप्रदातृत्वं च (Devas’ Hymn: Śiva as Parabrahman, Māyā-Śakti, and Giver of Karmic Fruits)

अध्याय 41 में विष्णु आदि देव महादेव की स्तुति करते हैं। वे शिव को ईश्वर/शम्भु और परब्रह्म मानते हुए कहते हैं कि वे अपनी ‘परा माया’ से देहधारियों को मोहित भी करते हैं। शिव मन-वाणी से परे होकर भी अपनी शिवशक्ति से जगत की सृष्टि और पालन करते हैं—मकड़ी के जाल के दृष्टान्त से। वे लोक-वैदिक मर्यादाओं के सेतु, यज्ञ-क्रतु के प्रवर्तक और समस्त कर्मफलों के निरन्तर दाता हैं। श्रद्धा-शुद्धि से युक्त वैदिक ज्ञाताओं की प्रशंसा और ईर्ष्यालु, भ्रमित, कटुवचन से दूसरों को पीड़ित करने वालों की निन्दा कर देवगण शिव से कृपा तथा ऐसे विनाशकारी स्वभावों के दमन हेतु हस्तक्षेप की प्रार्थना करते हैं।

52 verses

Adhyaya 42

दक्षयज्ञ-प्रसङ्गे देवतानां आश्वासनं तथा दण्डविधानम् | Consolation of the Devas and the Ordinance of Consequences in the Dakṣa-Yajña Episode

इस अध्याय में दक्ष-यज्ञ का प्रसंग आगे बढ़ता है। ब्रह्मा बताते हैं कि ब्रह्मा तथा ईश-सम्बद्ध देवों और ऋषियों द्वारा प्रसन्न किए जाने पर शम्भु (शिव) शांत हो जाते हैं। तब वे करुणा और सुधार की भावना से विष्णु और देवताओं को आश्वासन देते हैं कि यज्ञ-विघ्न कोई मनमाना द्वेष नहीं, बल्कि माया से उत्पन्न वैर और मोह का नियत फल है; किसी को कष्ट देना या अपमानित करना धर्म नहीं। आगे यज्ञ-विवाद के सहभागी जनों के लिए दण्ड और कर्म-व्यवस्था निश्चित होती है—दक्ष का सिर बकरे के सिर से प्रतिस्थापित होता है, भग की दृष्टि नष्ट/क्षीण होती है (मित्र के प्रसंग से), पूषा के दाँत टूटते हैं और उसका भक्षण-विधान बदलता है, भृगु पर बकरे जैसी दाढ़ी का चिह्न पड़ता है। अश्विनों को पूषा से सम्बद्ध भूमिका मिलती है और अध्वर्यु/ऋत्विजों के कार्य पुनर्नियोजित होते हैं। इस प्रकार शिव की करुणामय सत्ता के अधीन यज्ञ-व्यवस्था पुनः स्थापित होती है और देवताओं के विशेष लक्षणों का पुराणिक कारण बताया जाता है।

55 verses

Adhyaya 43

भक्तिभेदाः—ज्ञानप्रधानभक्तेः प्रशंसा (Grades of Devotees and the Praise of Knowledge-Centered Devotion)

इस अध्याय में सतीखण्ड का दक्ष-यज्ञोत्तर प्रसंग समाप्त होकर कथा से हटकर स्पष्ट तत्त्वोपदेश आता है। ब्रह्मा कहते हैं कि रमेश (विष्णु), ब्रह्मा तथा देव-ऋषियों की स्तुति से महादेव प्रसन्न होते हैं। शम्भु करुणा-दृष्टि से सबको देखकर सीधे दक्ष से बोलते हैं। वे कहते हैं कि वे सर्वस्वतंत्र जगदीश्वर होकर भी स्वेच्छा से ‘भक्तों के अधीन’ रहते हैं। फिर वे उपासकों के चार भेद बताते हैं—आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी—और क्रमशः श्रेष्ठता बताकर ज्ञानी को सबसे उत्तम व प्रिय कहते हैं, क्योंकि वह शिव-स्वभाव से एकरूप होता है। वेदान्त-श्रुति में स्थित आत्मज्ञान से ही शिव-प्राप्ति होती है; ज्ञानहीन लोग सीमित समझ से प्रयत्न करते हैं। केवल कर्मबद्ध वेद-पाठ, यज्ञ, दान और तप, यदि बाह्य कर्म मात्र हों, तो शिव-साक्षात्कार नहीं देते—यह भी प्रतिपादित है। इस प्रकार यज्ञ-विध्वंस प्रसंग को कर्मकाण्ड-आसक्ति की आलोचना और ज्ञानयुक्त भक्ति द्वारा मुक्ति के मार्ग के रूप में स्थापित किया गया है।

44 verses