
इस अध्याय में ब्रह्मा दक्ष के यज्ञ-मण्डप में वीरभद्र के शिवगणों सहित पहुँचने पर प्रकट हुए उत्पातों का वर्णन करते हैं। दक्ष के शरीर में कंपकंपी आदि अशुभ लक्षण, यज्ञ-स्थल पर भूकम्प, दिन में ग्रह-नक्षत्रों की विकृति, सूर्य का वर्ण बदलना और अनेक प्रभामण्डल दिखना, उल्का/अग्नि-वृष्टि, तारों की टेढ़ी व नीचे जाती गति, गिद्ध-स्याल आदि के भयावह शब्द, धूल भरी कठोर आँधियाँ, बवंडर और ज्वलनशील वस्तुओं की वर्षा—ये सब यज्ञ-विनाश के संकेत बताए गए हैं। कथा का तात्पर्य है कि नैतिक-यज्ञीय अव्यवस्था का प्रतिबिम्ब प्रकृति में उत्पात बनकर प्रकट होता है।
Verse 1
ब्रह्मोवाच । एवं प्रचलिते चास्मिन् वीरभद्रे गणान्विते । दुष्टचिह्नानि दक्षेण दृष्टानि विबुधैरपि
ब्रह्मा बोले—जब गणों सहित वीरभद्र इस प्रकार प्रचलित हुआ, तब दक्ष ने, और देवताओं ने भी, विनाशसूचक दुष्ट-चिह्न देखे।
Verse 2
उत्पाता विविधाश्चासन् वीरभद्रे गणान्विते । त्रिविधा अपि देवर्षे यज्ञविध्वंससूचकाः
हे देवर्षि! गणों से युक्त वीरभद्र के उपस्थित होते ही अनेक प्रकार के उत्पात प्रकट हुए—वे तीन प्रकार के थे—और यज्ञ-विध्वंस के सूचक बने।
Verse 3
दक्षवामाक्षिबाहूरुविस्पंदस्समजायत । नानाकष्टप्रदस्तात सर्वथाऽशुभसूचकः
तब दक्ष की बाईं आँख, बाँह और जाँघ फड़कने लगी। हे प्रिय! वह सर्वथा अशुभ का सूचक था और अनेक कष्टों को देने वाला था।
Verse 4
भूकंपस्समभूत्तत्र दक्षयागस्थले तदा । दक्षोपश्यच्च मध्याह्ने नक्षत्राण्यद्भुतानि च
तब उसी समय दक्ष के यज्ञ-स्थल में भूकम्प हुआ। और दक्ष ने मध्याह्न में भी नक्षत्रों में अद्भुत, अस्वाभाविक लक्षण देखे।
Verse 5
दिशश्चासन्सुमलिनाः कर्बुरोभूद्दिवाकरः । परिवेषसहस्रेण संक्रांतश्च भयंकरः
दिशाएँ अत्यन्त मलिन हो गईं, सूर्य धब्बेदार-सा मन्द पड़ गया; हजारों परिवेषों से घिरकर वह भयंकर संक्रान्ति-सा हो उठा।
Verse 6
नक्षत्राणि पतंति स्म विद्युदग्निप्रभाणि च । नक्षत्राणामभूद्वक्रा गतिश्चाधोमुखी तदा
तब नक्षत्र मानो गिरने लगे, बिजली और अग्नि-प्रभा की भाँति चमकते हुए; नक्षत्रों की गति विकृत हो गई और उनका प्रवाह नीचे की ओर हो गया।
Verse 7
गृध्रा दक्ष शिरः स्पृष्ट्वा समुद्भूताः सहस्रशः । आसीद्गृध्रपक्षच्छायैस्सच्छायो यागमंडपः
गिद्धों ने दक्ष के कटे हुए सिर को छूते ही वे हजारों की संख्या में उमड़ पड़े; उनके पंखों की छाया से यज्ञमण्डप घनी, अशुभ छाया से ढक गया।
Verse 8
ववाशिरे यागभूमौ क्रोष्टारो नेत्रकस्तदा । उल्कावृष्टिरभूत्तत्र श्वेतवृश्चिकसंभवा
तब यज्ञभूमि में सियारों ने हुआँ-हुआँ की, और आँखों के सामने भयानक अपशकुन प्रकट हुए। वहाँ श्वेत बिच्छुओं से उत्पन्न-सी उल्काओं की वर्षा हुई॥
Verse 9
खरा वाता ववुस्तत्र पांशुवृष्टिसमन्विताः । शलभाश्च समुद्भूता विवर्तानिलकंपिताः
वहाँ धूल-वर्षा के साथ प्रचण्ड पवन चलने लगे। टिड्डियों के झुंड भी उठ खड़े हुए, जो बवंडरी झोंकों से काँपते-उड़ते रहे॥
Verse 10
रीतैश्च पवनै रूर्द्ध्वं स दक्षाध्वरमंडपः । दैवान्वितेन दक्षेण यः कृतो नूतनोद्भुतः
तब उच्छृंखल प्रचण्ड पवनों ने उस अद्भुत नवनिर्मित दक्ष-यज्ञमण्डप को—जो देवताओं सहित दक्ष ने बनाया था—ऊपर उछालकर तितर-बितर कर दिया।
Verse 11
वेमुर्दक्षादयस्सर्वे तदा शोणितमद्भुतम् । वेमुश्च मांसखण्डानि सशल्यानि मुहुर्मुहुः
तब दक्ष आदि सभी ने अद्भुत रूप से रक्त की धाराएँ वमन कीं; और बार-बार वे काँटों-शल्य सहित मांस के खण्ड भी उगलने लगे—यह शिवापराध से उत्पन्न विनाश का भयानक लक्षण था।
Verse 12
सकंपाश्च बभूवुस्ते दीपा वातहता इव । दुःखिताश्चाभवन्सर्वे शस्त्रधाराहता इव
वे सब वायु से आहत दीपकों की भाँति काँप उठे; और शस्त्र की धार से कटे हुए-से सबके सब शोकाकुल हो गए।
Verse 13
तदा निनादजातानि बाष्पवर्षाणि तत्क्षणे । प्रातस्तुषारवर्षीणि पद्मानीव वनांतरे
तभी उसी क्षण करुण-निनाद उठते ही आँसुओं की वर्षा होने लगी—जैसे वन में प्रातःकाल ओस की बूँदों से पद्म झर-झर कर उठते हों।
Verse 14
दक्षाद्यक्षीणि जातानि ह्यकस्माद्विशदान्यपि । निशायां कमलाश्चैव कुमुदानीव संगवे
दक्ष आदि की आँखें भी अकस्मात् क्षीण, फीकी और तेजहीन हो गईं; और दिन में खिलने वाले कमल-से मुख भी रात्रि में म्लान, मानो प्रभात में कुमुदिनी-से, संकुचित प्रतीत हुए।
Verse 15
असृग्ववर्ष देवश्च तिमिरेणावृता दिशः । दिग्दाहोभूद्विशेषेण त्रासयन् सकलाञ्जनान्
तब भयंकर अपशकुन हुआ—रक्त की वर्षा होने लगी, दिशाएँ अन्धकार से ढँक गईं, और चारों ओर विशेष रूप से दिग्दाह भड़क उठा, जिससे समस्त जन भयभीत हो गए।
Verse 16
एवं विधान्यरिष्टानि ददृशुर्विबुधादयः । भयमापेदिरेऽत्यंतं मुने विष्ण्वादिकास्तदा
ऐसे अशुभ निमित्तों को देखकर देवगण आदि अत्यन्त भयभीत हो गए; हे मुनि, उस समय विष्णु आदि भी महान् भय से व्याकुल हो उठे।
Verse 17
भुवि ते मूर्छिताः पेतुर्हा हताः स्म इतीरयन् । तरवस्तीरसंजाता नदीवेगहता इव
वे ‘हाय! हम मारे गए!’ ऐसा पुकारते हुए मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े—जैसे बाढ़ के वेग से तट के वृक्ष उखड़कर गिर जाते हैं।
Verse 18
पतित्वा ते स्थिता भूमौ क्रूराः सर्पा हता इव । कंदुका इव ते भूयः पतिताः पुनरुत्थिताः
गिरकर वे भूमि पर ऐसे पड़े रहे जैसे मारे गए भयंकर सर्प। फिर वे गेंदों की भाँति उछलते हुए बार-बार गिरते और उठते रहे।
Verse 19
ततस्ते तापसंतप्ता रुरुदुः कुररी इव । रोदनध्वनिसंक्रातोरुक्तिप्रत्युक्तिका इव
तब तप और शोक की ज्वाला से संतप्त होकर वे कुररी पक्षी की भाँति रो पड़े; और उनका रुदन-ध्वनि आकाश में प्रतिध्वनि-सा, पुकार और प्रत्युत्तर की तरह गूँजता रहा।
Verse 20
सवैकुंठास्ततस्सर्वे तदा कुंठितशक्तयः । स्वस्वोपकंठमाकंठं लुलुठुः कमठा इव
तब वे सब—अपने-अपने वैकुण्ठादि धामों में रहते हुए भी—शक्ति-हीन हो गए। अपने-अपने स्थान के निकट वे कंठ तक धँसकर, कछुओं की भाँति, निढाल होकर पड़े रहे।
Verse 21
एतस्मिन्नंतरे तत्र संजाता चाशरीरवाक् । श्रावयत्यखिलान् देवान्दक्षं चैव विशेषतः
उसी क्षण वहाँ एक अशरीरी वाणी प्रकट हुई। उसने समस्त देवताओं को सुनाया और विशेषतः दक्ष को संबोधित किया।
Verse 22
आकाशवाण्युवाच । धिक् जन्म तव दक्षाद्य महामूढोसि पापधीः । भविष्यति महद्दुःखमनिवार्यं हरोद्भवम्
आकाशवाणी बोली—“धिक्कार है तुम्हारे जन्म को, हे दक्ष आदि! तुम महा-मूढ़ हो, पाप-बुद्धि वाले हो। हर (शिव) से उत्पन्न होने वाला महान दुःख, जो टल नहीं सकेगा, अवश्य होगा।”
Verse 23
हाहापि नोत्र ये मूढास्तव देवादयस्थिताः । तेषामपि महादुःखं भविष्यति न संशयः
“हाय! जो मूढ़ देव आदि यहाँ तुम्हारे पक्ष में खड़े हैं, उन्हें भी महान दुःख होगा—इसमें कोई संशय नहीं।”
Verse 24
ब्रह्मोवाच तच्छ्रुत्वाकाशवचनं दृष्ट्वारिष्टानि तानि च । दक्षः प्रापद्भयं चाति परे देवादयोपि ह
ब्रह्मा बोले—आकाशवाणी को सुनकर और उन अपशकुनों को देखकर, दक्ष अत्यन्त भय को प्राप्त हुआ; और अन्य देव तथा दिव्य जन भी भयभीत हो गए।
Verse 25
वेपमानस्तदा दक्षो विकलश्चाति चेतसि । अगच्छच्छरणं विष्णोः स्वप्रभोरिंदिरापतेः
तब दक्ष काँपते हुए और चित्त से अत्यन्त व्याकुल होकर, अपने स्वामी—इन्दिरापति विष्णु—की शरण में गया।
Verse 26
सुप्रणम्य भयाविष्टः संस्तूय च विचेतनः । अवोचद्देवदेवं तं विष्णुं स्वजनवत्सलम्
वह भय से व्याकुल होकर गहरे प्रणाम कर, मानो चेतना डगमगा गई हो, स्तुति करके अपने भक्तों पर स्नेह रखने वाले देवदेव विष्णु से बोला।
Verse 34
इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां द्वितीये सती खंडे दुश्शकुनदर्शनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण की द्वितीय रुद्रसंहिता के द्वितीय सतीखण्ड में ‘दुश्शकुनदर्शन’ नामक चौंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
The emergence of pervasive omens at Dakṣa’s sacrificial arena as Vīrabhadra and Śiva’s gaṇas advance—signals that the dakṣayajña is fated to be disrupted and ruined.
They portray ṛta (cosmic order) reacting to ritual-moral disorder: a yajña performed with pride and disrespect toward Śiva becomes cosmically unsustainable, and nature itself ‘speaks’ the impending correction.
Bodily inauspicious tremors in Dakṣa, earthquake at the yajña-site, midday astral anomalies, a discolored sun with many halos, falling fiery lights, abnormal star-movements, vultures and jackals at the arena, meteor-like showers, dust-storm winds, and swarming insects.