Purva Bhaga41 Adhyayas3558 Shlokas

First Quarter

Prathama Pada

Adhyayas in First Quarter

Adhyaya 1

Maṅgalācaraṇa, Naimiṣāraṇya-Sabhā, Sūta-Āhvāna, and Narada Purāṇa-Māhātmya

यह अध्याय गुरु, गणेश, वासुदेव/नारायण, नर–नरोत्तम और सरस्वती के मंगलाचरण से आरम्भ होकर आदिपुरुष की स्तुति करता है, जिनके अंश ब्रह्मा–विष्णु–महेश रूप से जगत् का संचालन करते हैं। नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषि तप, यज्ञ, ज्ञान और भक्ति से विष्णु की आराधना कर धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की समन्वित साधना पूछते हैं। वे व्यास-शिष्य, अधिकृत पुराण-वक्ता सूत रोमहर्षण को सिद्धाश्रम में जानकर वहाँ जाते हैं और नारायण-संबद्ध अग्निष्टोम यज्ञ का प्रसंग तथा अवभृथ-समापन की प्रतीक्षा देखते हैं। ऋषि ‘अतिथि-सत्कार रूप ज्ञान’ माँगकर विष्णु-प्रसन्नता, विधिवत पूजा, वर्णाश्रम-आचार, अतिथि-धर्म, फलदायी कर्म और मोक्षदायिनी भक्ति के स्वरूप पर प्रश्न करते हैं। सूत कहते हैं कि वे वही बताएँगे जो सनकादि ने नारद को गाया; फिर नारदपुराण की वेद-संगति, पाप-नाशक शक्ति, अध्याय-श्रवण/पाठ के क्रमिक फल, तथा कथा-शिष्टाचार और अधिकार का विधान बताते हैं। अंत में नारायण-स्मरण और एकाग्र श्रवण से भक्ति उत्पन्न होकर सभी पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं—यही मोक्षधर्म का सार है।

80 verses

Adhyaya 2

Nārada’s Hymn to Viṣṇu (Nāradasya Viṣṇu-stavaḥ)

ऋषियों के प्रश्न पर सूत सनकादि कुमारों का वर्णन करते हैं—वे ब्रह्मा के मानसपुत्र, ब्रह्मचारी और मोक्षपरायण होकर मेरु से ब्रह्मसभा की ओर जा रहे थे। मार्ग में वे विष्णु की पावन नदी गंगा को देखकर सीता-जल में स्नान की इच्छा करते हैं। तभी नारद आते हैं, ज्येष्ठ भ्राताओं को प्रणाम कर नारायण, अच्युत, अनन्त, वासुदेव, जनार्दन आदि नामों का जप करते हुए विस्तृत विष्णु-स्तोत्र गाते हैं। स्तोत्र में विष्णु को सगुण-निर्गुण, ज्ञान और ज्ञाता, योग और योग से प्राप्त, तथा विश्वरूप होकर भी असंग बताया गया है; कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, कल्कि आदि अवतारों का कीर्तन और नाम की शुद्धि-मोक्षदायिनी महिमा बार-बार कही गई है। स्नान कर संध्या-तर्पण के बाद मुनि हरिकथा में प्रवृत्त होते हैं; फिर नारद भगवान के लक्षण, फलदायी कर्म, सत्य ज्ञान, तप और अतिथि-सत्कार की विधि पूछते हैं जो विष्णु को प्रिय हो। अंत में फलश्रुति है—प्रातः पाठ से पवित्रता और विष्णुलोक की प्राप्ति।

58 verses

Adhyaya 3

Sṛṣṭi-varṇana, Bhārata-khaṇḍa-mahātmya, and Jagad-bhūgola (Creation, Glory of Bhārata, and World Geography)

नारद जी सनक से पूछते हैं कि आद्य सर्वव्यापी भगवान ने ब्रह्मा और देवताओं को कैसे उत्पन्न किया। सनक विष्णु-केन्द्रित अद्वैत सिद्धान्त बताते हैं—नारायण सर्वत्र व्याप्त हैं; सृष्टि, पालन और संहार के लिए प्रजापति/ब्रह्मा, रुद्र और विष्णु का त्रिरूप प्रकट होता है। माया/शक्ति को विद्या और अविद्या दोनों कहा गया है—भेद मानने पर बन्धन, अभेद जानने पर मुक्ति। फिर सांख्य-सदृश सृष्टि-क्रम (प्रकृति–पुरुष–काल; महत्, बुद्धि, अहंकार; तन्मात्राएँ और महाभूत) तथा ब्रह्मा की आगे की रचनाएँ वर्णित हैं। सात ऊर्ध्व लोक, पाताल आदि, मेरु, लोकालोक, सात द्वीप और उनके समुद्र, तथा भारतवर्ष को कर्मभूमि कहा गया है। अंत में भक्ति और निष्काम कर्म की महिमा—सब कर्म हरि/वासुदेव को अर्पित करना, भक्तों का सम्मान, नारायण और शिव को अभिन्न देखना, और यह निश्चय कि वासुदेव के अतिरिक्त कुछ भी नहीं।

84 verses

Adhyaya 4

Bhakti-Śraddhā-Ācāra-Māhātmya and the Commencement of the Mārkaṇḍeya Narrative

सनक नारद को बताते हैं कि श्रद्धा समस्त धर्म का मूल है और भक्ति सभी सिद्धियों का प्राण है; भक्ति के बिना दान, तप और अश्वमेध-सदृश यज्ञ भी निष्फल हैं, पर श्रद्धा से किया गया छोटा-सा कर्म भी स्थायी पुण्य और कीर्ति देता है। वे भक्ति को वर्णाश्रम-आचार से जोड़कर कहते हैं कि विहित आचार का त्याग करने वाला ‘पतित’ है; आचार-भ्रष्ट को न वेदान्त-ज्ञान, न तीर्थ, न यज्ञ बचा सकते। भक्ति सत्संग से उत्पन्न होती है, और सत्संग पूर्व-पुण्य से मिलता है; सज्जन उपदेश से भीतर का अंधकार दूर करते हैं। नारद भक्तों के लक्षण और गति पूछते हैं, तब सनक मार्कण्डेय के गुप्त उपदेश का आरम्भ करते हैं। आगे प्रलय में विष्णु को परम प्रकाश, क्षीरसागर में देवताओं की स्तुति और विष्णु का आश्वासन वर्णित है। मृकण्डु की तपस्या और स्तोत्र से विष्णु प्रसन्न होकर वर देते हैं कि वे उनके पुत्र रूप में अवतरित होंगे—इस प्रकार कथा में भक्ति की तारक शक्ति स्थापित होती है।

100 verses

Adhyaya 5

Mārkaṇḍeya-varṇanam (The Description of Mārkaṇḍeya)

नारद पूछते हैं—भगवान् मृकण्डु के पुत्र कैसे बने और प्रलय में मार्कण्डेय ने विष्णु की माया कैसे देखी। सनक कहते हैं—मृकण्डु गृहस्थ बने; हरि के तेज से पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका उपनयन हुआ। पिता ने संध्या-पूजा, वेदाध्ययन, संयम, कटु/हानिकारक वाणी से बचना और वैष्णव सत्पुरुषों का संग सिखाया। मार्कण्डेय ने अच्युत के लिए तप किया, पुराण-संहिता से जुड़ा सामर्थ्य पाया और प्रलय में जल पर पत्ते की तरह रहकर योगनिद्रा में स्थित हरि को देखा। फिर निमेष से कल्प, मन्वंतर, ब्रह्मा के दिन-रात और परार्ध तक काल-गणना बताई जाती है। सृष्टि लौटने पर वह जनार्दन की स्तुति करता है; भगवान् भागवत-लक्षण बताते हैं—अहिंसा, अद्वेष, दान, एकादशी, तुलसी-सेवा, माता-पिता/गौ/ब्राह्मण-सेवा, तीर्थयात्रा और शिव-विष्णु में समभाव। शालग्राम में ध्यान व धर्म से उसे निर्वाण मिलता है।

84 verses

Adhyaya 6

The Greatness of the Gaṅgā (Gaṅgāmāhātmya)

सूता नारद का वर्णन करते हैं—भक्ति से प्रसन्न नारद, शास्त्रार्थ-वेत्ता सनक से पूछते हैं कि कौन-सा क्षेत्र और कौन-सा तीर्थ सर्वोत्तम है। सनक ‘रहस्य’ ब्रह्म-उपदेश के साथ तीर्थ-प्रशंसा करते हुए प्रयाग में गंगा–यमुना संगम को सभी क्षेत्रों-तीर्थों में परम श्रेष्ठ बताते हैं, जहाँ देव, ऋषि और मनु आते हैं। गंगा की पवित्रता (विष्णु-पाद से उत्पत्ति) का महात्म्य कहा गया—नाम-स्मरण, उच्चारण, दर्शन, स्पर्श, स्नान और एक बूंद से भी पाप-नाश व उच्च गति मिलती है। फिर काशी/वाराणसी (अविमुक्त) की स्तुति और मृत्यु-समय स्मरण से शिव-पद की प्राप्ति बताई, पर संगम को उससे भी अधिक महिमामय कहा। हरि और शंकर (तथा ब्रह्मा) की अभिन्नता का सिद्धान्त देकर संप्रदाय-भेद करने से रोका गया। अंत में पुराण-पाठ और वक्ता का सम्मान गंगा/प्रयाग के पुण्य के तुल्य बताया गया तथा गंगा, गायत्री और तुलसी को दुर्लभ तारक आधार कहा गया।

71 verses

Adhyaya 7

Gaṅgā-māhātmya: Bāhu’s Envy, Defeat, Forest Exile, and Aurva’s Dharmic Consolation

नारद जी सनक से सगर-वंश और उस पुरुष के विषय में पूछते हैं जो दैत्य-स्वभाव से मुक्त हुआ। सनक पहले गंगा की परम पावनता बताते हैं—उनके स्पर्श से सगर-कुल शुद्ध होकर विष्णु-धाम को प्राप्त होता है। फिर विकु-वंश के राजा बाहु की कथा आती है: वह धर्मात्मा होकर सात अश्वमेध करता और वर्ण-धर्म स्थापित करता है, पर समृद्धि से अहंकार और ईर्ष्या बढ़ती है। आगे नीति-उपदेश है कि ईर्ष्या, कठोर वाणी, कामना और दंभ विवेक व लक्ष्मी का नाश करते हैं और अपने ही जन शत्रु बन जाते हैं। विष्णु-कृपा हटते ही हैहय और तालजंघ शत्रु बाहु को हराते हैं; वह गर्भवती रानियों सहित वन में जाता है और और्व ऋषि के आश्रम के पास अपमानित होकर मर जाता है। शोक में गर्भवती रानी बाहुप्रिया चिता पर चढ़ना चाहती है, पर और्व ऋषि धर्म का स्मरण कराकर गर्भस्थ भावी चक्रवर्ती के कारण उसे रोकते हैं, कर्माधीन मृत्यु की अनिवार्यता बताते हैं और विधिपूर्वक अंत्येष्टि कराते हैं। दाह के बाद बाहु दिव्य विमान से स्वर्ग जाता है; रानी और्व की सेवा करती है; अध्याय करुणा और लोक-हितकारी वाणी को विष्णु-सदृश बताकर समाप्त होता है।

77 verses

Adhyaya 8

गङ्गामाहात्म्य — The Greatness of the Gaṅgā

सनक नारद से कहते हैं—राजा बाहु की दोनों रानियाँ ऋषि और्व की सेवा करती हैं। बड़ी रानी विष देने का प्रयास करती है, पर साधु-सेवा के प्रभाव से छोटी रानी सुरक्षित रहती है और पचे हुए ‘गर’ विष के कारण ‘सगर’ नामक पुत्र को जन्म देती है। और्व ऋषि संस्कार कर सगर को राजधर्म तथा मंत्र-सम्पन्न अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा देते हैं। सगर अपने वंश का पता कर अत्याचारियों को जीतने का संकल्प लेकर वसिष्ठ के पास जाते हैं; वसिष्ठ शत्रु जातियों को अनुशासित कर कर्म-नियति और आत्मा की अवध्यता का उपदेश देकर उनका क्रोध शांत करते हैं। अभिषिक्त होकर सगर अश्वमेध करते हैं; इन्द्र घोड़ा चुरा कर पाताल में कपिल मुनि के पास छिपा देता है। सगर के पुत्र पृथ्वी खोदते हुए कपिल के सामने पहुँचते हैं और उनके तेज से भस्म हो जाते हैं। अंशुमान विनय व स्तुति से वर पाते हैं कि आगे चलकर भगीरथ गंगा को उतारेंगे; गंगा-जल पितरों को शुद्ध कर मोक्ष देगा। अंत में भगीरथ तक वंश-परंपरा और गंगा की शाप-निवारक शक्ति (सौदास) कही गई है।

139 verses

Adhyaya 9

The Greatness of the Gaṅgā (Gaṅgā-māhātmya): Saudāsa/Kalmāṣapāda’s Curse and Release

नारद जी ने सनक से पूछा कि राजा सौदास (मित्रसह) कैसे वसिष्ठ द्वारा शापित हुए और गंगा की बूंदों से पवित्र हुए। सनक ने बताया: रेवा तट पर शिकार के दौरान राजा ने एक राक्षसी (बाघिन) को मारा, जिसके पति ने बदला लेने की ठानी। अश्वमेध के बाद, राक्षस ने वसिष्ठ का रूप धरकर राजा को मांस परोसने के लिए उकसाया। असली वसिष्ठ ने क्रोधित होकर राजा को बारह वर्षों तक राक्षस बनने का श्राप दिया, जिसका निवारण गंगा जल से बताया। शाप का जल पैरों पर गिरने से राजा 'कल्माषपाद' कहलाए। राक्षस रूप में उन्होंने पाप किए, लेकिन अंततः एक ब्राह्मण द्वारा गंगा जल और तुलसी के छिड़काव से वे और एक पिशाची मुक्त हुए। राजा ने वाराणसी जाकर गंगा स्नान किया और सदाशिव के दर्शन कर मोक्ष प्राप्त किया।

149 verses

Adhyaya 10

The Origin of the Gaṅgā and the Gods’ Defeat Caused by Bali

नारद जी सनक से गंगा की उत्पत्ति पूछते हैं—जो विष्णु के चरणाग्र से प्रकट हुई और वक्ता-श्रोता के पापों का नाश करने वाली है। सनक देव-दैत्य वंश का प्रसंग बताते हैं: कश्यप की पत्नियाँ अदिति और दिति से देव और दैत्य उत्पन्न हुए; वैर हिरण्यकशिपु की परंपरा में प्रह्लाद, विरोचन और महाबली बलि तक पहुँचा। बलि विशाल सेना लेकर इन्द्रपुरी पर चढ़ आया; भयंकर युद्ध में शंख-नाद, अस्त्र-शस्त्र और लोककंपन का वर्णन है। आठ हजार वर्षों के बाद देव पराजित होकर भागते हैं और पृथ्वी पर छद्मवेश में भटकते हैं। बलि समृद्ध होकर विष्णु-प्रसन्नता हेतु अश्वमेध यज्ञ करता है, पर अदिति पुत्रों का राज्य छिनने से शोकाकुल होती है। वह हिमालय जाकर हरि को सच्चिदानन्द रूप में ध्यान करती हुई कठोर तप करती है। दैत्य-मायावी उसे देह-परिमाण और मातृधर्म की दुहाई देकर रोकना चाहते हैं; असफल होकर आक्रमण करते हैं, पर भस्म हो जाते हैं। देवों पर करुणा से विष्णु का सुदर्शन चक्र सौ वर्षों तक अदिति की रक्षा करता है।

53 verses

Adhyaya 11

Vāmana’s Advent, Aditi’s Hymn, Bali’s Gift, and the Mahatmya of Bhū-dāna

नारद पूछते हैं कि दावानल से अदिति कैसे बचीं। सनक बताते हैं कि हरि-भक्ति मनुष्य और उसके स्थान को पवित्र कर देती है; वहाँ आपदा, रोग, चोर और दुष्ट शक्तियाँ टिक नहीं पातीं। विष्णु अदिति को दर्शन देकर वर देते हैं; अदिति उनके निर्गुण-सगुण परात्परत्व, विराट्-शरीर, वेदमय स्वरूप और शिव-एकत्व का विस्तृत स्तोत्र गाती हैं। भगवान् उनके पुत्र बनने का वचन देते हैं और ‘विष्णु को धारण करने वालों’ के आंतरिक लक्षण बताते हैं—अहिंसा, सत्य, निष्ठा/पातिव्रत्य, गुरु-सेवा, तीर्थ-रुचि, तुलसी-पूजन, नाम-संकीर्तन और गो-रक्षा। अदिति से वामन का जन्म होता है; कश्यप स्तुति करते हैं। बलि के सोमयज्ञ में शुक्र दान से रोकते हैं, पर बलि विष्णु को दान-धर्म मानकर अडिग रहता है। वामन तीन पग भूमि माँगते हैं, वैराग्य और अंतर्यामी-तत्त्व सिखाते हैं तथा भूदाने का महात्म्य—भद्रमती-सुघोष की कथा और क्रमशः फल—विस्तार से कहते हैं। फिर विष्णु विराट होकर लोकों को नापते, ब्रह्माण्ड भेदते हैं; उनके चरणोदक से गंगा प्रकट होती है। बलि बँधकर भी रसातल पाता है और विष्णु उसके द्वारपाल बनते हैं। अंत में गंगा और इस कथा-श्रवण के पुण्य की प्रशंसा होती है।

197 verses

Adhyaya 12

Dharma-ākhyāna (Discourse on Dharma): Worthy Charity, Fruitless Gifts, and the Merit of Building Ponds

गंगा के पाप-नाशक माहात्म्य को सुनकर नारद, सनक से दान के योग्य पात्र के लक्षण पूछते हैं। सनक कहते हैं कि अविनाशी फल के लिए दान योग्य ब्राह्मणों को ही देना चाहिए और प्रतिग्रह (दान-स्वीकार) की मर्यादाएँ बताते हैं। फिर दम्भ, ईर्ष्या, व्यभिचार, हिंसक/अधर्म-जीविका, अशुद्ध याजन, तथा धर्म-कर्म का व्यापार करने वालों आदि को दिया दान ‘निष्फल’ कहा गया है। दान का मूल्य भाव से है—श्रद्धा से विष्णु-पूजा रूप दान सर्वोत्तम; कामना से, या क्रोध-तिरस्कार सहित, अथवा अपात्र को दिया दान मध्यम/अधम। धन का श्रेष्ठ उपयोग परोपकार है; दूसरों के लिए जीना ही सच्चा जीवन है। आगे धर्मराज भगिरथ की प्रशंसा कर धर्म-अधर्म का संक्षिप्त उपदेश देते हैं और ब्राह्मण-सेवा तथा तालाब/पुण्य-जलाशय निर्माण का महान फल बताते हैं। जल-कार्य—खोदना, कीचड़ हटाना, बाँध बनाना, वृक्ष लगाना, दूसरों को प्रेरित करना—पाप नाशकर स्वर्ग-प्रद कहा गया है।

97 verses

Adhyaya 13

Dharmānukathana (Narration of Dharma)

इस अध्याय में धर्मराज राजा को उपदेश देते हुए ऐसे धर्मकर्म बताते हैं जिनसे फल क्रमशः बढ़ता है। शिव या हरि के मंदिर का निर्माण, यहाँ तक कि मिट्टी का छोटा देवालय भी, अनेक कल्पों तक विष्णुलोक में वास देता है; फिर ब्रह्मपुर, स्वर्ग आदि की उन्नति होकर अंत में योगजन्म और मोक्ष की प्राप्ति होती है। लकड़ी, ईंट, पत्थर, स्फटिक, ताँबा, सोना आदि सामग्री के अनुसार तथा सफाई, लेपन, छिड़काव, सजावट, संरक्षण जैसी सेवाओं से पुण्य कई गुना बढ़ता है। तालाब, जलाशय, कुएँ, बावड़ी, नहर, गाँव, आश्रम, उपवन आदि लोकहित के अनुसार श्रेणीबद्ध हैं; यथाशक्ति दान करने पर गरीब और धनी को समान फल मिलता है। तुलसी रोपण-सींचन, पत्तों का दान, शालग्राम को अर्पण और ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण से महापाप नष्ट होते हैं और नारायणधाम में दीर्घ निवास मिलता है। दूध, घी, पंचामृत, नारियल जल, गन्ने का रस, छना जल, सुगंधित जल से अभिषेक तथा एकादशी, द्वादशी, पूर्णिमा, ग्रहण, संक्रांति, नक्षत्र-योग में विशेष फल कहा गया है। दानधर्म में अन्न-जल सर्वोत्तम, गौ और विद्या मोक्षदायिनी, रत्न-वाहन दान से भिन्न-भिन्न लोक; संगीत, नृत्य, घंटा, शंख, दीप आदि मंदिर-सेवा को मोक्षमार्ग बताया गया है। अंत में विष्णु-केंद्रित सिद्धांत है कि धर्म, कर्म, साधन और फल—सब विष्णु ही हैं।

154 verses

Adhyaya 14

Dharmopadeśa-Śānti: Rules of Impurity, Expiations, and Ancestor Rites

धर्मराज राजा को श्रुति–स्मृति-आधारित शौच और प्रायश्चित्त के नियम बताते हैं। भोजन के समय चाण्डाल/पतित का स्पर्श, उच्छिष्ट-दोष, मल-मूत्र, वमन आदि से अशुद्धि होने पर त्रि-संध्या स्नान, पञ्चगव्य, उपवास, घृताहुति और अधिक गायत्री-जप जैसे क्रमबद्ध उपाय कहे गए हैं। अन्त्यज-स्पर्श, रजस्वला, प्रसूति-सूतक आदि में स्नान की अनिवार्यता, ब्रह्मकूर्च जैसे कर्मों के बाद भी, प्रतिपादित है। मैथुन-धर्म में ऋतु/अऋतु, अनुचित संयोग और कुछ घोर पापों में अग्नि-प्रवेश को ही एकमात्र प्रायश्चित्त कहा गया है। आत्महत्या या दुर्घटनामृत व्यक्ति स्थायी बहिष्कृत नहीं; चान्द्रायण/कृच्छ्र से शुद्धि बताई गई है। गो-हिंसा के नैतिक नियम, शस्त्रानुसार तप-भेद, मुण्डन-शिखा नियम और राज-न्याय का वर्णन है। अंत में इष्ट–पूर्त कर्म, पञ्चगव्य-निर्माण, सूतक/गर्भपात अशौच-काल, विवाह में गोत्र-परिवर्तन तथा श्राद्ध-तर्पण की विधियाँ और प्रकार दिए गए हैं।

95 verses

Adhyaya 15

Pāpa-bheda, Naraka-yātanā, Mahāpātaka-vicāra, Atonement Limits, Daśa-vidhā Bhakti, and Gaṅgā as Final Remedy

सनक के कथन में धर्मराज यम, राजा भगीरथ को पापों के भेद, नरकों के नाम और भयंकर यातनाएँ (अग्नि, काटना, शीत, मल-आदि दण्ड, लोहे के उपकरण) बताते हैं। फिर चार महापातक—ब्रह्महत्या, सुरापान, स्तेय (विशेषतः सुवर्ण-चोरी) और गुरु-तल्प-गमन—तथा पापियों का संग पाँचवाँ, और इनके तुल्य पापों की गंभीरता कही जाती है। प्रायश्चित्त-योग्य और अप्रायश्चित्त कर्मों का भेद, तथा ईर्ष्या, चोरी, व्यभिचार, मिथ्या-साक्ष्य, दान में बाधा, अत्यधिक कर, मंदिर-दूषण आदि के लिए नरकवास और नीच योनियों की क्रम-परंपरा वर्णित है। अंत में विष्णु-सन्निधि में प्रायश्चित्त की सिद्धि, गंगा की तारक शक्ति, भक्ति के दस प्रकार (तामस-राजस-सात्त्विक क्रम), हरि-शिव की अभिन्नता और पितरों के उद्धार हेतु भगीरथ का गंगा-आनयन संकल्प बताया गया है।

169 verses

Adhyaya 16

Bhāgīratha’s Bringing of the Gaṅgā

नारद पूछते हैं कि हिमालय में भगीरथ ने क्या किया और गंगा कैसे उतरी। सनक कहते हैं—तपस्वी-राजा भगीरथ भृगु के आश्रम में जाकर मनुष्य-उत्थान का कारण और भगवान को प्रसन्न करने वाले कर्म पूछते हैं। भृगु सत्य को धर्मानुकूल, प्राणियों के हितकारी वचन बताते हैं, अहिंसा की प्रशंसा करते हैं, दुष्ट-संग से सावधान करते हैं और वैष्णव-स्मरण सिखाते हैं—पूजा व जप से “ॐ नमो नारायणाय” (अष्टाक्षरी) और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” (द्वादशाक्षरी), तथा नारायण का ध्यान। भगीरथ हिमवत पर घोर तप करते हैं; तेज से देव घबरा कर क्षीरसागर में महाविष्णु की स्तुति करते हैं। विष्णु प्रकट होकर पितरों के उद्धार का वचन देते हैं और शम्भु (शिव) की आराधना का आदेश देते हैं। भगीरथ ईशान की स्तुति करते हैं; शिव प्रकट होकर वर देते हैं—गंगा शिव की जटाओं से निकलकर भगीरथ के पीछे चलती है, सगर-पुत्रों के नाश-स्थान को पावन कर उन्हें विष्णुलोक पहुँचाती है। अंत में फलश्रुति—इस कथा का श्रवण/पाठ गंगास्नान का पुण्य देता है और वक्ता को विष्णुधाम ले जाता है।

116 verses

Adhyaya 17

Dvādaśī-vrata: Month-by-month Viṣṇu Worship and the Year-End Udyāpana

सूता के प्रसंग बाँधने पर नारद, गंगा-माहात्म्य से प्रेरित होकर, सनक से ऐसे हरि-व्रत पूछते हैं जो विष्णु को प्रसन्न करें और प्रवृत्ति-निवृत्ति का समन्वय कराएँ। सनक शुक्लपक्ष की द्वादशी पर मार्गशीर्ष से कार्तिक तक मासानुसार द्वादशी-व्रत-चक्र बताते हैं—उपवास, शुद्धि-नियम, निर्दिष्ट मात्रा के दूध आदि से अभिषेक, केशव-नारायण-माधव-गोविन्द-त्रिविक्रम-वामन-श्रीधर-हृषीकेश-पद्मनाभ- दामोदर आदि नामों के मंत्र, 108 आहुतियों का होम, रात्रि-जागरण और तिल, कृशरा, चावल, गेहूँ, मधु, अपूप, वस्त्र, सुवर्ण आदि का दान। अंत में मार्गशीर्ष कृष्ण द्वादशी को वार्षिक उद्यापन—मंडप, सर्वतोभद्र-रेखा, बारह कुंभ, लक्ष्मी-नारायण प्रतिमा या सममूल्य, पंचामृताभिषेक, पुराण-श्रवण, विशाल तिल-होम, बारह ब्राह्मणों का भोजन और आचार्य को दान। फल-श्रुति पाप-नाश, कुल-उद्धार, मनोवांछित सिद्धि और विष्णुधाम-प्राप्ति बताती है; श्रवण/कीर्तन से भी वाजपेय-तुल्य पुण्य कहा गया है।

113 verses

Adhyaya 18

Pūrṇimā-vrata (Lakṣmī–Nārāyaṇa-vrata): Observance, Moon Arghya, and Annual Udyāpana

सनक नारद को ‘पूर्णिमा-व्रत’ का उपदेश देते हैं—यह पाप-नाशक, शोक-हर, दुष्ट स्वप्नों तथा ग्रहदोषों से रक्षक है। मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा से साधक दन्तधावन, स्नान, श्वेत वस्त्र, आचमन कर नारायण-स्मरण सहित संकल्प करके लक्ष्मी–नारायण की पूजा करता है; उपचार, कीर्तन/पाठ तथा गृह्य-विधि से चतुरस्र स्थण्डिल पर घृत-तिल की आहुतियाँ पुरुषसूक्तानुसार देकर, शान्तिसूक्त से शमन करता है। पूर्णिमा को उपवास रखकर श्वेत पुष्प व अक्षत से चन्द्रमा को अर्घ्य देता है और पाषण्डियों से दूर रहकर रात्रि-जागरण करता है। प्रातः पुनः पूजा, ब्राह्मण-भोजन, फिर गृहस्थ-भोजन। यह व्रत मासिक रूप से एक वर्ष चलता है; कार्तिक में उद्यापन पर मण्डप-सज्जा, सर्वतोभद्र रचना, कुम्भ-स्थापन, पञ्चामृताभिषेक, गुरु को प्रतिमा-दक्षिणा, ब्राह्मण-भोजन, तिल-दान व तिल-होम—जिससे समृद्धि और अंततः विष्णुधाम की प्राप्ति होती है।

32 verses

Adhyaya 19

Dhvajāropaṇa and Dhvajāgopaṇa: Procedure, Stotra, and Phala (Merit) of Raising Viṣṇu’s Flag

सनक मुनि श्रीविष्णु के ध्वज (पताका) के आरोहण और उसकी रक्षा का पवित्र व्रत बताते हैं, जिसे पाप-नाशक और दान-तीर्थकर्म के तुल्य या श्रेष्ठ कहा गया है। कार्तिक शुक्ल दशमी को शुद्धि-नियमों से आरम्भ, एकादशी को संयम और निरन्तर नारायण-स्मरण। ब्राह्मणों सहित स्वस्तिवाचन व नन्दीश्राद्ध करके, गायत्री से ध्वज व दण्ड का संस्कार; सूर्य, गरुड़ (वैनतेय) और चन्द्र की पूजा, तथा ध्वजदण्ड पर धाता-विधाता का पूजन। गृह्याग्नि स्थापित कर पुरुषसूक्त, विष्णु-स्तोत्र, इरावती आदि से 108 पायस आहुतियाँ, गरुड़ तथा सौर-शान्ति के विशेष हवन, और हरि-सन्निधि में रात्रि-जागरण। संगीत-स्तोत्र के साथ ध्वज को ले जाकर द्वार या मंदिर-शिखर पर स्थापित कर विष्णु-पूजन व दीर्घ स्तोत्र-पाठ। अंत में गुरु-ब्राह्मणों का सत्कार, भोजन, पारण; फल में शीघ्र पापक्षय, ध्वज रहने तक सहस्रों युगों का सारूप्य, और जो केवल देखकर हर्षित हों उन्हें भी पुण्य-लाभ।

47 verses

Adhyaya 20

Dhvaja-Dhāraṇa Mahātmyam: Sumati–Satyamatī, Humility, and Deliverance by Hari’s Messengers

नारद जी सनक से पूछते हैं कि ध्वज-धारण (भगवान विष्णु के लिए ध्वजा उठाने) में अग्रणी सुमति की महिमा क्या है। सनक कृतयुग की कथा सुनाते हैं—सत्पद्वीप के राजा सुमति और रानी सत्यमती आदर्श वैष्णव शासक हैं: सत्यनिष्ठ, अतिथि-सेवी, अहंकार-रहित, हरिकथा-प्रिय, अन्न-जल दान तथा तालाब, बाग, कुएँ जैसे लोकहित कार्यों में तत्पर। सुमति द्वादशी को विष्णु-पूजन हेतु सुंदर ध्वजा चढ़ाते हैं। ऋषि विभाण्डक आते हैं और राजा की विनय-भावना की प्रशंसा करते हैं, जिससे धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की सिद्धि बताई जाती है। ध्वज-धारण और मंदिर-नृत्य से उनके विशेष संबंध का कारण पूछने पर सुमति पूर्वजन्म का प्रसंग बताते हैं—भारी पाप के बाद वन में जीर्ण विष्णु-मंदिर के पास रहकर अनजाने में भी निरंतर सेवा: मरम्मत, सफाई, जल-छिड़काव, दीप-प्रज्वलन; और अंत में मंदिर-परिसर में नृत्य। तब यमदूतों के विरुद्ध हरि के दूत कहते हैं कि हरि-सेवा और आकस्मिक भक्ति भी पाप को जला देती है। दंपति विष्णुलोक को ले जाए जाते हैं, फिर समृद्धि सहित लौटते हैं; अध्याय इस पापनाशक कथा के श्रवण-कीर्तन की महिमा से समाप्त होता है।

86 verses

Adhyaya 21

The Pañcarātra Vow (Haripañcaka Vrata): Observance from Śukla Ekādaśī to Pūrṇimā

सनक जी नारद को दुर्लभ हरिपञ्चक/पाञ्चरात्र व्रत बताते हैं, जो मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक पाँच रात्रियों का विष्णु-व्रत है और धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष देता है। आरम्भ में शौच, दन्तधावन-स्नान, देवपूजा, पञ्चमहायज्ञ और एकभुक्त नियम; एकादशी को उपवास, प्रातः उठकर गृह में हरि-पूजन तथा पञ्चामृत अभिषेक। गन्ध-पुष्प-धूप-दीप-नैवेद्य-ताम्बूल आदि उपचार, प्रदक्षिणा और वासुदेव/जनार्दन को ज्ञानप्रधान नमस्कार; पाँच रात्रि निराहार का संकल्प, एकादशी की जागरण-रात्रि और द्वादशी से चतुर्दशी तक निरन्तर साधना। पूर्णिमा को दूध से अभिषेक, तिल-होम और तिल-दान; छठे दिन आश्रम-कर्तव्यों के बाद पञ्चगव्य, ब्राह्मण-भोजन, मधु-घृतयुक्त पायस, फल, सुगन्धित जल-कलश, पाँच रत्नों सहित घट आदि दान, और वर्ष-पर्यन्त चक्र के बाद उद्यापन। अध्याय मोक्ष व अपार पुण्य, तथा भक्तिपूर्वक श्रवण से भी मुक्ति का फल बताता है।

29 verses

Adhyaya 22

Māsopavāsa (Month-long Fast) and Repeated Parāka Observances: Procedure and Fruits

सनक शुक्लपक्ष में आषाढ़ से आश्विन तक के चार महीनों में किसी एक मास में किए जाने वाले ‘पाप-नाशक’ वैष्णव व्रत का विधान बताते हैं। व्रती इन्द्रियों का संयम करे, पंचगव्य ग्रहण करे, विष्णु के समीप शयन करे, प्रातः उठकर नित्यकर्म कर क्रोधरहित होकर भगवान विष्णु की पूजा करे। विद्वान ब्राह्मणों की उपस्थिति में स्वस्तिवाचन कर मासोपवास का संकल्प ले और कहे कि पारण केवल प्रभु की आज्ञा से होगा। हरि-मंदिर में निवास कर प्रतिदिन पंचामृत से देवता का स्नान, अखण्ड दीप, अपामार्ग से दन्तधावन व विधिस्नान, पूजन, ब्राह्मण-भोजन व दक्षिणा करे, और कुटुम्बियों के साथ नियमित आहार ले। आगे बार-बार मासोपवास/पराक करने पर बढ़ते हुए फलों का वर्णन है, जो महायज्ञों से भी श्रेष्ठ होकर अंत में हरि-सादृश्य और परम आनन्द देता है। स्त्री-पुरुष, सभी आश्रमों के लिए तथा नारायण-भक्ति से श्रवण-कीर्तन मात्र से भी मोक्ष सुलभ कहा गया है।

28 verses

Adhyaya 23

Ekādaśī Vrata-Vidhi and the Galava–Bhadrashīla Itihāsa (Dharmakīrti before Yama)

सनक एकादशी को सर्वजन-हितकारी विष्णुभक्ति-व्रत बताते हैं। इसे परम पुण्य तिथि कहकर वे एकादशी को पूर्ण उपवास, तथा दशमी और द्वादशी को एक-एक बार भोजन—ऐसा तीन दिन का विधान बताते हैं। स्नान, विष्णु-पूजन, मंत्र-संकल्प, रात्रि-जागरण में कीर्तन व पुराण-श्रवण, फिर द्वादशी को पूजा के बाद ब्राह्मण-भोजन और दक्षिणा, तथा संयमित वाणी से भोजन करने का निर्देश है। दूषित संग, दंभ और कपट से बचकर भीतर की शुद्धि पर बल दिया गया है। आगे इतिहास में गालव के पुत्र भद्रशील अपने पूर्वजन्म के राजा धर्मकीर्ति का वर्णन करते हैं—रेवा तट पर अनजाने में एकादशी का उपवास-जागरण होने से चित्रगुप्त उसे पापमुक्त घोषित करते हैं; यम अपने दूतों को नारायण-भक्तों से दूर रहने की आज्ञा देते हैं, जिससे एकादशी और नाम-स्मरण की तारक शक्ति प्रकट होती है।

99 verses

Adhyaya 24

Varṇāśrama-ācāra: Common Virtues, Varṇa Duties, and the Four Āśramas

सूत कहते हैं कि सनक के हरि के पावन व्रत-दिन के उपदेश के बाद नारद ने सबसे पुण्यकारी व्रत का क्रमबद्ध वर्णन पूछा और फिर वर्ण-नियम, आश्रम-धर्म तथा प्रायश्चित्त-विधि का भी विस्तार से प्रश्न किया। सनक ने उत्तर दिया कि अविनाशी हरि की पूजा वर्णाश्रम के अनुरूप आचरण से होती है। वे चारों वर्णों और उपनयन से स्थापित तीन द्विज-वर्गों का निरूपण करते हैं; अपने-अपने स्वधर्म और गृह्यकर्मों में दृढ़ता पर बल देते हैं; तथा स्मृति-विरुद्ध न हो तो देशाचार को स्वीकार करते हैं। कलियुग में वर्ज्य या सीमित कर्मों, कुछ यज्ञों और विशेष विधानों का उल्लेख कर स्वधर्म त्यागने से पाखण्ड में गिरने की चेतावनी देते हैं। फिर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के कर्तव्य, तथा सामान्य सद्गुण—सरलता, प्रसन्नता, क्षमा, नम्रता—बताकर आश्रम-क्रम को परमधर्म-साधन कहते हैं। अंत में विष्णु-भक्ति से युक्त कर्मयोग को अनावृत्ति वाले परम धाम का मार्ग बताते हैं।

35 verses

Adhyaya 25

Varṇāśrama Saṁskāras, Upanayana Windows, Brahmacārin Ācāra, and Anadhyāya Prohibitions

सनक नारद से वैदिक वर्णाश्रम-धर्म का निरूपण करते हैं—परधर्म की निन्दा, गर्भाधान से आरम्भ होने वाले संस्कार, गर्भावस्था व जन्मकर्म (सीमन्त, जातकर्म, नान्दी/वृद्धि-श्राद्ध), नामकरण के नियम, तथा चूड़ाकरण का समय और चूक होने पर प्रायश्चित्त। वे वर्णानुसार उपनयन की आयु, मुख्य अवसर चूकने पर दण्ड, और मेखला, अजिन, दण्ड व वस्त्र आदि के उचित लक्षण बताते हैं। फिर ब्रह्मचारी-आचार—गुरुकुल-वास, भिक्षा से जीवन, नित्य स्वाध्याय, ब्रह्मयज्ञ व तर्पण, आहार-नियम, नमस्कार की मर्यादा तथा किनका सम्मान/परिहार करना चाहिए—यह सब कहा गया है। अंत में शुभ-अशुभ काल, दानफल देने वाली तिथियाँ (मन्वादी, युगादी, अक्षय दिन) और अनध्याय के नियम; निषिद्ध समय में अध्ययन को कल्याण-नाशक महापाप बताया गया है। अंततः वेदाध्ययन को ब्राह्मण का अनिवार्य मार्ग और वेद को विष्णु-स्वरूप शब्दब्रह्म कहा गया है।

65 verses

Adhyaya 26

Gṛhastha-praveśa: Vivāha-bheda, Ācāra-śauca, Śrāddha-kāla, and Vaiṣṇava-lakṣaṇa

सनक–नारद संवाद में ब्रह्मचर्य पूर्ण होने पर गुरु-सेवा, अनुमति, अग्नि-स्थापन, दक्षिणा और विवाह द्वारा गृहस्थ-प्रवेश का विधान बताया गया है। योग्य वर-वधू के गुण, सगोत्र/निकट-सम्बन्ध की सीमा, तथा अयोग्य लक्षण गिनाए गए हैं। आठ प्रकार के विवाहों का वर्णन कर कुछ की निन्दा और कुछ की क्रमिक स्वीकृति बताई गई है। बाह्य-आन्तरिक आचार—वेश-भूषा, शौच, वाणी-संयम, गुरु-सम्मान, निन्दा व कुसंग-त्याग—निर्दिष्ट है; अपवित्र स्पर्श आदि के बाद शुद्धि-स्नान और शुभ-अशुभ संकेत भी बताए गए हैं। सन्ध्या-पूजन, नित्य-नैमित्तिक यज्ञ और श्राद्ध के विस्तृत काल—ग्रहण, संक्रान्ति, प्रेतपक्ष, मन्वादि, अष्टका, तीर्थ आदि—निश्चित किए गए हैं। अंत में वैष्णव-भाव प्रमुख है: ऊर्ध्वपुण्ड्र बिना कर्म निष्फल, श्राद्ध में तुलसी/तिलक का निषेध निराधार, और विष्णु-कृपा ही धर्म-सिद्धि की गारंटी कही गई है।

46 verses

Adhyaya 27

Gṛhastha-nitya-karman: Śauca, Sandhyā-vidhi, Pañca-yajña, and Āśrama-krama

सनक नारद को ब्रह्ममुहूर्त से आरम्भ होने वाला गृहस्थ का नित्य-धर्म बताते हैं—मलोत्सर्ग में दिशा-नियम व संयम, निषिद्ध स्थान, तथा बाह्य-आन्तरिक शौच का सिद्धान्त। मिट्टी और जल से शुद्धि, ग्राह्य मिट्टी के स्रोत, शोधन की क्रमबद्ध संख्या, आश्रम-भेद से वृद्धि, रोग/आपदा में छूट और स्त्रियों के प्रसंगों की मर्यादा कही गई है। फिर आचमन के स्पर्श-नियम, दन्तधावन की दातुन व मन्त्र, नदियों-तीर्थों-मोक्षद नगरों का आवाहन कर स्नान, और सन्ध्या-विधि—संकल्प, व्याहृति-प्रोक्षण, न्यास, प्राणायाम, मार्जन, अघमर्षण, सूर्य को अर्घ्य, तथा गायत्री/सावित्री/सरस्वती का ध्यान। सन्ध्या-त्याग का दोष, आश्रम अनुसार स्नान-नियम, ब्रह्मयज्ञ, वैश्वदेव, अतिथि-सत्कार और पञ्चमहायज्ञों का विधान आता है। अंत में वानप्रस्थ के तप, यति-आचार, नारायण-केन्द्रित वेदान्त-ध्यान और विष्णु के परम धाम की प्राप्ति का फल कहा गया है।

106 verses

Adhyaya 28

Śrāddha-prayoga: Niyama, Brāhmaṇa-parīkṣā, Kutapa-kāla, Tithi-nyāya, and Vaiṣṇava-phala

सनक नारद को श्राद्ध की ‘परम विधि’ बताते हैं। पूर्वदिन के नियम—एक बार भोजन, ब्रह्मचर्य, भूमि पर शयन, यात्रा/क्रोध/मैथुन का त्याग; और आमंत्रित जनों द्वारा संयम-भंग होने पर घोर पाप का विधान। फिर योग्य ब्राह्मण—श्रोत्रिय, विष्णु-भक्त, स्मृति व वेदान्त-निपुण, दयालु; तथा अयोग्य—अंग-विकृति, अशुद्ध आजीविका, दुराचार, वेद/मंत्र-विक्रय आदि। कुतप-काल अपराह्न में बताया गया और क्षयाह, विद्धा, क्षय-वृद्धि तिथि, परा-तिथि के निर्णय नियम दिए गए। आगे कर्म-क्रम—विश्वदेव व पितृ-आमंत्रण, मंडल-रचना, पाद्य-आचमनीय, तिल-प्रक्षेप, अर्घ्य-पात्र, मंत्र-संकेत, पूजन, हवि-होम (अग्नि न हो तो ताल-होम), मौन सहित भोजन-विधि, गायत्री-जप, पुरुषसूक्त/त्रिमधु/त्रिसुपर्ण/पावमान पाठ, पिण्डदान, स्वस्तिवाचन, अक्षय-उदक, दक्षिणा और विसर्जन-मंत्र। अंत में आपत्कालीन विकल्प और वैष्णव निष्कर्ष—सबमें विष्णु की व्याप्ति है; विधिपूर्वक श्राद्ध पाप हरता और वंश-वृद्धि करता है।

90 verses

Adhyaya 29

Tithi-Nirṇaya for Vratas: Ekādaśī Rules, Saṅkrānti Punya-kāla, Eclipse Observances, and Prāyaścitta

सनक ऋषियों को बताते हैं कि श्रौत‑स्मार्त कर्म, व्रत और दान में सही तिथि‑निर्णय अनिवार्य है। वे उपवास योग्य तिथियाँ बताते हैं और परविद्धा‑पूर्वविद्धा, पूर्वाह्न‑अपराह्न, प्रदोष तथा क्षय‑वृद्धि तिथि के अनुसार ग्रहण‑नियम समझाते हैं। तिथि‑नक्षत्र व्रतों का निर्णय, विशेषकर एकादशी‑द्वादशी में दशमी‑दोष, दो एकादशी, पारण‑काल, गृहस्थ‑संन्यासी भेद आदि का सूक्ष्म विवेचन है। आगे ग्रहण‑धर्म में भोजन निषेध, ग्रहण भर जप‑होम, तथा चन्द्र/सूर्य ग्रहण हेतु अलग‑अलग वैदिक मंत्रों से आहुति का विधान आता है। संक्रान्ति का पुण्य‑काल राशि अनुसार घटिकाओं में बताया गया है; कर्क में दक्षिणायन और मकर में उत्तरायण का निर्देश है। अंत में कहा है कि विधिपूर्वक धर्म‑पालन से केशव प्रसन्न होते हैं और विष्णु के परम धाम की प्राप्ति होती है।

63 verses

Adhyaya 30

Prāyaścitta for Mahāpātakas and the Sin-destroying Power of Viṣṇu-smaraṇa

सनक नारद को बताते हैं कि प्रायश्चित्त कर्मकाण्ड की अनिवार्य पूर्णता है—प्रायश्चित्त के बिना कर्म निष्फल हैं, और वास्तविक शुद्धि नारायणाभिमुखता से होती है। अध्याय में चार महापातक—ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्ण-चोरी और गुरु-तल्पगमन—कहे गए हैं; ऐसे पापियों का संग भी पाँचवाँ दोष माना गया है, तथा सहवास की अवधि से पतन की मात्रा बताई गई है। ब्राह्मणादि-वध के लिए कपालधारी तप, तीर्थ-निवास, भिक्षा, संध्या-उपासना और बहुवर्षीय व्रतों का विधान है; राजदण्ड के नियम तथा स्त्री, बालक और रोगी के लिए शमन भी वर्णित है। सुरा के प्रकार, पात्र, औषधि-अपवाद और चान्द्रायण द्वारा पुनःदीक्षा का निर्देश मिलता है। चोरी के प्रायश्चित्त में स्वर्ण-रजत के मूल्य, त्रसरेणु से सुवर्ण तक सूक्ष्म माप, तथा प्राणायाम और गायत्री-जप की सीमाएँ दी गई हैं। अवैध संभोग, पशुहिंसा, अशौच-संस्पर्श, भोजन व वाणी के निषेध भी आते हैं। अंत में मोक्षधर्म—हरि-भक्ति और विष्णु-स्मरण की महिमा—कही गई है कि एक बार का स्मरण भी पाप-समूह नष्ट कर धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष फल देता है।

114 verses

Adhyaya 31

Yamapatha (The Road of Yama), Dāna-Phala, and the Imperishable Fruition of Karma

नारद जी सनक से यम के अधीन अत्यन्त कठिन परलोक-मार्ग का वर्णन पूछते हैं। सनक धर्मात्माओं—विशेषकर दानियों—की सुगम यात्रा और पापियों की दीर्घ दूरी, कठोर पथ, प्यास, यमदूतों की मार, बाँधकर घसीटे जाने आदि भयावह यातनाएँ बताते हैं। फिर धर्म के आश्वासन बताते हैं—अन्न, जल, दूध-घृत, दीप, वस्त्र, धन आदि का दान वैसी ही भोग-सम्पदा देता है; गौ, भूमि, गृह, वाहन, पशु आदि महादान स्वर्गीय वैभव और दिव्य वाहन प्रदान करते हैं; माता-पिता व ऋषियों की सेवा, दया, ज्ञान-दान और पुराण-पाठ से मार्ग पवित्र होता है। यम पुण्यवानों का दिव्य रूप से सम्मान करता है और शेष पाप की चेतावनी देता है; पापी चित्रगुप्त के लेखे से दण्डित होकर नरकों में गिरते हैं, प्रायश्चित्त के बाद स्थावर योनि में जन्म भी पाते हैं। अंत में प्रलय में पुण्य कैसे टिकता है—इस शंका का समाधान सनक नारायण की अविनाशी सत्ता, ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र रूपों की गुणानुसार अभिव्यक्ति, पुनः सृष्टि और भोगे बिना रहे कर्म के कल्पों तक नष्ट न होने से करते हैं।

71 verses

Adhyaya 32

Saṃsāra-duḥkha: Karmic Descent, Garbhavāsa, Life’s Anxieties, Death, and the Call to Jñāna-Bhakti

सनक नारद को बंधन का तत्त्व समझाते हैं—जीव पुण्यलोक भोगकर पापफल से गिरते हैं और स्थावर (वृक्ष-तृण-पर्वत) से लेकर कृमि, पशु आदि योनियों में भटकते हुए अंततः मनुष्य-जन्म पाते हैं। वनस्पति-वृद्धि की उपमा से बताया गया है कि संस्कार देह-प्रकटि और फल-भोग को कैसे नियत करते हैं। फिर गर्भवास का विस्तृत वर्णन है—शुक्र के साथ जीव का प्रवेश, कलल आदि भ्रूणावस्थाएँ, गर्भ का कष्ट और पूर्व नरकों की स्मृति; जन्म को हिंसामय और विस्मृति को अज्ञानजन्य कहा गया है। आगे असहाय शैशव, उच्छृंखल बाल्य, लोभ-काम से प्रेरित यौवन, चिंता-ग्रस्त गृहस्थाश्रम, जरा और अंत में मृत्यु, यमदूतों का बंधन तथा पुनः नरकानुभव आता है। निष्कर्ष में दुःख को कर्मक्षय द्वारा शुद्धि का साधन बताकर उपाय कहा गया है—परम ज्ञान का अभ्यास और जगत् के कारण-लयस्वरूप हरि/नारायण की भक्ति-पूजा, जो संसार से मुक्ति का सीधा मार्ग है।

51 verses

Adhyaya 33

Mokṣopāya: Bhakti-rooted Jñāna and the Aṣṭāṅga Yoga of Viṣṇu-Meditation

नारद सनक से पूछते हैं कि जब जीव निरन्तर कर्म करता और भोगता है, तब संसार-पाश कैसे कटे। सनक नारद की पवित्रता की प्रशंसा कर विष्णु/नारायण को सृष्टि-स्थिति-प्रलय के कर्ता और मोक्षदाता बताते हैं—भक्ति, शरणागति, दिव्य रूपों की उपासना के रूप में भी, और तत्त्वतः अद्वैत, स्वप्रकाश ब्रह्म के रूप में भी। फिर नारद योग-सिद्धि का कारण पूछते हैं। सनक कहते हैं—मोक्ष ज्ञान से है, पर ज्ञान की जड़ भक्ति है; दान, यज्ञ, तीर्थ आदि पुण्यकर्मों से भक्ति उत्पन्न होती है। योग दो प्रकार का है—कर्मयोग और ज्ञानयोग; ज्ञानयोग के लिए शुद्ध कर्म-आधार आवश्यक है, केशव की प्रतिमा-पूजा और अहिंसा-प्रधान आचार पर बल है। पाप क्षीण होने पर नित्य-अनित्य विवेक से वैराग्य और मुमुक्षुत्व जागते हैं। आगे पर/अपर आत्मा, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ, माया और शब्द-ब्रह्म (महावाक्य) से मुक्तिदायक बोध समझाया जाता है। अंत में अष्टांग योग—यम, नियम, आसन, प्राणायाम (नाड़ियाँ व चार प्रकार का श्वास), प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि—का विस्तार से वर्णन कर विष्णु-रूप ध्यान और प्रणव ‘ॐ’ चिन्तन को चरम साधना बताया गया है।

162 verses

Adhyaya 34

The Characteristics of Devotion to Hari

नारद जी सनक से पूछते हैं कि योग के अंग बताए जाने के बाद भी भगवान कैसे प्रसन्न होते हैं। सनक कहते हैं कि नारायण की एकनिष्ठ उपासना से ही मुक्ति मिलती है; भक्त शत्रुता और विपत्तियों से सुरक्षित रहते हैं, और इन्द्रियाँ विष्णु के दर्शन, पूजा और नाम-सेवा में लगकर सार्थक हो जाती हैं। वे गुरु और केशव की सर्वोच्चता बार-बार बताते हैं और संसार की असारता में हरि-उपासना को ही एकमात्र स्थिर सत्य कहते हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, विनय, करुणा, सत्संग और निरन्तर नाम-जप के साथ जाग्रत–स्वप्न–सुषुप्ति के विचार द्वारा प्रभु को उपाधियों से परे अन्तर्यामी नियन्ता बताते हैं। जीवन की क्षणभंगुरता से शीघ्र भक्ति का आग्रह करते हैं, अभिमान, ईर्ष्या, क्रोध और काम की निन्दा करते हैं, विष्णु-मन्दिर में सेवा (झाड़ू-पोंछा तक) की प्रशंसा करते हैं, और कहते हैं कि भक्ति सामाजिक भेदों से ऊपर है। अंत में जनार्दन का स्मरण, पूजन और शरणागति ही संसार-बन्धन काटकर परम धाम दिलाती है।

78 verses

Adhyaya 35

The Exposition of Spiritual Knowledge (Jñāna-pradarśanam)

सनक विष्णु-महिमा के श्रवण-कीर्तन की तत्क्षण पाप-नाशक शक्ति का गुणगान करते हैं और साधकों की योग्यता बताते हैं—शांत जन छह अंतःशत्रुओं को जीतकर ज्ञान-योग से अक्षर को पाते हैं, शुद्ध कर्म करने वाले कर्म-योग से अच्युत को, और लोभी-मोहित लोग प्रभु की उपेक्षा करते हैं। फिर अश्वमेध-सदृश फल देने वाली प्राचीन कथा आती है—वेदमाली नामक वेद-विद् हरिभक्त परिवार-लोभ से अधर्म व्यापार में पड़कर निषिद्ध वस्तुएँ, मदिरा, व्रत तक बेचता और अशुद्ध दान ग्रहण करता है। आशा की अतृप्ति देखकर वह वैराग्य धारण कर धन बाँटता, लोक-कल्याण के कार्य व मंदिर-निर्माण कराता और नरा-नारायण के आश्रम जाता है। वहाँ तेजस्वी मुनि जानन्ती से मिलकर सत्कार पाता और मोक्ष-ज्ञान माँगता है। जानन्ती निरंतर विष्णु-स्मरण, परनिंदा-त्याग, दया, छह दोषों का परित्याग, अतिथि-सत्कार, निष्काम पुष्प-पत्र-पूजा, देव-ऋषि-पितृ तर्पण, अग्नि-सेवा, मंदिर की सफाई/जीर्णोद्धार/दीपदान, प्रदक्षिणा-स्तोत्र, तथा नित्य पुराण-वेदांत अध्ययन का उपदेश देते हैं। ‘मैं कौन हूँ?’ का समाधान मनोजात अहंकार, निर्गुण आत्मा और ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य से होकर ब्रह्म-साक्षात्कार तक पहुँचता है; वाराणसी में उसे अंतिम मुक्ति मिलती है। फलश्रुति में श्रवण-कीर्तन को कर्म-बन्धन काटने वाला कहा गया है।

74 verses

Adhyaya 36

Yajñamālī–Sumālī Upākhyāna: Merit-Transfer through Temple Plastering (Lepa) and the Redemption of a Sinner

सनक नारद को वेदमाला के दो ब्राह्मण पुत्रों—यज्ञमाली और सुमाली—के विपरीत जीवन का वर्णन करते हैं। यज्ञमाली न्याय से धन बाँटकर दान-धर्म करता, पिता के लोक-कल्याण कार्य सँभालता और विष्णु-मंदिर की सेवा करता है; सुमाली संगीत, मदिरा, वेश्या-संग, परस्त्रीगमन आदि में धन गँवाकर चोरी और निषिद्ध आहार तक गिर जाता है। दोनों के एक साथ मरने पर यज्ञमाली को विष्णुदूत विमान से विष्णुलोक ले जाते हैं; मार्ग में वह सुमाली को यमदूतों द्वारा भूख-प्यास से पीड़ित प्रेत रूप में घसीटते देखता है। करुणा से वह सख्य-धर्म (सप्तपदी) स्मरण कर पूछता है कि ऐसे पापी का उद्धार कैसे हो। विष्णुदूत बताते हैं कि पूर्वजन्म में यज्ञमाली ने हरि-मंदिर में कीचड़ हटाकर लेप (प्लास्टर) योग्य स्थान बनाया था; उस लेप-कर्म का पुण्य दान किया जा सकता है। यज्ञमाली वह पुण्य सुमाली को दे देता है; यमदूत भाग जाते हैं, दिव्य रथ आता है और दोनों विष्णुलोक पहुँचते हैं। यज्ञमाली को मोक्ष मिलता है; सुमाली बाद में पृथ्वी पर लौटकर हरिभक्त, सदाचारी ब्राह्मण बनता, गंगा-स्नान कर विश्वेश्वर के दर्शन करता और परम धाम पाता है। अंत में कहा गया है कि विष्णु-भक्ति, हरिभक्त-संग और हरिनाम बड़े पापों का भी नाश करते हैं।

62 verses

Adhyaya 37

Hari-nāma Mahimā and Caraṇāmṛta: The Redemption of the Hunter Gulika (Uttaṅka Itihāsa)

सनक कमलापति विष्णु की महिमा कहते हैं कि हरि का एक नाम ही विषय-मोह और ममता में फँसे लोगों के पाप नष्ट कर देता है। वे बताते हैं—हरि-पूजा रहित घर श्मशान समान है; वेद-द्वेष तथा गौ और ब्राह्मणों से द्वेष राक्षसी प्रवृत्ति है; दुर्भाव से किया गया पूजन स्वयं विनाशक होता है; सच्चे भक्त लोक-कल्याणकारी और ‘विष्णुमय’ होते हैं। फिर कृतयुग की कथा आती है—हिंसक पापी गुलिका केशव-मंदिर लूटने जाता है और वैष्णव मुनि उत्तंक पर आक्रमण करता है। उत्तंक उसे रोककर क्षमा, ममता की निरर्थकता और दैव की अनिवार्यता का उपदेश देते हैं, और कहते हैं कि मृत्यु के बाद केवल धर्म-अधर्म ही साथ जाते हैं। सत्संग और हरि-सान्निध्य से गुलिका पश्चात्ताप कर पाप स्वीकार करता है, मर जाता है; विष्णु के चरण-प्रक्षालन के जल (चरणामृत) से वह पुनर्जीवित व शुद्ध होता है। पापमुक्त होकर वह विष्णुधाम जाता है और उत्तंक महाविष्णु की स्तुति कर भक्ति-प्रधान मोक्षधर्म का निष्कर्ष करते हैं।

70 verses

Adhyaya 38

The Greatness of Viṣṇu (Uttaṅka’s Hymn, Hari’s Manifestation, and the Boon of Bhakti)

नारद जी सनक से पूछते हैं कि किस स्तोत्र से जनार्दन प्रसन्न हुए और उत्तंक को कौन-सा वर मिला। सनक बताते हैं कि हरि-भक्त उत्तंक भगवान के चरणोदक की पवित्रता से प्रेरित होकर विस्तृत स्तोत्र गाता है, जिसमें विष्णु को आदिकारण, अंतर्यामी आत्मा, माया-गुणों से परे परम सत्य तथा जगत के आधार रूप में वर्णित किया गया है। उसकी पूर्ण शरणागति से लक्ष्मीपति साक्षात प्रकट होते हैं; उत्तंक दण्डवत् प्रणाम कर रोता है और प्रभु के चरण धोता है। विष्णु वर देते हैं; उत्तंक सभी जन्मों में अडिग भक्ति ही मांगता है। प्रभु उसे यह वर देते हैं, शंख-स्पर्श से दुर्लभ दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं और क्रिया-योग से उपासना कर नर-नारायण के धाम में जाकर मोक्ष पाने का उपदेश देते हैं। अंत में फलश्रुति है कि इसका पाठ-श्रवण पाप हरता, कामनाएँ पूर्ण करता और अंततः मोक्ष देता है।

60 verses

Adhyaya 39

The Greatness of Viṣṇu (Viṣṇor Māhātmya)

सनक ब्राह्मणों को बताते हैं कि हरि-कथा, हरि-नाम और भक्त-संग का उद्धारक सामर्थ्य सर्वोपरि है। जो नाम-कीर्तन में दृढ़ हैं, उनके बाह्य आचरण में दोष दिखे तब भी वे पूज्य हैं; गोविन्द का दर्शन, स्मरण, पूजन, ध्यान और नमस्कार भी जीव को संसार-सागर से पार कर देता है। फिर पुरातन कथा आती है—सोमवंशी राजा जयध्वज रेवा/नर्मदा तट पर विष्णु-मंदिर की सफाई और दीप-दान करता है; पुरोहित वीतिहोत्र इन दोनों कर्मों के विशेष फल पूछते हैं। राजा पूर्वजन्म-श्रृंखला सुनाता है: विद्वान पर पतित ब्राह्मण रैवत निषिद्ध आजीविका से गिरकर दीन मृत्यु पाता है और पापी चाण्डाल दण्डकेतु बनता है। वह रात में एक स्त्री के साथ सूने विष्णु-मंदिर में जाता है; अनायास मंदिर-मार्जन का स्पर्श और दीपक की स्थापना हो जाती है। शुद्ध भाव न होने पर भी पाप नष्ट होते हैं; प्रहरी उन्हें मार देते हैं, पर विष्णुदूत उन्हें विष्णुलोक ले जाते हैं, दीर्घ काल भोग के बाद वे पृथ्वी पर समृद्धि पाते हैं। जयध्वज निष्कर्ष देता है कि संकल्पयुक्त भक्ति का फल अपरिमेय है; जगन्नाथ/नारायण की पूजा, सत्संग, तुलसी-सेवा, शालग्राम-पूजन और भक्तों के सम्मान का उपदेश देता है, जिनकी सेवा अनेक पीढ़ियों का उद्धार करती है।

72 verses

Adhyaya 40

Manvantaras and Indras; Sudharmā’s Liberation through Viṣṇu-Pradakṣiṇā; Supremacy of Hari-Bhakti

सनक पापों का नाश करने वाली वैष्णव-स्तुति का वर्णन करते हैं, जिसे सुनने और गाने से महान फल मिलता है। प्राचीन संवाद में इन्द्र दिव्य भोगों के बीच बृहस्पति से पूर्व ब्रह्म-कल्प की सृष्टि तथा इन्द्र और देवताओं के वास्तविक स्वरूप व कर्तव्य पूछते हैं। बृहस्पति अपनी ज्ञान-सीमा बताकर उन्हें इन्द्रपुरी में ब्रह्मलोक से उतरे सुधर्मा के पास भेजते हैं। सुधर्मा की सभा में इन्द्र कल्प-वृत्तान्त और सुधर्मा की श्रेष्ठता का कारण पूछते हैं। सुधर्मा ब्रह्मा के दिन (1000 चतुर्युग) का निरूपण कर चौदह मनुओं, उनके-उनके इन्द्रों और देवगणों का मन्वन्तरों में क्रम से वर्णन करते हैं, यह दिखाते हुए कि जगत-प्रशासन की व्यवस्था बार-बार उसी प्रकार चलती है। फिर वे अपना पूर्वजन्म बताते हैं—वे पापी गिद्ध थे, विष्णु-मन्दिर के पास मारे गए; एक कुत्ता उन्हें उठाकर मन्दिर की परिक्रमा करता गया, जिससे अनजाने में प्रदक्षिणा हुई और दोनों को परम पद मिला। अंत में भक्ति-फल स्पष्ट है—यांत्रिक परिक्रमा भी बड़ा पुण्य देती है; नारायण का स्मरण-पूजन पाप हरकर जन्म-मरण मिटाता और विष्णुधाम देता है; इस उपदेश का श्रवण-पाठ अश्वमेध के समान फलदायक है।

59 verses

Adhyaya 41

Yuga-Dharma Framework, Kali-Yuga Diagnosis, and the Hari-Nāma Remedy (Transition to Vedānta Inquiry)

नारद जी सनक से युगों के लक्षण, अवधि और नियम पूछते हैं। सनक चतुर्युग की रचना (संध्या-संध्यांश सहित) बताकर कृत से कलि तक धर्म के क्रमशः क्षय, हरि के युगानुसार वर्ण, और द्वापर में वेद-विभाजन का वर्णन करते हैं। फिर कलियुग का ठोस चित्र आता है—व्रत-यज्ञों का लोप, वर्णाश्रमों में दंभ, राजकीय अत्याचार, सामाजिक भूमिकाओं का भ्रम, अकाल-अनावृष्टि और पाखंड का उदय। फिर भी हरिभक्तों को कलि हानि नहीं पहुँचा सकता—यह कहकर वे युग-विशेष के प्रधान साधन बताते हैं, और कलि में दान तथा विशेषतः हरिनाम-संकीर्तन को सर्वोत्तम उपाय कहते हैं। हरि (और शिव) के नाम-लितानियाँ रक्षक व मोक्षदायिनी बताई गई हैं। अंत में विषय युगधर्म से मोक्षधर्म की ओर मुड़ता है—नारद ब्रह्म का दृष्टांत चाहते हैं, सनक उन्हें सनन्दन के पास भेजते हैं, जिससे वेदान्त-चर्चा आरम्भ होती है।

123 verses