Adhyaya 11
Purva BhagaFirst QuarterAdhyaya 11197 Verses

Vāmana’s Advent, Aditi’s Hymn, Bali’s Gift, and the Mahatmya of Bhū-dāna

नारद पूछते हैं कि दावानल से अदिति कैसे बचीं। सनक बताते हैं कि हरि-भक्ति मनुष्य और उसके स्थान को पवित्र कर देती है; वहाँ आपदा, रोग, चोर और दुष्ट शक्तियाँ टिक नहीं पातीं। विष्णु अदिति को दर्शन देकर वर देते हैं; अदिति उनके निर्गुण-सगुण परात्परत्व, विराट्-शरीर, वेदमय स्वरूप और शिव-एकत्व का विस्तृत स्तोत्र गाती हैं। भगवान् उनके पुत्र बनने का वचन देते हैं और ‘विष्णु को धारण करने वालों’ के आंतरिक लक्षण बताते हैं—अहिंसा, सत्य, निष्ठा/पातिव्रत्य, गुरु-सेवा, तीर्थ-रुचि, तुलसी-पूजन, नाम-संकीर्तन और गो-रक्षा। अदिति से वामन का जन्म होता है; कश्यप स्तुति करते हैं। बलि के सोमयज्ञ में शुक्र दान से रोकते हैं, पर बलि विष्णु को दान-धर्म मानकर अडिग रहता है। वामन तीन पग भूमि माँगते हैं, वैराग्य और अंतर्यामी-तत्त्व सिखाते हैं तथा भूदाने का महात्म्य—भद्रमती-सुघोष की कथा और क्रमशः फल—विस्तार से कहते हैं। फिर विष्णु विराट होकर लोकों को नापते, ब्रह्माण्ड भेदते हैं; उनके चरणोदक से गंगा प्रकट होती है। बलि बँधकर भी रसातल पाता है और विष्णु उसके द्वारपाल बनते हैं। अंत में गंगा और इस कथा-श्रवण के पुण्य की प्रशंसा होती है।

Shlokas

Verse 1

नारद उवाच । अहो ह्यत्यद्भुतं प्रोक्तं त्वया भ्रातरिदं मम । स वह्निरदितिं मुक्त्वा कथं तानदहत्क्षणात् ॥ १ ॥

नारद बोले—अहो भ्राता! तुमने जो मुझे कहा है वह अत्यन्त अद्भुत है। वह अग्नि अदिति को छोड़कर उन सबको क्षणभर में कैसे जला गई?

Verse 2

वदादितेर्महासत्त्वं विशेषाश्चर्यकारणम् । परोपदेशनिरताः सज्जना हि मुनीश्वराः ॥ २ ॥

अदिति के महान् सत्त्व का वर्णन करो—वही विशेष आश्चर्य का कारण है; क्योंकि सज्जन मुनिश्वर सदा परोपदेश में तत्पर रहते हैं।

Verse 3

सनक उवाच । श्रृणु नारद माहात्म्यं हरिभक्तिरतात्मनाम् । हरिध्यानपरान्साधून्कः समर्थः प्रबाधितुम् ॥ ३ ॥

सनक बोले—हे नारद, हरि-भक्ति में रत आत्माओं की महिमा सुनो। हरि-ध्यान में परायण साधुओं को कौन कष्ट पहुँचा सकता है?

Verse 4

हरिभक्तिपरो यत्र तत्र ब्रह्मा हरिः शिवः । देवाः सिद्धा मुनीश्वाश्च नित्यं तिष्टंति सत्तमाः ॥ ४ ॥

जहाँ हरि-भक्ति में परायण जन होता है, वहाँ ब्रह्मा, हरि और शिव स्वयं विराजते हैं; और वहीं देव, सिद्ध तथा श्रेष्ठ मुनि सदा निवास करते हैं।

Verse 5

हरिरास्ते महाभाग हृदये शान्तचेतसाम् । हरिनामपराणां च किमु ध्यानरतात्मनाम् ॥ ५ ॥

हे महाभाग! शान्त चित्त वालों के हृदय में हरि निवास करते हैं। जो हरि-नाम में परायण हैं, उनके लिए तो यह सत्य है ही—फिर ध्यान में रत आत्माओं की तो बात ही क्या!

Verse 6

शिवपूजारतो वाऽपि विष्णुपूजापरोऽपि वा । यत्र तिष्टति तत्रैव लक्ष्मीः सर्वाश्च देवताः ॥ ६ ॥

चाहे कोई शिव-पूजा में रत हो या विष्णु-पूजा में समर्पित—जहाँ ऐसा भक्त निवास करता है, वहीं लक्ष्मी और समस्त देवता वास करते हैं।

Verse 7

यत्र पूजापरो विष्णोर्वह्निस्तत्र न बाधते । राजा वा तस्करो वापि व्याधयश्च न सन्ति हि ॥ ७ ॥

जहाँ विष्णु-पूजा में परायणता होती है, वहाँ अग्नि बाधा नहीं देती; न राजा का भय रहता है, न चोरों का, और न ही रोग टिकते हैं।

Verse 8

प्रेताः पिशाचाः कूष्माण्डग्रहा बालग्रहास्तथा । डाकिन्यो राक्षसाश्चैव न बाधन्तेऽच्युतार्चकम् ॥ ८ ॥

प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड-ग्रह, बालग्रह, डाकिनियाँ और राक्षस—ये सब अच्युत (विष्णु) के अर्चक-भक्त को बाधा नहीं देते।

Verse 9

परपीडारता ये तु भूतवेतालकादयः । नश्यन्ति यत्र सद्भक्तो हरिलक्ष्म्यर्चने रतः ॥ ९ ॥

जो परपीड़ा में रत भूत-वेताल आदि हैं, वे वहाँ नष्ट हो जाते हैं जहाँ सच्चा भक्त हरि-लक्ष्मी के अर्चन में लीन रहता है।

Verse 10

जितेन्द्रियः सर्वहितो धर्मकर्मपरायणः । यत्र तिष्टति तत्रैव सर्वतीर्थानि देवताः ॥ १० ॥

जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है, जो सबके हित में लगा है और धर्मकर्म में परायण है—जहाँ वह रहता है, वहीं समस्त तीर्थ और देवता उपस्थित होते हैं।

Verse 11

निमिषं निमिषार्द्धं वा यत्र तिष्टन्ति योगिनः । तत्रैव सर्वश्रेयांसि तत्तीर्थं तत्तपोवनम् ॥ ११ ॥

जहाँ योगी एक निमिष या आधे निमिष भी ठहरते हैं, वहीं समस्त कल्याण-फल प्रकट हो जाते हैं; वही स्थान तीर्थ और वही तपोवन बन जाता है।

Verse 12

यन्नामोच्चारणादेव सर्वे नश्यन्त्युपद्रवाः । स्तोत्रैर्वाप्यर्हणाभिर्वा किमु ध्यानेन कथ्यते ॥ १२ ॥

जिनके नामोच्चारण मात्र से ही सब उपद्रव नष्ट हो जाते हैं; यदि स्तोत्रों या अर्चना से ऐसा होता है, तो ध्यान की महिमा का तो कहना ही क्या।

Verse 13

एवं तेनाग्निना विप्र दग्धं सासुरकाननम् । सादितिर्नैव दग्धाभूद्विष्णुचक्राभिरक्षिता ॥ १३ ॥

हे विप्र! उस अग्नि ने असुरों सहित वन को जला डाला; परन्तु अदिति नहीं जली, क्योंकि विष्णुचक्र ने उसकी रक्षा की।

Verse 14

ततः प्रसन्नवदनः पह्मपत्रायतेक्षणः । प्रादुरासीत्समीपेऽस्याः शङ्खचक्रगदाधरः ॥ १४ ॥

तब प्रसन्न मुख और कमल-पत्र-से नेत्रों वाले, शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले प्रभु उसके समीप प्रकट हुए।

Verse 15

ईषद्वास्यस्फुरद्दन्तप्रभाभाषितदिङ्मुखः । स्पृशन्करेण पुण्येन प्राह कश्यपवल्लभाम् ॥ १५ ॥

हल्के खुले मुख से चमकते दाँतों की प्रभा से दिशाएँ आलोकित करते हुए, उन्होंने अपने पवित्र हाथ से कश्यप की प्रिया को स्पर्श किया और कहा।

Verse 16

श्रीभगवाननवाच । देवमातः प्रसन्नोऽस्मि तपसाराधितस्त्वया । चिरं श्रान्तासि भद्रं ते भविष्यति न संशयः ॥ १६ ॥

श्रीभगवान बोले—हे देवमाता! तुम्हारे तप से आराधित होकर मैं प्रसन्न हूँ। तुमने बहुत काल तक कष्ट सहा है; तुम्हारा कल्याण अवश्य होगा—इसमें संशय नहीं।

Verse 17

वरं वरय दास्यामि यत्ते मनसि रोचते । मा भैर्भद्रे महाभागे ध्रुवं श्रेयो भविष्यति ॥ १७ ॥

वर माँग लो; जो तुम्हारे मन को प्रिय हो, मैं दूँगा। हे भद्रे, महाभागे! भय मत करो; तुम्हारा परम श्रेय निश्चय ही होगा।

Verse 18

इत्युक्तादेवमाता सा देवदेवेन चक्रिणा । तुष्टाव प्रणिपत्यैनं सर्वलोकसुखावहम् ॥ १८ ॥

देवदेव, चक्रधारी प्रभु के ऐसा कहने पर देवमाता ने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया और समस्त लोकों को सुख देने वाले उस प्रभु की स्तुति की।

Verse 19

अदितिरुवाच । नमस्ते देवदेवेश सर्वव्यापिञ्जनार्दना । सत्त्वादिगुणभेदेन लोकव्यापारकारण ॥ १९ ॥

अदिति बोली—हे देवदेवेश! हे सर्वव्यापी जनार्दन! सत्त्व आदि गुणों के भेद से जगत् के समस्त व्यवहारों के कारणरूप आपको नमस्कार है।

Verse 20

नमस्ते बहुपरुपायारुपाय च महात्मने । सर्वैकरुपरुपाय निर्गुणाय गुणात्मने ॥ २० ॥

हे महात्मन्! अनेक परम रूपों वाले और अरूप भी, सब रूपों में एक रूप होकर प्रकट होने वाले, निर्गुण होकर भी गुणों के आत्मा—आपको नमस्कार है।

Verse 21

नमस्ते लोकनाथाय परमज्ञानरुपिणे । सद्भक्तजनवात्सल्यशालिने मङ्गलात्मने ॥ २१ ॥

हे लोकनाथ! परम-ज्ञानस्वरूप, सच्चे भक्तों पर वात्सल्य बरसाने वाले, मंगलमय आत्मा—आपको नमस्कार है।

Verse 22

यस्यावताररुपाणि ह्यर्चयन्ति मुनीश्वराः । तमादिपुरुषं देवं नमामि ह्यर्थसिद्धये ॥ २२ ॥

जिनके अवतार-रूपों की मुनिश्रेष्ठ पूजा करते हैं, उस आदिपुरुष देव को मैं अपने प्रयोजन-सिद्धि हेतु प्रणाम करता हूँ।

Verse 23

श्रुतयो यं न जानन्ति न जानन्ति च सूरयः । तं नमामि जगद्धेतुं समायं चाप्यमायिनम् ॥ २३ ॥

जिसे श्रुतियाँ भी पूर्णतः नहीं जानतीं और जिसे मुनि भी नहीं जान पाते, उस जगत्कारण, समदर्शी तथा मायारहित प्रभु को मैं प्रणाम करता हूँ।

Verse 24

यस्यावलोकनं चित्रं मायोपद्रवकारणम् । जगद्रूपं जगद्धेतुं तं वन्दें सर्ववन्दितम् ॥ २४ ॥

जिनकी अद्भुत दृष्टि माया के उद्रेक का कारण बनती है, जो जगत् का रूप भी हैं और जगत् के कारण भी—सबके वन्दनीय उस प्रभु को मैं वन्दन करता हूँ।

Verse 25

यत्पादाम्बुजकिञ्जल्कसेवारक्षितमस्तकाः । अवापुः परमां सिद्धिं तं वन्दे कमलाधवम् ॥ २५ ॥

जिनके चरण-कमलों की केसर-धूलि की सेवा से जिनके मस्तक रक्षित होते हैं, वे भक्त परम सिद्धि पाते हैं—उस कमलाधव (विष्णु) को मैं वन्दन करता हूँ।

Verse 26

यस्य ब्रह्मादयो देवा महिमानं न वै विदुः । अत्यासन्नं च भक्तानां तं वन्दे भक्तसंगिनम् ॥ २६ ॥

जिनकी महिमा को ब्रह्मा आदि देव भी यथार्थ नहीं जानते, वे ही अपने भक्तों के अत्यन्त निकट, सदा भक्त-संग में रहने वाले हैं—मैं उस भक्तसंगिन प्रभु को वन्दन करता हूँ।

Verse 27

यो देवस्त्यक्तसङ्गानां शान्तानं करुणार्णवः । करोति ह्यात्मनः सङ्गं तं देवं सङ्गवर्जितम् ॥ २७ ॥

जो देव त्यागी और शान्त जनों के लिए करुणा का सागर हैं, वे उन्हें अपने ही सान्निध्य-संग में ले लेते हैं; और वही देव स्वयं सर्वथा असंग हैं—मैं उस असंग प्रभु को वन्दन करता हूँ।

Verse 28

यज्ञेश्वरं यज्ञकर्म यज्ञकर्मसु निष्टितम् । नमामि यज्ञफलदं यज्ञकर्मप्रबोधकम् ॥ २८ ॥

मैं यज्ञेश्वर को नमस्कार करता हूँ—जो स्वयं यज्ञकर्म-स्वरूप हैं, समस्त यज्ञकर्मों में दृढ़ प्रतिष्ठित हैं; यज्ञफल देने वाले और यज्ञकर्म को जाग्रत व प्रकाशित करने वाले हैं।

Verse 29

अजामिलोऽपि पापात्मा यन्नामोच्चारणादनु । प्राप्तवान्परमं धाम तं वन्दे लोकसाक्षिणम् ॥ २९ ॥

पापात्मा अजामिल भी जिनके नामोच्चारण मात्र से परम धाम को प्राप्त हुआ—मैं उस सर्वलोक-साक्षी प्रभु को वन्दन करता हूँ।

Verse 30

हरिरुपी महादेवः शिवरुपी जनार्दनः । इति लोकस्य नेता यस्तं नमामि जगद्गुरुम् ॥ ३० ॥

महादेव हरि-रूप हैं और जनार्दन शिव-रूप हैं—इस प्रकार जो जगत के नेता हैं, उस जगद्गुरु को मैं नमस्कार करता हूँ।

Verse 31

ब्रह्माद्या अपि देवेशा यन्मायापाशयन्त्रिताः । न जानन्ति परं भावं तं वन्दे सर्वनायकम् ॥ ३१ ॥

ब्रह्मा आदि देवेश भी, उसकी माया के पाश में बँधकर, उसके परम तत्त्व को नहीं जानते। मैं उस सर्वनायक प्रभु को प्रणाम करता हूँ।

Verse 32

ह्यत्पह्मस्थोऽपिञ्योग्यानां दूरस्थ इव भासते । प्रमाणातीतसद्भावस्तं वन्दे ज्ञानसाक्षिणम् ॥ ३२ ॥

हृदय-कमल में स्थित होकर भी अयोग्यों को वह दूरस्थ-सा प्रतीत होता है। प्रमाणों से परे शुद्ध सत्-स्वरूप उस ज्ञान-साक्षी को मैं प्रणाम करता हूँ।

Verse 33

यन्मु खाद्ब्राह्यणो जातो बाहुभ्यां क्षत्रियोऽजनि । ऊर्वोर्वैश्यः समुत्पन्नः पद्यां शूद्रोऽभ्यजायत ॥ ३३ ॥

उसके मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुआ, भुजाओं से क्षत्रिय प्रकट हुआ। जंघाओं से वैश्य उत्पन्न हुआ और चरणों से शूद्र का जन्म हुआ।

Verse 34

मनसश्चन्द्रमा जातो जातः सूर्यश्च चक्षुषः । मुखादग्निस्तर्थेन्द्रश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥ ३४ ॥

मन से चन्द्रमा उत्पन्न हुआ, नेत्र से सूर्य प्रकट हुआ। मुख से अग्नि तथा इन्द्र उत्पन्न हुए, और प्राण से वायु का जन्म हुआ।

Verse 35

ऋग्यजुःसामरुपाय सत्यस्वरगतात्मने । षडङ्गरुपिणे तुभ्यं भूयोभूयो नमो नमः ॥ ३५ ॥

ऋग्, यजुः और साम—इन वेदों के रूप में स्थित, सत्यस्वरों में आत्मा-रूप से विराजमान, तथा षडङ्ग वेदाङ्ग-स्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है।

Verse 36

त्वमिन्द्रः पवनः सोमस्त्वमीशानस्त्वमन्तकः । त्वमग्निर्निर्ऋतिश्चैव वरुणस्त्वं दिवाकरः ॥ ३६ ॥

आप ही इन्द्र हैं, आप ही पवन और सोम हैं। आप ही ईशान हैं और आप ही अन्तक (मृत्यु) हैं; आप ही अग्नि, निरृति, वरुण तथा दिवाकर (सूर्य) हैं।

Verse 37

देवाश्च स्थावराश्चैव पिशाचाश्चैव राक्षसाः । गिरयः सिद्धगंधर्वानद्यो भूमिश्च सागराः ॥ ३७ ॥

देवता, स्थावर प्राणी, पिशाच और राक्षस; पर्वत, सिद्ध और गन्धर्व; नदियाँ, पृथ्वी और सागर—ये सब (आपमें ही समाहित हैं)।

Verse 38

त्वमेव जगतामीशो यत्रासि त्वं परात्परः । त्वद्रूपमखिलं देव तस्मान्नित्यं नमोऽस्तु ते ॥ ३८ ॥

आप ही समस्त जगतों के ईश्वर हैं; जहाँ आप हैं, वहाँ आप परात्पर परम हैं। हे देव! यह अखिल विश्व आपका ही स्वरूप है; इसलिए आपको मेरा नित्य नमस्कार हो।

Verse 39

अनाथानाथ सर्वज्ञ भूतदेवेन्द्रविग्रह । दैतेयैर्बाधितान्पुत्रान्मम पाहि जनार्दन ॥ ३९ ॥

हे अनाथों के नाथ, हे सर्वज्ञ, भूत-देव-इन्द्र द्वारा वन्दित स्वरूप! हे जनार्दन, दैत्यों से पीड़ित मेरे पुत्रों की रक्षा कीजिए।

Verse 40

इति स्तुत्वा देवमाता देवं नत्वा पुनः पुनः । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा हर्षाश्रुक्षालितस्तनी ॥ ४० ॥

इस प्रकार स्तुति करके देवमाता ने प्रभु को बार-बार प्रणाम किया। फिर अञ्जलि बाँधे—हर्ष के आँसुओं से भीगी हुई—वह बोली।

Verse 41

अनुग्राह्यास्मि देवेंश त्वया सर्वादिकारण । अकण्टकां श्रियां देहि मत्सुतानां दिवौकसाम् ॥ ४१ ॥

हे देवेश, हे सर्वकारण! मैं आपकी कृपा का पात्र बनूँ। मेरे पुत्रों—स्वर्गवासियों—को निष्कण्टक, बाधारहित श्री-समृद्धि प्रदान कीजिए।

Verse 42

अन्तर्य्यामिञ्जगद्रूप सर्वज्ञा परमेश्वर । अज्ञातं किं तव श्रीश किं मामीहयसि प्रभो ॥ ४२ ॥

हे अन्तर्यामी, जगद्रूप, सर्वज्ञ परमेश्वर! हे श्रीश! आपको क्या अज्ञात हो सकता है? हे प्रभो, आप यहाँ मेरी परीक्षा क्यों लेते हैं?

Verse 43

तथापि तव वक्ष्यामि यन्मे मनसि रोचते । वृथापुत्रास्मि देवेश दैतेयैः परिपीडिता ॥ ४३ ॥

तथापि जो मेरे मन को रुचता है, वह मैं आपको कहूँगी। हे देवेश, मैं व्यर्थ-मातृत्व वाली स्त्री हूँ, दैत्यों द्वारा पीड़ित और सताई गई हूँ।

Verse 44

तान्न हिंसितुमिच्छामि यतस्तेऽपि सुता मम । तानहत्वा श्रियं देहि मत्सुतेभ्यः सुरेश्वर ॥ ४४ ॥

मैं उन्हें हानि नहीं पहुँचाना चाहती, क्योंकि वे भी मेरे ही पुत्र हैं। हे सुरेश्वर, उन्हें मारे बिना मेरे पुत्रों को श्री-समृद्धि प्रदान कीजिए।

Verse 45

इत्युक्तो देवेदेवेशः पुनः प्रीतिमुपागतः । उवाच हर्षयन्विप्र देवमातरमादरात् ॥ ४५ ॥

ऐसा कहे जाने पर देवों के देवेश पुनः प्रसन्न हुए और—ऋषि को हर्षित करते हुए—देवमाता से आदरपूर्वक बोले।

Verse 46

श्रीभगवानुवाच । प्रीतोऽस्मि देवि भद्रं ते भविष्यामि सुतो ह्यहम् । यतः सपत्निपुत्रेषु वात्सल्यं देवि दुर्लभम् ॥ ४६ ॥

श्रीभगवान् बोले— हे देवी, मैं प्रसन्न हूँ; तुम्हारा कल्याण हो। निश्चय ही मैं तुम्हारा पुत्र बनूँगा, क्योंकि हे देवी, सौत की संतान के प्रति वात्सल्य दुर्लभ होता है।

Verse 47

त्वया तु यत्कृतं स्तोत्रं तत्पठान्ति नरास्तु ये । तेषां संपद्वरा पुत्रा न हीयन्ते कदाचन ॥ ४७ ॥

तुम्हारे द्वारा रचित जो स्तोत्र है, उसे जो लोग पढ़ते हैं—उनकी समृद्धि और श्रेष्ठ संतान कभी भी क्षीण नहीं होती।

Verse 48

त्वात्मजे वान्यपुत्रे वा यः समत्वेन वर्तते । न तस्य पुत्रशोकः स्यादेष धर्मः सनातनः ॥ ४८ ॥

जो अपने पुत्र और पराए पुत्र के प्रति समान भाव से व्यवहार करता है, उसे पुत्र-वियोग का शोक नहीं होता; यही सनातन धर्म है।

Verse 49

अदितिरुवाच । ताह वोढुं क्षमा देव त्वामाद्यपुरुषं परम् । असंख्याताण्डरोमाणं सर्वेशं सर्वकारणम् ॥ ४९ ॥

अदिति बोली— हे देव, उन्हें धारण करने की कृपा करो। आप आद्य परम पुरुष हैं; जिनके रोमकूपों में असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, आप सर्वेश्वर और सर्वकारण-कारण हैं।

Verse 50

यत्प्रभावं न जानन्ति श्रुतयः सर्वदेवताः । तमहं देवदेवेशं धारयामि कथं प्रभो ॥ ५० ॥

हे प्रभो, जिनकी महिमा को वेद और समस्त देवता भी नहीं जानते—उस देवों के देवेश को मैं अपने भीतर कैसे धारण करूँ?

Verse 51

अणोरणीयांसमजं परात्परतरं प्रभुम् । धारयामि कथं देव त्वामहं पुरुषोत्तमम् ॥ ५१ ॥

हे देव, हे पुरुषोत्तम! जो अजन्मा, अणु से भी सूक्ष्म और परात्पर से भी परे प्रभु है—मैं आपको मन में कैसे धारण करूँ?

Verse 52

महापातकयुक्तोऽपि यन्नामस्मृतिमात्रतः । मुच्यते स कथं देवोग्राम्येषु जनिमर्हति ॥ ५२ ॥

जो महापातकों से युक्त भी हो, वह केवल उसके नाम-स्मरण मात्र से मुक्त हो जाता है; फिर वह दिव्य प्रभु साधारण सांसारिक जनों में जन्म कैसे ले सकता है?

Verse 53

यथा शूकरमत्स्याद्या अवतारास्तव प्रभो । तथायमपि को वेद तव विश्वेश चेष्टितम् ॥ ५३ ॥

हे प्रभो! जैसे वराह और मत्स्य आदि आपके अवतार प्रसिद्ध हैं, वैसे ही हे विश्वेश! इस (वर्तमान) रूप को और आपकी लीला के रहस्य को कौन जान सकता है?

Verse 54

त्वत्पादपह्मप्रणतात्वन्नामस्मृतितत्परा । त्वामेव चिंतये देव यथेच्छासि तथा कुरु ॥ ५४ ॥

आपके कमल चरणों में प्रणाम करके और आपके नाम-स्मरण में तत्पर रहकर, हे देव! मैं केवल आपका ही चिंतन करता हूँ; जैसा आपकी इच्छा हो वैसा कीजिए।

Verse 55

सनक उवाच । तयोक्तं वचनं श्रुत्वा देवदेवो जनार्दनः । दत्त्वाभयं देवमातुरिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५५ ॥

सनक बोले—उनके वचन सुनकर देवों के देव जनार्दन ने देवमाता को अभयदान दिया और ये वचन कहे।

Verse 56

श्रीभगवानुवाच । सत्यमुक्तं महाभागे त्वया नास्त्यत्र संशयः । तथापि श्रृणु वक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं शुभे ॥ ५६ ॥

श्रीभगवान बोले—हे महाभागे, तुमने सत्य कहा है; इसमें कोई संशय नहीं। फिर भी, हे शुभे, सुनो—मैं तुम्हें रहस्य से भी अधिक गुप्त उपदेश कहूँगा।

Verse 57

रागद्वेषविहीना ये मद्भक्ता मत्परायणाः । वंहति सततं तें मां गतासूया अदाम्भिकाः ॥ ५७ ॥

जो मेरे भक्त राग-द्वेष से रहित, केवल मुझमें शरणागत, विनम्र, ईर्ष्या-रहित और दम्भ-रहित हैं—वे मुझे अपने हृदय में निरन्तर धारण करते हैं।

Verse 58

परोपतापविमुखाः शिवभक्तिपरायणः । मत्कथाश्रवणासक्ता वहन्ति सततं हि माम् ॥ ५८ ॥

जो पर-पीड़ा से विमुख, शिव-भक्ति में परायण, और मेरी कथाओं के श्रवण में आसक्त हैं—वे निश्चय ही मुझे भीतर सदा धारण करते हैं।

Verse 59

पतिव्रताः परिप्राणाः पतिभक्तिपरायणाः । वहन्ति सततं देवि स्त्रियोऽपि त्यक्तप्रत्सराः ॥ ५९ ॥

हे देवि, स्त्रियाँ भी—पतिव्रता, पति को प्राण समान मानने वाली, पति-भक्ति में परायण, और कलह व दोष-दर्शन का त्याग करने वाली—सदा धर्म को धारण करती हैं।

Verse 60

मातापित्रोश्च शुश्रूषुर्गुरुभक्तोऽतिथिप्रियः । हितकृद्बाह्यणानां यः स मां वहति सर्वदा ॥ ६० ॥

जो माता-पिता की सेवा करता है, गुरु-भक्ति में स्थित है, अतिथि-सत्कार में आनंद लेता है, और ब्राह्मणों के हित के लिए कार्य करता है—वह मुझे सदा धारण करता है।

Verse 61

पुण्यतीर्थरता नित्यं सत्सङ्गनिरतास्तथा । लोकानुग्रहशीलाश्च सततं ते वहन्ति माम् ॥ ६१ ॥

जो सदा पुण्य तीर्थों में रत, सत्संग में निरत और लोक-कल्याण में प्रवृत्त रहते हैं—वे निरंतर मुझे अपने हृदय में धारण करते हैं।

Verse 62

परोपकारविरताः परद्रव्यपराङ्मुखाः । नषुंसकाः परस्त्रीषु ते वहन्ति च मां सदा ॥ ६२ ॥

जो पर-पीड़ा से विरत, पर-धन से विमुख और पर-स्त्रियों के प्रति कामरहित रहते हैं—वे सदा मुझे धारण करते हैं।

Verse 63

तुलस्युपासनरताः सदा नामपरायणाः । गोरक्षणपरा ये च सततं मां वहन्ति ते ॥ ६३ ॥

जो तुलसी-उपासना में आसक्त, सदा नाम-स्मरण में परायण और गो-रक्षा में तत्पर रहते हैं—वे निरंतर मुझे धारण करते हैं।

Verse 64

प्रतिग्रहनिवृत्ता ये परान्नविमुखास्तथा । अन्नोदकप्रदातारो वहंति सततं हि माम् ॥ ६४ ॥

जो प्रतिग्रह (उपहार-ग्रहण) से निवृत्त, परान्न से विमुख न होने वाले और अन्न-जल दान करने वाले हैं—वे निश्चय ही सदा मुझे धारण करते हैं।

Verse 65

त्वं तु देवि पतिप्राणा साध्वी भूतहिते रता । संप्राप्य पुत्रभावं ते साधयिष्ये मनोरथम् ॥ ६५ ॥

परन्तु हे देवि! तुम पतिप्राणा, साध्वी और भूत-हित में रत हो; अतः मातृत्व-भाव को प्राप्त करके मैं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगा।

Verse 66

इत्युक्त्वा देवेदेवशो ह्यदितिं देवमातरम् । दत्त्वा कण्ठगतां मालामभयं च तिरोदधे ॥ ६६ ॥

ऐसा कहकर देवों के देवेश्वर ने देवमाता अदिति से कहा; फिर अपने कंठ की माला उन्हें पहनाकर और अभय प्रदान करके वे अंतर्धान हो गए।

Verse 67

सा तु संहृष्टमनसा देवसूर्दक्षनन्दिनी । प्रणम्य कमलाकान्तं पुनः स्वस्थानमाव्रजत् ॥ ६७ ॥

तब हर्षित हृदय वाली, दक्ष की पुत्री और देवों की जननी अदिति ने कमलाकान्त विष्णु को प्रणाम किया और फिर अपने धाम को लौट गई।

Verse 68

ततोऽदितिर्महाभागा सुप्रीता लोकवन्दिता । असूत समये पुत्रं सर्वलोकनमस्कृतम् ॥ ६८ ॥

तत्पश्चात् महाभागा, अत्यन्त प्रसन्न और लोकों द्वारा वन्दिता अदिति ने समय आने पर ऐसे पुत्र को जन्म दिया जिसे समस्त लोक नमस्कार करते हैं।

Verse 69

शङ्गचक्रधरं शान्तं चन्द्रमण्डलमध्यगम् । सुधाकलशदध्यन्नकरं वामनसंज्ञितम् ॥ ६९ ॥

वे शान्त स्वरूप, शंख-चक्र धारण करने वाले, चन्द्रमण्डल के मध्य स्थित; हाथों में सुधा का कलश और दध्यन्न का पात्र धारण करने वाले—वामन नाम से प्रसिद्ध हैं।

Verse 70

सहस्त्रादित्यसंकाशं व्याकोशकमलेक्षणम् । सर्वाभरणंसंयुक्तं पीताम्बरधरं हरिम् ॥ ७० ॥

हज़ार सूर्यों के समान तेजस्वी, खिले हुए कमल के समान नेत्रों वाले, समस्त आभूषणों से विभूषित और पीताम्बर धारण करने वाले हरि का ध्यान करना चाहिए।

Verse 71

स्तुत्यं मुनिगणैर्युक्तं सर्वलोकैकनायकम् । आविर्भूतं हरिं ज्ञात्वा कश्यपो हर्षविह्वलः । प्रणम्य प्रञ्जलिर्भूत्वा स्तोतुं समुपचक्रमे ॥ ७१ ॥

मुनिगणों से सेवित, समस्त लोकों के एकमात्र नायक, स्तुत्य श्रीहरि को प्रकट हुआ जानकर कश्यप हर्ष से विह्वल हो गया। उसने दण्डवत् प्रणाम किया और हाथ जोड़कर स्तुति आरम्भ की।

Verse 72

कश्यप उवाच । नमोनमस्तेऽखिलकारणाय नमोनमस्तेऽखइलपालकाय । नमोनमस्तेऽमरनायकाय नमोनमो दैतेयविनाशनाय ॥ ७२ ॥

कश्यप बोले—आपको बार-बार नमस्कार, हे समस्त कारण! आपको बार-बार नमस्कार, हे समस्त के पालक! आपको बार-बार नमस्कार, हे देवों के नायक! आपको बार-बार नमस्कार, हे दैत्यों के विनाशक!

Verse 73

नमोनमो भक्तजनप्रियाय नमोनमः सज्जनरंजिताय । नमोनमो दुर्जननाशनाय नमोऽस्तु तस्मै जगदीश्वराय ॥ ७३ ॥

भक्तजनों के प्रिय को बार-बार नमस्कार; सज्जनों को आनन्दित करने वाले को बार-बार नमस्कार; दुर्जनों का नाश करने वाले को बार-बार नमस्कार। उस जगदीश्वर को नमस्कार हो।

Verse 74

नमोनमः कारणवामनाय नारायणायामितविक्रमाय । सशार्ङ्गचक्रासिगदाधाराय नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ॥ ७४ ॥

कारण-स्वरूप वामन, अमित पराक्रम वाले नारायण को बार-बार नमस्कार। जो शार्ङ्ग धनुष, चक्र, खड्ग और गदा धारण करते हैं—उस पुरुषोत्तम को नमस्कार हो।

Verse 75

नमः पयोराशिनिवासनाय नमोऽस्तु सद्धृत्कमलस्थिताय । नमोऽस्तु सूर्याद्यमितप्रभाय नमोनमः पुण्यकथागताय ॥ ७५ ॥

क्षीरसागर में निवास करने वाले को नमस्कार; शुद्ध हृदय-रूपी कमल में स्थित को नमस्कार। सूर्य आदि से भी असीम प्रभा वाले को नमस्कार; पुण्य कथाओं द्वारा प्राप्त होने वाले को बार-बार नमस्कार।

Verse 76

नमोनमोऽर्केन्दुविलोचनाय नमोऽस्तु ते यज्ञफलप्रदाय । नमोऽस्तु यज्ञाङ्गविराजिताय नमोऽस्तु ते सज्जनवल्लभाय ॥ ७६ ॥

बार-बार नमस्कार है आपको, जिनके नेत्र सूर्य और चन्द्रमा के समान हैं। आपको नमस्कार, जो यज्ञों का फल प्रदान करते हैं। आपको नमस्कार, जो यज्ञ के अंगों से विभूषित होकर प्रकाशित होते हैं। आपको नमस्कार, जो सज्जनों के प्रिय हैं॥

Verse 77

नमो जगत्कारणकारणाय नमोऽस्तु शब्दादिविवर्जिताय । नमोऽस्तु ते दिव्यसुखप्रदाय नमो नमो भक्तमनोगताय ॥ ७७ ॥

आपको नमस्कार, जो जगत् के कारण के भी कारण हैं। आपको नमस्कार, जो शब्द आदि से परे हैं। आपको नमस्कार, जो दिव्य सुख प्रदान करते हैं। भक्तों के मन में निवास करने वाले आपको बार-बार नमस्कार॥

Verse 78

नमोऽस्तु ते ध्वान्तविनाशकाय नमोऽस्तु शब्दादिविवर्जिताय । नमोऽस्तु ते ध्वान्तविनाशकाय मन्दरधारकाय । नमोऽस्तु ते यज्ञवराहनाम्ने नमो हिरण्याक्षविदारकाय ॥ ७८ ॥

आपको नमस्कार, हे अन्धकार-विनाशक। आपको नमस्कार, जो शब्द आदि से परे हैं। आपको नमस्कार, हे अन्धकार-नाशक, मन्दर पर्वत को धारण करने वाले। आपको नमस्कार, यज्ञ-वराह नामधारी। हिरण्याक्ष का विदारण करने वाले आपको नमस्कार॥

Verse 79

नमोऽस्तु ते वामनरुपभाजे नमोऽस्तु ते क्षत्र्रकुलान्तकाय । नमोऽस्तु ते रावणमर्दनाय नमोऽस्तु ते नन्दसुताग्रजाय ॥ ७९ ॥

आपको नमस्कार, जो वामन रूप धारण करते हैं। आपको नमस्कार, जो क्षत्रिय कुलों का अन्त करने वाले हैं। आपको नमस्कार, जो रावण का मर्दन करने वाले हैं। आपको नमस्कार, जो नन्द-सुत (कृष्ण) के अग्रज हैं॥

Verse 80

नमस्ते कमलाकान्त नमस्ते सुखदायिने । स्मृतार्तिनाशिने तुभ्यं भूयो भूयो नमोनमः ॥ ८० ॥

हे कमलाकान्त! आपको नमस्कार; हे सुखदायिन्! आपको नमस्कार। जो स्मरण करने वालों की पीड़ा हर लेते हैं, आपको—बार-बार नमस्कार, नमस्कार॥

Verse 81

यज्ञेश यज्ञविन्यास यज्ञविन्घविनाशन । यज्ञरुप यजद्रूप यज्ञाङ्गं त्वां यजाम्यहम् ॥ ८१ ॥

हे यज्ञेश! हे यज्ञ-विन्यासकर्ता! यज्ञ के विघ्नों के विनाशक! हे यज्ञस्वरूप, यजमान-स्वरूप और यज्ञ के अंग-स्वरूप प्रभो—मैं आपकी आराधना करता हूँ।

Verse 82

इति स्तुतः स देवेशो वामनो लोकपावनः । उवाच प्रहसन्हर्षं वर्ध्दयन्कश्यपस्य सः ॥ ८२ ॥

इस प्रकार स्तुत होकर देवेश, लोकपावन वामन, मुस्कराते हुए बोले और कश्यप के हर्ष को बढ़ाने लगे।

Verse 83

श्रीभगवानुवाच । तात तुष्टोऽस्मि भद्रं ते भविष्यति सुरार्चिता । अचिरात्साधयिष्यामि निखिलं त्वन्मनोरथम् ॥ ८३ ॥

श्रीभगवान बोले: हे तात! मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, हे देवों द्वारा भी पूजित। शीघ्र ही मैं तुम्हारे हृदय के समस्त मनोरथ पूर्ण करूँगा।

Verse 84

अहं जन्मद्वये त्वेवं युवयोः पुत्रतां गतः । अस्मिञ्जन्मन्यपि तथा सादयाम्युत्तमं सुखम् ॥ ८४ ॥

दो जन्मों में मैं इस प्रकार तुम दोनों का पुत्र बना; और इस जन्म में भी वैसे ही मैं परम सुख को प्राप्त करता हूँ।

Verse 85

अत्रान्तरे बलिर्दैत्यो दीर्घसत्रं महामखम् । आरेभे गुरुणा युक्तः काव्येन च मुनीश्वरैः ॥ ८५ ॥

इसी बीच दैत्यराज बलि ने दीर्घसत्र नामक महान यज्ञ आरम्भ किया, अपने गुरु काव्य (शुक्राचार्य) तथा श्रेष्ठ मुनियों के साथ।

Verse 86

तस्मिन्मखे समाहूतो विष्णुर्लक्ष्मीसमन्वितः । हविः स्वीकरणार्थाय ऋषिभिर्ब्रह्यवादिभिः ॥ ८६ ॥

उस यज्ञ में ब्रह्म के उपदेशक ऋषियों ने लक्ष्मी सहित भगवान् विष्णु का आवाहन किया, ताकि वे हवि को स्वीकार करें।

Verse 87

प्रवृद्धैश्वर्यर्दैत्यस्य वर्त्तमाने महाक्रतौ । आमंत्र्य मातापितरौ स बटुर्वामनो ययौ ॥ ८७ ॥

दैत्य के बढ़ते ऐश्वर्य के बीच जब उसका महाक्रतु चल रहा था, तब बटु वामन माता-पिता से अनुमति लेकर चल पड़े।

Verse 88

स्मितेन मोहयँल्लोकं वामनो भक्तवत्सलः । हविर्भोक्तुमिवायातो बलेः प्रत्यक्षतो हरिः ॥ ८८ ॥

मृदु मुस्कान से लोक को मोहित करते, भक्तवत्सल वामन मानो हवि भोगने आए हों—हरि बली के सामने प्रत्यक्ष प्रकट हुए।

Verse 89

दुर्वृत्तो वा सुवृत्तो वा जडो वायं हितोऽपि वा । यो भक्तियुक्तस्तस्यान्तः सदा संनिहितो हरिः ॥ ८९ ॥

चाहे कोई दुर्वृत्त हो या सुवृत्त, जड़ हो या हितकारी—जो भक्ति से युक्त है, उसके भीतर हरि सदा निवास करते हैं।

Verse 90

आयान्तं वामनं दृष्ट्वा ऋषयो ज्ञानचक्षुषः । ज्ञात्वा नारायणं देवमुद्ययुः सभ्यसंयुताः ॥ ९० ॥

वामन को आते देखकर ज्ञानचक्षु ऋषियों ने उन्हें देव नारायण जान लिया; और सभासदों सहित वे सम्मान हेतु उठ खड़े हुए।

Verse 91

एतज्ज्ञात्वा दैत्यगुरुरेकांते बलिमब्रवीत् । स्वसारमविचार्यैव खलाः कार्याणि कुर्वते ॥ ९१ ॥

यह जानकर दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने एकांत में बलि से कहा—जो अपने ही हित का विचार नहीं करते, वे दुष्ट अपनी इच्छा से कर्म करते हैं।

Verse 92

शुक्र उवाच । भो भो दैत्यपते सौम्य ह्यपहर्ता तव श्रियम् । विष्णुर्वामनरुपेण ह्यदितेः पुत्रातां गतः ॥ ९२ ॥

शुक्राचार्य बोले—हे सौम्य दैत्यपति! तुम्हारी श्री को हरने वाला आ पहुँचा है—अदिति का पुत्र बनकर विष्णु वामन-रूप में आया है।

Verse 93

तवाध्वरं स आयाति त्वया तस्यासुरेश्वर । न किंचिदपि दातव्यं मन्मतं श्रृणु पण्डित ॥ ९३ ॥

वह तुम्हारे यज्ञ में आ रहा है; इसलिए, हे असुरेश्वर, उसे कुछ भी दान न देना। हे पण्डित, मेरी सम्मति सुनो।

Verse 94

आत्मबुद्धिः सुखकरी गुरुबुद्धिर्विशेषतः । परबुद्धिर्विनाशाय स्त्रीबुध्दिः प्रलयंकरी ॥ ९४ ॥

अपनी बुद्धि से किया विचार सुख देता है; गुरु-बुद्धि तो विशेष रूप से कल्याणकारी है। पराई बुद्धि पर चलना विनाशक है, और स्त्री-आसक्ति से शासित बुद्धि जीवन-नाशिनी कही गई है।

Verse 95

शत्रूणां हितकृतद्यस्तु स हन्तव्यो विशेषतः ॥ ९५ ॥

जो शत्रुओं का हित करने लगे, वह विशेष रूप से दण्डनीय—निग्रह योग्य है।

Verse 96

बलिरुवाच । एवं गुरो न वक्तव्यं धर्ममार्गविरोधतः । यदादत्ते स्वयं विष्णुः किमस्मादधिकं वरम् ॥ ९६ ॥

बलि बोले—हे गुरुदेव, ऐसा वचन नहीं कहना चाहिए, क्योंकि यह धर्ममार्ग के विरुद्ध है। जब स्वयं भगवान विष्णु दान स्वीकार करें, तो इससे बढ़कर वर क्या हो सकता है?

Verse 97

कुर्वन्ति विदुषो यज्ञान्विष्णुप्रीणनकारणात् । स चेत्साक्षाद्धविर्भोगी मत्तः कोऽभ्यधिको भुवी ॥ ९७ ॥

विद्वान लोग विष्णु को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करते हैं। यदि वही साक्षात् हवि के भोक्ता हैं, तो पृथ्वी पर उनसे बढ़कर कौन है?

Verse 98

दरिद्रेणापि यत्किंचिद्दीयते विष्णवे गुरो । तदेव परमं दानं दत्तं भवति चाक्षयम् ॥ ९८ ॥

हे गुरो, दरिद्र व्यक्ति भी जो कुछ थोड़ा-सा विष्णु को या गुरु को अर्पित करता है, वही परम दान है; दिया हुआ दान अक्षय फल देने वाला होता है।

Verse 99

स्मृतोऽपि परया भक्त्या पुनाति पुरुषोत्तमः । येन केनाप्यर्चितश्वेद्ददाति परमां गतिम् ॥ ९९ ॥

परम भक्ति से केवल स्मरण करने पर भी पुरुषोत्तम शुद्ध कर देते हैं। और किसी भी प्रकार से उनकी पूजा की जाए तो वे परम गति प्रदान करते हैं।

Verse 100

हरिर्हरति पापानिदुष्टचित्तैरपि स्मृतः । अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥ १०० ॥

हरि दुष्टचित्त वालों द्वारा भी स्मरण किए जाने पर पापों को हर लेते हैं। जैसे अग्नि अनिच्छा से छू लेने पर भी अवश्य जला देती है।

Verse 101

जिह्वाग्रे वसते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् । स विष्णुलोकमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥ १ ॥

जिसकी जिह्वा के अग्रभाग पर ‘हरि’ यह द्व्यक्षरी नाम सदा वास करता है, वह विष्णुलोक को प्राप्त होता है, जहाँ पुनर्जन्म का लौटना दुर्लभ है।

Verse 102

गोविंदेति सदा ध्यायेद्यस्तु रागादिवर्जितः । स याति विष्णुभवनमिति प्राहुर्मनीषिणः ॥ २ ॥

जो राग आदि से रहित होकर सदा ‘गोविंद’ का ध्यान करता है, वह विष्णु-धाम को जाता है—ऐसा मनीषीजन कहते हैं।

Verse 103

अग्नौ वा ब्राह्मणे वापिहूयते यद्वविर्गुरो । हरिभक्त्या महाभाग तेन विष्णुः प्रसीदति ॥ ३ ॥

हे महाभाग! आहुति अग्नि में दी जाए या ब्राह्मण को अर्पित की जाए—यदि वह हरि-भक्ति से समर्पित हो, तो उसी से विष्णु प्रसन्न होते हैं।

Verse 104

अहं तु हरितुष्यद्यर्थं करोम्यध्वरमुत्तमम् । स्वयमायाति चेद्विष्णुः कृतार्थोऽस्मि न संशयः ॥ ४ ॥

मैं तो केवल हरि को तुष्ट करने के लिए यह उत्तम यज्ञ कर रहा हूँ। यदि विष्णु स्वयं यहाँ पधारें, तो निःसंदेह मैं कृतार्थ हो जाऊँगा।

Verse 105

एवं वदति दैत्यन्द्रे विष्णुर्वामनरुपधृक् । प्रविवेशाध्वरस्थानं हुतवह्निमनोरमम् ॥ ५ ॥

दैत्येन्द्र के ऐसा कहते ही, विष्णु वामन-रूप धारण करके, पवित्र अग्नि से मनोहर उस यज्ञ-मंडप में प्रविष्ट हुए।

Verse 106

तं दृष्ट्वा कोटिसूर्याभं योग्यावयवसुन्दरम् । वामनं सहसोत्थाय प्रत्यगृह्णात्कृताञ्जलिः ॥ ६ ॥

उसे करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी और सुडौल अंगों से सुशोभित वामन रूप में देखकर वह तुरंत उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर श्रद्धापूर्वक उनका स्वागत किया।

Verse 107

दत्त्वासनं च प्रक्षाल्य पादौ वामनरुपिणम् । सकुटुंबो वहन्मूर्ध्ना परमां मुदमाप्तवान् ॥ ७ ॥

उन्होंने प्रभु के वामन-रूप को आसन अर्पित किया और विधिपूर्वक उनके चरण धोए; फिर परिवार सहित उन्हें मस्तक पर धारण कर परम आनंद को प्राप्त हुए।

Verse 108

विष्णवेऽस्मै जगद्धान्मे दत्त्वार्घ्यं विधिवद्कलिः । रोमाञ्चिततनुर्भूत्वा हर्षाश्रुनयनोऽब्रवीत् । बलिरुवाच ॥ ८ ॥

जगत्-धाम इस विष्णु को विधिपूर्वक अर्घ्य अर्पित करके, रोमांचित शरीर और हर्षाश्रुओं से भरी आँखों वाला वह बोला—बलि ने कहा।

Verse 109

अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलो मरवः । जीवितं सफलं मेऽद्य कृतार्थोऽस्मि न संशयः ॥ ९ ॥

आज मेरा जन्म सफल हुआ; आज मेरा जीवन भी सफल हुआ। आज मेरा जीना सार्थक हो गया—निःसंदेह मैं कृतार्थ हूँ।

Verse 110

अमोघामृतवृष्टिर्मे समायातातिदुर्लभा । त्वदागमनमात्रेण ह्यनायासो महोत्सवः ॥ ११० ॥

मेरे लिए अत्यन्त दुर्लभ अमोघ अमृत-वृष्टि आ पहुँची है। आपके मात्र आगमन से ही बिना परिश्रम महान उत्सव हो उठा है।

Verse 111

एते च ऋषयः सर्वे कृतार्थां नात्र संशयः । यैः पूर्वं हि तपस्तप्तं तदद्य सफलं प्रभो ॥ ११ ॥

ये सभी ऋषि निश्चय ही कृतार्थ हैं—इसमें कोई संशय नहीं। जिन्होंने पहले तप किया था, वह आज फलित हो गया है, हे प्रभो।

Verse 112

कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि न संशयः । तस्मात्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमोनमः ॥ १२ ॥

मैं कृतार्थ हूँ, मैं कृतार्थ हूँ, मैं कृतार्थ हूँ—इसमें संशय नहीं। इसलिए आपको नमस्कार, आपको नमस्कार, आपको नमस्कार, आपको नमस्कार—बारंबार प्रणाम।

Verse 113

त्वदाज्ञया त्वन्नियोगं साधयामीति मन्मनः । अत्युत्साहसमायुक्तं समाज्ञापय मां प्रभो ॥ १३ ॥

“आपकी आज्ञा से मैं आपका नियोग सिद्ध करूँगा”—ऐसा निश्चय मन में लेकर, महान उत्साह से युक्त मुझे भली-भाँति आदेश दीजिए, हे प्रभो।

Verse 114

एवमुर्को दीक्षितेन प्रहसन्वामनोऽब्रवीत् । देहि मे तपसि स्थातुं भूमिं त्रिपदसंमिताम् ॥ १४ ॥

दीक्षित यजमान द्वारा ऐसा कहे जाने पर, मुस्कराते हुए वामन ने कहा—“मुझे तप में स्थित होने हेतु तीन पग जितनी भूमि दीजिए।”

Verse 115

एतच्छॄत्वा बलिः प्राह राज्यं याचितवान्नहि । ग्रामं वा नगरं चापि धनं वा किं कृतं त्वया ॥ १५ ॥

यह सुनकर बलि बोला—“तुमने न राज्य माँगा, न ग्राम, न नगर, न धन; फिर तुमने यह क्या किया (तुम्हारा अभिप्राय क्या है)?”

Verse 116

तन्निशम्य बलिं प्राह विष्णुः सर्वशरीरभृत् । आसन्नभ्रष्टराज्यस्य वैराग्यं जनयन्निवा ॥ १६ ॥

यह सुनकर समस्त देहधारियों के धारक श्रीविष्णु ने बलि से कहा, मानो जिसका राज्य छिनने ही वाला था, उसमें वैराग्य जगा रहे हों।

Verse 117

श्रीभगवानुवाचा । श्रृणु दैत्यन्द्र वक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतमं परम् । सर्वसंगविहीनानां किमर्थैः साध्यतेवद ॥ १७ ॥

श्रीभगवान बोले—हे दैत्येन्द्र, सुनो; मैं तुम्हें परम उपदेश कहूँगा, जो रहस्य से भी अधिक रहस्य है। जो सर्वसंग से रहित हैं, उनके लिए सांसारिक अर्थ-भोग से क्या सिद्ध होता है, बताओ।

Verse 118

अहं तु सर्वभूतानामन्तर्यामीति भावय । मयि सर्वमिदं दैत्य किमन्यैः साध्यते वद ॥ १८ ॥

ऐसा भाव करो—‘मैं ही समस्त भूतों के भीतर अन्तर्यामी हूँ।’ हे दैत्य, जब यह सब मुझमें ही स्थित है, तो अन्य किसी से क्या साध्य है, बताओ।

Verse 119

रागद्वेषविहीनानां शान्तानां त्यक्तमायिनाम् । नित्यानंदस्वरुपाणां किमन्यैः साध्यते धनैः ॥ १९ ॥

जो राग-द्वेष से रहित, शान्त, माया के आडंबर को त्याग चुके, और जिनका स्वरूप नित्य आनन्द है—उनके लिए अन्य धन से क्या साध्य है?

Verse 120

आत्मवत्सर्वभूतानि पश्यतां शान्तचेतसाम् । अभिन्नमात्मनः सर्वं को दाता दीयते च किम् ॥ १२० ॥

जो शान्तचित्त होकर समस्त भूतों को आत्मवत् देखते हैं, उनके लिए सब कुछ आत्मा से अभिन्न है। तब दाता कौन, और दिया ही क्या जाता है?

Verse 121

पृथ्वीयं क्षत्रियवशा इति शास्त्रेषु निश्चितम् । तदाज्ञायां स्थिताः सर्वे लभन्ते परमं सुखम् ॥ २१ ॥

शास्त्रों में निश्चय है कि यह पृथ्वी क्षत्रियों के अधीन है। जो सब उनकी धर्मयुक्त आज्ञा में स्थित रहते हैं, वे परम सुख पाते हैं।

Verse 122

दातव्यो मुनिभिश्चापि षष्टांशो भूभुजे बले । महीयं ब्राह्मणानां तु दातव्या सर्व यत्नतः ॥ २२ ॥

राजा समर्थ हो तो मुनियों को भी उसे षष्ठांश देना चाहिए। परन्तु भूमि तो ब्राह्मणों को सर्व प्रयत्न से, अत्यन्त सावधानीपूर्वक देनी चाहिए।

Verse 123

भूमिदानस्य माहात्म्यं न भूतं न भविष्यति । परं निर्वाणमाप्नोति भूमिदो नात्र संशयः ॥ २३ ॥

भूमिदान की महिमा न पहले कभी हुई है, न आगे होगी। भूमिदाता परम निर्वाण को प्राप्त करता है—इसमें संशय नहीं।

Verse 124

स्वल्पामपि महीं दत्त्वा श्रोत्रियायाहिताग्नये । ब्रह्मलोकमवाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥ २४ ॥

श्रोत्रिय, आहिताग्नि ब्राह्मण को थोड़ी-सी भूमि भी दान देकर मनुष्य ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है, जहाँ से पुनरावृत्ति दुर्लभ है।

Verse 125

भूमिदः सर्वदः प्रोक्तो भूमिदो मोक्षभाग्भवेत् । अतिदानं तु तज्ज्ञेयं सर्वपापप्राणाशनम् ॥ २५ ॥

भूमिदाता को ‘सर्वदाता’ कहा गया है; भूमिदाता मोक्ष का भागी होता है। इसे अतिदान जानो—यह समस्त पापों के प्राण का नाश करता है।

Verse 126

महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः । दशहस्तां महीं दत्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २६ ॥

चाहे कोई महापातक से युक्त हो या सब प्रकार के पापों से दबा हो, दस हाथ प्रमाण भूमि का दान करके वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

Verse 127

सत्पात्रे भूमिदाता यः सर्वदानफलं लभेत् । भूमिदानसमं नान्यत्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ २७ ॥

जो सत्पात्र को भूमि दान देता है, वह समस्त दानों का फल प्राप्त करता है; तीनों लोकों में भूमि-दान के समान कोई दूसरा दान नहीं है।

Verse 128

द्विजाय वृत्तिहीनाय यः प्रदद्यान्महीं बले । तस्य पुण्यफलं वक्तुं न क्षमोऽब्दशतैरहम् ॥ २८ ॥

जो अपनी सामर्थ्य के अनुसार आजीविका-हीन द्विज (ब्राह्मण) को भूमि देता है, उस दान से उत्पन्न पुण्य-फल का वर्णन मैं सैकड़ों वर्षों में भी करने में समर्थ नहीं हूँ।

Verse 129

सक्ताय देवपूजासु वृत्तिहीनाय दैत्यप । स्वल्पामपि महीं दद्याद्यः स विष्णुर्न संशयः ॥ २९ ॥

हे दैत्यप! जो देव-पूजा में आसक्त किन्तु आजीविका-हीन व्यक्ति को थोड़ी-सी भी भूमि देता है, वह निःसंदेह विष्णु-स्वरूप है।

Verse 130

इक्षुगोधूम तुवरीपूगवृक्षादिसंयुता । पृथ्वी प्रदीयते येन स विष्णुर्नात्र संशयः ॥ १३० ॥

जो गन्ना, गेहूँ, दालें, सुपारी आदि वृक्षों से युक्त पृथ्वी का दान करता है, वह निःसंदेह विष्णु ही है।

Verse 131

वृत्तिहीनाय विप्राय दरिद्राय कुटुम्बिने । स्वल्पामपि महींदत्त्वा विष्णुसायुज्यमान्पुयात् ॥ ३१ ॥

जो आजीविका से रहित, दरिद्र और कुटुम्ब-पालक ब्राह्मण को थोड़ी-सी भी भूमि दान देता है, वह श्रीविष्णु के सायुज्य को प्राप्त होता है।

Verse 132

सक्ताय देवपूजासु विप्रायाढकिकां महीम् । दत्त्वा लभेत गङ्गायां त्रिरात्रस्नानजं फलम् ॥ ३२ ॥

देवपूजा में आसक्त ब्राह्मण को एक आढक-परिमाण भूमि दान देने से गङ्गा में तीन रात्रि स्नान का पुण्यफल प्राप्त होता है।

Verse 133

विप्राय वृत्तिहीनाय सदाचाररताय च । द्रोणिकां पृथिवीं दत्त्वा यत्फलं लभते श्रृणु ॥ ३३ ॥

आजीविका से रहित और सदाचार में रत ब्राह्मण को द्रोणिका-परिमाण भूमि दान करने से जो पुण्यफल मिलता है, उसे सुनो।

Verse 134

गङ्गातीर्थाश्वमेधानां शतानि विधिवन्नरः । कृत्वा यत्फलमाप्वोति तदाप्नोति स पुष्कलम् ॥ ३४ ॥

गङ्गातीर्थ की सैकड़ों यात्राएँ और सैकड़ों अश्वमेध यज्ञ विधिपूर्वक करने से जो फल मनुष्य पाता है, वही प्रचुर फल वह यहाँ भी प्राप्त करता है।

Verse 135

ददाति खारिकां भूमिं दरिद्राय द्विजाय यः । तस्य पुण्यं प्रवक्ष्यामि वदतो मे निशामय ॥ ३५ ॥

जो दरिद्र ब्राह्मण को खारिका-परिमाण भूमि दान देता है, उसके पुण्य का मैं वर्णन करूँगा—मेरी वाणी सुनो।

Verse 136

अश्वमेधसहस्त्राणि वाजपेयशतानि च । विधाय जाह्नवीतीरे यत्फलं तल्लभेद्धुवम् ॥ ३६ ॥

जो कोई जाह्नवी (गंगा) के तट पर पूजन‑व्रत आदि करता है, वह निश्चय ही वही पुण्यफल पाता है जो अन्यथा हजार अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञों से मिलता है।

Verse 137

भूमिदानं महादानमतिदानं प्रकीर्त्तितम् । सर्वपापप्रशमनमपवर्गफलप्रदम् ॥ ३७ ॥

भूमिदान को महादान, बल्कि अतिदान कहा गया है; यह समस्त पापों का शमन करता है और मोक्षरूपी फल प्रदान करता है।

Verse 138

अत्रोतिहासं वक्ष्यामि श्रृणु दैत्यकुलेश्वर । यच्छुत्वा श्रद्धया युक्तो भूमिदानफलं लभेत् ॥ ३८ ॥

अब मैं यहाँ एक प्राचीन इतिहास कहूँगा—हे दैत्यकुल-ईश्वर, सुनो; जिसे श्रद्धा से सुनकर मनुष्य भूमिदान का फल प्राप्त करता है।

Verse 139

आसीत्पुरा द्विजवरो ब्राह्मकल्पे महामतिः । दरिद्रो वृत्तिहीनश्च नाम्ना भद्रमतिर्बले ॥ ३९ ॥

प्राचीन काल में, ब्रह्मकल्प के समय, एक श्रेष्ठ द्विज ब्राह्मण था—महामति; पर वह दरिद्र और निर्वाहहीन था, और बल देश में ‘भद्रमति’ नाम से प्रसिद्ध था।

Verse 140

श्रुतानि सर्वशास्त्राणि तेन वेददिवानिशम् । श्रुतानि च पुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वशः ॥ १४० ॥

उसने समस्त शास्त्र सुने थे; वह दिन‑रात वेद का अध्ययन करता था। उसने पुराण और सभी प्रकार के धर्मशास्त्र भी सुने थे।

Verse 141

अभवंस्तस्य षट्पत्न्यः श्रुतिः सिन्धुर्यशोवती । कामिनी मालिनी चैव शोभा चेति प्रकीर्तिताः ॥ ४१ ॥

उसकी छह पत्नियाँ थीं—श्रुति, सिन्धु, यशोवती, कामिनी, मालिनी और शोभा—ऐसा परम्परा में कहा गया है।

Verse 142

आसु पत्नीषु तस्यासञ्चत्वरिंशच्छतद्वयम् । पुत्राणामसुरश्रेष्ट सर्वे नित्यं बुभुक्षिताः ॥ ४२ ॥

उन पत्नियों से, हे असुरश्रेष्ठ, उसके दो सौ बयालीस पुत्र हुए; और वे सभी सदा भूख से व्याकुल रहते थे।

Verse 143

अकिञ्चनो भद्रमतिः क्षुधार्त्तानात्मजान्प्रियाः । पश्यन्स्वयं क्षुधार्त्तश्च विललापाकुलेन्द्रियः ॥ ४३ ॥

निर्धन भद्रमति ने अपने प्रिय पुत्रों को भूख से पीड़ित देखा; और स्वयं भी भूख से व्याकुल होकर, इन्द्रियाँ अस्थिर होने पर, वह विलाप करने लगा।

Verse 144

धिग्जन्म भाग्यरहितं धिग्जन्म धनवर्जितम् । धिग्जन्म धर्मरहितं धिग्जन्म ख्यातिवर्जितम् ॥ ४४ ॥

धिक्कार है उस जन्म को जो सौभाग्य से रहित हो; धिक्कार है उस जन्म को जो धन से वंचित हो। धिक्कार है उस जन्म को जो धर्महीन हो; धिक्कार है उस जन्म को जो कीर्ति से रहित हो।

Verse 145

नरस्य बह्वपत्यस्य धिग्जन्मैश्वर्यवार्जितम् । अहो गुणाः सौम्यता च विद्वत्ता जन्म सत्कुले ॥ ४५ ॥

बहुत संतान वाले पुरुष का भी, यदि वह ऐश्वर्य और उत्तम कुल-सम्पदा से रहित हो, तो उसका जन्म धिक्कारयोग्य है। अहो, गुण कितने प्रशंसनीय हैं—सौम्यता, विद्वत्ता और सत्कुल में जन्म।

Verse 146

दारिद्याम्बुधिमग्नस्य सर्वमेतन्न शोभते । प्रियाः पुत्राश्चपौत्राश्च बान्धवा भ्रातरस्तथा ॥ ४६ ॥

जो दरिद्रता के समुद्र में डूब गया है, उसके लिए यह सब शोभा नहीं देता—न प्रियजन, न पुत्र-पौत्र, न बंधु, न ही भाई।

Verse 147

शिष्याश्च सर्वमनुजास्त्यजन्त्यैश्वर्यवार्जितम् । चाण्डालो वा द्विजो वापि भाग्यवानेव पूज्यते ॥ ४७ ॥

शिष्य और समस्त लोग ऐश्वर्य से रहित व्यक्ति को छोड़ देते हैं; चाहे वह चाण्डाल हो या द्विज, पूज्य तो केवल भाग्यवान ही होता है।

Verse 148

दरिद्रः पुरुषो लोके शववल्लोकनिन्दितः । अहो संपत्संमायुक्तो निष्टुरो वाप्यनिष्ठुरः ॥ ४८ ॥

इस लोक में दरिद्र पुरुष शव के समान लोगों द्वारा निंदित होता है; अहो! परंतु संपत्ति से युक्त होने पर वह निष्ठुर भी हो तो अनिष्ठुर मान लिया जाता है।

Verse 149

गुणहीनोऽपि गुणवान्मूर्खो वाप्यथ पण्डितः । ऐश्वर्यगुणयुक्तश्चेत्पूज्य एव न संशयः ॥ ४९ ॥

कोई गुणहीन हो या गुणवान, मूर्ख हो या पण्डित—यदि वह ऐश्वर्य और प्रतिष्ठित गुणों से युक्त है, तो निःसंदेह वही पूज्य होता है।

Verse 150

अहो दरिद्रता दुःखं तत्राप्याशातिदुःखदा । आशाभिभूताः पुरुषा दुःखमश्नुवतेऽक्षयम् ॥ १५० ॥

अहो! दरिद्रता दुःख है, और उसमें भी आशा अत्यन्त दुःख देने वाली है; आशा से अभिभूत मनुष्य अक्षय शोक भोगते हैं।

Verse 151

आशयादासा ये दासास्ते सर्वलोकस्य । आशा दासी येषां तेषां दासायते लोकः ॥ ५१ ॥

जो आशा के दास बन जाते हैं, वे मानो समस्त लोक के सेवक हो जाते हैं। पर जिनके लिए आशा ही दासी है, उनके लिए संसार दासवत् हो जाता है।

Verse 152

मानो हि महतां लोके धनमक्षयमुच्यते । तस्मिन्नाशाख्यरिपुणा माने नष्टे दरिद्रता ॥ ५२ ॥

इस लोक में महापुरुषों का मान (यश) अक्षय धन कहा गया है। पर उसका ‘आशा/अपेक्षा’ नामक शत्रु है; मान नष्ट हो जाए तो दरिद्रता पीछे लगती है।

Verse 153

सर्वशास्त्रार्थवेत्तापि दरिद्रो भाति मूर्खवत् । नैष्किञ्चन्यमहाग्राहग्रस्तानां को विमोचकः ॥ ५३ ॥

सब शास्त्रों के अर्थ जानने वाला भी यदि दरिद्र हो, तो मूर्ख-सा ही प्रतीत होता है। ‘नैष्किञ्चन्य’ नामक महाग्राह से ग्रस्त जनों को कौन छुड़ाए?

Verse 154

अहो दुःखमहो दुःखमहो दुःखं दरिद्रता । तत्रापि पुत्रभार्याणां बाहुल्यमतिदुःखदम् ॥ ५४ ॥

हाय, कितना दुःख—कितना दुःख—कितना दुःख है दरिद्रता! और उसमें भी पुत्रों और पत्नी का अधिक भार अत्यन्त दुःख देने वाला होता है।

Verse 155

एवमुक्त्वा भद्रमतिः सर्वशास्त्रार्थपारगः । अन्यमैश्वर्यदं धर्मं मनसाऽचिन्तयत्तदा ॥ ५५ ॥

ऐसा कहकर, समस्त शास्त्रार्थों के पारगामी भद्रमति ने तब मन में ऐसे दूसरे धर्म का चिन्तन किया जो ऐश्वर्य प्रदान करता है।

Verse 156

भूमिदानं विनिश्चित्य सर्वदानोत्तमोत्तमम् । दानेन योऽनुमंताति स एव कृतवान्पुरा ॥ ५६ ॥

भूमिदान को सब दानों में परम श्रेष्ठ जानकर, जो व्यक्ति इस दान का अनुमोदन करता है, वह भी मानो पूर्वकाल में स्वयं वही दान कर चुका होता है।

Verse 157

प्रापकं परमं धर्मं सर्वकामफलप्रदम् । दानानामुत्तमं दानं भूदानं परिकीर्तितम् ॥ ५७ ॥

जो परम धर्म तक पहुँचाने वाला और समस्त शुभ कामनाओं का फल देने वाला है—दानों में वही सर्वोत्तम दान ‘भूदान’ कहा गया है।

Verse 158

यद्दत्त्वा समवान्पोति यद्यदिष्टतमं नरः । इति निश्चत्य मतिमान्धीरो भद्रमतिर्बले ॥ ५८ ॥

“इसे दान करने से मनुष्य समृद्ध होता है और जो उसे अत्यन्त प्रिय है वह प्राप्त करता है”—ऐसा निश्चय करके, शुभ बुद्धि वाला धीर पुरुष दृढ़ संकल्प से वैसा ही आचरण करता है।

Verse 159

कौशाम्बींनाम नगरीं कलत्रापत्ययुग्ययौ । सुघोषनामविप्रेन्द्रं सर्वैश्वर्यसमन्एविलितम् ॥ ५९ ॥

कौशाम्बी नामक नगर में सुघोष नाम का एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था, जो पत्नी और पुत्रों सहित, समस्त ऐश्वर्यों से सम्पन्न था।

Verse 160

गत्वा याचितवान्भूमिं पञ्चहस्तायतां बले । सुघोषो धर्मनिरतस्तं निरीक्ष्य कुटुम्बिक्रम् ॥ १६० ॥

वह वहाँ जाकर पाँच हाथ विस्तार की भूमि माँगने लगा। धर्मपरायण सुघोष ने उस गृहस्थ और उसके परिवार की स्थिति को देखकर विचार किया।

Verse 161

मनसा प्रीयमाणेन समभ्यर्च्येदमब्रवीत् । कृतार्थोऽहं भद्रमते सफलं मम जन्म च ॥ ६१ ॥

मन से प्रसन्न होकर उसने विधिपूर्वक पूजन किया और बोला— “हे भद्रमति! मैं कृतार्थ हूँ; मेरा जन्म भी सफल हो गया।”

Verse 162

मत्कुल पावनं जातं त्वदनुग्रहतो द्विज । इत्युक्त्वा तं समभ्यर्च्य सुघोषो धर्मतत्परः ॥ ६२ ॥

“हे द्विज! आपकी अनुग्रह से मेरा कुल पवित्र हो गया।” ऐसा कहकर धर्मपरायण सुघोष ने उनका श्रद्धापूर्वक पूजन किया।

Verse 163

पञ्चहस्तमितां भूमिं ददौ तस्मै महामतिः । पृथिवी वैष्णवी पुण्या पृथिवीं विष्णुपालिता ॥ ६३ ॥

उस महामति ने उसे पाँच हस्त प्रमाण भूमि दान दी। क्योंकि पृथ्वी वैष्णवी और पवित्र है; वह विष्णु द्वारा पालित और रक्षित है।

Verse 164

पृथिव्यास्तु प्रदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः । मन्त्रेणानेन दैत्येन्द्र सुघोषस्तं द्विजोत्तमम् ॥ ६४ ॥

“पृथ्वी के दान से जनार्दन मुझ पर प्रसन्न हों।” हे दैत्येन्द्र! इस मंत्र से सुघोष ने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण से कहा।

Verse 165

विष्णुबुद्ध्या समभ्यर्च्य तावतीं पृथिवीं ददौ । सोऽपि भद्रमतिर्विप्रो धीमता याचितां भुवम् ॥ ६५ ॥

प्राप्तकर्ता को विष्णु-बुद्धि से मानकर उसने पूजन किया और उतनी भूमि दान दी। और वह भद्रमति ब्राह्मण भी, बुद्धिमान के याचने पर, माँगी हुई भूमि दे बैठा।

Verse 166

दत्तवान्हरिभक्ताय श्रोत्रियाय कुटुम्बिने । सुघोषो भूमिदानेन कोटिवंशसमन्वितः ॥ ६६ ॥

सुघोष ने हरि-भक्त, वेद-विद् गृहस्थ श्रोत्रिय को भूमि का दान किया; उस भूमिदान से वह कोटि-कोटि पीढ़ियों तक विस्तृत वंश से युक्त हो गया।

Verse 167

प्रपेदे विष्णुभवनं यत्र गत्वा न शोचति । बले भद्रमतिश्चापि यतः प्रार्थितवाञ्छ्रियम् ॥ ६७ ॥

उसने विष्णु-भवन को प्राप्त किया—जहाँ पहुँचकर कोई शोक नहीं करता। और बाल्यावस्था में भी भद्रमति ने, क्योंकि उसने श्री की प्रार्थना की थी, समृद्धि प्राप्त की।

Verse 168

स्थितवान्विष्णुभवने सकुटुम्बो युगायुतम् । तथैव ब्रह्मसदने स्थित्वा कोटियुगायुतम् ॥ ६८ ॥

वह अपने कुटुम्ब सहित विष्णु-भवन में दस सहस्र युगों तक रहा; और उसी प्रकार ब्रह्मा के सदन में निवास करके वह वहाँ कोटि युगों तक ठहरा।

Verse 169

ऐन्द्रं पदं समासाद्य स्थितवान्कल्पपञ्चकम् । ततो भुवं समासाद्य सर्वैश्वर्यसमन्वितः ॥ ६९ ॥

ऐन्द्र पद को प्राप्त करके वह पाँच कल्पों तक वहाँ स्थित रहा; फिर पृथ्वी को प्राप्त कर वह समस्त ऐश्वर्य और प्रभुत्व से सम्पन्न हो गया।

Verse 170

जातिस्मरो महाभागो बुभुजे भोगमुत्तमम् । ततो भद्रमतिर्दैत्य निष्कामो विष्णुतत्परः ॥ १७० ॥

वह महाभाग पूर्वजन्म-स्मरण से युक्त होकर उत्तम भोगों का उपभोग करता रहा; तत्पश्चात दैत्य भद्रमति निष्काम होकर विष्णु-परायण हो गया।

Verse 171

पृथिवीं वृत्तिहीनेभ्यो ब्राह्मणेभ्यः प्रदत्तवान् । तस्य विष्णुः प्रसन्नात्मा तत्त्वैश्वर्यमनुत्तमम् ॥ ७१ ॥

उसने आजीविका-हीन ब्राह्मणों को पृथ्वी (भूमि व निर्वाह) दान दी। तब प्रसन्न-हृदय भगवान विष्णु ने उसे तत्त्व-निष्ठ, अनुपम ऐश्वर्य-सम्पन्न राज्य प्रदान किया।

Verse 172

कोटिवंशसमेतस्य ददौ मोक्षमनुत्तमम् । तस्माद्दैत्यपते मह्यं सर्वधर्मपरायण ॥ ७२ ॥

उसने करोड़ों वंशजों सहित भी उसे अनुपम मोक्ष प्रदान किया। इसलिए, हे दैत्यपति, हे सर्वधर्म-परायण! वैसी ही कृपा मुझे भी प्रदान कीजिए।

Verse 173

तपश्चरिष्येमोक्षाय देहि मे त्रिपदां महीम् । वैरोचनिस्ततो दृष्टः कलशं जलपूरितम् ॥ ७३ ॥

“मैं मोक्ष के लिए तप करूँगा; मुझे तीन पग भूमि दीजिए।” तब वैरोचनि (बलि) जल से भरा कलश लिए हुए दिखाई पड़ा, दान-विधि हेतु तत्पर।

Verse 174

आददे पृथिवीं दातुं वर्णिने वामनाय । विष्णुः सर्वगतोज्ञात्वा जलधारावरोधिनम् ॥ ७४ ॥

तेजस्वी वामन ब्रह्मचारी को पृथ्वी दान देने हेतु (बलि) उद्यत हुआ। पर सर्वव्यापी भगवान विष्णु ने जलधारा को रोकने वाले को पहचान लिया।

Verse 175

काव्यं हस्तस्थदर्भाग्रं तच्छरे संन्यवेशयत् । दर्भाग्रेऽभून्महाशस्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम् ॥ ७५ ॥

काव्य ने अपने हाथ में पकड़े दर्भ के अग्रभाग को उस बाण पर रख दिया। दर्भ के अग्र पर ही कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी महाशस्त्र प्रकट हो उठा।

Verse 176

अमोघं ब्राह्ममत्युग्रं काव्याक्षिग्रासलोलुपम् । आयाय भार्गवसुरानसुरानेकचक्षुषा ॥ ७६ ॥

वह अमोघ, अत्यन्त उग्र ब्राह्म-अस्त्र—काव्य (शुक्र) के नेत्र को निगलने को आतुर—अपने एक नेत्र से भार्गव, देवों और असुरों की ओर वेग से दौड़ा।

Verse 177

पश्येति वांदिदेशे च दर्भाग्रं शस्त्रसन्निभम् । बलिर्ददौ महाविष्णोर्महीं त्रिपदसंमिताम् ॥ ७७ ॥

“देखो!” कहकर उसने शस्त्र-सम तीक्ष्ण दर्भाग्र दिखाया। तब बलि ने महाविष्णु को त्रिविक्रम के तीन पगों से मापी जाने वाली पृथ्वी दान दी।

Verse 178

ववृधे सोऽपि विश्वात्मा आब्रह्यभुवनं तदा । अमिमीत महीं द्वाभ्यां पद्भ्यां विश्वतनुर्हरिः ॥ ७८ ॥

तब वह विश्वात्मा ब्रह्मलोक तक समस्त भुवनों में फैल गया। और विश्वरूप हरि ने केवल दो पगों से ही पृथ्वी को नाप लिया।

Verse 179

स आब्रह्मकटाहांतपदान्येतानि सप्रभः । पादाङ्गुष्ठाग्रनिर्भिन्नं ब्रह्माण्डं विभिदे द्विधा ॥ ७९ ॥

उनके तेजस्वी चरण ब्रह्माण्ड-रूपी कटाह की सीमा तक जा पहुँचे। और अपने पादाङ्गुष्ठ के अग्र से उन्होंने ब्रह्माण्ड को भेदकर उसे दो भागों में कर दिया।

Verse 180

तद्दारा बाह्यसलिलं बहुधारं समागतम् । धौतविष्णुपदं तोयं निर्मलं लोकपावनम् ॥ १८० ॥

उस छिद्र से बाह्य जल अनेक धाराओं में उमड़ आया—विष्णुपद-प्रक्षालित वह निर्मल जल, जो समस्त लोकों को पावन करने वाला है।

Verse 181

अजाण्डबाह्यनिलयं धारारुपमवर्त्तत । तज्जलं पावनं श्रेष्टं ब्रह्मादीन्पावयत्सुरान् ॥ ८१ ॥

ब्रह्माण्ड के बाहर निवास करते हुए वह निरन्तर धारा के रूप में प्रवाहित हुई। वह जल परम पावन था; उसने ब्रह्मा आदि देवताओं को भी पवित्र कर दिया।

Verse 182

सत्पर्षिसेवितं चैव न्यपतन्मेरुमूर्द्धनि ॥ ८२ ॥

वह सत्पुरुष ऋषियों द्वारा सेवित-पावन स्थान, मेरु पर्वत के शिखर पर आकर गिर पड़ी।

Verse 183

एतद्दष्ट्वाद्भुतं कर्म ब्रह्माद्या देवतागणाः । ऋषयो मनवश्चैव ह्यस्तुवन्हर्षविह्वलाः ॥ ८३ ॥

इस अद्भुत कर्म को देखकर ब्रह्मा आदि देवगण, तथा ऋषि और मनु भी, हर्ष से विह्वल होकर स्तुति करने लगे।

Verse 184

देव ऊचुः । नमः परेशाय परात्मरुपिणे परात्परायापररुपधारिणे । ब्रह्मात्मने ब्रह्मरतात्मबुद्धये नमोऽस्तु तेऽव्याहतकर्मशीलिने ॥ ८४ ॥

देव बोले—परमेश्वर, परात्मस्वरूप, परात्पर तथा प्रकट रूप धारण करने वाले! ब्रह्मस्वरूप, ब्रह्म में रत अन्तर्बुद्धि वाले! जिनके कर्म और आचरण कभी बाधित नहीं होते—आपको नमस्कार।

Verse 185

परेश परमानन्द परमात्मन्परात्पर । सर्वात्मने जगन्मूर्त्ते प्रमाणातीत ते नमः ॥ ८५ ॥

हे परेश! हे परमानन्द! हे परात्पर परमात्मा! सर्वात्मा, जगन्मूर्ति, और प्रमाणातीत—आपको नमस्कार है।

Verse 186

विश्वतश्चक्षुषे तुभ्यं विश्वतो बाहवे नमः । विश्वतः शिरसे चैव विश्वतो गतये नमः ॥ ८६ ॥

आपको नमस्कार, जिनकी आँखें सर्वत्र हैं; आपको नमस्कार, जिनकी भुजाएँ सर्वत्र विस्तृत हैं। आपको नमस्कार, जिनका शिर सर्वत्र है; और आपको नमस्कार, जिनकी गति सर्वत्र व्याप्त है।

Verse 187

एवं स्तुतो महाविष्णुर्ब्रह्याद्यैः स्वर्द्दवौकसाम् । दत्त्वाभयं च मुमुदे देवदेवः सनातनः ॥ ८७ ॥

इस प्रकार ब्रह्मा आदि स्वर्गवासियों द्वारा स्तुत होकर महाविष्णु—देवों के देव सनातन प्रभु—ने उन्हें अभयदान दिया और प्रसन्न हुए।

Verse 188

विरोचनात्मजं दैत्यं पदैकार्थं बबन्ध ह । ततः प्रपन्नं तु बलिं ज्ञात्वा चास्मै रसातलम् । ददौ तद्वारपालश्च भक्तवश्यो बभूव ह ॥ ८८ ॥

विरोचनपुत्र दैत्य बलि को प्रभु ने एक ही पग के सामर्थ्य से बाँध दिया। फिर बलि को शरणागत जानकर उसे रसातल लोक प्रदान किया; और भक्तवश्य होकर स्वयं वहाँ के द्वारपाल बन गए।

Verse 189

नारद उवाच । रसातले महाविष्णुर्विरोचनसुतस्य वै । किं भोज्यं कल्पयामास घोरे सर्पभयाकुले ॥ ८९ ॥

नारद बोले—हे मुनिवर! सर्पभय से व्याकुल उस भयानक रसातल में महाविष्णु ने विरोचनपुत्र के लिए कौन-सा भोजन तैयार किया?

Verse 190

सनक उवाच । अमन्त्रितं हविर्यत्तु हूयते जातवेदसि । अपात्रे दीयते यच्च तद्धोरं भोगसाधनम् ॥ १९० ॥

सनक बोले—जो हवि बिना मंत्र के जातवेद (अग्नि) में आहुति दी जाती है, और जो दान अपात्र को दिया जाता है—वह दोनों घोर फल देने वाले, केवल भोग-बन्धन के साधन बनते हैं।

Verse 191

हुतं हविरशुचिना दृत्तं सत्कर्म यत्कृतम् । तत्सर्वं तत्र भोगार्हमधः पातफलप्रदम् ॥ ९१ ॥

अशुद्ध हवि से जो हवन किया गया और अशुद्ध विधि से जो तथाकथित सत्कर्म किया गया—वह सब अधोलोकों में ही भोग्य बनता है और अधःपतन का फल देता है।

Verse 192

एवं रसातलं विष्णुर्बलये सासुराय तु । दत्त्वाभयं च सर्वेषां सुराणां त्रिदिवं ददौ ॥ ९२ ॥

इस प्रकार विष्णु ने असुरों सहित बलि को रसातल में भेज दिया; और समस्त देवताओं को अभय देकर उन्हें त्रिदिव (स्वर्गलोक) पुनः प्रदान किया।

Verse 193

पूज्यमानोऽमरगणैः स्तूयमानो महर्षिभिः । गंधर्वैर्गीयमानश्च पुनर्वामनतां गतः ॥ ९३ ॥

देवगणों द्वारा पूजित, महर्षियों द्वारा स्तुत, और गन्धर्वों द्वारा गाया गया वह प्रभु पुनः वामन-रूप को प्राप्त हुआ।

Verse 194

एतद्दृष्ट्वा महत्कर्ममुनयो ब्रह्मवादिनः । परस्परं स्मितमुखाः प्रणेभुः पुरुषोत्तमम् ॥ ९४ ॥

इस महान कर्म को देखकर ब्रह्म के उपदेशक मुनि परस्पर मुस्कराते हुए पुरुषोत्तम को प्रणाम करने लगे।

Verse 195

सर्वभूतात्मको विष्णुर्वामनत्वमुपागतः । मोहयन्निखिलं लोकं प्रपेदे तपसे वनम् ॥ ९५ ॥

समस्त प्राणियों के आत्मा विष्णु वामन-रूप को प्राप्त होकर, समूचे लोक को मोहित करते हुए तपस्या के लिए वन को चले गए।

Verse 196

एवं प्रभावा सा देवी गङ्गा विष्णुपदोद्भवा । यस्याः स्मरणमात्रेण मुच्यते सर्वपातकैः ॥ ९६ ॥

ऐसी ही महिमा है विष्णु के चरण से प्रकट हुई देवी गंगा की; जिनका केवल स्मरण करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

Verse 197

इदं तु गङ्गामाहात्म्यं यः पठेच्छृणुयादपि । देवालये नदीतीरे सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ ९७ ॥

जो इस गंगा-माहात्म्य का पाठ करे या इसे सुने भी, और वह देवालय में या नदी-तट पर हो, तो उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

Frequently Asked Questions

Sanaka teaches that where a devotee absorbed in Hari abides, Brahmā–Hari–Śiva and the devas are present; such presence transforms ordinary geography into a living sacred ford (tīrtha) and tapovana because the mind settled in Hari becomes the locus of sanctity, overriding external dangers and impurity.

The chapter frames land as the support of beings and sacrifice; therefore giving land is symbolically giving all supports of life and ritual. It is praised as uniquely sin-destroying and liberation-yielding when given to a worthy brāhmaṇa lacking livelihood, with graded fruits illustrating how minimal land-gifts can rival major sacrifices in merit.

When Vāmana expands and pierces the cosmic egg with His toe, the water that washes Viṣṇu’s foot flows outward and descends, becoming Gaṅgā. The avatāra act thus becomes a cosmographic etiology for Gaṅgā’s purifying status, linking bhakti-itihāsa with tīrtha theology.