Adhyaya 19
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Dhvajāropaṇa and Dhvajāgopaṇa: Procedure, Stotra, and Phala (Merit) of Raising Viṣṇu’s Flag

सनक मुनि श्रीविष्णु के ध्वज (पताका) के आरोहण और उसकी रक्षा का पवित्र व्रत बताते हैं, जिसे पाप-नाशक और दान-तीर्थकर्म के तुल्य या श्रेष्ठ कहा गया है। कार्तिक शुक्ल दशमी को शुद्धि-नियमों से आरम्भ, एकादशी को संयम और निरन्तर नारायण-स्मरण। ब्राह्मणों सहित स्वस्तिवाचन व नन्दीश्राद्ध करके, गायत्री से ध्वज व दण्ड का संस्कार; सूर्य, गरुड़ (वैनतेय) और चन्द्र की पूजा, तथा ध्वजदण्ड पर धाता-विधाता का पूजन। गृह्याग्नि स्थापित कर पुरुषसूक्त, विष्णु-स्तोत्र, इरावती आदि से 108 पायस आहुतियाँ, गरुड़ तथा सौर-शान्ति के विशेष हवन, और हरि-सन्निधि में रात्रि-जागरण। संगीत-स्तोत्र के साथ ध्वज को ले जाकर द्वार या मंदिर-शिखर पर स्थापित कर विष्णु-पूजन व दीर्घ स्तोत्र-पाठ। अंत में गुरु-ब्राह्मणों का सत्कार, भोजन, पारण; फल में शीघ्र पापक्षय, ध्वज रहने तक सहस्रों युगों का सारूप्य, और जो केवल देखकर हर्षित हों उन्हें भी पुण्य-लाभ।

Shlokas

Verse 1

सनक उवाच । अन्यद्व्रतं प्रवक्ष्यामि ध्वजारोपणसंज्ञितम् । सर्वपापहरं पुण्यं विष्णुप्रीणनकारणम् ॥ १ ॥

सनक बोले—अब मैं ‘ध्वजारोपण’ नामक एक अन्य व्रत कहूँगा; यह पुण्यकर्म समस्त पापों का हरण करने वाला और भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने का कारण है।

Verse 2

यः कुर्याद्विष्णुभवने ध्वजारोपणमुत्तमम् । संपूज्यते विग्निञ्च्याद्यैः किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥ २ ॥

जो विष्णु-मन्दिर में उत्तम ध्वजारोपण करता है, वह विघ्नेश (गणेश) आदि देवों द्वारा भी पूजित-सम्मानित होता है; फिर अधिक कहने की क्या आवश्यकता?

Verse 3

हेमभारसहस्त्रं तु यो ददाति कुटुम्बिने । तत्फलं तुल्यमात्रं स्याद्धूजारोपणकर्मणः ॥ ३ ॥

जो कोई गृहस्थ को सोने के हजार भार दान दे, उसका पुण्य भी ध्वजा-रोपण के कर्म के समान मात्र होता है।

Verse 4

ध्वजारोपणतुल्यं स्याद्गङ्गास्नानमनुत्तमम् । अथवा तुलसिसेवा शिवलिङ्गप्रपूजनम् ॥ ४ ॥

अतुल्य गङ्गा-स्नान का पुण्य ध्वजा-रोपण के समान कहा गया है; अथवा तुलसी-सेवा और शिवलिङ्ग का विधिवत् पूजन भी (उसी के तुल्य है)।

Verse 5

अहोऽपूर्वमहोऽपूर्वमहोऽपूर्वमिदं द्विज । सर्वपाप हरं कर्म ध्वजागोपणसंज्ञितम् ॥ ५ ॥

अहो! अपूर्व, अपूर्व, अत्यन्त अपूर्व है यह, हे द्विज; ‘ध्वजागोपण’ नामक यह कर्म समस्त पापों का नाश करने वाला है।

Verse 6

सन्ति वै यानि कार्याणि ध्वजारोपणकर्मणि । तानि सर्वाणि वक्ष्यामि श्रृणुष्व गदतो मम ॥ ६ ॥

ध्वजा-रोपण के कर्म में जो-जो विधियाँ हैं, वे सब मैं कहूँगा; मेरे वचन को सुनो।

Verse 7

कार्तिकस्य सिते पक्षे दशम्यां प्रयतो नरः । स्नानं कुर्यात्प्रयत्नेन दन्तधावनपूर्वकम् ॥ ७ ॥

कार्तिक शुक्ल पक्ष की दशमी को संयमी पुरुष दन्तधावन से आरम्भ करके यत्नपूर्वक स्नान करे।

Verse 8

एकाशी ब्रह्मचारी च स्वपेन्नारायणं स्मरन् । धौताम्बरधरः शुद्धो विप्रो नारायणाग्रतः ॥ ८ ॥

एकादशी का व्रत रखकर और ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, स्वप्न में भी नारायण का स्मरण करे। धुले हुए शुद्ध वस्त्र धारण करने वाला पवित्र ब्राह्मण नारायण के सम्मुख रहे।

Verse 9

ततः प्रातः समुत्थाय स्नात्वाचम्य यथाविधि । नित्यकर्माणि निर्वर्त्य पश्चाद्विष्णुं समर्चयेत् ॥ ९ ॥

फिर प्रातः उठकर विधिपूर्वक स्नान और आचमन करे। नित्यकर्मों को पूर्ण करके उसके बाद श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु की सम्यक् पूजा करे।

Verse 10

चतुर्भिर्ब्राह्मणैः सार्ध्दं कृत्वा च स्वस्तिवाचनम् । नान्दीश्राद्धं प्रकुर्वीत ध्वजारोपणकर्मणि ॥ १० ॥

चार ब्राह्मणों के साथ स्वस्तिवाचन कराकर, ध्वजारोपण के कर्म में नान्दीश्राद्ध का अनुष्ठान करे।

Verse 11

ध्वजस्तम्भो च गायत्र्या प्रोक्षयेद्वस्त्रसंयुतौ । सूर्यं च वैनतेयं च हिमांशुं तत्परोऽर्चयेत् ॥ ११ ॥

गायत्री मंत्र से ध्वज और ध्वजस्तम्भ को वस्त्र सहित प्रोक्षण (अभिषेक) करे। फिर एकाग्र होकर सूर्य, वैनतेय (गरुड़) और हिमांशु (चन्द्र) की पूजा करे।

Verse 12

धातारं च विधातारं पूजयेद्धजदण्डके । हरिद्राक्षतगन्धाद्यैः शुक्लपुष्पैर्विशेषतः ॥ १२ ॥

ध्वजदण्ड पर धाता और विधाता की पूजा करे; हल्दी, अक्षत, गंध आदि अर्पित करे—विशेषतः श्वेत पुष्पों से।

Verse 13

ततो गोचर्ममात्रघं तु स्थण्डिलं चोपलिप्य वै । आधायान्गिं स्वगृह्योत्त्या ह्याज्यभागादिकं क्रमात् ॥ १३ ॥

फिर गोचर्म-प्रमाण का स्थण्डिल (यज्ञभूमि) लीपकर, अपने गृह्य-विधान के अनुसार पवित्र अग्नि की स्थापना करे; और तत्पश्चात क्रम से घृत-आहुतियाँ तथा अन्य नियत भाग अर्पित करे।

Verse 14

जुहुयात्पायसं चैव साज्यमष्टोत्तरं शतम् । प्रथमं पौरुषं सूक्तं विष्णोर्नुकमिरावतीम् ॥ १४ ॥

घृतयुक्त पायस की एक सौ आठ आहुतियाँ अग्नि में दे; और आरम्भ में पुरुषसूक्त, विष्णु-स्तुति के मन्त्र तथा ‘इरावती’ नामक सूक्त का पाठ करे।

Verse 15

ततश्च वैनतेयाय स्वाहेत्यष्टाहुतीस्तथा । सोमो धेनुमुदुत्यं च जुहुयाच्च ततो द्विज ॥ १५ ॥

फिर ‘स्वाहा’ कहकर वैनतेय (गरुड़) के लिए आठ आहुतियाँ दे; और उसके बाद, हे द्विज, ‘सोमो धेनुः’ तथा ‘उदुत्यं’ इन मन्त्रों से भी हवन करे।

Verse 16

सौरमन्त्राञ्जपेत्तत्र शान्तिसूत्कानि शक्तितः । रात्रौ जागरणं कुर्यादुपकण्ठं हरेः शुचुः ॥ १६ ॥

वहाँ सौर-मन्त्रों का जप करे और सामर्थ्य के अनुसार शान्ति-सूक्तों का पाठ करे। शुद्ध होकर रात्रि में हरेि (विष्णु) के सान्निध्य में जागरण करे।

Verse 17

ततः प्रातः समुत्थाय नित्यकर्म समाप्य च । गन्धपुष्पादिभिर्देवमर्चयेत्पूर्ववत्क्रमात् ॥ १७ ॥

फिर प्रातः उठकर नित्यकर्म पूर्ण करके, पूर्ववत् विधि के अनुसार क्रम से गन्ध, पुष्प आदि से देव (भगवान्) की अर्चना करे।

Verse 18

ततो मङ्गलवाद्यैश्च सूक्तपाठैश्च शौभनम् । नृत्यैश्च रतोत्रपठनैर्नयेद्विष्णवालये ध्वजम् ॥ १८ ॥

तत्पश्चात् मंगल वाद्यों, सूक्त-पाठ, शोभायात्रा, नृत्य तथा स्तोत्र-गान के साथ ध्वज को विष्णु-मंदिर तक ले जाए।

Verse 19

देवस्य द्वारदेशे वा शिखरे वा मुदान्वितः । सुस्थिरं स्थापयेद्विप्र ध्वजं सस्तम्भसंयुतम् ॥ १९ ॥

हे विप्र! आनंद और श्रद्धा से युक्त होकर, देवालय के द्वार-प्रदेश में या शिखर पर दंड सहित ध्वज को दृढ़ता से स्थापित करे।

Verse 20

गन्धपुष्पाघक्षतैर्द्देवं धूपदीपैर्मनोहरैः । भक्षयभोज्यादिसंयुक्तैर्नैवेद्यैश्च हरिं यजेत् ॥ २० ॥

गंध, पुष्प और अक्षत, मनोहर धूप-दीप, तथा भक्ष्य-भोज्य आदि सहित नैवेद्य से भगवान हरि की पूजा करे।

Verse 21

एवं देवालये स्थाप्य शोभनं ध्वजमुत्तमम् । प्रदक्षिणमनुव्रज्य स्तोत्रमेतदुदूरयेत् ॥ २१ ॥

इस प्रकार देवालय में उत्तम, शोभन ध्वज स्थापित करके, प्रदक्षिणा करते हुए इस स्तोत्र का उच्च स्वर से पाठ करे।

Verse 22

नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुष पूर्वज ॥ २२ ॥

हे पुण्डरीकाक्ष! आपको नमस्कार; हे विश्वभावन! आपको नमस्कार। हे हृषीकेश! महापुरुष, आदिपुरुष! आपको बार-बार नमस्कार।

Verse 23

येनेदमखिलं जातं यत्र सर्वं प्रतिष्टितम् । लयमेष्यति यत्रैवं तं प्रपन्नोऽस्मि केशवम् ॥ २३ ॥

जिससे यह समस्त जगत उत्पन्न हुआ, जिसमें सब कुछ प्रतिष्ठित है और जिसमें अंततः सब लीन हो जाता है—उस केशव की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

Verse 24

न जानन्ति परं भावं यस्य ब्रह्यादयः सुराः । योगिनोयं न पश्यन्ति तं वन्दं ज्ञानरुपिणम् ॥ २४ ॥

जिसके परम तत्त्व को ब्रह्मा आदि देव भी नहीं जानते, और योगी भी जिसका दर्शन नहीं कर पाते—उस ज्ञानस्वरूप प्रभु को मैं प्रणाम करता हूँ।

Verse 25

अन्तरिक्षंतु यन्नाभिर्द्यौर्मूर्द्धा यस्य चैव हि । पादोऽभूद्यस्य पृथिवी तं वन्दे विश्वरुपिणम् ॥ २५ ॥

जिसकी नाभि अंतरिक्ष है, जिसका मस्तक स्वर्ग है और जिसके चरण पृथ्वी बन गए—उस विश्वरूप प्रभु को मैं प्रणाम करता हूँ।

Verse 26

यस्य श्रोत्रे दिशः सर्वा यच्चक्षुर्दिनकृच्छशी । ऋक्सामयजुषी येन तं वन्दे ब्रह्ररुपिणम् ॥ २६ ॥

जिसके कान समस्त दिशाएँ हैं, जिनकी आँखें सूर्य और चंद्रमा हैं, और जिनसे ऋग्, साम और यजुर्वेद प्रकट व प्रतिष्ठित हैं—उस ब्रह्मस्वरूप को मैं प्रणाम करता हूँ।

Verse 27

यन्मुखाद्वाह्मणा जाता यद्वाहोरभवन्नृपाः । वैश्या यस्योरुतो जाताः पद्भ्यां शूद्रो व्यजायत ॥ २७ ॥

जिनके मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुए, जिनकी भुजाओं से क्षत्रिय-नृप प्रकट हुए, जिनकी जंघाओं से वैश्य जन्मे और जिनके चरणों से शूद्र उत्पन्न हुआ—उस जगदाधार प्रभु को मैं प्रणाम करता हूँ।

Verse 28

मायासङ्गममात्रेण वदन्ति पुरुषं त्वजम् । स्वभावविमलं शुद्धं निर्विकारं निरञ्जनम् ॥ २८ ॥

केवल माया के संग से ही लोग पुरुष को ‘जन्मा’ कहते हैं; वास्तव में वह स्वभाव से निर्मल, शुद्ध, निर्विकार और निरंजन है।

Verse 29

क्षीरब्धि शायिनं देवमनन्तमपराजितम् । सद्भक्तवत्सलं विष्णुं भक्तिगम्यं नमाम्यहम् ॥ २९ ॥

मैं क्षीरसागर पर शयन करने वाले अनंत, अपराजित देव—भगवान विष्णु को नमस्कार करता हूँ; जो सच्चे भक्तों पर वात्सल्य रखते हैं और भक्ति से ही प्राप्त होते हैं।

Verse 30

पृथिव्यादीनि भूतानि तन्मात्राणींन्द्रियाणि च । सूक्ष्मासूक्ष्माणि येनासंस्तं वन्दे सर्वतोमुखम् ॥ ३० ॥

मैं उस सर्वतोमुख प्रभु को वंदन करता हूँ, जिनसे पृथ्वी आदि भूत, तन्मात्राएँ और इंद्रियाँ—सूक्ष्म और स्थूल—प्रकट हुए।

Verse 31

यद्ब्रह्म परमं धाम सर्वलोकोत्तमोत्तमम् । निर्गुणं परमं सूक्ष्मं प्रणतोऽस्ति पुनः पुनः ॥ ३१ ॥

उस ब्रह्म को—परम धाम, समस्त लोकों से परे परमोत्कृष्ट, निर्गुण, परम और अत्यंत सूक्ष्म—मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।

Verse 32

अविकारमजं शुद्धं सर्वतोबाहुमीश्वरम् । यमामनन्ति योगीन्द्राः सर्वकारणकारणम् ॥ ३२ ॥

जो अविकार, अज और शुद्ध हैं—जिनकी भुजाएँ सर्वत्र हैं—उन्हीं ईश्वर को योगीन्द्र ‘सर्वकारण-कारण’ कहते हैं।

Verse 33

यो देवः सर्वभूतानामन्तरात्मा जगन्मयः । निर्गुणः परमात्मा च स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥ ३३ ॥

जो देव समस्त प्राणियों के अन्तरात्मा हैं, जगत् में व्याप्त हैं, गुणातीत परमात्मा हैं—वे श्रीविष्णु मुझ पर प्रसन्न हों।

Verse 34

हृदयस्थोऽपि दूरस्थो मायया मोहितात्मनाम् । ज्ञानिनां सर्वगो यस्तु स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥ ३४ ॥

हृदय में स्थित होकर भी माया से मोहित चित्त वालों को दूर प्रतीत होते हैं; पर ज्ञानियों के लिए सर्वव्यापी हैं—वे श्रीविष्णु मुझ पर प्रसन्न हों।

Verse 35

चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । हूयते च पुनर्द्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥ ३५ ॥

चार-चार आहुतियों से, दो से, और पाँच से भी; तथा फिर दो से हवन किया जाता है—वे श्रीविष्णु मुझ पर प्रसन्न हों।

Verse 36

ज्ञानिनां कर्मिणां चैव तथा भक्तिमतां नृणाम् । गतिदाता विश्वमृग्यः स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥ ३६ ॥

ज्ञानियों, कर्मकाण्डियों तथा भक्तिमान नर-नारियों को भी परमगति देने वाले, और समस्त विश्व द्वारा अन्वेष्य—वे श्रीविष्णु मुझ पर प्रसन्न हों।

Verse 37

जगद्धितार्थं ये देहा ध्रियन्ते लीलया हरेः । तानर्चयन्ति विबुधाः स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥ ३७ ॥

जगत् के हित हेतु हरि जिन देहों को लीला से धारण करते हैं, उन रूपों की देवगण और विद्वान भी पूजा करते हैं—वे श्रीविष्णु मुझ पर प्रसन्न हों।

Verse 38

यमामनन्ति वै सन्तः सच्चिदानन्दविग्रहम् । निर्गुणं च गुणाधारं स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥ ३८ ॥

जिन्हें संतजन सच्चिदानन्द-स्वरूप कहते हैं, जो निर्गुण होकर भी समस्त गुणों के आधार हैं—वे श्रीविष्णु मुझ पर प्रसन्न हों।

Verse 39

इति स्तुत्वा नमेद्विष्णुं ब्राह्मणांश्च प्रपूजयेत् । आचार्यं पूजयेत्पश्चाद्दक्षिणाच्छादनादिभिः ॥ ३९ ॥

इस प्रकार स्तुति करके विष्णु को प्रणाम करे और ब्राह्मणों का विधिपूर्वक पूजन-सत्कार करे। फिर बाद में गुरु का भी दक्षिणा, वस्त्र आदि से पूजन करे।

Verse 40

ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या भक्ति भावसमन्वितः । पुत्रमित्रकलत्राद्यैः स्वयं च सह बन्धुभिः ॥ ४० ॥

भक्ति-भाव से युक्त होकर अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराए। फिर पुत्र, मित्र, पत्नी आदि तथा बंधुओं के साथ स्वयं भी भोजन करे।

Verse 41

कुर्वीत पारणं विप्र नारायणपरायणः । यस्त्वेतत्कर्म कुर्वीत ध्वजारोपणमुत्तमम् । तस्य पुण्यफलं वक्ष्ये श्रृणुष्व सुसमाहितः ॥ ४१ ॥

हे विप्र! नारायण-परायण होकर पारण (व्रत-समापन) करे। और जो यह उत्तम ध्वजारोपण-कर्म करता है, उसका पुण्यफल मैं कहूँगा—तुम एकाग्र होकर सुनो।

Verse 42

पटो ध्वजस्य विप्रेन्द्र यावच्चलति वायुना । तावन्ति पापजालानि नश्यन्त्येव न संशयः ॥ ४२ ॥

हे विप्रेन्द्र! ध्वज का पट जितनी देर वायु से फहराता रहता है, उतनी ही देर पापों के समूह नष्ट होते रहते हैं—इसमें संदेह नहीं।

Verse 43

महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः । ध्वजं विष्णुगृहे कृत्वा मुच्यते सर्वपातकैः ॥ ४३ ॥

चाहे कोई महापातक से युक्त हो या सब प्रकार के पापों से घिरा हो, विष्णु-गृह/मन्दिर में ध्वज स्थापित करने से वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

Verse 44

यावद्दिनानि तिष्टेत ध्वजो विष्णुगृहे द्विज । तावद्युगसहस्त्राणि हरिसारुप्यमश्नुते ॥ ४४ ॥

हे द्विज! विष्णु-गृह/मन्दिर में जितने दिनों तक ध्वज खड़ा रहता है, उतने ही सहस्र युगों तक भक्त भगवान् हरि का सारूप्य (उनके समान रूप) प्राप्त करता है।

Verse 45

आरोपितं ध्वजं दृष्ट्वा येऽभिनन्दन्ति धार्मिकाः । तेऽपि सर्वे प्रमुच्यन्ते महापातककोटिभिः ॥ ४५ ॥

जो धर्मात्मा लोग उठाए हुए ध्वज को देखकर हर्ष से उसका अभिनन्दन करते हैं, वे भी करोड़ों महापातकों से पूर्णतः मुक्त हो जाते हैं।

Verse 46

आरोपितो ध्वजो विष्णुगृहे धुन्वन्पटं स्वकम् । कर्तुः सर्वाणि पापानि धुनोति निमिषार्द्धतः ॥ ४६ ॥

विष्णु-गृह/मन्दिर में उठाया हुआ ध्वज जब अपने वस्त्र को फहराता है, तब वह ध्वज-स्थापक के समस्त पापों को आधे निमेष में झाड़ देता है।

Verse 47

यस्त्वारोप्य गृहे विष्णोर्ध्वजं नित्यमुपाचरेत् । स देवयानेन दिवं यातीव सुमतिर्नृपः ॥ ४७ ॥

हे नृप! जो व्यक्ति अपने घर में विष्णु का ध्वज उठाकर उसकी नित्य उपासना करता है, वह सुमति होकर देवयान मार्ग से स्वर्ग को प्राप्त होता है।

Frequently Asked Questions

The chapter presents dhvaja-installation as a sustained, visible act of Viṣṇu-sevā whose efficacy continues as long as the flag cloth flutters. Its phalaśruti ties ongoing physical presence (the standing dhvaja) to ongoing pāpa-kṣaya, granting sārūpya for vast durations and extending benefit even to observers who rejoice—framing the rite as both personal and communal mokṣa-oriented dharma.

Key components include: Kārtika śukla-daśamī purification and discipline; ekādaśī restraint and constant remembrance; svasti-vācana with brāhmaṇas; nāndī-śrāddha; consecration of banner and staff with Gāyatrī; worship of Sūrya, Garuḍa, Candra and Dhātā-Vidhātā; a gṛhya fire-rite with 108 pāyasa āhutis alongside Puruṣa-sūkta and other named hymns; night vigil; festive procession; installation at gateway or temple summit; Viṣṇu pūjā, stotra-recitation, and concluding honors/feeding/pāraṇa.

The text promises immediate and ongoing destruction of sins while the flag flutters, liberation from even grave sins through dedicating the banner, attainment of sārūpya with Hari for thousands of yugas corresponding to the days the flag stands, and heavenly ascent (devayāna) for one who raises and worships the flag daily.