Adhyaya 14
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Dharmopadeśa-Śānti: Rules of Impurity, Expiations, and Ancestor Rites

धर्मराज राजा को श्रुति–स्मृति-आधारित शौच और प्रायश्चित्त के नियम बताते हैं। भोजन के समय चाण्डाल/पतित का स्पर्श, उच्छिष्ट-दोष, मल-मूत्र, वमन आदि से अशुद्धि होने पर त्रि-संध्या स्नान, पञ्चगव्य, उपवास, घृताहुति और अधिक गायत्री-जप जैसे क्रमबद्ध उपाय कहे गए हैं। अन्त्यज-स्पर्श, रजस्वला, प्रसूति-सूतक आदि में स्नान की अनिवार्यता, ब्रह्मकूर्च जैसे कर्मों के बाद भी, प्रतिपादित है। मैथुन-धर्म में ऋतु/अऋतु, अनुचित संयोग और कुछ घोर पापों में अग्नि-प्रवेश को ही एकमात्र प्रायश्चित्त कहा गया है। आत्महत्या या दुर्घटनामृत व्यक्ति स्थायी बहिष्कृत नहीं; चान्द्रायण/कृच्छ्र से शुद्धि बताई गई है। गो-हिंसा के नैतिक नियम, शस्त्रानुसार तप-भेद, मुण्डन-शिखा नियम और राज-न्याय का वर्णन है। अंत में इष्ट–पूर्त कर्म, पञ्चगव्य-निर्माण, सूतक/गर्भपात अशौच-काल, विवाह में गोत्र-परिवर्तन तथा श्राद्ध-तर्पण की विधियाँ और प्रकार दिए गए हैं।

Shlokas

Verse 1

धर्मराज उवाच । श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं वर्णानामनुपूर्वशः । प्रब्रवीमि नृपश्रेष्ट तं श्रृणुष्व समाहितः ॥ १ ॥

धर्मराज बोले—हे नृपश्रेष्ठ! श्रुति और स्मृति में कहा गया वर्णों का धर्म मैं क्रम से बताता हूँ; तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो।

Verse 2

यो भुञ्जानोऽशुचिं वापि चाण्डालं पतितं स्पृशेत् । क्रोधादज्ञानतो वापिं तस्य वक्ष्यामि निष्कृतिम् ॥ २ ॥

यदि कोई भोजन करते समय अशुद्ध व्यक्ति, या चाण्डाल, या पतित को छू ले—चाहे क्रोध से या अज्ञानवश—तो उस कर्म की प्रायश्चित्त-निष्कृति मैं बताऊँगा।

Verse 3

त्रिरात्रं वाथ षड्रात्रं यथासंख्यं समाचरेत् । स्नानं त्रिषवणं विप्रपञ्चगव्येन शुध्यति ॥ ३ ॥

यथाक्रम तीन रात या छह रात का प्रायश्चित्त करे। प्रातः‑मध्याह्न‑सायं त्रिकाल स्नान करके ब्राह्मण पंचगव्य के सेवन/प्रयोग से शुद्ध होता है।

Verse 4

भुञ्जानस्य तु विप्रस्य कदाचिजत्स्त्रवते गुदम् । उच्छिष्टत्वेऽशुचित्वे च तस्य शुद्धिं वदामि ते ॥ ४ ॥

परन्तु भोजन करते हुए ब्राह्मण के गुदा से कभी स्राव हो जाए, तो वह उच्छिष्ट‑दोष से युक्त और अशुचि हो जाता है। उसकी शुद्धि का उपाय मैं तुम्हें बताता हूँ।

Verse 5

पूर्वं कृत्वा द्विजः शौचं पश्चादप उपस्पृशेत् । अहोरात्रोषितो भूत्वा पञ्चगव्येन शुध्यति ॥ ५ ॥

पहले द्विज शौच करे, फिर आचमन हेतु जल का स्पर्श करे। यदि वह एक दिन‑रात अशुचि रहा हो, तो पंचगव्य से शुद्ध हो जाता है।

Verse 6

निगिरन्यदि मेहेत भुक्त्वा वा मेहने कृते । अहोरात्रोषितो भूत्वा जुहुयात्सर्पिषाऽनलम् ॥ ६ ॥

यदि निगलते समय मूत्र हो जाए, या भोजन के बाद मूत्र किया जाए, तो एक दिन‑रात उपवास/निवास करके घृत से अग्नि में आहुति दे—यही प्रायश्चित्त है।

Verse 7

यदा भोजनकाले स्यादशुचिर्ब्राह्मणः क्वचित् । भूमौ निधाय तं ग्रासं स्नात्वा शुद्धिमवान्पुयात् ॥ ७ ॥

यदि भोजन के समय ब्राह्मण किसी कारण से अशुचि हो जाए, तो उस ग्रास को भूमि पर रख दे; फिर स्नान करके शुद्ध होकर लौटे और भोजन करे।

Verse 8

भक्षयित्वा तु तद् आसमुपवालेन शुद्ध्यति । अशित्वा चैव तत्सर्वं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ॥ ८ ॥

यदि वह अन्न खा लिया जाए, तो उपवास से शुद्धि होती है; पर यदि उसे सबका-सब खा लिया हो, तो तीन रात्रियों तक अशौच रहता है।

Verse 9

अश्रतश्चेद्वमिः स्याद्वै ह्यस्वस्थस्त्रिश्रतं जपेत् । स्वस्थस्त्रीणि सहस्त्राणि गायत्र्याः शोधनं परम् ॥ ९ ॥

यदि खाने के बाद वमन हो जाए, तो अस्वस्थ होने पर गायत्री का तीन सौ जप करे। स्वस्थ हो तो तीन हजार जप करे—गायत्री द्वारा यह परम शोधन कहा गया है।

Verse 10

चाण्डालैः श्वपर्चैः स्पृष्टो विण्मूत्रे च कृते द्विजः ॥ १० ॥

चाण्डाल या श्वपच के स्पर्श से, तथा विष्ठा-मूत्र के संसर्ग से, द्विज अशुद्ध हो जाता है—ऐसा धर्मज्ञों ने कहा है।

Verse 11

त्रिरात्रं तु प्रकुर्वीत भुक्तोच्छिष्टः षडाचरेत् । उदक्यां सूतिकांवापि संस्पृशेदन्त्यजो यदि ॥ ११ ॥

यदि अन्त्यज रजस्वला या सूतिका को स्पर्श करे, तो तीन रात्रियों का अशौच करे; और यदि भुक्त-उच्छिष्ट (भोजन-शेष अवस्था) वाले को स्पर्श करे, तो छह (रात्रियाँ) आचरे।

Verse 12

त्रिरात्रेण विशुद्धिः स्यादिति शातातपोऽब्रवीत् । रजस्वला तु संस्पृष्टा श्वभिर्मातङ्गवायसैः ॥ १२ ॥

शातातप ने कहा—“तीन रात्रियों में शुद्धि होती है।” और रजस्वला स्त्री यदि कुत्तों, चाण्डाल (मातङ्ग) या कौओं से स्पर्शित हो, तो (ऐसी) अशुद्धि मानी जाती है।

Verse 13

निराहारा शुचिस्तिष्टेत्काले स्नानेन शुद्ध्यति । रजस्वले यदा नार्यावन्योन्यं स्पृशतः क्वचित् ॥ १३ ॥

निराहार रहकर शुद्ध अवस्था में नियत समय तक रहे; उचित समय पर स्नान से शुद्धि होती है। यदि किसी समय रजस्वला स्त्री के साथ अन्य स्त्रियों का परस्पर स्पर्श हो जाए, तो शास्त्रोक्त शौच-नियम का पालन करना चाहिए॥१३॥

Verse 14

शुद्धेते ब्रह्मकूर्चेन ब्रह्मकूर्चेन चोपरि । उच्छिष्टेन च संस्पृष्टो यो न स्नानं समाचरेत् ॥ १४ ॥

ब्रह्मकूर्च-व्रत से शुद्ध होकर, और ऊपर से फिर ब्रह्मकूर्च से भी शुद्ध होने पर भी, जो व्यक्ति उच्छिष्ट (जूठे/अशुद्ध अवशेष) के स्पर्श से दूषित होकर भी विधिपूर्वक स्नान नहीं करता, वह वास्तव में शुद्ध नहीं माना जाता॥१४॥

Verse 15

ऋतौ तु गर्भं शङ्कित्वा स्नानं मैथुनिनः स्मृतम् । अनॄतौ तु स्त्रियं गत्वा शौचं मूत्रपुरीषवत् ॥ १५ ॥

स्त्री के ऋतु-काल में संगम होने पर गर्भ-सम्भावना मानकर बाद में स्नान करना चाहिए—यह मैथुन करने वालों के लिए स्मृति-नियम है। परन्तु ऋतु के बाहर स्त्रीगमन करने पर शौच मूत्र-पुरीष के समान (यथाविधि) बताया गया है॥१५॥

Verse 16

उभावप्यशुची स्यातां दम्पती याभसंगतौ । शयनादुत्थिता नारी शुचिः स्यादशुचिः पुमान् ॥ १६ ॥

अशास्त्रीय (याभ) संगति में पति-पत्नी दोनों ही अशुचि हो जाते हैं। परन्तु शयन से उठने पर स्त्री शुचि मानी जाती है, और पुरुष अशुचि माना जाता है॥१६॥

Verse 17

भर्त्तुः शरीरशुश्रूषां दौरात्म्यादप्रकुर्वती । दण्ड्या द्वादशकं नारी वर्षं त्याज्या धनं विना ॥ १७ ॥

जो स्त्री दुष्ट बुद्धि से अपने पति के शरीर की सेवा-शुश्रूषा नहीं करती, उसे बारह (दण्ड-एकक) का दण्ड देना चाहिए। और यदि वह फिर भी न सुधरे, तो बिना धन दिए एक वर्ष तक उसका त्याग करना चाहिए॥१७॥

Verse 18

त्यजन्तो पतितान्बन्धून्दण्ड्यानुत्तमसाहसम् । पिता हि पतितः कामं न तु माता कदाचन ॥ १८ ॥

जो दंडनीय और पतित बंधुओं का त्याग करते हैं, वे महापाप के भागी हैं। पिता भले ही पतित हो जाए, किन्तु माता कभी पतित नहीं होती।

Verse 19

आत्मानं घातयेद्यस्तु रज्ज्वादिभिरुपक्रमैः । मृते मेध्येन लेत्पव्यो जीवतो द्विशतं दमः ॥ १९ ॥

जो रस्सी आदि उपायों से आत्महत्या का प्रयास करता है, यदि वह मर जाए तो उसे पवित्र लेप लगाना चाहिए; यदि जीवित रहे तो दो सौ पण का दंड है।

Verse 20

दण्ड्यास्तत्पुत्रमित्राणि प्रत्येकं पाणिकं दमम् । प्रायश्चित्तं ततः कुर्युर्यथाशास्त्रप्रचोदितम् ॥ २० ॥

उसके पुत्रों और मित्रों को प्रत्येक को एक पण का दंड देना चाहिए। तत्पश्चात उन्हें शास्त्रानुसार विहित प्रायश्चित करना चाहिए।

Verse 21

जलाग्न्युद्वन्धनभ्रष्टाः प्रव्रज्यानाशकच्युताः । विषप्रपतनध्वस्ताः शस्त्रघातहताश्च ये ॥ २१ ॥

जो जल, अग्नि, फांसी, संन्यास से भ्रष्टता, अनशन भंग, विष, ऊंचाई से गिरने या शस्त्र के आघात से मृत्यु को प्राप्त हुए हैं।

Verse 22

न चैते प्रव्रत्यवसिताः सर्वलोकबहिष्कृताः । चान्द्रायणेन शुद्ध्यंन्ति तत्पकृच्छ्रद्वयेन वा ॥ २२ ॥

इन्हें न तो संन्यास से पूर्णतः च्युत मानना चाहिए और न ही समाज से बहिष्कृत। वे चांद्रायण व्रत या दो कृच्छ्र व्रतों के पालन से शुद्ध हो जाते हैं।

Verse 23

उभयावसितः पापश्यामच्छबलकाच्च्युतः । चान्द्रायणाभ्यां शुद्ध्येत दत्त्वा धेनुं तथा वृषम् ॥ २३ ॥

जो ‘उभयावसित’ नामक दोष में गिर गया हो और ‘पापश्याम’ तथा ‘च्छबल’ कहे जाने वाले पापकर्मों में लिप्त हो गया हो, वह दो चान्द्रायण व्रत करके तथा गौ और वृषभ का दान देकर शुद्ध होता है।

Verse 24

स्वश्रृगालप्लवङ्गाद्यैर्मानुषैश्च रतिं विना । स्पृष्टः स्त्रात्वा शुचिः सद्यो दिवा संध्यासु रात्रिषु ॥ २४ ॥

कुत्ते, सियार, बंदर आदि या किसी मनुष्य द्वारा (काम-सम्बन्ध के बिना) स्पर्श हो जाने पर, स्नान करके वह तुरंत शुद्ध हो जाता है—दिन में, संध्याकालों में या रात्रि में भी।

Verse 25

अज्ञानाद्वा तु यो भुक्त्वा चाण्डालान्नं कथंचन । गोमूत्रयावकाहारो मासार्द्धेन विशुद्ध्यति ॥ २५ ॥

यदि कोई अज्ञानवश किसी प्रकार चाण्डाल का अन्न खा ले, तो वह गोमूत्र और यावक (जौ का आहार) पर रहकर आधे मास में शुद्ध हो जाता है।

Verse 26

गोब्राह्मणगृहं दग्ध्वा मृतं चोद्वन्धनादिना । पाशं छित्वा तथा तस्य कृच्छ्रमेकं चरेद्दिजः ॥ २६ ॥

गौ के घर/बाड़े या ब्राह्मण के गृह को जला देने पर, या फाँसी आदि से मृत्यु करा देने पर, तथा उस (हत्या-कार्य) की रस्सी/फंदा काट देने पर—द्विज को एक कृच्छ्र प्रायश्चित्त करना चाहिए।

Verse 27

चाण्डालपुल्पसानां च भुक्त्वा हत्वा च योषितम् । कृच्छ्रार्ध्दमाचरेज्ज्ञानादज्ञानादैन्दवद्वयम् ॥ २७ ॥

चाण्डाल या पुल्पस जनों का अन्न खाकर, या किसी स्त्री की हत्या कर—चाहे जान-बूझकर हो या अनजाने में—मनुष्य को कृच्छ्र का आधा प्रायश्चित्त करना चाहिए; और साथ ही दो ऐन्दव (चन्द्र-सम्बन्धी) व्रत भी करने चाहिए।

Verse 28

कोपालिकान्नभोक्तॄणां तन्नारीगामिनां तथा । अगम्यागमने विप्रो मद्यगो मांसभक्षणे ॥ २८ ॥

कापालिकों का अन्न खाने से, उनकी स्त्रियों का संग करने से, निषिद्ध स्त्रियों से गमन करने से, मद्यपान और मांसभक्षण से ब्राह्मण घोर पतित हो जाता है।

Verse 29

तपत्कृच्छ्रपरिक्षिप्तो मौर्वीहोमेन शुद्ध्यति । महापातककर्त्तारश्चत्वारोऽथ विशेषतः ॥ २९ ॥

तपत्कृच्छ्र नामक कठोर प्रायश्चित्त से तप्त-परिक्षिप्त मनुष्य मौर्वी-होम द्वारा शुद्ध होता है; और विशेषतः महापातक करने वाले चार प्रकार के व्यक्ति कहे गए हैं।

Verse 30

अग्निं प्रविश्य शुद्ध्यन्तिस्थित्वा वा महति क्रतौ । रहस्यकरणोऽप्येवं मासमभ्यस्य पूरुषः ॥ ३० ॥

पवित्र अग्नि में प्रवेश करने से शुद्धि होती है, अथवा महान् वैदिक यज्ञ में स्थित रहने से भी। इसी प्रकार गुप्त अपराध करने वाला भी एक मास तक विधि का अभ्यास करे तो शुद्ध हो जाता है।

Verse 31

अघमर्षणसूक्तं वा शुद्ध्येदन्तर्जले जपन् । रजकश्चर्मकारश्च नटो बुरुड एव च ॥ ३१ ॥

अथवा जल के भीतर खड़े होकर अघमर्षण सूक्त का जप करने से शुद्धि होती है—यहाँ तक कि रजक, चर्मकार, नट और बुरुड भी।

Verse 32

कैवर्त्तमेदभिल्लाश्व सत्पैते ह्यन्त्यजाः स्मृताः । भुक्त्वा चैषां स्त्रियो गत्वा पीत्वा यः प्रतिगृह्यते ॥ ३२ ॥

कैवर्त, मेद, भिल्ल, अश्व और सत्पैत—ये अन्त्यज माने गए हैं। जो इनके अन्न को खाए, इनकी स्त्रियों के पास जाए, या इनके साथ पीकर उनसे दान/आतिथ्य स्वीकार करे, वह दोष का भागी होता है।

Verse 33

कृच्छ्रार्द्धमाचरेज्ज्ञानादैन्दवद्वयम् । मातरं गुरुपत्नीं च दुहितृभगिनीस्नुषाः ॥ ३३ ॥

यदि कोई जानबूझकर माता, गुरुपत्नी, पुत्री, बहन या पुत्रवधू के साथ संभोग करता है, तो उसे कृच्छ्रार्ध व्रत और दो ऐन्दव व्रत का पालन करना चाहिए।

Verse 34

संगम्य प्रविशेदग्निं नान्याशुद्धिर्विधीयते । राज्ञीं प्रव्रजितां धात्रीं तथावर्णोत्तमामपि ॥ ३४ ॥

रानी, संन्यासिनी, धात्री या उच्च वर्ण की स्त्री के साथ संभोग करने पर अग्नि में प्रवेश करना चाहिए; इसके अतिरिक्त अन्य कोई शुद्धि विधान नहीं है।

Verse 35

गत्वाकृच्छ्रद्वयं कुर्यात्सगोत्रामभिगम्य च । अमूषु पितृगोत्रासु मातृगोत्रगतासु च ॥ ३५ ॥

सगोत्र स्त्री, चाहे वह पिता के गोत्र की हो या माता के गोत्र की, उसके साथ गमन करने पर दो कृच्छ्र व्रत करने चाहिए।

Verse 36

परदारेषु सर्वेषु कृच्छ्रार्द्धं तपनं चरेत् । वेश्याभिगमने पापं व्यपोहन्ति द्विजास्तथा ॥ ३६ ॥

परायी स्त्री के साथ गमन करने पर कृच्छ्रार्ध और तपन व्रत करना चाहिए। वेश्यागमन करने पर भी द्विज इसी प्रकार पाप का नाश करते हैं।

Verse 37

पीत्वा सकृत्सुतत्पं च पञ्चरात्रं कुशोदकम् । गुरुतल्पगतो कुर्याद्रबाह्मणो विधिवद्रूतम् ॥ ३७ ॥

गुरुपत्नी के साथ गमन करने वाले ब्राह्मण को एक बार सुतप्त (अत्यंत गरम) द्रव्य पीकर और पाँच रातों तक कुशोदक पीकर विधिपूर्वक व्रत करना चाहिए।

Verse 38

गोन्घस्य केचिदिच्छन्ति केचिच्चैवावकीर्णिनः । दण्डादूर्ध्वं प्रहारेण यस्तु गां विनिपातयेत् ॥ ३८ ॥

कुछ लोग गोहत्या के लिए ‘गोंघा’ नामक प्रायश्चित्त बताते हैं, और कुछ ‘अवकीर्णिन’ का प्रायश्चित्त कहते हैं। पर जो दण्ड की मर्यादा से ऊपर प्रहार करके गाय को गिरा दे, वह भारी दोष का भागी होता है और उसी के अनुसार प्रायश्चित्त करे।

Verse 39

द्विगुणं गोव्रतं तस्य प्रायश्चितं विशोधयेत् । अङ्गुष्टमात्रस्थूलस्तु बाहुमात्रप्रमाणकः ॥ ३९ ॥

उस दोष की शुद्धि के लिए द्विगुण ‘गोव्रत’ रूप प्रायश्चित्त करना चाहिए। (दण्ड/उपकरण) अंगूठे जितना मोटा और बाँह (अग्रबाहु) जितना लंबा निर्धारित है।

Verse 40

सार्द्रकस्सपालाश्च गोदण्डः परिकीर्त्तितः । गवां निपातने चैव गर्भोऽपि संभवेद्यदि ॥ ४० ॥

गीली लकड़ी तथा पलाश-लकड़ी से बना दण्ड ‘गो-दण्ड’ कहा गया है। और यदि गायों को गिराने/मारने के प्रसंग में गर्भपात भी हो जाए, तो वह भी उसी दोष में सम्मिलित है।

Verse 41

एकैकशश्वरेत्कृच्छ्रं एषा गोन्घस्य निष्कृतिः । बन्धने रोधने चैव पोषणे वा गवां रुजाम् ॥ ४१ ॥

प्रत्येक (गाय के प्रति) एक-एक करके ‘कृच्छ्र’ तप करना चाहिए; यही गो-पीड़ा (गोंघा) का निष्कृति है। चाहे बाँधने से, रोकने/कैद करने से, या गायों की बीमारी में पालन-पोषण न करने से—इन सब में यह दोष लगता है।

Verse 42

संपद्यते चेन्मरणं निमित्तेनैव लिप्यते । मूर्च्छितः पतितो वापि दण्डेनाभिहतस्ततः ॥ ४२ ॥

यदि मृत्यु हो जाए, तो दोष का लेखा उसी तात्कालिक कारण के अनुसार होता है। चाहे वह व्यक्ति मूर्छित हो, गिर पड़ा हो, या बाद में दण्ड से आहत हुआ हो—दायित्व उसी विशेष निमित्त के अनुसार ही माना जाता है।

Verse 43

उत्थाय षट्पदं गच्छेत्सप्त पञ्चदशापि वा । ग्रासं वा यदि गृह्णीयात्तोयं वापि पिबेद्यदि ॥ ४३ ॥

यदि कोई उठकर छह पग चले—या सात, अथवा पंद्रह भी—या एक ग्रास भोजन ले, या जल भी पी ले, तो व्रत/नियम भंग माना जाता है और विधि से पुनः आरम्भ करना चाहिए।

Verse 44

सर्वव्याधिप्रनष्टानां प्रायश्चित्तं न विद्यते । कष्टलोष्टाश्मभिर्गावः शस्त्रैर्वा निहता यदि ॥ ४४ ॥

जो सब प्रकार की घोर व्याधियों से नष्ट-प्राय हो गए हों, उनके लिए प्रायश्चित्त नहीं बताया गया है—विशेषतः यदि गौएँ काष्ठ, लोष्ट, शिला अथवा शस्त्र से मारी गई हों।

Verse 45

प्रायश्चित्तं स्मृतं तत्र शस्त्रे शस्त्रे निगद्यते । काष्टे सान्तपनं प्रोक्तं प्राजापत्यं तु लोष्टके ॥ ४५ ॥

उस प्रसंग में प्रायश्चित्त शस्त्र-शस्त्र के अनुसार पृथक् कहा गया है। काष्ठ से (हिंसा) होने पर सान्तपन, और लोष्ट से होने पर प्राजापत्य प्रायश्चित्त बताया गया है।

Verse 46

तप्तकृच्छ्रं तु पाषाणे शस्त्रे चाप्यतिकृच्छ्रकम् । औषधं स्नेहमाहारं दद्याद्गोब्राह्मणेषु च ॥ ४६ ॥

पाषाण के अपराध में तप्तकृच्छ्र, और शस्त्र के अपराध में अधिक कठोर अतिकृच्छ्र करना चाहिए। साथ ही औषध, घृतादि स्नेह, तथा आहार का दान—विशेषतः गौओं और ब्राह्मणों को—देना चाहिए।

Verse 47

दीयमाने विपत्तिः स्यात्प्रायश्चित्तं तदा नहि । तैलभेषजपाने च भेषजानां च भक्षणे ॥ ४७ ॥

दान/अर्पण करते समय यदि कोई विपत्ति हो जाए, तो तब प्रायश्चित्त नहीं होता। इसी प्रकार तैल या औषधि-पान में, तथा औषधियों के भक्षण में भी प्रायश्चित्त नहीं बताया गया है।

Verse 48

निशल्यकरणे चैव प्रायश्चित्तं न विद्यते । वत्सानां कण्ठबन्धेन क्रिययाभेषजेन तु ॥ ४८ ॥

निशल्यकरण के कर्म में कोई प्रायश्चित्त नहीं बताया गया है; बछड़ों के विषय में तो कंठ-बन्ध आदि व्यवहारिक उपाय और औषधि से ही उपचार करना चाहिए।

Verse 49

सायं संगोपनार्थं च त्वदोषो रोषबन्धयोः । पादे चैवास्य रोमाणि द्विपादे श्मश्रु केवलम् ॥ ४९ ॥

सायंकाल में रक्षा हेतु छिपाव करना उचित है; पर तुम्हारा दोष क्रोध और वैर-बंधन में है। और उसके शरीर में—पैरों पर रोम हैं, पर द्विपाद मनुष्य में केवल दाढ़ी ही होती है।

Verse 50

त्रिपादे तु शिखावर्तं मूले सर्वं समाचरेत् । सर्वान्केशान्समुद्धृत्य छेदयेदङ्गुलद्वयम् ॥ ५० ॥

शिर के तृतीय भाग में शिखा-वर्त को मूल में विधिपूर्वक व्यवस्थित करे। समस्त केशों को समेटकर दो अंगुल के प्रमाण से काटे (अर्थात् उतना छोड़ दे)।

Verse 51

एवमेव तु नारीणां मुण्डनं शिरसः स्मृतम् । न स्त्रिया वपनं कार्यं न च वीरासनं स्मृतम् ॥ ५१ ॥

इसी प्रकार स्त्रियों के लिए भी शिर-मुण्डन कहा गया है। पर स्त्री को पूर्ण वपन (नित्य-रूप से) नहीं करना चाहिए, और उसके लिए वीरासन भी नहीं बताया गया है।

Verse 52

न च गोष्टे निवासोऽस्ति न गच्छन्तीमनुव्रजेत् । राजा वा राजपुत्रो वा ब्राह्मणो वा बहुश्रुतः ॥ ५२ ॥

गोशाला में निवास नहीं करना चाहिए और कहीं जाती हुई स्त्री के पीछे नहीं चलना चाहिए—चाहे वह राजा हो, राजपुत्र हो, या बहुश्रुत ब्राह्मण ही क्यों न हो।

Verse 53

अकृत्वा वपनं तेषां प्रायश्चित्तं विनिर्द्दिशेत् । केशानां रक्षणार्थं च द्विगुणं व्रतमादिशेत् ॥ ५३ ॥

यदि उन्होंने मुण्डन (वपन) नहीं किया हो, तो उनके लिए प्रायश्चित्त बताना चाहिए; और केशों की रक्षा के लिए दुगुना व्रत करने की आज्ञा देनी चाहिए।

Verse 54

द्विगुणे गतु व्रते चीर्णे द्विगुणा व्रतदक्षिणा ॥ ५४ ॥

जब व्रत को दुगुने रूप में ग्रहण करके विधिपूर्वक पूरा किया जाए, तब उस व्रत की दक्षिणा भी दुगुनी देनी चाहिए।

Verse 55

पापं न क्षीयते हन्तुर्दाता च नरकं व्रजेत् । अश्रौतस्मार्तविहितं प्रायश्चित्तं वदन्ति ये ॥ ५५ ॥

हन्ता का पाप क्षीण नहीं होता और जो उसे आदेश/अनुमति देता है वह नरक को जाता है—ऐसा वे कहते हैं जो श्रुति-स्मृति से असंमत प्रायश्चित्त बताते हैं।

Verse 56

तान्धर्मविन्घकर्तॄंश्च राजा दण्डेन पीडयेत् । न चैतान्पीडयेद्राजा कथंचित्काममोहितः ॥ ५६ ॥

धर्म में विघ्न करने वालों को राजा दण्ड से दमन करे; परन्तु काम से मोहित होकर राजा उन्हें किसी भी प्रकार दण्ड न दे।

Verse 57

तत्पापं शतधाभूत्वा तमेव परिसर्पति । प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ॥ ५७ ॥

वह पाप सौ गुना होकर उसी पर लौट आता है। इसलिए प्रायश्चित्त कर लेने के बाद ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिए।

Verse 58

विंशतिर्गा वृषं चैकं दद्यात्तेषां च दक्षिणाम् । क्रिमिभिस्तृण संभूतैर्मक्षिकादिनिपातितैः ॥ ५८ ॥

बीस गायें और एक वृषभ तथा उनके लिए यथाविधि दक्षिणा दान करे। तृण से उत्पन्न कीड़ों और मक्षिका आदि के गिरने से जो दोष हो, उसके लिए यह प्रायश्चित्त कहा गया है।

Verse 59

कृच्छ्रार्द्धं स प्रकुर्वीत शक्त्या दद्याच्च दक्षिणाम् । प्रायश्चित्तं च कृत्वा वै भोजयित्वा द्विजोत्तमान् ॥ ५९ ॥

वह अर्ध-कृच्छ्र व्रत करे और अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा भी दे। प्रायश्चित्त विधिपूर्वक करके फिर श्रेष्ठ द्विजों (ब्राह्मणों) को भोजन कराए।

Verse 60

सुवर्णमानिकं दद्यात्ततः शुद्धिर्विधीयते । चाण्डालश्वपचैः स्पृष्टे निशि स्नानं विधीयते ॥ ६० ॥

नियत मात्रा में सुवर्ण दान करे; तब शुद्धि होती है। चाण्डाल या श्वपच के स्पर्श से (अशुद्ध होने पर) रात्रि में स्नान का विधान है।

Verse 61

न वसेत्तत्र रात्रौ तु सद्यः स्नानेन शुद्ध्यति । वसेदथ यदा रात्रावज्ञानादविचक्षणः ॥ ६१ ॥

वहाँ रात्रि में न ठहरे; स्नान करने से तुरंत शुद्ध हो जाता है। पर यदि कोई अविवेकी अज्ञानवश रात्रि में ठहर जाए, (तो) वह तत्काल स्नान से शुद्धि करे।

Verse 62

तदा तस्य तु तत्पापं शतधा परिवर्तते । उद्गच्छन्ति च नक्षत्राण्युपरिष्टाच्च ये ग्रहाः ॥ ६२ ॥

तब उसका वह पाप सौ गुना बढ़ जाता है; और ऊपर चलने वाले नक्षत्र तथा ग्रह भी (उसके) साक्षी-रूप से उदित होते हैं।

Verse 63

संस्पृष्टे रश्मिभिस्तेषामुदकस्नानमाचरेत् । याश्चान्तर्जलवल्मीकमूषिकोषरवर्त्मसु ॥ ६३ ॥

जब वे (जल) सूर्य-किरणों से स्पर्शित हो जाएँ, तब जल-स्नान करना चाहिए। और जो जल भीतर के जल-मार्गों में हो—जैसे बाँबी, चूहे के बिल, खारी भूमि और पगडंडियों के मार्ग—उनके विषय में भी यही विधि है।

Verse 64

श्मशाने शौचशेषे च न ग्राह्याः सत्प मृत्तिकाः । इष्टापूर्तं तु कर्त्तव्यं ब्राह्मणेन प्रयत्नतः ॥ ६४ ॥

श्मशान में तथा शौच-क्रिया के बाद जब तक अशौच शेष रहे, तब शुद्ध-उपयोग की पवित्र मिट्टी ग्रहण नहीं करनी चाहिए। किंतु ब्राह्मण को प्रयत्नपूर्वक इष्ट और पूर्त—यज्ञादि तथा लोकहित-दान—अवश्य करना चाहिए।

Verse 65

इष्टेन लभते स्वर्गं मोक्षं पूर्त्तेन चान्पुयात् । वित्तक्षेपो भवेदिष्टं तडागं पूर्त्तमुच्यते ॥ ६५ ॥

इष्ट से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, और पूर्त से मोक्ष भी प्राप्त हो सकता है। धन का व्यय यज्ञ-पूजा में करना ‘इष्ट’ कहलाता है, और तालाब का निर्माण ‘पूर्त’ कहा गया है।

Verse 66

आरामश्च विशेषेण देवद्रोण्यस्तथैव च । वापीकूपतडागानि देवतायतनानि च ॥ ६६ ॥

और विशेष रूप से उद्यान-आराम बनवाना, तथा देव-उपयोग के जलकुंड (देवद्रोणी) स्थापित करना; साथ ही बावड़ी, कुआँ, तालाब बनवाना और देवताओं के मंदिर-आयतन निर्मित करना—ये सब महान् पुण्य हैं।

Verse 67

पतितान्युद्धरेद्यस्तु स पूर्वफलमश्नुते । शुक्लाया आहरेन्मूत्रं कृष्णाया गोः शकृत्तथा ॥ ६७ ॥

जो पतितों का उद्धार (सुधार) करता है, वह पूर्वोक्त श्रेष्ठ फल को भोगता है। श्वेत गौ का गोमूत्र और कृष्ण गौ का गोबर भी (विधिपूर्वक) संग्रह करना चाहिए।

Verse 68

ताम्रायाश्च पयो ग्राह्यं श्वेतायाश्च दधि स्मृतम् । कपिलाया घृतं ग्राह्यं महापातकनाशनम् ॥ ६८ ॥

ताम्रवर्णी गाय का दूध ग्रहण करना चाहिए, श्वेत गाय का दही कहा गया है। कपिला गाय का घी लेना चाहिए—यह महापातकों का नाश करने वाला है।

Verse 69

कुशैस्तीर्थनदीतौयैः सर्वद्रव्यं पृथक् पृथक् । आहृत्य प्रणवेनैव उत्थाप्य प्रणवेन च ॥ ६९ ॥

कुश और तीर्थ-नदी के जल से प्रत्येक सामग्री को अलग-अलग लाकर, केवल प्रणव (ॐ) से ही सबको उठाकर (संस्कार करके), और फिर प्रणव से ही पुनः उठाए।

Verse 70

प्रणवेन समालोड्य प्रणवेनैव संपिबेत् । पालाशे मध्यमे पर्णे भाण्डे ताम्रमये शुभे ॥ ७० ॥

प्रणव (ॐ) का जप करते हुए उसे अच्छी तरह मिलाकर, फिर प्रणव का उच्चारण करते हुए ही पिए। यह शुभ ताम्र-पात्र में हो, और बीच में पलाश का पत्ता रखा हो।

Verse 71

पिबेत्पुष्करपर्णे वा मृन्मये वा कुशोदकम् । सूतके तु समुत्पन्ने द्वितीये समुपस्थिते ॥ ७१ ॥

सूतक उत्पन्न होने पर, और दूसरा दिन उपस्थित होने पर, कुश-जल को कमल-पत्र में या मिट्टी के पात्र में रखकर पीना चाहिए।

Verse 72

द्वितीये नास्ति दोषस्तु प्रथमेनैव शुध्यति । जातेन शुध्यते जातं मृतेन मृतकं तथा ॥ ७२ ॥

दूसरे (दिन/अवसर) में दोष नहीं होता; पहले ही से शुद्धि हो जाती है। जन्म से जन्म-संबंधी शुद्ध होता है, और मृत्यु से मृत्यु-संबंधी भी वैसे ही शुद्ध होता है।

Verse 73

गर्भसंस्त्रवणे मासे त्रीण्यहानि विनिर्दिशेत् ॥ ७३ ॥

गर्भपात जिस मास में हो, उस स्थिति में तीन दिन का शौच-काल निर्धारित करे।

Verse 74

रात्रिभिर्मासतुल्याभिर्गर्भस्त्रावे विशुद्ध्यति । रजस्युपरते साध्वी स्नानेन स्त्री रजस्वला ॥ ७४ ॥

गर्भपात में जितने मास हुए हों, उतनी ही रात्रियों के बाद शुद्धि होती है। रजःस्राव रुकने पर रजस्वला स्त्री स्नान से शुद्ध होती है।

Verse 75

स्वगोत्राद्भृश्यते नारी विवाहात्सप्तमे पदे । स्वामिगोत्रेण कर्त्तव्यास्तस्याः पिण्डोदकक्रियाः ॥ ७५ ॥

विवाह के सातवें पग पर स्त्री अपने गोत्र से पृथक मानी जाती है; उसके बाद उसके पिण्ड-उदक आदि कर्म पति के गोत्र से करने चाहिए।

Verse 76

उद्देश्यं पिण्डदाने स्यात्पिण्डे पिण्डे द्विनामतः । षण्णां देयास्त्रयः पिण्डा एवं दाता न मुह्यति ॥ ७६ ॥

पिण्डदान में उद्देश्य (जिनके लिए) बताना चाहिए; प्रत्येक पिण्ड पर दो नाम कहे जाएँ। छह जनों के लिए तीन पिण्ड देने चाहिए; इस प्रकार दाता भ्रमित नहीं होता।

Verse 77

स्वेन भर्त्रा सहस्त्राब्दं माताभुक्ता सुदैवतम् । पितामह्यपि स्वेनैव स्वेनैव प्रपितामही ॥ ७७ ॥

माता ने अपने ही पति के साथ, सौभाग्य और दैवी अनुग्रह से युक्त होकर, सहस्र वर्ष तक दाम्पत्य का सुख भोगा; वैसे ही पितामही ने अपने ही (पति) के साथ, और वैसे ही प्रपितामही ने भी।

Verse 78

वर्षे तु कुर्वीत मातापित्रोस्तु सत्कृतिम् । अदैवं भोजयेच्छ्राद्धं पिण्डमेकं तु निर्वपेत् ॥ ७८ ॥

वर्ष में एक बार माता-पिता का विधिपूर्वक सत्कार करे। देव-आहुतिरहित श्राद्ध में अतिथियों को भोजन कराए और एक ही पिण्ड अर्पित करे।

Verse 79

नित्यं नैमित्तिकं काम्यं वृद्धिश्राद्धमथापरम् । पार्वणं चेति विज्ञेयं श्राद्धं प़ञ्चविधं बुधैः ॥ ७९ ॥

बुद्धिमान जन श्राद्ध को पाँच प्रकार का मानते हैं—नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धिश्राद्ध और पार्वण श्राद्ध।

Verse 80

ग्रहोपरागे संक्रान्तौ पर्वोत्सवमलालये । निर्वपेत्र्रीन्नरः पिण्डानेकमेव मृतेऽहनि ॥ ८० ॥

ग्रहण, संक्रान्ति, पर्व-उत्सव तथा आपत्ति-काल में मनुष्य तीन पिण्ड अर्पित करे; परन्तु मृत्यु-दिवस में केवल एक ही पिण्ड अर्पित करे।

Verse 81

अनूढ न पृथक्कन्या पिण्डे गोत्रे च सूतके । पाणिग्रहणमन्त्राभ्यां स्वगोत्राद्भ्रश्यते ततः ॥ ८१ ॥

अविवाहित कन्या पिण्ड, गोत्र और सूतक में पिता-कुल से पृथक नहीं मानी जाती। पर पाणिग्रहण-मन्त्रों से विवाह-संस्कार पूर्ण होने पर वह अपने (पैतृक) गोत्र से हट जाती है।

Verse 82

येन येन तु वर्णेन या कान्या परिणीयते । तत्समं सूतकं याति तथापिण्डोदकेऽपि च ॥ ८२ ॥

जिस वर्ण में कन्या का विवाह होता है, उसी के समान वह सूतक को प्राप्त करती है; और पिण्ड तथा उदक (तर्पण) के विषय में भी वही नियम है।

Verse 83

विवाहे चैव संवृत्ते चतुर्थेऽहनिरात्रिषु । एकत्वं सा व्रजेद्भर्तुः पिण्डे गोत्रे च सूतके ॥ ८३ ॥

विवाह के विधिपूर्वक सम्पन्न होने पर चौथे दिन-रात्रि में पत्नी पति के साथ एकत्व को प्राप्त होती है—पिण्ड, गोत्र और सूतक में भी वह उसी की सहभागी मानी जाती है।

Verse 84

प्रथमेऽह्नि द्वितीये वा तृतीये वा चतुर्थके । अस्थिसंचयनं कार्यं बन्धुभिर्हितबुद्धिभिः ॥ ८४ ॥

पहले दिन, या दूसरे, या तीसरे, अथवा चौथे—इनमें से किसी भी दिन हितबुद्धि वाले बन्धुओं द्वारा अस्थि-संचयन करना चाहिए।

Verse 85

चतुर्थे पञ्चमे चैव सत्पमे नवमे तथा । अस्थिसंचयनं प्रोक्तं वर्णानामनुपूर्वशः ॥ ८५ ॥

अस्थि-संचयन का विधान वर्णों के क्रम से—चौथे, पाँचवें, सातवें और नववें दिन कहा गया है।

Verse 86

एकादशाहे प्रेतस्य यस्य चोत्सृज्यते वृषः । मुच्यते प्रेतलोकात्स स्वर्गलोके महीयते ॥ ८६ ॥

जिस मृतक के लिए एकादशाह में वृषभ का उत्सर्जन किया जाता है, वह प्रेतलोक से मुक्त होकर स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।

Verse 87

नाभिमात्रे जले स्थित्वा हृदयेन तु चिन्तयेत् । आगच्छन्तु मे पितरो गृह्णन्त्वेताञ्जाञ्जलीन् ॥ ८७ ॥

नाभि तक जल में खड़े होकर हृदय से ऐसा चिन्तन करे—“मेरे पितरगण पधारें और मेरे ये अञ्जलि-दान स्वीकार करें।”

Verse 88

हस्तौ कृत्वा तु संयुक्तौ पूरचित्वा जलेन च । गोश्रृङ्गमात्रमुद्धृत्य जलमध्ये विनिः क्षिपेत् ॥ ८८ ॥

दोनों हाथ जोड़कर जल से भर ले; फिर गो-शृंग जितना ही जल उठाकर उसी जल के मध्य में पुनः अर्पित कर दे।

Verse 89

आकाशे च क्षिपेद्वारि वारिस्थो दक्षघिणामुखः । पितॄणां स्थानमाकाशं दक्षिणादिक् तथैव च ॥ ८९ ॥

जल में खड़े होकर दक्षिणमुख होकर दाहिने हाथ से जल लेकर आकाश में उछाले; क्योंकि पितरों का स्थान आकाश है और उनकी दिशा भी दक्षिण ही है।

Verse 90

आपो देवगणाः प्रोक्ता आपः पितृगणास्तथा । तस्मादस्य जलं देयं पितॄणां हितमिच्छता ॥ ९० ॥

आप (जल) देवगण कहे गए हैं और आप ही पितृगण भी हैं; इसलिए जो पितरों का हित चाहता है, वह उन्हें जल अर्पित करे।

Verse 91

दिवासूर्यांशुसंतत्पं रात्रौ नक्षत्रमारुतैः । मध्ययोरप्युभाभ्यां च पवित्रं सर्वदा जलम् ॥ ९१ ॥

दिन में सूर्यकिरणों से तप्त और रात में नक्षत्रों के अधीन वायु से स्पर्शित—इन दोनों के बीच के समय में भी जल सदा पवित्र रहता है।

Verse 92

स्वभावयुक्तमव्यक्तममेध्येन सदा शुचिः । भाण्डस्थं धरणीस्थं वा पवित्रं सर्वदा जलम् ॥ ९२ ॥

जल स्वभाव से ही अव्यक्त (निर्मल) और सदा शुद्ध है; अपवित्र वस्तु के संसर्ग में भी—पात्र में हो या धरती पर—जल सर्वदा पावन रहता है।

Verse 93

देवतानां पितॄणां च जलं दद्याज्जलाञ्जलीन् । असंस्कृतप्रमीतानां स्थले दद्याद्विचक्षणः ॥ ९३ ॥

देवताओं और पितरों को जलाञ्जलि रूप में जल अर्पित करे। जो बिना संस्कार के मर गए हों, उनके लिए भी विवेकी पुरुष उचित स्थान पर जल दे।

Verse 94

श्राद्धे हवनकाले च दद्यादेकेन पाणिना । उभाभ्यां तर्पणे दद्यादेष धर्मो व्यवस्थितः ॥ ९४ ॥

श्राद्ध और हवन के समय एक हाथ से दान/अर्पण करे; पर तर्पण में दोनों हाथों से दे—यही धर्म की स्थापित मर्यादा है।

Verse 95

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे धर्मशान्तिनिर्देशो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

इस प्रकार श्री बृहन्नारदीय पुराण के पूर्वभाग, प्रथम पाद में ‘धर्म-शान्ति-निर्देश’ नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

The chapter prescribes graded remedies such as setting the morsel aside, bathing, ācamana, fasting for set durations, pañcagavya for certain day-night impurity cases, and—where specified—homa with ghee; vomiting is addressed through extensive Gāyatrī-japa (hundreds to thousands, depending on health).

It first details technical śauca and prāyaścitta procedures (baths, japa, homa, named penances), then broadens into merit-making dharma through iṣṭa (ritual expenditure) and pūrta (public works like wells, ponds, temples), presenting both as complementary paths toward śānti and higher aims.

It outlines piṇḍa specification rules, lists five śrāddha types, prescribes contexts for one vs three piṇḍas, and gives tarpaṇa method (standing in water, facing south, offering water with both hands), grounding ancestor rites in the purifying theology of water.