Adhyaya 26
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Gṛhastha-praveśa: Vivāha-bheda, Ācāra-śauca, Śrāddha-kāla, and Vaiṣṇava-lakṣaṇa

सनक–नारद संवाद में ब्रह्मचर्य पूर्ण होने पर गुरु-सेवा, अनुमति, अग्नि-स्थापन, दक्षिणा और विवाह द्वारा गृहस्थ-प्रवेश का विधान बताया गया है। योग्य वर-वधू के गुण, सगोत्र/निकट-सम्बन्ध की सीमा, तथा अयोग्य लक्षण गिनाए गए हैं। आठ प्रकार के विवाहों का वर्णन कर कुछ की निन्दा और कुछ की क्रमिक स्वीकृति बताई गई है। बाह्य-आन्तरिक आचार—वेश-भूषा, शौच, वाणी-संयम, गुरु-सम्मान, निन्दा व कुसंग-त्याग—निर्दिष्ट है; अपवित्र स्पर्श आदि के बाद शुद्धि-स्नान और शुभ-अशुभ संकेत भी बताए गए हैं। सन्ध्या-पूजन, नित्य-नैमित्तिक यज्ञ और श्राद्ध के विस्तृत काल—ग्रहण, संक्रान्ति, प्रेतपक्ष, मन्वादि, अष्टका, तीर्थ आदि—निश्चित किए गए हैं। अंत में वैष्णव-भाव प्रमुख है: ऊर्ध्वपुण्ड्र बिना कर्म निष्फल, श्राद्ध में तुलसी/तिलक का निषेध निराधार, और विष्णु-कृपा ही धर्म-सिद्धि की गारंटी कही गई है।

Shlokas

Verse 1

सनक उवाच । वेदग्रहणपर्यंतं शुश्रूषानियतो गुरोः । अनुज्ञातस्ततस्तेन कुर्यादग्निपरिग्रहम् ॥ १ ॥

सनक बोले—वेदाध्ययन की समाप्ति तक गुरु की सेवा में नियमपूर्वक स्थित रहे। फिर गुरु की आज्ञा पाकर पवित्र अग्नियों का ग्रहण और प्रतिष्ठापन करे।

Verse 2

वेदाश्च धर्मशास्त्राणि वेदाङ्गान्यपि च द्विजः । अधीत्य गुरवे दत्त्वा दक्षिणां संविशेद्वृहम् ॥ २ ॥

वेद, धर्मशास्त्र और वेदाङ्गों का अध्ययन करके द्विज गुरु को दक्षिणा अर्पित करे और फिर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे।

Verse 3

रुपलावण्यसंपन्नां सगुणां सुकुलोद्भवाम् । द्विजः समुद्वहेत्कन्यां सुशीलां धर्म चारिणीम् ॥ ३ ॥

द्विज को ऐसी कन्या से विवाह करना चाहिए जो रूप-लावण्य से युक्त, सद्गुणी, श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न, सुशील और धर्म का आचरण करने वाली हो।

Verse 4

मातृतः पंचमीं धीमान्पितृतः सप्तमीं तथा । द्विजः समुद्वहेत्कन्यथा गुरुतल्पराः ॥ ४ ॥

बुद्धिमान द्विज को माता-पक्ष से पाँचवीं पीढ़ी के परे और पिता-पक्ष से सातवीं पीढ़ी के परे की कन्या से विवाह करना चाहिए; अन्यथा वह गुरु-शय्या का उल्लंघन करने वाले के समान निंदनीय होता है।

Verse 5

रोगिणीं चैव वृत्ताक्षीं सरोगकुलसंभवाम् । अतिकेशाममकेशां च वाचालां नोद्वहेद्वुधः ॥ ५ ॥

बुद्धिमान पुरुष को रोगिणी, गोल/उभरी आँखों वाली, रोगग्रस्त कुल में उत्पन्न, अत्यधिक केश वाली या केशहीन, तथा अत्यन्त वाचाल स्त्री से विवाह नहीं करना चाहिए।

Verse 6

कोपानां वामनां चैव दीर्घदेहां विरुपिणीम् । न्यानाधिकाङ्गीमुन्मत्तां पिशुनां नोद्वहेद् बुधः ॥ ६ ॥

बुद्धिमान को क्रोधी, बौनी या अत्यन्त दीर्घकाया, विकृत रूप वाली, अंगों में न्यूनता या अधिकता वाली, उन्मत्त तथा चुगली/निंदा करने वाली को पत्नी रूप में ग्रहण नहीं करना चाहिए।

Verse 7

स्थूलगुल्फां दीर्घजंघां तथैव पुरुषाकृतिम् । श्मश्रुव्यंजनसंयुक्तां कुब्जां चैवाद्वहेन्न च ॥ ७ ॥

स्थूल टखनों वाली, लम्बी जंघाओं वाली, पुरुष-सदृश आकृति वाली, दाढ़ी/रोम या ऐसे चिह्नों से युक्त, तथा कुब्जा स्त्री को नहीं ग्रहण करना चाहिए।

Verse 8

वृथाहास्यमुखीं चैव सदान्यगृह वासिनीम् । विवादशीलां भ्रमितां निष्ठुरां नोद्वहेद्रुधः ॥ ८ ॥

बुद्धिमान को व्यर्थ हँसी से युक्त मुख वाली, सदा पराये घर में रहने वाली, झगड़ालू, चंचल-चित्त भटकने वाली, तथा कठोर स्वभाव/वाणी वाली स्त्री से विवाह नहीं करना चाहिए।

Verse 9

बह्वशिनीं स्थीलदंतां स्थूलोष्ठीं घुर्घुरस्वनाम् । अतिकृष्णां रक्तवर्णां धूर्तां नैवोद्वहे द्वुधः ॥ ९ ॥

बुद्धिमान पुरुष को बहुत अधिक खाने वाली, मोटे दांतों वाली, मोटे होंठों वाली, घुरघुराने वाली (कर्कश स्वर), अत्यंत काली, लाल नेत्रों वाली और धूर्त स्त्री से विवाह नहीं करना चाहिए।

Verse 10

सदा रोदनशीलां च पांडुराभां च कुत्सिताम् । तासश्वासादिसंयुक्तां निद्राशीलां च नोद्वहेत् ॥ १० ॥

जो सदा रोती रहती हो, पीली (पांडु) वर्ण की हो, निंदित आचरण वाली हो, खांसी-श्वास आदि रोगों से युक्त हो और बहुत सोने वाली हो, उससे विवाह न करें।

Verse 11

अनर्थभाषिणीं चैव लोकद्वेष परायणाम् । परापवादनिरतां तस्कारां नोद्वहेद्वुधः ॥ ११ ॥

बुद्धिमान मनुष्य को अनर्थ (हानिकारक) बोलने वाली, लोगों से द्वेष रखने वाली, दूसरों की निंदा में लगी रहने वाली और चोर स्वभाव वाली स्त्री से विवाह नहीं करना चाहिए।

Verse 12

दीर्घनासां च कितवां तनूरुहविभूषिगताम् । गर्वितां बकवृत्तिं च सर्वथा नोद्वहेद्वुधः ॥ १२ ॥

लंबी नाक वाली, धूर्त, शरीर के रोमों को सजाने में लगी रहने वाली, घमंडी और बगुले जैसी (कपटी) वृत्ति वाली स्त्री से बुद्धिमान पुरुष सर्वथा विवाह न करे।

Verse 13

बालभावादविज्ञातस्वभावामुद्वहेद्यदि । प्रगल्भां वाऽगुणां ज्ञात्वा सर्वथा तां परित्यजेत् ॥ १३ ॥

यदि बालपन के कारण स्वभाव जाने बिना विवाह कर लिया हो, और बाद में उसे ढीठ (निर्लज्ज) या गुणहीन जानकर, उसका सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।

Verse 14

भर्त्तृपुत्रेषु या नारी सर्वदा निष्ठुरा भवेत् । परानुकूलिनी या च सर्वथा तां परित्यजेत् ॥ १४ ॥

जो स्त्री पति के पुत्रों के प्रति सदा कठोर रहती है, और जो सर्वथा परायों के अनुकूल रहती है, उसे हर प्रकार से त्याग देना चाहिए।

Verse 15

विवाहाश्चाष्टधा ज्ञेया ब्राह्माद्या मुनिसत्तम । पूर्वः पूर्वो वरो ज्ञेयः पूर्वाभावे परः परः ॥ १५ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! विवाह आठ प्रकार के माने गए हैं, ब्राह्म से आरम्भ। पूर्व-पूर्व प्रकार श्रेष्ठ है; उसके अभाव में क्रम से अगला-आगला ग्रहण करना चाहिए।

Verse 16

ब्राह्नो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः । गांधर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमो मतः ॥ १६ ॥

ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर; तथा गान्धर्व, राक्षस और पैशाच—ये आठवाँ प्रकार सहित आठ माने गए हैं।

Verse 17

ब्राह्मेण च विवाहेन वैवाह्यो वै द्विजोत्तमः । दैवेनाप्यथवा विप्र केचिदार्षं प्रचक्षते ॥ १७ ॥

हे द्विजोत्तम! ब्राह्म-विवाह से वर का विवाह-योग्य होना सिद्ध होता है; और दैव-विवाह से भी, हे विप्र। कुछ लोग इसे आर्ष-विवाह कहते हैं।

Verse 18

प्राजापत्यादयो विप्र विवाहाः पंचज गर्हिताः । अभावेषु तु पूर्वेषां कुर्यादेव परान्बुधः ॥ १८ ॥

हे विप्र! प्राजापत्य आदि पाँच विवाह निन्दित कहे गए हैं; तथापि पूर्ववर्ती श्रेष्ठ प्रकारों के अभाव में बुद्धिमान को क्रम से परवर्ती प्रकार अवश्य अपनाने चाहिए।

Verse 19

यज्ञोपवीतद्वितयं सोत्तरीयं च धारयेत् । सुवर्णकुंडले चैव धौतवस्त्रद्वयं तथा ॥ १९ ॥

वह दो यज्ञोपवीत और उत्तरीय धारण करे; तथा स्वर्ण-कुण्डल और धुले हुए वस्त्रों की जोड़ी भी पहने।

Verse 20

अनुलेपनलित्पांगः कृत्तकेशनखः शुचिः । धारयेद्वैणवं दंडं सोदकं च कमंडलुम् ॥ २० ॥

अंगों पर अनुलेपन किए, केश-नख कटे हुए और शुद्ध रहकर, वह वैष्णव दण्ड तथा जल-भरा कमण्डलु धारण करे।

Verse 21

उष्णीषममलं छत्रं पादुके चाप्युपानहौ । धारयेत्पुष्पमाल्ये च सुगंधं प्रियदर्शनः ॥ २१ ॥

प्रियदर्शन भक्त निर्मल उष्णीष धारण करे और छत्र रखे; तथा पादुका-उपानह (चप्पल-जूते) उपयोग करे, पुष्पमाला और सुगंध भी धारण करे।

Verse 22

नित्यं स्वाध्यायशीलः स्याद्यथाचारं समाचरेत् । परान्नं नैव भुञ्जीत परवादं च वर्जयेत् ॥ २२ ॥

वह नित्य स्वाध्याय में रत रहे और यथाचार विधि का पालन करे। पराया अन्न न खाए और पर-निंदा का त्याग करे।

Verse 23

पादेन नाक्रमेत्पादमुच्छिष्टं नैव लंघयेत् । न संहताभ्यां हस्ताभ्यां कंडूयेदात्मनः शिरः ॥ २३ ॥

अपने पाँव से दूसरे के पाँव पर न चढ़े; उच्छिष्ट/अशुद्ध वस्तु को न लाँघे। दोनों हाथ जोड़कर अपने सिर को न खुजलाए।

Verse 24

पूज्यं देवालयं चैव नापसव्यं व्रजेद्दिजः । देवार्चाचमनस्नानव्रतश्राद्धक्रियादिषु ॥ २४ ॥

द्विज को पूज्य पुरुष तथा देवालय की परिक्रमा अपसव्य (वामावर्त) नहीं करनी चाहिए। देवपूजा, आचमन, स्नान, व्रत, श्राद्ध और अन्य कर्मों में भी यही नियम है।

Verse 25

न भवेन्मुक्तकेशश्च नैकवस्त्रधरस्तथा । नारोहेदुष्ट्रयानं च शुष्कवादं च वर्जयेत् ॥ २५ ॥

केश खुले रखकर न रहे, न केवल एक वस्त्र धारण करे। ऊँट पर न चढ़े और शुष्क, निष्फल वाद-विवाद का त्याग करे।

Verse 26

अन्य स्त्रियं न गच्छेच्च पैशुन्यं परिवर्जयेत् । नापसव्यं व्रजेद्विप्र गोश्चत्थानलपर्वतान् ॥ २६ ॥

परस्त्री के पास न जाए और चुगली-निंदा का परित्याग करे। हे विप्र! गाय, पीपल, अग्नि और पर्वतों की अपसव्य परिक्रमा भी न करे।

Verse 27

चतुष्पथं चैत्यवृक्षं र्देवखातं नृपं तथा । असूयां मत्सरत्वं च दिवास्वापं च वर्जयेत् ॥ २७ ॥

चौराहा, चैत्य-वृक्ष, देवखात (मंदिर का सरोवर) तथा राजा के समक्ष अनुचित आचरण से बचे। साथ ही दोषदृष्टि, ईर्ष्या और दिन में सोना भी त्यागे।

Verse 28

न वदेत्परपापानि स्वपुण्यं न प्रकाशयेत् । स्वकं नाम स्वनक्षत्रं मानं चैवातिगोपयेत् ॥ २८ ॥

दूसरों के पापों का वर्णन न करे और अपने पुण्य का प्रचार न करे। अपना नाम, अपना नक्षत्र और अपना मान-प्रतिष्ठा भी अत्यन्त गुप्त रखे।

Verse 29

न दुर्जनैः सह वसे न्नाशास्त्रं श्रृणुयात्तथा । आसवद्यूतगीतेषु द्विजस्तु न रर्तिं चरेत् ॥ २९ ॥

द्विज को दुष्ट जनों की संगति में नहीं रहना चाहिए और अशास्त्रीय उपदेश नहीं सुनने चाहिए; तथा मदिरा, जुआ और अश्लील गीतों में आसक्ति नहीं करनी चाहिए।

Verse 30

आर्द्रास्थि च तथोच्छिष्टं शूद्रं च पतितं तथा । सर्पं च भषणं स्पृष्ट्वा सचैलं स्नानमाचरेत् ॥ ३० ॥

गीली हड्डी, जूठा, शूद्र, पतित, सर्प या आभूषण को छू लेने पर शुद्धि हेतु वस्त्र सहित स्नान करना चाहिए।

Verse 31

चितिं च चितिकाष्टं च यूपं चांडालमेव च । स्पृष्ट्वा देवलकं चैव सवासा जलमाविशेत् ॥ ३१ ॥

चिता, चिताकाष्ठ, यूप, चाण्डाल या देवलक को छू लेने पर शुद्धि हेतु वस्त्र सहित जल में प्रवेश कर स्नान करना चाहिए।

Verse 32

दीपखट्वातनुच्छायाकेशवस्रकटोदकम् । अजामार्जंनिमार्जाररेणुर्द्दैवं शुभं हरेत् ॥ ३२ ॥

दीपक, खाट, सूक्ष्म छाया, केश, वस्त्र, घड़े का जल, बकरी, बिल्ली, झाड़ू/साफ़ करने का साधन, बिल्ली से उठी धूल तथा दैवी शुभ-चिह्न—इनको शुभ मानकर ग्रहण करना चाहिए।

Verse 33

शूर्प्पवातं प्रेतधूमं तथा शूद्रान्नभोजनम् । वृषलीपतिसङ्गं च दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ३३ ॥

सूप (शूर्प) की हवा, प्रेतकर्म का धुआँ, शूद्र का अन्न-भोजन और वृषली के पति की संगति—इनसे दूर ही रहना चाहिए।

Verse 34

असच्छास्त्र्रार्थमननं खादनं नखकेशयोः । तथैव नग्नशयनं सर्वदा परिवर्जयेत् ॥ ३४ ॥

असत् (अशुभ) शास्त्रों के अर्थ का मनन, नाखून‑केश चबाना तथा नग्न होकर शयन—इन सबका सदा परित्याग करे।

Verse 35

शिरोभ्यंगावशिष्टेन तैलेनांगं न लेपयेत् । तांबूलमशुचिं नाद्यात्तथा सुप्तं न बोधयेत् ॥ ३५ ॥

शिरो‑अभ्यंग के बाद बचे हुए तेल से शरीर पर लेपन न करे। अशुचि अवस्था में तांबूल न खाए; और सोए हुए को न जगाए।

Verse 36

नाशुद्धोऽग्निं परिचरेत्पूजयेद्गुरुदेवताः । न वामहस्तेनैकेन पिबेद्वक्रेण वा जलम् ॥ ३६ ॥

अशुद्ध अवस्था में अग्नि की परिचर्या न करे, न गुरु और देवताओं की पूजा करे। केवल बाएँ हाथ से, या मुख को टेढ़ा करके, जल न पिए।

Verse 37

न चाक्रमेद्गुरोश्छायां तदाज्ञां च मुनीश्वर । न निंदेद्योगिनो विप्रान्व्रतिनोऽपि यतींस्तथा ॥ ३७ ॥

हे मुनीश्वर! गुरु की छाया का अतिक्रमण न करे और उनकी आज्ञा का उल्लंघन न करे। योगियों, विप्रों, व्रतधारियों तथा यतियों की निंदा न करे।

Verse 38

परस्परस्य मर्माणि न कदापि वदेद्द्विजः । दर्शे च पौर्णमास्यां च यागं कुर्याद्यथाविधि ॥ ३८ ॥

द्विज को परस्पर के मर्म (गुप्त दोष/दुर्बलता) कभी नहीं कहने चाहिए। और दर्श तथा पौर्णमासी के दिन विधिपूर्वक यज्ञ करे।

Verse 39

उपसनं च होतव्यं सायं प्रातर्द्विजातिभिः । उपासनपरित्यागी सुरापीत्युच्यते बुधैः ॥ ३९ ॥

सायं और प्रातः द्विजों को नित्य संध्या-उपासना अवश्य करनी चाहिए। जो इस उपासना का त्याग करता है, उसे विद्वान सुरापान करने वाले के समान कहते हैं।

Verse 40

अयने विषुवे चैव युगादिषु चतुर्ष्वपि । दर्शे च प्रेतपक्षे च श्राद्धं कुर्याद्गृही द्विजः ॥ ४० ॥

अयन, विषुव, चारों युगादि, अमावस्या (दर्श) तथा प्रेतपक्ष में द्विज गृहस्थ को श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

Verse 41

मन्वादिषु मृदाहे च अष्टकासु च नारद । नावधान्ये समायाते गृही श्राद्धं समाचरेत् ॥ ४१ ॥

हे नारद! मन्वादि दिनों में, मृदाह के दिन, अष्टका-काल में तथा नवधान्य-समय आने पर गृहस्थ को विधिपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए।

Verse 42

श्रोत्रिये गृहमायाते ग्रहणे चंद्रसूर्योः । पुण्यक्षेत्रेषु तीर्थेषु गृही श्राद्धं समाचरेत् ॥ ४२ ॥

जब श्रोत्रिय ब्राह्मण घर आए, चन्द्र-सूर्य ग्रहण के समय, तथा पुण्यक्षेत्रों और तीर्थों में निवास करते हुए गृहस्थ को श्राद्ध विधिपूर्वक करना चाहिए।

Verse 43

यज्ञो दानं तपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम् । वृथा भवति तत्सर्वमूर्द्धपुंड्रं विना कृतम् ॥ ४३ ॥

यज्ञ, दान, तप, होम, स्वाध्याय और पितृतर्पण—ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण किए बिना किए जाएँ तो वे सब निष्फल हो जाते हैं।

Verse 44

उर्द्धपुंड्रं च तुलसीं श्राद्धे नेच्छंति केचन । वृथाचारः परित्याज्यस्तस्माच्छ्रेयोऽर्थिभिर्द्विजैः ॥ ४४ ॥

कुछ लोग श्राद्ध में ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण और तुलसी-सेवन को नहीं मानते। इसलिए परम-श्रेय चाहने वाले द्विजों को ऐसे व्यर्थ, निराधार आचार का त्याग करना चाहिए।

Verse 45

इत्येवमादयो धर्माः स्मृतिमार्गप्रचोदिताः । कार्याद्विजातिभिः सम्यक्सर्वकर्मफलप्रदाः ॥ ४५ ॥

इसी प्रकार के और भी धर्म स्मृति-मार्ग से प्रेरित हैं। द्विजातियों को उन्हें विधिपूर्वक करना चाहिए, क्योंकि वे समस्त कर्मों का फल देने वाले हैं।

Verse 46

सदा चारपरा ये तु तेषां विष्णुः प्रसीदति । विष्णौ प्रसन्नतां याते किमसाध्यं द्विजोत्तम ॥ ४६ ॥

जो सदा सदाचार में तत्पर रहते हैं, उन पर भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। और जब विष्णु प्रसन्न हों, हे द्विजोत्तम, तब कौन-सा कार्य असाध्य रह जाता है?

Frequently Asked Questions

They provide a graded Smṛti taxonomy for lawful household formation: earlier forms (e.g., Brāhma/Daiva/Ārṣa/Prājāpatya) are treated as superior, while later forms are censured yet conditionally permitted when prior options are not feasible—showing the Purāṇa’s pragmatic dharma logic within a normative hierarchy.

It asserts that sacrifice, charity, austerity, fire-offerings, Vedic study, and ancestral offerings become fruitless without the ūrdhva-puṇḍra, and it explicitly dismisses objections to using ūrdhva-puṇḍra and tulasī during śrāddha—recasting ancestor-rites as devotionally validated rather than merely customary.