
Dharmaranya Mahatmya
This section is anchored in the sacred landscape associated with Vārāṇasī (Kāśī) and the named forest-region Dharmāraṇya. It presents the area as a densely sacralized tīrtha-field served by major deities (Brahmā, Viṣṇu, Maheśa), directional guardians, divine mothers, and celestial beings, thereby situating local topography within pan-Indic cosmological governance. The narrative also encodes a social-religious ecology: communities of learned brāhmaṇas, ritual performance, śrāddha offerings, and merit-transfer doctrines are tied to the place’s identity.
40 chapters to explore.

धर्मारण्यकथाप्रस्तावः (Prologue to the Dharmāraṇya Narrative)
अध्याय 1 नैमिषारण्य में पुराण-श्रवण की रूपरेखा स्थापित करता है। शौनक आदि ऋषि सूत (लोमहर्षण) का स्वागत कर उनसे ऐसी पावन कथा का अनुरोध करते हैं जो दीर्घकाल से संचित पापों का क्षय कर दे। सूत मंगलाचरण करके बतलाते हैं कि वे ईश्वर-कृपा से तीर्थों के परम फल का वर्णन करेंगे। फिर कथा का दूसरा स्तर खुलता है—धर्म (यम/धर्मराज) ब्रह्मा की सभा में जाते हैं और देवताओं, ऋषियों, वेदों तथा तत्त्वों के मानवीकृत रूपों से परिपूर्ण विराट् सभा का दर्शन करते हैं। वहाँ वेदव्यास से ‘धर्मारण्य-कथा’ सुनते हैं, जिसे धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष देने वाली, विस्तृत और पुण्यप्रदा कहा गया है। संयमनी लौटकर धर्मराज नारद से मिलते हैं; नारद उन्हें अत्यन्त सौम्य और प्रसन्न देखकर चकित होते हैं। यम बताते हैं कि धर्मारण्य-कथा के श्रवण से यह परिवर्तन हुआ और इसकी शुद्धिकारी शक्ति, यहाँ तक कि घोर पापों से भी मुक्ति देने वाली प्रभावशीलता का वर्णन करते हैं। अंत में संकेत मिलता है कि नारद मनुष्यलोक में युधिष्ठिर की सभा की ओर जाते हैं और आगे का उपदेश उत्पत्ति, संरक्षण, कालक्रम, पूर्ववृत्त, भविष्यफल तथा तीर्थों की स्थिति—इन सबका क्रमबद्ध परिचय देगा।

Dharmāraṇya-Māhātmya: Vārāṇasī’s Sacred Forest, Merit of Death, and Ancestral Rites
यह अध्याय व्यास के अलंकृत स्तवन से आरम्भ होता है, जिसमें वाराणसी की महिमा और उसके भीतर धर्मारण्य नामक परम पवित्र वन का विशेष गौरव बताया गया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, लोकपाल/दिक्पाल, मातृगण, शिव-शक्तियाँ, गन्धर्व और अप्सराएँ आदि दिव्य-सत्ताओं की उपस्थिति गिनाकर इस क्षेत्र को निरन्तर पूजित और कर्मकाण्ड से परिपूर्ण तीर्थ-भूमि के रूप में स्थापित किया गया है। फिर मोक्ष-तत्त्व का प्रतिपादन आता है—धर्मारण्य में जिन प्राणियों की मृत्यु होती है, कीट-पतंग से लेकर उच्चतर जीवों तक, उन्हें स्थिर मुक्ति और विष्णुलोक-गमन का फल बताया गया है, फलश्रुति-शैली में संख्याओं सहित। इसके बाद पिण्डदान का विधान है: यव, व्रीहि, तिल, घी, बिल्वपत्र, दूर्वा, गुड़ और जल से पिण्ड अर्पित करने को पितरों की तृप्ति तथा वंश-परम्परा के उद्धार हेतु अत्यन्त प्रभावी कहा गया है, पीढ़ियों और कुल-गणना के संकेतों के साथ। अध्याय धर्मारण्य की सौम्य पारिस्थितिकी भी दिखाता है—वृक्ष-लताएँ, पक्षी, और स्वभावतः वैरी प्राणियों में भी निर्भयता—जिससे धर्ममय वातावरण का नैतिक चित्र उभरता है। शाप और अनुग्रह दोनों में समर्थ ब्राह्मणों तथा वेदाध्ययन-नियमपरायण विद्वत् ब्राह्मण-समुदायों (अठारह हजार आदि) की उपस्थिति का उल्लेख है। अंत में युधिष्ठिर धर्मारण्य की उत्पत्ति, उसके पृथ्वी पर तीर्थ होने का कारण, और ब्राह्मण बस्तियों की स्थापना (अठारह हजार की संख्या सहित) के विषय में प्रश्न करते हैं, जिससे आगे की कथा का आधार बनता है।

Dharmarāja’s Tapas in Dharmāraṇya and the Devas’ Attempted Distraction (धर्मारण्ये धर्मराजतपः–देवव्याकुलता–अप्सरःप्रेषणम्)
व्यास एक पौराणिक प्रसंग का आरम्भ करते हैं, जिसका श्रवण पवित्र करने वाला है। त्रेता-युग में धर्मारण्य में धर्मराज (आगे चलकर युधिष्ठिर) अत्यन्त कठोर तप करते हैं—शरीर क्षीण, देह अचल, और अल्प श्वास से जीवन धारण; यह परम आत्मसंयम का चित्र है। तप से उत्पन्न तेज से देवगण भयभीत हो उठते हैं और इन्द्र के पद के हिलने की आशंका से कैलास में शिव के पास जाते हैं। ब्रह्मा दीर्घ स्तुति करते हैं—शिव अवर्णनीय, योगियों के अन्तरप्रकाश, गुणों के आधार, और जगत्-प्रक्रिया के मूल कारण तथा विश्वरूप हैं। शिव आश्वस्त करते हैं कि धर्मराज कोई संकट नहीं; फिर भी इन्द्र भीतर से व्याकुल रहकर सभा बुलाता है। बृहस्पति कहते हैं कि तप का प्रत्यक्ष प्रतिरोध असम्भव है, इसलिए अप्सराओं को भेजा जाए। इन्द्र के आदेश से वे संगीत, नृत्य और मोहक हाव-भाव द्वारा ध्यान भंग करने धर्मारण्य जाती हैं। वन-आश्रम की शोभा—पुष्प, पक्षियों का कलरव, और पशुओं की सौहार्दपूर्ण गति—का वर्णन होता है। प्रमुख अप्सरा वर्धनी वीणा, ताल और नृत्य से प्रदर्शन करती है; धर्मराज का मन क्षणभर विचलित होता है। तब युधिष्ठिर पूछते हैं कि धर्म में स्थित व्यक्ति में यह उद्वेग कैसे? व्यास नीति-उपदेश देते हैं—प्रमाद पतन का कारण है; काम-प्रलोभन बड़ी माया है, जो तप, दान, दया, संयम, स्वाध्याय, शुचिता और लज्जा जैसे गुणों को धीरे-धीरे क्षीण कर देती है, जब तक मनुष्य फँस न जाए।

Dharmāraṇya Māhātmya: Varddhanī–Dharma Dialogue, Śiva’s Boons, and the Institution of Dharmavāpī
इस अध्याय में व्यास बताते हैं कि यह कथा यमदूतों के भय को दूर करती है, क्योंकि इसमें धर्म/यम का धर्मसम्मत उद्देश्य स्पष्ट होता है। धमारण्य में तप करते हुए धर्म का सामना अप्सरा वर्द्धनी से होता है; वे उसका परिचय पूछते हैं। वर्द्धनी कहती है कि इन्द्र को भय था—धर्म का तप कहीं लोक-व्यवस्था को डिगा न दे—इसी कारण उसे भेजा गया। सत्य और भक्ति से प्रसन्न होकर धर्म उसे वर देते हैं: इन्द्रलोक में स्थिरता तथा उसके नाम का तीर्थ, जिसमें पाँच-रात्रि का व्रत आदि नियम हों और वहाँ दान-जप-पाठ का अक्षय फल मिले। इसके बाद धर्म अत्यन्त कठोर तप करते हैं; देवगण व्याकुल होकर शिव की शरण लेते हैं। शिव प्रकट होकर तप की प्रशंसा करते हैं और वर देते हैं। धर्म प्रार्थना करते हैं कि यह क्षेत्र तीनों लोकों में ‘धर्मारण्य’ के नाम से प्रसिद्ध हो तथा सभी प्राणियों—मनुष्य ही नहीं, अन्य जीवों के लिए भी—मोक्षदायी तीर्थ स्थापित हो। शिव नाम की पुष्टि करते हैं, विश्वेश्वर/महालिङ्ग रूप में लिङ्ग-सन्निधि का वचन देते हैं और धर्मवापी की स्थापना का विधान बताते हैं। आगे धार्मेश्वर के स्मरण-पूजन की प्रभावशीलता, धर्मवापी में स्नान और यम के लिए तर्पण-मंत्र, रोग-शोक व उपद्रव-निवारण, श्राद्ध के श्रेष्ठ समय (अमावस्या, संक्रान्ति, ग्रहण आदि), तथा तीर्थों की तुलना का वर्णन है। अंत में फलश्रुति आती है—यहाँ किए गए दान, जप, श्राद्ध आदि से महान पुण्य और परलोक में उत्तम गति प्राप्त होती है।

सदाचार-शौच-सन्ध्या-विधि (Ethical Conduct, Purity, and Sandhyā Procedure)
इस अध्याय में युधिष्ठिर धर्म और समृद्धि के मूल ‘सदाचार’ का उपदेश पूछते हैं। व्यास जी प्राणियों और गुणों की क्रमबद्ध श्रेष्ठता बताते हुए ब्राह्मण-विद्या और ब्रह्म-तत्परता को सर्वोपरि कहते हैं। सदाचार को द्वेष-राग से रहित धर्म-मूल बताया गया है; दुराचार से लोक-निन्दा, रोग और आयु-क्षय होता है—ऐसी चेतावनी दी गई है। फिर यम-नियम (सत्य, अहिंसा, संयम, शौच, स्वाध्याय, उपवास आदि), काम-क्रोध-मोह-लोभ-मात्सर्य जैसे अंतःशत्रुओं पर विजय, और धीरे-धीरे धर्म-संचय का मार्ग बताया जाता है। मनुष्य अकेला जन्मता और अकेला मरता है; परलोक में केवल धर्म ही साथ जाता है—यह मुख्य प्रतिपादन है। उत्तरार्ध में नित्यचर्या का विधिवत वर्णन है—ब्रह्ममुहूर्त में स्मरण, निवास से दूर मलोत्सर्ग, मिट्टी और जल से शुद्धि, आचमन के नियम, कुछ दिनों में दन्तधावन का निषेध, प्रातःस्नान का फल, तथा प्राणायाम, अघमर्षण, गायत्री-जप, सूर्य को अर्घ्य, तर्पण और गृह्यकर्म सहित सन्ध्या-विधि। इसे संयमी द्विज के लिए स्थिर नित्य-धर्म कहा गया है।

गृहस्थधर्म-उपदेशः (Householder Dharma: pañcayajña, hospitality, and conduct codes)
इस अध्याय में व्यास गृहस्थ-आचार का तकनीकी उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि समाज और यज्ञ-व्यवस्था का आधार गृहस्थ है; देव, पितर, ऋषि, मनुष्य और अन्य प्राणी भी उसके पालन-पोषण पर आश्रित हैं। ‘त्रयीमयी धेनु’ का रूपक आता है, जिसके चार स्तन—स्वाहा, स्वधा, वषट् और हन्त—देवों को आहुति, पितरों को तर्पण, ऋषि/विधि-पालन, तथा मनुष्यों/आश्रितों के पोषण का संकेत करते हैं; वेद-पाठ और अन्नदान को परस्पर जुड़ा नित्यधर्म कहा गया है। फिर दैनिक क्रम बताया गया है—शौच-शुद्धि, तर्पण, पूजा, भूतबलि, और विधिपूर्वक अतिथि-सत्कार। ‘अतिथि’ विशेषतः ब्राह्मण अतिथि माना गया है; बिना बाधा पहुँचाए स्वागत, यथाशक्ति भोजन, और मधुर वाणी का विधान है। युधिष्ठिर के प्रश्न पर आठ विवाह-रूप—ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, असुर, गान्धर्व, राक्षस, पैशाच—का नैतिक क्रम से विवेचन होता है और कन्या-शुल्क को विक्रय-भाव से निंदित किया गया है। आगे पंचयज्ञ—ब्रह्म, पितृ, देव, भूत, नृ—का विधान, वैश्वदेव और अतिथि-सेवा की उपेक्षा की निंदा, तथा शुद्धि, संयम, अनध्याय, वाणी-नीति, बड़ों का सम्मान और दान-फल के नियम देकर निष्कर्ष किया गया है कि ये धर्मारण्य-निवासियों हेतु श्रुति-स्मृति-सम्मत आचार हैं।

धर्मवापी-श्राद्धमाहात्म्यं तथा पतिव्रताधर्म-नियमाः (Dharma-vāpī Śrāddha Māhātmya and the Ethical Guidelines of Pativratā-dharma)
इस अध्याय में संवाद-शैली में तीर्थकर्म का उपदेश और गृह-नीति साथ-साथ आती है। व्यास धर्मवापी तीर्थ पर पहुँचकर पितृ-तर्पण और पिण्डदान की अद्भुत महिमा बताते हैं—इनसे पितरों को दीर्घकाल तक तृप्ति मिलती है और विविध परलोक-स्थितियों में गए प्राणियों तक भी इसका पुण्य-लाभ फैलता है। फिर कलियुग को लोभ, वैर, निन्दा और सामाजिक कलह से अस्थिर बताया गया है, पर साथ ही यह भी कहा गया है कि वाणी-मन-शरीर की शुद्धि, अहिंसा, संयम, माता-पिता की सेवा, दान और धर्म-ज्ञान से शुद्धि संभव है। शौनक के प्रश्न पर सूत पतिव्रता-धर्म के लक्षण विस्तार से बताते हैं—आचरण-संयम, पति के हित को प्रधान रखना, संदिग्ध/अपकीर्तिकर संगति से बचना, मर्यादित वाणी-व्यवहार और गृह्य-पूजा का नियम। अधर्माचरण के लिए दुष्ट-योनि आदि परिणामों की चेतावनी दी गई है। अंत में धर्मक्षेत्र में श्राद्ध और दान की पुनः प्रशंसा है—भक्ति से किया गया छोटा-सा अर्पण भी कुल की रक्षा करता है, जबकि अधर्म से कमाया धन श्राद्ध में लगाना दोषपूर्ण कहा गया है। उपसंहार में धर्मारण्य को सदा कामना-पूर्ति करने वाला, योगियों को मोक्ष देने वाला और सिद्धों को सफलता देने वाला बताया गया है।

Dharmāraṇya-Prastāva: Deva-samāgama and Sṛṣṭi-Kathā (धर्मारण्यप्रस्तावः—देवसमागमः सृष्टिकथा च)
इस अध्याय में युधिष्ठिर धर्मारण्य की कथा को और विस्तार से सुनने की प्रार्थना करते हैं। व्यास बताते हैं कि यह प्रसंग स्कन्दपुराण से उद्धृत है, जिसे स्वयं स्थाणु (शिव) ने स्कन्द को कहा था; इसका श्रवण अनेक तीर्थों के फल के समान है और विघ्नों का नाश करता है। फिर दृश्य कैलास पर जाता है, जहाँ पंचवक्त्र, दशभुज, त्रिनेत्र, शूलपाणि शिव कपाल और खट्वांग धारण किए गणों से घिरे हैं; ऋषि, सिद्ध और दिव्य गायक उनकी स्तुति करते हैं। स्कन्द देखते हैं कि देवगण और उच्च देवताएँ शिव के द्वार पर दर्शन की प्रतीक्षा कर रही हैं। शिव उठकर प्रस्थान को उद्यत होते हैं तो स्कन्द कारण पूछते हैं। शिव बताते हैं कि वे देवताओं सहित धर्मारण्य जाने वाले हैं और साथ ही सृष्टि-कथा सुनाते हैं—प्रलय में परब्रह्म की स्थिति, महत्तत्त्व का उदय, विष्णु का जल में विहार, वटवृक्ष और पत्ते पर शिशु-रूप का प्राकट्य, नाभि-कमल से ब्रह्मा का जन्म, तथा लोकमण्डल और योनियों सहित प्राणियों की रचना का आदेश। आगे ब्रह्मा के मानसपुत्र, कश्यप और उनकी पत्नियाँ, आदित्यगण तथा धर्म के कारण “धर्मारण्य” नाम की व्युत्पत्ति कही जाती है। देव, सिद्ध, गन्धर्व, नाग, ग्रह आदि की महासभा का वर्णन होता है और अंत में ब्रह्मा वैकुण्ठ जाकर विष्णु की विधिवत स्तुति करते हैं; विष्णु दिव्य रूप में प्रकट होकर सृष्टि, पवित्र भूगोल और दैवी परामर्श के बीच का सेतु स्थापित करते हैं।

धर्मारण्ये देवसमागमः तथा ऋष्याश्रमस्थापनम् (Divine Assembly in Dharmāraṇya and the Establishment of Ṛṣi-Āśramas)
यह अध्याय संवाद-शैली में है। व्यास पुण्यकथा सुनाते हैं—विष्णु ब्रह्मा और देवताओं के आगमन का कारण पूछते हैं; ब्रह्मा बताते हैं कि तीनों लोकों में कोई भय नहीं है और वे एक प्राचीन, धर्म-प्रतिष्ठित तीर्थ के दर्शन हेतु आए हैं। विष्णु गरुड़ पर शीघ्र धर्मारण्य जाते हैं और देवगण साथ चलते हैं। धर्मराज यम दिव्य अतिथियों का विधिवत् आतिथ्य और अलग-अलग पूजन से स्वागत करते हैं, विष्णु की स्तुति करते हैं और कहते हैं कि इस क्षेत्र का तीर्थत्व भगवान की कृपा तथा देवता-संतोष से सिद्ध है। विष्णु वर देने को कहते हैं; यम प्रार्थना करते हैं कि धर्मारण्य में ऋषि-आश्रम स्थापित हों, ताकि तीर्थ की रक्षा हो, उपद्रव रुके और वेदपाठ व यज्ञों से यह वन गूँज उठे। तब विष्णु विराट रूप धारण कर दिव्य सहायता से अनेक विद्वान ब्राह्मण-ऋषियों को, उनके गोत्र-प्रवर और वंश-परंपराओं सहित, उचित स्थानों पर स्थापित करते हैं। आगे युधिष्ठिर इन समूहों की उत्पत्ति, नाम और निवास-स्थानों के विषय में पूछते हैं और विस्तृत सूचियाँ चलती हैं। उत्तर भाग में देवी-नामों तथा ब्रह्मा द्वारा कामधेनु के आवाहन का संकेत भी मिलता है, जिससे धर्म-व्यवस्था के पोषण का भाव पुष्ट होता है।

Kāmadhenū’s Creation of Attendants and the Regulation of Saṃskāras in Dharmāraṇya (कामधेन्वनुचर-निर्माण तथा संस्कारानुशासन)
व्यास युधिष्ठिर को धर्मारण्य की कथा सुनाते हैं, जहाँ यज्ञ-जीवन के लिए सेवा-व्यवस्था स्थापित होती है। ब्रह्मा की प्रेरणा से कामधेनु का आवाहन किया जाता है और वह प्रत्येक याज्ञिक के लिए जोड़े में अनुचर प्रदान करती है। इससे शिखा और यज्ञोपवीत जैसे पवित्र चिह्नों से युक्त, शास्त्र-ज्ञान और सदाचार में निपुण, अनुशासित बड़ा समुदाय प्रकट होता है। देवता आदेश देते हैं कि समिधा, पुष्प, कुश आदि दैनिक सामग्री नियमित रूप से उपलब्ध कराई जाए, और नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकरण, उपनयन आदि संस्कार अनुचरों की अनुमति से ही हों; अनुमति की अवहेलना करने पर बार-बार कष्ट, रोग और सामाजिक हानि जैसे दुष्परिणाम बताए गए हैं। इसके बाद कामधेनु की महिमा का वर्णन है—वह अनेक देव-स्वरूपों और तीर्थों का पवित्र आश्रय मानी गई है। युधिष्ठिर के विवाह और संतान संबंधी प्रश्न पर व्यास बताते हैं कि अनुचरों को गंधर्व कन्याएँ कैसे मिलीं: शिव का दूत विश्वावसु से कन्याएँ मांगता है, अस्वीकार होने पर शिव की शक्ति-प्रेरणा से गंधर्वराज कन्याएँ दे देता है। अनुचर वैदिक विधि से आज्य-भाग आदि आहुतियाँ करते हैं और गंधर्व-विवाह के संदर्भ में प्रचलित रीति का संकेत मिलता है। अंत में धर्मारण्य में स्थिर बसाहट दिखती है, जहाँ विविध जप-यज्ञ चलते रहते हैं और अनुचर-समुदाय तथा उनकी स्त्रियाँ गृह-सेवा व यज्ञ-सहायता द्वारा सामग्री जुटाकर स्थान-आधारित धर्म का स्थायी आदर्श स्थापित करती हैं।

Lolajihva-vadhaḥ and the Naming of Satya Mandira (लोलजिह्ववधः सत्यमन्दिरनामकरणं च)
अध्याय में व्यास–युधिष्ठिर संवाद है। युधिष्ठिर आगे की कथा सुनाने का अनुरोध करते हैं और कहते हैं कि व्यास-वाणी का अमृत उन्हें कभी तृप्त नहीं करता। व्यास कलियुग के अंतकाल में उत्पन्न संकट बताते हैं—राक्षस-राज लोलजिह्व उठ खड़ा होता है, तीनों लोकों में आतंक फैलाता है, फिर धर्मारण्य पहुँचकर अनेक प्रदेशों को जीतता और एक सुंदर, पवित्र बस्ती को जला देता है; भयभीत ब्राह्मण वहाँ से पलायन कर जाते हैं। तब श्रीमाता के नेतृत्व में असंख्य देवियाँ प्रकट होती हैं। वे त्रिशूल, शंख-चक्र-गदा, पाश-अंकुश, खड्ग, परशु आदि दिव्य आयुध धारण कर ब्राह्मणों की रक्षा और राक्षस-विनाश हेतु युद्ध करती हैं। लोलजिह्व की गर्जना से दिशाएँ और समुद्र काँप उठते हैं; इन्द्र (वासव) नलकूबर को समाचार लेने भेजते हैं, जो युद्ध का वृत्तांत बताता है। इन्द्र विष्णु को सूचित करते हैं; विष्णु (इस वर्णन में सत्यलोक से) अवतरित होकर सुदर्शन चक्र छोड़ते हैं और लोलजिह्व को निष्प्रभ कर देते हैं। देवियों के प्रहारों के बीच राक्षस मारा जाता है। देव-गंधर्व विष्णु की स्तुति करते हैं; विस्थापित ब्राह्मणों को ढूँढ़कर आश्वस्त किया जाता है कि वासुदेव के चक्र से राक्षस का अंत हो गया। ब्राह्मण परिवार सहित लौटकर तप, यज्ञ और अध्ययन पुनः आरंभ करते हैं। बस्ती का नाम-निर्णय भी होता है—कृतयुग में यह धर्मारण्य और त्रेता में ‘सत्य मन्दिर’ के नाम से प्रसिद्ध होती है।

गणेशोत्पत्तिः एवं धर्मारण्ये प्रतिष्ठा (Gaṇeśa’s Origin and Installation in Dharmāraṇya)
व्यास युधिष्ठिर से धर्मारण्य में ‘सत्यमन्दिर’ नामक बस्ती के रक्षात्मक पवित्रीकरण का वर्णन करते हैं। ध्वज-पताकाओं से सुसज्जित प्राकार, ब्राह्मण-सम्बद्ध क्षेत्र में मध्य पीठ, और चारों दिशाओं में शुद्ध किए गए द्वार स्थापित किए जाते हैं। पूर्व में धर्मेश्वर, दक्षिण में गणनायक (गणेश), पश्चिम में भानु (सूर्य) और उत्तर में स्वयम्भू की प्रतिष्ठा से दिशा-रक्षा का दिव्य विधान बनता है। फिर गणेश की उत्पत्ति की कथा आती है। पार्वती अपने शरीर के उबटन/मल से एक बालक का रूप बनाकर उसमें प्राण प्रतिष्ठित करती हैं और उसे द्वारपाल नियुक्त करती हैं। महादेव के प्रवेश में बाधा होने पर संघर्ष होता है और बालक का शिरच्छेद हो जाता है। पार्वती के दुःख को शांत करने हेतु महादेव गज-शिर लगाकर उसे पुनर्जीवित करते हैं और ‘गजानन’ नाम देते हैं। देव-ऋषि स्तुति करते हैं; गणेश वर देते हैं कि वे धर्मारण्य में सदा रहकर साधकों, गृहस्थों और वणिक-समुदाय की रक्षा करेंगे, विघ्न हरेंगे, कल्याण देंगे, तथा विवाह, उत्सव और यज्ञों में प्रथम पूज्य होंगे।

रविक्षेत्रे संज्ञातपः, अश्विनौ-उत्पत्तिः, रविकुण्ड-माहात्म्यं च (Saṃjñā’s austerity in Ravikṣetra, the birth of the Aśvins, and the Māhātmya of Ravikuṇḍa)
इस अध्याय में युधिष्ठिर व्यास से पूछते हैं कि अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति कैसे हुई और पृथ्वी पर सूर्य-तत्त्व का अवतरण/प्रकट होना किस प्रकार हुआ। व्यास संज्ञा–सूर्य की कथा सुनाते हैं। सूर्य के प्रचण्ड तेज को सह न सकने पर संज्ञा अपनी छाया को स्थानापन्न बनाकर, गृहधर्म निभाने और रहस्य छिपाए रखने की आज्ञा देकर चली जाती हैं। इसी प्रसंग में यम और यमुना का प्रादुर्भाव तथा यम के साथ हुए विवाद से छाया की पहचान प्रकट होने का वर्णन आता है। सूर्य संज्ञा की खोज करते हुए धर्मारण्य में उन्हें वडवा (घोड़ी) रूप में कठोर तप करते पाते हैं। वहाँ कथा में नासिका-प्रदेश से जुड़े विशिष्ट संयोग से नासत्य और दसर—अश्विनौ—का जन्म होता है। आगे रविकुण्ड का माहात्म्य कहा गया है—स्नान, दान, तर्पण, श्राद्ध और बकुलार्क-पूजन से पापशुद्धि, आरोग्य, रक्षा, समृद्धि और कर्मफल-वृद्धि का फल बताया गया है। सप्तमी, रविवार, ग्रहण, संक्रान्ति, व्यतीपात और वैधृति आदि कालों में विशेष फल की प्रशंसा भी दी गई है।

Hayagrīva-hetu-nirūpaṇa (The Causal Account of Viṣṇu as Hayagrīva) | हयग्रीवहेतुनिरूपणम्
इस अध्याय में बहुवाणी धर्म-तत्त्व की जिज्ञासा प्रकट होती है। युधिष्ठिर धर्मारण्य में भगवान विष्णु ने कब और कैसे तप किया—यह क्रम से जानना चाहते हैं। फिर स्कन्द, रुद्र/ईश्वर से पूछते हैं कि सर्वव्यापी, गुणातीत, सृष्टि-पालन-संहार करने वाले प्रभु ने अश्वमुख रूप क्यों धारण किया—जिसे हयग्रीव तथा कृष्ण के रूप में स्पष्ट किया गया है। इसके बाद वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम और कृष्ण के प्रसिद्ध कार्यों तथा कल्कि के भविष्य-प्रसंग का संक्षिप्त स्मरण कराया जाता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि वही परम सत्ता धर्म-स्थापन हेतु अनेक रूपों में प्रकट होती है। रुद्र कारण-कथा बताते हैं। यज्ञ की तैयारी करते देवगण विष्णु को योगारूढ़, ध्यानस्थ अवस्था में नहीं पा पाते और बृहस्पति के पास जाते हैं। फिर वाम्र्य (चींटियाँ/वल्मीकीय जीव) धनुष की डोरी (गुण) कुतरकर उन्हें जगाएँ—ऐसा उपाय किया जाता है; ‘समाधि न टूटे’—यह नैतिक संकोच भी व्यक्त होता है, पर वाम्र्यों को यज्ञ-भाग देकर सहमति बनती है। डोरी कटते ही धनुष के झटके से एक सिर कटकर आकाश को उठ जाता है; देवगण व्याकुल होकर खोज में लगते हैं—यहीं से हयग्रीव-तत्त्व और योग-समाधि से जुड़ी दैवी कारण-व्यवस्था का संकेत मिलता है।

हयग्रीवोत्पत्तिः तथा धर्मारण्यतीर्थमाहात्म्यम् (Hayagrīva’s Manifestation and the Māhātmya of Dharmāraṇya Tīrthas)
इस अध्याय में दो जुड़े हुए प्रसंग आते हैं। पहले देवताओं का संकट बताया गया है—वे ‘शिर’ का पता नहीं लगा पाते; तब ब्रह्मा विश्वकर्मा को यज्ञ-सिद्धि से संबद्ध देवता के लिए उपयुक्त रूप बनाने का आदेश देते हैं। सूर्य-रथ के प्रसंग में एक अश्व-शिर प्रकट होता है, जिसे विष्णु से जोड़कर हयग्रीव रूप प्रादुर्भूत होता है। देवगण विधिवत स्तुति करते हैं और हयग्रीव/विष्णु को ओंकार, यज्ञ, काल, गुण तथा भूत-देवताओं के अधिष्ठान रूप में पहचानते हैं; विष्णु वर देकर बताते हैं कि यह रूप कल्याणकारी और पूज्य है। दूसरे भाग में व्यास–युधिष्ठिर संवाद से कारण-व्याख्या मिलती है—सभा में ब्रह्मा का अभिमान, उससे उत्पन्न शाप-सदृश परिणाम और विष्णु के शिर से जुड़ा प्रसंग, तथा धर्मारण्य में विष्णु का तप। फिर धर्मारण्य को महान् क्षेत्र कहा गया है; मुक्तेश/मोक्षेश्वर और देवसरस/देवखाता आदि तीर्थों की महिमा वर्णित है। स्नान, पूजन (विशेषतः कार्त्तिक में कृत्तिका-योग), तर्पण-श्राद्ध, जप और दान के विधान बताए गए हैं; फलस्वरूप पाप-नाश, पितरों का उद्धार, दीर्घायु, आरोग्य, वंश-वृद्धि और उच्च लोक-प्राप्ति का आश्वासन दिया गया है।

Śakti-Sthāpana in Dharmāraṇya: Directional Guardianship, Sacred Lake, and Akṣaya Merit (अध्याय १६)
अध्याय 16 में युधिष्ठिर और व्यास के बीच प्रश्नोत्तर रूप में धर्म-चर्चा होती है। युधिष्ठिर धर्मारण्य में राक्षस, दैत्य, यक्ष आदि से उत्पन्न भय को शांत करने हेतु स्थापित रक्षात्मक शक्तियों का क्रमबद्ध विवरण—उनके नाम और स्थान—जानना चाहते हैं। व्यास बताते हैं कि देवाधिकारियों ने इन शक्तियों को चारों दिशाओं में द्विजों और समस्त जनसमुदाय की रक्षा के लिए स्थापित किया। इस प्रसंग में श्रीमाता, शान्ता, सावित्री, गात्रायी, छत्राजा और आनन्दा आदि देवी-रूपों के नाम, उनके आयुध और गरुड़ व सिंह जैसे वाहन, तथा स्थान-रक्षा और यज्ञ-धर्म की मर्यादा की रक्षा करने वाला स्वरूप वर्णित है। फिर छत्राजा के स्थान के सामने स्थित एक पवित्र सरोवर का उल्लेख आता है, जहाँ स्नान, तर्पण और पिण्डदान अक्षय फल देने वाले कहे गए हैं। आगे पुण्य-तत्त्व का विस्तार करते हुए रोग-शमन, शत्रु-निवारण, समृद्धि और विजय की आश्वस्ति दी जाती है। अंत में आनन्दा को सात्त्विकी शक्ति मानकर उनकी स्तुति की जाती है; निर्दिष्ट अर्पणों से उनका पूजन करने पर स्थायी फल, विद्या-वृद्धि और कल्याण प्राप्त होता है।

Śrīmātā-Kulamātā-Stuti and Pūjāvidhi (Protective Śakti Discourse)
इस अध्याय में व्यास राजा से दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठित एक महाशक्ति का वर्णन करते हैं। वह शान्ता देवी, श्रीमाता, कुलमाता और स्थानमाता—इन अनेक नामों से पूजित होकर वंश और निवास-स्थान की रक्षिका शक्ति मानी गई है। उसके बहुभुज रूप, घण्टा, त्रिशूल, अक्ष-माला, कमण्डलु आदि आयुध-चिह्न, वाहन-प्रतीक तथा कृष्ण और रक्त वर्ण के वस्त्रों का संकेत दिया गया है; साथ ही विष्णु-स्थापन से उसका सम्बन्ध, दैत्य-विनाशक स्वरूप और सरस्वती-रूप की स्पष्ट पहचान बताई गई है। फिर पूजा-विधि कही गई है—पुष्प, सुगन्ध (कपूर, अगरु, चन्दन), दीप-धूप, तथा अन्न-नैवेद्य (धान्य, मिष्ठान्न, पायस, मोदक) अर्पित करना। किसी भी शुभ कार्य के आरम्भ से पहले उचित निवेदन करके ब्राह्मणों और कुमारियों को भोजन कराना आवश्यक बताया गया है। फल के रूप में युद्ध और प्रतियोगिताओं में विजय, विघ्नों का नाश, विवाह-उपनयन-सीमन्त आदि संस्कारों की सिद्धि, समृद्धि, विद्या, संतान और अंततः सरस्वती की कृपा से उत्तम परलोक-गति का प्रतिपादन किया गया है।

Karṇāṭaka-Dānava-Vadhaḥ — The Slaying of Karṇāṭaka and the Institution of Śrīmātā Worship
इस अध्याय में दो कथानक-धाराएँ साथ चलती हैं। रुद्र स्कन्द को धर्मारण्य की प्राचीन घटना सुनाते हैं—कर्णाटक नामक दानव निरन्तर विघ्न उत्पन्न करता था, विशेषकर दम्पतियों को लक्ष्य बनाकर और वैदिक मर्यादा को भंग करके। तब श्रीमाता मातङ्गी/भुवनेश्वरी के रूप में प्रकट होकर उसका संहार करती हैं। दूसरी ओर व्यास, युधिष्ठिर के प्रश्न के उत्तर में, कर्णाटक के स्वभाव, उसके अवैदिक अत्याचार, तथा ब्राह्मणों और स्थानीय जनसमुदाय (व्यापारियों सहित) द्वारा किए गए धार्मिक प्रतिकार का वर्णन करते हैं। अध्याय में समन्वित पूजन-विधान बताया गया है—पञ्चामृत स्नान, गन्धोदक, धूप-दीप, नैवेद्य और दूध-उत्पाद, मिठाइयाँ, अन्न-धान्य, दीपक तथा उत्सव-भोज्य आदि विविध अर्पण। श्रीमाता दर्शन देकर रक्षा का वर देती हैं और फिर अठारह आयुधों से युक्त, अनेक भुजाओं वाली उग्र योद्धा-रूप में प्रकट होती हैं। दानव छल और शस्त्रों से युद्ध करता है, देवी दिव्य बन्धनों और निर्णायक शक्ति से उसे परास्त कर अंततः उसका वध करती हैं। अंत में आचार-निर्देश है कि शुभ कर्मों के आरम्भ में, विशेषतः विवाह में, श्रीमाता की पूजा करने से विघ्न नहीं आते। संतानहीन को संतान, निर्धन को धन, तथा आयु और आरोग्य की वृद्धि—ऐसा फल स्पष्ट रूप से बताया गया है, जो निरन्तर उपासना से सिद्ध होता है।

इन्द्रतीर्थ-माहात्म्य एवं इन्द्रेश्वरलिङ्गप्रादुर्भावः (Indra Tīrtha Māhātmya and the Manifestation of the Indreśvara Liṅga)
यह अध्याय व्यास–युधिष्ठिर संवाद के रूप में इन्द्रसरोवर में स्नान तथा धर्मारण्य में इन्द्रेश्वर शिव के दर्शन‑पूजन की महिमा बताता है। व्यास कहते हैं कि वहाँ स्नान, लिङ्ग‑दर्शन और पूजा से दीर्घकाल से संचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं। युधिष्ठिर उत्पत्ति‑कथा पूछते हैं। व्यास बताते हैं कि वृत्रवध से उत्पन्न ब्रह्महत्या‑सदृश दोष को शांत करने हेतु इन्द्र ने उत्तर दिशा में एक बस्ती से आगे जाकर कठोर तप किया। तब शिव उग्र रूप में प्रकट होकर आश्वासन देते हैं कि धर्मारण्य में ऐसे क्लेश टिकते नहीं; भीतर प्रवेश कर इन्द्रसरोवर में स्नान करो। इन्द्र अपने नाम से शिव‑प्रतिष्ठा की प्रार्थना करते हैं; शिव योगबल से प्रकट पाप‑नाशक लिङ्ग (कूर्म‑चिह्न से युक्त) दिखाकर जीवों के कल्याण हेतु वहीं ‘इन्द्रेश्वर’ रूप में स्थित होते हैं। अध्याय में नित्य पूजा‑अर्चना, विविध उपहार, माघ मास की अष्टमी व चतुर्दशी के विशेष व्रत, देव के सम्मुख नीलोत्सर्ग, चतुर्दशी को रुद्र‑जप, द्विजों को स्वर्ण‑रत्ननिर्मित नेत्र‑प्रतिमा का दान, स्नान के बाद पितृ‑तर्पण आदि के फल बताए गए हैं। रोग‑दुःख और अनिष्टों से मुक्ति, मनोवांछित सिद्धि तथा श्रद्धापूर्वक श्रवण करने वालों की शुद्धि का फलश्रुति में प्रतिपादन है; अंत में जयन्त की भक्ति और इन्द्र की आवर्ती पूजा का उल्लेख आता है।

देवमज्जनकतीर्थमाहात्म्यं तथा मन्त्रकूटोपदेशः (Devamajjanaka Tīrtha-Māhātmya and Instruction on Mantra ‘Kūṭa’ Structures)
इस अध्याय में व्यास–युधिष्ठिर संवाद के माध्यम से धर्मारण्य में स्थित देवमज्जनक नामक अनुपम शिव-तीर्थ का वर्णन आता है। वहाँ शंकर के एक अद्भुत स्तम्भन और भ्रम-सी अवस्था का प्रसंग कहा गया है, जिससे तीर्थ की अलौकिक महिमा प्रकट होती है। फिर कथा तकनीकी धर्म-तत्त्व की ओर मुड़ती है। पार्वती शिव से मन्त्रों के भेद और ‘षड्विध’ शक्तियों के विषय में पूछती हैं; शिव सावधानीपूर्वक बीजाक्षरों और कूट-संयोगों का उपदेश देते हैं—माया-बीज, वह्नि-बीज, ब्रह्म-बीज, काल-बीज और पार्थिव-बीज आदि का उल्लेख करते हुए उनके प्रभाव, आकर्षण, मोहन आदि कार्यों का संकेत करते हैं, साथ ही दुरुपयोग से सावधान भी करते हैं। अंत में देवमज्जनक तीर्थ-माहात्म्य बताया गया है—स्नान तथा पान, आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को विशेष व्रत, उपवास सहित पूजन और रुद्र-जप को पाप-शोधन, रक्षा तथा कल्याण-प्रद कहा गया है। फलश्रुति में इस कथा के श्रवण और प्रचार से महायज्ञ-समान पुण्य, समृद्धि, आरोग्य और वंश-वृद्धि की प्राप्ति बताई गई है।

गोत्र–प्रवर-विवाहनिषेधः तथा प्रायश्चित्तविधानम् (Gotra–Pravara Marriage Prohibitions and Expiatory Regulations)
अध्याय 21 में गोत्र–प्रवर के नियमों और विवाह-योग्यता से सम्बन्धित धर्मशास्त्रीय सामग्री का संकलन है। व्यास के वचन से आरम्भ होकर प्रसंग-स्थल से जुड़ी देवताओं/शक्तियों (अनेक नामों वाली देवियों सहित) की सूची दी जाती है, फिर गोत्र–प्रवर के तकनीकी भेद, समान/भिन्न प्रवर के उदाहरणों सहित, विस्तार से बताए जाते हैं। इसके बाद समान गोत्र या समान प्रवर में, तथा कुछ मातृ-पक्षीय सम्बन्धों में विवाह का स्पष्ट निषेध किया गया है। निषिद्ध विवाह के सामाजिक–वैदिक परिणाम—ब्राह्मण्य-स्थिति का ह्रास और सन्तान का हीन-लक्षण—बताकर, ऐसे विवाह करने वालों के लिए विशेषतः चान्द्रायण व्रत आदि प्रायश्चित्त का विधान किया गया है। कात्यायन, याज्ञवल्क्य, गौतम आदि आचार्यों के मतों के आधार पर पितृ-मातृ वंश में कितनी दूरी तक सम्बन्ध मान्य है, बड़े-छोटे भाई के विवाह-क्रम, तथा “पुनर्भू” आदि गृहस्थ-धर्म की श्रेणियाँ भी समझाई गई हैं। अध्याय का उद्देश्य नियमों का संरक्षण और उल्लंघन होने पर शुद्धि-मार्ग बताना है।

यॊगिनीनां स्थानविन्यासः (Placement of the Yoginīs and Directional Śaktis)
इस अध्याय में प्रश्नोत्तर-रूप संवाद है। युधिष्ठिर व्यास से पूछते हैं कि काजेश द्वारा प्रतिष्ठित योगिनियाँ कौन हैं, उनका स्वरूप कैसा है और वे कहाँ निवास करती हैं। व्यास बतलाते हैं कि वे नाना आभूषणों, वस्त्रों, वाहनों और निनादों से विभूषित हैं तथा उनका मुख्य कार्य यज्ञकर्म में लगे विप्रों और भक्तों की रक्षा कर भय का नाश करना है। फिर दिग्विन्यास का वर्णन आता है—चारों दिशाओं और आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य, ईशान आदि उपदिशाओं में इन शक्तियों की स्थापना कही गई है। आशापुरी, छत्रा, ज्ञानजा, पिप्पलाम्बा, शान्ता, सिद्धा, भट्टारिका, कदम्बा, विकटा, सुपणा, वसुजा, मातङ्गी, वाराही, मुकुटेश्वरी, भद्रा, महाशक्ति, सिंहारा आदि नामों का उल्लेख कर यह भी कहा जाता है कि इनके अतिरिक्त असंख्य योगिनियाँ हैं। आगे कुछ देवियों का आशापूर्णा के निकट होना, कुछ का पूर्व-उत्तर-दक्षिण-पश्चिम में नियत स्थान पाना, तथा जल-तर्पण और बलि जैसे उपचरों का संकेत मिलता है। एक शक्ति सिंहासनस्थ, चतुर्भुजा और वरदायिनी कही गई है; कोई ध्यान से सिद्धि देती है; कोई भुक्ति और मुक्ति प्रदान करती है; और कुछ रूप त्रिसंध्या में प्रत्यक्ष माने गए हैं। अंत में नैऋत्य दिशा में ब्राह्माणी आदि तथा ‘जल-मातर’ समूह का उल्लेख कर अध्याय रक्षक स्त्री-शक्तियों के पवित्र भूगोल-सूचक के रूप में पूर्ण होता है।

धर्मारण्ये देवसत्र-प्रवर्तनं लोहासुरोपद्रवश्च | The Devas’ Satra in Dharmāraṇya and the Disruption by Lohāsura
व्यास बताते हैं कि दैत्यों के साथ संघर्ष से पीड़ित देवता शरण के लिए ब्रह्मा के पास जाते हैं और विजय का उपाय पूछते हैं। ब्रह्मा धर्मारण्य की पूर्व-रचना का वर्णन करते हैं—ब्रह्मा, शंकर और विष्णु के दिव्य सहयोग से, तथा यम के तप को कारण-समर्थन मानकर। वे कर्म-भूगोल का नियम भी कहते हैं कि धर्मारण्य में किया गया दान, यज्ञ या तप ‘कोटि-गुणित’ हो जाता है; वहाँ पुण्य और पाप—दोनों का फल बढ़कर प्रकट होता है। देवता धर्मारण्य पहुँचकर सहस्र वर्षों का महान् सत्र आरम्भ करते हैं। प्रमुख ऋषियों को यज्ञ के विशेष-विशेष पदों पर नियुक्त कर विशाल वेदी-परिसर बनाते हैं, मंत्र-विधि से आहुतियाँ देते हैं और वहाँ रहने वाले द्विजों तथा आश्रित जनों को अन्नदान व अतिथि-सत्कार से तृप्त करते हैं। फिर आगे के युग में लोहासुर ब्रह्मा-सदृश वेश धारण कर याजकों और समुदायों को सताता है। वह यज्ञ-सामग्री नष्ट करता, पवित्र स्थानों को अपवित्र करता और भय से लोग तितर-बितर हो जाते हैं। विस्थापित लोग नए गाँव बसाते हैं जिनके नाम भय, भ्रम और मार्ग-विच्छेद की स्मृति रखते हैं; धर्मारण्य भी दूषण के कारण रहने योग्य कठिन हो जाता है और उसका तीर्थ-वैभव क्षीण-सा पड़ जाता है, अंततः असुर संतुष्ट होकर चला जाता है।

धर्मारण्य-माहात्म्य-वर्णनम् | Description of the Glory of Dharmāraṇya (Dharmāraṇya Māhātmya)
व्यास धर्मारण्य नामक श्रेष्ठ तीर्थ-प्रदेश का माहात्म्य समाप्त करते हुए उसे परम मंगलमय और अनेक जन्मों के संचित पापों को हरने वाला बतलाते हैं। वे कहते हैं कि वहाँ स्नान करने से अपराधों से मुक्ति मिलती है; इसी से धर्मराज युधिष्ठिर महान पाप-निवारण और सज्जनों की रक्षा हेतु उस वन में प्रवेश करते हैं। इसके बाद क्षेत्र की साधना-व्यवस्था बताई गई है—विभिन्न तीर्थों में स्नान, देवालयों के दर्शन, और अपनी भावना के अनुसार इष्ट-पूर्त (यज्ञ, दान, सेवा आदि) कर्म। फलश्रुति में कहा गया है कि जो वहाँ पहुँचते हैं या केवल उसका नाम/महिमा सुनते हैं, वे भोग और मोक्ष दोनों पाते हैं तथा संसार-भोग के उपरान्त निर्वाण को प्राप्त होते हैं। विशेष रूप से द्विजों द्वारा श्राद्ध-काल में इस माहात्म्य का पाठ करने पर पितरों का दीर्घकालीन उद्धार बताया गया है। धर्मवापी तीर्थ की महिमा यह है कि केवल जल भी, बिना अन्य सामग्री के, विशाल पाप-राशि का नाश करता है और गया-श्राद्ध तथा बार-बार पिण्डदान के तुल्य फल देता है—जल और स्मरण पर आधारित सरल किन्तु अत्यन्त प्रभावी विधान।

सत्यलोकात्सरस्वती-आनयनं तथा द्वारावतीतीर्थे पिण्डदानफलम् | Bringing Sarasvatī from Satyaloka and the Merit of Piṇḍa-dāna at Dvāravatī Tīrtha
इस अध्याय में सूत जी सरस्वती के धर्मारण्य में पावन महत्त्व का “उत्तम तीर्थ-माहात्म्य” सुनाते हैं। शांत, विद्वान, नियमशील योगी मुनि मार्कण्डेय (कमण्डलु और जपमाला सहित) के पास अनेक ऋषि श्रद्धापूर्वक आते हैं। वे नैमिषारण्य आदि में सुनी हुई नदी-अवतरण की कथाएँ स्मरण कर सरस्वती के आगमन और उससे जुड़े कर्म-विधान का रहस्य पूछते हैं। मार्कण्डेय बताते हैं कि सरस्वती को सत्यलोक से सुरेन्द्राद्रि के निकट धर्मारण्य में लाया गया; वह शरण देने वाली और परम पवित्र है। फिर व्रत-काल का विधान कहा गया—भाद्रपद शुक्लपक्ष की शुभ द्वादशी को, द्वारावती-तीर्थ में (जहाँ मुनि और गन्धर्व सेवा करते हैं) पिण्डदान तथा श्राद्धादि पितृकर्म करना चाहिए। इसका फल पितरों के लिए अक्षय बताया गया है, और सरस्वती का जल परम मंगलकारी, महापातक-नाशक (ग्रन्थ-भाषा में ब्रह्महत्या आदि दोषों का भी हरने वाला) कहा गया है। अंत में सरस्वती को स्वर्ग-फल और अपवर्ग (मोक्षोपयोगी पुण्य) की साधिका, इच्छापूर्ति का कारण बताकर कर्म को उच्च आध्यात्मिक लक्ष्य से जोड़ा गया है।

द्वारवती-तीर्थमाहात्म्य (Dvāravatī Tīrtha Māhātmya: Merit of Viṣṇu’s Abiding Sacred Ford)
व्यास द्वारवती से जुड़े विष्णु-सम्बन्धी तीर्थ की महिमा बताते हैं और कर्मों की एक पवित्र व्यवस्था का वर्णन करते हैं। आरम्भ में कहा गया है कि मर्कण्डेय ने ‘स्वर्ग का द्वार खोल दिया’; और जो लोग विष्णु-प्राप्ति के संकल्प से देह त्यागते हैं, वे विष्णु के सायुज्य और सन्निधि को प्राप्त होते हैं। फिर आत्मसंयम के उपाय, विशेषकर उपवास/अनाशन, को अत्यन्त प्रभावशाली तप कहा गया है। तीर्थ-स्नान, केशव-पूजन तथा पिण्ड और जल-तर्पण सहित श्राद्ध को ऐसे कर्म बताया गया है जो दीर्घ, मानो ब्रह्माण्ड-परिमित काल तक पितरों को तृप्त करते हैं। हरि की वहाँ उपस्थिति से पाप-नाश होता है; और यह तीर्थ मोक्षार्थियों को मुक्ति, धनार्थियों को समृद्धि, तथा सामान्य भक्तों को दीर्घायु और सुख प्रदान करता है। श्रद्धा से वहाँ दिया गया दान अक्षय कहा गया है। बड़े-बड़े यज्ञ, दान और तप का जो फल है, वह केवल उस स्थान पर स्नान मात्र से भी मिल जाता है—यहाँ तक कि सामाजिक रूप से विनम्र स्थिति वाले, परन्तु श्रद्धालु साधकों के लिए भी—इस प्रकार तीर्थ की सुलभता और भगवत्प्रतिष्ठित प्रभाव को प्रतिपादित किया गया है।

Govatsa-tīrtha Māhātmya and the Self-Manifolding Liṅga (गोवत्सतीर्थमाहात्म्यं)
सूत जी गोवत्स नामक प्रसिद्ध तीर्थ का माहात्म्य कहते हैं, जो मार्कण्डेय से सम्बद्ध स्थान के निकट माना गया है। वहाँ अम्बिकापति शिव गोवत्स (बछड़े) के रूप में निवास करते हैं और स्वयम्भू लिङ्ग के रूप में प्रकट होते हैं। रुद्रभक्त और शिकारी स्वभाव वाला राजा बलाहक उस अद्भुत बछड़े का वन में पीछा करता है; उसे पकड़ने का प्रयास करते ही तेजस्वी लिङ्ग प्रकट हो जाता है। राजा विस्मित होकर उस दिव्य घटना का चिन्तन करता हुआ देह त्याग देता है, और देवदुन्दुभि, पुष्पवर्षा के साथ तत्काल शिवलोक को प्राप्त होता है। देवगण लोककल्याण हेतु शिव से प्रार्थना करते हैं कि वे वहीं उज्ज्वल लिङ्गरूप में स्थिर रहें। शिव उनकी याचना स्वीकार कर भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष में कुहू तिथि पर विशेष पूजन-व्रत का विधान बताते हैं और उपासकों को अभय तथा पुण्य-लाभ का वर देते हैं। अध्याय में पिण्डदान और तर्पण की महिमा भी कही गई है—विशेषकर गोवत्स के पास गङ्गा-कूपक में किए गए कर्म कठिन अवस्था में पड़े पितरों तक को तृप्त करते हैं। “चाण्डाल-स्थल” नाम की उत्पत्ति एक नैतिक प्रसंग से समझाई जाती है कि आचरण से ही चाण्डालत्व आता है; लिङ्ग की असामान्य वृद्धि का शमन-विधान कर क्षेत्र की प्रतिष्ठा स्थिर की जाती है। अंत में फलश्रुति में कहा है कि लिङ्ग-दर्शन और तीर्थ-सेवा घोर पापों का भी शोधन करती है, और यह अध्याय स्थान-माहात्म्य, कर्म-विधि तथा नैतिक रूपान्तरण का उपदेश देता है।

लोहोयष्टिका-तीर्थमाहात्म्य (Lohayaṣṭikā Tīrtha-Māhātmya: Ritual Efficacy of Ancestral Offerings)
इस अध्याय में व्यास–मार्कण्डेय संवाद के माध्यम से नैऋत्य दिशा में स्थित लोहोयष्टिका तीर्थ का माहात्म्य कहा गया है। वहाँ रुद्र का स्वयम्भू-लिङ्ग रूप में सान्निध्य और सरस्वती-जल से जुड़े श्राद्ध-तर्पण का विधान बताया गया है। विशेषतः अमावस्या तथा नभस्य/भाद्रपद के कृष्णपक्ष में पिण्डदान, श्राद्ध और तर्पण करने का समय-नियम स्पष्ट किया गया है। ग्रन्थ कहता है कि इस तीर्थ पर बार-बार पिण्ड अर्पण करने का फल गयाक्षेत्र के समान है; अनुशासित विधि से अपने ही क्षेत्र में पितरों की तृप्ति हो सकती है। मोक्ष की इच्छा रखने वालों के लिए रुद्र-तीर्थ में गोदान और विष्णु-तीर्थ में सुवर्णदान जैसे सहायक दानों का भी निर्देश है। ‘हरि के हाथ’ (जनार्दन) में पिण्ड समर्पित करने की भक्तिमय वाणी दी गई है, जिससे पितृकर्म वैष्णव-भाव और ऋणत्रय से मुक्ति के विषय से जुड़ता है। फलश्रुति में प्रेत-योनि से उद्धार, अक्षय पुण्य, तथा वंशजों को आरोग्य और रक्षा का लाभ बताया गया है; साथ ही यह भी कि धर्मपूर्वक कमाया हुआ थोड़ा-सा दान भी यहाँ अनेक गुना फल देता है।

लोहासुरविचेष्टितम् (The Deeds of Lohāsura) — Dharmāraṇya Pitṛ-Tīrtha Māhātmya
सूत जी लोहासुर नामक दैत्य का चरित्र सुनाते हैं। वृद्धों की उच्च सिद्धि देखकर उसके भीतर वैराग्य जागता है और वह श्रेष्ठ तप-स्थल की खोज में अंतर्भक्ति का अद्भुत रूप अपनाता है—मस्तक पर गंगा, नेत्रों में कमल, हृदय में नारायण, कटि में ब्रह्मा और देह में देवताओं का प्रतिबिंब, जैसे जल में सूर्य। वह दिव्य सौ वर्षों तक कठोर तप करता है और शिव से वर पाता है कि उसका शरीर क्षय न हो और मृत्यु का भय न रहे; फिर सरस्वती तट पर पुनः तप में प्रवृत्त होता है। इंद्र उसके तप से भयभीत होकर विघ्न डालते हैं; युद्ध छिड़ता है और वर-प्रभाव से केशव तक पराजित-से वर्णित होते हैं। तब ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र सत्य-बल और ‘वाक्पाश’ (वाणी का बंधन) से दैत्य को रोककर आदेश देते हैं कि वह सत्यवचन-धर्म की रक्षा करे और देवताओं को न सताए। इसके बदले देवता प्रलय तक उसके शरीर में निवास का वचन देते हैं और धर्मारण्य में धर्मेश्वर के निकट उसका देह-सम्बन्धी तीर्थ प्रकट होता है। अध्याय में पितृकर्म का माहात्म्य भी कहा गया है—स्थानीय कूप पर तथा निर्दिष्ट तिथियों में, विशेषतः भाद्रपद की चतुर्दशी और अमावस्या को, तर्पण-पिंडदान करने से पितरों की तृप्ति अनेक गुना होती है; इसे गया़/प्रयाग के समान या उससे भी अधिक फलदायक बताया गया है। पितृ-गाथा और ज्ञात-अज्ञात कुलों के लिए अर्पण का उपयोगी मंत्र भी दिया गया है। अंत में फलश्रुति है कि इस कथा का श्रवण महापापों का नाश करता है और बार-बार गयाश्राद्ध तथा अनेक गोदान के तुल्य पुण्य देता है।

रामचरित-संक्षेपः (Condensed Rāma Narrative and the Ideal of Rāma-rājya)
इस अध्याय में सूर्यवंश में जन्मे विष्णु-अंशावतार श्रीराम का संक्षिप्त, क्रमबद्ध और धर्मप्रधान चरित वर्णित है। आरम्भ में विश्वामित्र के साथ गमन, यज्ञ-रक्षा, ताड़का-वध, धनुर्वेद-प्राप्ति तथा अहल्या-उद्धार द्वारा राम की धर्मनिष्ठा और शास्त्र-पालन का स्वरूप दिखाया गया है। फिर जनकसभा में शिवधनुष-भंग और सीता-विवाह से उनके राजकीय व वैवाहिक अधिकार की प्रतिष्ठा होती है। कैकेयी के वरदान से चौदह वर्ष का वनवास, दशरथ का देहान्त, भरत की वापसी और पादुका-राज्य (प्रतिनिधि शासन) के माध्यम से त्याग, आज्ञापालन और राज्यधर्म की मर्यादा प्रतिपादित होती है। शूर्पणखा-प्रसंग, सीता-हरण, जटायु का पतन, हनुमान-सुग्रीव से मैत्री, खोज-कार्य और संदेश-प्रेषण संकट-निवारण की कथा को आगे बढ़ाते हैं। सेतु-निर्माण, लंका-घेराबंदी, तिथि-चिह्नित युद्ध-क्रम, इन्द्रजीत व कुम्भकर्ण के प्रसंग और रावण-वध के साथ विजय पूर्ण होती है। विभीषण का अभिषेक, सीता की शुद्धि-भावना, अयोध्या-प्रत्यावर्तन और ‘रामराज्य’ का आदर्श—प्रजा-कल्याण, अपराध-रहित समाज, समृद्धि तथा वृद्धों और द्विजों का सम्मान—विस्तार से कहा गया है। अंत में राम का तीर्थ-माहात्म्य के विषय में प्रश्न, कथा-स्मृति को तीर्थयात्रा की व्याख्या से जोड़ देता है।

Dharmāraṇya as Supreme Tīrtha: River-Māhātmya, Phalāśruti, and Rāma’s Pilgrimage Movement (धर्मारण्य-माहात्म्य-प्रकरणम्)
इस अध्याय में श्रीराम वसिष्ठ से पूछते हैं कि पाप-शुद्धि के लिए सर्वोच्च तीर्थ कौन-सा है। सीता-हरण के प्रसंग में ब्रह्म-राक्षसों के वध से उत्पन्न पाप के प्रायश्चित्त की धर्मचिन्ता उन्हें प्रेरित करती है। वसिष्ठ गंगा, नर्मदा/रेवा, ताप्ती, यमुना, सरस्वती, गण्डकी, गोमती आदि पवित्र नदियों का क्रम से वर्णन करते हैं और दर्शन, स्मरण, स्नान तथा विशेष काल-विधियों के अलग-अलग फल बताते हैं—जैसे कार्तिक में सरस्वती-स्नान और माघ में प्रयाग-स्नान। फिर तीर्थ-फलश्रुति के रूप में पापक्षय, नरक-निवारण, पितरों का उद्धार और विष्णुलोक-प्राप्ति का आश्वासन दिया जाता है। अंत में धर्मारण्य को सर्वश्रेष्ठ तीर्थ घोषित किया जाता है—प्राचीन प्रतिष्ठित, देवताओं द्वारा प्रशंसित, महापातक-नाशक और कामी, यति, सिद्ध आदि सभी साधकों के लिए अभीष्ट-प्रद। ब्रह्मा के कथनानुसार राम प्रसन्न होकर सीता, भाइयों, हनुमान, रानियों और विशाल अनुचर-वर्ग के साथ प्रस्थान करते हैं तथा प्राचीन तीर्थ में पैदल जाने की मर्यादा का पालन करते हैं। रात्रि में एक स्त्री का विलाप सुनकर वे दूतों को भेजते हैं कि उसका दुःख-कारण पूछें—यहीं से आगे की कथा का सूत्रपात होता है।

Dharmāraṇya-adhidevatā’s Lament and Śrī Rāma’s Restoration of the Vedic Settlement (Satya-Mandira)
अध्याय में व्यास-प्रसंग के अंतर्गत कथा आरम्भ होती है। श्रीराम के दूत एक एकाकी, अलंकृत किन्तु अत्यन्त व्याकुल दिव्य स्त्री को देखते हैं और उसका समाचार राम को देते हैं। राम विनयपूर्वक उसके पास जाकर उसका परिचय, परित्याग का कारण पूछते हैं और उसे संरक्षण देने का वचन देते हैं। वह स्तुति करके राम को परम, नित्य, दुःखनाशक, जगत्-आधार और राक्षस-विनाशक बताती है तथा स्वयं को धर्मारण्य-क्षेत्र की अधिदेवता घोषित करती है। वह कहती है कि बारह वर्षों से एक प्रबल असुर के भय से यह क्षेत्र उजड़ गया है; ब्राह्मण और वैश्य पलायन कर गए, यज्ञ-वेदी और गृह-अग्निहोत्र लुप्त हो गए। जहाँ पहले दीर्घिका-स्नान, खेल, पुष्प, समृद्धि और मंगल-चिह्न थे, वहाँ अब काँटे, वन्य पशु और अशुभ लक्षण दिखाई देते हैं। राम दिशाओं में बिखरे ब्राह्मणों को खोजकर पुनः बसाने का संकल्प करते हैं। देवी अनेक गोत्रों के वेदवेत्ता ब्राह्मणों और धर्मनिष्ठ वैश्य-समुदाय का उल्लेख करती है तथा अपना नाम भट्टारिका—स्थानीय रक्षिका—बताती है। राम उसकी सत्यता स्वीकार कर ‘सत्य-मंदिर’ नाम से नगर की स्थापना की घोषणा करते हैं और सेवकों को अर्घ्य-पाद्य सहित सम्मानपूर्वक ब्राह्मणों को लाने भेजते हैं; जो उन्हें न अपनाए, उसके लिए दण्ड और निर्वासन का आदेश देते हैं। ब्राह्मण खोजे जाकर आदर से बुलाए जाते हैं; राम कहते हैं कि उनकी कीर्ति विप्र-प्रसाद पर ही आधारित है। फिर वे पाद्य, अर्घ्य, आसन से स्वागत, साष्टांग प्रणाम और आभूषण, वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा असंख्य गौ-दान द्वारा धर्मारण्य की वैदिक व्यवस्था को पुनः प्रतिष्ठित करते हैं।

जीर्णोद्धार-दानधर्मः | Jīrṇoddhāra and the Ethics of Dāna (Qualified Giving)
इस अध्याय में धर्मारण्य में जीर्णोद्धार और दान-धर्म का धर्मशास्त्रीय विवेचन आता है। श्रीमाता की आज्ञा से राम जीर्णोद्धार करने का संकल्प लेते हैं और दान को विधिपूर्वक बाँटने की अनुमति माँगते हैं। कहा गया है कि दान पात्र को ही देना चाहिए, अपात्र को नहीं—पात्र नाव के समान दाता और ग्राही दोनों को पार लगाता है, जबकि अपात्र लोहे के पिंड की तरह विनाशकारी होता है। ब्राह्मणत्व केवल जन्म से नहीं, बल्कि क्रिया-समर्थता और यज्ञादि कर्म की सिद्धि से फल निश्चित होता है। कुछ ब्राह्मण संयमित आजीविका का वर्णन करते हुए राजदान स्वीकारने से डरते हैं और राजाश्रय को संकटकारी बताते हैं। राम वसिष्ठ से परामर्श करते हैं और त्रिमूर्ति का आवाहन करते हैं; त्रिमूर्ति प्रकट होकर जीर्णोद्धार की स्वीकृति देते हैं तथा धर्म-रक्षा में राम के पूर्व कार्य की प्रशंसा करते हैं। फिर निर्माण और दान आरम्भ होता है—सभागृह, आवास, भंडारगृह; धन, गौ, और ग्राम विद्वान पुरोहितों को दिए जाते हैं तथा ‘त्रयीविद्या’ के विशेषज्ञों की स्थापना की जाती है। देवता चामर, खड्ग आदि चिह्न प्रदान करते हैं और आचार-नियम बताते हैं—गुरु व कुलदेवता की पूजा, एकादशी व शनिवार को दान, निर्बल-वंचितों का पालन, और निर्विघ्न सिद्धि हेतु श्रीमाता तथा सम्बद्ध देवताओं को प्रथम अर्पण। अंत में तीर्थ-व्यवस्था का विस्तार (तालाब, कुएँ, खाइयाँ, द्वार), राजाज्ञा मिटाने पर निषेध, हनुमान को रक्षक नियुक्ति, और दिव्य आशीर्वाद का वर्णन है।

Rāma-śāsana on Dharmāraṇya: Protection of Land Grants and the Dharma of Endowments (रामशासन-भूमिदानधर्मः)
इस अध्याय में संवाद-रूप से कथा आती है। युधिष्ठिर व्यास से पूछते हैं कि त्रेता-युग में सत्य-मंदिर में श्रीराम द्वारा रचित प्राचीन ‘शासन’ (राजकीय ताम्रपत्र/अभिलेख) क्या है। व्यास धर्मारण्य की पृष्ठभूमि बताते हैं—वहाँ नारायण स्वामी हैं, एक योगिनी उद्धारक शक्ति है, और धर्म-लेखों के स्थायित्व हेतु ताम्रपत्र को अति-दीर्घजीवी माध्यम कहा गया है। आगे विष्णु को वेद, पुराण और धर्मशास्त्रों में सर्वत्र एक ही परम तत्त्व के रूप में स्थापित किया जाता है, और राम को धर्म-रक्षा तथा विरोधी शक्तियों के विनाश हेतु अवतार बताया जाता है। शासन की शैली अभिलेखीय-धर्म परंपरा जैसी है—भूमिदाता की प्रशंसा, भूमि हड़पने वालों/अनुमोदन करने वालों पर कठोर दंड, और संरक्षण करने वालों के लिए महान पुण्य। भूमि-चोरी के नरक-फल, नीच योनियों में जन्म, थोड़ी-सी भूमि-दान का भी विशाल फल, तथा ब्राह्मण को दी गई भूमि की अहस्तांतरणीयता स्पष्ट की गई है। यह भी कहा गया है कि विद्वान ब्राह्मण ताम्रपत्र की रक्षा करें, उसका विधिपूर्वक पूजन करें और नित्य आराधना करें; साथ ही राम-नाम का सतत जप रक्षक भक्ति-धर्म है। अंत में राम आज्ञा देते हैं कि यह शासन कल्प-कल्प तक सुरक्षित रहे, और उल्लंघन करने वालों पर दंड हेतु हनुमान को रक्षक-प्रवर्तक के रूप में स्मरण करते हैं; फिर राम अयोध्या लौटकर दीर्घकाल तक राज्य करते हैं।

धर्मारण्ये रामयज्ञः, सीतापुरस्थापनं च (Rāma’s Sacrifice in Dharmāraṇya and the Founding of Sītāpura)
इस अध्याय में नारद के प्रश्न से प्रेरित होकर ब्रह्मा धर्मारण्य में श्रीराम के यज्ञ और शासन-व्यवस्था का वर्णन करते हैं। प्रयाग-त्रिवेणी, शुक्लतीर्थ, काशी, गंगा, हरिक्षेत्र और धर्मारण्य आदि के तीर्थ-माहात्म्य को सुनकर राम पुनः तीर्थयात्रा का संकल्प लेते हैं और सीता, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न सहित वसिष्ठ के पास विधि-निर्देश हेतु जाते हैं। राम पूछते हैं कि महाक्षेत्र में ब्रह्महत्या आदि महापापों के नाश के लिए दान, नियम, स्नान, तप, ध्यान, यज्ञ, होम या जप—इनमें कौन श्रेष्ठ है; वसिष्ठ धर्मारण्य में यज्ञ का विधान करते हैं, जिसका फल कालानुसार अनेकगुणित बताया गया है। सीता कहती हैं कि वही वेद-निपुण ब्राह्मण ऋत्विज हों जो पूर्वयुगों से जुड़े और धर्मारण्य-निवासी हों। तब अठारह नामित याज्ञिक बुलाए जाते हैं; यज्ञ पूर्ण होकर अवभृथ-स्नान होता है और पुरोहितों का सम्मान-पूजन किया जाता है। अंत में सीता यज्ञ-समृद्धि को स्थिर करने हेतु अपने नाम से एक बसावट की प्रार्थना करती हैं; राम ब्राह्मणों को सुरक्षित स्थान देकर ‘सीतापुर’ की स्थापना करते हैं और उसे शान्ता तथा सुमंगला जैसी रक्षक-कल्याणकारी देवियों से संबद्ध बताते हैं। इसके बाद अध्याय एक प्रशासनिक-धार्मिक चार्टर का रूप लेता है—अनेक ग्रामों की सृष्टि कर उन्हें ब्राह्मण-निवास हेतु दान दिया जाता है; सहायक जनसमुदाय (वैश्य-शूद्र) तथा गौ, अश्व, वस्त्र, स्वर्ण, रजत, ताम्र आदि दान नियत किए जाते हैं। राम आदेश देते हैं कि ब्राह्मणों की याचना का आदर हो और उनकी सेवा से राज्य में समृद्धि आती है; बाहरी दुष्टों द्वारा विघ्न डालना निंदनीय है। अंत में राम अयोध्या लौटते हैं, प्रजा आनंदित होती है, धर्मराज्य चलता रहता है और सीता के गर्भवती होने का संकेत वंश-परंपरा की निरंतरता को पुष्ट करता है।

Adhyāya 36: Hanumān’s Guardianship, Kali-yuga Portents, and the Contest over Śāsana (Rāma’s Ordinance)
इस अध्याय में संवाद-परंपरा के माध्यम से कथा आगे बढ़ती है। नारद ब्रह्मा से पूछते हैं कि आगे क्या हुआ, वह पवित्र स्थान कितने समय तक स्थिर रहा, उसकी रक्षा किसने की और किसकी आज्ञा से वहाँ शासन चलता रहा। ब्रह्मा बताते हैं कि त्रेता से द्वापर और कलि के आगमन तक केवल वायुपुत्र हनुमान ही उस क्षेत्र की रक्षा करने में समर्थ रहे, और वे स्पष्ट रूप से श्रीराम की आज्ञा से वहाँ प्रहरी बने रहे; लोगों का जीवन सामूहिक आनंद, निरंतर वेदपाठ (ऋग्, यजुः, साम, अथर्व) तथा उत्सवों और विविध यज्ञों से समृद्ध था। फिर युधिष्ठिर व्यास से पूछते हैं कि क्या वह स्थान कभी शत्रुओं द्वारा तोड़ा या जीता गया। व्यास कलियुग के आरंभ के लक्षण बताते हैं—असत्य का बढ़ना, ऋषियों से वैर, माता-पिता के प्रति श्रद्धा का क्षय, कर्मकाण्ड में शिथिलता, भ्रष्टाचार और वर्ण-धर्म का उलट जाना—जिससे धर्म-ह्रास का चित्र बनता है। इसके बाद कन्नौज के धर्मनिष्ठ राजा आम का प्रसंग आता है और धर्मारण्य में इन्द्रसूरि के प्रभाव से जैन-प्रधान शासन तथा वैवाहिक गठबंधनों द्वारा उसका विस्तार दिखाया जाता है, जिससे वैदिक संस्थाएँ और ब्राह्मण-अधिकार दबने लगते हैं। ब्राह्मणों का एक दल राजा के पास निवेदन करता है और दामाद-शासक कुमारपाल से अहिंसा बनाम वैदिक यज्ञ-हिंसा पर वाद-विवाद होता है। ब्राह्मण कहते हैं कि वेद-विहित हिंसा यदि शस्त्र के बिना, मंत्र और विधि से, क्रूरता के लिए नहीं बल्कि यज्ञ-व्यवस्था हेतु हो, तो वह अधर्म नहीं। कुमारपाल श्रीराम/हनुमान की वर्तमान रक्षा का प्रत्यक्ष प्रमाण मांगता है; तब समाज रामेश्वर/सेतुबन्ध की नियमबद्ध यात्रा और तप का संकल्प करता है ताकि हनुमान के दर्शन से राम-शासन की पुनः प्रतिष्ठा हो। आगे हनुमान की करुणा, राम की आज्ञा की पुष्टि और जन-जीवन के लिए दान-व्यवस्थाओं का संकेत मिलता है।

Hanumān’s Epiphany, Authentication Tokens, and the Protection of Brāhmaṇas in Dharmāraṇya (अञ्जनीसूनोः स्वरूपदर्शनम् अभिज्ञानपुटिकाप्रदानं च)
इस अध्याय में धर्मारण्य के ब्राह्मण पवनपुत्र हनुमान् की दीर्घ स्तुति करते हैं—उनकी राम-भक्ति, रक्षक-शक्ति और गो–ब्राह्मण-हित के प्रति निष्ठा का गुणगान करते हुए। प्रसन्न होकर हनुमान् वर देते हैं; ब्राह्मण दो बातें माँगते हैं—(1) लंका-दहन आदि पराक्रम का प्रत्यक्ष दर्शन, और (2) प्रजा की आजीविका व धर्म-व्यवस्था को हानि पहुँचाने वाले पापी राजा पर सुधारात्मक दण्ड। हनुमान् बताते हैं कि कलियुग में उनका वास्तविक स्वरूप सामान्यतः दृष्टिगोचर नहीं होता, फिर भी भक्तिभाव से वे एक मध्यस्थ रूप प्रकट करते हैं, जिसे पुराण-वर्णन के अनुरूप मानकर सब विस्मित होते हैं। वे ऐसे फल भी देते हैं जिनसे असाधारण तृप्ति होती है और धर्मारण्य क्षुधा-शमन के दिव्य क्षेत्र के रूप में प्रतिष्ठित होता है। फिर हनुमान् ‘अभिज्ञान’ की व्यवस्था करते हैं—अपने शरीर के रोम/केश लेकर दो पूटिकाएँ बनाते हैं। एक पूटिका राम-भक्त राजा को देने पर वरदायक है; दूसरी दुष्ट शासक के लिए दण्ड-प्रमाण बनती है, जो धर्म-प्रतिष्ठा होने तक सेना और कोषागार आदि को दग्ध कर सकती है, तथा ग्राम-देय, व्यापारी-कर और पूर्व-व्यवस्थाओं की पुनर्स्थापना का आदेश कराती है। तीन रात्रियों तक ब्रह्मयज्ञ और वेद-पाठ के बाद हनुमान् विशाल शिला-मंच पर ब्राह्मणों की निद्रा की रक्षा करते हैं और पितृ-सम वायु-वेग से छह मास की यात्रा को कुछ मुहूर्तों में समेटकर उन्हें धर्मारण्य पहुँचा देते हैं। प्रातःकाल यह घटना लोक-विस्मय बनती है और अध्याय का संदेश दृढ़ होता है—भक्ति से धर्म की रक्षा, प्रमाण-चिह्नों द्वारा सत्यापन, और विद्वत् समुदाय का संरक्षण।

Rājā Kumarapālakaḥ—Vipra-saṃvādaḥ, Agni-upadravaḥ, Rāma-nāma-prāyaścittaṃ ca (King Kumarapālaka’s dialogue with Brahmins, the fire-crisis, and expiation through Rāma’s Name)
व्यास जी एक प्रसंग सुनाते हैं—सज्जित ब्राह्मण-प्रधान फल लेकर राज-द्वार पर आए और राजा के पुत्र कुमारपालक ने उनका स्वागत किया। राजा ने जिन/अर्हत के प्रति आदर, प्राणियों पर दया, योग-शाला में जाना, गुरु-पूजन, निरंतर मंत्र-जप और पञ्चूषण (तप-ऋतु) के पालन जैसी मिश्रित नीति बताई, जिससे ब्राह्मण असंतुष्ट हुए। उन्होंने राम और हनुमान के उपदेश का स्मरण कराते हुए कहा कि राजा को विप्र-वृत्ति (ब्राह्मणों का निर्वाह) देनी चाहिए और धर्म की रक्षा करनी चाहिए; पर राजा ने अल्प-दान भी अस्वीकार कर दिया। तब दंड-रूप से हनुमान से संबंधित एक थैली महल में फेंकी गई और राज-भंडार, वाहन तथा राज-चिह्नों में भयंकर आग फैल गई; मानवीय उपाय विफल रहे। भयभीत राजा ब्राह्मणों के पास गया, दंडवत् प्रणाम कर अज्ञान स्वीकार किया और बार-बार ‘राम’ नाम का जप करने लगा। उसने कहा कि राम-भक्ति और ब्राह्मण-पूजा ही रक्षक हैं, और अग्नि-शांति की प्रार्थना की; साथ ही प्रतिज्ञा की कि ब्राह्मण-सेवा और राम-भक्ति के बिना उसका अपराध महापातक के समान है। ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर शाप शांत किया; आग बुझ गई और राज्य में व्यवस्था लौट आई। फिर नई प्रशासनिक व्यवस्था बनी—विद्वत्-समूहों का पुनर्गठन, समुदायों की सीमाएँ, तथा वार्षिक कर्मकांड और दान का विधान किया गया, विशेषतः पौष शुक्ल त्रयोदशी के व्रत-दान आदि का निर्देश। अध्याय का निष्कर्ष यह है कि धर्म-आधारित शासन स्थिर हुआ और शासन-नीति का आधार राम-नाम की भक्ति को पुनः दृढ़ किया गया।

Cāturvidya–Traividya Organization, Gotra–Pravara Mapping, and Dharmāraṇya Settlement Register (अध्याय ३९)
इस अध्याय में ब्रह्मा नारद को उपदेश-रूप संवाद में बतलाते हैं कि कैसे अनुशासित वेदाध्ययन वाले श्रेष्ठ द्विज समुदाय संहिता, पद, क्रम और घन-पाठ की शुद्ध परंपरा से वेद-ध्वनि को सुरक्षित रखते हैं। ब्रह्मा और विष्णु सहित देवगण वहाँ पहुँचकर उनके यज्ञ-ध्वनि-परिसर, आचार-व्यवस्था और नैतिक अनुशासन को देखते हैं और उसे त्रेता-युग जैसी धर्मस्थिति का चिह्न मानते हैं। कली के विघ्नों की आशंका से देवता एक नियत आर्थिक-धार्मिक व्यवस्था स्थापित करते हैं—चातुर्विद्य और त्रैविद्य के बीच जीविका-भाग, पेशागत सीमाएँ, परस्पर विवाह-निषेध, तथा कुल-विभाजन का औपचारिक नियम, जिसका नियामक नाम पाठ में ‘काजेश’ कहा गया है। इसके बाद अध्याय एक विस्तृत अभिलेख बन जाता है: समुदाय से जुड़े 55 ग्रामों के नाम, फिर प्रत्येक ग्राम के लिए गोत्र-प्रवर की सूची और ग्राम-विशिष्ट ‘गोत्र-देवी’ (वंश-रक्षिका देवी) का निर्देश। नारद के प्रश्नों से गोत्र, कुल और देवी की पहचान की विधि स्पष्ट होती है, और ब्रह्मा क्रमशः स्थानों को वंश-प्रवर आदि से जोड़ते हैं। अंत में बाद के युगों में संकर और पतन को युग-परिवर्तनजन्य मानकर स्वीकार किया गया है, पर यह रजिस्टर धर्मारण्य के संदर्भ-ग्रंथ की तरह सुरक्षित रखा गया है।

Dharmāraṇya: Community Dharma, Adjudication Norms, and Phalaśruti
इस अध्याय में नारद ब्रह्मा से पूछते हैं कि मोहरकपुर में जब कुटुम्ब-भेद और पक्ष-विभाजन हो जाए, तब त्रैविद्य (वेद-विद्या में निपुण) विद्वान कैसे उत्तर देते हैं। ब्रह्मा बताते हैं कि शिष्ट ब्राह्मण-समुदाय अग्निहोत्र, यज्ञ, स्मार्त आचार और शास्त्रीय तर्क के साथ अनुशासन बनाए रखते हैं; और वाडव-प्रमुख धर्मशास्त्र, स्थान-आचार तथा कुल-आचार पर आधारित परम्परागत धर्म को स्पष्ट करते हैं। फिर एक प्रकार का सामुदायिक “धर्म-चार्टर” आता है—राम-सम्बन्धी चिह्नों और मुद्रिका/मुद्रा का आदर, सदाचार-भंग पर नियत दण्ड, पात्रता-नियम, सामाजिक दण्ड तथा अपराधियों का समुदाय द्वारा परिहार। जन्म-संस्कारों के दान (षष्ठी-दिन आदि), जीविका के हिस्सों (वृत्ति-भाग) का वितरण, कुलदेवताओं के लिए नियत अंश, और न्याय-निर्णय की प्रक्रिया में निष्पक्षता का आदर्श भी बताया गया है—पक्षपात, रिश्वत और अन्यायपूर्ण निर्णय की कठोर निन्दा की गई है। व्यास कलियुग में वेद-आचरण के क्षय और दलगत प्रवृत्ति का वर्णन करते हुए भी गोत्र, प्रवर और अवतङ्क जैसे पहचान-चिह्नों की मर्यादा को पुनः स्थापित करते हैं। अंत में हनुमान को अदृश्य रूप से न्याय-रक्षक बताया गया है—पक्षपात और उचित सेवा की उपेक्षा से हानि होती है, जबकि धर्माचरण की रक्षा होती है। फलश्रुति में धर्मारण्य-कथा के श्रवण-सम्मान को पवित्रता और समृद्धि देने वाला कहा गया है तथा पुराण-पाठ और दान के सत्कारपूर्ण नियम बताए गए हैं।
Dharmāraṇya is portrayed as a concentrated tīrtha-zone where divine beings continually 'serve' the place, making it inherently merit-generating and spiritually protective for residents and pilgrims.
The text highlights enduring salvific outcomes for beings who die there, and emphasizes śrāddha/pinda-style offerings as mechanisms for uplifting multiple ancestral generations and extended lineages.
The section foregrounds aetiological questioning about how Dharmāraṇya became established among the gods, why it is tīrtha-like on earth, and how large communities of brāhmaṇas were instituted there.