Adhyaya 21
Brahma KhandaDharmaranya MahatmyaAdhyaya 21

Adhyaya 21

अध्याय 21 में गोत्र–प्रवर के नियमों और विवाह-योग्यता से सम्बन्धित धर्मशास्त्रीय सामग्री का संकलन है। व्यास के वचन से आरम्भ होकर प्रसंग-स्थल से जुड़ी देवताओं/शक्तियों (अनेक नामों वाली देवियों सहित) की सूची दी जाती है, फिर गोत्र–प्रवर के तकनीकी भेद, समान/भिन्न प्रवर के उदाहरणों सहित, विस्तार से बताए जाते हैं। इसके बाद समान गोत्र या समान प्रवर में, तथा कुछ मातृ-पक्षीय सम्बन्धों में विवाह का स्पष्ट निषेध किया गया है। निषिद्ध विवाह के सामाजिक–वैदिक परिणाम—ब्राह्मण्य-स्थिति का ह्रास और सन्तान का हीन-लक्षण—बताकर, ऐसे विवाह करने वालों के लिए विशेषतः चान्द्रायण व्रत आदि प्रायश्चित्त का विधान किया गया है। कात्यायन, याज्ञवल्क्य, गौतम आदि आचार्यों के मतों के आधार पर पितृ-मातृ वंश में कितनी दूरी तक सम्बन्ध मान्य है, बड़े-छोटे भाई के विवाह-क्रम, तथा “पुनर्भू” आदि गृहस्थ-धर्म की श्रेणियाँ भी समझाई गई हैं। अध्याय का उद्देश्य नियमों का संरक्षण और उल्लंघन होने पर शुद्धि-मार्ग बताना है।

Shlokas

Verse 1

व्यास उवाच । तया चोत्पादिता राजञ्छरीरा त्कुलदेवताः

व्यास बोले—हे राजन्! उसके शरीर से कुलदेवताएँ, अर्थात् रक्षक देवियाँ भी उत्पन्न की गईं।

Verse 2

गात्रा ९ शांता १० शेषदेवी ११ वाराही १२ भद्रयोगिनी १३

वे इस प्रकार कही गईं—गात्रा (९), शांता (१०), शेषदेवी (११), वाराही (१२) और भद्रयोगिनी (१३)।

Verse 3

तारणी १८ वन कानंदा १९ चामुंडा २० च सुरेश्वरी २१

तथा—तारणी (१८), वनकानंदा (१९), चामुंडा (२०) और सुरेश्वरी (२१) भी (उन्हीं में) कही गईं।

Verse 4

दारभट्टारिकेत्या २२ द्या प्रत्येका शतधा पुनः । उत्पन्नाः शक्तयस्तस्मिन्नानारूपान्विताः शुभाः । अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रवरण्यथ देवताः

तथा एक का नाम दारभट्टारिका (२२) कहा गया। फिर वे सब प्रत्येक पुनः सौ-सौ रूपों में प्रकट हुईं; वहाँ अनेक रूपों से युक्त शुभ शक्तियाँ उत्पन्न हुईं। अब आगे मैं उन देवियों में जो श्रेष्ठ हैं, उनका क्रम से वर्णन करूँगा।

Verse 5

आंगिरसबार्हस्पत्यभारद्वाज २२ मांडव्यसगोत्रस्य वत्ससवात्स्यसवात्स्यायनस ४ सामान्यलौगाक्षसगोत्रस्य गोत्रजा भद्रयोगिनी प्रवर ३ काश्यपवसिष्ठ अवत्सार २० कौशिकसगोत्रस्य गोत्रजा पक्षिणी प्रवर ३ विश्वामित्र अथर्व भारद्वाज २१ सामान्यप्रवर १ पैमग्यसभरद्वाज २ समानप्रवरा २ लौगाक्षसगार्ग्यायनसकाश्यपकश्यप ४ समानप्रवर ३ कौशिककुशिकसाः २ समानप्रवरः ४ औपमन्युलोगाक्षस २ समानप्रवराः

यहाँ विभिन्न गोत्रों से संबद्ध प्रवर-समूहों (ऋषि-परम्पराओं) की सूची दी गई है—जैसे आङ्गिरस–बार्हस्पत्य–भारद्वाज आदि—उनकी संख्या और उपशाखाओं सहित। यह गणना धर्मानुसार विवाह में गोत्र और प्रवर की समानता या भिन्नता का निर्णय करने हेतु संदर्भ मानी जाती है।

Verse 6

त्यजेत्समानप्रवरां सगोत्रां मातुः सपिंडामचिकित्स्यरोगाम् । अजातलोम्नीं च तथान्यपूर्वां सुतेन हीनस्य सुतां सुकृष्णाम्

समान प्रवर और समान गोत्र वाली कन्या को, तथा माता की ओर से सपिंड संबंधिनी को, और असाध्य रोग से पीड़िता को त्याग देना चाहिए। जिसके शरीर में अभी परिपक्वता के लक्षण (रोम) न आए हों, जो पूर्व-विवाहिता हो, तथा पुत्रहीन पुरुष की पुत्री—भले ही वह सुन्दर-श्यामल/आकर्षक हो—उसे भी वधू रूप में नहीं लेना चाहिए।

Verse 7

एक एव ऋषिर्यत्र प्रवरेष्वनुवर्तते । तावत्समानगोत्रत्वमृते भृग्वंगिरोगणात्

जहाँ प्रवरों में एक भी ऋषि-नाम समान रूप से चलता है, वहाँ उतनी ही सीमा तक गोत्र की समानता मानी जाती है—परन्तु भृगु और आङ्गिरस-गण के विषय में परम्परागत अपवाद है।

Verse 8

भद्रकाली च ५ माहेशी ६ सिंहोरी ७ धनमर्द्दनी

(देवीनाम) भद्रकाली (५), माहेशी (६), सिंहोरी (७) और धनमर्द्दनी—ये भी नाम हैं।

Verse 9

समानगोत्रप्रवरां कन्यामूढ्वोपगम्य च । तस्यामुत्पाद्य चांडालं ब्राह्मण्यादेव हीयते

जो पुरुष समान गोत्र और समान प्रवर वाली कन्या से विवाह करके उसके साथ सहवास करता है और उससे संतान उत्पन्न करता है, वह संतान चाण्डाल होती है; और वह पुरुष स्वयं भी ब्राह्मण्य से गिर जाता है।

Verse 10

कात्यायनः । परिणीय सगोत्रा तु समानप्रवरां तथा । त्यागं कृत्वा द्विजस्तस्यास्ततश्चांद्रायणं चरेत्

कात्यायन कहते हैं—यदि किसी द्विज ने समान गोत्र तथा समान प्रवर वाली स्त्री से विवाह कर लिया हो, तो उसे उसका त्याग कर देना चाहिए और तत्पश्चात् चान्द्रायण प्रायश्चित्त करना चाहिए।

Verse 11

उत्सृज्य तां ततो भार्यां मातृवत्परिपालयेत्

उस पत्नी को त्यागकर, उसके बाद उसे माता के समान पालन-पोषण और संरक्षण देना चाहिए।

Verse 12

याज्ञवल्क्यः । अरोगिणीं भ्रातृमतीमसमानार्षगोत्रजाम् । पंचमात्सप्तमार्दूर्ध्वं मातृतः पितृत स्तथा

याज्ञवल्क्य कहते हैं—स्वस्थ, भाई वाली तथा भिन्न ऋषि-गोत्र (आर्ष-गोत्र) में उत्पन्न कन्या से विवाह करना चाहिए। माता-पक्ष और पिता-पक्ष—दोनों ओर पाँचवीं से आगे और सातवीं तक (संबंध-गणना में) विवाह की अनुमति है।

Verse 13

असमानप्रवरैर्विवाह इति गौतमः । यद्येकं प्रवरं भिन्नं मातृगोत्रवरस्य च । तत्रोद्वाहो न कर्तव्यः सा कन्या भगिनी भवेत्

गौतम कहते हैं—विवाह भिन्न प्रवर वाले कुल में करना चाहिए। यदि माता के गोत्र-प्रवर से एक भी प्रवर समान हो जाए, तो वहाँ विवाह नहीं करना चाहिए; वह कन्या बहन के समान मानी जाए।

Verse 14

दाराग्निहोत्रसंयोगं कुरुते योऽग्रजे स्थिते । परिवेत्ता स विज्ञेयः परिवित्तिस्तु पूर्वजः

जिसका बड़ा भाई अविवाहित रहते हुए भी जो विवाह करके गृह्याग्नि-होत्र का संयोग करता है, वह ‘परिवेत्ता’ कहलाता है; और वह बड़ा भाई ‘परिवित्ति’ कहा जाता है।

Verse 15

सदा पौनर्भवा कन्या वर्ज नीया कुलाधमा । वाचा दत्ता मनोदत्ता कृतकौतुकमंगला

जो कन्या बार-बार ‘पुनर्भवा’ होकर लौटाई गई हो, वह कुल-धर्म का पालन करने वाले वर को सदा वर्ज्य है। इसी प्रकार जो वाणी से दत्त (प्रतिज्ञात), मन से दत्त, या जिसके लिए कौतुक-मंगल (सगाई) हो चुका हो, उसे दूसरा न ले।

Verse 16

उदकस्पर्शिता याच याच पाणिगृहीतका । अग्निं परिगता या च पुनर्भूः प्रसवा च या

जिस कन्या का उदक-स्पर्श (जल-स्पर्श) संस्कार हो चुका हो, या जिसका पाणिग्रहण हो गया हो, या जो अग्नि की परिक्रमा कर चुकी हो—वह वर्ज्य है। इसी प्रकार ‘पुनर्भू’ स्त्री तथा जो प्रसवा (संतानवती) हो, वह भी वर्ज्य है।

Verse 17

योगेश्वरी १४ मोहलज्जा १५ कुलेशी १६ शकुलाचिता

‘योगेश्वरी’, ‘मोहलज्जा’, ‘कुलेशी’ और ‘शकुलाचिता’—ये नाम/उपाधियाँ सूची में १४–१७ के रूप में गिनी गई हैं।

Verse 18

अथावटंकाः कथ्यंते गोत्र १ पात्र २ दात्र ३ त्राशयत्र ४ लडकात्र १५ मंडकीयात्र १६ विडलात्र १७ रहिला १८ भादिल १९ वालूआ २० पोकीया २१ वाकीया २२ मकाल्या २३ लाडआ २४ माणवेदा २५ कालीया २६ ताली २७ वेलीया २८ पांवलन्डीया २९ मूडा ३० पीतूला ३१ धिगमघ ३२ भूतपादवादी ३४ होफोया ३५ शेवार्दत ३६ वपार ३७ वथार ३८ साधका ३९ बहुधिया ४०

अब ‘अवटंक’ कहे जाते हैं—गोत्र, पात्र, दात्र, त्राशयत्र, लडकात्र, मंडकीयात्र, विडलात्र, रहिला, भादिल, वालूआ, पोकीया, वाकीया, मकाल्या, लाडआ, माणवेदा, कालीया, ताली, वेलीया, पांवलन्डीया, मूडा, पीतूला, धिगमघ, भूतपादवादी, होफोया, शेवार्दत, वपार, वथार, साधका, बहुधिया—इस प्रकार परंपरा में ४० तक सूची है।

Verse 19

मातुलस्य सुतामूढ्वा मातृगोत्रां तथैव च । समानप्रवरां चैव त्यक्त्वा चांद्रायणं चरेत्

यदि किसी ने मातुल (मामा) की पुत्री से, या माता के गोत्र वाली स्त्री से, अथवा समान-प्रवर वाली स्त्री से विवाह किया हो, तो उसे त्यागकर चान्द्रायण प्रायश्चित्त करना चाहिए।