Adhyaya 39
Brahma KhandaDharmaranya MahatmyaAdhyaya 39

Adhyaya 39

इस अध्याय में ब्रह्मा नारद को उपदेश-रूप संवाद में बतलाते हैं कि कैसे अनुशासित वेदाध्ययन वाले श्रेष्ठ द्विज समुदाय संहिता, पद, क्रम और घन-पाठ की शुद्ध परंपरा से वेद-ध्वनि को सुरक्षित रखते हैं। ब्रह्मा और विष्णु सहित देवगण वहाँ पहुँचकर उनके यज्ञ-ध्वनि-परिसर, आचार-व्यवस्था और नैतिक अनुशासन को देखते हैं और उसे त्रेता-युग जैसी धर्मस्थिति का चिह्न मानते हैं। कली के विघ्नों की आशंका से देवता एक नियत आर्थिक-धार्मिक व्यवस्था स्थापित करते हैं—चातुर्विद्य और त्रैविद्य के बीच जीविका-भाग, पेशागत सीमाएँ, परस्पर विवाह-निषेध, तथा कुल-विभाजन का औपचारिक नियम, जिसका नियामक नाम पाठ में ‘काजेश’ कहा गया है। इसके बाद अध्याय एक विस्तृत अभिलेख बन जाता है: समुदाय से जुड़े 55 ग्रामों के नाम, फिर प्रत्येक ग्राम के लिए गोत्र-प्रवर की सूची और ग्राम-विशिष्ट ‘गोत्र-देवी’ (वंश-रक्षिका देवी) का निर्देश। नारद के प्रश्नों से गोत्र, कुल और देवी की पहचान की विधि स्पष्ट होती है, और ब्रह्मा क्रमशः स्थानों को वंश-प्रवर आदि से जोड़ते हैं। अंत में बाद के युगों में संकर और पतन को युग-परिवर्तनजन्य मानकर स्वीकार किया गया है, पर यह रजिस्टर धर्मारण्य के संदर्भ-ग्रंथ की तरह सुरक्षित रखा गया है।

Shlokas

Verse 1

ब्रह्मोवाच । शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि रहस्यं परमं मतम् । एते ब्रह्मविदः प्रोक्ताश्चातुर्विद्या महा द्विजाः

ब्रह्मा बोले—हे पुत्र, सुनो; मैं परम रहस्यरूप महान उपदेश कहता हूँ। ये ब्रह्म-विद्या के ज्ञाता, चारों विद्याओं में निपुण महाद्विज कहे गए हैं।

Verse 2

स्वाध्यायाश्च वषट्काराः स्वधाकाराश्च नित्यशः । रामाज्ञापालकाश्चैव हनुमद्भक्तितत्पराः

वे स्वाध्याय में रत हैं और नित्य वषट् तथा स्वधा के उच्चारण करते हैं; वे राम की आज्ञा का पालन करते और हनुमान-भक्ति में सदा तत्पर रहते हैं।

Verse 3

एकदा तु ततो देवा ब्रह्माणं समुपागताः । ब्राह्मणान्द्रष्टुकामास्ते ब्रह्मविष्णुपुरोगमाः

एक बार वे सब देवता ब्रह्मा के पास आए। ब्रह्मा और विष्णु के नेतृत्व में वे ब्राह्मणों के धर्माचरण को देखने की इच्छा से आए थे।

Verse 4

तान्देवानागतान्दृष्ट्वा स्वस्थानाच्चलितास्तु ते । अर्घपाद्यं पुरस्कृत्य मधुपर्कं तथैव च

आए हुए उन देवताओं को देखकर वे अपने आसनों से उठ खड़े हुए। आगे अर्घ्य और पाद्य रखकर, तथा मधुपर्क भी आदरपूर्वक प्रस्तुत किया।

Verse 5

पूजयित्वा ततो विप्रा देवान्ब्रह्मपुरोगमान् । ब्रह्मात्र उपविष्टास्ते वेदानुच्चारयन्ति हि

फिर उन विप्रों ने ब्रह्मा के अग्रणी देवताओं का पूजन किया। तत्पश्चात वे ब्रह्मा के सान्निध्य में बैठकर वेदों का उच्चारण करने लगे।

Verse 6

संहितां च पदं चैव क्रमं घनं तथैव च । उच्चैः स्वरेण कुर्वीत ऋचामृग्वेदसंहिताम्

वे संहिता, पद, क्रम और घन—इन सब विधियों से ऋग्वेद की ऋचाओं का पाठ करते थे, और ऊँचे, स्पष्ट स्वर में ऋग्वेद-संहिता का उच्चारण करते थे।

Verse 7

सामगाश्च प्रकुर्वंति स्तोत्राणि विविधानि च । शास्त्राणि च तथा याज्यापुरोनुवाक्या स्तथा

और सामगान करने वाले विविध स्तोत्रों का गान करते थे। इसी प्रकार शास्त्रीय अंशों का, याज्या-मंत्रों का तथा पुरोनुवाक्या ऋचाओं का भी विधिपूर्वक पाठ होता था।

Verse 8

चतुरक्षरं परं चैव चतुरक्षरमेव च । द्व्यक्षरं च तथा पंचाक्षरं द्वयक्षरमेव च । एतद्यज्ञस्वरूपं च यो जपेज्ज्ञानपूर्वकम्

परम चतुरक्षरी मंत्र, चतुरक्षरी रूप, द्व्यक्षरी तथा पंचाक्षरी और फिर द्व्यक्षरी—जो इसे यज्ञ का स्वरूप जानकर ज्ञानपूर्वक जपता है…

Verse 9

अंते ब्रह्म पदप्राप्तिः सत्यंसत्यं वदाम्यहम् । एकाग्रमानसाः सर्वे वेदपाठरता द्विजाः

अंत में ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है—यह सत्य है, सत्य है, मैं कहता हूँ। एकाग्रचित्त होकर वे सभी द्विज वेदपाठ में रत थे।

Verse 10

तेषामंगणदेशेषु कण्डूयन्ते कचान्मृगाः । ब्राह्मणा वेदमातां च जपंति विधिपूर्वकम्

उनके आँगनों में मृग अपने बालों को खुजाते थे; और ब्राह्मण विधिपूर्वक ‘वेदमाता’ का भी जप करते थे।

Verse 11

हस्ते धृतांश्च तैर्दर्भान्भक्षंते मृगपोतकाः । निर्वैरं तं तदा दृष्ट्वा आश्रमं गृहमेधिनाम्

उनके हाथों में धरे दर्भ को मृगशावक खाते थे। गृहस्थों का वह आश्रम निर्वैर देखकर (सब) विस्मित हो उठे।

Verse 12

तुतुषुः परमं देवा ऊचुस्ते च परस्परम् । त्रेतायुगमिदानीं च सर्वे धर्मपरायणाः

देवता परम प्रसन्न हुए और परस्पर बोले—“अब तो मानो त्रेतायुग आ गया है; सब धर्मपरायण हैं।”

Verse 13

कलिर्दुष्टस्तथा प्रोक्तः किं करिष्यति पापकः । चातुर्विद्यान्समाहूय ऊचुस्ते त्रय एव च

“कलि दुष्ट कहा गया है—वह पापी क्या करेगा?” ऐसा कहकर उन तीनों दिव्य जनों ने चातुर्विद्यों को बुलाया और उनसे कहा।

Verse 14

वृत्त्यर्थं भवतां चैव त्रैविद्यानां तथैव च । विभागं वः प्रदास्यामो यथावत्प्रतिपाल्यताम्

“तुम्हारी आजीविका के लिए और वैसे ही त्रैविद्यों के लिए भी, हम तुम्हें यथोचित भाग देंगे; उसे विधिपूर्वक ठीक-ठीक निभाया जाए।”

Verse 15

ये वणिजः पुरा प्रोक्ताः षट्त्रिंशच्च सहस्रकाः । त्रिसहस्रास्तु त्रैविद्या दशपंचसहस्रकाः

“जो वणिक पहले बताए गए थे, वे छत्तीस हजार हैं। त्रैविद्य तीन हजार हैं, और दशपंचसहस्रक पंद्रह हजार हैं।”

Verse 16

चातुर्विद्यास्तथा प्रोक्ता अन्योन्यं वृत्तिमाश्रिताः । सत्रिभागास्तु त्रैविद्याश्चतुर्भागास्तु चात्रिणः

“इस प्रकार चातुर्विद्य कहे गए, जो परस्पर एक-दूसरे की वृत्ति पर आश्रित थे। त्रैविद्यों को तीन भाग मिले और चात्रिणों को चार भाग।”

Verse 17

वणिजां गृहमागत्य पौरोहित्यस्य नित्यशः । भागं विभज्य संप्रापुः काजेशेन विनिर्मिताः

वणिकों के घर प्रतिदिन पुरोहित-सेवा हेतु आकर, वे अपना-अपना भाग बाँटकर प्राप्त करते थे—जो काजेश द्वारा स्थापित किया गया था।

Verse 18

परस्परं न विवाहश्चातुर्विद्यत्रिविद्ययोः । चातुर्विद्या मया प्रोक्तास्त्रिविद्यास्तु तथैव च

चातुर्विद्य और त्रिविद्य के बीच परस्पर विवाह नहीं होना चाहिए। मैंने चातुर्विद्यों का विधान कहा है, और उसी प्रकार त्रिविद्यों का भी॥

Verse 19

त्रैविभागेन त्रैविद्याश्चतुर्भागेन चात्रिणः । एवं ज्ञातिविभागस्तु काजेशेन विनिर्मितः

त्रिविद्यों को तीन भाग का अंश दिया गया और चात्रिणों को चार भाग का। इस प्रकार ज्ञातियों का विभाग काजेश द्वारा स्थापित किया गया॥

Verse 20

कृतकृत्यास्तु ते विप्राः प्रणेमुस्तान्सुरोत्तमान् । वृत्तिं दत्त्वा ततो देवाः स्वस्थानं च प्रतस्थिरे

कार्य सिद्ध कर वे ब्राह्मण देवश्रेष्ठों को प्रणाम करने लगे। फिर देवताओं ने उन्हें आजीविका का साधन देकर अपने धाम को प्रस्थान किया॥

Verse 21

पंचपंचाशद्ग्रामाणां ते द्विजाश्च निवासिनः । चतुर्विद्यास्तु ते प्रोक्तास्तदादि तु त्रिविद्यकाः

वे द्विज पचपन ग्रामों के निवासी बने। वे ‘चातुर्विद्य’ कहलाए, और उसी समय से (अन्य) ‘त्रिविद्यक’ कहे गए॥

Verse 22

चातुर्विद्यस्य गोत्राणि दशपंच तथैव च । भारद्वाजस्तथा वत्सः कौशिकः ८ कुश एव च

चातुर्विद्यों के गोत्र भी पंद्रह हैं—जैसे भारद्वाज, वत्स, कौशिक और कुश आदि॥

Verse 23

जातूकर्ण्यस्तथा कुंतो वशिष्ठो ११ धारणस्तथा

इसी प्रकार जातूकर्ण्य और कुंत, तथा (एकादश) वशिष्ठ और धारण भी स्मरण किए गए हैं।

Verse 24

आत्रेयो मांडिलश्चैव १४ लौगाक्षश्च १५ ततः परम् । स्वस्थानानां च नामानि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः

आत्रेय और मांडिल (चौदहवें), तथा लौगाक्ष (पंद्रहवें) हैं; इसके बाद मैं उनके अपने पवित्र स्थानों के नाम क्रम से कहूँगा।

Verse 25

सीतापूरं च श्रीक्षेत्रं २ मगोडी च ३ तथा स्मृता । ज्येठलोजस्तथा चैव शेरथा च ततः परम्

सीतापूर, (दूसरा) श्रीक्षेत्र और (तीसरी) मगोडी—ये स्मरण किए गए हैं; फिर उसके बाद ज्येठलोज और शेरथा आते हैं।

Verse 26

छेदे ताली वनोडी च गोव्यंदली तथैव च । कंटाचोषली चैव कोहेचं चंदनस्तथा

छेद, ताली, वनोडी; तथा गोव्यंदली भी; और कंटाचोषली, कोहेचं तथा चंदन भी (कहे गए हैं)।

Verse 27

थलग्रामश्च सोहं च हाथंजं कपडवाणकम् । व्रजन्होरी च वनोडी च फीणां वगोलं दृणस्तथा

थलग्राम और सोहं; हाथंजं और कपडवाणकम्; व्रजन्होरी और वनोडी; तथा फीणां, वगोलं और दृण भी (कहे गए हैं)।

Verse 28

थलजा चारणं सिद्धा भालजाश्च ततः परम् । महोवी आईया मलीआ गोधरी आमतः परम्

थलजा, चारण, सिद्धा और फिर भालजा; तथा महोवी, आईया, मलीआ, गोधरी और उसके बाद आमतः।

Verse 29

वाठसुहाली तथा चैव माणजा सानदीयास्तथा । आनन्दीया पाटडीअ टीकोलीया ततः परम्

वाठसुहाली भी; माणजा और सानदीया; फिर आनन्दीया, पाटडीअ और टीकोलीया उसके बाद।

Verse 30

गंभी धणीआ मात्रा च नातमोरास्तथैव च । वलोला रांत्यजाश्चैव रूपोला बोधणीच वै

गंभी, धणीआ और मात्रा; तथा नातमोराः भी; वलोला और रांत्यजा; रूपोला और बोधणी भी।

Verse 31

छत्रोटा अलु एवा च वासतडीआमतः परम् । जाषासणा गोतीया च चरणीया दुधीयास्तथा

छत्रोटा और अलु; फिर वासतडी उसके बाद; जाषासणा और गोतीया; तथा चरणीया और दुधीयाही।

Verse 32

हालोला वैहोला च असाला नालाडास्तथा । देहोलो सौहासीया च संहालीयास्तथैव च

हालोला और वैहोला; असाला और नालाडा भी; देहोलो, सौहासीया तथा संहालीया भी।

Verse 33

स्वस्थानं पंचपत्ताशद्ग्रामा एते ह्यनुक्रमात् । दत्ता रामेण विधिवत्कृत्वा विप्रेभ्य एव च

ये स्वस्थान के पचपन ग्राम क्रम से हैं; राम ने विधिपूर्वक कर्म करके उन्हें ब्राह्मणों को दान में दिया।

Verse 34

अतः परं प्रवक्ष्यामि स्वस्थानस्य च गोत्रजान् । तथा हि प्रवरांश्चैव यथावद्विधिपूर्वकम्

अब आगे मैं स्वस्थान के गोत्रजनों तथा उनके प्रवरों का वर्णन करूँगा—जैसा नियम और परंपरा के अनुसार यथावत् है।

Verse 35

ज्ञात्वा तु गोत्रदेवीं च तथा प्रवरमेव च । स्वस्थानं जायते चैव द्विजाः स्वस्थानवासिनः

गोत्रदेवी और अपने प्रवर को जान लेने से स्वस्थान का स्वरूप सिद्ध होता है; स्वस्थानवासी द्विज अपने यथार्थ स्वरूप में प्रतिष्ठित होते हैं।

Verse 36

नारद उवाच । कथं च जायते गोत्रं कथं तु ज्ञायते कुलम् । कथं वा ज्ञायते देवी तद्वदस्व यथार्थतः

नारद बोले—गोत्र कैसे उत्पन्न होता है, और कुल कैसे जाना जाता है? तथा देवी कैसे पहचानी जाती है? यह मुझे सत्य और स्पष्ट रूप से कहिए।

Verse 37

ब्रह्मोवाच । सीतापुरं तु प्रथमं प्रवरद्वयमेव च । कुशवत्सौ तथा चात्र मया ते परिकीर्त्तितौ

ब्रह्मा बोले—सीतापुर प्रथम है और उसका प्रवर द्वय है; यहाँ कुश और वत्स—ये दोनों मैंने तुम्हें कहे हैं।

Verse 38

१ श्रीक्षेत्रे द्वितीयं चैव गोत्राणां त्रयमेव च । छांदनसस्तथा वत्सस्तृतीयं कुशमेव च

श्रीक्षेत्र में दूसरा निवास-स्थान कहा गया है और वहाँ तीन गोत्र हैं—छांदनस, वत्स तथा तीसरा कुश गोत्र।

Verse 39

शोहोली च चतुर्थं वै कुशप्रवरमेव च

शोहोली चौथा (स्थान) है और उसका प्रवर कुश ही है।

Verse 40

श्रेयस्थानं हि षष्ठं वै भारद्वाजः कुशस्तथा

श्रेयस्थान छठा (स्थान) है; वहाँ (वंश-चिह्न) भारद्वाज तथा कुश हैं।

Verse 41

वटस्थानमष्टमं च निबोध सुतसत्तम

हे श्रेष्ठ पुत्र! जानो—वटस्थान आठवाँ (स्थान) है।

Verse 42

तत्र गोत्रं कुशं कुत्सं भारद्वाजं तथैव च । राज्ञः पुरं नवमं च भारद्वाजप्रवरमेव च ९

वहाँ गोत्र—कुश, कुत्स और भारद्वाज भी हैं। और राज्ञःपुर नवम (स्थान) है, जिसका प्रवर भारद्वाज ही है।

Verse 43

कृष्णवाटं दशमं चैव कुशप्रवरमेव च । दहलोडमेकादशं वत्सप्रवरमेव हि

दसवाँ ‘कृष्णवाट’ है, जो कुश-प्रवर से युक्त है। और ग्यारहवाँ ‘दहलोड’ है, जो निश्चय ही वत्स-प्रवर से युक्त है।

Verse 44

चेखलीद्वादशं पौककुशप्रवरमेव च

बारहवाँ ‘चेखली’ है, जो ‘पौक–कुश-प्रवर’ से युक्त है।

Verse 45

चांचोदखे १२ देहोलोडी आत्रयश्च वत्सकुत्सकश्चैव । भारद्वाजीकोणाया च भारद्वाजगोलंदृणाशकुस्तथा

चांचोदख (बारह) में ‘देहोलोडी’ आत्रेय परम्परा से संबद्ध है; तथा वत्स–कुत्स से भी युक्त मानी गई है। इसी प्रकार भारद्वाज—कोणाया, और भारद्वाज—गोलंदृण—आशकु से भी उसके संबंध बताए गए हैं।

Verse 46

थलत्यजाद्वये चैव कुशधारणमेव च । नारणसिद्धा च स्वस्थानं कुत्सं गोत्रं प्रकीर्तितम्

‘थलत्यजा’ नामक युग्म में, तथा ‘कुशधारण’ में, और ‘नारणसिद्धा’ में—ये उनके अपने-अपने स्थान कहे गए हैं; और इनके साथ ‘कुत्स-गोत्र’ का उल्लेख किया गया है।

Verse 47

भालजां कुत्सवत्सौ च मोहोवी आकुशस्तथा । ईयाश्लीआ शांडिलश्च गोधरीपात्रमेव च

‘भालजा’ कुत्स–वत्स से संबद्ध है; और ‘मोहोवी’ आकुश परम्परा की है। इसी प्रकार ‘ईयाश्लीआ’, ‘शांडिल’, तथा ‘गोधरी-पात्र’ भी (उल्लिखित हैं)।

Verse 48

आनंदीया द्वे चैव भारद्वाजशांडिलश्चैव पाटडीआ कुशमेव च

आनंदीया के दो (समूह/स्थान) हैं; तथा भारद्वाज–शांडिल्य परंपरा से संबद्ध जन हैं; और कुश-वंश की पाटडीया भी है।

Verse 49

वांसडीआश्चैव जास्वा कौत्समणा वत्सआत्रेयौ गीता आकुशगौतमौ

और वांसडीया तथा जास्वा हैं; कौत्समणा; वत्स–आत्रेय; तथा आकुश–गौतम परंपरा से संबद्ध गीता भी है।

Verse 50

चरणीआ भारद्वाजः दुधीआधारणसा हि अहो सोन्नामांडिल्यस्तथा

चरणीया भारद्वाज-गोत्र की है; दुधीया निश्चय ही धारण-शाखा से संबद्ध है; और वैसे ही सोन्नामांडिल्य भी है।

Verse 51

वेलोला हुराश्चैवा असाला कुशश्चैव धारणा च द्वितीय कम्

वेलोला और हुरा, तथा असाला; कुश भी; और धारणाः—यह दूसरा समूह है।

Verse 52

नालोला वत्सधारणीया च देलोला कुत्समेव च । सोहासीया भारद्वाजकुशवत्समेव च

नालोला वत्स–धारणीया परंपरा से संबद्ध है; देलोला निश्चय ही कुत्स-गोत्र की है; और सोहासीया भी भारद्वाज–कुश–वत्स परंपरा से संबद्ध है।

Verse 53

सुहालीआ वत्सं वै प्रोक्तं गोत्राणि यथाक्रमम् । मया प्रोक्तानि चैवात्र स्वस्थानानि यथाक्रमम्

‘सुहालीआ’ और ‘वत्स’ का वर्णन किया गया तथा गोत्रों को यथाक्रम कहा गया। यहाँ मैंने उनके-उनके निवास-स्थान और बसावट भी क्रम से बताई है।

Verse 54

शीतवाडिया ये प्रोक्ताः कुशो वत्सस्तथैव च । विश्वामित्रो देवरातस्तृतीयो दलमेव च

‘शीतवाडिया’ नाम वाले कहे गए हैं; ‘कुश’ और ‘वत्स’ भी। ‘विश्वामित्र’ और ‘देवरात’ बताए गए हैं, तथा तीसरा ‘दल’ भी है।

Verse 55

भार्गवच्यावनाप्नवानौर्वजमदग्निरेव हि । वचार्द्दशेषाबुटला गोत्रदेव्यः प्रकीर्तिताः

भार्गव, च्यावन, आप्नवान, और्व और जमदग्नि—ये घोषित किए गए हैं। इनके साथ गोत्र-देवियाँ—वाक्, अर्द्धशेषा और अबुटला—भी नाम से कीर्तित हैं।

Verse 56

श्रीक्षेत्रं द्वितीयं प्रोक्तं गोत्रद्वितयमेव च । छांदनसस्तथा वत्सं देवी द्वितयमेव च

‘श्रीक्षेत्र’ को दूसरा कहा गया है और वैसे ही दो गोत्र। ‘छांदनस’ और ‘वत्स’ बताए गए हैं तथा (उनसे संबद्ध) दो देवियाँ भी कही गई हैं।

Verse 57

आंगिरसांबरीषश्च यौवनाश्वस्तथैव च । भृगुच्यवनआप्नवानौ र्वजमदग्निमेव च

आंगिरस, आंबरीष और यौवनाश्व—ये भी बताए गए हैं; तथा भृगु, च्यावन, आप्नवान, और्व और जमदग्नि भी कीर्तित हैं।

Verse 58

देवी भट्टारिका प्रोक्ता द्वितीया शेपला तथा । एतद्वंशोद्भवा ये च शृणु तान्मुनिसत्तम

देवी भट्टारिका का नाम कहा गया है, और दूसरी (देवी) शेपला भी। इसी वंश में जो उत्पन्न हुए हैं, उन्हें सुनिए, हे मुनिश्रेष्ठ।

Verse 59

सक्रोधनाः सदाचाराः श्रौतस्मार्तक्रियापराः । पंचयज्ञरता नित्यं संबंधसंमाश्रिताः । क्षतज्ञाः क्रतुजाश्चैव ते सर्वे नृपसत्तमाः

वे धर्मोचित क्रोध वाले, सदाचारी, श्रौत और स्मार्त कर्मों में तत्पर हैं। नित्य पंचयज्ञ में रत, उचित संबंध और मर्यादा पर आश्रित हैं। क्षति-प्रतिदान का ज्ञान रखने वाले और यज्ञजन्य—वे सब नृपों में श्रेष्ठ हैं।

Verse 60

तृतीयं मगोडोआ वै गोत्रद्वितयमेव च । भारद्वाजस्तथा कुत्सं देवी द्वितयमेव च

तीसरे के रूप में ‘मगोडोआ’ कहा गया है, और दो गोत्र भी—भारद्वाज तथा कुत्स। और देवियों की एक जोड़ी भी (इन पंक्तियों में) बताई गई है।

Verse 61

आंगिरसबार्हस्पत्यभारद्वाजस्तथैव च । विश्वामित्रदेव रातौप्रवरत्रयमेव च

आंगिरस, बार्हस्पत्य और भारद्वाज—ये भी कहे गए हैं। तथा विश्वामित्र–देवरात के लिए प्रवरोँ की त्रयी भी घोषित है।

Verse 62

शेषला बुधला प्रोक्ताधारशांतिस्तथैव च । अस्मिन्ग्रामे च ये जाता ब्राह्मणाः सत्यवादिनः

शेषला और बुधला कही गई हैं, तथा आधारशान्ति भी। और इस ग्राम में जो ब्राह्मण जन्मे हैं, वे सत्यवचन बोलने वाले हैं।

Verse 63

द्विजपूजाक्रिया युक्ता नानायज्ञक्रियापराः । अस्मिन्गोत्रे समुत्पन्ना द्विजाः सर्वे मुनीश्वराः

ब्राह्मणों की पूजा और नाना प्रकार के यज्ञों में तत्पर, इस गोत्र में उत्पन्न सभी द्विज मुनीश्वर हैं।

Verse 64

चतुर्थं शीहोलियाग्रामं गोत्रद्वित यमेव च । विश्वामित्रदेवराततृतीयौदलमेव च

चौथा शीहोलिया ग्राम है, जहाँ दो गोत्र हैं। तीसरा विश्वामित्र और देवरात (औदल) कहा गया है।

Verse 65

देवी चचाई वै तेषां गोत्रदेवी प्रकीर्तिता । अस्मिन्गोत्रे तुये जाता दुर्बला दीनमा नसाः

उनकी गोत्रदेवी 'चचाई' कही गई हैं। इस गोत्र में जो उत्पन्न होते हैं, वे दुर्बल और दीन मन वाले होते हैं।

Verse 66

असत्यभाषिणो विप्रा लोभिनो नृपसत्तम । सर्व्वविद्याप्रवीणाश्च ब्राह्मणा ब्रह्मसत्तम

हे नृपश्रेष्ठ! वे ब्राह्मण असत्य बोलने वाले और लोभी होते हैं, किन्तु हे ब्रह्मसत्तम! वे सर्वविद्या में प्रवीण भी होते हैं।

Verse 67

ज्येष्ठलोजा पंचमं च स्वस्थानं प्रतिकीर्तितम् । वत्सशीया कुत्सशीया प्रवरद्वितयं स्मृतम्

पाँचवाँ स्थान 'ज्येष्ठलोजा' कहा गया है, जो उनका अपना स्थान है। वहाँ वत्सशीय और कुत्सशीय, ये दो प्रवर माने गए हैं।

Verse 68

आवरिवृवाप्रः यौवनाश्वभृगुच्यवनआप्नोर्वजमदग्निस्तथैव हि

इसी प्रकार स्मरणीय पितृ-ऋषि हैं—आवरिवृवाप्र, यौवनाश्व, भृगु, च्यवन, आप्नोर्व और जामदग्नि।

Verse 69

चचाई वत्सगोत्रस्य शांता च कुत्सगोत्रजा । एतैस्त्रिभिः पंचभिश्च द्विजा ब्रह्मस्वरूपिणः

चचाई वत्स-गोत्र की है और शांता कुत्स-गोत्र में जन्मी है। इन तीनों तथा उन पाँचों के द्वारा ये द्विज ब्रह्मस्वरूप माने जाते हैं।

Verse 70

शांता दांताः सुशीलाश्च धन पुत्रैश्च संयुताः । वेदाध्ययनहीनाश्च कुशलाः सर्वकर्मसु

वे शांत, संयमी और सुशील हैं; धन और पुत्रों से युक्त हैं। वेदाध्ययन से रहित होते हुए भी वे सब कार्यों में कुशल हैं।

Verse 71

सुरूपाश्च सदाचाराः सर्वधर्मेषु निष्ठिताः । दानधर्म्मरताः सर्वे अत्रजा जलदा द्विजाः

वे सुंदर रूप वाले, सदाचारी और समस्त धर्मों में निष्ठावान हैं। इस स्थान में जन्मे ये सभी द्विज दान-धर्म में रत हैं—मेघों के समान जल बरसाने वाले।

Verse 72

शेरथाग्रामेषु वै जाताः प्रवरद्वयसंयुताः । कुशभारद्वाजाश्चैव देवीद्वयं तथैव च

वे निश्चय ही शेरथा के ग्रामों में जन्मे हैं और दो प्रवरों से युक्त हैं—कुश और भारद्वाज; तथा उसी प्रकार दो देवियों से भी संबद्ध हैं।

Verse 73

विश्वामित्रो देवरातस्तृतीयौ दल एव च । आंगिरसबार्हस्पत्यभारद्वाजास्तथैव च

यहाँ विश्वामित्र और देवरात, तथा तृतीय और दल भी कहे गए हैं; और इसी प्रकार आङ्गिरस, बार्हस्पत्य तथा भारद्वाज—ये भी (प्रवर/वंश) माने गए हैं।

Verse 74

कमला च महालक्ष्मीर्द्वितीया यक्षिणी तथा । अस्मिन्गोत्रे च ये जाताः श्रौतस्मार्त्तरता बुधाः

कमला और महालक्ष्मी का उल्लेख है; तथा द्वितीया के रूप में यक्षिणी भी। और इस गोत्र में जन्मे लोग श्रौत और स्मार्त—दोनों आचारों में रत, बुद्धिमान होते हैं।

Verse 75

अस्मिन्वंशे च ये जाता ब्राह्मणाः सत्यवादिनः । अलौल्याश्च महायज्ञा वेदाज्ञाप्रतिपालकाः

और इस वंश में जन्मे ब्राह्मण सत्यवक्ता होते हैं; लोभ से रहित, महायज्ञों के कर्ता, तथा वेद की आज्ञाओं के पालनकर्ता होते हैं।

Verse 76

दंतालीया भारद्वाजकुत्सशायास्तथैव च । आंगिरसबार्हस्पत्यभारद्वाजास्तथैव च

दंतालीय, तथा भारद्वाज–कुत्स–शाय (परंपरा) भी कही गई है; और उसी प्रकार आङ्गिरस, बार्हस्पत्य तथा भारद्वाज—ये भी (प्रवर) बताए गए हैं।

Verse 77

देवी च यक्षिणी प्रोक्ता द्वितीया कर्मला तथा । अस्मिन्गोत्रे च ये जाता वाडवा धनिनः शुभाः

देवी और यक्षिणी कही गई हैं; तथा द्वितीया के रूप में कर्मला भी। और इस गोत्र में जन्मे लोग वाडव (वंशज) धनवान और शुभ होते हैं।

Verse 78

वस्त्रालंकरणोपेता द्विजभक्तिपरायणाः । ब्रह्मभोज्यपराः सर्वे सर्वे धर्मपरायणाः

वे वस्त्रों और आभूषणों से सुशोभित, द्विजों की भक्ति-सेवा में तत्पर, ब्राह्मणों के योग्य दान-भोजन में प्रवृत्त—सब के सब धर्मपरायण हैं।

Verse 79

वडोद्रीयान्वये जाताश्चत्वारः प्रवराः स्मृताः । कुशः कुत्सश्च वत्सश्च भारद्वाजस्तथैव च

वडोद्रीय वंश में चार प्रवर स्मरण किए गए हैं—कुश, कुत्स, वत्स तथा भारद्वाज।

Verse 80

तत्प्रवराण्यहं वक्ष्ये तथा गोत्राण्यनुक्रमात् । विश्वामित्रो देवरातस्तृतीयौदल एव च

अब मैं उन प्रवरों को तथा क्रम से गोत्रों को कहूँगा—विश्वामित्र, देवरात, तृतीय और दल।

Verse 81

आंगिरसांबरीषश्च यौवनाश्वस्तृतीयकः । भार्गवश्च्यावनाप्नवानौर्वजमदग्निस्तथैव च

आंगिरस और अंबरीष, तथा तीसरे यौवनाश्व; इसी प्रकार भार्गव, च्यावन, आप्नवान, और्व और जमदग्नि भी।

Verse 82

आंगिरसबार्हस्पत्यभारद्वाजास्तथैव च । कर्मला क्षेमला चैव धारभट्टारिका तथा

इसी प्रकार आंगिरस, बार्हस्पत्य और भारद्वाज; तथा कर्मला, क्षेमला और धारभट्टारिका भी कही गई हैं।

Verse 83

चतुर्थी क्षेमला प्रोक्ता गोत्रमाता अनुक्रमात् । अस्मिन्गोत्रे तु ये जाताः पंचयज्ञरताः सदा

क्रमानुसार चौथी गोत्रमाता ‘क्षेमला’ कही गई है। इस गोत्र में जन्मे लोग सदा पंचयज्ञों में रत रहते हैं।

Verse 84

लोभिनः क्रोधिनश्चैव प्रजायंते बहुप्रजाः । स्नानदानादि निरताः सदा विनिर्जितेंद्रियाः

वे लोभी और क्रोधी भी उत्पन्न हो सकते हैं, फिर भी बहु-संतान से युक्त होते हैं। वे स्नान, दान आदि कर्तव्यों में नित्य लगे रहकर सदा इंद्रियों को जीतते हैं।

Verse 85

वापीकूपतडागानां कर्तारश्च सहस्रशः । व्रतशीला गुणज्ञाश्च मूर्खा वेदविवर्जिताः

वे सहस्रों की संख्या में बावड़ी, कुआँ और तालाब बनवाने वाले होते हैं। व्रतशील और गुणों के ज्ञाता हैं, पर उन्हें मंदबुद्धि और वेद-विद्या से रहित कहा गया है।

Verse 86

गोदणीयाभिधे ग्रामे गोत्रौ द्वौ तत्र संस्थितौ । वत्सगोत्रं प्रथमकं भारद्वाजं द्वितीयकम्

‘गोदणीया’ नामक ग्राम में दो गोत्र प्रतिष्ठित हैं—पहला वत्स गोत्र और दूसरा भारद्वाज गोत्र।

Verse 87

भृगुच्यवनाप्नवानौर्वपुरोध समेव च । शीहरी प्रथमा ज्ञेया द्वितीया यक्षिणी तथा

भृगु, च्यवन, आप्नव, और्व, पुरोध और सम भी (इस परंपरा में) गिने जाते हैं। शीहरी को प्रथम (गोत्रमाता) जानो और यक्षिणी को द्वितीया।

Verse 88

अस्मिन्गोत्रोद्भवा विप्रा धनधान्यसमन्विताः । सामर्षा लौल्यहीनाश्च द्वेषिणः कुटिलास्तथा

इस गोत्र में उत्पन्न ब्राह्मण धन-धान्य से सम्पन्न होते हैं। वे शीघ्र क्रोध करने वाले, चंचलता-रहित, परन्तु द्वेषी और कुटिल आचरण वाले भी हैं।

Verse 89

हिंसिनो धनलुब्धाश्च मया प्रोक्तास्तु भूपते

हे भूपते! मैंने उन्हें हिंसक और धन के लोभी—ऐसा ही कहा है।

Verse 90

कण्टवाडीआ ग्रामे विप्राः कुशगोत्र । शुक्लशुश्च समुद्भवाः । प्रवरं तस्य वक्ष्यामि शृणु त्वं च नृपोत्तम

कण्टवाड़ीआ ग्राम में कुश-गोत्र के ब्राह्मण हैं और शुक्लशु की सन्तति भी है। उस वंश का प्रवर मैं कहूँगा—हे नृपोत्तम, तुम सुनो।

Verse 91

विश्वमित्रो देवरात उदलश्च त्रयः स्मृताः । चचाई देवी सा प्रोक्ता शृणु त्वं नृप सत्तम

विश्वामित्र, देवरात और उदला—ये तीन (प्रवर-ऋषि) स्मरण किए जाते हैं। चचाई देवी का भी यहाँ कथन है; हे नृपसत्तम, तुम सुनो।

Verse 92

यजंते क्रतुभिस्तत्र हृष्टचित्तैकमानसाः । सर्वविद्यासु कुशला ब्राह्मणाः सत्यवादिनः

वहाँ वे हर्षित चित्त और एकाग्र मन से क्रतुओं द्वारा यज्ञ करते हैं। वे ब्राह्मण समस्त विद्याओं में कुशल और सत्यवचन हैं।

Verse 93

वेखलोया मया प्रोक्ता कुत्सवंशे समुद्भवाः । प्रवरत्रयसंयुक्ताः शृणुत्वं च नृपोत्तम

मैंने कुत्स-वंश में उत्पन्न, त्रि-प्रवर से युक्त वेखलोया का वर्णन किया है। हे नृपोत्तम, अब आगे भी सुनो।

Verse 94

विश्वामित्रो देवराजौदलश्चेति त्रयः स्मृताः । चचाई देवी तेषां वै कुलरक्षाकरी स्मृता

विश्वामित्र, देवराज-औदल आदि तीन प्रवर स्मरण किए गए हैं; और देवी चचाई उनकी कुल-रक्षिका मानी गई है।

Verse 95

ब्राह्मणाश्च महात्मानः सत्त्ववंतो गुणान्विताः । तपस्वियोगिनश्चैव वेदवेदांगपारगाः

वे महात्मा ब्राह्मण हैं—सत्त्वसम्पन्न, गुणों से युक्त; तपस्वी और योगी, वेद तथा वेदाङ्गों में पारंगत।

Verse 96

साधवश्च सदाचारा विष्णुभक्तिपरायणाः । स्नानसंध्यापरा नित्यं ब्रह्मभोज्यपरायणाः

वे साधु और सदाचारी हैं, विष्णु-भक्ति में परम निष्ठावान; नित्य स्नान और संध्या-वन्दन में तत्पर, तथा ब्राह्मणों को यथोचित भोजन कराने में स्थिर।

Verse 97

अस्मिन्वंशे मया प्रोक्ताः शृणुत्वं च अतः परम्

इस वंश के विषय में मैंने जो कहा, वह कहा; हे राजन्, अब इसके आगे जो है, उसे भी सुनो।

Verse 98

देहलोडीआ ये प्रोक्ताः कुत्सप्रवरसंयुताः । आंगिरस आंबरीषो युवनाश्वस्तृतीयकः

जो ‘देहलोडीआ’ कहलाते हैं, वे कुत्स-प्रवर से युक्त हैं। उनके नाम—आङ्गिरस, आम्बरीष और तृतीय युवनाश्व हैं।

Verse 99

गोत्रदेवी मया प्रोक्ता श्रीशेषदुर्बलेति च । कुत्सवंशे च ये जाताः सद्वृत्ताः सत्यभाषिणः

गोत्र-देवी मैंने ‘श्री-शेष-दुर्बला’ कही है। और कुत्स-वंश में जो जन्मे हैं, वे सदाचारी और सत्यभाषी हैं।

Verse 100

वेदाध्ययनशीलाश्च परच्छिद्रैकदर्शिनः । सामर्षा लौल्यतो हीना द्वेषिणः कुटिलास्तथा

वे वेदाध्ययन में रत हैं, पर पर-छिद्र ही देखने वाले हैं। वे क्रोधयुक्त, चंचलता से रहित, तथा द्वेषी और कुटिल भी हैं।

Verse 110

शांता दांता सुशीलाश्च धनपुत्रसमन्विताः । धर्मारण्ये द्विजाः श्रेष्ठाः क्रतुकर्मणि कोविदाः

धर्मारण्य में श्रेष्ठ द्विज शांत, दांत (इन्द्रियनिग्रही) और सुशील हैं; धन और पुत्रों से युक्त तथा यज्ञकर्म में निपुण हैं।

Verse 120

हाथीजणे च ये जाता वत्सा भारद्वाजास्तथा । ज्ञानजा यक्षिणी चैव गोत्रदेव्यौ प्रकी र्तिते

और हाथीजण में जो जन्मे हैं, वे वत्स तथा भारद्वाज हैं। वहाँ ‘ज्ञानजा’ और ‘यक्षिणी’—ये दो गोत्र-देवियाँ कही गई हैं।

Verse 130

महोत्कटा महाकायाः प्रलंबाश्च महोद्धताः । क्लेशरूपाः कृष्णवर्णाः सर्वशास्त्र विशारदाः

वे अत्यन्त भयानक, विशाल देह वाले, ऊँचे और उग्र वेग से युक्त हैं; क्लेश के साक्षात् रूप, कृष्णवर्ण, और फिर भी समस्त शास्त्रों में निपुण—ऐसा उनका वर्णन है।

Verse 140

ब्रह्मभोज्यपराः सर्वे सर्वे धर्म्म परायणाः

वे सभी ब्रह्मभोज्य (शुद्ध वैदिक अर्पण) में तत्पर हैं और सभी धर्म में दृढ़तापूर्वक परायण हैं।

Verse 150

वारणसिद्धाश्च ये प्रोक्ता ब्राह्मणा ज्ञानवित्तमाः । अस्मिन्गोत्रे च ये विप्राः सत्यवादिजितव्रताः

जो ब्राह्मण ‘वारणसिद्ध’ कहे गए हैं—ज्ञान-धन में श्रेष्ठ—और इस गोत्र में उत्पन्न जो विप्र सत्यवचन और जितव्रत (सु-नियंत्रित व्रतों) वाले हैं, उनका यहाँ स्मरण किया गया है।

Verse 160

विश्वामित्रो देवरातस्तृतीयौदल एव च । देवी चवाई चैवात्र रक्षारूपा व्यवस्थिता

विश्वामित्र, देवरात और तृतीय उदल—ये नाम कहे गए; और यहाँ देवी चवाई भी रक्षाशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

Verse 170

गोधरीयाश्च ये जाता ब्राह्मणा ज्ञानसत्तमाः । गोत्रत्रयमथो वक्ष्ये यथा चैवाप्यनुक्रमात्

और जो गोधरीय नाम से उत्पन्न ब्राह्मण ज्ञान में उत्तम हैं; अब मैं तीनों गोत्रों का यथाक्रम वर्णन करूँगा।

Verse 180

आंगिरसांबरीषौ च यौवनाश्वस्तृतीयकः । देवी चच्छत्रजा चैव द्वितीया शेषला तथा

आंगिरस और आंबरीष (नाम) कहे गए हैं, और तीसरे यौवनाश्व हैं; इसी प्रकार देवी चच्छत्रजा तथा दूसरी शेषला भी स्मरण की जाती हैं।

Verse 190

साणदां च परं स्थानं पवित्रं परमं मतम् । कुशप्रवरजा विप्रास्तत्रस्थाः पावनाः स्मृताः

साणदा को परम स्थान, अत्यन्त पवित्र माना गया है। वहाँ निवास करने वाले कुश-प्रवरज ब्राह्मण पावन करने वाले स्मरण किए गए हैं।

Verse 200

विश्वामित्रो देवरातस्तृतीयौदलमेव हि । अस्मिन्गोत्रे च ये जाता वेदशास्त्र परायणाः

विश्वामित्र और देवरात, तथा निश्चय ही तीसरे उदल—इस गोत्र में जो जन्मे हैं, वे वेद और शास्त्रों में परायण हैं।

Verse 210

अस्मिन्वंशे समुद्भूता ब्राह्मणा देवतत्पराः । सस्वाधायवषट्कारा वेदशास्त्रप्रवर्तकाः

इस वंश में देवताओं में तत्पर ब्राह्मण उत्पन्न हुए—जो स्वाध्याय और वषट्कार करने वाले तथा वेद-शास्त्रों के प्रवर्तक-पालक थे।

Verse 220

रूपोला परमं स्थानं पवित्रमतिपुण्यदम् । अस्मिन्गोत्रत्रये चैव देवीत्रितयमेव च

रूपोला परम धाम है—पवित्र और अत्यधिक पुण्य देने वाला। इस गोत्र-त्रय में देवी-त्रय भी (विराजमान) है।

Verse 230

छत्रोटा च परं स्थानं सर्वलोकैकपूजितम् । कुशगोत्रं समाख्यातं प्रवरत्रयमेव हि

छत्रोटा परम पवित्र स्थान है, जो समस्त लोकों में पूजित है। इसका गोत्र कुश-गोत्र कहा गया है और इसमें तीन प्रवर माने गए हैं।

Verse 240

अतः परं च संस्थानं जाखासणमुदाहृतम् । गोत्रं वै वात्स्यसंज्ञं तु गोत्रजा शीहुरी तथा । प्रवराणि च पंचैव मया तव प्रकाशितम्

इसके आगे जो दूसरा स्थान कहा गया है, वह जाखासण है। उसका गोत्र ‘वात्स्य’ कहलाता है और उस गोत्र में जन्मे ‘शीहुरी’ भी कहे जाते हैं। मैंने तुम्हें उनके पाँच प्रवर बताए हैं।

Verse 250

आंगिरसं बार्हस्पत्यं भारद्वाजं तृतीयकम् । अस्मिन्वंशे च ये जाताः ब्राह्मणा पूतमूर्तयः

आंगिरस, बार्हस्पत्य और भारद्वाज—ये तीन प्रवर हैं। इस वंश में जो ब्राह्मण जन्म लेते हैं, वे धर्म से परिशुद्ध, पवित्र स्वरूप वाले होते हैं।

Verse 260

अरोगिणः सदा देवाः सत्यव्रतपरायणाः

वे सदा निरोग रहते हैं, आचरण में देवतुल्य होते हैं और सत्य-व्रत में पूर्णतः परायण रहते हैं।

Verse 270

तस्मिन्गोत्रे द्विजा जाताः पूर्वोक्तगुणशालिनः

उस गोत्र में द्विज जन्म लेते हैं, जो पहले कहे गए गुणों से युक्त होते हैं—धर्मनिष्ठ और शुचि आचरण वाले।

Verse 280

कडोव्या नवमं चैव कोहाटोया दशमं तथा । हरडीयैकादशं चैव भदुकीया द्वादशं तथा

कडोव्या नौवीं कही गई है, और कोहाटोया दसवीं। हरडीयाँ ग्यारहवीं है तथा भदुकीयाँ बारहवीं मानी गई है।

Verse 290

शूद्रेषु जातिभेदः स्यात्कलौ प्राप्ते नराधिप । भ्रष्टाचाराः परं ज्ञात्वा ज्ञातिबंधेन पीडिताः

हे नराधिप! कलियुग के आने पर शूद्रों में जाति-भेद की अनेक शाखाएँ उत्पन्न होंगी। श्रेष्ठ को जानकर भी वे आचार से भ्रष्ट होकर, कुटुम्ब-बंधन के दबाव से पीड़ित होंगे।

Verse 300

स्वकर्मनिरताः शांताः कृषिकर्मपरायणाः । धर्मारण्यान्नातिदूरे धेनूः संचारयंति ते

वे अपने-अपने कर्म में रत, शांत और कृषि-कार्य में तत्पर रहते हैं। धर्मारण्य से अधिक दूर नहीं, वे अपनी धेनुओं को चराते-फिराते हैं।

Verse 310

वृत्तिं चक्रुर्ब्राह्मणास्तेऽ न्योन्यं मिश्रसमुद्भवाः । अन्यच्च श्रूयतां राजंस्त्रैविद्यानां द्विजन्मनाम्

वे ब्राह्मण परस्पर मिश्र-संबंधों से उत्पन्न होकर, आपस में ही अपनी जीविका का प्रबंध करने लगे। हे राजन्! त्रिवेदी द्विजों के विषय में और भी सुनिए।

Verse 320

यदि जीवति दैवाच्चेद्भ्रष्टाचारा भवेदिति

यदि दैववश वह जीवित रह जाए, तो वह आचार से भ्रष्ट हो जाता है—ऐसा कहा गया है।

Verse 326

एकादशसमा ये च बहिर्ग्रामे वसंति ते । एवं भेदाः समभवन्नाना मोढद्विजन्मनाम् । युगानुसारात्कालेन ज्ञातीनां च वृषस्य वा

जो ग्यारह वर्षों तक ग्राम के बाहर निवास करते थे—इस प्रकार मोढ द्विजों में अनेक भेद उत्पन्न हुए। युगों के क्रम के अनुसार समय बीतने पर ज्ञातियों में तथा वृष (वंश-शाखा) के विषय में भी भेद प्रकट हो गए।