Vayaviya Samhita41 Adhyayas2242 Shlokas

Uttara Bhaga

Uttarabhaga

Adhyayas in Uttara Bhaga

Adhyaya 1

विभूतिविस्तरप्रश्नः / Inquiry into the Expansion of Śiva’s Vibhūti

अध्याय 1 का आरम्भ शिव-वन्दना से होता है—गौरी के स्तनों के केसर-चिह्न से अंकित शिव-वक्ष का दिव्य चित्रण भक्ति और तत्त्व-चिन्तन स्थापित करता है। सूत कहते हैं कि उपमन्यु को शिव का अनुग्रह मिलने के बाद, मध्याह्न-व्रत से उठकर वायु नैमिषारण्य में ऋषियों की सभा में आते हैं। नित्यकर्म पूर्ण कर चुके मुनि उन्हें आते देखकर बीच में तैयार आसन पर बैठाते हैं। लोकवन्द्य वायु सुखपूर्वक बैठकर प्रभु की महिमा का स्मरण करते हुए सर्वज्ञ, अजेय महादेव की शरण लेते हैं और कहते हैं कि समस्त चर-अचर जगत् ही शिव की विभूति है। यह शुभ वचन सुनकर शुद्ध ऋषि ‘विभूति-विस्तार’ का विस्तृत वर्णन माँगते हैं और प्रश्न को उपमन्यु की तपस्या व पाशुपत-व्रत की सिद्धि तथा वासुदेव कृष्ण आदि दृष्टान्तों से जोड़ते हैं। इस प्रकार यह अध्याय कथा-भूमिका से आगे बढ़कर शिव-प्राकट्य और उसकी प्राप्ति के साधनों के व्यवस्थित विवेचन की माँग का सेतु बनता है।

27 verses

Adhyaya 2

पाशुपतज्ञानप्रश्नः — Inquiry into Pāśupata Knowledge (Paśu–Pāśa–Paśupati)

अध्याय 2 में ऋषि पाशुपत-ज्ञान तथा पाशुपति (शिव), पशु (बद्ध जीव) और पाश (बंधन) के तात्त्विक अर्थ स्पष्ट करने की प्रार्थना करते हैं। सूत वायु को योग्य वक्ता बताते हैं, जो पूर्व-प्रकाशन का आधार रखते हैं—मंदर पर्वत पर महादेव श्रीकण्ठ ने देवी को परम पाशुपत-ज्ञान उपदेश किया था। फिर वायु उस शिक्षा को आगे की कथा से जोड़ते हैं, जहाँ कृष्ण (कृष्ण-रूप विष्णु) विनयपूर्वक मुनि उपमन्यु के पास जाकर दिव्य ज्ञान और शिव की विभूति का पूर्ण विवेचन माँगते हैं। कृष्ण के प्रश्नों से सिद्धान्त-रचना स्पष्ट होती है—पाशुपति कौन, पशु कौन, किन पाशों से बँधे हैं और मुक्ति कैसे होती है। उपमन्यु शिव-देवी को प्रणाम कर उत्तर आरम्भ करते हैं, जिससे बंधन-मोक्ष पर आधारित शैव साधना का क्रम स्थापित होता है।

60 verses

Adhyaya 3

शिवस्य विश्वव्याप्तिः—अष्टमूर्तिः पञ्चब्रह्म च | Śiva’s Cosmic Pervasion: Aṣṭamūrti and the Pañcabrahma Forms

उपमन्यु कृष्ण को बताते हैं कि परमात्मा महेश/शिव अपनी ही मूर्तियों के द्वारा समस्त चराचर जगत में व्याप्त होकर उसे धारण करते हैं। यह अध्याय कहता है कि सारा विश्व शिव की अष्टमूर्ति में स्थित है, जैसे सूत्र में पिरोए हुए मणि। फिर प्रमुख शिव-रूपों का वर्णन करते हुए पंचब्रह्म तनुओं—ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव, सद्योजात—को सर्वव्यापक बताया गया है, जिनसे कुछ भी अव्याप्त नहीं रहता। ईशान क्षेत्रज्ञ/भोक्ता तत्त्व के, तत्पुरुष अव्यक्त तथा गुणमय भोग्यों के, अघोर बुद्धि-तत्त्व (धर्म आदि सहित) के, वामदेव अहंकार के, और सद्योजात मन के अधिष्ठाता हैं। आगे इन्द्रिय-करण-विषय-भूत के संबंध दिए हैं—श्रोत्र–वाक्–शब्द–व्योम, त्वक्–पाणि–स्पर्श–वायु, चक्षु–चरण–रूप–अग्नि, रसना–पायु–रस–आपः, घ्राण–उपस्थ–गन्ध–भू। अंत में इन मूर्तियों की कीर्ति और पूजनीयता को एकमात्र श्रेय-कारक कल्याण बताया गया है।

17 verses

Adhyaya 4

शिवशक्त्यैक्य-तत्त्वविचारः / Inquiry into the Unity of Śiva and Śakti (Para–Apara Ontology)

इस अध्याय में कृष्ण पूछते हैं कि परमतेजस्वी शर्व (शिव) की मूर्तियों से यह जगत् कैसे व्याप्त है और स्त्री–पुंभाव से युक्त संसार पर दिव्य दम्पति कैसे अधिष्ठान करते हैं। उपमन्यु कहते हैं कि शिव–शिवा की श्रीमद्-विभूति और याथात्म्य का संक्षेप ही कहा जा सकता है, विस्तार असंभव है। वे शक्ति को महादेवी और शिव को शक्तिमान बताकर कहते हैं कि चराचर जगत् उनकी विभूति का केवल लेश है। आगे चित्–अचित्, शुद्ध–अशुद्ध, पर–अपर का भेद बताकर समझाते हैं कि अचेतन से संयुक्त चेतना के कारण अपर/अशुद्ध पक्ष में संसार चलता है, फिर भी पर और अपर दोनों पर शिव–शिवा का स्वाभाविक स्वाम्य है। जगत् उनके अधीन है, वे जगत् के अधीन नहीं—यह उनकी सार्वभौम सत्ता है। चन्द्र और चाँदनी की तरह शिव–शक्ति की अभिन्नता प्रतिपादित होती है; शक्ति के बिना शिव का प्रकाश जगत् में प्रकट नहीं होता।

88 verses

Adhyaya 5

शिवस्य परापरब्रह्मस्वरूपनिर्णयः / Determination of Śiva as Higher and Lower Brahman

इस अध्याय में उपमन्यु बताते हैं कि चर-अचर समस्त जगत् देवदेव शिव का ही ‘विग्रह’ है, पर पाश-बन्धन की भारीता से बँधे जीव इसे नहीं पहचानते। एक ही तत्त्व को अनेक प्रकार से कहा जाता है—अविकल्प परम अवस्था को न जानने वाले मुनि भी भिन्न-भिन्न वचन करते हैं—इस एकता-बहुलता के तनाव का निरूपण होता है। अपर ब्रह्म को भूत-तत्त्व, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण और विषय-समूह के रूप में, तथा पर ब्रह्म को शुद्ध चिदात्मा चेतना के रूप में बताया गया है। ‘ब्रह्म’ शब्द की व्युत्पत्ति (बृहत्त्व/बृंहणत्व) देकर कहा गया कि दोनों ही रूप ब्रह्माधिपति भगवान् शिव के ही हैं। आगे जगत् को विद्या-अविद्या की रचना कहा गया—विद्या सत्य-संगत चेतन ज्ञान, अविद्या अचेतन मिथ्या-ग्रहण; भ्रान्ति और यथार्थ-संवित्ति का भेद दिखाकर निष्कर्ष है कि सत्-असत् दोनों के स्वामी शिव ही इन द्वयों और उनके ज्ञान-फलों के अधिपति हैं।

37 verses

Adhyaya 6

Śiva’s Freedom from Bondage and His Cosmic Support (शिवस्य अबन्धत्वं तथा सर्वाधिष्ठानत्वम्)

इस अध्याय में उपमन्यु सिद्धान्तरूप से बताते हैं कि शिव किसी भी प्रकार के बन्धन के अधीन नहीं हैं—आणव, मायीय, प्राकृत, ज्ञान‑मानसिक, इन्द्रिय, भूत तथा तन्मात्रा आदि। काल, कला, विद्या, नियति, राग‑द्वेष, कर्म, उसका विपाक तथा सुख‑दुःख भी उन्हें बाँध नहीं सकते। मित्र‑शत्रु, नियन्ता‑प्रेरक, स्वामी‑गुरु‑रक्षक जैसे सम्बन्धात्मक विशेषण भी उन पर लागू नहीं होते; वे सर्वथा निरपेक्ष हैं। अंत में प्रतिपादित है कि परमात्मा शिव सर्वमंगल हैं, अपनी शक्तियों से अपने स्वरूप में स्थित रहकर समस्त जगत के अडिग अधिष्ठान हैं, इसलिए ‘स्थाणु’ कहलाते हैं।

31 verses

Adhyaya 7

शक्तितत्त्ववर्णनम् / Exposition of the Principle of Śakti

इस अध्याय में उपमन्यु शिव की स्वाभाविकी शक्ति का तात्त्विक निरूपण करते हैं। वह सर्वव्यापी, सूक्ष्म और आनन्द-चैतन्यमयी है, जो सूर्यकिरणों की भाँति एक होकर भी अनेक रूपों में प्रकट होती है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया—इन शक्तियों के असंख्य भेद बताए गए हैं तथा अग्नि की चिंगारियों की तरह उसके प्रस्फुटन से तत्त्वों की उत्पत्ति कही गई है। विद्या-अविद्या के अधिपति, पुरुष और प्रकृति उसी के क्षेत्र में स्थित हैं; महत् आदि समस्त विकार उसके कार्य हैं। शिव ‘शक्तिमान’ हैं और शक्ति वेद-श्रुति-स्मृति, ज्ञान, धृति तथा जानने-चाहने-करने की सामर्थ्य का आधार है। माया, जीव, विकृति तथा सत्-असत् का समस्त विस्तार उसी से व्याप्त है; उसकी लीला मोहित भी करती है और मुक्त भी। उसके सहित सर्वेश का जगत में (यहाँ) सत्ताईस प्रकार से व्याप्त होना और इस बोध से मोक्ष का होना प्रतिपादित है।

40 verses

Adhyaya 8

शिवज्ञान-प्रश्नः तथा सृष्टौ शिवस्य स्वयमाविर्भावः (Inquiry into Śiva-knowledge and Śiva’s self-manifestation in creation)

इस अध्याय में कृष्ण शिव-प्रदत्त ‘वेदसार’ का यथार्थ वर्णन माँगते हैं, जो शरणागतों को मोक्ष देता है। यह तत्त्व गूढ़, बहुस्तरीय और अभक्त अथवा अयोग्य के लिए अप्राप्य बताया गया है। फिर कृष्ण पूछते हैं कि इस उपदेश के अनुसार पूजा-विधि कैसी हो, अधिकार किसे है, तथा ज्ञान और योग का मार्ग से क्या संबंध है। उपमन्यु वेदाभिप्राय के अनुरूप संक्षिप्त शैव-सूत्र बताते हैं, जो स्तुति-निन्दा से रहित और शीघ्र निश्चय कराने वाला है; उसका पूर्ण विस्तार असंभव कहकर वे सार रूप में कहते हैं। आगे सृष्टि-प्रसंग में, प्राकट्य से पूर्व शिव (स्थाणु/महेश्वर) कारण-शक्ति सहित स्वयं प्रकट होकर प्रभु रूप धारण करते हैं और फिर देवों में प्रथम ब्रह्मा को उत्पन्न करते हैं। ब्रह्मा अपने दिव्य जनक को देखते हैं और शिव उत्पन्न ब्रह्मा को—इस परस्पर दर्शन से यह स्थापित होता है कि सृजन-शक्ति शिव के पूर्व स्वयम्-प्रकाश से प्रवाहित होती है।

49 verses

Adhyaya 9

योगाचार्यरूपेण शर्वावताराः (Śarva’s manifestations as Yoga-Teachers)

अध्याय 9 में कृष्ण उपमन्यु से शर्व (शिव) के विषय में पूछते हैं कि युगों के परिवर्तन में शिव योग-आचार्य के छल-रूप में अवतार लेकर शिष्यों की स्थापना भी करते हैं। उपमन्यु वाराहकल्प के, विशेषतः सातवें मन्वन्तर में, युग-क्रम के अनुसार अट्ठाईस योगाचार्यों का वर्णन करते हैं। फिर कहा जाता है कि प्रत्येक आचार्य के चार शान्तचित्त शिष्य होते हैं और श्वेत से आरम्भ करके श्वेताश्व, श्वेतलोहित, विकोष/विकेश तथा सनत्कुमार-समूह आदि नाम-समूहों सहित शिष्यों की क्रमबद्ध सूची दी जाती है। यह अध्याय शैव योग-परम्परा की वंशावली-प्रधान, सूचीबद्ध पुराणीय निर्देशिका के रूप में प्रस्तुत है।

28 verses

Adhyaya 10

श्रद्धामाहात्म्यं तथा देवीप्रश्नः (The Greatness of Śraddhā and Devī’s Question to Śiva)

इस अध्याय में कृष्ण उपमन्यु को शिव-ज्ञान के परम ज्ञाता कहकर प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि शिव-ज्ञान का ‘अमृत’ चखकर भी तृप्ति नहीं होती। उपमन्यु मन्दर पर्वत पर महादेव के साथ देवी के ध्यानमय, अंतरंग आसन का वर्णन करते हैं, जहाँ देवियाँ और गण उपस्थित हैं। उचित समय देखकर देवी पूछती हैं—जो मनुष्य अल्पबुद्धि हैं और आत्मतत्त्व में स्थित नहीं, वे किस उपाय से महादेव को प्रसन्न कर सकते हैं? ईश्वर उत्तर देते हैं कि कर्मकाण्ड, तप, जप, आसन-योग या केवल तात्त्विक ज्ञान—श्रद्धा के बिना सब निष्फल हैं; श्रद्धा ही प्रधान साधन है। श्रद्धा अपने स्वधर्म के पालन से, विशेषतः वर्णाश्रम-नियमों से, बढ़ती और सुरक्षित रहती है। इस प्रकार आचार-निष्ठा से स्थिर श्रद्धा शिव की कृपा को सुलभ बनाती है—शिव दर्शन, स्पर्श, पूजा और संवाद के योग्य हो जाते हैं।

38 verses

Adhyaya 11

भक्ताधिकारि-द्विजधर्म-योगिलक्षणवर्णनम् / Duties of Qualified Devotees and Marks of Yogins

शिव देवी से कहते हैं कि वे वर्ण-धर्म तथा योग्य भक्तों और विद्वान द्विज साधकों के आचार का संक्षेप बताएँगे। त्रिकाल स्नान, अग्निकार्य, क्रम से लिंग-पूजन, दान-दया-ईश्वरभाव और सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा-सत्य आदि संयम बताए गए हैं। अध्ययन- अध्यापन-व्याख्या, ब्रह्मचर्य, श्रवण, तप, क्षमा और शौच का विधान है; शिखा, उपवीत, उष्णीष, उत्तरीय धारण, भस्म-रुद्राक्ष धारण तथा पर्वों में, विशेषकर चतुर्दशी को, विशेष पूजा का निर्देश है। आहार-शुद्धि में ब्रह्मकूर्च आदि नियत सेवन और बासी/अशुद्ध अन्न, कुछ धान्य, मद्य तथा उसके गंध तक का त्याग कहा गया है। आगे योगी के लक्षण—क्षमा, शांति, संतोष, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, शिव-ज्ञान, वैराग्य, भस्म-सेवन और सर्वासक्ति-निवृत्ति—तथा दिन में भिक्षा-आहार जैसे कठोर व्रत संक्षेप में बताए गए हैं; इस प्रकार यह अध्याय बाह्य आचार, नैतिक शुद्धि और योगिक विरक्ति को जोड़कर शैव आचार-संहिता प्रस्तुत करता है।

56 verses

Adhyaya 12

पञ्चाक्षर-षडक्षरमन्त्र-माहात्म्यम् | The Greatness of the Pañcākṣara/Ṣaḍakṣara Mantra

अध्याय 12 में श्रीकृष्ण उपमन्यु से पञ्चाक्षर मन्त्र की महिमा का तत्त्वतः वर्णन पूछते हैं। उपमन्यु कहते हैं कि उसका विस्तार दीर्घ काल में भी अपरिमेय है, इसलिए वे संक्षेप में उपदेश देते हैं। यह मन्त्र वेद और शिवागम—दोनों में प्रमाणित है, शिवभक्तों के लिए पूर्ण साधन है और सभी पुरुषार्थों को सिद्ध करता है। अक्षरों में छोटा होकर भी अर्थ में महान—वेदसार, मोक्षप्रद, निश्चयात्मक और स्वयं शिवस्वरूप बताया गया है। यह दिव्य, सिद्धिदायक, प्राणियों के मन को आकर्षित करने वाला, गूढ़ और निर्विवाद है। मन्त्र-रूप ‘नमः शिवाय’ को आद्य सूत्र कहा गया है। ‘ॐ’ एकाक्षर को शिव की सर्वव्यापक सत्ता से जोड़ा गया है तथा ईशान आदि पञ्चब्रह्म-तत्त्वों से संबद्ध सूक्ष्म एकाक्षर-तत्त्व मन्त्र-क्रम में प्रतिष्ठित बताए गए हैं। इस प्रकार वाच्य-वाचक भाव से सूक्ष्म षडक्षर में पञ्चब्रह्मतनु शिव ही मन्त्र भी हैं और अर्थ भी।

38 verses

Adhyaya 13

पञ्चाक्षरीविद्यायाḥ कलियुगे मोक्षोपायः | The Pañcākṣarī Vidyā as a Means of Liberation in Kali Yuga

इस अध्याय में देवी कलियुग की स्थिति बताती हैं—काल कलुषित है, जीतना कठिन है, धर्म उपेक्षित है, वर्णाश्रम-आचार क्षीण हो गया है, समाज-धर्म में संकट है और गुरु–शिष्य परंपरा टूट रही है। वे पूछती हैं कि ऐसे बंधनों में शिवभक्त कैसे मुक्त हों। ईश्वर उत्तर देते हैं कि उनकी ‘परमा विद्या’—हृदय को आनंद देने वाली पञ्चाक्षरी—पर आश्रय ही उपाय है; भक्ति से अंतःकरण जिनका ढलता है वे कलि में भी मोक्ष पाते हैं। फिर मन-वाणी-काया के दोषों से मलिन, कर्म के अयोग्य और ‘पतित’ जनों के विषय में शंका उठती है कि क्या उनका कर्म नरक ही देगा। शिव अपनी प्रतिज्ञा दोहराकर रहस्य बताते हैं—मंत्र सहित उनकी पूजा (समंत्रक-पूजा) निर्णायक उद्धारक साधन है; पतित भक्त भी इस विद्या से मुक्त हो सकता है।

60 verses

Adhyaya 14

मन्त्रसिद्ध्यर्थं गुरुपूजा–आज्ञा–पौरश्चर्यविधिः / Guru-Authorization, Offerings, and Puraścaraṇa for Mantra-Siddhi

इस अध्याय में मंत्र-सिद्धि के लिए शैव विधि बताई गई है। ईश्वर कहते हैं कि गुरु की आज्ञा, विधिपूर्वक क्रिया, श्रद्धा और अपेक्षित दक्षिणा/अर्पण के बिना किया गया जप निष्फल होता है। शिष्य को तत्त्ववेत्ता, सद्गुणसम्पन्न और तपोनिष्ठ गुरु/आचार्य के पास जाकर भावशुद्धि के साथ वाणी, मन, शरीर और धन से सेवा करनी चाहिए; यथाशक्ति दीर्घकाल तक गुरु-पूजा और दान करे तथा वित्त-शाठ्य (धन में छल) से बचे। गुरु के प्रसन्न होने पर स्नान, मंत्र-शुद्ध जल और मंगल द्रव्यों से शुद्धि कर, उचित अलंकरण सहित, पवित्र स्थान (नदी/समुद्र तट, गोशाला, मंदिर या शुद्ध गृह) में दोषरहित तिथि-नक्षत्र-योग पर अनुष्ठान कराया जाता है। तब गुरु शुद्ध स्वर-उच्चारण से ‘परम मंत्र’ देकर आज्ञा प्रदान करते हैं। मंत्र और आज्ञा पाकर शिष्य पुरश्चरण की नियत संख्या और संयमित आहार-विहार सहित नियमित जप करता है। पुरश्चरण पूर्ण कर नित्य जप बनाए रखने वाला, शिव और गुरु के अंतःस्मरण में स्थित होकर सिद्ध होता है और सिद्धि प्रदान करने में समर्थ बनता है।

39 verses

Adhyaya 15

शिवसंस्कार-दीक्षानिरूपणम् (Śivasaṃskāra and the Typology of Dīkṣā)

इस अध्याय में श्रीकृष्ण, मन्त्र के माहात्म्य और प्रयोग के उपदेश के बाद “शिवसंस्कार” का स्पष्ट विवरण पूछते हैं। उपमन्यु बताते हैं कि संस्कार वह विधि है जो व्यक्ति को पूजा आदि साधनों का अधिकार देती है; यह षडध्व की शुद्धि, ज्ञान-प्रदान और पाश-बन्धन के क्षय का कारण है, इसलिए इसे दीक्षा भी कहते हैं। शिवागम की भाषा में दीक्षा तीन प्रकार की है—शाम्भवी, शाक्ती और मान्त्री। शाम्भवी गुरु-प्रसाद से क्षणमात्र में फल देने वाली है, जो केवल दृष्टि, स्पर्श या वाणी से भी सम्पन्न हो सकती है; यह तीव्रा और तीव्रतरा—दो भेदों में पाश-क्षय के अनुसार कही गई है: तीव्रतरा से तत्काल शान्ति/मोक्ष, और तीव्रा से जीवनभर क्रमशः शुद्धि होती है। शाक्ती दीक्षा गुरु के योगोपाय और ज्ञान-चक्षु द्वारा शक्ति के अवतरण से शिष्य-देह में प्रवेश कर ज्ञान प्रदान करती है; आगे मान्त्री दीक्षा आदि का संकेत है।

74 verses

Adhyaya 16

समयाह्वय-संस्कारः — Rite of ‘Samayāhvaya’ and the Preparatory Layout (Maṇḍapa, Vedi, Kuṇḍas, Maṇḍala, Śiva-kumbha)

अध्याय 16 में उपमन्यु शुभ दिन और शुद्ध, निर्दोष स्थान में किए जाने वाले प्रारम्भिक ‘समयाह्वय-संस्कार’ का विधान बताते हैं। फिर गंध, रंग, स्वाद आदि लक्षणों से भूमि-परीक्षा कर शिल्प-शास्त्रानुसार मण्डप निर्माण, वेदी-स्थापन और अष्टदिक् के अनुसार अनेक कुण्डों की व्यवस्था कही गई है, जिसमें ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा की क्रम-रचना विशेष है; पश्चिम में प्रधान कुण्ड का वैकल्पिक स्थान भी बताया गया है। वेदी को छत्र, ध्वज, मालाओं से सजाकर मध्य में रंगीन चूर्णों से शुभ मण्डल बनाया जाता है—समर्थों के लिए स्वर्ण/अरुण चूर्ण, और निर्धनों के लिए सिन्दूर, शालि/निवार चूर्ण आदि विकल्प। कमल-मण्डल के प्रमाण (एक/दो हाथ), कर्णिका, केसर और दलों के माप तथा ईशान भाग में विशेष अलंकरण निर्दिष्ट हैं। अंत में धान्य, तिल, पुष्प और कुश बिखेरकर लक्षणयुक्त शिव-कुम्भ तैयार किया जाता है, जिससे आगे के आवाहनादि कर्मों का आरम्भ होता है।

78 verses

Adhyaya 17

षडध्व-शुद्धिः (Purification of the Six Adhvans / Sixfold Cosmic Path)

अध्याय 17 में उपमन्यु कहते हैं कि गुरु शिष्य की योग्यता/अधिकार की परीक्षा करके, सर्व-बन्ध-विमुक्ति हेतु षडध्व-शुद्धि कराए या सिखाए। फिर छह अध्वों—कला, तत्त्व, भुवन, वर्ण, पद और मन्त्र—को सृष्टि-प्रकटीकरण के क्रमबद्ध पथ के रूप में संक्षेप में बताया गया है। निवृत्ति आदि पाँच कलाओं का वर्णन कर यह कहा गया है कि शेष पाँच अध्व इन्हीं कलाओं से व्याप्त हैं। तत्त्वाध्व को शिव-तत्त्व से भूमि तक 26 तत्त्वों की शृंखला मानकर शुद्ध, अशुद्ध और मिश्र भेद से समझाया गया है। भुवनाध्व आधार से उन्मना तक (उपभेदों को छोड़कर) साठ का कहा गया है। वर्णाध्व पचास रुद्र-रूप अक्षरों का, पदाध्व अनेक भेदों वाला, और मन्त्राध्व परम विद्या से व्याप्त बताया गया है। दृष्टान्त दिया है कि जैसे तत्त्वों के स्वामी शिव तत्त्वों में गिने नहीं जाते, वैसे ही मन्त्र-नायक मन्त्राध्व में नहीं गिने जाते। अंत में कहा है कि व्यापक–व्याप्य के तर्क सहित षडध्व का यथार्थ ज्ञान बिना अध्व-शोधन का अधिकारी नहीं बनता; इसलिए साधना से पहले अध्वों का स्वरूप और उनकी व्याप्ति-रचना समझनी चाहिए।

45 verses

Adhyaya 18

Maṇḍala–Pūjā–Homa Krama (Maṇḍala Worship and Homa Sequence for the Disciple)

अध्याय 18 में आचार्य के आदेश से होने वाली मण्डल-पूजा और होम की सुव्यवस्थित विधि बताई गई है। स्नान आदि शुद्धि के बाद शिष्य हाथ जोड़कर ध्यानपूर्वक शिव-मण्डल के पास जाता है। गुरु नेत्रबन्धन तक मण्डल का प्रकाशन करते हैं; फिर शिष्य पुष्पावकीरण करता है और जहाँ फूल गिरते हैं, उसी संकेत से गुरु शिष्य का नाम/नियोजन निर्धारित करते हैं। इसके बाद शिष्य को निर्माल्य-मण्डल में ले जाकर ईशान (शिव) की पूजा कराई जाती है और शिवानल में आहुतियाँ दी जाती हैं। अशुभ स्वप्न होने पर दोष-शान्ति हेतु मूलविद्या से 100, 50 या 25 आहुतियों का विधान है। शिखा पर सूत्र बाँधना, निवृत्ति-कला से सम्बद्ध आधार-पूजा, वागीश्वरी-पूजन तथा होम-प्रधान क्रम का वर्णन है। गुरु की ‘योजना’ और अनुमत मुद्राओं से शिष्य को सर्व-योनि में एक साथ अधिकार/प्रवेश का भाव प्राप्त होता है; यह अध्याय मन्त्र, मुद्रा और अग्नि द्वारा शुद्धि, नियोजन और आध्यात्मिक एकीकरण का प्रक्रियात्मक मार्गदर्शक है।

62 verses

Adhyaya 19

साधक-दीक्षा तथा मन्त्रसाधन (Puraścaraṇa and the Discipline of the Mantra-Sādhaka)

इस अध्याय में गुरु द्वारा योग्य साधक की स्थापना और शैव विद्या/मन्त्र की दीक्षा-विधि का क्रम बताया गया है। उपमन्यु मण्डल-पूजन, कुम्भ-स्थापन, होम, शिष्य की स्थिति तथा पूर्वकर्मों की पूर्ति को पूर्वोक्त क्रम से वर्णित करते हैं। गुरु अभिषेक करके ‘परम मन्त्र’ प्रदान करता है और पुष्पाम्बु से शिष्य के कर में शैव-विद्या का स्पर्शपूर्वक हस्तान्तरण कर विद्योپदेश पूर्ण करता है। मन्त्र को परमेṣ्ठिन् (शिव) की कृपा से इह-पर सिद्धि देने वाला कहा गया है। शिव की अनुमति पाकर गुरु साधना और शिव-योग सिखाता है; शिष्य विनियोग का ध्यान रखते हुए मन्त्र-साधन करता है, जिसे मूलमन्त्र का पुरश्चरण कहा गया है। मुमुक्षु के लिए अत्यधिक कर्मकाण्डीय श्रम अनिवार्य नहीं, फिर भी उसका अनुष्ठान शुभ माना गया है।

27 verses

Adhyaya 20

शिवाचार्याभिषेकविधिः / Rite of Consecrating a Śiva-Teacher (Śivācārya Abhiṣeka)

अध्याय 20 में संस्कारों से शुद्ध तथा पाशुपत-व्रत का पालन करने वाले योग्य शिष्य को विधिपूर्वक शिवाचार्य पद पर प्रतिष्ठित करने का अभिषेक-क्रम बताया गया है। पूर्वोक्त विधि से मण्डल बनाकर परमेश्वर की पूजा की जाती है। पाँच कलश दिशाओं और मध्य में स्थापित होते हैं—पूर्व/अग्र में निवृत्ति, पश्चिम में प्रतिष्ठा, दक्षिण में विद्या, उत्तर में शान्ति और मध्य में परा—इन शक्तियों/स्तरों का विन्यास करके। रक्षाकर्म, धैनवी मुद्रा, मंत्रों से कलश-संस्कार, आहुतियाँ और अंत में पूर्णाहुति की जाती है। शिष्य को सिर खुला रखकर मण्डल में प्रवेश कराया जाता है और मंत्र-तर्पण आदि पूर्वाङ्ग पूरे होते हैं। फिर आचार्य शिष्य को आसन पर बैठाकर अभिषेक करता है, सकलीकरण करके पंचकला-रूप का बंधन/प्रकाशन करता है और शिष्य को शिव को समर्पित करता है। निवृत्ति-कलश से क्रमशः अभिषेक के बाद आचार्य ‘शिव-हस्त’ शिष्य के मस्तक पर रखकर उसे शिवाचार्य के रूप में नियुक्त करता है। आगे पूजन, 108 आहुतियों का होम और अंत में पूर्णाहुति से समापन बताया गया है।

30 verses

Adhyaya 21

शिवाश्रम-नित्यनैमित्तिककर्मविधिः / Śaiva Āśrama-Duties: Daily and Occasional Rites (Morning Purity & Bath Procedure)

अध्याय 21 में कृष्ण शिव-शास्त्र के अनुसार शैवाश्रम साधक के नित्य और नैमित्तिक कर्मों का स्पष्ट विधान पूछते हैं। उपमन्यु प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर अम्बा (शक्ति) सहित शिव का ध्यान, फिर एकान्त में आवश्यक शारीरिक क्रियाएँ करने की विधि बताते हैं। शौच, दन्तधावन तथा दन्तकाष्ठ न मिलने या कुछ तिथियों में निषेध होने पर विकल्प, और बार-बार जल से कुल्ला करके मुख-शुद्धि का निर्देश दिया गया है। नदी, तालाब, सरोवर या घर में ‘वारुण स्नान’ की प्रक्रिया—स्नान-द्रव्य, बाह्य अशुद्धि हटाना, मृदा से शुद्धि, स्नान के बाद की स्वच्छता—विस्तार से कही गई है। शुद्ध वस्त्र धारण और पुनः शुद्धि पर बल है; ब्रह्मचारी, तपस्वी, विधवा आदि के लिए सुगन्धित स्नान व अलंकरण-सदृश आचरण वर्जित बताए गए हैं। उपवीत व शिखा बाँधकर अवगाहन, आचमन, जल में त्रिमण्डल स्थापना, निमग्न होकर मन्त्र-जप व शिव-स्मरण, और अंत में पवित्र जल से आत्माभिषेक—इस प्रकार दैनिक देहचर्या को मन्त्र-केन्द्रित शैव साधना बनाया गया है।

43 verses

Adhyaya 22

न्यासत्रैविध्य-भूतशुद्धि-प्रक्रिया (Threefold Nyāsa and the Procedure of Elemental Purification)

अध्याय 22 में उपमन्यु तीन प्रकार के न्यास का विधान बताते हैं—स्थिति (स्थिरीकरण), उत्पत्ति (प्राकट्य) और संहृति (लय), जो सृष्टि-प्रक्रिया के अनुरूप है। पहले आश्रमानुसार (गृहस्थ, ब्रह्मचारी, यति, वानप्रस्थ) न्यास-भेद बताए गए हैं, फिर स्थिति-न्यास और उत्पत्ति-न्यास की दिशा/क्रम-व्यवस्था तथा संहृति में उलटा क्रम समझाया गया है। आगे वर्णों में बिंदु सहित न्यास, उँगलियों व हथेलियों में शिव-प्रतिष्ठा, दस दिशाओं में अस्त्रन्यास और पंचभूत-रूप पंच कलाओं का ध्यान आता है। इन्हें सूक्ष्म देह के केंद्रों—हृदय, कंठ, तालु, भ्रूमध्य, ब्रह्मरंध्र—में स्थापित कर बीजों से ग्रंथन किया जाता है और पंचाक्षरी विद्या के जप से शुद्धि होती है। फिर प्राण-निग्रह, अस्त्र-मुद्रा से भूतग्रंथि-छेदन, सुषुम्ना से आत्मा का ब्रह्मरंध्र से निर्गमन और शिव-तेज में एकत्व बताया गया है। वायु से शोषण, कालाग्नि से दाह, कलाओं का लय और अमृत-प्लावन द्वारा विद्या-मय देह का पुनर्निर्माण होता है। अंत में करन्यास, देहन्यास, अंगन्यास, संधियों पर वर्णन्यास, षडंगन्यास, दिग्बंध तथा संक्षिप्त विकल्प भी दिए हैं। लक्ष्य देह-आत्म-शोधन से शिवभाव प्राप्त कर परमेश्वर की शुद्ध पूजा-योग्यता है।

32 verses

Adhyaya 23

पूजाविधान-व्याख्या (Pūjāvidhāna-vyākhyā) — Exposition of the Procedure of Worship

अध्याय 23 में उपमन्यु, शिव द्वारा स्वयं शिवा को उपदिष्ट पूजाविधान का संक्षिप्त विवेचन करते हैं। साधक पहले आभ्यंतर-याग पूर्ण करता है, इच्छानुसार होम आदि अग्निकर्म जोड़कर, फिर बाह्य-याग में प्रवृत्त होता है। मन की व्यवस्था, पूजाद्रव्यों की शुद्धि, ध्याना के बाद विघ्ननाश हेतु विनायक का विधिवत पूजन बताया गया है। तत्पश्चात दक्षिण-उत्तर में स्थित नन्दीश और सुयशस् आदि परिचरों का मानसिक सम्मान कर, सिंहासन/योगासन अथवा ‘त्रि-तत्त्व’ से युक्त शुद्ध कमलासन की रचना की जाती है। उसी आसन पर साम्ब शिव का विस्तृत ध्यान—अतुल, अलंकृत, चतुर्भुज, त्रिनेत्र, नीलकण्ठ-प्रभ, सर्पाभरणयुक्त; वरद-अभय मुद्रा तथा मृग और टङ्क धारण करने वाला—निर्दिष्ट है। अंत में शिव के वामभाग में स्थित माहेश्वरी का चिंतन कर, शिव–शक्ति युगल-तत्त्व को पूजाक्रम में प्रतिष्ठित किया गया है।

23 verses

Adhyaya 24

पूजास्थानशुद्धिः पात्रशोधनं च — Purification of the Worship-Space and Preparation of Ritual Vessels

इस अध्याय में उपमन्यु शिव-पूजा के लिए पूजास्थान और पात्रों की शुद्धि का क्रम बताते हैं। मूल-मंत्र से जल छिड़ककर स्थान पवित्र किया जाता है और चन्दन-गन्धयुक्त जल से भीगे पुष्प रखे जाते हैं। अस्त्र-मंत्र से विघ्नों का नाश, फिर अवगुण्ठन और वर्म-बंधन करके दिशाओं में अस्त्र-विन्यास से पूजा-क्षेत्र की रक्षा की जाती है। इसके बाद दर्भ बिछाकर प्रोक्षण आदि से शौच, सभी पात्रों का शोधन और द्रव्य-शुद्धि कही गई है। प्रोक्षणी, अर्घ्य, पाद्य और आचमनीय—इन चार पात्रों को धोकर, छिड़ककर ‘शिव-जल’ से संस्कारित करने का विधान है। पात्रों में धातु-रत्न, सुगन्ध, पुष्प, अन्न, पत्र और दर्भ जैसे शुभ द्रव्य डालने तथा कार्यानुसार मिश्रण बताये हैं—स्नान/पान के जल में शीतल सुगन्ध, पाद्य में उशीरा-चन्दन, एला-कर्पूर आदि चूर्ण; और अर्घ्य में कुशाग्र, अक्षत, जौ/गेहूँ/तिल, घृत, सरसों, पुष्प तथा भस्म। इस प्रकार स्थान→रक्षा→पात्र→जल→उपहार की क्रमबद्ध पवित्रता से पूजा की सिद्धि सुनिश्चित होती है।

72 verses

Adhyaya 25

आवरणपूजाविधानम् / The Procedure of Āvaraṇa (Enclosure) Worship

इस अध्याय में उपमन्यु पूर्वोक्त पूजाविधि का एक तकनीकी पूरक बताते हैं—हविस्-आहुति, दीपदान और नीराजन के संदर्भ में आवरण-अर्चना कब और कैसे करनी है। शिव–शिवा को केंद्र में रखकर वलयाकार (आवरण) पूजा का क्रम दिया गया है, जिसमें प्रथम आवरण में मंत्रजप से आरम्भ होकर दिशाओं में क्रमशः विस्तार होता है। ऐशान्य, पूर्व, दक्षिण, उत्तर, पश्चिम, आग्नेय आदि दिशाक्रम का वर्णन है तथा ‘गर्भ-आवरण’ को मंत्रसमूह रूप में अंतःस्थ आवरण कहा गया है। बाह्य आवरण में इन्द्र(शक्र), यम, वरुण, कुबेर(धनद), अग्नि(अनल), नैऋति, वायु/मारुत आदि लोकपालों और शक्तियों की स्थापना-पूजा बताई गई है। अंजलिबद्ध होकर सुखासन में बैठकर ‘नमः’ मंत्रों से प्रत्येक देवता का आवाहन कर पूजन करने की विधि दी गई है। यह अध्याय शिव-शक्ति के चारों ओर ब्रह्माण्डीय व्यवस्था को क्रमबद्ध पूजा-मानचित्र में रूपान्तरित करता है।

65 verses

Adhyaya 26

पञ्चाक्षरमाहात्म्यम् / The Greatness of the Pañcākṣarī (Five-Syllable) Mantra

अध्याय 26 में उपमन्यु उपदेश देते हैं कि अन्य तप या यज्ञ-मार्गों से बढ़कर शिव-मंत्र-भक्ति है। आरम्भ में ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी, गुरु-शय्या का अपराध, माता-पिता वध, वीर या भ्रूण-हत्या जैसे घोर पाप गिनाए गए हैं। फिर कहा गया है कि परमकारण शिव की पञ्चाक्षरी मंत्र से आराधना करने पर इन पापों का क्रमशः क्षय होता है और बारह वर्षों की चरणबद्ध शुद्धि से मुक्ति का मार्ग खुलता है। एकान्त शिव-भक्ति, इन्द्रिय-निग्रह और भिक्षा आदि से संयमित जीवन—यह ‘पतित’ माने गए व्यक्ति के लिए भी पर्याप्त है। केवल जल-व्रत, वायु-आहार आदि कठोर तप अपने आप शिवलोक नहीं दिलाते; पर पञ्चाक्षरी-भक्ति से किया गया एक बार का पूजन भी मंत्र-गौरव से शिवधाम पहुँचा देता है। तप और यज्ञ, चाहे समस्त धन दक्षिणा में दे दिया जाए, शिव-मूर्ति-पूजा के समान नहीं; पञ्चाक्षर से पूजने वाला भक्त बंधन में हो या बाद में छूटे, निःसंदेह मुक्त होता है। रुद्र/अरुद्र स्तोत्र, षडक्षर, सूक्त-मंत्र आदि रूपों का उल्लेख है, पर निर्णायक तत्व शिव-भक्ति ही है।

35 verses

Adhyaya 27

अग्निकार्य-होमविधिः (Agnikārya and Homa Procedure)

अध्याय 27 में उपमन्यु अग्निकार्य और होम-विधि का क्रमबद्ध वर्णन करते हैं। कुंड, स्थण्डिल, वेदी या लोहे/नव-शुभ मृद्भांड में उचित स्थान पर अग्नि की स्थापना, संस्कारों द्वारा शुद्धि करके महादेव का पूजन, और फिर होम-आहुतियाँ देने की विधि बताई गई है। कुंड के प्रमाण (एक-दो हस्त आदि), वृत्त या चतुरस्र आकार, वेदी-मंडल की रचना, मध्य में अष्टदल कमल, तथा अङ्गुल-प्रमाण (24 अङ्गुल = एक कर/हस्त) का निर्देश मिलता है। एक से तीन मेखलाएँ, सुस्थिर व सुशोभित मृण्मय निर्माण, योनिरूपों के विकल्प, दिशा-स्थापन, कुंड/वेदी पर गोमय-जल लेपन और मंडल की गोमय-जल से शुद्धि भी कही गई है। यह अध्याय महादेव-केंद्रित शैव होम का विधि-नक्शा प्रस्तुत करता है।

74 verses

Adhyaya 28

नैमित्तिकविधिक्रमः (Occasional Rites and Their Procedure)

अध्याय 28 में उपमन्यु शिव-आश्रम के अनुयायियों के लिए नैमित्तिक व्रतों और कर्मों की विधि बतलाते हैं, जो शिवशास्त्र-प्रमाणित मार्ग पर आधारित है। मासिक व पाक्षिक क्रम में अष्टमी, चतुर्दशी और पर्व-तिथियों पर, तथा अयन-परिवर्तन, विषुव और ग्रहण जैसे विशेष कालों में पूजन की वृद्धि का विधान है। प्रतिमास ब्रह्मकूर्च बनाकर उससे शिव का अभिषेक, उपवास, और शेष का सेवन—इसे ब्रह्महत्या आदि भारी दोषों के लिए भी श्रेष्ठ प्रायश्चित्त कहा गया है। आगे मास-नक्षत्रानुसार कर्म व दान: पौष में पुष्य पर नीराजन, माघ में मघा पर घृत-कंबल दान, फाल्गुन के अंत में महोत्सव आरम्भ, चैत्र की चित्रा पूर्णिमा पर दोला-विधि, वैशाख में विशाखा पर पुष्पोत्सव, ज्येष्ठ में मूला पर शीतल जलघट दान, आषाढ़ में उत्तराषाढ़ा पर पवित्रारोपण, श्रावण में मंडल-सज्जा, तथा आगे निर्दिष्ट नक्षत्रों पर जलक्रीड़ा/प्रोक्षण आदि। यह अध्याय व्रत, पूजा, दान और उत्सवों का एक पवित्र पंचांग-रूप खाका प्रस्तुत करता है।

35 verses

Adhyaya 29

काम्यकर्मविभागः — Taxonomy of Kāmya (Desire-Motivated) Śaiva Rites

अध्याय 29 में श्रीकृष्ण उपमन्यु से पूछते हैं कि शिवधर्म के अधिकारी नित्य‑नैमित्तिक कर्तव्यों के अतिरिक्त क्या काम्य‑कर्म भी करते हैं। उपमन्यु फल को ऐहिक, आमुष्मिक और उभय रूप में बाँटकर साधना के प्रकार बताते हैं—क्रियामय, तपोमय, जप‑ध्यानमय और सर्वमय; तथा क्रिया में होम, दान, अर्चन आदि की क्रमबद्ध विधियाँ। वे कहते हैं कि कर्म का पूर्ण फल मुख्यतः शक्तिसंपन्न को मिलता है, क्योंकि शक्ति परमात्मा शिव की आज्ञा/अनुज्ञा ही है; इसलिए शिवाज्ञाधारी को काम्य‑विधियाँ करनी चाहिए। आगे वे शैव और माहेश्वर द्वारा अंतः‑बहिः क्रम से किए जाने वाले, इस लोक और परलोक दोनों फल देने वाले कर्म बताते हैं और स्पष्ट करते हैं कि ‘शिव’ और ‘माहेश्वर’ में तत्त्वतः भेद नहीं; शैव ज्ञान‑यज्ञ में, माहेश्वर कर्म‑यज्ञ में प्रवृत्त हैं—अतः शैव भीतर प्रधान, माहेश्वर बाहर प्रधान, पर विधि मूलतः एक ही है।

40 verses

Adhyaya 30

द्वितीयतृतीयावरणपूजाक्रमः | The Sequence of the Second and Third Enclosure Worship (Āvaraṇa-pūjā)

अध्याय 30 शैव मण्डल-पूजा में द्वितीय और तृतीय आवरण की पूजा-विधि का तकनीकी निरूपण करता है। आरम्भ में शिव-शिवा के समीप हेरम्ब गणेश और षण्मुख स्कन्द का गन्ध आदि से पूजन बताया गया है। फिर प्रथम आवरण में ईशान से दिक्क्रम के अनुसार प्रत्येक देवता का अपनी शक्ति सहित पूजन कर सद्यान्त तक क्रम पूर्ण किया जाता है। शिव और शिवा के लिए हृदयादि षडङ्गों की पूजा अग्नि-दिशा आदि में विन्यास सहित कही गई है; वाम आदि आठ रुद्र अपनी-अपनी वामा-शक्तियों सहित दिशाओं में क्रम से (वैकल्पिक रूप से) पूज्य हैं। इसके बाद द्वितीय आवरण में दिक्पत्रों पर शक्ति सहित शिव-रूप—पूर्व में अनन्त, दक्षिण में सूक्ष्म, पश्चिम में शिवोत्तम, उत्तर में एकनेत्र—स्थापित होते हैं; मध्य दिशाओं में एकरुद्र, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ और शिखण्डीश आदि का भी शक्ति सहित विधान है। द्वितीय आवरण में चक्रवर्ती-स्वरूप राजाओं का पूजन तथा तृतीय आवरण में अष्टमूर्तियों का अपनी शक्तियों सहित वन्दन बताया गया है; प्रत्येक रूप शक्ति-संयोग से ही पूर्ण माना गया है।

103 verses

Adhyaya 31

पञ्चावरणमार्गस्थं योगेश्वरस्तोत्रम् (Pañcāvaraṇa-mārga Stotra to Yogeśvara Śiva)

अध्याय 31 में उपमन्यु कृष्ण से कहते हैं कि वे पञ्चावरण-मार्ग के क्रम से उपदिष्ट ‘योगेश्वर शिव’ का पावन स्तोत्र सुनाएँगे। स्तोत्र में बार-बार ‘जय जय’ और ‘नमः’ के साथ शिव के अनेक दिव्य विशेषण आते हैं। शिव को जगत् के एकमात्र स्वामी, शुद्ध चैतन्य, वाणी और मन से परे तत्त्व के रूप में स्तुति की गई है—वे निरञ्जन, निराधार होकर भी सर्वाधार, निष्कारणोद्भव, निरन्तर परमानन्द और मोक्ष-शान्ति के परम कारण हैं। उनकी सर्वव्यापकता, अप्रतिहत शक्ति, अद्वितीय ऐश्वर्य और अविनाशिता का प्रतिपादन कर यह अध्याय पाठ-लितुर्गी और सिद्धान्त-सार बनकर भक्त के मन को परत-दर-परत ध्यान में ले जाकर कर्म-पूर्णता और आध्यात्मिक फल की ओर उन्मुख करता है।

188 verses

Adhyaya 32

मन्त्रसिद्धिः, प्रतिबन्धनिरासः, श्रद्धा-नियमाः (Mantra Efficacy, Removal of Obstacles, and the Role of Faith/Discipline)

अध्याय 32 में उपमन्यु कृष्ण से कहते हैं कि इह-पर की सफलता देने वाली साधना का सार यह है कि इस जीवन में भी पूजा़, होम, जप, ध्यान, तप और दान के संयुक्त अनुशासन से विशेष शैव फल प्राप्त होते हैं। पहले मंत्र और उसके अर्थ को जानकर मंत्र-संसाधन/संस्कार करना आवश्यक है; उसी आधार पर कर्म फलदायी बनते हैं। फिर ‘प्रतिबन्ध’ नामक अदृष्ट, शक्तिशाली विघ्न का वर्णन है, जो सिद्ध मंत्र के फल को भी रोक सकता है। विघ्न-लक्षण दिखें तो उतावली न करें; शकुन आदि संकेतों की जाँच कर प्रायश्चित्त-शमन करें। गलत विधि या मोह से किए कर्म निष्फल होते हैं और लोक-हँसी का कारण बनते हैं; तथा दृष्ट-फल कर्म में अविश्वास श्रद्धा-हीनता है, श्रद्धाहीन को फल नहीं मिलता। दोष देवता का नहीं, क्योंकि विधिपूर्वक करने वाले फल देखते हैं। अंत में कहा है कि विघ्न-निरास के बाद सिद्ध साधक विश्वास-श्रद्धा से युक्त होकर साधना करे; चाहें तो ब्रह्मचर्य और नियत आहार (रात्रि में हविष्य, पायस, फल) अपनाकर सिद्धि प्राप्त करे।

86 verses

Adhyaya 33

केवलामुष्मिकविधिः — The Rite for Exclusive Otherworldly Attainment (Liṅga-Abhiṣeka and Padma-Pūjā Protocol)

उपमन्यु एक अद्वितीय व्रत का वर्णन करते हैं, जिसे वे केवल ‘अमुष्मिक’ (परलोक-साधक) विधि कहते हैं—तीनों लोकों में इसके समान कोई कर्म नहीं। वे प्रमाण देते हैं कि यह व्रत सभी देवों ने किया है—विशेषतः ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र; इन्द्र और लोकपाल; सूर्य आदि नवग्रह; विश्वामित्र-वसिष्ठ जैसे ब्रह्मविद् महर्षि; तथा शिवभक्त ऋषि (श्वेत, अगस्त्य, दधीचि)। नन्दीश्वर, महाकाल, भृंगीश जैसे गणेश्वर, और दैत्य, शेष आदि महानाग, सिद्ध, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, भूत-पिशाच तक इसका अनुष्ठान करते हैं। इस व्रत से प्राणी अपने-अपने पद को प्राप्त होते हैं और देव ‘देवत्व’ में स्थिर होते हैं—ब्रह्मा को ब्रह्मत्व, विष्णु को विष्णुत्व, रुद्र को रुद्रत्व, इन्द्र को इन्द्रत्व, गणेश को गणेशत्व। फिर विधि बताई जाती है—श्वेत चन्दन से सुवासित जल द्वारा लिङ्गाभिषेक, खिले श्वेत कमलों से पूजा, प्रणाम, और लक्षणयुक्त सुंदर पद्मासन बनाना; सामर्थ्य हो तो स्वर्ण-रत्न से सजाकर, केसर-जाल के मध्य छोटे लिङ्ग की स्थापना।

18 verses

Adhyaya 34

लिङ्गप्रतिष्ठा-माहात्म्यम् / The Greatness of Liṅga Installation

इस अध्याय में लिङ्ग-प्रतिष्ठा तथा बेर/प्रतिमा-स्थापन को तुरंत फल देने वाला कर्म बताया गया है, जिससे नित्य, नैमित्तिक और काम्य सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। उपमन्यु कहते हैं—जगत् लिङ्गमय है, सब कुछ लिङ्ग में प्रतिष्ठित है; लिङ्ग की स्थापना से स्थिरता, व्यवस्था और मंगल की स्थापना हो जाती है। कृष्ण के प्रश्नों पर लिङ्ग का स्वरूप, महेश्वर का ‘लिङ्गी’ होना और लिङ्गरूप में शिव-पूजा का कारण स्पष्ट किया जाता है। लिङ्ग अव्यक्त, त्रिगुण-संबद्ध, सृष्टि-लय का मूल, अनादि-अनन्त और जगत् का उपादान-कारण है; उसी मूल प्रकृति/माया से चर-अचर जगत् प्रकट होता है। शुद्ध, अशुद्ध और शुद्धाशुद्ध के भेद बताकर देवताओं की स्थिति समझाई जाती है। निष्कर्षतः इह-पर कल्याण हेतु पूर्ण प्रयत्न से लिङ्ग-प्रतिष्ठा करनी चाहिए; यह शिव की आज्ञा से विश्व को पुनः आधार देने वाला महाकर्म है।

45 verses

Adhyaya 35

प्रणवविभागः—वेदस्वरूपत्वं लिङ्गे च प्रतिष्ठा (The Division of Oṃ, Its Vedic Forms, and Its Placement in the Liṅga)

इस अध्याय में प्रणव (ॐ) को ब्रह्म/शिव का परम नाद-चिह्न और वेद-प्रकाश का बीज बताया गया है। उपमन्यु उस गूँजते ‘ॐ’ध्वनि-प्राकट्य का वर्णन करते हैं जिसे रजस् और तमस् के आवरण से ब्रह्मा और विष्णु आरम्भ में नहीं समझ पाते। फिर एकाक्षर को चार भागों में समझाया गया—अ, उ, म (तीन मात्राएँ) तथा नादरूप अर्धमात्रा। इन्हें लिङ्ग के प्रतीकात्मक स्थानों से जोड़ा गया—अ दक्षिण, उ उत्तर, म मध्य, और नाद शिखर पर श्रवणीय; तथा वेदों से—अ=ऋग्वेद, उ=यजुर्वेद, म=सामवेद, नाद=अथर्ववेद। आगे गुण, सृष्टि-कार्य, तत्त्व, लोक, कला/अध्व और सिद्धि-सदृश शक्तियों से इनके सम्बन्ध दिखाकर मंत्र, वेद और ब्रह्माण्ड-रचना की शैव व्याख्या प्रस्तुत की गई है।

85 verses

Adhyaya 36

लिङ्ग-बेर-प्रतिष्ठाविधिः / The Procedure for Installing the Liṅga and the Bera (Icon)

अध्याय 36 में उपदेशात्मक संवाद है। कृष्ण शिव-प्रोक्त लिङ्ग और बेर (प्रतिमा) की श्रेष्ठ प्रतिष्ठा-विधि पूछते हैं। उपमन्यु क्रम बताते हैं—अशुभ-रहित शुभ दिन (विशेषतः शुक्ल पक्ष) चुनना, शास्त्रीय माप से लिङ्ग बनवाना, भूमि-परीक्षा कर शुभ स्थान लेना। प्रारम्भिक उपचारों में पहले गणेश-पूजन, फिर स्थल-शुद्धि और लिङ्ग को स्नान-स्थान तक ले जाना है। शिल्पशास्त्रानुसार स्वर्ण लेखनी से कुंकुमादि रंग लेकर रेखांकन/अंकन किया जाता है। लिङ्ग और पिण्डिका को मिट्टी-जल के मिश्रणों तथा पंचगव्य से शुद्ध कर वेदिका सहित पूजन होता है। फिर दिव्य जलाशय में ले जाकर अधिवास हेतु स्थापित किया जाता है। अधिवास-मण्डप तोरण, आवरण, दर्भ-मालाएँ, अष्टदिग्गज, अष्ट दिक्पाल-कलश और अष्टमंगल चिह्नों से सुसज्जित होता है तथा दिक्पालों की पूजा की जाती है। मध्य में कमलासन-चिह्नित विशाल पीठ स्थापित कर आगे की प्रतिष्ठा-क्रिया शुद्धि, दिशा और देव-क्रम के अनुसार आगे बढ़ती है।

70 verses

Adhyaya 37

योगप्रकारनिर्णयः (Classification and Definition of Yoga)

इस अध्याय में श्रीकृष्ण ‘परम-दुर्लभ’ योग का ठीक-ठीक स्वरूप पूछते हैं—उसकी पात्रता, अंग, विधि, प्रयोजन तथा मृत्यु के कारणों का विवेचन—ताकि साधक आत्मविनाश से बचे और शीघ्र फल पाए। उपमन्यु शैव मत से योग को शिव में स्थिर चित्त की दृढ़ वृत्ति बताते हैं, जो अंतःकरण की चंचलताओं के निरोध से सिद्ध होती है। फिर योग के पाँच प्रकार क्रम से बताए जाते हैं—मन्त्रयोग, स्पर्शयोग (प्राणायाम-संबद्ध), भावयोग, अभावयोग और सर्वोच्च महायोग। जप व मन्त्रार्थ-चिन्तन, प्राण-नियमन, भाव-ध्यान तथा दृश्य-प्रपंच का सत्य में लय—इन लक्षणों द्वारा समर्थ एकाग्रता से लेकर सूक्ष्म निर्विकल्प लीनता तक की साधना-क्रमावली प्रस्तुत होती है।

67 verses

Adhyaya 38

अन्तराय-उपसर्ग-विवेचनम् / Analysis of Yogic Obstacles (Antarāyas) and Upasargas

इस अध्याय में उपमन्यु योगाभ्यास करने वालों के सामने आने वाले अन्तरायों का सूक्ष्म विवेचन करते हैं। वे दस मुख्य विघ्न बताते हैं—आलस्य, तीव्र रोग, प्रमाद, मार्ग या साधना-स्थान के विषय में संशय, चित्त की अस्थिरता, अश्रद्धा, विपर्यय (भ्रमित निर्णय), दुःख, अवसाद/दौर्मनस्य, तथा विषयों में चित्त का विक्षेप। फिर वे इनके लक्षण स्पष्ट करते हैं—रोग देह और कर्म-कारणों से, संशय विकल्पों में बँटी बुद्धि से, अस्थिरता मन के आधारहीन होने से, अश्रद्धा योगमार्ग में भाव-शून्यता से, और विपर्यय उलटी समझ से उत्पन्न होता है। दुःख को आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक—तीन रूपों में बाँटा गया है; अवसाद विफल कामना से, और विक्षेप अनेक विषयों में मन के फैलाव से होता है। इन विघ्नों के शांत होने पर योगी को सिद्धि-समीप के ‘दैवी’ उपसर्ग भी दिख सकते हैं, पर वे आसक्ति बढ़ा सकते हैं। ऐसे छह उपसर्ग हैं—प्रतिभा, श्रवण, वार्ता, दर्शन, आस्वाद और वेदना। अध्याय का उद्देश्य साधक को इन संकेतों का विवेक देकर मोक्ष-लक्ष्य पर स्थिर रखना है।

78 verses

Adhyaya 39

ध्यानप्रकारनिर्णयः / Determination of the Modes of Meditation (on Śrīkaṇṭha-Śiva)

अध्याय 39 में श्रीकण्ठ-शिव पर केन्द्रित ध्यान को क्रमबद्ध साधना के रूप में बताया गया है। उपमन्यु कहते हैं कि योगी श्रीकण्ठ का ध्यान करते हैं, क्योंकि उनके स्मरण से ही तुरंत अभीष्ट सिद्ध होता है। मन को स्थिर करने हेतु स्थूल (विषय-आधारित) ध्यान, फिर सूक्ष्म और निर्विषय प्रवृत्ति का भेद किया गया है। शिव का प्रत्यक्ष चिन्तन सभी सिद्धियाँ देता है; अन्य रूपों का ध्यान करते समय भी भीतर से शिवरूप का स्मरण आधार बनाना चाहिए। ध्यान को पुनरावृत्ति से उत्पन्न स्थैर्य कहा गया है—सविषय से निर्विषय की ओर गमन। ‘निर्विषय’ को बुद्धि-सन्तति के प्रवाह के रूप में, जो निराकार आत्मबोध की ओर झुकता है, समझाया गया है। सबीज-निर्बीज ध्यान में पहले सबीज, अंत में निर्बीज का उपदेश है; प्राणायाम से शान्ति आदि क्रमिक उपलब्धियाँ भी कही गई हैं।

59 verses

Adhyaya 40

अवभृथस्नान-तीर्थयात्रा-तेजोदर्शनम् | Avabhṛtha Bath, Tīrtha-Pilgrimage, and the Vision of Divine Radiance

अध्याय 40 में उपदेश से आगे बढ़कर अनुष्ठान और तीर्थयात्रा का वर्णन है। सूत कहते हैं कि वायु यदव और उपमन्यु से सम्बद्ध ज्ञान-योग का वृत्तान्त मुनियों को सुनाकर अंतर्धान हो जाते हैं। तब नैमिषारण्य के ऋषि प्रातःकाल अपने सत्र-यज्ञ के समापन हेतु अवभृथ-स्नान करने निकलते हैं। ब्रह्मा की आज्ञा से देवी सरस्वती मधुर जल वाली शुभ नदी रूप में प्रकट होती हैं; ऋषि स्नान कर यज्ञ पूर्ण करते हैं। वे शिव-सम्बन्धी जल से देवताओं का तर्पण करते हुए वाराणसी की ओर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में हिमालय से दक्षिण की ओर बहती भागीरथी (गंगा) में स्नान कर आगे बढ़ते हैं। वाराणसी पहुँचकर उत्तरवाहिनी गंगा में डुबकी लगाकर विधिपूर्वक अविमुक्तेश्वर लिंग की पूजा करते हैं। प्रस्थान के समय आकाश में करोड़ों सूर्यों के समान दीप्त, सर्वदिशाओं में व्याप्त अद्भुत दिव्य तेज देखते हैं; भस्मधारी पाशुपत सिद्ध सैकड़ों की संख्या में आकर उस तेज में लीन हो जाते हैं, जिससे शिव-परम पद और दिव्य शक्ति-स्थान का संकेत मिलता है।

49 verses

Adhyaya 41

स्कन्दसरः (Skandasara) — तीर्थवर्णनम् / Description of the Skandasara Sacred Lake

अध्याय 41 में सूत जी तीर्थ-वर्णन करते हैं। ‘स्कन्दसरः’ नामक पवित्र सरोवर का स्थान और स्वरूप बताया गया है—समुद्र-सा विस्तृत, पर जल मधुर, शीतल, निर्मल और सहज उपलब्ध। स्फटिक-से तट, ऋतु-पुष्प, कमल और जल-वनस्पतियाँ तथा मेघ-सी लहरें इसे ‘धरती पर आकाश’ जैसा दिव्य बनाती हैं। फिर मुनि और मुनिकुमार स्नान तथा तीर्थ-जल ग्रहण की विधियाँ करते दिखते हैं; भस्म, त्रिपुण्ड्र, श्वेत वस्त्र और नियत आचार से शैव तपस्वी-लक्षण प्रकट होते हैं। घट, कलश, कमण्डलु, पत्तों के पात्र आदि साधनों का उल्लेख है और जल-संग्रह के हेतु—अपने लिए, दूसरों के लिए और विशेषतः देवताओं के लिए—गिनाए गए हैं। इस प्रकार स्थल-वैभव से लेकर आचार और तीर्थ-जल की ‘पुण्य-आर्थिक’ व्यवस्था तक, सब कुछ शिव-केन्द्रित पवित्रता और पुण्य का संकेत देता है।

51 verses