
अध्याय 36 में उपदेशात्मक संवाद है। कृष्ण शिव-प्रोक्त लिङ्ग और बेर (प्रतिमा) की श्रेष्ठ प्रतिष्ठा-विधि पूछते हैं। उपमन्यु क्रम बताते हैं—अशुभ-रहित शुभ दिन (विशेषतः शुक्ल पक्ष) चुनना, शास्त्रीय माप से लिङ्ग बनवाना, भूमि-परीक्षा कर शुभ स्थान लेना। प्रारम्भिक उपचारों में पहले गणेश-पूजन, फिर स्थल-शुद्धि और लिङ्ग को स्नान-स्थान तक ले जाना है। शिल्पशास्त्रानुसार स्वर्ण लेखनी से कुंकुमादि रंग लेकर रेखांकन/अंकन किया जाता है। लिङ्ग और पिण्डिका को मिट्टी-जल के मिश्रणों तथा पंचगव्य से शुद्ध कर वेदिका सहित पूजन होता है। फिर दिव्य जलाशय में ले जाकर अधिवास हेतु स्थापित किया जाता है। अधिवास-मण्डप तोरण, आवरण, दर्भ-मालाएँ, अष्टदिग्गज, अष्ट दिक्पाल-कलश और अष्टमंगल चिह्नों से सुसज्जित होता है तथा दिक्पालों की पूजा की जाती है। मध्य में कमलासन-चिह्नित विशाल पीठ स्थापित कर आगे की प्रतिष्ठा-क्रिया शुद्धि, दिशा और देव-क्रम के अनुसार आगे बढ़ती है।
Verse 1
श्रीकृष्ण उवाच । भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि प्रतिष्ठाविधिमुत्तमम् । लिंगस्यापि च बेरस्य शिवेन विहितं यथा
श्रीकृष्ण बोले—हे भगवन्, मैं प्रतिष्ठा की उत्तम विधि सुनना चाहता हूँ—लिङ्ग की भी और बेर (मूर्ति) की भी, जैसा कि भगवान शिव ने विधान किया है।
Verse 2
उपमन्युरुवाच । अनात्मप्रतिकूले तु दिवसे शुक्लपक्षके । शिवशास्त्रोक्तमार्गेण कुर्याल्लिंगं प्रमाणवत्
उपमन्यु बोले—जो दिन आत्मा के प्रतिकूल न हो (अर्थात् शुभ हो) और शुक्लपक्ष में हो, उस दिन शिव-शास्त्रों में बताए मार्ग के अनुसार उचित प्रमाण वाला शिवलिङ्ग बनाना चाहिए।
Verse 3
स्वीकृत्याथ शुभस्थानं भूपरीक्षां विधाय च । दशोपचारान्कुर्वीत लक्षणोद्धारपूर्वकान्
शुभ स्थान चुनकर और भूमि की विधिवत परीक्षा करके, स्थल-लक्षण निर्धारण व तैयारी से आरम्भ होने वाले दस उपचारों द्वारा शिव-पूजन की क्रिया को ठीक प्रकार स्थापित करना चाहिए।
Verse 4
तेषां दशोपचाराणां पूर्वं पूज्य १ विनायकम् । स्थानशुद्ध्यादिकं कृत्वालिंगं स्नानालयं नयेत्
उन दस उपचारों में पहले विनायक (गणेश) की पूजा करे। फिर स्थान-शुद्धि आदि विधि करके शिवलिंग को स्नान-स्थान पर ले जाए।
Verse 5
शलाकया कांचनया २ कुंकुमादिरसाक्तया । लक्षितं लक्षणं शिल्पशास्त्रेण विलिखेत्ततः
फिर केसर आदि के रस में डूबी स्वर्ण-शलाका से, शिल्पशास्त्र के विधानानुसार, संकेतित शुभ लक्षणों को अंकित करे।
Verse 6
अष्टमृत्सलिलैर्वाथ पञ्चमृत्सलिलैस्तथा । लिङ्गं पिंडिकया सार्धं पञ्चगव्यैश्च शोधयेत्
आठ प्रकार की पवित्र मृत्तिकाओं के जल से, तथा पाँच मृत्तिकाओं के जल से भी, पिंडिका सहित शिवलिंग को शुद्ध करे; और पंचगव्य से भी उसका शोधन करे।
Verse 7
सवेदिकं समभ्यर्च्य दिव्याद्यं तु जलाशयम् । नीत्वाधिवासयेत्तत्र लिंगं पिंडिकया सह
वेदी सहित जलाशय की विधिपूर्वक अर्चना करके, दिव्य (पूज्य) जल लेकर, वहाँ पिंडिका सहित शिवलिंग का अधिवास कराए।
Verse 8
अधिवासालये शुद्धे सर्वशोभासमन्विते । सतोरणे सावरणे दर्भमालासमावृते
शुद्ध अधिवास-शाला में—जो समस्त शोभा से सुशोभित हो—सतोरन (मंगल तोरण) और उचित आवरणों से युक्त, तथा पवित्र दर्भ-घास की मालाओं से परितः आवृत होकर (विधि सम्पन्न की जाए)।
Verse 9
दिग्गजाष्टकसंपन्ने दिक्पालाष्टघटान्विते । अष्टमंगलकैर्युक्ते कृतदिक्पालकार्चिते
वह स्थान आठ दिग्गजों से समलंकृत था, दिक्पालों के आठ कलशों सहित; अष्टमंगल चिह्नों से शोभित और दिक्पालों द्वारा विधिपूर्वक पूजित था।
Verse 10
तेजसं दारवं वापि कृत्वा पद्मासनांकितम् । विन्यसेन्मध्यतस्तत्र विपुलं पीठकालयम्
दीप्तिमान धातु का या काष्ठ का, पद्मासन-चिह्न से अंकित शुभ आसन बनाकर, उसके मध्य में विशाल पीठ-आधार को स्थापित करे।
Verse 11
द्वारपालान्समभ्यर्च्य भद्रादींश्चतुरःक्रमात् । समुद्रश्च विभद्रश्च सुनंदश्च विनंदकः
भद्र आदि चारों द्वारपालों की क्रम से सम्यक् पूजा करके—समुद्र, विभद्र, सुनन्द और विनन्दक—(साधक आगे विधि में प्रवृत्त हो)।
Verse 12
स्नापयित्वा समभ्यर्च्य लिंगं वेदिकया सह । सकूर्चाभ्यां तु वस्त्राभ्यां समावेष्ट्यं समंततः
लिंग को वेदिका सहित स्नान कराकर और सम्यक् पूजन करके, फिर कूर्च-किनारे वाले दो वस्त्रों से उसे चारों ओर से आवेष्टित करे।
Verse 13
प्रापय्य शनकैस्तोयं पीठिकोपरि शाययेत् । प्राक्शिरस्कमधःसूत्रं पिंडिकां चास्य पश्चिमे
धीरे-धीरे जल अर्पित करके उसे पीठिका पर शयन कराए। उसका शिर पूर्वाभिमुख रहे; सूत्र नीचे रखा जाए और उसकी पिंडिका (आधार) पश्चिम दिशा में स्थापित की जाए।
Verse 14
सर्वमंगलसंयुक्तं लिंगं तत्राधिवासयेत् । पञ्चरात्रं त्रिरात्रं वाप्येकरात्रमथापि वा
वहाँ सर्वमंगल-समन्वित लिंग का अधिवासन (संस्कारपूर्वक प्रतिष्ठा) करे। उसे पाँच रात्रि, या तीन रात्रि, अथवा एक ही रात्रि तक पवित्र निवास में रखे।
Verse 15
विसृज्य पूजितं तत्र शोधयित्वा च पूर्ववत् । संपूज्योत्सवमार्गेण शयनालयमानयेत्
वहाँ की पूजा का समापन करके, पूर्ववत् पुनः शोधन करे। फिर उत्सव-विधि के अनुसार सम्यक् पूजन कर, (प्रतिष्ठित चिन्ह/देव) को शयनालय में ले जाए।
Verse 16
तत्रापि शयनस्थानं कुर्यान्मंडलमध्यतः । शुद्धैर्जलैः स्नापयित्वा लिंगमभ्यर्चयेत्क्रमात्
वहाँ भी मंडल के मध्य में शयन-स्थान बनाए। शुद्ध जलों से लिंग को स्नान कराकर, विधि-क्रम से लिंग की अर्चना करे।
Verse 17
ऐशान्यां पद्ममालिख्य शुद्धलिप्ते महीतले । शिवकुंभं शोधयित्वा तत्रावाह्य शिवं यजेत्
ईशान दिशा में शुद्ध-लिप्त भूमि पर कमल का आलेखन करे। शिवकुंभ को शुद्ध करके, उसमें भगवान शिव का आवाहन कर, उनकी पूजा करे।
Verse 18
वेदीमध्ये सितं पद्मं परिकल्प्य विधानतः । तस्य पश्चिमतश्चापि चंडिकापद्ममालिखेत्
वेदी के मध्य में विधि के अनुसार श्वेत कमल की रचना करे; और उसके पश्चिम में चण्डिका का कमलासन भी अंकित करे।
Verse 19
क्षौमाद्यैर्वाहतैर्वस्त्रैः पुष्पैर्दर्भैरथापि वा । प्रकल्प्य शयनं तस्मिन्हेमपुष्पं विनिक्षिपेत्
क्षौम आदि धुले हुए वस्त्रों से—या पुष्पों और दर्भ से भी—शयन-स्थान तैयार करे; और उस शय्या पर स्वर्ण-पुष्प अर्पित करे।
Verse 20
तत्र लिंगं समानीय सर्वमंगलनिःस्वनैः । रक्तेन वस्त्रयुग्मेन सकूर्चेन समंततः
वहाँ शुभ-मंगल ध्वनियों और जयकारों के बीच शिवलिंग को लाकर; फिर उसके चारों ओर सर्वत्र कूर्च सहित लाल वस्त्रों की जोड़ी व्यवस्थित करे।
Verse 21
सह पिंडिकयावेष्ट्य शाययेच्च यथा पुरा । पुरस्तात्पद्ममालिख्य तद्दलेषु यथाक्रमम्
पिण्डिका सहित उसे लपेटकर पूर्ववत् वैसे ही शय्या पर रखे। फिर सामने कमल अंकित करके, उसके दलों पर यथाक्रम आगे बढ़े।
Verse 22
विद्येशकलशान्न्यस्येन्मध्ये शैवीं च वर्धनीम् । परीत्य पद्मत्रितयं जुहुयुर्द्विजसत्तमाः
विद्येश-कलशों को स्थापित करके, मध्य में शैव ‘वर्धनी’ पात्र रखे। फिर पद्म-त्रय की परिक्रमा कर श्रेष्ठ द्विज हवन में आहुति दें।
Verse 23
ते चाष्टमूर्तयः कल्प्याः पूर्वादिपरितः स्थिताः । चत्वारश्चाथ वा दिक्षु स्वध्येतारस्सजापकाः
वे आठ मूर्तियाँ पूर्व आदि दिशाओं से आरम्भ करके चारों ओर स्थित मानकर श्रद्धापूर्वक ध्यान करने योग्य हैं। और दिशाओं में चार सेवक भी हैं—वेद-स्वाध्यायी तथा जप-परायण—जो निरन्तर पवित्र जप में लगे रहते हैं।
Verse 24
जुहुयुस्ते विरंच्याद्याश्चतस्रो मूर्तयः स्मृताः । दैशिकः प्रथमं तेषामैशान्यां पश्चिमे ऽथ वा
विरञ्चि (ब्रह्मा) आदि से आरम्भ होने वाली चार मूर्तियाँ स्मरण की गई हैं; वे हवन-क्रिया में आहुति देती हैं। उनमें ‘दैशिक’—दीक्षा देने वाला मार्गदर्शक रूप—प्रथम है; उसे ईशान (उत्तर-पूर्व) में, अथवा पश्चिम में स्थापित/पूजित करें।
Verse 25
प्रधानहोमं कुर्वीत सप्तद्रव्यैर्यथाक्रमम् । आचार्यात्पादमर्धं वा जुहुयुश्चापरे द्विजाः
सात द्रव्यों से यथाक्रम प्रधान-होम करना चाहिए। और कुछ द्विज, आचार्य से प्राप्त विधान के अनुसार, चौथाई या आधा भाग भी अग्नि में आहुति रूप से अर्पित कर सकते हैं।
Verse 26
प्रधानमेकमेवात्र जुहुयादथ वा गुरुः । पूर्वं पूर्णाहुतिं हुत्वा घृतेनाष्टोत्तरं शतम्
यहाँ प्रधान-आहुति एक ही दे; अथवा गुरु ही उसे सम्पन्न करें। पहले पूर्णाहुति करके, फिर घृत से एक सौ आठ आहुतियाँ अर्पित करे।
Verse 27
मूर्ध्नि मूलेन लिंगस्य शिवहस्तं प्रविन्यसेत् । शतमर्धं तदर्धं वा क्रमाद्द्रव्यैश्च सप्तभिः
लिङ्ग के मूल के अनुरूप, मूल-मन्त्र के साथ मस्तक पर ‘शिव-हस्त’ (शिव-मुद्रा) का विन्यास करे। फिर सात द्रव्यों से क्रमशः विधिपूर्वक—पूर्ण सौ, या उसका आधा, अथवा उसका भी आधा—कर्म सम्पन्न करे।
Verse 28
हुत्वाहुत्वा स्पृशेल्लिंगं वेदिकां च पुनः पुनः । पूर्णाहुतिं ततो हुत्वा क्रमाद्दद्याच्च दक्षिणाम्
बार-बार आहुति देकर, लिंग और वेदिका को पुनः-पुनः स्पर्श करे। तत्पश्चात् पूर्णाहुति होमकर, क्रम से नियत दक्षिणा प्रदान करे।
Verse 29
आचार्यात्पादमर्धं वा होत्ःणां स्थपतेरपि । तदर्धं देयमन्येभ्यः सदस्येभ्यश्च शक्तितः
उचित दक्षिणा में से आचार्य को चौथाई या आधी दे; वैसे ही होतृ-पुरोहितों और स्थपति को भी। उस हिस्से का आधा भाग अपनी शक्ति के अनुसार अन्य ऋत्विजों और सभा के विद्वान सदस्यों को दे।
Verse 30
ततः श्वभ्रे वृषं हैमं कूर्चं वापि निवेश्य च । मृदंभसा पञ्चगव्यैः पुनः शुद्धजलेन च
फिर एक गड्ढे में स्वर्ण का वृषभ या (विधि का) कूर्च-गुच्छ स्थापित करे; और उसे मिट्टी व जल से, पंचगव्य से, तथा पुनः शुद्ध जल से शुद्ध करे।
Verse 31
शोधितां चंदनालिप्तां श्वभ्रे ब्रह्मशिलां क्षिपेत् । करन्यासं ततः कृत्वा नवभिः शक्तिनामभिः
शुद्ध करके चंदन से लेपी हुई ब्रह्मशिला को गड्ढे में स्थापित करे। फिर कर-न्यास करके नौ शक्तियों के नामों से हाथों का संस्कार करे।
Verse 32
हरितालादिधातूंश्च बीजगंधौषधैरपि । शिवशास्त्रोक्तविधिना क्षिपेद्ब्रह्मशिलोपरि
हरिताल आदि धातुओं को, बीजों को, सुगंध-द्रव्यों को और औषधियों को भी—शिवशास्त्र में कही विधि के अनुसार—ब्रह्मशिला के ऊपर रखे।
Verse 33
प्रतिलिंगं तु संस्थाप्य क्षीरं वृक्षसमुद्भवम् । स्थितं बुद्ध्वा तदुत्सृज्य लिंगं ब्रह्मशिलोपरि
प्रतिलिंग स्थापित करके उस पर वृक्ष से उत्पन्न क्षीर-रस अर्पित करे। वह स्थिर हो गया यह जानकर उसे छोड़ दे और ब्रह्म-शिला पर लिंग की प्रतिष्ठा करे।
Verse 34
प्रागुदक्प्रवरां किंचित्स्थापयेन्मूलविद्यया । पिंडिकां चाथ संयोज्य शाक्तं मूलमनुस्मरन्
मूलविद्या (आधार-मंत्र) से उसे थोड़ा पूर्व और उत्तर की ओर झुका कर स्थापित करे। फिर पिंडिका को जोड़कर शाक्त मूल-मंत्र का अंतःस्मरण करे।
Verse 35
बन्धनं बंधकद्रव्यैः कृत्वा स्थानं विशोध्य च । दत्त्वा चार्घ्यं च पुष्पाणि कुर्युर्यवनिकां पुनः
बंधन-द्रव्यों से बंधन करके स्थान को शुद्ध करे। अर्घ्य और पुष्प अर्पित करके फिर यवनिका (परदा) को यथास्थान करे।
Verse 36
यथायोग्यं निषेकादि लिंगस्य पुरतस्तदा । आनीय शयनस्थानात्कलशान्विन्यसेत्क्रमात्
तब लिंग के सम्मुख यथाविधि निषेक आदि प्रारंभिक कर्म करे। और शयनस्थान से कलश लाकर क्रम से स्थापित करे।
Verse 37
महापूजामथारभ्य संपूज्य कलशान्दश । शिवमंत्रमनुस्मृत्य शिवकुंभजलांतरे
महापूजा आरंभ करके दसों कलशों की सम्यक् पूजा करे। शिव-मंत्र का स्मरण कर शिव-कुंभ के जल में (उसका) न्यास/संस्कार करे।
Verse 38
अंगुष्ठानामिकायोगादादाय तमुदीरयेत् । न्यसेदीशानभागस्य मध्ये लिंगस्य मंत्रवित्
अंगूठे और अनामिका का योग करके उसे ग्रहण कर मंत्रोच्चार करे; फिर मंत्र-विद् साधक ईशान-भाग में, लिंग के मध्य में उसका न्यास करे।
Verse 39
शक्तिं न्यसेत्तथा विद्यां विद्येशांश्च यथाक्रमम् । लिङ्गमूले शिवजलैस्ततो लिंगं निषेचयेत्
फिर शक्ति का, तथा विद्या और विद्येशों का यथाक्रम न्यास करे। तत्पश्चात लिंग-मूल में शिव-जल से लिंग का अभिषेक-सेचन करे।
Verse 40
वर्धन्यां पिंडिकालिंगं विद्येशकलशैः पुनः । अभिषिच्यासनं पश्चादाधाराद्यं प्रकल्पयेत्
वर्धनी में पिंडिका सहित लिंग को स्थापित करके, विद्येश्वर के कलशों के पवित्र जल से पुनः अभिषेक करे। फिर आसन रखकर आधार आदि समस्त अधार-व्यवस्था विधिपूर्वक करे।
Verse 41
कृत्वा पञ्चकलान्यासं दीप्तं लिंगमनुस्मरेत् । आवाहयेच्छिवौ साक्षात्प्राञ्जलिः प्रागुदङ्मुखः
पंचकलाओं का न्यास करके, दीप्तिमान लिंग का मन से ध्यान करे। हाथ जोड़कर, पूर्व या उत्तरमुख होकर, साक्षात् शिव का आवाहन करे।
Verse 42
सर्वाभरणशोभाढ्यं सर्वमंगलनिस्वनैः । ब्रह्मविष्णुमहेशार्कशक्राद्यैर्देवदानवैः
वह समस्त आभूषणों की शोभा से दीप्त था और सर्वमंगल ध्वनियों से गूँज रहा था—जहाँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर्य, इन्द्र आदि देव तथा दानव भी उपस्थित थे।
Verse 43
आनंदक्लिन्नसर्वांगैर्विन्यस्तांजलिमस्तकैः । स्तुवद्भिरेव नृत्यद्भिर्नामद्भिरभितो वृतम्
आनंद से भीगे हुए समस्त अंगों वाले भक्त, मस्तक पर अंजलि रखकर, चारों ओर से उसे घेरकर खड़े थे। कोई स्तुति कर रहे थे, कोई नृत्य कर रहे थे और कोई नमस्कार कर रहे थे—सब प्रभु शिव की आराधना में लगे थे।
Verse 44
ततः पञ्चोपचारांश्च कृत्वा पूजां समापयेत् । नातः परतरः कश्चिद्विधिः पञ्चोपचारकात्
तदनंतर पंचोपचार करके पूजा का समापन करना चाहिए। पंचोपचार-पूजा से बढ़कर कोई विधि नहीं है।
Verse 45
प्रतिष्ठां लिंगवत्कुर्यात्प्रतिमास्वपि सर्वतः । लक्षणोद्धारसमये कार्यं नयनमोचनम्
प्रतिमाओं के लिए भी सर्वत्र शिवलिंग के समान ही प्रतिष्ठा करनी चाहिए। और लक्षणोद्धार के समय ‘नयनमोचन’ (नेत्र-उद्घाटन) का संस्कार अवश्य करना चाहिए।
Verse 46
जलाधिवासे शयने शाययेत्तान्त्वधोमुखीम् । कुम्भोदशायितां मंत्रैर्हृदि तां सन्नियोजयेत्
जलाधिवास के समय उस तंतु (पवित्र सूत्र) को शय्या पर अधोमुख करके लिटाना चाहिए। फिर उसे कलशोदक में शयित करके, मंत्रों द्वारा हृदय में दृढ़तापूर्वक नियोजित करना चाहिए।
Verse 47
कृतालयां परामाहुः प्रतिष्ठामकृतालयात् । शक्तः कृतालयः पश्चात्प्रतिष्ठाविधिमाचरेत्
वे कहते हैं कि पूर्ण रूप से बने हुए मंदिर में की गई प्रतिष्ठा, अधूरे मंदिर में की गई प्रतिष्ठा से श्रेष्ठ है। इसलिए जब आलय (मंदिर) विधिवत् पूर्ण हो जाए और सामर्थ्य हो, तब उसके बाद प्रतिष्ठा-विधि का आचरण करना चाहिए।
Verse 48
अशक्तश्चेत्प्रतिष्ठाप्य लिंगं बेरमथापि वा । शक्तेरनुगुणं पश्चात्प्रकुर्वीत शिवालयम्
यदि कोई पहले मंदिर बनाने में असमर्थ हो, तो पहले शिवलिंग या प्रतिमा (बेर) की प्रतिष्ठा करे। फिर अपनी शक्ति के अनुसार बाद में शिवालय का निर्माण करे।
Verse 49
गृहार्चां च पुनर्वक्ष्ये प्रतिष्ठाविधिमुत्तमम् । कृत्वा कनीयसंबेरं लिंगं वा लक्षणान्वितम्
अब मैं गृह-पूजा हेतु प्रतिष्ठा की उत्तम विधि फिर कहता हूँ। शास्त्रोक्त लक्षणों से युक्त छोटा बेर (प्रतिमा) या शिवलिंग बनाकर (आगे प्रतिष्ठा करे)।
Verse 50
अयने चोत्तरे प्राप्ते शुक्लपक्शे शुभे दिने । देवीं कृत्वा शुभे देशे तत्राब्जं पूर्ववल्लिखेत्
जब उत्तरायण आ जाए, शुक्ल पक्ष के शुभ दिन में, पवित्र स्थान पर देवी को स्थापित करे; और वहाँ पूर्ववत् कमल-यंत्र अंकित करे।
Verse 51
विकीर्य पत्रपुष्पाद्यैर्मध्ये कुंभं निधाय च । परितस्तस्य चतुरः कलशान् दिक्षु विन्यसेत्
पत्ते, पुष्प आदि बिखेरकर बीच में कुम्भ स्थापित करे; और उसके चारों ओर चार दिशाओं में चार कलश विन्यस्त करे।
Verse 52
पञ्च ब्रह्माणि तद्बीजैस्तेषु पञ्चसु पञ्चभिः । न्यस्य संपूज्य मुद्रादि दर्शयित्वाभिरक्ष्य च
पाँच ब्रह्म-मंत्रों को उनके बीजाक्षरों सहित पाँच स्थानों पर पाँच प्रकार के न्यास से स्थापित करके, उनका पूर्ण पूजन करे। फिर मुद्राएँ आदि दिखाकर, अभिरक्षा-विधि से रक्षा करे।
Verse 53
विशोध्य लिंगं बेरं वा मृत्तोयाद्यैर्यथा पुरा । स्थापयेत्पुष्पसंछन्नमुत्तरस्थे वरासने
मिट्टी, जल आदि से परम्परा के अनुसार लिङ्ग या बेर (प्रतिमा) को शुद्ध करके, उसे पुष्पों से आच्छादित कर उत्तर दिशा में रखे उत्तम आसन पर स्थापित करे।
Verse 54
निधाय पुष्पं शिरसि प्रोक्षयेत्प्रोक्षणीजलैः । समभ्यर्च्य पुनः पुष्पैर्जयशब्दादिपूर्वकम्
शिर पर पुष्प रखकर प्रोक्षणी जल से छिड़काव करे। फिर पुष्पों से पुनः सम्यक् अर्चना करके ‘जय’ आदि मंगल-घोष के साथ आगे की क्रिया करे।
Verse 55
कुम्भैरीशानविद्यांतैः स्नापयेन्मूलविद्यया । ततः पञ्चकलान्यासं कृत्वा पूजां च पूर्ववत्
कुम्भों के जल से स्नान कराए, अंत में ईशान-विद्या का जप करते हुए और मूल-विद्या से विधि संपन्न करे। तत्पश्चात् पंचकला-न्यास करके पूर्ववत् पूजा करे।
Verse 56
नित्यमाराधयेत्तत्र देव्या देवं त्रिलोचनम् । एकमेवाथ वा कुंभं मूर्तिमन्त्रसमन्वितम्
वहाँ प्रतिदिन देवी सहित त्रिलोचन देव (शिव) की आराधना करे। अथवा मूर्ति-भाव और मंत्र से युक्त एक ही कुम्भ की पूजा करे।
Verse 57
न्यस्य पद्मांतरे सर्वं शेषं पूर्ववदाचरेत् । अत्यंतोपहतं लिंगं विशोध्य स्थापयेत्पुनः
सब कुछ पद्म-यंत्र के भीतर न्यास करके शेष विधि पूर्ववत् करे। यदि लिंग अत्यन्त क्षतिग्रस्त हो, तो उसे भलीभाँति शुद्ध करके पुनः स्थापित करे।
Verse 58
संप्रोक्षयेदुपहतमनागुपहतं यजेत् । लिंगानि बाणसंज्ञानि स्थापनीयानि वा न वा
जो उपहत हो उसे संप्रोक्षण से शुद्ध करे; जो अनुपहत हो उसका यजन-पूजन करे। ‘बाण-लिंग’ नामक लिंगों का प्रतिष्ठापन किया भी जा सकता है या बिना प्रतिष्ठा के भी पूज्य हैं।
Verse 59
तानि पूर्वं शिवेनैव संस्कृतानि यतस्ततः । शेषाणि स्थापनीयानि यानि दृष्टानि बाणवत्
वे तो पहले ही शिव द्वारा यथायोग्य संस्कृत (पवित्र) किए गए थे। जो शेष वस्तुएँ बाणों की भाँति इधर-उधर पड़ी दिखें, उन्हें समेटकर उनके यथास्थान प्रतिष्ठित करे।
Verse 60
स्वयमुद्भूतलिंगे च दिव्ये चार्षे तथैव च । अपीठे पीठमावेश्य कृत्वा संप्रोक्षणं विधिम्
स्वयम्भू लिंग तथा दिव्य और आर्ष (ऋषि-प्रतिष्ठित) लिंग के विषय में, यदि पीठ न हो तो पहले पीठ स्थापित करके विधिपूर्वक संप्रोक्षण-क्रिया करे।
Verse 61
यजेत्तत्र शिवं तेषां प्रतिष्ठा न विधीयते । दग्धं श्लथं क्षतांगं च क्षिपेल्लिंगं जलाशये
वहाँ उन लिंगों के निकट शिव का पूजन करे; उनके लिए (नव) प्रतिष्ठा का विधान नहीं है। परन्तु जो लिंग दग्ध, श्लथ या खण्डित-अंग हो, उसे जलाशय में विसर्जित कर दे।
Verse 62
संधानयोग्यं संधाय प्रतिष्ठाविधिमाचरेत् । बेराद्वा विकलाल्लिंगाद्देवपूजापुरस्सरम्
जो जोड़ने योग्य है उसे विधिपूर्वक जोड़कर, फिर प्रतिष्ठा-विधि का आचरण करे। चाहे प्रतिमा (बेर) से हो या अपूर्ण लिंग से—पहले देवाधिदेव शिव की पूजा को पूर्वकर्म बनाकर ही यह प्रक्रिया करनी चाहिए।
Verse 63
उद्वास्य हृदि संधानं त्यागं वा युक्तमाचरेत् । एकाहपूजाविहतौ कुर्याद्द्विगुणमर्चनम्
आह्वित सन्निधि का यथाविधि उद्वासन करके, फिर हृदय में शम्भु का संधान कर स्मरण करे, अथवा युक्ति से त्याग का आचरण करे। यदि एक दिन की नित्य-पूजा छूट जाए, तो प्रायश्चित्त व पुनर्स्थापन हेतु दुगुना अर्चन करे।
Verse 64
द्विरात्रे च महापूजां संप्रोक्षणमतः परम् । मासादूर्ध्वमनेकाहं पूजा यदि विहन्यते
यदि पूजा दो रातों तक रुक जाए, तो महापूजा करके उसके बाद विधिपूर्वक संप्रोक्षण करे। परंतु यदि एक मास के बाद अनेक दिनों तक पूजा भंग हो जाए, तो नियम के अनुसार (पूर्ण) पुनःस्थापना करनी चाहिए।
Verse 65
प्रतिष्ठा प्रोच्यते कैश्चित्कैश्चित्संप्रोक्षणक्रमः । संप्रोक्षणे तु लिंगादेर्देवमुद्वास्य पूर्ववत्
कुछ आचार्य इस क्रिया को ‘प्रतिष्ठा’ कहते हैं और कुछ इसे ‘संप्रोक्षण-क्रम’ कहते हैं। संप्रोक्षण में तो लिंग आदि से देवता का पूर्वोक्त विधि से उद्वासन करके, फिर शुद्धि-कर्म करना चाहिए।
Verse 66
अष्टपञ्चक्रमेणैव स्नापयित्वा मृदंभसा । गवां रसैश्च संस्नाप्य दर्भतोयैर्विशोध्य च
अष्ट-पञ्च क्रम के अनुसार पहले मिट्टी-मिश्रित जल से स्नान कराए। फिर गो-रसों (पंचगव्य आदि) से पुनः स्नान कराकर, अंत में दर्भ-संस्कारित जल से शुद्धि करे।
Verse 67
प्रोक्षयेत्प्रोक्षणीतोयैर्मूलेनाष्टोत्तरं शतम् । सपुष्पं सकुशं पाणिं न्यस्य लिंगस्य मस्तके
प्रोक्षणीय (पवित्र) जल से शिवलिंग का प्रोक्षण करे और मूल-मंत्र का एक सौ आठ बार जप करे। फिर पुष्प और कुश सहित हाथ को लिंग के मस्तक (शीर्ष) पर रखे।
Verse 68
पञ्चवारं जपेन्मूलमष्टोत्तरशतं ततः । ततो मूलेन मूर्धादिपीठांतं संस्पृशेदपि
मूल-मंत्र का पाँच बार जप करे, फिर उसका एक सौ आठ बार जप करे। तत्पश्चात् उसी मूल-मंत्र का उच्चारण करते हुए सिर से लेकर अंतिम पीठ तक शरीर के पवित्र पीठों का स्पर्श करे—इस प्रकार शिव-पूजा हेतु देह का संस्कार होता है।
Verse 69
पूजां च महतीं कुर्याद्देवमावाह्य पूर्ववत् । अलब्धे स्थापिते लिंगे शिवस्थाने जले ऽथ वा
पूर्ववत् देव का आवाहन करके भव्य पूजा करे। यदि प्रतिष्ठित लिंग उपलब्ध न हो, तो शिव-स्थान में, अथवा जल में भी पूजा कर सकता है।
Verse 70
वह्नौ रवौ तथा व्योम्नि भगवंतं शिवं यजेत्
अग्नि में, सूर्य में तथा खुले आकाश में भी भगवन् शिव की पूजा करे।
The chapter centers on pratiṣṭhā—installing and consecrating the liṅga (and associated bera/icon) through site selection, purification, marking by śāstric rules, and adhivāsa in a properly prepared ritual pavilion.
Directional deities, pots, and the eight elephants encode the cosmos into the ritual space, making the installation a microcosmic re-ordering where Śiva’s presence is stabilized within a fully ‘mapped’ universe of directions and guardians.
Gaṇeśa (Vināyaka) is worshipped first, followed by strict purity operations (sthānaśuddhi, pañcagavya cleansing) and śilpaśāstra-compliant marking—presented as prerequisites for valid consecration.