Adhyaya 6
Svargarohana ParvaAdhyaya 6116 Verses

Adhyaya 6

Chapter Arc: जनमेजय का जिज्ञासु प्रश्न उठता है—हे भगवन्, महाभारत-श्रवण का विधि-विधान क्या है, और पर्व-पर्व पर कौन-सा दान-धर्म अपेक्षित है? → वैशम्पायन उत्तर देते हुए श्रवण-पारायण की क्रमबद्ध मर्यादा, प्रत्येक पर्व की समाप्ति पर दान, ब्राह्मण-भोजन, हविष्य, गन्ध-माल्य-चन्दन, गौ-दान और सुवर्ण-निष्क सहित दान की सूक्ष्म विधि बताते हैं; कथा अब युद्ध-वीरता से हटकर ‘श्रवण’ को यज्ञ-तुल्य कर्म सिद्ध करने की ओर बढ़ती है। → श्रवण-पारायण के फल का उत्कर्ष घोषित होता है—पर्व-समाप्ति पर विधिपूर्वक आचरण करने वाला श्रोता दिव्य माल्य-अम्बर धारण कर देवताओं के साथ स्वर्ग में ‘दूसरे देव’ की भाँति आनंदित होता है; अश्वमेध, अतिरात्र आदि यज्ञ-फलों के तुल्य फल ‘भारत-श्रवण’ से प्राप्त होता है। → अध्याय श्रोता को परम कल्याण के लिए सतत प्रयत्न का उपदेश देता है—मन का संयम, भीतर-बाहर की शुद्धि, इतिहास का यथावत श्रवण, और पर्वानुसार महादान/रत्न-दान/ब्राह्मण-तर्पण द्वारा श्रवण को पूर्ण करना।

Shlokas

Verse 1

/ न्न् व निज: ।। स्वर्गारोहणपर्व सम्पूर्णम्‌ ।। नी (0) आप आन+- अनुष्टुप्‌ ( अन्य बड़े छन्द ) बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके कुल योग अनुष्टप्‌ घानकर गिननेपर उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये २१४॥ (३) ४> २१८ ॥० दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये स्वर्गारोहणपर्वकी कुल एलोकसंख्या -- २१८ ।।> श्रीमहाभारतं सम्पूर्णम्‌ - श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासके द्वारा प्रकट होनेके कारण “कृष्णादागतः कार्ष्ण:” इस व्युत्पत्तिके अनुसार यह उपाख्यान 'कार्ष्णवेद' के नामसे प्रसिद्ध है। महाभारतश्रवणविधि: माहात्म्य, कथा सुननेकी विधि और उसका फल जनमेजय उवाच भगवन्‌ केन विधिना श्रोतव्यं भारतं बुध: । फलं किं के च देवाश्न पूज्या वै पारणेष्विह,जनमेजयने पूछा--भगवन्‌! विद्वानोंको किस विधिसे महाभारतका श्रवण करना चाहिये? इसके सुननेसे क्या फल होता है? इसकी पारणाके समय किन-किन देवताओंका पूजन करना चाहिये? भगवन! प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर क्‍या दान देना चाहिये? और इस कथाका वाचक कैसा होना चाहिये? यह सब मुझे बतानेकी कृपा कीजिये

ジャナメージャヤは言った。「尊き御方よ、賢者はどのような作法によって『マハーバーラタ』を聴聞すべきでしょうか。聴聞によっていかなる果が生じますか。また読誦の結願(パーラナ/pāraṇa)の時、ここではいかなる神々を礼拝すべきでしょうか。」

Verse 2

देयं समाप्ते भगवन्‌ किं च पर्वणि पर्वणि । वाचक: कीदृशश्षात्र एष्टव्यस्तद्‌ वदस्व मे,जनमेजयने पूछा--भगवन्‌! विद्वानोंको किस विधिसे महाभारतका श्रवण करना चाहिये? इसके सुननेसे क्या फल होता है? इसकी पारणाके समय किन-किन देवताओंका पूजन करना चाहिये? भगवन! प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर क्‍या दान देना चाहिये? और इस कथाका वाचक कैसा होना चाहिये? यह सब मुझे बतानेकी कृपा कीजिये

ジャナメージャヤは言った。「尊き御方よ、(読誦の)成就の時には何を布施すべきでしょうか。さらに各パルヴァンの終わりごとには何を施すべきでしょうか。また、この聖なる物語の語り手(ヴァーチャカ)は、いかなる人物を選ぶべきでしょうか。どうかお教えください。」

Verse 3

वैशम्पायन उवाच शृणु राजन्‌ विधिमिमं फलं यच्चापि भारतात्‌ | श्रुताद्‌ भवति राजेन्द्र यत्‌ त्वं मामनुपृच्छसि,वैशम्पायनजीने कहा--राजेन्द्र! महाभारत सुननेकी जो विधि है और उसके श्रवणसे जो फल होता है, जिसके विषयमें तुमने मुझसे जिज्ञासा प्रकट की है, वह सब बता रहा हूँ; सुनो

ヴァイシャンパーヤナは言った。「聞け、王よ。『マハーバーラタ』を聴聞する正しい作法と、またその聴聞から生ずる果報とを—まさに汝が、諸王のうち最勝なる者として、我に問うたその事を—説き明かそう。」

Verse 4

दिवि देवा महीपाल क्रीडार्थमवनिं गता: । कृत्वा कार्यमिदं चैव ततश्न दिवमागता:,भूपाल! स्वर्गके देवता भगवान्‌की लीलामें सहायता करनेके लिये पृथ्वीपर आये थे और इस कार्यको पूरा करके वे पुनः स्वर्गमें जा पहुँचे

ヴァイシャンパーヤナは言った。「王よ、天上の神々は、主の神聖なる戯れ(リーラー)のために地上へ降りた。まさにこの務めを成し遂げると、彼らは再び天へ帰って行った。」

Verse 5

हन्त यत्‌ ते प्रवक्ष्यामि तच्छुणुष्व समाहित: । ऋषीणां देवतानां च सम्भवं वसुधातले,अब मैं इस भूतलपर ऋषियों और देवताओंके प्रादुर्भावके विषयमें प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें जो कुछ बताता हूँ, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो

ヴァイシャンパーヤナは言った。「さあ—心を一つにして、私が語ることを聞きなさい。地上における仙人(リシ)と神々の顕現と起源を、明らかに、そして善意をもって語ろう。」

Verse 6

अतन्र रुद्रास्तथा साध्या विश्वेदेवाश्ष शाश्वता: | आदित्यश्षाश्विनौ देवौ लोकपाला महर्षय:,भरतश्रेष्ठ।! यहाँ महाभारतमें रुद्र, साध्य, सनातन विश्वेदेव, सूर्य, अश्विनीकुमार, लोकपाल, महर्षि, गुह्मक, गन्धर्व, नाग, विद्याधर, सिद्ध, धर्म, स्वयम्भू ब्रह्मा, श्रेष्ठ मुनि कात्यायन, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, अप्सराओंके समुदाय, ग्रह, संवत्सर, अयन, ऋतु, सम्पूर्ण चराचर जगत्‌, देवता और असुर--ये सब-के-सब एकत्र हुए देखे जाते हैं

ヴァイシャンパーヤナは言った。「バーラタ族の最勝者よ、疲れを知らぬかのように集いし者たちが見えた—ルドラ神群、サーディヤ神群、永遠のヴィシュヴェデーヴァ神群、アーディティヤ神群、二柱のアシュヴィン神、世界の守護者(ローカパーラ)、そして大いなる仙人たちである。」

Verse 7

गुहाुका श्व सगन्धर्वा नागा विद्याधरास्तथा | सिद्धा धर्म: स्वयम्भूश्न मुनि: कात्यायनो वर:,भरतश्रेष्ठ।! यहाँ महाभारतमें रुद्र, साध्य, सनातन विश्वेदेव, सूर्य, अश्विनीकुमार, लोकपाल, महर्षि, गुह्मक, गन्धर्व, नाग, विद्याधर, सिद्ध, धर्म, स्वयम्भू ब्रह्मा, श्रेष्ठ मुनि कात्यायन, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, अप्सराओंके समुदाय, ग्रह, संवत्सर, अयन, ऋतु, सम्पूर्ण चराचर जगत्‌, देवता और असुर--ये सब-के-सब एकत्र हुए देखे जाते हैं

ヴァイシャンパーヤナは言った。「バーラタ族の最勝者よ、天界および半天の衆—グヒヤカ、ガンダルヴァ、ナーガ、ヴィディヤーダラ、シッダ—が共に集い、さらにダルマそのもの、スヴァヤンブー(梵天)、そして卓越せる聖仙カーティヤーヤナもまたそこにあった。」

Verse 8

गिरय: सागरा नद्यस्तथैवाप्सरसां गणा: । ग्रहा: संवत्सराश्वैव अयनान्यूतवस्तथा,भरतश्रेष्ठ।! यहाँ महाभारतमें रुद्र, साध्य, सनातन विश्वेदेव, सूर्य, अश्विनीकुमार, लोकपाल, महर्षि, गुह्मक, गन्धर्व, नाग, विद्याधर, सिद्ध, धर्म, स्वयम्भू ब्रह्मा, श्रेष्ठ मुनि कात्यायन, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, अप्सराओंके समुदाय, ग्रह, संवत्सर, अयन, ऋतु, सम्पूर्ण चराचर जगत्‌, देवता और असुर--ये सब-के-सब एकत्र हुए देखे जाते हैं

ヴァイシャンパーヤナは言った。「バーラタ族の最勝者よ、山々、海原、河川—またアプサラスの群れ—さらに諸惑星、歳年、アヤナ(至の運行)、そして季節—これらすべてが、そこに集いしものとして見えた。」

Verse 9

स्थावरं जड़म॑ चैव जगत्‌ सर्व सुरासुरम्‌ । भारते भरतश्रेष्ठ एकस्थमिह दृश्यते,भरतश्रेष्ठ।! यहाँ महाभारतमें रुद्र, साध्य, सनातन विश्वेदेव, सूर्य, अश्विनीकुमार, लोकपाल, महर्षि, गुह्मक, गन्धर्व, नाग, विद्याधर, सिद्ध, धर्म, स्वयम्भू ब्रह्मा, श्रेष्ठ मुनि कात्यायन, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, अप्सराओंके समुदाय, ग्रह, संवत्सर, अयन, ऋतु, सम्पूर्ण चराचर जगत्‌, देवता और असुर--ये सब-के-सब एकत्र हुए देखे जाते हैं

ヴァイシャンパーヤナは言った。「おお、バーラタ族のうち最もすぐれた者よ。この『マハーバーラタ』の中には、宇宙のすべて—神々とアスラ—が一つの場所に集い現れている。不動のもの、無知覚のもの、そして存在する一切がここにある。結末のこの大いなる幻視において、叙事詩はダルマの全景を示し、あらゆる存在の位階が並び立って、ダルマの最終の裁きとパーンダヴァたちの運命を見届けるかのようである。」

Verse 10

तेषां श्रुत्वा प्रतिष्ठानं नामकर्मानुकीर्तनात्‌ । कृत्वापि पातकं घोरं सद्यो मुच्येत मानव:,मनुष्य घोर पातक करनेपर भी उन सबकी प्रतिष्ठा सुनकर तथा प्रतिदिन उनके नाम और कर्मोका कीर्तन करता हुआ उससे तत्काल मुक्त हो जाता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「彼らの高き位を聞き、またその名と行いを常に語り称えるなら、人は—たとえ恐るべき罪を犯していても—ただちにそれから解き放たれる。ここに示されるのは、正しき者を憶念し讃えることの浄化の力であり、真実の聴聞と誦述によって道徳の更生が開かれるという教えである。」

Verse 11

इतिहासमिमं श्रुत्वा यथावदनुपूर्वश: । संयतात्मा शुचिर्भूत्वा पारं गत्वा च भारते,महादानानि देयानि रत्नानि विविधानि च । मनुष्य अपने मनको संयममें रखते हुए बाहर-भीतरसे शुद्ध हो महाभारतमें वर्णित इस इतिहासको क्रमश: यथावत्‌ रूपसे सुनकर इसे समाप्त करनेके पश्चात्‌ इनमें मारे गये प्रमुख वीरोंके लिये श्राद्ध करे। भारत! भरतभूषण! महाभारत सुनकर श्रोता अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे नाना प्रकारके रत्न आदि बड़े-बड़े दान दे

ヴァイシャṃパーヤナは言った。「この物語を、順序正しく、ありのままに聞き、心を制して内外ともに清浄となり、終わりまで聴き終えたならば、バーラタよ—その後に大いなる布施をなすべきである。さまざまな宝玉をも施すがよい。『マハーバーラタ』を聴き終えたのち、聞き手は力の及ぶかぎり、討ち死にした主要な英雄たちのためにシュラーダッダ(śrāddha)を営み、敬虔の心をもってブラーフマナたちに惜しみなく施すべきである。」

Verse 12

तेषां श्राद्धानि देयानि श्रुत्वा भारत भारतम्‌ । ब्राह्मणेभ्यो यथाशक्त्या भक्‍त्या च भरतर्षभ

ヴァイシャṃパーヤナは言った。「このバーラタ族の物語を聞き終えたなら、バーラタの末裔よ、彼らのためにシュラーダッダ(śrāddha)の儀礼を営むべきである—そして力の及ぶかぎり、真実の帰依をもってブラーフマナたちに施すのだ。バーラタ族のうち最もすぐれた者よ。」

Verse 13

गाव: कांस्योपदोहाश्न कन्याश्वैव स्वलंकृता:

ヴァイシャンパーヤナは言った。「青銅の搾乳器を備えた牛があり、また、華やかに飾り立てた乙女たちもいた。」この偈は、吉祥なる贈与と儀礼の供物の光景を呼び起こし、富をため込むのではなく、施しと歓待と功徳のために用いるべきだという社会的・倫理的理想を示している。

Verse 14

सर्वकामगुणोपेता यानानि विविधानि च । भवनानि विचित्राणि भूमिर्वासांसि काउ्चनम्‌

ヴァイシャンパーヤナは言った。「そこには、望まれるあらゆる安楽と妙徳を具えた多種多様の乗り物があり、また驚くべき彩り豊かな邸宅があり、さらに土地と衣—黄金の輝きを放つもの—があった。」

Verse 15

वाहनानि च देयानि हया मत्ताश्ष वारणा: । शयनं शिबिकाश्रैव स्यन्दनाश्च स्वलंकृता:

ヴァイシャンパーヤナは言った。「乗り物は布施(ダーナ)として与えるべきである—勇み立つ馬、発情して荒ぶる象。さらに寝台と輿(こし)、そして美しく飾られた戦車も。」

Verse 16

यद्‌ यद्‌ गृहे वरं किंचिद्‌ यद्‌ यदस्ति महद्‌ वसु । तत्‌ तद्‌ देयं द्विजातिभ्य आत्मा दाराश्न सूनव:

ヴァイシャンパーヤナは言った。「家にある最上のものは何であれ、またそこにある大いなる財は何であれ—それらは一つ残らず二度生まれし者(ドヴィジャ)に施すべきである。まことに、自身、妻、そして息子たちさえも(完全な捨離と施与の精神において)捧げるべきである。」

Verse 17

गौएँ, काँसीके दुग्धपात्र, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और सम्पूर्ण मनोवाञ्छित गुणोंसे युक्त कन्याएँ, नाना प्रकारके यान, विचित्र भवन, भूमि, वस्त्र, सुवर्ण, वाहन, घोड़े, मतवाले हाथी, शय्या, शिबिकाएँ, सजे-सजाये रथ तथा घरमें जो कोई भी श्रेष्ठ वस्तु और महान्‌ धन हो, वह सब ब्राह्मणोंको देने चाहिये। स्त्री-पुत्रोंसहित अपने शरीरको भी उनकी सेवामें लगा देना चाहिये ।। श्रद्धया परया युक्त क्रमशस्तस्य पारग: । शक्तित: सुमना हृष्ट: शुश्रुषुरविकल्पक:

ヴァイシャンパーヤナは言った。婆羅門たちに与えるべきは、牛、カーシーの乳器、衣と装身具、望まれる諸徳を具えた乙女たち、さまざまな乗り物、奇麗なる邸宅、土地、衣服、黄金、車乗、馬、発情して荒ぶる象、寝台、輿、そして飾り整えられた戦車である。家にあるいかなる最上の品と大いなる財も、ことごとく施すべきである。さらに妻子とともに、自らの身さえ彼らへの奉仕に捧げるべきである。至上の信(シュラッダー)を具え、力に応じて、段階を追って彼岸(事の究竟)へと進みゆけ—心は朗らかに、胸は喜びに満ち、奉仕に専念し、ためらいを離れて。

Verse 18

पूर्ण श्रद्धाकें साथ क्रमश: कथा सुनते हुए उसे अन्ततक पूर्णरूपसे श्रवण करना चाहिये। यथाशक्ति श्रवणके लिये उद्यत रहकर मनको प्रसन्न रखे। हृदयमें हर्षसे उललसित हो मनमें संशय या तर्क-वितर्क न करे ।। सत्यार्जवरतो दान्त: शुचि: शौचसमन्वित: । श्रद्धधानो जितक्रोधो यथा सिध्यति तच्छृूणु,सत्य और सरलताके सेवनमें संलग्न रहे। इन्ट्रियोंका दमन करे, शुद्ध एवं शौचाचारसे सम्पन्न रहे। श्रद्धालु बना रहे और क्रोधको काबूमें रखे। ऐसे श्रोताको जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त होती है, वह बताता हूँ; सुनो

ヴァイシャンパーヤナは言った。「この物語は、完全な信をもって段階を追って聴き、終わりに至るまで余すところなく聴聞すべきである。力の及ぶかぎり聴聞に励み、心を朗らかに保て。喜びにより胸を高くし、疑いにも、理屈の争いにも沈むな。真実と率直を誓い、自制し、清浄で潔斎を守り、信を抱き、怒りを制する聴き手—そのような者がいかにして霊的成就を得るか、今わたしが語ろう。聴け。」

Verse 19

शुचि: शीलान्विताचार: शुक्लवासा जितेन्द्रिय: । संस्कृत: सर्वशास्त्रज्ञ: श्रद्दधानोइनसूयक:,जो बाहर-भीतरसे पवित्र, शीलवानू, सदाचारी, शुद्ध वस्त्र धारण करनेवाला, जितेन्द्रिय, संस्कारसम्पन्न, सम्पूर्ण शास्त्रोंका तत्त्वज्ञ, श्रद्धालू, दोषदृष्टिसे रहित, रूपवान्‌, सौभाग्यशाली, मनको वशगमें रखनेवाला, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हो, ऐसे विद्वान्‌ पुरुषको दान और मानसे अनुगृहीत करके वाचक बनाना चाहिये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「内にも外にも清らかで、徳と正しい行いを備え、清浄な白衣をまとい、感官を制し、教養に富み、あらゆるシャーストラ(śāstra)の精髄に通じ、信心深く、他人の過失をあげつらわぬ学匠を、語り手(vācaka)として任ずべきである。その学者を布施と敬意によって遇し支えるなら、ダルマを損なわぬかたちで聖なる物語を伝えるにふさわしくなる。」

Verse 20

रूपवान्‌ सुभगो दान्त: सत्यवादी जितेन्द्रिय: । दानमानगृहीतश्न कार्यो भवति वाचक:,जो बाहर-भीतरसे पवित्र, शीलवानू, सदाचारी, शुद्ध वस्त्र धारण करनेवाला, जितेन्द्रिय, संस्कारसम्पन्न, सम्पूर्ण शास्त्रोंका तत्त्वज्ञ, श्रद्धालू, दोषदृष्टिसे रहित, रूपवान्‌, सौभाग्यशाली, मनको वशगमें रखनेवाला, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हो, ऐसे विद्वान्‌ पुरुषको दान और मानसे अनुगृहीत करके वाचक बनाना चाहिये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「容姿端麗で福運に恵まれ、節度を保ち、真実を語り、感官を制する者—そのような学匠を、布施と敬意によって遇し支えるなら、語り手(vācaka)として任ずべきである。」

Verse 21

अविलम्बमनायस्तमद्रुतं धीरमूर्जितम्‌ । असंसक्ताक्षरपदं स्वरभावसमन्वितम्‌,कथावाचकको न तो बहुत रुक-रुककर कथा बाँचनी चाहिये और न बहुत जल्दी ही। आरामके साथ धीरगतिसे अक्षरों और पदोंका स्पष्ट उच्चारण करते हुए उच्चस्वरसे कथा बाँचनी चाहिये। मीठे स्वरसे भावार्थ समझाकर कथा कहनी चाहिये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「語りは、いたずらに滞って苦しくなってはならず、また急ぎすぎてもならない。落ち着きと力をもって一定の歩みで進め、音節と語を明瞭に発し、だらりと連ねず、声と情趣とを調和させよ。そうしてこそ語り手は、甘やかに意を伝え、物語を分かりやすく、しかも効き目あるものとする。」

Verse 22

त्रिषष्टिवर्णसंयुक्तमष्टस्थानसमीरितम्‌ । वाचयेद्‌ वाचक: स्वस्थ: स्वासीन: सुसमाहित:,तिरसठ अक्षरोंका उनके आठों स्थानोंसे ठीक-ठीक उच्चारण करे। कथा सुनाते समय वाचकके लिये स्वस्थ और एकाग्रचित्त होना आवश्यक है। उसके लिये आसन ऐसा होना चाहिये जिसपर वह सुखपूर्वक बैठ सके

ヴァイシャンパーヤナは言った。「語り手は、六十三の音素から成る本文を、八つの発音部位に従って正しく発して読誦せよ。物語るとき、読者は健やかで、楽に坐し、深く心を統一していなければならない。」

Verse 23

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्‌ | देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्‌,अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये

ナーラーヤナに礼拝し、また人中の最勝者なるナラに、さらに女神サラスヴァティーとヴィヤーサに帰敬してのち、ついで「ジャヤ」(すなわち『マハーバーラタ』)を誦すべきである。

Verse 24

ईदृशाद्‌ वाचकादू राजन श्रुत्वा भारत भारतम्‌ | नियमस्थ: शुचि: श्रोता शृण्वन्‌ स फलमश्षुते,राजन! भरतनन्दन! नियमपरायण पवित्र श्रोता ऐसे वाचकसे महाभारतकी कथा सुनकर श्रवणका पूरा-पूरा फल पाता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「王よ——バラタの裔よ——このような徳ある誦者から『マハーバーラタ』を聴くならば、戒を守り清浄なる聴聞者は、慎みをもって心を澄ませて聴き、その聴聞の果報を余すところなく得るのである。」

Verse 25

पारणं प्रथम प्राप्प द्विजान्‌ कामैश्न तर्पयन्‌ । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं वै लभते नर:,जो मनुष्य प्रथम पारणके समय ब्राह्मणोंको अभीष्ट वस्तुएँ देकर तृप्त करता है वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है। उसे अप्सराओंसे भरा हुआ विमान प्राप्त होता है और वह प्रसन्नतापूर्वक एकाग्रचित्त हो देवताओंके साथ स्वर्गलोकमें जाता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「初めての斎戒を解く時(パーラナ)に至り、望まれる施物をもって二度生まれし者(ブラーフマナ)を満ち足らせる人は、まことにアグニシュトーマ祭の功徳を得る。」

Verse 26

अप्सरोगणसंकीर्ण विमानं लभते महत्‌ | प्रहृष्ट: स तु देवैश्व दिवं याति समाहित:,जो मनुष्य प्रथम पारणके समय ब्राह्मणोंको अभीष्ट वस्तुएँ देकर तृप्त करता है वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है। उसे अप्सराओंसे भरा हुआ विमान प्राप्त होता है और वह प्रसन्नतापूर्वक एकाग्रचित्त हो देवताओंके साथ स्वर्गलोकमें जाता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「その者は、アプサラスの群れで満ちた大いなる天の車を得る。歓喜し、心を一つに収めて、神々とともに天界へ赴く。」

Verse 27

द्वितीयं पारणं प्राप्प सो$तिरात्रफलं लभेत्‌ । सर्वरत्नमयं दिव्यं विमानमधिरोहति,जो मनुष्य दूसरा पारण पूरा करता है उसे अतिरात्र यज्ञका फल मिलता है। वह सर्वरत्नमय दिव्य विमानपर आरूढ़ होता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「第二のパーラナを成し遂げた者は、アティラートラ祭の功徳を得る。そして、あらゆる宝玉で作られたかのように輝く、神々しき空中の車に乗り昇る。」

Verse 28

दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धविभूषित: । दिव्याड्भदधरो नित्यं देवलोके महीयते,वह दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करता, दिव्य चन्दनसे चर्चित एवं दिव्य सुगन्धसे वासित होता और दिव्य अंगद धारण करके सदा देवलोकमें सम्मानित होता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「天の花鬘と天衣をまとい、神妙なる香りを身に塗り薫らせ、光り輝く臂輪を帯びて、彼は神々の世界において常に尊ばれる。」

Verse 29

तृतीयं पारणं प्राप्प द्वादशाहफलं लभेत्‌ । वसत्यमरसंकाशो वर्षाण्ययुतशो दिवि,तीसरा पारण पूरा करनेपर मनुष्य द्वादशाहयज्ञका फल पाता है और देवताओंके तुल्य तेजस्वी होकर हजारों वर्षोतक स्वर्गलोकमें निवास करता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「第三のパーラナ(pāraṇa)を成し遂げた者は、十二日間の供犠に等しい功徳を得る。不死の神々のごとく輝き、天界において幾万年ものあいだ住まうのである。」

Verse 30

चतुर्थे वाजपेयस्य पठ्चमे द्विगुणं फलम्‌ । उदितादित्यसंकाशं ज्वलन्तमनलोपमम्‌

ヴァイシャンパーヤナは言った。「第四の段においてはヴァージャペーヤ(Vājapeya)供犠の果報を得、第五の段ではその果報が倍となる――昇りたての太陽のように、燃え立ち、火に比すべき輝きである。」

Verse 31

विमान विबुधै: सार्धमारुह् दिवि गच्छति । वर्षायुतानि भवने शक्रस्य दिवि मोदते

ヴァイシャンパーヤナは言った。「神々とともに天の車に乗り、彼は天界へ赴く。幾万年ものあいだ、天上の国、インドラの宮殿において歓喜する――それは、世の試練を越えて正しき行いを積み、ダルマを尊んだ果報である。」

Verse 32

चौथे पारणमें वाजपेय-यज्ञका और पाँचवेंमें उससे दूना फल प्राप्त होता है। वह पुरुष उदयकालके सूर्य तथा प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी विमानपर आरूढ़ हो देवताओंके साथ स्वर्गलोकमें जाता है और वहाँ इन्द्रभवनमें दस हजार वर्षोतक आनन्द भोगता है ।। षष्ठे द्विगुणमस्तीति सप्तमे त्रिगुणं फलम्‌ । कैलासशिखराकार वैदूर्यमणिवेदिकम्‌

ヴァイシャンパーヤナは言った。「第六のパーラナでは功徳は倍になると言われ、第七では三倍となる。(その果報は)カイラーサ山の峰のごとき光輝ある天上の住処であり、ヴァイドゥーリヤ(vaidūrya)の宝を嵌め込んだ台座の上に据えられている。」

Verse 33

परिक्षिप्तं च बहुधा मणिविद्रुम भूषितम्‌ । विमान समधिष्ठाय कामगं साप्सरोगणम्‌

ヴァイシャンパーヤナは言った。「さまざまに飾り立てられ、宝玉と珊瑚で豪奢に荘厳された天の車に、彼らは乗り込んだ――それは意のままにどこへでも赴くことができ、アプサラスたちの一団が随従していた。」

Verse 34

सर्वाल्लोकान्‌ विचरते द्वितीय इव भास्कर: । छठे पारणमें इससे दूना और सातवेंमें तिगुना फल मिलता है। वह मनुष्य अप्सराओंसे भरे हुए और इच्छानुसार चलनेवाले, कैलासशिखरकी भाँति उज्ज्वल, वैदूर्यमणिकी वेदियोंसे विभूषित, नाना प्रकारसे सुसज्जित तथा मणियों और मूँगोंसे अलंकृत विमानपर बैठकर दूसरे सूर्यकी भाँति सम्पूर्ण लोकोंमें विचरता है || ३२-३३ ई ।। अष्टमे राजसूयस्य पारणे लभते फलम्‌,आठवें पारणमें मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है। वह मनके समान वेगशाली और चन्द्रमाकी किरणोंके समान रंगवाले श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए चन्द्रोदयतुल्य रमणीय विमानपर आरूढ़ होता है

ヴァイシャンパーヤナは語った。彼は第二の太陽のごとく、あらゆる世界を巡り行く。ここでは、戒律ある修行(ヴラタ)を段階的に成就することで得られる崇高な来世の果報が説かれる。第六の成就では功徳は倍となり、第七では三倍となる。かくして人は、意のままに進む光輝く天の車(ヴィマーナ)に乗る—カイラーサ山の峰のように明るく、ヴァイドゥールヤ宝の壇座で飾られ、宝玉と珊瑚で荘厳され、アプサラスに囲まれて—太陽の輝きで宇宙を遍歴する。第八の成就に至れば、ラージャスーヤ祭の果を得て、月の出のように麗しいヴィマーナに昇る。そこは、心のごとく速く、月光のように白い駿馬に繋がれている。

Verse 35

चन्द्रोदयनिभं रम्यं विमानमधिरोहति । चन्द्ररश्मिप्रतीकाशैह्यैर्युक्ते मनोजवै:,आठवें पारणमें मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है। वह मनके समान वेगशाली और चन्द्रमाकी किरणोंके समान रंगवाले श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए चन्द्रोदयतुल्य रमणीय विमानपर आरूढ़ होता है

彼は月の出のように麗しいヴィマーナに昇る。そこは、心のごとく速く、月光の色を帯びた白馬に繋がれている。

Verse 36

सेव्यमानो वरस्त्रीणां चन्द्रात्‌ कान्ततरैर्मुखै: । मेखलानां निनादेन नूपुराणां च निः:स्वनै:

ヴァイシャンパーヤナは語った。彼は月よりもなお輝く顔をもつ優れた女たちに侍され、敬われていた。腰帯の鈴の音と足輪の澄んだ響きが、あたりに鳴り渡っていた。

Verse 37

नवमे क्रतुराजस्य वाजिमेधस्य भारत,भारत! नवाँ पारण पूर्ण होनेपर श्रोताको यज्ञोंके राजा अश्वमेधका फल प्राप्त होता है। वह सोनेके खंभों और छज्जोंसे सुशोभित, वैदूर्यमणिकी बनी हुई वेदियोंसे विभूषित, चारों ओरसे जाम्बूनदमय दिव्य वातायनोंसे अलंकृत, स्वर्गवासी गन्धर्वों एवं अप्सराओंसे सेवित दिव्य विमानपर आरूढ़ हो अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होता हुआ स्वर्गमें दूसरे देवताकी भाँति देवताओंके साथ आनन्द भोगता है। उसके अंगोंमें दिव्य माला एवं दिव्य वस्त्र शोभा पाते हैं तथा वह दिव्य चन्दनसे चर्चित होता है

ヴァイシャンパーヤナは語った。おお、バーラタよ。第九の修行が成就すると、聞く者は祭祀の王アシュヴァメーダの果報を得る。黄金の柱と天蓋に飾られ、ヴァイドゥールヤ宝の壇座で荘厳され、四方をジャームブーナダ金の神々しい窓で囲まれた天のヴィマーナに乗り、天界のガンダルヴァとアプサラスに侍されつつ、彼は自らの卓越した光彩で輝く。天においては、第二の神のごとく諸神とともに歓喜を味わう。天の花鬘と衣がその身を飾り、天の白檀が塗られている。

Verse 38

काञ्चनस्तम्भनिर्यूहवैदूर्यकृतवेदिकम्‌ । जाम्बूनदमर्यैर्दिव्यैर्गवाक्षै: सर्वतो वृतम्‌,भारत! नवाँ पारण पूर्ण होनेपर श्रोताको यज्ञोंके राजा अश्वमेधका फल प्राप्त होता है। वह सोनेके खंभों और छज्जोंसे सुशोभित, वैदूर्यमणिकी बनी हुई वेदियोंसे विभूषित, चारों ओरसे जाम्बूनदमय दिव्य वातायनोंसे अलंकृत, स्वर्गवासी गन्धर्वों एवं अप्सराओंसे सेवित दिव्य विमानपर आरूढ़ हो अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होता हुआ स्वर्गमें दूसरे देवताकी भाँति देवताओंके साथ आनन्द भोगता है। उसके अंगोंमें दिव्य माला एवं दिव्य वस्त्र शोभा पाते हैं तथा वह दिव्य चन्दनसे चर्चित होता है

ヴァイシャンパーヤナは語った。「おお、バーラタよ。それは四方をジャームブーナダ金の神々しい格子窓に囲まれ、黄金の柱と張り出した軒飾りで飾られ、ヴァイドゥールヤ宝で作られた壇座(祭壇の台)を備えていた。」

Verse 39

सेवितं चाप्सर: सड्घैर्गन्धर्वैर्देविचारिभि: । विमानं समधिष्ठाय श्रिया परमया ज्वलन्‌,भारत! नवाँ पारण पूर्ण होनेपर श्रोताको यज्ञोंके राजा अश्वमेधका फल प्राप्त होता है। वह सोनेके खंभों और छज्जोंसे सुशोभित, वैदूर्यमणिकी बनी हुई वेदियोंसे विभूषित, चारों ओरसे जाम्बूनदमय दिव्य वातायनोंसे अलंकृत, स्वर्गवासी गन्धर्वों एवं अप्सराओंसे सेवित दिव्य विमानपर आरूढ़ हो अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होता हुआ स्वर्गमें दूसरे देवताकी भाँति देवताओंके साथ आनन्द भोगता है। उसके अंगोंमें दिव्य माला एवं दिव्य वस्त्र शोभा पाते हैं तथा वह दिव्य चन्दनसे चर्चित होता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。天を行くガンダルヴァとアプサラスの群れに仕えられ、彼は天上のヴィマーナに乗り上がって座を占める。至上の光輝に燃え立ち、ああバーラタよ、彼は燦然と輝く。

Verse 40

दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यचन्दनरूषित: । मोदते दैवतै: सार्थ दिवि देव इवापर:,भारत! नवाँ पारण पूर्ण होनेपर श्रोताको यज्ञोंके राजा अश्वमेधका फल प्राप्त होता है। वह सोनेके खंभों और छज्जोंसे सुशोभित, वैदूर्यमणिकी बनी हुई वेदियोंसे विभूषित, चारों ओरसे जाम्बूनदमय दिव्य वातायनोंसे अलंकृत, स्वर्गवासी गन्धर्वों एवं अप्सराओंसे सेवित दिव्य विमानपर आरूढ़ हो अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होता हुआ स्वर्गमें दूसरे देवताकी भाँति देवताओंके साथ आनन्द भोगता है। उसके अंगोंमें दिव्य माला एवं दिव्य वस्त्र शोभा पाते हैं तथा वह दिव्य चन्दनसे चर्चित होता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。天の花鬘と衣をまとい、神なる白檀の香膏を塗られ、彼は天上で神々とともに歓喜する。ああバーラタよ、まるで別の神のごとく輝く。

Verse 41

दशमं पारणं प्राप्य द्विजातीनभिवन्द्य च । किंकिणीजालनिर्घोषं पताकाध्वजशोभितम्‌

ヴァイシャンパーヤナは言った。第十の渡りに至り、二度生まれし者(ドヴィジャ)に恭しく礼拝して、彼らは鈴の房が鳴り響く音に満ち、旗幟と幢が飾られた場所へと至った。

Verse 42

रत्नवेदिकसम्बाधं वैदूर्यममणितोरणम्‌ । हेमजालपरिक्षिप्तं प्रवालवलभीमुखम्‌

ヴァイシャンパーヤナは言った。(彼らは天上の楼閣を見た。)宝石の壇が隙間なく飾られ、門とトーラナはヴァイドゥーリヤの宝で荘厳されていた。金の網のような格子が周囲をめぐり、正面と屋根の縁は珊瑚色の光を放っていた。

Verse 43

गन्धर्वैर्गीतकुशलैरप्सरोभिश्व शोभितम्‌ । विमान॑ सुकृतावासं सुखेनैवोपपद्यते

ヴァイシャンパーヤナは言った。歌に巧みなガンダルヴァとアプサラスにより荘厳されたその天上のヴィマーナは、善業の果として与えられた住処であり、安らかに、たやすく彼のもとへと現れる。

Verse 44

दसवाँ पारण पूरा होनेपर ब्राह्मणोंको प्रणाम करनेके पश्चात्‌ श्रोताको पुण्यनिकेतन विमान अनायास ही प्राप्त हो जाता है। उसमें छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरें लगी होती हैं और उनसे मधुर ध्वनि फैलती रहती है। बहुत-सी ध्वजा-पताकाएँ उस विमानकी शोभा बढ़ाती हैं। उनमें जगह-जगह रत्नमय चबूतरे बने होते हैं। वैदूर्य-यमणिका बना हुआ फाटक लगा होता है। सब ओरसे सोनेकी जालीद्वारा वह विमान घिरा होता है। उसके छज्जोंके नीचे मूँगे जड़े होते हैं। संगीतकुशल गण्धर्वों और अप्सराओंसे उस विमानकी शोभा और बढ़ जाती है ।। मुकुटेनाग्निवर्णेन जाम्बूनदविभूषिणा । दिव्यचन्दनदिग्धाड़ो दिव्यमाल्यविभूषित:,उसपर बैठा हुआ पुण्यात्मा पुरुष अग्नितुल्य तेजस्वी मुकुटसे अलंकृत तथा जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित होता है। उसका शरीर दिव्य चन्दनसे चर्चित तथा दिव्य मालाओंसे विभूषित होता है। दिव्य भोगोंसे सम्पन्न हो वह दिव्य लोकोंमें विचरता है और देवताओंकी कृपासे उत्कृष्ट शोभा-सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है

ヴァイシャンパーヤナは語った。かの天の乗り物に座す功徳ある者は、火のごとく赫々と輝く冠を戴き、清らかなジャームブーナダ金の宝飾を身に帯びる。四肢は天なる白檀に塗られ、天上の花鬘にて荘厳される。天界の享楽を具え、諸々の神界を巡りゆき、神々の恩寵によって、至高の光栄と繁栄を得る—それは敬虔な修行と恭敬の行いの果として示されるのである。

Verse 45

दिव्यॉल्लोकान्‌ विचरति दिव्यैर्भोगै: समन्वित: । विबुधानां प्रसादेन श्रिया परमया युत:,उसपर बैठा हुआ पुण्यात्मा पुरुष अग्नितुल्य तेजस्वी मुकुटसे अलंकृत तथा जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित होता है। उसका शरीर दिव्य चन्दनसे चर्चित तथा दिव्य मालाओंसे विभूषित होता है। दिव्य भोगोंसे सम्पन्न हो वह दिव्य लोकोंमें विचरता है और देवताओंकी कृपासे उत्कृष्ट शोभा-सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है

ヴァイシャンパーヤナは語った。天界の享楽を具え、彼は諸々の神界を自在に巡る。さらに神々の恩寵によって、至高の光栄と繁栄を身に受ける。この偈は『マハーバーラタ』の倫理の眼目を示す—功徳の行いは死を越えて果を結び、ついには神恩により授けられる輝ける名誉へと至るのである。

Verse 46

अथ वर्षगणानेवं स्वर्गलोके महीयते । ततो गन्धर्वसहित: सहस्राण्येकविंशतिम्‌

かくして天界において、彼は天の衆によってこのように崇められる。その後、ガンダルヴァらを伴い、彼はさらに進む—時と数のはかり知れぬ広がりを経て—二万一千に及ぶ。

Verse 47

दिव्ययानविमानेषु लोकेषु विविधेषु च

ヴァイシャンパーヤナは語った。(彼らは)天の乗り物にあり、また種々の世界に見出された—業に応じて衆生が異なる神界と異なる渡り方を得るという、死後の秩序をほのめかす描写である。

Verse 48

ततः सूर्यस्य भवने चन्द्रस्य भवने तथा

それから彼らは太陽の宮へ、また同じく月の宮へと至った—天界の諸領域をしかるべき順序に従って進みゆく。正しき行いの果は、衆生をより高き位へと導くからである。

Verse 49

एवमेतन्महाराज नात्र कार्या विचारणा

ヴァイシャンパーヤナは言った。「そのとおりでございます、大王よ。ここでこれ以上思案する必要はありません。」

Verse 50

श्रद्धधानेन वै भाव्यमेवमाह गुरुर्मम । महाराज! ठीक ऐसी ही बात है। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मेरे गुरुका कथन है कि महाभारतकी इस महिमा और फलपर श्रद्धा रखनी चाहिये ।। ४९६ || वाचकस्य तु दातव्यं मनसा यद्‌ यदिच्छति,हस्त्यश्वरथयानानि वाहनानि विशेषत: । वाचकको उसके मनमें जिस-जिस वस्तुकी इच्छा हो वह सब देनी चाहिये। हाथी, घोड़े, रथ, पालकी तथा दूसरे-दूसरे वाहन विशेषरूपसे देने चाहिये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「これは信をもって受けとめねばならぬ—それが我が師の宣言である。大王よ、まさにそのとおりで、この件に異なる思いを差し挟んではならない。我が師の教えは、『マハーバーラタ』の偉大さと、それが授ける霊的果報とを信受せよ、ということだ。さらに、語り手が心に望むものは何であれ与えるべきである—とりわけ象、馬、戦車、輿(こし)、その他の乗り物を。」

Verse 51

कटके कुण्डले चैव ब्रह्मुसूत्रं तथा परम्‌,कड़े, कुण्डल, यज्ञोपवीत, विचित्र वस्त्र और विशेषत: गनन्‍्ध अर्पित करके वाचककी देवताके समान पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला श्रोता भगवान्‌ विष्णुके लोकमें जाता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「腕輪と耳飾りを捧げ、さらに聖紐(ヤジュニョーパヴィータ)をはじめ、諸々の装身具、上質で彩り豊かな衣、そしてとりわけ香料を供えて、語り手を神に礼拝するがごとく敬いなさい。かく行う聴聞者は、主ヴィシュヌの世界に至る。」

Verse 52

वस्त्र चैव विचित्र च गन्धं चैव विशेषत: । देववत्‌ पूजयेत्‌ तं तु विष्णुलोकमवाप्नुयात्‌,कड़े, कुण्डल, यज्ञोपवीत, विचित्र वस्त्र और विशेषत: गनन्‍्ध अर्पित करके वाचककी देवताके समान पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला श्रोता भगवान्‌ विष्णुके लोकमें जाता है

上質で彩り豊かな衣を捧げ、とりわけ香料を供え、かの語り手を神に礼拝するがごとく礼敬すべきである。そうする聴聞者はヴィシュヌの世界に至る—すなわち、聖なる教えとそれを伝える者への敬意そのものが功徳あるダルマであり、吉祥の行き先へ導くのである。

Verse 53

अतः: पर प्रवक्ष्यामि यानि देयानि भारते । वाच्यमाने तु विप्रेभ्यो राजन्‌ पर्वणि पर्वणि,राजन! भरतश्रेष्ठ) महाभारतकी कथा प्रारम्भ हो जानेपर प्रत्येक पर्वमें क्षत्रियोंकी जाति, देश, सत्यता, माहात्म्य, धर्म और वृत्तिको जानकर ब्राह्मणोंको जो-जो वस्तुएँ अर्पित करनी चाहिये, अब उनका वर्णन करूँगा

ヴァイシャンパーヤナは言った。「これより先、『バーラタ』(マハーバーラタ)において施すべき布施について述べよう。王よ、物語がバラモンたちに誦されているあいだ、各パルヴァンごとに、ふさわしい施与を捧げるべきである。」

Verse 54

जातिं देशं च सत्यं च माहात्म्यं भरतर्षभ | धर्म वृत्ति च विज्ञाय क्षत्रियाणां नराधिप,राजन! भरतश्रेष्ठ) महाभारतकी कथा प्रारम्भ हो जानेपर प्रत्येक पर्वमें क्षत्रियोंकी जाति, देश, सत्यता, माहात्म्य, धर्म और वृत्तिको जानकर ब्राह्मणोंको जो-जो वस्तुएँ अर्पित करनी चाहिये, अब उनका वर्णन करूँगा

ヴァイシャンパーヤナは言った。「おお、バーラタ族の雄牛よ、王よ—バーラタの系譜において最もすぐれた御方よ—クシャトリヤたちの血統と国土、真実性と偉大さ、さらにダルマと慣習の行いを確かめ知ったうえで、いま『マハーバーラタ』の物語が語り始められたのち、各パルヴァンごとに婆羅門へいかなる供物を捧げるべきかを説き明かそう。」

Verse 55

स्वस्ति वाच्य द्विजानादौ ततः कार्ये प्रवर्तिते । समाप्ते पर्वणि ततः स्वशकक्‍्त्या पूजयेद्‌ द्विजान्‌,पहले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर कथावाचनका कार्य प्रारम्भ कराये। फिर पर्व समाप्त होनेपर अपनी शक्तिके अनुसार उन ब्राह्मणोंकी पूजा करे

ヴァイシャンパーヤナは言った。「まず婆羅門たちに吉祥の祝詞(svasti)を唱えさせ、そののち意図する誦読/儀礼の営みを始めよ。パルヴァンが終わったなら、己の力に応じてその婆羅門たちを敬い、供養すべきである。」

Verse 56

आदी तु वाचकं चैव वस्त्रगन्धसमन्वितम्‌ | विधिवद्‌ भोजयेद्‌ राजन्‌ मधु पायसमुनत्तमम्‌,राजन्‌! आदिपर्वकी कथाके समय वाचकको नूतन वस्त्र पहनाकर चन्दन आदिसे उसकी पूजा करे और विधिपूर्वक उसे मीठी एवं उत्तम खीर भोजन कराये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「初めに、王よ、語り手(誦者)を法にかなって敬い—新しい衣をまとわせ、香油を塗って荘厳し—ついで作法どおり、甘き蜜と最上のパーヤサ(乳粥)を食してもらうべきである。」

Verse 57

ततो मूलफलप्रायं पायसं मधुसर्पिषा । आस्तीके भोजयेदू राजन्‌ दद्याच्चैव गुडौदनम्‌,राजन! तत्पश्चात्‌ आस्तीकपर्वकी कथाके समय ब्राह्मणोंको मधु और घीसे युक्त खीर भोजन कराये। उस भोजनमें फल-मूलकी अधिकता होनी चाहिये। फिर गुड़ और भात दान करे

次いで、王よ、アースティーカ(Āstīka)に関わる誦読/儀礼の折には、婆羅門たちに蜜とギー(澄ましバター)を加えたパーヤサを供し、その中には果実と根菜を多くすべきである。さらに後、グダ(黒糖)を和えた甘飯を施しとして与えよ。

Verse 58

अपूपैश्नैव पूपैश्न मोदकैश्व समन्वितम्‌ । सभापर्वणि राजेन्द्र हविष्यं भोजयेद्‌ द्विजान्‌

ヴァイシャンパーヤナは言った。「王中の王よ、サバー・パルヴァンの折には、二度生まれし者(dvija)に供物の食(haviṣya)を供し、アプーパ、プーパ、モーダカを添えて饗すべきである。」

Verse 59

राजेन्द्र! सभापर्व आरम्भ होनेपर ब्राह्मणोंको पूओं, कचौड़ियों और मिठाइयोंके साथ खीर भोजन कराये ।। आरण्यके मूलफलैस्तर्पयेत्तु द्विजोत्तमान्‌ । अरणीपर्व चासाद्य जलकुम्भान्‌ प्रदापयेत्‌,वनपर्वमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको फल-मूलोंद्वारा तृप्त करे। अरणीपर्वमें पहुँचकर जलसे भरे हुए घडोंका दान करे

ヴァイシャンパーヤナは言った。「王のうち最勝なる者よ、サバー・パルヴァ(Sabhā-parvan)が始まるとき、婆羅門たちには乳粥(kṣīra)を、揚げパンや餡入りの菓子、甘味とともに供して食を施すべきである。アーラニヤカ(Āraṇyaka)の段では、最上の再生族(twice-born)を森の根と果実によって満ち足らせよ。さらにアラニー(Araṇī)の段に至れば、水を満たした水壺を施与せよ。かくして各段において、布施と饗応は土地と時宜にかなうよう整え、学徳ある者を敬い、命を支えるのである。」

Verse 60

तर्पणानि च मुख्यानि वन्यमूलफलानि च । सर्वकामगुणोपेतं विप्रेभ्यो$न्नं प्रदापयेत्‌,इतना ही नहीं, जिनको खानेसे तृप्ति हो सके, ऐसे उत्तम-उत्तम जंगली मूल-फल और सभी अभीष्ट गुणोंसे सम्पन्न अन्न ब्राह्मणोंको दान करे

ヴァイシャンパーヤナは言った。「主要なるタルパナ(tarpana、奠水の供献)を捧げ、さらに、食して真に飢えを満たす最上の森の根と果実を施し、また、あらゆる望ましい徳を具えた食を婆羅門たちに与えるべきである。この教えが重んじるのは、ダルマにかなう布施—形だけ整えるのではなく、実際の滋養と、受けるに足る者への敬虔な配慮をもって完全たらしめることである。」

Verse 61

विराटपर्वणि तथा वासांसि विविधानि च । उद्योगे भरतश्रेष्ठ सर्वकामगुणान्वितम्‌

またヴィラータ(Virāṭa)の章においても、さまざまな衣があった。さらにウドヨーガ(Udyoga、戦の準備)の章では、バーラタ族の最勝者よ、望まれるあらゆる卓越が備わり、目的を成就させる諸徳をことごとく具えていた。

Verse 62

भोजनं भोजयेद्‌ विप्रान्‌ गन्धमाल्यैरलंकृतान्‌ । भरतश्रेष्ठ! विराटपर्वमें भाँति-भाँतिके वस्त्र दान करे तथा उद्योगपर्वमें ब्राह्मणोंकी चन्दन और फूलोंकी मालासे अलंकृत करके उन्हें सर्वगुणसम्पन्न अन्न भोजन कराये ॥। ६१ *॥] भीष्मपर्वणि राजेन्द्र दत्त्वा यानमनुत्तमम्‌

ヴァイシャンパーヤナは言った。「バーラタ族の最勝者よ、香と花鬘で飾って婆羅門たちをもてなし、食を施すべきである。ヴィラータ・パルヴァ(Virāṭa Parva)では種々の衣を施与し、ウドヨーガ・パルヴァ(Udyoga Parva)では、白檀と花鬘によって婆羅門たちを敬ったのち、あらゆる美徳を具えた食を供すべきである。さらにビーシュマ・パルヴァ(Bhīṣma Parva)では、王の主よ、比類なき乗り物を与えて…」

Verse 63

द्रोणपर्वणि विप्रेभ्यो भोजनं परमार्चितम्‌

ヴァイシャンパーヤナは言った。「ドローナ・パルヴァ(Droṇa Parva)において、婆羅門たちには、最上の礼をもって尊ばれた食事が供された。」この一句は、戦の暴虐と動乱のただ中にあっても、ヴィプラ(vipra)—学徳ある聖なる客—への敬意と、客をもてなす義務(atithi-satkāra)を守り抜くべきだという、叙事詩の倫理的主張を示している。

Verse 64

शराक्ष देया राजेन्द्र चापान्यसिवरास्तथा । राजेन्द्र! द्रोणपर्वमें ब्राह्मणोंको परम उत्तम भोजन कराये और उन्हें धनुष, बाण तथा उत्तम खड्ग प्रदान करे ।। ६३ $ ।। कर्णपर्वण्यपि तथा भोजन सार्वकामिकम्‌

ヴァイシャンパーヤナは語った。「王の中の最勝者よ、防具を施し、また弓と優れた剣を与えよ。王よ、『ドローナ篇』においては、婆羅門たちに最上の食を供し、弓・矢・卓越した刃を授けよ。『カルナ篇』においてもまた、あらゆる求めを満たす食を整えよ。」

Verse 65

विप्रेभ्य: संस्कृतं सम्यग्‌ दद्यात्‌ संयतमानस: । कर्णपर्वमें भी ब्राह्मणोंको अच्छे ढंगसे तैयार किया हुआ सबकी रुचिके अनुकूल उत्तम भोजन दे और अपने मनको वशमें रखे ।। ६४ $ ।। शल्यपर्वणि राजेन्द्र मोदकै: सगुडौदनै:

ヴァイシャンパーヤナは語った。「心を制した者は、婆羅門たちに、よく整えられた食を正しく施すべきである。王の中の最勝者よ、『シャリヤ篇』においても、甘菓と、ジャガリーを加えて炊いた飯とで彼らを喜ばせよ。施しは自制と周到さをもって、彼らの好みにかなうようになされねばならぬ。」

Verse 66

गदापर्वण्यपि तथा मुद्गमिश्र॑ प्रदापयेत्‌

ヴァイシャンパーヤナは語った。「同様に、『ガダー篇』においても、ムドガ(緑豆)を混ぜた調理物を施しとして与えさせるべきである。」

Verse 67

स्त्रीपर्वणि तथा र्नैस्तर्पयेत्तु द्विजोत्तमान्‌ । गदापर्वमें भी मूँग मिलाये हुए चावलका दान करे। स्त्रीपर्वमें रत्नोंद्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त करे ।। घृतौदनं पुरस्ताच्च ऐषीके दापयेत्‌ पुन:

ヴァイシャンパーヤナは語った。「『婦人篇』においては、二度生まれの者は最上の婆羅門たちを満ち足らせねばならぬ。『ガダー篇』においては、ムング豆を混ぜた飯を施しとして与えよ。さらに『婦人篇』では、宝玉を捧げて優れた婆羅門たちを喜ばせよ。以前にも、『アイシーカ』の段において、ギーで炊いた飯を再び施させるべきである。」

Verse 68

शान्तिपर्वण्यपि तथा हविष्यं भोजयेद्‌ द्विजान्‌

ヴァイシャンパーヤナは語った。「同様に、『シャーンティ篇』においても、二度生まれの者たちに、聖なる供物食ハヴィシュヤ(haviṣya)をもって食を施すべきである。」

Verse 69

आश्चमेधिकमासाद्य भोजन सार्वकामिकम्‌ | शान्तिपर्वमें भी ब्राह्मणोंको हविष्य भोजन कराये। आश्वमेधिकपर्वमें पहुँचनेपर सबकी रुचिके अनुकूल उत्तम भोजन दे ।। ६८ ह ।। तथा<<श्रमनिवासे तु हविष्यं भोजयेद्‌ द्विजान्‌

ヴァイシャンパーヤナは語った。「アシュヴァメーダ(馬供犠)の章に至ったなら、正しき望みのすべてを満たす食を施すべきである。シャーンティ・パルヴァにおいては、バラモンたちにハヴィシュヤ—祭祀に供する清浄の食—をもって饗すべし。さらにアシュヴァメーダ・パルヴァに到れば、人それぞれの嗜みにかなう最上の饗応を与えよ。同様に、疲れた者の憩いの場においても、二度生まれし者(ドヴィジャ)をハヴィシュヤで養うべきである。」

Verse 70

महाप्रास्थानिके तद्वत्‌ सर्वकामगुणान्वितम्‌

ヴァイシャンパーヤナは語った。「マハープラースターニカの段においてもまた、同じく、あらゆる望ましき徳と卓越を具えたものとして説かれている。」

Verse 71

हरिवंशसमाप्तौ तु सहस्नं भोजयेद्‌ द्विजान्‌

ヴァイシャンパーヤナは語った。「ハリヴァンシャの終わりには、二度生まれし者(ドヴィジャ)—すなわちバラモン—千人に食を施すべし。」

Verse 72

तदर्धेनापि दातव्या दरिद्रेणापि पार्थिव,पृथ्वीनाथ! यदि श्रोता दरिद्र हो तो उसे भी आधी दक्षिणाके साथ गोदान अवश्य करना चाहिये। प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर विद्वान्‌ पुरुष सुवर्णसहित पुस्तक वाचकको समर्पित करे

ヴァイサンパーヤナは語った。「王よ、大地の主よ。たとえ貧しき者であっても布施はなすべきである—たとえ慣例のダクシナー(謝礼)の半分であっても。聞き手が貧しいなら、減じた謝礼を添えて、なお必ず牛施(ゴーダーナ)を行うべきである。各パルヴァの終わりには、学識ある者は、誦読された書を朗誦者に黄金とともに献じよ。」

Verse 73

प्रतिपर्वसमाप्तौ तु पुस्तकं वै विचक्षण: । सुवर्णेन च संयुक्त वाचकाय निवेदयेत्‌,पृथ्वीनाथ! यदि श्रोता दरिद्र हो तो उसे भी आधी दक्षिणाके साथ गोदान अवश्य करना चाहिये। प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर विद्वान्‌ पुरुष सुवर्णसहित पुस्तक वाचकको समर्पित करे

ヴァイサンパーヤナは語った。「各パルヴァの終わりには、分別ある者は書を黄金とともに朗誦者へ献ずべきである。大地の主よ。聞き手が貧しいとしても、半分のダクシナーを添えて、なお必ず牛施を行うべきである。かくして各パルヴァの末に、学識ある者は書を黄金とともに、声に出して読む者へ正式に引き渡すのである。」

Verse 74

हरिवंशे पर्वणि च पायसं तत्र भोजयेत्‌ । पारणे पारणे राजन्‌ यथावद्‌ भरतर्षभ

ヴァイシャンパーヤナは言った。「ハリヴァンシャ(Harivaṁśa)を誦読する折にも、そこで甘い乳粥(pāyasa)を食として供すべきである。結誦の儀(pāraṇa)ごとに、王よ——バーラタ族の雄牛よ——しかるべき作法に従って、これを怠りなく行うべし。」

Verse 75

राजन! भरतश्रेष्ठ! हरिवंशपर्वमें भी प्रत्येक पारणके समय ब्राह्मणोंको यथावत्‌ रूपसे खीर भोजन कराये ।। समाप्य सर्वा:ः प्रयत: संहिता: शास्त्रकोविद: । शुभे देशे निवेश्याथ क्षौमवस्त्राभिसंवृता:,इस प्रकार एकाग्रचित्त हो सब पर्वोकी संहिताओंको समाप्त करके शास्त्रवेत्ता पुरुषको चाहिये कि वह उन्हें रेशमी वस्त्रोंमें लपेटकर किसी उत्तम स्थानमें रखे और स्वयं स्नान आदिसे पवित्र हो श्वेत वस्त्र, फ़ूलकी माला तथा आभूषण धारण करके चन्दन-माला आदि उपचारोंसे उन संहिता-पुस्तककी पृथक्‌-पृथक्‌ विधिवत्‌ पूजा करे। पूजाके समय चित्तको एकाग्र एवं शुद्ध रखे। भाँति-भाँतिके उत्तम भक्ष्य, भोजन, पेय, माल्य तथा अन्य कमनीय वस्तुएँ भेंटके रूपमें चढ़ाये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「王よ、バーラタ族の最勝者よ! ハリヴァンシャ・パルヴァにおいても、各誦読の結びごとに、婆羅門たちへ乳粥(khīra)を正しく施して饗すべきである。すべてのサンヒター(saṁhitā)を慎み深く完了したなら、経典に通じた者はそれらを細布—亜麻または絹—に包み、吉祥の地に安置せよ。ついで沐浴などにより身を清め、白衣をまとい、花鬘と装身具を身につけ、檀香や花鬘ほかの供物をもって、それらの写本集を一つ一つ別々に、法にかなって礼拝すべし。心を専一にして清浄に保ち、上等の食、飲み物、花環、その他の悦ばしき贈り物を供えよ。」

Verse 76

शुक्लाम्बरधर: स्रग्वी शुचिर्भूत्वा स्‍्वलंकृतः । अर्चयेत यथान्यायं गन्धमाल्यै: पृथक्‌ पृथक्‌,इस प्रकार एकाग्रचित्त हो सब पर्वोकी संहिताओंको समाप्त करके शास्त्रवेत्ता पुरुषको चाहिये कि वह उन्हें रेशमी वस्त्रोंमें लपेटकर किसी उत्तम स्थानमें रखे और स्वयं स्नान आदिसे पवित्र हो श्वेत वस्त्र, फ़ूलकी माला तथा आभूषण धारण करके चन्दन-माला आदि उपचारोंसे उन संहिता-पुस्तककी पृथक्‌-पृथक्‌ विधिवत्‌ पूजा करे। पूजाके समय चित्तको एकाग्र एवं शुद्ध रखे। भाँति-भाँतिके उत्तम भक्ष्य, भोजन, पेय, माल्य तथा अन्य कमनीय वस्तुएँ भेंटके रूपमें चढ़ाये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「身を清め、白衣をまとい、花鬘をかけ、ふさわしく飾り整えたなら、作法に従って礼拝し、香と花鬘とをそれぞれ別々に供えるべきである。心を専一にして清浄に保ち、佳き食、飲み物、花環、その他の悦ばしき品々を供物として捧げよ。」

Verse 77

संहितापुस्तकान्‌ राजन्‌ प्रयतः सुसमाहित:ः । भक्ष्यैमल्यैश्न पेयैश्व कामैश्न विविधै: शुभ:,इस प्रकार एकाग्रचित्त हो सब पर्वोकी संहिताओंको समाप्त करके शास्त्रवेत्ता पुरुषको चाहिये कि वह उन्हें रेशमी वस्त्रोंमें लपेटकर किसी उत्तम स्थानमें रखे और स्वयं स्नान आदिसे पवित्र हो श्वेत वस्त्र, फ़ूलकी माला तथा आभूषण धारण करके चन्दन-माला आदि उपचारोंसे उन संहिता-पुस्तककी पृथक्‌-पृथक्‌ विधिवत्‌ पूजा करे। पूजाके समय चित्तको एकाग्र एवं शुद्ध रखे। भाँति-भाँतिके उत्तम भक्ष्य, भोजन, पेय, माल्य तथा अन्य कमनीय वस्तुएँ भेंटके रूपमें चढ़ाये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「王よ、慎みを保ち、心をよく収めて、編まれたサンヒターの書巻を法にかなって敬うべきである。佳き食、花鬘、飲み物、そして吉祥にして望ましきさまざまの贈り物を供え、専心し清浄なる注意をもって礼拝せよ。」

Verse 78

हिरण्यं च सुवर्ण च दक्षिणामथ दापयेत्‌ | सर्वत्र त्रिपलं स्वर्ण दातव्यं प्रयतात्मना,इसके बाद हिरण्य एवं सुवर्णकी दक्षिणा दे। मनको वशमें रखकर सभी पुस्तकोंपर तीन-तीन पल सोना चढ़ाना चाहिये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「それから、ヒラニヤ(黄金)と精金とをダクシナー(dakṣiṇā、祭礼の謝礼)として施すべきである。心をよく調え、しかるべき作法に志す者は、定められたすべての場において、三パラの黄金(tri-pala)を供えて布施とせよ。」

Verse 79

तदर्थ पादशेषं वा वित्तशाव्यविवर्जितम्‌ । यद्‌ यदेवात्मनो<भीष्टं तत्‌ तद्‌ देयं द्विजातये,इतना न हो सके तो सबपर डेढ़-डेढ़ पल सोना चढ़ाये और यह भी सम्भव न हो तो पौन-पौन पल चढ़ाये; परंतु धन रहते हुए कंजूसी नहीं करनी चाहिये। जो-जो वस्तु अपनेको प्रिय लगती हो वही-वही ब्राह्मणको दानमें देनी चाहिये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「もし全き分量を整えられぬなら、残りの端分であっても捧げよ――財があるのに吝嗇の汚れを帯びてはならぬ。己がとりわけ愛し大切にする品こそ、そのまま二度生まれの者(ブラーフマナ)に施しとして与えるべきである。」

Verse 80

सर्वथा तोषयेद्‌ भक्त्या वाचकं गुरुमात्मन: । देवता: कीर्तयेत्‌ सर्वा नरनारायणौ तथा,कथावाचक अपना गुरु होता है, अतः उसके प्रति भक्तिभाव रखते हुए उसे सर्वथा संतुष्ट करना चाहिये। उस समय सम्पूर्ण देवताओं तथा भगवान्‌ नर-नारायणका कीर्तन करना चाहिये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「信愛の心をもって、己の師である語り手をあらゆる手立てで満足させよ。その時には、すべての神々を讃え、またナラとナーラーヤナをも讃嘆して唱えるべきである。」

Verse 81

ततो गन्धैश्न माल्यैश्न स्वलंकृत्य द्विजोत्तमान्‌ | तर्पयेद्‌ विविधै: कामैदनिश्वलोच्चावचैस्तथा,तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको चन्द्र और माला आदिसे विभूषित करके उन्हें नाना प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुएँ और भाँति-भाँतिके छोटे-बड़े आवश्यक पदार्थ देकर संतुष्ट करे

それから、香と花鬘とで最勝の二度生まれの者たちを飾り、さまざまな望みの享楽をもって彼らを満たすべし。すなわち、大小さまざまの必需の品を、しかるべき分量で施して歓ばせよ。

Verse 82

अतितात्रस्य यज्ञस्थ फल प्राप्रोति मानव: । प्राप्तुयाच्च क्रतुफलं तथा पर्वणि पर्वणि,ऐसा करनेसे मनुष्यको अतिरात्र यज्ञका फल मिलता है तथा प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर ब्राह्मणकी पूजा करनेसे श्रौत यज्ञका फल प्राप्त होता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「このように行えば、人はアティラートラ祭の功徳を得る。また、各々の行(パルヴァン)の終わりごとにブラーフマナを敬い供養すれば、ヴェーダの祭式(シュラウタ)の果報をも得るのである。」

Verse 83

वाचको भरतमश्रेष्ठ व्यक्ताक्षरपदस्वर: | भविष्यं श्रावयेद्‌ विद्वान्‌ भारतं भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) कथावाचकको विद्दवान्‌ होना चाहिये और प्रत्येक अक्षर, पद तथा स्वरका सुस्पष्ट उच्चारण करते हुए उसे महाभारत या हरिवंशके भविष्यपर्वकी कथा सुनानी चाहिये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「おお、バラタ族の最勝者よ。語り手は学識ある者であり、あらゆる音節・語・声調を明晰に発して誦すべきである。かくして『バーラタ』を人々に聞かせよ、バラタ族の雄牛よ。また(ハリヴァンシャの伝承に従い)『バヴィシュヤ』の章も誦すべきである。」

Verse 84

भुक्तवत्सु द्विजेन्द्रेष यथावत्‌ सम्प्रदापयेत्‌ । वाचकं भरतश्रेष्ठ भोजयित्वा स्वलंकृतम्‌,भरतभूषण! सम्पूर्ण कथाकी समाप्ति होनेके बाद श्रेष्ठ ब्राह्मणोंक भोजन कर लेनेपर उन्हें यथोचित दान देना चाहिये। फिर वाचकको भी वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत करके उत्तम अन्न भोजन कराना चाहिये। इसके बाद उसे दान-मानसे संतुष्ट करना उचित है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「最上のバラモンたちが食事を終えたなら、しかるべき作法に従って相応の施与をなすべきである。ついで、バーラタ族の最勝者よ、物語を誦する者を衣と飾りで荘厳して敬い、上等の食を供して饗せよ。その後、贈り物と敬意の礼をもって彼を満足させるのがふさわしい。」

Verse 85

वाचके परितुष्टे तु शुभा प्रीतिरनुत्तमा । ब्राह्मणेषु तु तुष्टेषु प्रसन्ना: सर्वदेवता:,कथावाचकके संतुष्ट होनेपर ही परम उत्तम एवं मंगलमयी प्रीति प्राप्त होती है। ब्राह्मणोंके संतुष्ट होनेपर श्रोताके ऊपर समस्त देवता प्रसन्न होते हैं

ヴァイシャンパーヤナは言った。「聖なる物語の誦者が満ち足りるとき、比類なき吉祥の歓喜と親愛が生じる。バラモンたちが満足するとき、諸天はことごとく聴聞者に対して慈しみ深くなる。」

Verse 86

ततो हि वरणं कार्य द्विजानां भरतर्षभ | सर्वकामैर्यथान्यायं साधुभिश् पृथग्विधै:,इसलिये भरतश्रेष्ठ) साधुस्वभावके श्रोताओंको चाहिये कि वे न्यायपूर्वक ब्राह्मणोंका वरण करें तथा उनकी विभिन्न प्रकारकी समस्त इच्छाएँ पूर्ण करते हुए उनका यथोचित पूजन करें

ゆえに、バーラタ族の雄牛よ、二度生まれの者(バラモン)を選び、これを敬うのはまことに正しい。徳ある聴聞者は、正義と定められた作法に従い、ふさわしく彼らを供養し、さまざまな願いと必要を、しかるべきかたちで満たすべきである。」

Verse 87

इत्येष विधिरुद्दिष्टो मया ते द्विपदां वर । श्रद्दधानेन वै भाव्यं यन्मां त्वं परिपृच्छसि,मनुष्योंमें श्रेष्ठ नरेश्वर! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे थे, उसके अनुसार यह मैंने महाभारतके सुनने तथा उसका पारायण करनेकी विधि बतलायी है। तुम्हें इसपर श्रद्धा करनी चाहिये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「かくして、人のうち最勝の王よ、汝が我に問うたとおり、マハーバーラタを聴聞し、またその誦読を成就するための作法を、我は汝に示した。これに信を置くべきである。」

Verse 88

भारतश्रवणे राजन्‌ पारणे च नृपोत्तम । सदा यत्नवता भाव्यं श्रेयस्तु परमिच्छता

ヴァイシャンパーヤナは言った。「王よ、統べる者のうち最勝者よ、至上の善を願う者は、バーラタを聴聞することと、その誦読を正しく成就することとに、常に努め励むべきである。」

Verse 89

राजन! नृपश्रेष्ठ अपने परम कल्याणकी इच्छा रखनेवाले श्रोताको महाभारतको सुनने तथा इसका पारायण करनेके लिये सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये ।। भारतं शृणुयान्नित्यं भारतं परिकीर्तयेत्‌ । भारतं भवने यस्य तस्य हस्तगतो जय:,प्रतिदिन महाभारत सुने। नित्यप्रति महाभारतका पाठ करे। जिसके घरमें महाभारत ग्रन्थ मौजूद है, विजय उसके हाथमें है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「王よ、諸王のうち最勝なるお方よ。最高の善を願う聞き手は、常に『マハーバーラタ』を聴聞し、また誦読することに努めねばならぬ。『バーラタ』は日々聴き、日々これを宣揚すべきである。家に『バーラタ』が在る者には、勝利がまさに手中にある。」

Verse 90

भारतं परम पुण्यं भारते विविधा: कथा: । भारतं सेव्यते देवैर्भारतं परमं पदम्‌,महाभारत परम पवित्र ग्रन्थ है। इसमें नाना प्रकारकी कथाएँ हैं। देवता भी महाभारतका सेवन करते हैं। महाभारत परमपदस्वरूप है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「『バーラタ』は至上の功徳をもたらす。『バーラタ』には多種多様な物語が収められている。神々さえも『バーラタ』を味わい、これを愛護する。『バーラタ』そのものが最高の到達点であり、至高の境地の具現である。」

Verse 91

भारतं सर्वशास्त्राणामुत्तमं भरतर्षभ | भारतात्‌ प्राप्यते मोक्षस्तत्त्वमेतद्‌ ब्रवीमि तत्‌,भरतश्रेष्ठ) महाभारत सम्पूर्ण शास्त्रोंमें उत्तम है। महाभारतसे मोक्ष प्राप्त होता है। यह मैं तुमसे सच्ची बात बता रहा हूँ

ヴァイシャンパーヤナは言った。「バーラタ族の雄牛よ、『マハーバーラタ』はあらゆるシャーストラの中で最上である。『バーラタ』によってモークシャ(解脱)が得られる――この真実を汝に告げる。」

Verse 92

महाभारतमाख्यान क्षितिं गां च सरस्वतीम्‌ । ब्राह्मणान्‌ केशवं चैव कीर्तयन्‌ नावसीदति,महाभारत नामक इतिहास, पृथ्वी, गौ, सरस्वती, ब्राह्मण और भगवान्‌ श्रीकृष्णका कीर्तन करनेवाला मनुष्य कभी विपत्तिमें नहीं पड़ता

ヴァイシャンパーヤナは言った。「聖なる物語たる『マハーバーラタ』を絶えず誦し讃え、さらに大地、牛、サラスヴァティー河、ブラーフマナたち、そしてケーシャヴァ(シュリー・クリシュナ)を敬って称える者は、災厄に沈むことがない。」

Verse 93

वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ । आदी चान्ते च मध्ये च हरि: सर्वत्र गीयते,भरतश्रेष्ठ! वेद, रामायण तथा पवित्र महाभारतके आदि, मध्य एवं अन्तमें सर्वत्र भगवान्‌ श्रीहरिका ही गान किया जाता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「バーラタ族の雄牛よ。ヴェーダにおいても、聖なる『ラーマーヤナ』においても、そして『マハーバーラタ』においても、初めにも中ほどにも終わりにも、至るところでハリが歌われ讃えられる。」

Verse 94

यत्र विष्णुकथा दिव्या: श्रुतयश्चन सनातना: । तत्‌ श्रोतव्यं मनुष्येण परं पदमिहेच्छता,जहाँ भगवान्‌ विष्णुकी दिव्य कथाओं तथा सनातन श्रुतियोंका समावेश है उस महाभारतका इस जगत्‌में परमपदकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको अवश्य श्रवण करना चाहिये

ヴィシュヌ神の神聖なる物語と、永遠なるヴェーダの啓示(シュルティ)がともに存するところ、その『マハーバーラタ』は、この世において最高の境地を求める人が必ず聴聞すべきものである。

Verse 95

एतत्‌ पवित्र परममेतद्‌ धर्मनिदर्शनम्‌ । एतत्‌ सर्वगुणोपेतं श्रोतव्यं भूतिमिच्छता,यह महाभारत परम पवित्र है। यह धर्मके स्वरूपका साक्षात्कार करानेवाला है तथा यह समस्त उत्तम गुणोंसे सम्पन्न है। अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको इसका श्रवण अवश्य करना चाहिये

この『マハーバーラタ』は至上に清浄であり、ダルマの相を証し示すもの。あらゆる善徳を具え、己の安寧を願う者は必ずこれを聴聞すべきである。

Verse 96

कायिकं वाचिकं चैव मनसा समुपार्जितम्‌ । तत्‌ सर्व नाशमायाति तमः सूर्योदये यथा,महाभारतके श्रवणसे शरीर, वाणी और मनके द्वारा सज्चित किये हुए सारे पाप वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार

ヴァイシャンパーヤナは言った。「身によって、言葉によって、そして心によって積み重ねられた罪は、すべて滅びる。日の出に闇が消え失せるがごとく。」

Verse 97

अष्टादशपुराणानां श्रवणाद्‌ यत्‌ फलं भवेत्‌ | तत्‌ फलं समवाप्रोति वैष्णवो नात्र संशय:,अठारह पुराणोंके सुननेसे जो फल होता है वह सारा फल वैष्णव पुरुषको अकेले महाभारतके श्रवणसे मिल जाता है, इसमें संशय नहीं है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「十八のプラーナを聴聞して得られる功徳、その功徳を、ヴィシュヌに帰依する者は『マハーバーラタ』のみを聴くことで余すところなく得る。疑いはない。」

Verse 98

स्त्रियश्न पुरुषाश्वैव वैष्णवं पदमाप्तुयु: । स्त्रीभिश्व पुत्रकामाभि: श्रोतव्यं वैष्णवं यश:,स्त्रियाँ हों या पुरुष, सभी इसके श्रवणसे भगवान्‌ विष्णुके धामको चले जाते हैं। पुत्रकी कामना रखनेवाली स्त्रियोंको भगवान्‌ विष्णुके यशस्वरूप इस महाभारतका श्रवण अवश्य करना चाहिये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「女であれ男であれ、皆この聴聞によってヴィシュヌの至高の住処に到る。ゆえに子を願う女性は、ヴィシュヌの栄光たるこの『マハーバーラタ』を必ず聴聞すべきである。」

Verse 99

दक्षिणा चात्र देया वै निष्कपञ्चसुवर्णकम्‌ | वाचकाय यथाशकक्‍त्या यथोक्तं फलमिच्छता,शास्त्रोक्त फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह महाभारत-श्रवणके पश्चात्‌ वाचकको यथाशक्ति सोनेके पाँच सिक्के दक्षिणाके रूपमें दान करे

ヴァイシャンパーヤナは言った。「ここでもまた、祭儀の謝礼として、黄金のニシュカ五枚を必ず施すべきである。経典に説かれた果報を望む者は、『マハーバーラタ』を聴聞したのち、力の及ぶかぎりそれを誦読者に与え、正しい布施によって聖なる教えの伝承を敬うべきである。」

Verse 100

स्वर्णशुद्धीं च कपिलां सवत्सां वस्त्रसंवृताम्‌ | वाचकाय च दद्याद्धि आत्मन: श्रेय इच्छता,अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको उचित है कि वह कपिला गौके सींगोंमें सोना मढ़ाकर उसे वस्त्रसे आच्छादित करके बछड़ेसहित वाचकको दान दे

ヴァイシャンパーヤナは言った。「自らの霊的安寧を求める者は、誦読者に、子牛を伴うカピラー(黄褐色の牝牛)を施すべきである。角には清めた黄金を被せ、身は布で覆って整えよ。これは、布施を意図あるダルマの行いとして示す——よく調えられた吉祥の贈り物を、ふさわしい受け手に捧げ、功徳と内なる善を育むためである。」

Verse 101

अलड्कार प्रदद्याच्च पाण्योर्वे भरतर्षभ । कर्णस्याभरणं दद्याद्‌ धनं चैव विशेषत:,भरतश्रेष्ठ! इसके सिवा कथावाचकके लिये दोनों हाथोंके कड़े, कानोंके कुण्डल और विशेषत: धन प्रदान करे

ヴァイシャンパーヤナは言った。「おお、バーラタ族の雄よ。手の飾り—腕輪や臂釧—をも施すべし。耳飾りも与え、そして何より財を与えるべきである。」この偈は、誦読者・語り手への施与をダルマの行いとして示す。聖なる物語を言葉の称賛だけでなく、確かな贈り物によって敬い、とりわけ財の支えを重んじよ、というのである。

Verse 102

भूमिदानं समादद्याद्‌ वाचकाय नराधिप । भूमिदानसमं दान॑ न भूतं न भविष्यति,नरेश्वर! वाचकके लिये भूमिदान तो अवश्य ही करना चाहिये; क्योंकि भूमिदानके समान दूसरा कोई दान न हुआ है, न होगा

ヴァイシャンパーヤナは言った。「おお王よ、誦読者のために土地の施与を必ず行うべきである。人の主よ、土地の布施に等しい布施は、過去にもなく、未来にもない。」

Verse 103

शृणोति श्रावयेद्‌ वापि सततं चैव यो नर: । सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवं पदमाप्तनुयात्‌,जो मनुष्य सदा महाभारतको सुनता अथवा सुनाता रहता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर भगवान्‌ विष्णुके धामको जाता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。常に『マハーバーラタ』を聴く者、あるいは人々のためにそれを誦読させる者は、あらゆる罪より解き放たれ、ヴィシュヌの至上の住処に到る。此の偈は、聖なる物語への不断の関わりを倫理の修行として示す——聴聞し、ダルマを担う伝承を伝えることが行いを清め、信愛と解脱へと導くのである。

Verse 104

पितृनुद्धरते सवानिकादशसमुद्धवान्‌ | आत्मानं ससुतं चैव स्त्रियं च भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) वह पुरुष अपनी ग्यारह पीढ़ीमें समस्त पितरोंका, अपना तथा अपनी स्त्री और पुत्रका भी उद्धार कर देता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「おお、バラタ族の雄牛よ。そのような男は一族の救い手となる――十一代にわたる祖霊を彼岸へと渡らせ、さらに自らと妻と息子の霊的な高揚をも確かなものとするのだ。」

Verse 105

दशांशश्रैव होमो5पि कर्तव्यो5त्र नराधिप । इदं मया तवाग्रे च प्रोक्त सर्व नरर्षभ,नरेश्वरर महाभारत सुननेके बाद उसके लिये दशांश होम भी करना आवश्यक है। नरश्रेष्ठ इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष इन सब बातोंका विस्तारके साथ वर्णन कर दिया

ヴァイシャンパーヤナは言った。「おお王よ、この件においては『ダシャーンシャ・ホーマ』、すなわち十分の一を捧げる火供もまた行うべきである。おお人の中の最勝者よ、かくして私は、なすべきことのすべてを、余すところなく汝の前に説き明かした。」

Verse 366

अड्के परमनारीणां सुखसुप्तो विबुध्यते । चन्द्रमासे भी अधिक कमनीय मुखोंद्वारा सुशोभित होनेवाली सुन्दरी दिव्याड्रनाएँ उसकी सेवामें रहती हैं तथा सुरसुन्दरियोंके अंकमें सुखसे सोया हुआ वह पुरुष उन्हींकी मेखलाओंके खन-खन शब्दों और नूपुरोंकी मधुर झनकारोंसे जगाया जाता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。至上の美をもつ女たちの抱擁に憩い、彼は歓喜のうちに眠り、そして目覚める。月にも勝る麗しき面差しに飾られた天界のアプサラスが彼に仕え、天女たちの膝に安らかに身を横たえるそのとき、彼は彼女らの腰帯の鈴の音と足輪の甘やかな響きによって呼び覚まされる。

Verse 466

पुरन्दरपुरे रम्ये शक्रेण सह मोदते । इस प्रकार बहुत वर्षोतक वह स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक रहता है। तदनन्तर इक्‍्कीस हजार वर्षोतक गन्धर्वोंके साथ इन्द्रकी रमणीय नगरीमें रहकर देवेन्द्रके साथ ही वहाँका सुख भोगता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。プランダラ(インドラ)の麗しき都において、彼はシャクラとともに歓楽する。かくして彼は多くの年、天界にて尊崇を受けつつ住み、その後さらに二万一千年のあいだ、ガンダルヴァたちとともにインドラの魅惑の都に留まり、神々の主と並んで天上の安楽を味わうのである。

Verse 473

दिव्यनारीगणाकीर्णो निवसत्यमरो यथा । दिव्य रथों और विमानोंपर आरूढ़ हो नाना प्रकारके लोकोंमें विचरता और दिव्य नारियोंसे घिरा हुआ देवताकी भाँति वहाँ निवास करता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。天女の群れに取り囲まれ、彼は不死の者のごとくそこに住まう――天の車や飛行宮殿に乗り、さまざまな天界を巡り、功徳の成就がもたらす光輝を享受するのである。

Verse 483

शिवस्य भवने राजन्‌ विष्णोर्याति सलोकताम्‌ | राजन्‌! इसके बाद वह सूर्य, चन्द्रमा, शिव तथा भगवान्‌ विष्णुके लोकमें जाता है

ヴァイシャンパーヤナは言った。「王よ、シヴァの神聖なる御殿において、彼はサローカター(同一の界に住する果)を得て、ヴィシュヌと同じ世界に至る。」

Verse 623

ततः सर्वगुणोपेतमन्नं दद्यात्‌ सुसंस्कृतम्‌ । राजेन्द्र! भीष्मपर्वमें उत्तम सवारी देकर अच्छी तरह छौंक-बघारकर तैयार किया हुआ सभी उत्तम गुणोंसे युक्त भोजन दान करे

ヴァイシャンパーヤナは言った。「そののち、よく調えられた食を施すべきである。正しく煮炊きされ、清らかに整えられ、あらゆる善き徳を備えたものを。」

Verse 656

अपूपैस्तर्पणैश्वैव सर्वमन्नें प्रदापयेत्‌ । राजेन्द्र! शल्यपर्वमें मिठाई, गुड़, भात, पूआ तथा तृप्तिकारक फल आदिके साथ सब प्रकारके उत्तम अन्न दान करे

ヴァイシャンパーヤナは言った。「王の中の最勝者よ、あらゆる食を施し分かつべきである。とりわけ甘き菓子アプーパ(apūpa)と、満ち足りを与える供食タルパナ(tarpaṇa)を。」

Verse 673

ततः सर्वगुणोपेतमन्नं दद्यात्‌ सुसंस्कृतम्‌ । ऐषीकपर्वमें पहले घी मिलाया हुआ भात जिमाये। फिर अच्छी तरह संस्कार किये हुए सर्वगुणसम्पन्न अन्नका दान करे

それから、よく調えられ、あらゆる善き徳を備えた食を施すべきである。

Verse 703

स्वर्गपर्वण्यपि तथा हविष्यं भोजयेद्‌ द्विजान्‌ | इसी प्रकार महाप्रस्थानिकपर्वमें भी समस्त वाउ्छनीय गुणोंसे युक्त अन्न आदिका दान करे। स्वर्गारोहणपर्वमें भी ब्राह्मणोंको हविष्य खिलाये

ヴァイシャンパーヤナは言った。「同様に、スヴァルガारोहणの章においても、ドヴィジャ(再生の者、すなわちバラモン)にハヴィシュヤ(haviṣya)—清浄にして供献された食—を食させるべきである。」

Verse 716

गामेकां निष्कसंयुक्तां ब्राह्मणाय निवेदयेत्‌ । हरिवंशकी समाप्ति होनेपर एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराये तथा स्वर्णमुद्रासहित एक गौ ब्राह्मणको दान दे

ヴァイシャンパーヤナは言った。「ブラーフマナには、ニシュカ(黄金の貨幣または装身具)を添えて、牝牛一頭を献ずべきである。」この箇所は、それをダーナ(布施)の功徳として位置づけ、尊い誦読の結びにあたり、聖なる学知を敬い、惜しみない贈与によって祭司共同体を支えることを説いている。

Verse 1263

महादानानि देयानि रत्नानि विविधानि च । मनुष्य अपने मनको संयममें रखते हुए बाहर-भीतरसे शुद्ध हो महाभारतमें वर्णित इस इतिहासको क्रमश: यथावत्‌ रूपसे सुनकर इसे समाप्त करनेके पश्चात्‌ इनमें मारे गये प्रमुख वीरोंके लिये श्राद्ध करे। भारत! भरतभूषण! महाभारत सुनकर श्रोता अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे नाना प्रकारके रत्न आदि बड़े-बड़े दान दे

ヴァイシャンパーヤナは言った。「大いなる布施をなし、さまざまな宝玉などを施すべきである。人は心を制し、外も内も清浄に保ちつつ、『マハーバーラタ』に説かれるこの歴史を、順序正しくそのままに聴聞し、聴き終えてのち、そこに斃れた第一の勇士たちのためにシュラーダッダ(śrāddha)の儀礼を修すべきである。おおバーラタよ、バーラタ族の飾りよ。『マハーバーラタ』を聴き終えたなら、聴聞者は己の力に応じ、信敬をもってブラーフマナたちに宝玉などの大いなる贈り物を数多く施すべきである。」

Verse 6963

मौसले सार्वगुणिकं गन्धमाल्यानुलेपनम्‌ । आश्रमवासिकपर्वमें ब्राह्मणोंको हविष्प भोजन कराये। मौसलपर्वमें सर्वगुणसम्पन्न अन्न, चन्दन, माला और अनुलेपनका दान करे

ヴァイシャンパーヤナは言った。マウサラの章においては、あらゆる善き徳を具えた施与—香料、花鬘、塗香(軟膏)—をなすべきである。アーシュラマヴァーシカの章においては、供犠の供物たるハヴィス(havis)から調えた食をもって、ブラーフマナたちを饗応するよう取り計らうべきである。かくしてマウサラ・パルヴァでは、最上の食、白檀、花鬘、塗香の練り香を施すべし—それは敬虔と清浄と寛施によってダルマを支える行いである。