वासिष्ठकथनम् (आदित्य–सोमवंशवर्णनम् तथा रुद्रसहस्रनाम-प्रशंसा)
सिद्धियोगापहारी च सिद्धः सर्वार्थसाधकः अक्षुण्णः क्षुण्णरूपश् च वृषणो मृदुर् अव्ययः
siddhiyogāpahārī ca siddhaḥ sarvārthasādhakaḥ akṣuṇṇaḥ kṣuṇṇarūpaś ca vṛṣaṇo mṛdur avyayaḥ
वह अयोग्य से सिद्धि-योग को भी हर लेने वाला है; वह सदा सिद्ध है, और समस्त सत्-अर्थों को सिद्ध करने वाला। वह अक्षुण्ण—अखंड है, फिर भी लीला हेतु क्षुण्णरूप—भंग-सा रूप धारण करता है; वह वृषण—महाबलवान वृषभ-स्वरूप, मृदु—करुणामय, और अव्यय—अविनाशी शिव है।
Suta Goswami (narrating the Shiva Sahasranama to the sages of Naimisharanya)