वासिष्ठकथनम् (आदित्य–सोमवंशवर्णनम् तथा रुद्रसहस्रनाम-प्रशंसा)
इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वासिष्ठकथनं नाम चतुःषष्टितमो ऽध्यायः ऋषय ऊचुः आदित्यवंशं सोमस्य वंशं वंशविदां वर वक्तुमर्हसि चास्माकं संक्षेपाद् रोमहर्षण
iti śrīliṅgamahāpurāṇe pūrvabhāge vāsiṣṭhakathanaṃ nāma catuḥṣaṣṭitamo 'dhyāyaḥ ṛṣaya ūcuḥ ādityavaṃśaṃ somasya vaṃśaṃ vaṃśavidāṃ vara vaktumarhasi cāsmākaṃ saṃkṣepād romaharṣaṇa
इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के पूर्वभाग में “वासिष्ठकथन” नामक चौंसठवाँ अध्याय (समाप्त/प्रारम्भ) होता है। ऋषियों ने कहा—हे रोमहर्षण, वंश-विदों में श्रेष्ठ, कृपा करके हमें संक्षेप में सूर्यवंश और सोमवंश का वर्णन कीजिए।
Sages (Ṛṣis) of Naimiṣāraṇya addressing Sūta Romaharṣaṇa