वासिष्ठकथनम् (आदित्य–सोमवंशवर्णनम् तथा रुद्रसहस्रनाम-प्रशंसा)
मातृहा पितृहा चैव वीरहा भ्रूणहा तथा संवत्सरं क्रमाज्जप्त्वा त्रिसंध्यं शङ्कराश्रमे
mātṛhā pitṛhā caiva vīrahā bhrūṇahā tathā saṃvatsaraṃ kramājjaptvā trisaṃdhyaṃ śaṅkarāśrame
माता-हंता, पिता-हंता, वीर-हंता या भ्रूण-हंता भी—यदि शंकर के आश्रम में रहकर क्रम से एक वर्ष तक त्रिसंध्या जप करे, तो शुद्ध हो जाता है।
Suta Goswami (narrating the Śaiva prāyaścitta teaching within the Purva-bhāga discourse)