
कृतयुगवर्णनम् तथा राजधर्मोपदेशः (Kṛtayuga Description and Instruction on Royal Dharma)
Upa-parva: Mārkaṇḍeya–Yuga-Dharma Upadeśa (Prophecy and Royal Ethics Episode)
This chapter continues Mārkaṇḍeya’s account of cyclical time and social restoration. He describes a future re-establishment of order: the protection of the earth for the twice-born, the performance of a great horse-sacrifice, and the installation of auspicious boundaries (maryādā) said to be primordial in origin. The narrative includes a program of security and pacification—suppression of predatory bands and the placement of emblems and weapons in conquered regions as signs of stabilized rule—culminating in the decline of adharma and the increase of dharma when the Kṛta age is attained. Mārkaṇḍeya outlines markers of societal flourishing: ritual activity, public works, thriving agriculture across seasons, and a varṇa-based division of duties presented as normative for that age. The discourse then pivots to direct counsel: Yudhiṣṭhira is urged to resolve dharma-doubt by aligning himself with dharma, practicing compassion, protecting subjects as one’s own children, honoring ancestors and deities, correcting errors through proper giving, and avoiding contempt toward Brahmins. The frame closes with Yudhiṣṭhira’s assent and the listeners’ astonishment at the purāṇic instruction.
Chapter Arc: युधिष्ठिर के समक्ष महर्षि मार्कण्डेय काल-चक्र का द्वार खोलते हैं—चारों युगों की वर्ष-संख्या, ब्रह्मा के दिन-रात का मान, और वह अद्भुत तथ्य कि प्रलय के महाशून्य में भी एक साक्षी बना रहता है। → वर्णाश्रम-धर्म के ढहने का चित्र उभरता है: कलियुग में क्षत्रिय-वैश्य विकर्म में पड़ते हैं, अल्पायु और स्वल्पबल हो जाते हैं; ब्राह्मण बाह्य वेश से मुनि-सा कपट धारण कर जीविका के लिए अधर्म का सहारा लेते हैं। समाज का ताना-बाना उलटता जाता है और नैतिक दिशा धुँधली पड़ती जाती है। → प्रलय का दृश्य: जब लोक देव-दानव-समेत शून्य हो जाते हैं, तब भी मार्कण्डेय का दीर्घजीवी अस्तित्व बना रहता है—और वे उस परम रहस्य के निकट पहुँचते हैं जहाँ ब्रह्मा के दिन-रात में समस्त विश्व का परिवर्तन होता है। इस विराट विनाश के बीच एक दिव्य बालक का दर्शन होता है—लाल-लाल तलवों और कोमल अँगुलियों वाला—जिसे मार्कण्डेय श्रद्धा से मस्तक पर उठाकर प्रणाम करते हैं। → महर्षि काल-मान (युग, सहस्रयुग, ब्राह्म-अहः) का विधान स्थापित करते हैं और कलियुग के लक्षणों द्वारा यह बोध देते हैं कि धर्म का क्षय भी नियति के चक्र में आता है; फिर भी साक्षी-चेतना और परम सत्ता का संकेत प्रलय में भी बना रहता है। → दिव्य बालक का रहस्य—वह कौन है और प्रलय के पार किस सत्य की ओर संकेत करता है—अगले प्रसंग की ओर कथा को धकेल देता है।
Verse 1
हि >> आय न हुक है 7 अष्टा शीर्त्याधिकशततमोब् ध्याय: चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको ४ (02०8 कुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान्के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना वैशम्पायन उवाच ततः स पुनरेवाथ मार्कण्डेयं यशस्विनम् । पप्रच्छ विनयोपेतो धर्मराजो युधिषिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर विनयशील धर्मराज युधिष्ठिरने यशस्वी मार्कण्डेय मुनिसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया--
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ បន្ទាប់មក ព្រះរាជា យុធិឋ្ឋិរ អ្នកគោរពធម៌ និងមានសុភាពរាបសារ បានសួរឡើងម្ដងទៀត ដោយក្តីគោរព ចំពោះមហាមុនី មារកណ្ឌេយៈ ដ៏មានកេរ្តិ៍ឈ្មោះ។
Verse 2
नैके युगसहस्रान्तास्त्वया दृष्टा महामुने । न चापीह सम: कश्रिदायुष्मान् दृश्यते तव,“महामुने! आपने हजार-हजार युगोंके अन्तमें होनेवाले अनेक महाप्रलयके दृश्य देखे हैं। इस संसारमें आपके समान बड़ी आयुवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं दिखायी देता
«ឱ មហាមុនី! អ្នកបានឃើញទិដ្ឋភាពនៃមហាប្រល័យជាច្រើន ដែលកើតឡើងនៅចុងបញ្ចប់នៃយុគរាប់ពាន់ៗ។ ហើយនៅក្នុងលោកនេះ មិនឃើញមានអ្នកណាស្មើអ្នកទេ ក្នុងអាយុកាលដ៏យូរអង្វែង»។
Verse 3
वर्जयित्वा महात्मानं ब्रह्माणं परमेषछ्ठिनम् । न ते$स्ति सदृश: ककश्रिदायुषा ब्रह्मवित्तम,ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! परमेष्ठी महात्मा ब्रह्माजीको छोड़कर दूसरा कोई आपके समान दीर्घायु नहीं है
«លើកលែងតែ ព្រះព្រហ្មា មហាត្មា ព្រះបរមេស្ឋិន—អ្នករៀបចំសកល—មិនមានអ្នកណាស្មើអ្នកទេ ក្នុងអាយុកាលដ៏យូរអង្វែង ឱ អ្នកដឹងព្រហ្មន៍ដ៏ប្រសើរបំផុត»។
Verse 4
अनन्तरिक्षे लोके5स्मिन् देवदानववर्जिते । त्वमेव प्रलये विप्र ब्रह्माणमुपतिष्ठसे,ब्रह्म! जब यह संसार देवता, दानव तथा अन्तरिक्ष आदि लोकोंसे शून्य हो जाता है उस प्रलयकालमें केवल आप ही ब्रह्माजीके पास रहकर उनकी उपासना करते हैं
«ឱ ព្រាហ្មណ៍! នៅពេលប្រល័យសកល កាលណាលោកនេះ—រួមទាំងមធ្យមលោក—ក្លាយជាសូន្យ ពុំមានទេវតា និងអសុរ ទៀតឡើយ នោះមានតែអ្នកម្នាក់ឯង ដែលនៅសល់ ដើម្បីបម្រើ និងគោរពបូជាព្រះព្រហ្មា»។
Verse 5
प्रलये चापि निर्वत्ति प्रबुद्धे च पितामहे । त्वमेक: सृज्यमानानि भूतानीह प्रपश्यसि,ब्रह्मर्ष! फिर प्रलयकाल व्यतीत होनेपर जब पितामह ब्रह्मा जागते हैं, तब सम्पूर्ण दिशाओंमें वायुको फैलाकर उसके द्वारा समस्त जलराशिको इधर-उधर छितराकर (सूखे स्थानोंमें) ब्रह्माजीके द्वारा जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्धिज्ज नामक चार प्रकारके प्राणी रचे जाते हैं, उन्हें एकमात्र आप ही (सबसे पहले) अच्छी तरह देख पाते हैं
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «សូម្បីតែនៅពេលមហាប្រល័យ ហើយម្ដងទៀតនៅពេលការបង្កើតចាប់ផ្តើមឡើងវិញ—នៅពេលពិតាមហៈ ព្រះព្រហ្មា ភ្ញាក់ឡើង—មានតែអ្នកតែមួយគត់ ឱ ព្រះឥសីព្រហ្មណ៍ ដែលអាចឃើញសត្វលោកទាំងឡាយនៅទីនេះ ខណៈពួកវាកំពុងត្រូវបានបង្កើតឡើង»។
Verse 6
चतुर्विधानि विप्रर्षे यथावत् परमेछ्िना । वायुभूता दिश: कृत्वा विक्षिप्यापस्ततस्तत:,ब्रह्मर्ष! फिर प्रलयकाल व्यतीत होनेपर जब पितामह ब्रह्मा जागते हैं, तब सम्पूर्ण दिशाओंमें वायुको फैलाकर उसके द्वारा समस्त जलराशिको इधर-उधर छितराकर (सूखे स्थानोंमें) ब्रह्माजीके द्वारा जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्धिज्ज नामक चार प्रकारके प्राणी रचे जाते हैं, उन्हें एकमात्र आप ही (सबसे पहले) अच्छी तरह देख पाते हैं
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះឥសីព្រហ្មណ៍ដ៏ប្រសើរ! កាលណាព្រះបរមេស្ឋិន (ព្រះអ្នកបង្កើត) ក្រោយពេលមហាប្រល័យបានកន្លងផុត ទ្រង់ភ្ញាក់ឡើងជាពិតាមហៈ ព្រះព្រហ្មា ទ្រង់បញ្ចេញខ្យល់ឲ្យពាសពេញទិសទាំងអស់ ហើយដោយខ្យល់នោះ ទ្រង់បំបែកទឹកឲ្យរាលដាលទៅទីនេះទីនោះ ដើម្បីឲ្យមានដីស្ងួត។ បន្ទាប់មក ទ្រង់បង្កើតសត្វមានជីវិតបួនប្រភេទ—កើតពីស្បូន កើតពីស៊ុត កើតពីញើស/កម្ដៅ និងកើតពីការដុះលូត។ ក្នុងការបង្កើតដំបូងនោះ មានតែអ្នកតែមួយគត់ដែលអាចឃើញវាបានច្បាស់តាំងពីដើម»។
Verse 7
त्वया लोकगुरु: साक्षात् सर्वलोकपितामह: । आराधितो द्विजश्रेष्ठ तत्परेण समाधिना,द्विजश्रेष्ठी आपने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सम्पूर्ण लोकोंके पितामह साक्षात् लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है। विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत्की प्रारम्भिक सृष्टिको प्रत्यक्ष किया है और घोर तपस्याद्वारा (मरीचि आदि) प्रजापतियोंको भी जीत लिया है
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រហ្មណ៍ដ៏ប្រសើរ! អ្នកបានគោរពបូជានិងបំពេញព្រះហឫទ័យព្រះព្រហ្មា ដោយផ្ទាល់—ជាគ្រូនៃលោកទាំងឡាយ និងជាពិតាមហៈនៃសត្វលោកទាំងអស់—ដោយសមាធិដែលផ្តោតលើទ្រង់តែមួយ។ ដោយការរឹតត្បិតខាងក្នុងដ៏ឯកចិត្តនេះ អ្នកបានទទួលព្រះគុណដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់»។
Verse 8
स्वप्रमाणमथो विप्र त्वया कृतमनेकश: । घोरेणाविश्य तपसा वेधसो निर्जितास्त्वया,द्विजश्रेष्ठी आपने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सम्पूर्ण लोकोंके पितामह साक्षात् लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है। विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत्की प्रारम्भिक सृष्टिको प्रत्यक्ष किया है और घोर तपस्याद्वारा (मरीचि आदि) प्रजापतियोंको भी जीत लिया है
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រហ្មណ៍! អ្នកឯងជាភស្តុតាងនៃសមិទ្ធផលដែលអ្នកបានធ្វើបានម្តងហើយម្តងទៀត។ ដោយចូលទៅក្នុងតបស្យាដ៏កាចសាហាវ អ្នកបានឈ្នះសូម្បីតែអំណាចអ្នកបង្កើត—ព្រះប្រជាបតិទាំងឡាយ—ដោយតបៈរបស់អ្នក»។
Verse 9
नारायणाड्कप्रख्यस्त्वं साम्परायेडतिपठ्यसे । भगवाननेकश: कृत्वा त्वया विष्णोश्व विश्वकृत्,आप भगवान् नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। परलोकमें आपकी महिमाका सर्वत्र गान होता है। आपने पहले स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले सर्वव्यापक ब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका (योगकी कलासे) अलौकिक उद्घाटन कर वैराग्य और अभ्याससे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिद्वारा विश्वरचयिता भगवान्का अनेक बार साक्षात्कार किया है
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «អ្នកត្រូវបានល្បីល្បាញថាមានសភាពដូចព្រះនារាយណៈ ហើយនៅលោកក្រោយ កិត្តិយសរបស់អ្នកត្រូវបានច្រៀងសរសើរទូទាំងទីកន្លែង។ ដោយវិន័យវិញ្ញាណរបស់អ្នក អ្នកបានឃើញព្រះវិស្ណុ—អ្នកបង្កើតសកលលោក—ម្តងហើយម្តងទៀត ដោយបានបើកបង្ហាញ (ដោយអំណាចយោគ) ផ្កាឈូកក្នុងបេះដូងដ៏អស្ចារ្យ ហើយដោយទស្សនៈទេវភាពដែលទទួលបានពីវៃរាគ្យៈ និងការអនុវត្តជាប់លាប់»។
Verse 10
कर्णिकोद्धरणं दिव्यं ब्रह्यण: कामरूपिण: । रत्नालंकारयोगाशभ्यां दृग्भ्यां दुष्टस्त्वया पुरा,आप भगवान् नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। परलोकमें आपकी महिमाका सर्वत्र गान होता है। आपने पहले स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले सर्वव्यापक ब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका (योगकी कलासे) अलौकिक उद्घाटन कर वैराग्य और अभ्याससे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिद्वारा विश्वरचयिता भगवान्का अनेक बार साक्षात्कार किया है
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «កាលពីមុន អ្នកបានឃើញដោយទិដ្ឋិដ៏ទេវភាព ដែលកើតពីការអនុវត្តយោគៈយ៉ាងមានវិន័យ និងវៃរាគ្យៈក្នុងចិត្ត នូវការបើកបង្ហាញដ៏អស្ចារ្យនៃកណ្ណិកា (ផ្នែកកណ្ដាល) នៃផ្កាឈូកក្នុងបេះដូង—បទពិសោធន៍ដែលបង្ហាញប្រាហ្មន៍សកល ដែលអាចយករូបរាងតាមព្រះបំណង ជាមូលដ្ឋានកំណើតនៃលោក ដ៏តុបតែងដោយពន្លឺរុងរឿង។ ដូច្នេះ ដោយសារភក្តិ និងសិទ្ធិយោគៈរបស់អ្នក អ្នកបានក្លាយជាអ្នកល្អឯកក្នុងចំណោមអ្នកដែលស្នាក់នៅជិតព្រះនារាយណៈ ហើយកិត្តិយសរបស់អ្នកត្រូវបានច្រៀងសរសើរនៅក្នុងលោកបន្ទាប់»។
Verse 11
तस्मात् तवान्तको मृत्युर्जरा वा देहनाशिनी । नत्वां विशति विप्रर्षे प्रसादात् परमेछ्चिन:,इसीलिये सबको मारनेवाली मृत्यु तथा शरीरको जर्जर बना देनेवाली जरा आपका स्पर्श नहीं करती है। ब्रह्मर्ष! इसमें भगवान् परमेष्ठीका कृपाप्रसाद ही कारण है
ដូច្នេះហើយ ឱ ព្រះឥសីល្អឯកក្នុងចំណោមព្រហ្មណ៍ទាំងឡាយ មរណៈ—អ្នកបញ្ចប់សត្វលោកទាំងអស់—ក៏មិនអាចប៉ះពាល់អ្នកបានទេ ហើយជរា ដែលធ្វើឲ្យរាងកាយចុះខ្សោយ ក៏មិនអាចចូលមកលើអ្នកបានដែរ។ ការរួចផុតពីការចាស់ទុំ និងមរណភាពនេះ កើតពីព្រះគុណប្រសាទដ៏មហិមារបស់ព្រះបរមេឋ្ឋី (ព្រះព្រហ្ម)។
Verse 12
यदा नैवं रविनग्निर्न वायुर्न च चन्द्रमा: । नैवान्तरिक्ष नैवोर्वी शेष भवति किंचन,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत् उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ នៅពេលមហាប្រល័យ មិននៅសល់ទៀតទេ ទាំងព្រះអាទិត្យ ទាំងភ្លើង ទាំងខ្យល់ ទាំងព្រះចន្ទ; មិននៅសល់ទៀតទេ ទាំងអាកាសមធ្យម និងផែនដី—គ្មានអ្វីសល់ឡើយ។ សត្វចល និងអចលទាំងអស់ លិចចូលក្នុងមហាសមុទ្រតែមួយនៃលោក ហើយបាត់ពីទស្សនៈ។ ទេវតា និងអសុរៈវិនាស ហើយសូម្បីតែនាគធំៗក៏ត្រូវបំផ្លាញ។ នៅពេលនោះ ព្រះអម្ចាស់នៃសត្វទាំងអស់ អាត្មាអមិត ដែលស្នាក់ និងសម្រាកលើផ្កាឈូក និងផ្កាឧត្បល នៅជិតព្រះព្រហ្ម; ហើយមានតែអ្នកប៉ុណ្ណោះដែលបន្តបូជាព្រះអង្គ។
Verse 13
तस्मिन्नेकार्णवे लोके नष्टे स्थावरजड़मे । नष्टे देवासुरगणे समुत्सन्नमहोरगे,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत् उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ នៅពេលលោកក្លាយជាមហាសមុទ្រតែមួយ ហើយអ្វីៗដែលថេរ និងអសកម្មទាំងអស់វិនាស—នៅពេលកងទ័ពទេវតា និងអសុរៈត្រូវបំផ្លាញ ហើយសូម្បីតែនាគធំៗក៏ត្រូវលុបលាង—នោះជាមហាប្រល័យដែលមិននៅសល់ទៀតទេ ទាំងព្រះអាទិត្យ ភ្លើង ខ្យល់ ព្រះចន្ទ អាកាស និងផែនដី។ សត្វចល និងអចលទាំងអស់ លិចចូលក្នុងទឹកជំនន់តែមួយ ហើយបាត់ពីទស្សនៈ។ នៅពេលនោះ ព្រះព្រហ្ម អាត្មាអមិត ជាព្រះអម្ចាស់នៃសត្វទាំងអស់ នៅតែស្ថិត; ហើយមានតែការបូជាដ៏ស្មោះស្ម័គ្រចំពោះព្រះអង្គប៉ុណ្ណោះដែលនៅសល់។
Verse 14
शयानममितात्मानं पद्मोत्पलनिकेतनम् | त्वमेक: सर्वभूतेशं ब्रह्माणमुपतिष्ठसि,(महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत् उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े-बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «នៅពេលមហាប្រល័យ—ពេលដែលព្រះអាទិត្យ ភ្លើង ខ្យល់ ព្រះចន្ទ អាកាស និងផែនដី មិននៅសល់ទៀត ហើយលោកចល និងអចលទាំងមូល លិចចូលក្នុងមហាសមុទ្រតែមួយ ហើយបាត់ទៅ—ពេលដែលទេវតា និងអសុរៈវិនាស ហើយសូម្បីតែនាគធំៗក៏ត្រូវបំផ្លាញ—នៅពេលនោះ ព្រះអម្ចាស់នៃសត្វទាំងអស់ ព្រះព្រហ្ម អាត្មាអមិត សម្រាកលើទីស្នាក់នៅនៃផ្កាឈូក និងផ្កាឧត្បល; ហើយមានតែអ្នកប៉ុណ្ណោះដែលនៅជិតព្រះអង្គ ឈរបម្រើ និងបូជាព្រះអង្គ»។
Verse 15
एतत् प्रत्यक्षत: सर्व पूर्व वृत्तं द्विजोत्तम । तस्मादिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वहेत्वात्मिकां कथाम्,द्विजोत्तम! यह सारा पुरातन इतिहास आपका प्रत्यक्ष देखा हुआ है। इसलिये मैं आपके मुखसे सबके हेतुभूत कालका निरूपण करनेवाली कथा सुनना चाहता हूँ
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ឱ ព្រហ្មណ៍ឧត្តម—អ្នកជាអ្នកកើតជាថ្មី (ទ្វិជ) ដ៏ប្រសើរ—រឿងរ៉ាវបុរាណទាំងនេះ អ្នកបានដឹងដោយផ្ទាល់។ ដូច្នេះ ខ្ញុំប្រាថ្នាស្តាប់ពីមាត់អ្នក នូវកថាដែលបកស្រាយហេតុដើម និងកាលៈទេសៈ—ពេលវេលា និងលក្ខខណ្ឌ—ដែលក្លាយជាមូលហេតុនៃសព្វសេចក្តីទាំងអស់»។
Verse 16
अनुभूतं हि बहुशस्त्वयैकेन द्विजोत्तम | न ते<स्त्यविदितं किंचित् सर्वलोकेषु नित्यदा,विप्रवर! केवल आपने ही अनेक कल्पोंकी श्रेष्ठ रचनाका बहुत बार अनुभव किया है। सम्पूर्ण लोकोंमें कभी कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो'
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ឱ ទ្វិជឧត្តម អ្នកតែម្នាក់ឯងបានឃើញ និងបានជួបប្រទះជាញឹកញាប់ នូវរឿងរ៉ាវជាច្រើនតាមកាលយូរអង្វែងជាច្រើនយុគ។ ក្នុងលោកទាំងអស់ មិនមានអ្វីណាមួយ—នៅពេលណាក៏ដោយ—ដែលនៅមិនស្គាល់ចំពោះអ្នកទេ ឱ ព្រហ្មណ៍ប្រសើរបំផុត»។
Verse 17
मार्कण्डेय उदाच हन्त ते वर्णयिष्यामि नमस्कृत्वा स्वयम्भुवे । पुरुषाय पुराणाय शाश्वतायाव्ययाय च
ម៉ារកណ្ឌេយៈបានមានពាក្យថា៖ «ល្អហើយ—ស្តាប់ចុះ; ខ្ញុំនឹងពណ៌នាប្រាប់អ្នក។ ដំបូង ខ្ញុំនមស្ការចំពោះព្រះអម្ចាស់ស្វយម្ភូ—ព្រះបុរសបុរាណដើម—អស់កល្បជានិច្ច មិនចាស់មិនសាបសូន្យ—ហើយទើបចាប់ផ្តើម»។
Verse 18
अव्यक्ताय सुसूक्ष्माय निर्गुणाय गुणात्मने । स एष पुरुषव्याघत्र पीतवासा जनार्दन:
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ចំពោះព្រះអវ្យក្ត—មិនបង្ហាញខ្លួន—ដ៏ល្អិតល្អន់យ៉ាងខ្លាំង; ចំពោះព្រះដែលគ្មានគុណលក្ខណៈ ប៉ុន្តែជាមូលដ្ឋាននៃគុណលក្ខណៈទាំងអស់—នោះហើយជាព្រះជនារទនៈ ស្លៀកព្រះវស្ត្រពណ៌លឿង ឱ វីរបុរសដូចខ្លា»។
Verse 19
एष कर्ता विकर्ता च भूतात्मा भूतकृत् प्रभु: । अचिन्त्यं महदाश्चर्य पवित्रमिति चोच्यते
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ព្រះអង្គជាអ្នកធ្វើ និងជាអ្នករៀបចំកំណត់លទ្ធផល; ជាអាត្មាខាងក្នុងនៃសត្វទាំងអស់; ជាអ្នកបង្កើតសត្វទាំងអស់; ជាព្រះអម្ចាស់អធិបតី។ ព្រះអង្គត្រូវបានហៅថា មិនអាចគិតដល់បាន, អស្ចារ្យដ៏មហិមា, និងជាព្រះបរិសុទ្ធបំផុតដែលបរិសុទ្ធភាព»។
Verse 20
मार्कण्डेयजी बोले--राजन! मैं स्वयं प्रकट होनेवाले सनातन, अविनाशी, अव्यक्त, सूक्ष्म, निर्गुण एवं गुणस्वरूप पुराणपुरुषको नमस्कार करके तुम्हें वह कथा अभी सुनाता हूँ। पुरुषसिंह! ये जो हमलोगोंके पास बैठे हुए पीताम्बरधारी भगवान् जनार्दन हैं, ये ही संसारकी सृष्टि और संहार करनेवाले हैं। ये ही भगवान् समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी आत्मा और उनके रचयिता हैं। ये पवित्र, अचिन्त्य एवं महान् आश्वर्यमय तत्त्व कहे जाते हैं ।। १७ -7१९ || अनादिनिधनं भूत॑ विश्वमव्ययमक्षयम् | एष कर्ता न क्रियते कारणं चापि पौरुषे,इनका न आदि है, न अन्त। ये सर्वभूतस्वरूप, अव्यय और अक्षय हैं। ये ही सबके कर्ता हैं, इनका कोई कर्ता नहीं है। पुरुषार्थकी प्राप्तिमें भी ये ही कारण हैं
វៃសម្បាយណៈ បានមានពាក្យថា៖ «ព្រះអង្គនោះ គ្មានដើម គ្មានចុង—ជាសកលលោកផ្ទាល់ ដែលមិនរលាយ មិនចុះខ្សោយ។ ព្រះអង្គតែមួយគត់ជាអ្នកធ្វើ; គ្មានអ្នកបង្កើតណាអាចបង្កើតព្រះអង្គបានឡើយ។ ហើយសូម្បីតែក្នុងការសម្រេចគោលបំណងមនុស្ស (puruṣārtha) ព្រះអង្គក៏ជាមូលហេតុសម្រេចចិត្តដ៏ចម្បងផងដែរ»។
Verse 21
यद्येष पुरुषो वेद वेदा अपि न त॑ विदुः । सर्वमाश्नर्यमेवैतन्निवृत्तं राजसत्तम
វៃសម្បាយណៈ បានមានពាក្យថា៖ «បើបុរសនេះដឹងពិតប្រាកដ នោះសូម្បីតែវេទទាំងឡាយក៏មិនអាច ‘ដឹង’ គាត់បាន—ស្ថានភាពរបស់គាត់ល្អិតល្អន់ និងលើសពីការចាប់យល់ធម្មតា។ ទាំងអស់នេះពិតជាអស្ចារ្យណាស់ ឱ ព្រះមហាក្សត្រដ៏ប្រសើរ ព្រោះគាត់បានត្រឡប់ចេញពីការចូលរួមក្នុងលោកិយៈ ហើយឈរនៅក្នុងភាពដកខ្លួន (ពីបំណង និងកម្ម)»។
Verse 22
चत्वार्याहु: सहस्राणि वर्षाणां तत् कृतं युगम्
វៃសម្បាយណៈ បានមានពាក្យថា៖ «គេប្រកាសថា បួនពាន់ឆ្នាំ ជាសម័យក្រឹតយុគ (Kṛta Yuga) នោះ»។
Verse 23
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशक्ष तथाविध: । चार हजार दिव्य वर्षोका एक सत्ययुग बताया गया है, उतने ही सौ वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके होते हैं (इस प्रकार कुल अड़तालीस सौ दिव्य वर्ष सत्ययुगके हैं) ।। २२३ || त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते
វៃសម្បាយណៈ បានមានពាក្យថា៖ «សម័យនោះមានសន្ធ្យា (sandhyā) រយឆ្នាំ (ទេវឆ្នាំ) ហើយសន្ធ្យាំស (sandhyāṃśa) ចុងបញ្ចប់ក៏មានទំហំដូចគ្នា។ ដូច្នេះ សត្យយុគ (Satya Yuga) មានបួនពាន់ទេវឆ្នាំ ហើយបន្ថែមរយទេវឆ្នាំសម្រាប់ចំណុចភ្ជាប់ដើម និងចុង—សរុបបានបួនពាន់ប្រាំរយទេវឆ្នាំ។ បន្ទាប់មក ត្រេតាយុគ (Tretā Yuga) ត្រូវបាននិយាយថាមានបីពាន់ទេវឆ្នាំ»។
Verse 24
तथा वर्षसहसे द्वे द्वापरं परिमाणत:
វៃសម្បាយណៈ បានមានពាក្យថា៖ «ដូចគ្នានេះដែរ តាមមាត្រដ្ឋាន ទ្វាបរយុគ (Dvāpara) មានរយៈពេលពីរពាន់ឆ្នាំ»។
Verse 25
सहस्रमेकं वर्षाणां तत: कलियुगं स्मृतम्,तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं (इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है)। संध्या और संध्यांशका मान बराबर-बराबर ही समझो
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ បន្ទាប់ពីនោះ គេរំលឹកថា កលិយុគមានអាយុកាលមួយពាន់ឆ្នាំទេវៈ។ បន្ទាប់មក គេកំណត់ថា មានមួយរយឆ្នាំជាសន្ធ្យា (ពេលព្រលប់នៃយុគ) និងមួយរយឆ្នាំទៀតជាសន្ធ្យាំស (ពេលបន្ទាប់ពីសន្ធ្យា)។ ដូច្នេះ កលិយុគសរុបបានដល់មួយពាន់ពីររយឆ្នាំទេវៈ; ចូរយល់ថា មាត្រដ្ឋាននៃសន្ធ្យា និងសន្ធ្យាំស ស្មើគ្នា។
Verse 26
तस्य वर्षशतं संधि: संध्यांशश्व॒ ततः परम् | संधिसंध्यांशयोस्तुल्यं प्रमाणमुपधारय,तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं (इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है)। संध्या और संध्यांशका मान बराबर-बराबर ही समझो
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «សម្រាប់យុគនោះ សន្ធិ (រយៈពេលផ្លាស់ប្ដូរ) មានមួយរយឆ្នាំ ហើយបន្ទាប់មក សន្ធ្យាំស ក៏មានមួយរយឆ្នាំដែរ។ ចូរយល់ថា មាត្រដ្ឋាននៃសន្ធិ និងសន្ធ្យាំស ស្មើគ្នា»។
Verse 27
क्षीणे कलियुगे चैव प्रवर्तेत कृतं युगम् । एषा द्वादशसाहस्त्री युगाख्या परिकीर्तिता,कलियुगके क्षीण हो जानेपर पुनः सत्ययुगका आरम्भ होता है। इस तरह बारह हजार दिव्य वर्षोकी एक चतुर्युगी बतायी गयी है
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ពេលកលិយុគបានរត់ដល់ចុង និងសាបសូន្យទៅហើយ ក្រឹតយុគ (សត្យយុគ) នឹងចាប់ផ្តើមឡើងវិញ។ ដូច្នេះហើយ គេប្រកាសវដ្តនៃយុគទាំងបួន ដែលគេហៅថា ‘ដប់ពីរពាន់’ (ឆ្នាំទេវៈ)»។
Verse 28
एतत् सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाह्नतम् । विश्व हि ब्रह्मभवने सर्वत: परिवर्त्तते
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ដូច្នេះហើយ ការពណ៌នាដ៏ឧត្តម ដែលទាក់ទងនឹងព្រះព្រហ្ម បានប្រកាសរួចហើយ ដល់កម្រិតមួយពាន់ (ជាមាត្រ/ចំនួន)។ ព្រោះពិតណាស់ សកលលោកទាំងមូល នៅក្នុងលំនៅដ្ឋាននៃព្រះព្រហ្ម វិលវង់ និងបង្វិលទៅមកគ្រប់ទិសទាំងអស់»។
Verse 29
अल्पावशिष्टे तु तदा चुगान्ते भरतर्षभ
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ប៉ុន្តែពេលនោះ នៅចុងបញ្ចប់នៃយុគ—ឱ ព្រះអង្គជាគោឧសភក្នុងចំណោមពួកភារតៈ—នៅសល់ពេលតិចតួចប៉ុណ្ណោះ»។
Verse 30
सहस्रान्ते नरा: सर्वे प्रायशो5नृतवादिन: । यज्ञप्रतिनिधि: पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «នៅចុងបញ្ចប់នៃពាន់ឆ្នាំ មនុស្សភាគច្រើនតែងក្លាយជាអ្នកនិយាយមិនពិត។ នៅកាលនោះ ឱ បារថៈ ការយជ្ញក៏ក្លាយជាការធ្វើតែជំនួសប៉ុណ្ណោះ ហើយទានក៏ក្លាយជាទានតែជំនួសដែរ»។
Verse 31
व्रतप्रतिनिधिश्वैव तस्मिन् काले प्रवर्तते । भरतश्रेष्ठ सहस्र युगकी समाप्तिमें जब थोड़ा-सा ही समय शेष रह जाता है, उस समय कलियुगके अन्तिम भागमें प्राय: सभी मनुष्य मिथ्यावादी हो जाते हैं। पार्थ! उस समय यज्ञ, दान और व्रतके प्रतिनिधि कर्म चालू हो जाते हैं अर्थात् यज्ञ, दान, तप मुख्य विधिसे न होकर गौण विधिसे नाममात्र होने लगते हैं || २९-३० $ ।। ब्राह्मणा: शूद्रकर्माणस्तथा शूद्रा धनार्जका:
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «នៅកាលនោះ ការអនុវត្តវ្រត (វិន័យសាសនា) តែជំនួសៗ នឹងក្លាយជារឿងពេញនិយម។ ព្រាហ្មណ៍នឹងយកការងារដែលសមស្របសម្រាប់សូទ្រៈមកធ្វើ ហើយសូទ្រៈនឹងមមាញឹកក្នុងការរកទ្រព្យ—សញ្ញានៃការធ្លាក់ចុះនៅចុងយុគ ដែលសេចក្តីពិត និងការប្រតិបត្តិយជ្ញ ទាន និងតបស្យា តាមវិធីដ៏ពេញលេញ ត្រូវបានបោះបង់»។
Verse 32
निवृत्तयज्ञस्वाध्याया दण्डाजिनविवर्जिता:,(सहस्र चतुर्युगके अन्तिम) कलियुगके अन्तिम भागमें ब्राह्मण यज्ञ, स्वाध्याय, दण्ड और मृगचर्मका त्याग कर देंगे और (भनक्ष्याभक्ष्यका विचार छोड़कर) सब कुछ खाने- पीनेवाले हो जायँगे। तात! ब्राह्मण तो जपसे दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रोंके जपमें संलग्न होंगे
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «នៅផ្នែកចុងក្រោយនៃយុគកលិ—នៅចុងបញ្ចប់នៃវដ្តយុគដ៏វែង—ព្រាហ្មណ៍នឹងបោះបង់យជ្ញ និងការសិក្សាវេទ (ស្វាធ្យាយ) ហើយនឹងលះបង់ឈើច្រត់ និងស្បែកក្តាន់ដែលជាសញ្ញានៃជីវិតវិន័យ។ ដោយបោះចោលការបែងចែកអាហារដែលគួរឬមិនគួរទទួលទាន ពួកគេនឹងក្លាយជាអ្នកញ៉ាំផឹកដោយមិនរើស។ កូនអើយ ព្រាហ្មណ៍នឹងគេចចេញពីជប (ការសូត្រសក្ការៈ) ខណៈសូទ្រៈវិញនឹងចូលរួមក្នុងការសូត្រមន្តវេទ»។
Verse 33
ब्राह्मणा: सर्वभक्षाश्न॒ भविष्यन्ति कलौ युगे । अजपा ब्राह्मणास्तात शूद्रा जपपरायणा:,(सहस्र चतुर्युगके अन्तिम) कलियुगके अन्तिम भागमें ब्राह्मण यज्ञ, स्वाध्याय, दण्ड और मृगचर्मका त्याग कर देंगे और (भनक्ष्याभक्ष्यका विचार छोड़कर) सब कुछ खाने- पीनेवाले हो जायँगे। तात! ब्राह्मण तो जपसे दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रोंके जपमें संलग्न होंगे
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ក្នុងយុគកលិ ព្រាហ្មណ៍នឹងក្លាយជាអ្នកញ៉ាំគ្រប់យ៉ាង ដោយទទួលទានអ្វីក៏បានដែលមាន។ កូនអើយ ព្រាហ្មណ៍នឹងបោះបង់វិន័យនៃជប (ការសូត្រសក្ការៈ) ខណៈសូទ្រៈវិញនឹងឧស្សាហ៍ឧបាសកក្នុងមន្តជប»។
Verse 34
विपरीते तदा लोके पूर्वरूपं क्षयस्य तत् । बहवो म्लेच्छराजान: पृथिव्यां मनुजाधिप,नरेश्वर! इस प्रकार जब लोगोंके विचार और व्यवहार विपरीत हो जाते हैं, तब प्रलयका पूर्वरूप आरम्भ हो जाता है। उस समय इस पृथ्वीपर बहुत-से म्लेच्छ राजा राज्य करने लगते हैं
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «នៅពេលលោកលោកីយ៍វិលបញ្ច្រាស—នៅពេលគំនិត និងអាកប្បកិរិយារបស់មនុស្សផ្ទុយពីរបៀបត្រឹមត្រូវ—នោះហើយជាសញ្ញាមុននៃការបំផ្លាញ។ នៅកាលនោះ ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃមនុស្ស ជាច្រើននៃស្តេចម្លេច្ឆៈ នឹងឡើងគ្រប់គ្រងលើផែនដី»។
Verse 35
मृषानुशासिन: पापा मृषावादपरायणा: । आन्ध्रा: शका: पुलिन्दाश्न यवनाश्न नराधिपा:,छलसे शासन करनेवाले, पापी और असत्यवादी आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, बाह्लीक तथा शौर्यसम्पन्न आभीर इस देशके राजा होंगे। नरश्रेष्ठी उस समय कोई ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «នឹងមានស្តេចអាក្រក់ កាន់អំណាចដោយល្បិចកល ហើយលះបង់សច្ចៈ ទៅពឹងពាក់លើពាក្យកុហក។ ព្រះមហាក្សត្រនោះនឹងជាអន្ធ្រៈ សកៈ ពុលិន្ទៈ និងយវនៈ»។
Verse 36
काम्बोजा बाह्लिका: शूरास्तथा5<5भीरा नरोत्तम | न तदा ब्राह्मण: कश्रनित् स्वधर्ममुपजीवति,छलसे शासन करनेवाले, पापी और असत्यवादी आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, बाह्लीक तथा शौर्यसम्पन्न आभीर इस देशके राजा होंगे। नरश्रेष्ठी उस समय कोई ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ មនុស្សប្រសើរបំផុត! នៅកាលនោះ កាម្ពោជៈ និងបាហ្លីកៈ ហើយដូចគ្នានោះ អាភីរៈអ្នកក្លាហាន នឹងកាន់អំណាច។ ពេលនោះ មិនមានព្រាហ្មណ៍ណាម្នាក់អាចចិញ្ចឹមជីវិតដោយធម៌របស់ខ្លួនបានឡើយ»។
Verse 37
क्षत्रियाश्षापि वैश्याश्ष विकर्मस्था नराधिप । अल्पायुष: स्वल्पबला: स्वल्पवीर्यपराक्रमा:,नरेश्वर! क्षत्रिय और वैश्य भी अपना-अपना धर्म छोड़कर दूसरे वर्णोके कर्म करने लगेंगे। सबकी आयु कम होगी, सबके बल, वीर्य और पराक्रम घट जायँगे
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! សូម្បីតែខ្សត្រីយៈ និងវៃស្យៈ ក៏នឹងបោះបង់កាតព្វកិច្ចតាមវណ្ណៈរបស់ខ្លួន ហើយទៅធ្វើការងាររបស់វណ្ណៈផ្សេងៗ។ ដោយហេតុនោះ មនុស្សនឹងមានអាយុខ្លី កម្លាំងនឹងថយចុះ ហើយថាមពលជីវិត និងវីរភាពនឹងរលាយបាត់»។
Verse 38
अल्पसाराल्पदेहाश्व॒ तथा सत्याल्पभाषिण: । बहुशून्या जनपदा मृगव्यालावृता दिश:,मनुष्य नाटे कदके होंगे। उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा। बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे। सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोसे भरी होंगी। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य (अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे। शूद्र द्विजातियोंको भो (ऐ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूट्रोंको आर्य अर्थात् आप कहकर सम्बोधन करेंगे
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «មនុស្សនឹងក្លាយជាមនុស្សគ្មានសារសំខាន់ មានរាងកាយទន់ខ្សោយ ហើយពោលពាក្យដែលមានសច្ចៈតិចតួចបំផុត។ ដែនដីជាច្រើននឹងក្លាយជាទំនេរខ្លាំង ហើយទិសទាំងអស់នឹងពោរពេញដោយសត្វព្រៃ និងសត្វសាហាវ»។
Verse 39
युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च ब्रह्मवादिन: । भोवादिनस्तथा शाद्रा ब्राह्मणाश्चार्यवादिन:,मनुष्य नाटे कदके होंगे। उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा। बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे। सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोसे भरी होंगी। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य (अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे। शूद्र द्विजातियोंको भो (ऐ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूट्रोंको आर्य अर्थात् आप कहकर सम्बोधन करेंगे
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «នៅពេលចុងបញ្ចប់នៃយុគមកដល់ មនុស្សជាច្រើននឹងនិយាយអំពីព្រហ្ម (Brahman) ដោយឥតប្រយោជន៍—គ្រាន់តែពាក្យសម្តី គ្មានការយល់ដឹងពិត។ សូទ្រៈនឹងហៅអ្នកទ្វិជៈដោយពាក្យរឹង ‘भो!’ ហើយព្រាហ្មណ៍វិញ នឹងហៅសូទ្រៈដោយពាក្យគោរព ‘អារយៈ’ (‘លោក/អ្នក’)»។
Verse 40
युगान्ते मनुजव्याप्र भवन्ति बहुजन्तवः । न तथा घ्राणयुक्ताश्न सर्वगन्धा विशाम्पते,पुरुषसिंह राजन! युगान्तकालमें बहुतसे जीव-जन्तु उत्पन्न हो जायँगे। सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थ नासिकाको उतने गन्धयुक्त नहीं प्रतीत होंगे
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «នៅចុងបញ្ចប់នៃយុគ មហាសត្វជាច្រើនប្រភេទនឹងកើតមានឡើង។ ហើយសូម្បីអ្នកដែលមានអារម្មណ៍ក្លិន ក៏មិនអាចទទួលដឹងក្លិនក្រអូបទាំងឡាយដូចដែលវាគួរតែមានបានទេ។ ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃប្រជាជន ឱ សីហាបុរស ឱ ព្រះមហាក្សត្រ—នៅពេលនោះ ក្លិនទាំងអស់នឹងស្រកអំណាច និងស្រអាប់ទៅ»។
Verse 41
रसाश्च मनुजव्यात्र न तथा स्वादुयोगिन: । बहुप्रजा हस्वदेहा: शीलाचारविवर्जिता: । मुखे भगा: स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये,नरव्याप्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे। राजन्! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान (बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी। उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा। युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी। राजन! युगान्त-कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा (प्रायः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी-
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ បុរសខ្លាឃ្មុំ (ខ្លាខ្លាំង) សូម្បីអាហារ និងទឹករសជាតិទាំងឡាយ ក៏មិនមានភាពផ្អែមឆ្ងាញ់ និងរសជាតិល្អដូចដែលគួរតែមានទៀតឡើយ។ នៅចុងយុគ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ ស្ត្រីទាំងឡាយនឹងមានកម្ពស់ទាប មានកូនច្រើន ប៉ុន្តែខ្វះភាពខ្មាស់អៀន និងសីលធម៌ល្អ។ នៅពេលនៃការរលាយបាត់នោះ ស្ត្រីនឹងនិយាយអំពីរឿងកាមគុណដោយបើកចំហ និងមិនឈប់ឈរ»។
Verse 42
अट्टशूला जनपदा: शिवशूलाश्षतुष्पथा: । केशशूला: स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये,नरव्याप्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे। राजन्! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान (बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी। उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा। युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी। राजन! युगान्त-कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा (प्रायः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी-
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «នៅចុងយុគ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ—ឱ បុរសខ្លាឃ្មុំ—ដែនដីទាំងឡាយនឹងដូចជាត្រូវបានចាក់ដោយស្នែងមុត; សូម្បីតាមចំណុចប្រសព្វផ្លូវ ក៏នឹងមាន ‘ស្នែងព្រះសិវៈ’ ជាសញ្ញាអមង្គល។ ស្ត្រីទាំងឡាយក៏នឹងរងទុក្ខដូចជាត្រូវ ‘ចាក់ដោយសក់’ និងមានរោគាភាព។ នេះហើយជាសញ្ញាឈឺចាប់នៃការរលំរលាយសីលធម៌នៅចុងយុគ»។
Verse 43
अल्पक्षीरास्तथा गावो भविष्यन्ति जनाधिप । अल्पपुष्पफलाश्चापि पादपा बहुवायसा:,जनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा। वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर (अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे। भूपाल! ब्राह्मणगलोग (लोभवश) ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान- दक्षिणा लेंगे
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃមនុស្ស នៅពេលនោះ គោទាំងឡាយនឹងឲ្យទឹកដោះតិចតួចប៉ុណ្ណោះ។ ដើមឈើក៏នឹងមានផ្កា និងផ្លែតិច ហើយលើវានឹងមានក្អែកច្រើនជាងបក្សីមង្គល។ ដូច្នេះ នៅពេលយុគស្រកចុះ សញ្ញានៃសម្បូរបែប និងភាពបរិសុទ្ធនឹងរលាយបាត់ ហើយអ្វីដែលទាបថោក និងអមង្គលនឹងក្លាយជាអធិបតេយ្យ»។
Verse 44
ब्रह्मवध्यानुलिप्तानां तथा मिथ्याभिशंसिनाम् । नृपाणां पृथिवीपाल प्रतिगृह्नन्ति वै द्विजा:,जनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा। वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर (अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे। भूपाल! ब्राह्मणगलोग (लोभवश) ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान- दक्षिणा लेंगे
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ អ្នកអភិបាលផែនដី ព្រះព្រាហ្មណ៍ទាំងឡាយនឹងទទួលយកទានពីស្តេចដែលប្រឡាក់ដោយបាប ‘ព្រហ្មហត្យា’ និងពីអ្នកដែលនិយាយបង្កាច់ ប្រាប់ពាក្យមិនពិត។ នេះជាសញ្ញានៃការស្រកចុះសីលធម៌នៃយុគ៖ សូម្បីអ្នកដែលគួរតែថែរក្សាធម្ម ក៏ត្រូវជាប់ពាក់ព័ន្ធដោយលោភលន់ និងការសម្របសម្រួល; ហើយអ្នកគ្រប់គ្រងដែលមិនបរិសុទ្ធ ក៏នៅតែរកបានការអនុម័តផ្លូវសាសនាតាមរយៈការឧបត្ថម្ភ»។
Verse 45
लोभमोहपरीताश्च मिथ्याधर्मध्वजावृता: । भिक्षार्थ पृथिवीपाल चज्चूर्यन्ते द्विजैर्दिश:,राजन! वे ब्राह्मण लोभ और मोहमें फँसकर झूठे धर्मका ढोंग रचनेवाले होंगे, इतना ही नहीं, वे भिक्षाके लिये सारी दिशाओंके लोगोंको पीड़ित करते रहेंगे
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! ពួកព្រាហ្មណ៍ដែលត្រូវលោភៈ និងមោហៈគ្របដណ្ដប់ ហើយពាក់ស្លាកទង់នៃធម៌ក្លែងក្លាយ មិនត្រឹមតែសុំទានប៉ុណ្ណោះទេ; ដោយអះអាងថាសុំទាន ពួកគេនឹងរំខាន និងបង្កទុក្ខដល់ប្រជាជនគ្រប់ទិសទាំងអស់»។
Verse 46
करभारभयाद् भीता गृहस्था: परिमोषका: | मुनिच्छञाकृतिच्छन्ना वाणिज्यमुपजीविन:
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ដោយភ័យខ្លាចគ្រោះថ្នាក់នៃការត្រូវទ្រាំទម្ងន់ធ្ងន់ ពួកចោរទាំងនោះបានរស់នៅខាងក្រៅដូចជាគ្រួសារករ។ លាក់ខ្លួនក្រោមរូបរាងអ្នកសមណៈ ពួកគេរកជីវិតដោយពាណិជ្ជកម្ម—យកតួនាទីគួរគោរពធ្វើជាខែលបាំងសម្រាប់ការលួចលាក់»។
Verse 47
अर्थलोभान्नरव्याप्र तथा च ब्रह्म॒चारिण:
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ដោយសារលោភៈចំពោះទ្រព្យសម្បត្តិ មនុស្សនឹងរវល់រវាងក្នុងការប្រកបកិច្ចការលោកិយ; ដូចគ្នានេះ សូម្បីតែអ្នកដែលបានប្តេជ្ញាព្រហ្មចារី (brahmacārin) ក៏អាចត្រូវទាញចូលទៅក្នុងភាពរវល់មិនស្ងប់នោះដែរ»។
Verse 48
आश्रमेषु वृथाचारा: पानपा गुरुतल्पगा: । इह लौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम्
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «នៅក្នុងអាស្រាម មានអ្នកខ្លះដែលអាកប្បកិរិយារបស់ពួកគេគ្មានសារសំខាន់—ជាអ្នកផឹកស្រា និងអ្នករំលោភគ្រែរបស់គ្រូ (guru)។ នៅទីនេះ ពួកគេដេញតាមតែគោលបំណងលោកិយ ប្រាថ្នាឲ្យសាច់ និងឈាមកើនឡើង»។
Verse 49
नरश्रेष्ठल धनके लोभसे ब्रह्मचारी भी आश्रमोंमें दम्भपूर्ण आचारको अपनायेंगे और मद्यपान करके गुरुपत्नीगमन करेंगे। लोग अपने शरीरके मांस और रक्त बढ़ानेवाले इहलौकिक कर्मांमें ही लगे रहेंगे ।। बहुपाषण्डसंकीर्णा: परान्नगुणवादिन: । आश्रमा मनुजव्यात्र भविष्यन्ति युगक्षये,नरश्रेष्ठ) युगान्तकालमें सभी आश्रम अनेक प्रकारके पाखण्डोंसे व्याप्त और दूसरोंसे मिले हुए भोजनका ही गुणगान करनेवाले होंगे
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ វីរបុរសក្នុងចំណោមមនុស្ស! នៅចុងបញ្ចប់នៃយុគៈ អាស្រាមទាំងអស់នឹងត្រូវគ្របដណ្ដប់ដោយការបង្ហាញបែបបាបសាសនាច្រើនប្រភេទ និងភាពច្របូកច្របល់។ មនុស្សនឹងសរសើរ និងរត់តាមអាហារដែលបានមកពីអ្នកដទៃ ហើយវិន័យនៃអាស្រាមនឹងត្រូវបំផ្លាញខាងក្នុង—ដល់ថ្នាក់សញ្ញាខាងក្រៅជំនួសការអត់ធ្មត់ខាងក្នុង ហើយធម៌ធ្លាក់ចុះទៅជាការចង់បាន និងការលាក់ពុត»។
Verse 50
यर्थर्तुवर्षी भगवान् न तथा पाकशासन: । न चापि सर्वबीजानि सम्यगू रोहन्ति भारत,भगवान् इन्द्र भी ठीक वर्षाऋतुके समय जलकी वर्षा नहीं करेंगे। भारत! भूमिमें बोये हुए सभी बीज ठीकसे नहीं जमेंगे
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ដូចព្រះអម្ចាស់ដ៏ប្រសើរដែលបញ្ជូនភ្លៀងឲ្យធ្លាក់តាមរដូវកាលដ៏សមគួរ ដូច្នោះផងដែរ បាកសាសនៈ (ព្រះឥន្ទ្រ) ក៏ត្រូវប្រព្រឹត្តឲ្យត្រឹមត្រូវ។ ប្រសិនបើព្រះឥន្ទ្រមិនបង្ហូរទឹកភ្លៀងនៅពេលគួរ ទេហើយ ឱ ភារតៈ សូម្បីគ្រាប់ពូជដែលបានសាបក្នុងដី ក៏មិនអាចដុះលូតលាស់បានល្អឡើយ»។
Verse 51
हिंसाभिरामश्न जनस्तथा सम्पद्यते5शुचि: । अधर्मफलमत्यर्थ तदा भवति चानघ,कलियुगमें सब लोग हिंसामें ही सुख माननेवाले तथा अपवित्र रहेंगे। निष्पाप! उस समय अधर्मका फल बहुत अधिक मात्रामें मिलेगा
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «នៅយុគកលិ មនុស្សទាំងឡាយនឹងយកអំពើហិង្សាជាសេចក្តីរីករាយ ហើយដោយហេតុនោះ នឹងក្លាយជាមិនបរិសុទ្ធក្នុងអាកប្បកិរិយា។ ឱ អ្នកគ្មានបាប! នៅពេលនោះ ផលនៃអធម៌នឹងកើនឡើងយ៉ាងលើសលប់—ផ្លែផ្ការបស់វានឹងច្រើន និងធ្ងន់ធ្ងរ»។
Verse 52
तदा च पृथिवीपाल यो भवेद् धर्मसंयुतः । अल्पायु: स हि मन्तव्यो न हि धर्मो5स्ति कश्नन,भूपाल! उस समय जो भी धर्ममें तत्पर रहेगा, उसकी आयु बहुत थोड़ी देखनेमें आयेगी; क्योंकि उस समय कोई भी धर्म टिक नहीं सकेगा
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ហើយនៅពេលនោះ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ អ្នកណាក្នុងចំណោមអ្នកគ្រប់គ្រងដែលនៅជាប់ជានិច្ចនឹងធម៌ នឹងត្រូវគេរាប់ថាជាមនុស្សអាយុខ្លី; ព្រោះនៅសម័យនោះ ធម៌មិនអាចឈរជាប់បានឡើយ»។
Verse 53
भूयिष्ठं कूटमानैश्व पण्यं विक्रीणते जना: । वणिजकश्न नरव्यात्र बहुमाया भवन्त्युत,लोग बाजारमें झूठे माप-तौल बनाकर बहुत-सा माल बेचते रहेंगे। नरश्रेष्ठीी उस समयके बनिये भी बहुत माया जाननेवाले (धूर्त) होंगे
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «នៅសម័យនោះ មនុស្សភាគច្រើននឹងលក់ទំនិញដោយប្រើទម្ងន់ និងរង្វាស់ក្លែងក្លាយ។ ហើយពួកពាណិជ្ជករ ឱ មនុស្សប្រសើរ ក៏នឹងពោរពេញដោយល្បិចកល និងការបោកបញ្ឆោត—ចេះក្បាច់កលជាច្រើនប្រភេទ»។
Verse 54
धर्मिष्ठा: परिहीयन्ते पापीयान् वर्धते जन: । धर्मस्य बलहानि: स्यादधर्मश्ष बली तथा,धर्मात्मा पुरुष हानि उठाते दीखेंगे और बड़े-बड़े पापी लौकिक दृष्टिसे उन्नतिशील होंगे। धर्मका बल घटेगा और अधर्म बलवान् होगा
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «អ្នកដែលស្មោះត្រង់ចំពោះធម៌ នឹងត្រូវបន្ថយ និងត្រូវគេមើលរំលង; ខណៈដែលមនុស្សមានបាបធ្ងន់ធ្ងរ នឹងរីកចម្រើន និងកើនឡើង។ កម្លាំងនៃធម៌នឹងថយចុះ ហើយអធម៌វិញ នឹងក្លាយជាមានអំណាច»។
Verse 55
अल्पायुषो दरिद्राश्न॒ धर्मिष्ठा मानवास्तथा । दीर्घायुष: समृद्धाश्व विधर्माणो युगक्षये,युगान्तकालमें धर्मिष्ठ मानव अल्पायु तथा दरिद्र देखे जायँगे और अधर्मी मनुष्य दीर्घायु तथा समृद्धिशाली देखे जायँगे
វៃសម្បាយណៈបានមានព្រះវាចា៖ នៅចុងសម័យយុគ (យុគាន្ត) សូម្បីតែមនុស្សដែលឈរជាប់ក្នុងធម៌ ក៏នឹងត្រូវឃើញថាមានអាយុខ្លី និងក្រីក្រ; ខណៈដែលអ្នកប្រព្រឹត្តផ្ទុយនឹងធម៌ នឹងត្រូវឃើញថាមានអាយុវែង និងសម្បូរបែប។
Verse 56
नगराणां विहारेषु विधर्माणो युगक्षये । अधर्मिष्ठिरुपायैश्व प्रजा व्यवहरन्त्युत,युगान्तके समय नगरोंके उद्यानोंमें पापी पुरुष अड्डा जमायेंगे और पापपूर्ण उपायोंद्वारा प्रजाके साथ दुर्व्यवहार करेंगे
វៃសម្បាយណៈបានមានព្រះវាចា៖ នៅចុងសម័យយុគ ក្នុងសួនកម្សាន្តនៃទីក្រុង បុរសដែលបានធ្លាក់ចេញពីធម៌ នឹងមកប្រមូលផ្តុំធ្វើជាទីស្នាក់; ហើយដោយល្បិចអធម៌ដ៏អាក្រក់ ពួកគេនឹងធ្វើទុក្ខបុកម្នេញប្រជាជន។
Verse 57
संचयेन तथाल्पेन भवन्त्याब्यमदान्विता: । धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूयिष्ठशो नरा:,राजन! थोड़ेसे धनका संग्रह हो जानेपर लोग धनाढ्यताके मदसे उन्मत्त हो उठेंगे। यदि किसीने विश्वास करके अपने धनको धरोहरके रूपमें रख दिया तो अधिकांश पापाचारी और निर्लज मनुष्य उस धरोहरको हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और उससे साफ कह देंगे कि हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है
វៃសម្បាយណៈបានមានព្រះវាចា៖ ព្រះរាជាអើយ សូម្បីតែការប្រមូលទ្រព្យតិចតួច ក៏ធ្វើឲ្យមនុស្សហើមអួតដោយមោទនភាពនៃសម្បត្តិ។ ហើយបើមានអ្នកដាក់ប្រាក់ជាដំណាក់ដោយទុកចិត្ត មនុស្សភាគច្រើននឹងព្យាយាមយកវាទៅជារបស់ខ្លួន ហើយនិយាយដោយមិនខ្មាសថា «នៅទីនេះ អ្នកគ្មានអ្វីទេ»។
Verse 58
हर्तु व्यवसिता राजन् पापाचारसमन्विता: । नैतदस्तीति मनुजा वर्तन्ते निरपत्रपा:,राजन! थोड़ेसे धनका संग्रह हो जानेपर लोग धनाढ्यताके मदसे उन्मत्त हो उठेंगे। यदि किसीने विश्वास करके अपने धनको धरोहरके रूपमें रख दिया तो अधिकांश पापाचारी और निर्लज मनुष्य उस धरोहरको हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और उससे साफ कह देंगे कि हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है
វៃសម្បាយណៈបានមានព្រះវាចា៖ ព្រះរាជាអើយ ពេលពួកគេបានសម្រេចចិត្តលួចយកវា—ដោយជាប់ពាក់ព័ន្ធនឹងអំពើបាប—មនុស្សឥតអៀនខ្មាស នឹងប្រព្រឹត្តដល់ថ្នាក់និយាយថា «វាមិនមាននៅទីនេះសោះ»។ ដូច្នេះ ពេលមានទ្រព្យតិចតួចត្រូវបានប្រមូល មនុស្សនឹងម醉ដោយមោទនភាពនៃសម្បត្តិ; ហើយបើមានអ្នកទុកចិត្តដាក់ទ្រព្យជាធានា ឬជាអ្វីសម្រាប់រក្សាទុក មនុស្សអាក្រក់ជាច្រើននឹងព្យាយាមយកដំណាក់នោះ ហើយបដិសេធកាតព្វកិច្ចដោយមាត់ត្រង់។
Verse 59
पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणो5थ मृगास्तथा । नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते,मनुष्यका मांस खानेवाले हिंसक जीव तथा पशु-पक्षी नागरिकोंके बगीचों और देवालयोंमें भी शयन करेंगे
វៃសម្បាយណៈបានមានព្រះវាចា៖ សត្វសាហាវដែលស៊ីសាច់មនុស្ស—ទាំងបក្សី និងសត្វព្រៃ—នឹងមកដេកសូម្បីតែនៅក្នុងសួនកម្សាន្តនៃទីក្រុង និងក្នុងទីសក្ការៈបូជាដ៏បរិសុទ្ធ។
Verse 60
सप्तवर्षष्टवर्षाश्च स्त्रियों गर्भधरा नूप । दशद्वादशवर्षाणां पुंसां पुत्र: प्रजायते,राजन! युगान्तकालमें सात-आठ वर्षकी स्त्रियाँ गर्भ धारण करेंगी और दस-बारह वर्षकी अवस्थावाले पुरुषोंके भी पुत्र होंगे
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! នៅក្នុងយុគនៃការធ្លាក់ចុះនោះ សូម្បីក្មេងស្រីអាយុប្រាំពីរ ឬប្រាំបីឆ្នាំក៏នឹងមានផ្ទៃពោះ ហើយសូម្បីក្មេងប្រុសអាយុដប់ ឬដប់ពីរឆ្នាំក៏នឹងបង្កើតកូនប្រុសបានដែរ»។
Verse 61
भवन्ति षोडशे वर्षे नरा: पलितिनस्तथा । आयु:क्षयो मनुष्याणां क्षिप्रमेव प्रपद्यते,सोलहवें वर्षमें मनुष्योंक बाल पक जायँगे और उनकी आयु शीघ्र ही समाप्त हो जायगी
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ដល់អាយុដប់ប្រាំមួយឆ្នាំ បុរសនឹងមានសក់ស្កូវរួចហើយ; ហើយអាយុកាលរបស់មនុស្សនឹងរលត់ចុះយ៉ាងឆាប់រហ័ស និងឈានទៅដល់ទីបញ្ចប់»។
Verse 62
क्षीणायुषो महाराज तरुणा वृद्धशीलिन: । तरुणानां च यच्छीलं तद् वृद्धेषु प्रजायते,महाराज! उस समयके तरुणोंकी आयु क्षीण होगी और उनका शील-स्वभाव बूढ़ोंका- सा हो जायगा और तरुणोंका जो शील-स्वभाव होना चाहिये, वह बूढ़ोंमें प्रकट होगा
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រដ៏អធិការ! នៅពេលនោះ យុវជននឹងមានអាយុខ្លី ហើយនឹងមានអាកប្បកិរិយា និងចរិតដូចមនុស្សចាស់; ហើយអាកប្បកិរិយាដែលគួរតែមាននៅក្នុងយុវជន នឹងទៅបង្ហាញឡើងនៅក្នុងមនុស្សចាស់វិញ»។
Verse 63
विपरीतास्तदा नार्यो वज्चयित्वारहत: पतीन् | व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासै: पशुभिरेव च,उस समयकी विपरीत स्वभाववाली स्त्रियाँ अपने योग्य पतियोंको भी धोखा देकर बुरे शील-स्वभावकी हो जायँगी और सेवकों तथा पशुओंके साथ भी व्यभिचार करेंगी
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «នៅពេលនោះ ស្ត្រីដែលមានចរិតបញ្ច្រាស នឹងបោកបញ្ឆោតស្វាមីដែលសមរម្យរបស់ខ្លួន ហើយក្លាយជាមនុស្សមានសីលធម៌ទាប; ពួកនាងនឹងប្រព្រឹត្តអំពើអសីលសូម្បីជាមួយអ្នកបម្រើ និងសត្វផងដែរ»។
Verse 64
वीरपत्न्यस्तथा नार्य: संश्रयन्ति नरान् नृप । भर्तारमपि जीवन्तमन्यान् व्यभिचरन्त्युत,राजन! वीर पुरुषोंकी पत्नियाँ भी परपुरुषोंका आश्रय लेंगी और पतिके जीते हुए भी दूसरोंसे व्यभिचार करेंगी
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! សូម្បីភរិយារបស់វីរបុរស—ស្ត្រីដែលគួរត្រូវបានការពារដោយកិត្តិយស—ក៏នឹងស្វែងរកទីពឹងពាក់លើបុរសដទៃ; ហើយទោះស្វាមីនៅរស់ក៏ដោយ ពួកនាងនឹងប្រព្រឹត្តអំពើផិតក្បត់ជាមួយអ្នកដទៃផងដែរ»។
Verse 65
तस्मिन् युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते चायुष: क्षये । अनावृष्टिर्महाराज जायते बहुवार्षिकी,महाराज! इस प्रकार आयुको क्षीण करनेवाले सहस्र युगोंके अन्तिम भागकी समाप्ति होनेपर बहुत वर्षोतक वृष्टि बंद हो जाती है
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ មហារាជា! នៅពេលចុងបញ្ចប់នៃពាន់យុគមកដល់ ហើយអាយុកាលរបស់សត្វលោករលាយចុះទៅរកទីបញ្ចប់ នោះគ្រោះរាំងស្ងួតយូរអង្វែងកើតឡើង—ភ្លៀងឈប់ធ្លាក់អស់ជាច្រើនឆ្នាំ»។
Verse 66
ततस्तान्यल्पसाराणि सत्त्वानि क्षुधितानि वै । प्रलयं यान्ति भूयिष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते,पृथ्वीपते! इससे भूतलके थोड़ी शक्तिवाले अधिकांश प्राणी भूखसे व्याकुल होकर मर जाते हैं
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «បន្ទាប់មក ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃផែនដី! សត្វមានកម្លាំងតិចទាំងនោះ—ដែលត្រូវឃ្លានបង្ខំ—ភាគច្រើនជួបវិនាសលើផែនដី»។
Verse 67
ततो दिनकरेदीप्तै: सप्तभिर्मनुजाधिप । पीयते सलिल ॑ सर्व समुद्रेषु सरित्सु च,नरेश्वर! तदनन्तर प्रचण्ड तेजवाले सात सूर्य उदित होकर सरिताओं और समुद्रोंका सारा जल सोख लेते हैं
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «បន្ទាប់មក ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃមនុស្ស! ដោយពន្លឺឆេះឆាបនៃព្រះអាទិត្យប្រាំពីរ ទឹកទាំងអស់ត្រូវបានស្រូបអស់—ទាំងក្នុងសមុទ្រ និងក្នុងទន្លេ»។
Verse 68
यच्च काष्ठ॑ तृणं चापि शुष्कं चार्द्र च भारत । सर्व तद् भस्मसाद् भूत॑ दृश्यते भरतर्षभ,भरतकुलभूषण! उस समय जो भी तृण-काष्ठ अथवा सूखे-गीले पदार्थ होते हैं, वे सभी भस्मीभूत दिखायी देने लगते हैं
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ភារត! អ្វីៗទាំងអស់—ទាំងឈើទាំងស្មៅ មិនថាស្ងួតឬសើម—សុទ្ធតែឃើញថាប្រែក្លាយជាផេះទៅហើយ ឱ វីរបុរសក្នុងពួកភារត!»។
Verse 69
तत: संवर्तको वह्निवायुना सह भारत | लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम्,भारत! इसके बाद '“संवर्तक” नामकी प्रलयकालीन अग्नि वायुके साथ उन सम्पूर्ण लोकोंमें फैल जाती है, जहाँका जल पहले सात सूर्योंद्वारा सोख लिया गया है
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «បន្ទាប់មក ឱ ភារត! អគ្គី “សំវર્તក” នៃកាលវិនាស—រួមជាមួយខ្យល់—រាលដាលចូលទៅក្នុងលោកទាំងអស់ ដែលទឹករបស់វាត្រូវបានព្រះអាទិត្យស្រូបស្ងួតទៅមុនហើយ»។
Verse 70
ततः स पृथिवीं भिनत्त्वा प्रविश्य च रसातलम् । देवदानवयक्षाणां भयं जनयते महत्,तत्पश्चात् पृथ्वीका भेदन कर वह अग्नि रसातलतक पहुँच जाती है तथा देवता, दानव और यक्षोंके लिये महान् भय उपस्थित कर देती है
បន្ទាប់មក វាបំបែកផែនដី ហើយចូលទៅកាន់ រាសាតល (Rasātala) បង្កឲ្យកើតភ័យខ្លាំងដល់ពួកទេវតា ដានវៈ និងយក្ខៈ។
Verse 71
निर्दहन् नागलोकं च यच्च किज्चित् क्षिताविह । अधस्तात् पृथिवीपाल सर्व नाशयते क्षणात्,राजन्! वह नागलोकको जलाती हुई इस पृथ्वीके नीचे जो कुछ भी है, उस सबको क्षणभरमें नष्ट कर देती है
វៃសម្បាយនៈ បាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះរាជា! វាឆេះដុតនគរនាគ (Nāgaloka) ហើយបំផ្លាញភ្លាមៗអ្វីៗទាំងអស់ដែលមានលើផែនដីនេះ និងអ្វីៗទាំងអស់ដែលស្ថិតនៅក្រោមវា»។
Verse 72
ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च । निर्दहत्यशिवो वायु: स च संवर्तकोडनल:,इसके बाद वह अमंगलकारी प्रचण्ड वायु और वह संवर्तक अग्नि बाईस हजार योजन तकके लोगोंको भस्म कर डालती है
បន្ទាប់មក ខ្យល់ព្រៃផ្សៃអមង្គលបានកើតឡើង ហើយជាមួយនោះមានភ្លើងសំវរតក (Saṁvartaka) ដោយរួមគ្នា វាឆេះដុត និងបំផ្លាញជាស្មៅផេះសត្វលោកទូលំទូលាយដល់ម្ភៃពីរពាន់យោជនៈ។
Verse 73
सदेवासुरगन्धर्व सयक्षोरगराक्षसम् । ततो दहति दीप्त: स सर्वमेव जगद् विभु:,इस प्रकार सर्वत्र फैली हुई वह प्रज्वलित अग्नि देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण विश्वको भस्म कर डालती है
វៃសម្បាយនៈ បាននិយាយថា៖ បន្ទាប់មក ភ្លើងដ៏ភ្លឺចែងចាំង ដែលរាលដាលគ្រប់ទិសនោះ ឆេះដុតពិភពលោកទាំងមូល រួមទាំងទេវតា អសុរ គន្ធវៈ យក្ខៈ នាគ និងរាក្សស។
Verse 74
ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिता: । उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शना:,इसके बाद आकाशमें महान् मेघोंकी घोर घटा घिर आती है, जो अद्भुत दिखायी देता है। उनमेंसे प्रत्येक मेघ-समूह हाथियोंके झुंडकी भाँति विशालकाय और श्यामवर्ण तथा बिजलीकी मालाओंसे विभूषित होता है
បន្ទាប់មក នៅលើមេឃ មានពពកធំៗអស្ចារ្យឲ្យឃើញ កើតឡើងជាខ្លាំង—ធំដូចហ្វូងដំរី មានពណ៌ខ្មៅងងឹត ហើយតុបតែងដោយខ្សែរផ្លេកបន្ទោរដូចកម្រងផ្កា។
Verse 75
केचिन्नीलोत्पलश्यामा: केचित् कुमुदसंनि भा: । केचित् किज्जल्कसंकाशा: केचित् पीता: पयोधरा:,कुछ बादल नील कमलक समान श्याम और कुछ कुमुद-कुसुमके समान सफेद होते हैं। कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है। कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले और कुछ कारण्डव पक्षीके समान दृष्टिगोचर होते हैं। कोई-कोई कमलदलके समान और कुछ हिंगुल-जैसे जान पड़ते हैं
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ពពកខ្លះងងឹតដូចផ្កាឈូកខៀវ; ខ្លះសដូចផ្កាគុមុទ។ ខ្លះមានពណ៌ដូចធូលីលម្អងផ្កា ហើយខ្លះទៀត—អ្នកកាន់ទឹក—លេចលើកលែងជាពណ៌លឿង»។
Verse 76
केचिद्धारिद्रसंकाशा: कारण्डवनिभास्तथा । केचित् कमलपत्राभा: केचिद्धिड्डुलसप्रभा:,कुछ बादल नील कमलक समान श्याम और कुछ कुमुद-कुसुमके समान सफेद होते हैं। कुछ जलधरोंकी कान्ति केसरोंके समान दिखायी देती है। कुछ मेघ हल्दीके सदृश पीले और कुछ कारण्डव पक्षीके समान दृष्टिगोचर होते हैं। कोई-कोई कमलदलके समान और कुछ हिंगुल-जैसे जान पड़ते हैं
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ខ្លះមានពណ៌លឿងដូចរមៀត; ខ្លះមានពណ៌ដូចបក្សីករណ្ឌវ។ ខ្លះភ្លឺដូចស្លឹកឈូក ហើយខ្លះមានពន្លឺក្រហមដូចហិង្គុល (វើមីល្យុង)»។
Verse 77
केचित् पुरवराकारा: केचिद् गजकुलोपमा: । केचिदञ्जनसंकाशा: केचिन्मकरसंनिभा:,कुछ श्रेष्ठ नगरोंके समान, कुछ हाथियोंके झुंड-जैसे, कुछ काजलके रंगवाले और कुछ मगरोंकी-सी आकृतिवाले होते हैं
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ខ្លះមានរាងដូចនគរល្អឥតខ្ចោះ; ខ្លះដូចហ្វូងដំរី។ ខ្លះងងឹតដូចអញ្ជន (កូហ្ល) ហើយខ្លះមានទ្រង់ទ្រាយដូចមகர (ក្រពើ)»។
Verse 78
विद्युन्मालापिनद्धाड: समुत्तिष्ठन्ति वै घना: । घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिता: । ततो जलधरा: सर्वे व्याप्रुवन्ति नभस्तलम्,वे सभी बादल विद्युन्मालाओंसे अलंकृत होकर घिर आते हैं। महाराज! भयंकर गर्जना करनेके कारण उनका स्वरूप बड़ा भयानक जान पढ़ता है। धीरे-धीरे वे सभी जलधर समूचे आकाशमण्डलको ढक लेते हैं
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ឱ មហារាជា ពពកទាំងឡាយកើនឡើង ដោយពាក់ព័ន្ធជាមាលាវិទ្យុ។ រូបរាងវាខ្លាចគួរឱ្យភ័យ ហើយសំឡេងរន្ទះរបស់វាកាន់តែធ្វើឱ្យគួរឱ្យតក់ស្លុត។ បន្ទាប់មក ពពកអ្នកកាន់ទឹកទាំងអស់បានរាលដាលគ្របដណ្តប់លើមេឃទាំងមូល»។
Verse 79
तैरियं पृथिवी सर्वा सपर्वतवनाकरा । आपूर्यते महाराज सलिलौघपरिप्लुता,महाराज! उनके वर्षा करनेपर पर्वत, वन और खानोंसहित यह सारी पृथ्वी अगाध जलराशिमें ड्ूबकर सब ओरसे भर जाती है
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ឱ មហារាជា ពេលពួកវាបង្ហូរភ្លៀង ចក្រភពផែនដីទាំងមូលនេះ—ជាមួយភ្នំ ព្រៃ និងរ៉ែ—ត្រូវបានជន់លិចដោយលំហូរទឹកដ៏កក្រើក ហើយពេញលេញគ្រប់ទិស»។
Verse 80
ततस्ते जलदा घोरा राविण: पुरुषर्षभ । सर्वतः प्लावयन्त्याशु चोदिता: परमेछ्िना,पुरुषरत्न! तदनन्तर विधातासे प्रेरित हो गर्जन-तर्जन करनेवाले वे भयंकर मेघ शीघ्र सब ओर वर्षा करके सबको जलसे आप्लावित कर देते हैं
បន្ទាប់មក ឱ បុរសឧត្តម ពពកភ្លៀងដ៏គួរឱ្យភ័យខ្លាច ដែលមានសំឡេងផ្គរលាន់កក្រើក—ដោយព្រះបង្កើត (វិធាតា) ជំរុញឲ្យចលនា—បានបង្ហូរភ្លៀងយ៉ាងឆាប់រហ័សពីគ្រប់ទិស ហើយជន់លិចអស់ទាំងអ្វីៗ។
Verse 81
वर्षमाणा महत् तोयं पूरयन्तो वसुंधराम् । सुघोरमशिवं रौद्रं नाशयन्ति च पावकम्,महान् जल-समूहकी वर्षा करके वसुन्धराको जलमें डुबोनेवाले वे समस्त मेघ उस अत्यन्त घोर, अमंगलकारी और भयानक अग्निको बुझा देते हैं
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ពពកទាំងនោះ បង្ហូរទឹកយ៉ាងមហិមា ហើយជន់លិចផែនដី ដោយឡែកវាបានពន្លត់ភ្លើងដ៏សាហាវបំផុត—អមង្គល និងកាចសាហាវ—ឲ្យរលត់បញ្ចប់អណ្តាតភ្លើងបំផ្លាញរបស់វា»។
Verse 82
ततो द्वादशवर्षाणि पयोदास्त उपप्लवे । धाराभि: पूरयन्तो वै चोद्यमाना महात्मना,तदनन्तर प्रलयकालके वे पयोधर महात्मा ब्रह्माजीकी प्रेरणा पाकर पृथ्वीको परिपूर्ण करनेके लिये बारह वर्षोतक धारावाहिक वृष्टि करते हैं
បន្ទាប់មក នៅគ្រាពេលមហាប្រល័យ ពពកដ៏ផ្ទុកទឹកភ្លៀង—ដោយមហាត្មា (ព្រះបរម) ជំរុញ—បានបង្ហូរទឹកជាខ្សែៗមិនដាច់រយៈពេលដប់ពីរឆ្នាំ បំពេញផែនដីពីគ្រប់ទិស។
Verse 83
ततः समुद्र: स्वां वेलामतिक्रामति भारत । पर्वताश्च विदीर्यन्ते मही चाप्सु निमज्जति,भारत! तदनन्तर समुद्र अपनी सीमाको लाँघ जाता है, पर्वत फट जाते और पृथ्वी पानीमें डूब जाती है
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «បន្ទាប់មក ឱ ភារតៈ សមុទ្រលើសកំណត់ឆ្នេររបស់ខ្លួន; ភ្នំទាំងឡាយបែកបាក់ ហើយផែនដីផ្ទាល់ក៏លិចចូលទៅក្នុងទឹក»។
Verse 84
सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पयोदा नभस्तलम् । संवेष्टयित्वा नश्यन्ति वायुवेगपराहता:,तत्पश्चात् समस्त आकाशको घेरकर सब ओर फैले हुए वे मेघ वायुके प्रचण्ड वेगसे छिन्न-भिन्न होकर सहसा अदृश्य हो जाते हैं
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ពពកទាំងនោះ រអិលរអួលភាន់ច្រឡំពីគ្រប់ទិស ដោយឆាប់រហ័សបានព័ទ្ធគ្រប់លំហអាកាសទាំងមូល; បន្ទាប់មក ត្រូវខ្យល់ដ៏កាចសាហាវបោកបក់ បែកខ្ទេច ហើយរលាយបាត់ពីភ្នែកភ្លាមៗ»។
Verse 85
ततस्तं मारुतं घोरं स्वयम्भूमनुजाधिप । आदि: पद्मालयो देव: पीत्वा स्वपिति भारत,नरेश्वरर इसके बाद कमलमें निवास करनेवाले आदिदेव स्वयं ब्रह्माजी उस भयंकर वायुको पीकर सो जाते हैं
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «បន្ទាប់មក ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃមនុស្ស ទំនប់ខ្យល់ដ៏គួរឱ្យភ័យនោះ ត្រូវបានព្រះស្វយម្ភូ—អាទិទេវៈអ្នកស្នាក់នៅក្នុងផ្កាឈូក—លេបស្រូបចូល។ ព្រះព្រហ្មា បានផឹកវាចូលហើយ ក៏ដេកលក់ទៅ ឱ ភារតៈ»។
Verse 86
तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजड्रमे । नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते,इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगतमें मैं अकेला ही इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «នៅក្នុងមហាសមុទ្រតែមួយដ៏គួរឱ្យភ័យនៃការលាយរលាយនោះ—ពេលដែលសត្វចលនានិងអចលនាបានវិនាស, ពេលដែលក្រុមទេវតានិងអសុរាបានបាត់បង់, ហើយសូម្បីយក្សនិងរាក្សសក៏មិននៅសល់—នៅសល់តែវាលទទេដ៏គួរឱ្យស្ញប់ស្ញែងនោះប៉ុណ្ណោះ»។
Verse 87
निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे । अनन्तरिक्षे लोके5स्मिन् भ्रमाम्पेकोडहमाहत:,इस प्रकार चराचर प्राणियों, देवताओं तथा असुर आदिके नष्ट हो जानेपर यक्ष, राक्षस, मनुष्य, हिंसक जीव, वृक्ष तथा अन्तरिक्षसे शून्य उस घोर एकार्णवमय जगतमें मैं अकेला ही इधर-उधर मारा-मारा फिरता हूँ
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ ក្នុងលោកនេះដែលគ្មានមនុស្ស គ្មានសត្វ និងគ្មានដើមឈើ ហើយសូម្បីសត្វនៅមធ្យមលោកក៏សូន្យ—ខ្ញុំដែលរងទុក្ខ និងនៅតែម្នាក់ឯង បានវង្វេងដើរទៅមកដោយគ្មានទិសដៅ»។
Verse 88
एकार्णवे जले घोरे विचरन् पार्थिवोत्तम | अपश्यन् सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं तत:,नृपश्रेष्ठी एकार्णवके उस भयंकर जलमें विचरते हुए जब मैंने किसी भी प्राणीको नहीं देखा, तब मुझे बड़ी व्याकुलता हुई
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រដ៏ប្រសើរ ខណៈខ្ញុំវង្វេងដើរនៅក្នុងទឹកដ៏គួរឱ្យភ័យនៃមហាសមុទ្រតែមួយដែលលេបលាន់អស់ទាំងអ្វីៗ ហើយមិនឃើញសត្វមានជីវិតណាមួយសោះ នោះចិត្តខ្ញុំត្រូវបានគ្របដណ្តប់ដោយការថប់បារម្ភយ៉ាងខ្លាំង និងភាពអស់សង្ឃឹម»។
Verse 89
ततः सुदीर्घ गत्वाहं प्लवमानो नराधिप । श्रान्त: क्वचिन्न शरणं लभाम्यहमतन्द्रित:,नरेश्वरर उस समय आलस्यशून्य होकर सुदीर्घकाल-तक तैरता हुआ मैं दूर जाकर बहुत थक गया। परंतु कहीं भी मुझे कोई आश्रय नहीं मिला
បន្ទាប់មក ឱ ព្រះមហាក្សត្រ ខ្ញុំបានហែលទឹកទៅមុខយូរណាស់ ដោយមិនបន្ធូរចិត្តឡើយ; ខ្ញុំបាននឿយហត់ដល់កម្រិតខ្លាំងបំផុត ប៉ុន្តែក៏មិនឃើញទីជ្រកកោន ឬទីពឹងពាក់នៅកន្លែងណាមួយសោះ។
Verse 90
ततः कदाचित् पश्यामि तस्मिन् सलिलसंचये । न्यग्रोधं सुमहान्तं वै विशालं पृथिवीपते,राजन्! तदनन्तर एक दिन एकार्णवकी उस अगाध जलराशिमें मैंने एक बहुत विशाल बरगदका वृक्ष देखा
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «បន្ទាប់មក នៅពេលមួយ ខ្ញុំបានសម្លឹងទៅក្នុងមហាសមុទ្រនៃទឹកដ៏ធំទូលាយនោះ ហើយបានឃើញនៅទីនោះដើមន្យាក្រដ (ដើមប៉ាន្យាន) មួយដើមធំមហិមា ទូលាយសន្ធឹង—ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃផែនដី ឱ ព្រះរាជា!»
Verse 91
शाखायां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णायां नराधिप । पर्यड्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते,नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे। महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख कमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था। उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ព្រះរាជា លើសាខាដ៏ទូលាយ និងសន្ធឹងនៃដើមឈើនោះ មានគ្រែសម្រាកមួយ—ឱ អ្នកអភិរក្សផែនដី—ដែលបានបំពាក់ដោយពូកព្រំដ៏ទេវីយៈ។»
Verse 92
उपविष्टं महाराज पद्मेन्दुसद्शाननम् | फुल्लपद्मविशालाक्षं बालं पश्यामि भारत,नराधिप! उस वृक्षकी चौड़ी शाखापर एक पलंग था, जिसके ऊपर दिव्य बिछौने बिछे हुए थे। महाराज! उस पलंगपर एक सुन्दर बालक बैठा दिखायी दिया, जिसका मुख कमलके समान कमनीय शोभा धारण करनेवाला तथा चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था। उसके नेत्र प्रफुल्ल पद्मदलके समान विशाल थे
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ព្រះមហារាជា ឱ ភារតៈ ខ្ញុំបានឃើញកុមារម្នាក់អង្គុយនៅទីនោះ មានមុខស្រស់ស្អាតដូចផ្កាឈូក និងព្រះចន្ទ; ភ្នែកធំទូលាយដូចស្លឹកផ្កាឈូកដែលកំពុងរីកពេញលេញ។»
Verse 93
ततो मे पृथिवीपाल विस्मय: सुमहानभूत् | कथं त्वयं शिशु: शेते लोके नाशमुपागते,पृथ्वीनाथ! उसे देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मैं सोचने लगा--'सारे संसारके नष्ट हो जानेपर भी यह बालक यहाँ कैसे सो रहा है?”
បន្ទាប់មក ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃផែនដី ការភ្ញាក់ផ្អើលដ៏មហិមាបានកើតឡើងក្នុងខ្ញុំ។ ខ្ញុំគិតថា៖ «ហេតុអ្វីបានជាកុមារនេះដេកលក់នៅទីនេះ—ឱ ព្រះនាយកផែនដី—ទោះបីលោកលោកបានឈានដល់ការវិនាសក៏ដោយ?»
Verse 94
तपसा चिन्तयंश्वापि तं शिशुं नोपलक्षये । भूतं भव्यं भविष्यं च जानन्नपि नराधिप,नरेश्वर! मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंका ज्ञाता होनेपर भी तपस्यासे भलीभाँति चिन्तन करता (ध्यान लगाता) रहा, तो भी उस शिशुके विषयमें कुछ न जान सका
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះវាចា៖ «ទោះបីខ្ញុំបានប្រតិបត្តិតបស្យា និងផ្តោតចិត្តពិចារណាដោយជ្រាលជ្រៅ ក៏ខ្ញុំមិនអាចដឹងអ្វីអំពីកុមារនោះបានឡើយ។ ឱ ព្រះរាជា ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃមនុស្ស—ទោះបីខ្ញុំជាអ្នកដឹងអតីត បច្ចុប្បន្ន និងអនាគត ក៏នៅតែមិនអាចឈានដល់ចំណេះដឹងអំពីគាត់បាន។»
Verse 95
अतसीपुष्पवर्णा भ: श्रीवत्सकृतभूषण: । साक्षाल्लक्ष्म्या इवावास: स तदा प्रतिभाति मे,उसकी अंगकान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। उसका वक्ष:स्थल श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित था। वह उस समय मुझे साक्षात् लक्ष्मीका निवासस्थान-सा प्रतीत होता था
វៃសម្បាយណៈបាននិយាយថា៖ «ពន្លឺកាយរបស់ទ្រង់មានពណ៌ខៀវងងឹត ដូចពណ៌ផ្កាអតសី (ផ្កាហ្វ្លាក់)។ ទ្រូងរបស់ទ្រង់ត្រូវបានតុបតែងដោយសញ្ញា “ស្រីវត្ស”។ នៅពេលនោះ ទ្រង់ហាក់ដូចជាទីស្ថានពិតប្រាកដនៃព្រះនាងលក្ខ្មីផ្ទាល់»។
Verse 96
ततो मामब्रवीद् बाल: स पद्मनिभलोचन: । श्रीवत्सधारी द्युतिमान् वाक््यं श्रुतिसुखावहम्
បន្ទាប់មក កុមារនោះមានព្រះនេត្រដូចផ្កាឈូក មានពន្លឺរុងរឿង និងពាក់សញ្ញា “ស្រីវត្ស” បានមានព្រះបន្ទូលមកកាន់ខ្ញុំ ដោយពាក្យពេចន៍ផ្អែមល្ហែម ស្រួលស្តាប់។
Verse 97
जानामि त्वां परिश्रान्तं ततो विश्रामकाड्क्षिणम् । मार्कण्डेय इहास्स्व त्वं यावदिच्छसि भार्गव
វៃសម្បាយណៈបាននិយាយថា៖ «ខ្ញុំដឹងថា អ្នកនឿយហត់ ហើយប្រាថ្នាចង់សម្រាក។ ឱ មារកណ្ឌេយៈ សូមស្នាក់នៅទីនេះ តាមដែលអ្នកចង់បាន ឱ ភារគវៈ»។
Verse 98
मुझे विस्मयमें पड़ा देख कमलके समान नेत्रवाले उस श्रीवत्सधारी कान्तिमान् बालकने मुझसे इस प्रकार श्रवणसुखद वचन कहा--'भृगुवंशी मार्कण्डेय! मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम बहुत थक गये हो और विश्राम चाहते हो। तुम्हारी जबतक इच्छा हो यहाँ बैठो ।। अभ्यन्तरं शरीरे मे प्रविश्य मुनिसत्तम । आस्स्व भो विहितो वास: प्रसादस्ते कृतो मया,“'मुनिश्रेष्ठ! मैंने तुमपर कृपा की है। तुम मेरे शरीरके भीतर प्रवेश करके विश्राम करो। वहाँ तुम्हारे रहनेके लिये व्यवस्था की गयी है”
វៃសម្បាយណៈបាននិយាយថា៖ ខណៈដែលខ្ញុំធ្លាក់ក្នុងភាពអស្ចារ្យ កុមារនោះ—មានព្រះនេត្រដូចផ្កាឈូក ពន្លឺរុងរឿង និងពាក់សញ្ញា “ស្រីវត្ស”—បាននិយាយមកកាន់ខ្ញុំដោយពាក្យពេចន៍ស្រួលស្តាប់ថា៖ «ឱ មារកណ្ឌេយៈ នៃវង្សភ្រឹគុ ខ្ញុំស្គាល់អ្នក។ អ្នកនឿយហត់ខ្លាំង ហើយចង់សម្រាក។ អង្គុយនៅទីនេះតាមដែលអ្នកចង់។ ចូលទៅក្នុងកាយរបស់ខ្ញុំ ឱ មុនីដ៏ប្រសើរ ហើយសម្រាកនៅទីនោះ។ កន្លែងស្នាក់នៅត្រូវបានរៀបចំស្រេចហើយ; ខ្ញុំបានប្រទានព្រះគុណដល់អ្នក»។
Verse 99
ततो बालेन तेनैवमुक्तस्थासीत् तदा मम । निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत,उस बालकके ऐसा कहनेपर उस समय मुझे अपने दीर्घ-जीवन और मानव-शरीरपर बड़ा खेद और वैराग्य हुआ
វៃសម្បាយណៈបាននិយាយថា៖ «ពេលកុមារនោះនិយាយមកខ្ញុំដូច្នេះ នៅខណៈនោះ ខ្ញុំមានចិត្តវៀរចាកយ៉ាងជ្រាលជ្រៅ—នឿយណាស់ចំពោះជីវិតដ៏វែង និងសូម្បីតែចំពោះសភាពជាមនុស្សផ្ទាល់ ឱ ភារតៈ»។
Verse 100
ततो बालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम् । तस्याहमवशो वकत्रे दैवयोगात् प्रवेशित:,तदनन्तर उस बालकने सहसा अपना मुख खोला और मैं दैवयोगसे परवशकी भाँति उसमें प्रवेश कर गया
បន្ទាប់មក កុមារនោះបានបើកមាត់ធំៗភ្លាមៗ។ ដោយការប្រែប្រួលនៃវាសនា ខ្ញុំ—គ្មានអំណាចដូចជាត្រូវបង្ខំ—ត្រូវបានទាញឲ្យចូលទៅក្នុងមាត់របស់គេ។
Verse 101
ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप । सराष्ट्रनगराकीर्णा कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम्,राजन! उसमें प्रवेश करते ही मैं सहसा उस बालकके उदरमें जा पहुँचा। वहाँ मुझे समस्त राष्ट्रों और नगरोंसे भरी हुई यह सारी पृथ्वी दिखायी दी
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃមនុស្ស! ពេលខ្ញុំចូលទៅភ្លាម ខ្ញុំក៏ស្ថិតនៅក្នុងពោះកុមារនោះដោយរហ័ស។ នៅទីនោះ ខ្ញុំបានឃើញផែនដីទាំងមូល—ពេញលេញគ្រប់ផ្នែក—ពោរពេញដោយនគរ និងអាណាចក្រ»។
Verse 102
गड्डां शतद्रं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम् । चर्मण्वतीं वेत्रवर्ती चन्द्रभागां सरस्वतीम्,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ខណៈខ្ញុំដើរល្បាតនៅក្នុងពោះកុមារមហាត្មានោះ ខ្ញុំបានឃើញទន្លេបរិសុទ្ធជាច្រើន—គង្គា, សតទ្រុ, សីតា, យមុនា, កៅសិកី, ចរម្វតី, វេត្រវតី, ចន្ទ្រភាគា និង សរស្វតី។
Verse 103
सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि । वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ភារត! ខ្ញុំបានឃើញទន្លេសិន្ធុ និង វិបាសា ហើយក៏ទន្លេគោទាវរីផងដែរ; ដូចគ្នានេះ ខ្ញុំបានឃើញ វស្វោកសារា, នលិនី និង នರ್ಮទា»។
Verse 104
नदीं ताम्रां च वेणां च पुण्यतोयां शुभावहाम् । सुवेणां कृष्णवेणां च इरामां च महानदीम्,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «នៅទីនោះ ខ្ញុំបានឃើញទន្លេតាម្រា និង វេណា ហើយទន្លេបរិសុទ្ធ ពុណ្យតោយា ដែលនាំមកនូវសុភមង្គល; ក៏បានឃើញ សុវេណា និង ក្រឹષ્ણវេណា ហើយអ៊ីរាមា ទន្លេធំ»។
Verse 105
वितस्तां च महाराज कावेरीं च महानदीम् । शोणं च पुरुषव्याप्र विशल्यां किम्पुनामपि,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ ឱ វីរបុរសដូចខ្លា ក្នុងចំណោមមនុស្ស ខ្ញុំក៏បានឃើញទន្លេ វិតស្តា និងទន្លេ កាវេរី ដែលអស្ចារ្យក្នុងចំណោមទន្លេទាំងឡាយ ព្រមទាំងទន្លេ សោណៈ វិសល្យា ហើយសូម្បីតែ គិម្បុនា ផងដែរ»។
Verse 106
एताश्षान्याश्व नद्यो5हं पृथिव्यां या नरोत्तम । परिक्रामन् प्रपश्यामि तस्य कुक्षौ महात्मन:,नरश्रेष्ठ फिर तो मैं उस महात्मा बालकके उदरमें घूमने लगा। घूमते हुए मैंने वहाँ गंगा, सतलज, सीता, यमुना, कोसी, चम्बल, वेत्रवती, चिनाव, सरस्वती, सिन्धु, व्यास, गोदावरी, वस्वोकसारा, नलिनी, नर्मदा, ताम्रपर्णी, वेणा, शुभदायिनी पुण्यतोया, सुवेणा, कृष्णवेणा, महानदी इरामा, वितस्ता (झेलम), महानदी कावेरी, शोणभद्र, विशल्या तथा किम्पुना--इन सबको तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य नदियाँ हैं, उनको भी देखा
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ បុរសប្រសើរបំផុត ខណៈដែលខ្ញុំដើរវិលវល់ ខ្ញុំបានឃើញនៅក្នុងពោះរបស់អង្គមានព្រលឹងធំអស្ចារ្យនោះ ទន្លេទាំងនេះទាំងអស់—ហើយក៏បានឃើញទន្លេផ្សេងៗទៀតទាំងឡាយ ដែលហូរលើផែនដីនេះផងដែរ»។
Verse 107
ततः समुद्र पश्यामि यादोगणनिषेवितम् । रत्नाकरममित्रघ्न पयसो निधिमुत्तमम्,शत्रुसूदन! इसके बाद जलजन्तुओंसे भरे हुए अगाध जलके भण्डार परम उत्तम रत्नाकर समुद्रको भी देखा
បន្ទាប់មក ខ្ញុំបានឃើញសមុទ្រ—ដែលសត្វទឹកជាច្រើនក្រុមមកស្នាក់នៅ—ជាឃ្លាំងទឹកដ៏អស្ចារ្យ និងជ្រៅមិនអាចវាស់បាន ជារតនាគារ។ ឱ អ្នកសម្លាប់សត្រូវ អ្នកបង្ក្រាបសត្រូវ ដូច្នេះហើយ ខ្ញុំបានឃើញសមុទ្រដ៏លើសលប់នោះ។
Verse 108
तत्र पश्यामि गगन चन्द्रसूर्यविराजितम् । जाज्वल्यमानं तेजोभि: पावकार्कसमप्रभम्,वहाँ मुझे चन्द्रमा और सूर्यसे सुशोभित आकाशमण्डल दिखायी दिया, जो अनन्त तेजसे प्रज्वलित तथा अग्नि एवं सूर्यके समान देदीप्यमान था
នៅទីនោះ ខ្ញុំបានឃើញមណ្ឌលមេឃ ដែលតុបតែងដោយព្រះច័ន្ទ និងព្រះអាទិត្យ—ភ្លឺចែងចាំងដោយពន្លឺអសীম ដ៏រលោងដូចភ្លើង និងព្រះអាទិត្យ។
Verse 109
पश्यामि च महीं राजन् काननैरुपशोभिताम् । (सपर्वतवनद्वीपां निमग्नाशतसड्कुलाम् ।) यजन्ते हि तदा राजन् ब्राह्मणा बहुभिर्मखै:,राजन! वहाँकी भूमि विविध काननोंसे सुशोभित, पर्वत, वन और द्वीपोंसे उपलक्षित तथा सैकड़ों सरिताओंसे संयुक्त दिखायी देती थी। ब्राह्मणलोग नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना करते थे
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ ខ្ញុំបានឃើញដែនដីនោះ តុបតែងដោយព្រៃជាច្រើន—មានភ្នំ ព្រៃឈើ និងកោះជាសញ្ញា ហើយពោរពេញដោយទន្លេ និងស្ទឹងរាប់រយ។ នៅសម័យនោះ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ ព្រះព្រាហ្មណ៍ទាំងឡាយបានធ្វើយញ្ញជាច្រើន ដើម្បីបូជាព្រះអម្ចាស់ ដែលជាបុរសនៃយញ្ញ (យជ្ញបុរុស)»។
Verse 110
क्षत्रियाश्ष प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरंजनै: । वैश्या: कृषिं यथान्यायं कारयन्ति नराधिप,नरेश्वर! क्षत्रिय राजा सब वर्णोकी प्रजाका अनुरंजन करते--सबको सुखी और प्रसन्न रखते थे। वैश्य न्यायपूर्वक खेतीका काम और व्यापार करते थे
វៃសម្បាយណៈ បាននិយាយថា៖ «ពួកក្សត្រិយៈ ប្រតិបត្តិភារកិច្ចរបស់ខ្លួន ដោយបង្កើតការពេញចិត្ត និងទទួលបានមេត្តាចិត្តពីវណ្ណៈទាំងអស់—ធ្វើឲ្យមនុស្សទាំងអស់សុខសាន្ត និងរីករាយ។ ចំណែកពួកវៃស្យៈ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ ក៏ធ្វើឲ្យការកសិកម្ម និងការជួញដូរ ប្រព្រឹត្តទៅតាមយុត្តិធម៌ និងច្បាប់ល្អត្រឹមត្រូវ»។
Verse 111
शुश्रूषायां च निरता द्विजानां वृषलास्तदा । ततः परिपतन् राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मन:,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
វៃសម្បាយណៈ បាននិយាយថា៖ «នៅសម័យនោះ ពួកសូទ្រៈ ប្តេជ្ញាចិត្តក្នុងការបម្រើ និងថែទាំពួកទ្វិជៈ (អ្នកកើតពីរដង)។ បន្ទាប់មក ឱ ព្រះមហាក្សត្រ ខណៈដែលខ្ញុំដើរទៅមកក្នុងពោះរបស់មហាបុរសមានព្រលឹងធំអង្គនោះ ខ្ញុំបានឃើញភ្នំជាច្រើន—ហិមវាន, ហេមកូត, និសធ, ស្វេតគិរីពណ៌សភ្លឺដូចប្រាក់, គន្ធមាទន, មន្ទរាចល, ភ្នំនីលដ៏ធំ, មេរុមាស, មហេន្ទ្រ, វិន្ធ្យដ៏ខ្ពស់, មលយ និងបារីយាត្រ—ជាមួយភ្នំផ្សេងៗទៀតជាច្រើន ទាំងអស់តុបតែងដោយរតនៈនានា។ ខណៈដែលខ្ញុំវង្វេងដើរនៅទីនោះ ខ្ញុំក៏បានឃើញសត្វដូចជា សិង្ហ, ខ្លា និងជ្រូកព្រៃផងដែរ»។
Verse 112
हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम् । निषध॑ चापि पश्यामि श्वेतं च रजतान्वितम्,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
វៃសម្បាយណៈ បាននិយាយថា៖ «ខ្ញុំឃើញហិមវាន ហើយឃើញភ្នំហេមកូតផងដែរ; ខ្ញុំក៏ឃើញនិសធ ហើយឃើញស្វេតៈ ដែលភ្លឺរលោងជាមួយពន្លឺប្រាក់»។
Verse 113
पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम् । मन्दरं मनुजव्याप्र नीलं चापि महागिरिम्,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
វៃសម្បាយណៈ បាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះអធិរាជ អ្នកគ្រប់គ្រងផែនដី ខ្ញុំឃើញភ្នំគន្ធមាទន; ហើយឱ ‘ខ្លានៃមនុស្ស’ ខ្ញុំក៏ឃើញមន្ទរ និងភ្នំនីលដ៏ធំផងដែរ»។
Verse 114
पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम् | महेन्द्र चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम्,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
វៃសម្បាយណៈ បាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រដ៏អធិការ ខ្ញុំឃើញមេរុ—ភ្នំមាស; ខ្ញុំក៏ឃើញមហេន្ទ្រ និងវិន្ធ្យ—ភ្នំដ៏ល្អឥតខ្ចោះបំផុត»។
Verse 115
मलयं चापि पश्यामि पारियात्र च पर्वतम् | एते चान्ये च बहवो यावन्त: पृथिवीधरा:,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ខ្ញុំក៏បានឃើញជួរភ្នំមលយ និងភ្នំបារិយាត្រ ហើយក៏បានឃើញភ្នំជាច្រើនទៀត—ច្រើនដល់ថ្នាក់ជាអ្នកទ្រទ្រង់ផែនដី។ ខណៈដែលខ្ញុំដើរវិលវល់នៅក្នុងពោះនៃកុមារមហាត្មានោះ ភ្នំធំៗទាំងឡាយបានបង្ហាញខ្លួនដល់ខ្ញុំ សុទ្ធតែតុបតែងដោយរតនៈនានា—បង្ហាញថាពិភពលោកទាំងមូល និងភូមិសាស្ត្រពិសិដ្ឋរបស់វា អាចស្ថិតនៅក្នុងរាងកាយអស្ចារ្យតែមួយ ហើយទស្សនៈរបស់អ្នកឃើញពង្រីកឡើងដោយការអត់ធ្មត់ និងការសង្កេតយ៉ាងប្រុងប្រយ័ត្ន»។
Verse 116
तस्योदरे मया दृष्टा: सर्वे रत्नविभूषिता: । सिंहान् व्याप्रान् वराहांश्न॒ पश्यामि मनुजाधिप,शूद्र तीनों द्विजातियोंकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहते थे। राजन! यह सब देखते हुए जब मैं उस महात्मा बालकके उदरमें भ्रमण करता आगे बढ़ा, तब हिमवान्, हेमकूट, निषध, रजतयुक्त श्वेतगिरि, गन्धमादन, मन्दराचल, महागिरि नील, सुवर्णमय पर्वत मेरु, महेन्द्र, उत्तम विन्ध्यगिरि, मलय तथा पारियात्र पर्वत देखे। ये तथा और भी बहुत-से पर्वत मुझे उस बालकके उदरमें दिखायी दिये। वे सब-के-सब नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। राजन! वहाँ घूमते हुए मैंने सिंह, व्याप्र और वाराह आदि पशु भी देखे
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «នៅក្នុងពោះកុមារនោះ ខ្ញុំបានឃើញអ្វីៗទាំងអស់តុបតែងដោយរតនៈ។ ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃមនុស្ស! ខណៈដែលខ្ញុំដើរវិលវល់នៅទីនោះ ខ្ញុំបានឃើញសត្វសិង្ហ សត្វខ្លា និងសត្វជ្រូកព្រៃផងដែរ»។
Verse 117
पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते । तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन् पर्यचरं तदा,पृथ्वीपते! भूमण्डलमें जितने प्राणी हैं, उन सबको देखते हुए मैं उस समय उस बालकके उदरमें विचरता रहा
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃលោក ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃផែនដី—ខណៈដែលខ្ញុំនៅទីនោះ ខ្ញុំបានឃើញសត្វមានជីវិតទាំងអស់ដែលមាននៅលើផែនដី; ហើយដោយឃើញពួកវាទាំងអស់ ខ្ញុំបានដើរវិលវល់នៅពេលនោះក្នុងពោះក្មេងប្រុសនោះ»។
Verse 118
कुक्षौ तस्य नरव्याघ्र प्रविष्ट: संचरन् दिश: । शक्रादींश्वापि पश्यामि कृत्स्नान् देवगणानहम्,नरश्रेष्ठ उस शिशुके उदरमें प्रविष्ट हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते हुए इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंके भी दर्शन हुए
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ វីរបុរសដូចខ្លា! ក្រោយចូលទៅក្នុងពោះកុមារនោះ ខ្ញុំបានដើរវិលវល់ទៅគ្រប់ទិសទាំងអស់។ នៅទីនោះ ខ្ញុំបានឃើញសូម្បីតែឥន្ទ្រ និងអ្នកដទៃទៀត—ពិតប្រាកដថា ក្រុមទេវតាទាំងមូល»។
Verse 119
साध्यान् रुद्रांस्तथा5<दित्यान् गुह्मकान् पितरस्तदा । सर्पान् नागान् सुपर्णाश्च वसूनप्यश्चिनावपि,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃផែនដី! ខ្ញុំបានឃើញសាធ្យៈ រុទ្រៈ និងអាទិត្យៈ; គុហ្យកៈ និងបិត្រិ; ពស់ និងនាគ; សុបរណៈ (អ្នកមានស្លាបធំៗ); វសុ និងសូម្បីតែអស្វិនទ្វ័យ។ ខ្ញុំក៏បានឃើញគន្ធព្វៈ អប្សរៈ យក្សៈ និងឫសិ។ ខ្ញុំបានឃើញក្រុមដៃត្យៈ និងដានវៈ កូនប្រុសសിംហិកា ដូចជា រាហ៊ុ និងសត្រូវទេវតាផ្សេងៗទៀត។ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! អ្វីៗទាំងអស់—ទាំងចល និងអចល—ដែលខ្ញុំធ្លាប់ឃើញក្នុងលោកនេះ សុទ្ធតែបង្ហាញខ្លួនដល់ខ្ញុំក្នុងពោះនៃមហាត្មានោះ។ ហើយឱ ព្រះមហាក្សត្រដ៏អធិក! ខ្ញុំរស់រាល់ថ្ងៃដោយផ្លែឈើ ហើយបន្តដើរវិលវល់ក្នុងលោកទាំងមូលនេះ»។
Verse 120
गन्धर्वाप्सरसो यक्षानषींश्वैव महीपते । देत्यदानवसड्घांश्व नागांश्न मनुजाधिप,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता
វៃសម្បាយណៈ បានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! ខ្ញុំបានឃើញពួកគន្ធರ್ವ និងអប្សរា ពួកយក្ខ និងឥសី; ក្រុមដៃត្យ និងដានវ; ហើយពួកនាគផងដែរ ឱ ព្រះអធិរាជនៃមនុស្ស។ ឱ ព្រះអធិរាជនៃផែនដី! ខ្ញុំក៏បានឃើញសាធ្យ រុទ្រ អាទិត្យ គុហ្យក ពិត្រ; ពស់ និងនាគ សុប័ណ៌ វសុ និងអស្វិនីទ្វ័យ; គន្ធರ್ವ អប្សរា យក្ខ និងអ្នកដទៃជាច្រើន។ ខ្ញុំបានឃើញសមាគមនៃដៃត្យ និងដានវ ពួកនាគ និងកូនប្រុសរបស់សിംហិកា (ដូចជា រាហុ) និងសត្រូវនៃទេវតាផ្សេងៗ។ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! អ្វីៗទាំងអស់—ទាំងអចល និងចល—ដែលខ្ញុំធ្លាប់ឃើញក្នុងលោកនេះ សុទ្ធតែបង្ហាញខ្លួនដល់ខ្ញុំក្នុងពោះនៃមហាត្មានោះ។ ហើយ ឱ ព្រះមហាក្សត្រដ៏អស្ចារ្យ! ខ្ញុំរស់ដោយបរិភោគផ្លែឈើរៀងរាល់ថ្ងៃ ហើយដើរវង្វេងទៅទូទាំងលោកនេះ»។
Verse 121
सिंहिकातनयांश्वापि ये चान्ये सुरशत्रव: । यच्च किंचिन्मया लोके दृष्टं स्थावरजड्रमम्,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता
វៃសម្បាយណៈ បានមានព្រះវាចា៖ «ខ្ញុំក៏បានឃើញកូនប្រុសរបស់សിംហិកា និងសត្រូវនៃទេវតាផ្សេងៗ។ ហើយអ្វីៗទាំងអស់ដែលខ្ញុំធ្លាប់ឃើញក្នុងលោកនេះ—ទាំងអចល និងចល—ឱ ព្រះអធិរាជនៃផែនដី! សុទ្ធតែបង្ហាញខ្លួនដល់ខ្ញុំក្នុងពោះនៃមហាត្មានោះ។ ខ្ញុំបានឃើញសាធ្យ រុទ្រ អាទិត្យ គុហ្យក ពិត្រ; ពស់ និងនាគ សុប័ណ៌ វសុ អស្វិនទ្វ័យ; គន្ធರ್ವ អប្សរា យក្ខ និងឥសី។ ខ្ញុំបានឃើញក្រុមដៃត្យ និងដានវ ពួកនាគ កូនប្រុសរបស់សിംហិកា (រាហុ និងអ្នកដទៃ) និងសត្រូវនៃទេវតាផ្សេងៗ។ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! អ្វីៗទាំងអស់ដែលខ្ញុំបានយល់ឃើញថាជាវិសាលភាពនៃសត្តិភាព សុទ្ធតែបង្ហាញដល់ខ្ញុំថាប្រមូលផ្តុំស្ថិតនៅក្នុងព្រះអង្គនោះ។ ហើយ ឱ ព្រះមហាក្សត្រដ៏អស្ចារ្យ! ខ្ញុំរស់រៀងរាល់ថ្ងៃដោយផ្លែឈើ ហើយបន្តដើរវង្វេងទៅទូទាំងលោកនេះ»។
Verse 122
सर्व पश्याम्यहं राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मन: । चरमाण: फलाहार: कृत्स्नं जगदिदं विभो,पृथ्वीपते! साध्य, रुद्र, आदित्य, गुह्यक, पितर, सर्प, नाग, सुपर्ण, वसु, अश्विनीकुमार, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष तथा ऋषियोंका भी मैंने दर्शन किया। दैत्य-दानवसमूह, नाग, सिंहिकाके पुत्र (राहु आदि) तथा अन्य देवशत्रुओंको भी देखा। राजन्! इस लोकमें मैंने जो कुछ भी स्थावर-जंगम पदार्थ देखे थे, वे सब मुझे उस महात्माकी कुक्षिमें दृष्टिगोचर हुए। महाराज! मैं प्रतिदिन फलाहार करता और इस सम्पूर्ण जगतमें घूमता रहता
វៃសម្បាយណៈ បានមានព្រះវាចា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! ខ្ញុំឃើញអ្វីៗទាំងអស់នៅក្នុងពោះនៃមហាត្មានោះ។ ខ្ញុំរស់ដោយផ្លែឈើ ហើយដើរវង្វេងទៅមក ឱ ព្រះអធិរាជដ៏មានអានុភាព ឱ ព្រះអធិរាជនៃផែនដី! ខ្ញុំបានឃើញលោកទាំងមូលនៅទីនោះ»។
Verse 123
अन्तःशरीरे तस्याहं वर्षाणामधिकं शतम् । न च पश्यामि तस्याहं देहस्यान्तं कदाचन,उस बालकके शरीरके भीतर मैं सौ वर्षमे अधिक कालतक घूमता रहा, तो भी कभी उसके शरीरका अन्त नहीं दिखायी दिया
វៃសម្បាយណៈ បានមានព្រះវាចា៖ «នៅក្នុងរាងកាយរបស់កុមារនោះ ខ្ញុំបានដើរវង្វេងលើសពីមួយរយឆ្នាំ; ប៉ុន្តែមិនមានពេលណាមួយដែលខ្ញុំបានឃើញចុងបញ្ចប់ ឬព្រំដែននៃរាងកាយរបស់គាត់ឡើយ»។
Verse 124
सततं धावमानश्ष् चिन्तयानो विशाम्पते । (भ्रमंस्तत्र महीपाल यदा वर्षगणान् बहून् ।) आसादयामि नैवान्तं तस्य राजन् महात्मन:,युधिष्ठिर! मैं निरन्तर दौड़ लगाता और चिन्तामें पड़ा रहता था। महाराज! जब बहुत वर्षोतक भ्रमण करनेपर भी उस महात्माके शरीरका अन्त नहीं मिला, तब मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन वरदायक एवं वरेण्य देवताकी ही विधिपूर्वक शरण ली
វៃសម្បាយណៈ បានមានព្រះវាចា៖ «ខ្ញុំរត់ទៅមកជានិច្ច ហើយត្រូវក្តីព្រួយបារម្ភគ្របដណ្តប់ ឱ ព្រះអធិរាជនៃប្រជាជន។ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! ខ្ញុំបានវង្វេងនៅទីនោះអស់ជាច្រើនឆ្នាំ ប៉ុន្តែមិនអាចរកឃើញចុងបញ្ចប់នៃមហាត្មានោះឡើយ។ ដូច្នេះ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! ខ្ញុំបានសុំជ្រកកោន—ដោយគោរពតាមវិធី—ចំពោះទេវតាដ៏គួរគោរព និងប្រទានពរ នោះ ដោយចិត្ត ពាក្យ និងកាយ»។
Verse 125
ततस्तमेव शरणं गतो<5स्मि विधिवत् तदा । वरेण्यं वरदं देव॑ं मनसा कर्मणैव च,युधिष्ठिर! मैं निरन्तर दौड़ लगाता और चिन्तामें पड़ा रहता था। महाराज! जब बहुत वर्षोतक भ्रमण करनेपर भी उस महात्माके शरीरका अन्त नहीं मिला, तब मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन वरदायक एवं वरेण्य देवताकी ही विधिपूर्वक शरण ली
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «បន្ទាប់មក នៅពេលនោះ ខ្ញុំបានចូលសុំជ្រកកោនតាមពិធីបែបបទ ចំពោះទេវតានោះដដែល—ជាទេវតាដែលគួរជ្រើសរើស និងជាអ្នកប្រទានពរ—ដោយចិត្ត និងដោយកិច្ចការផង។ យុធិឋ្ឋិរ! ខ្ញុំរត់រវល់មិនឈប់ឈរ ហើយមានក្តីព្រួយបារម្ភជានិច្ច; ហើយពេលដែល ទោះបីខ្ញុំវង្វេងដើររយៈពេលជាច្រើនឆ្នាំក៏ដោយ ក៏មិនអាចរកឃើញទីបញ្ចប់នៃរាងកាយរបស់មហាត្មានោះបានទេ នោះខ្ញុំបានសុំជ្រកកោនតាមរបៀបត្រឹមត្រូវ ចំពោះព្រះដ៏គួរគោរព និងប្រទានពរនោះ។»
Verse 126
ततो<5हं सहसा राजन् वायुवेगेन नि:सृतः । महात्मनो मुखात् तस्य विवृतात् पुरुषोत्तम,पुरुषरत्न युधिष्ठिर! उनकी शरण लेते ही मैं वायुके समान वेगसे उक्त महात्मा बालकके खुले हुए मुखकी राहसे सहसा बाहर निकल आया
បន្ទាប់មក ឱ ព្រះមហាក្សត្រ ខ្ញុំត្រូវបានបញ្ចេញចេញភ្លាមៗ ដោយល្បឿនដូចខ្យល់ ដោយចេញតាមមាត់ដែលបើកចំហររបស់មហាត្មានោះ។ ឱ អ្នកល្អបំផុតក្នុងមនុស្ស—ឱ គ្រឿងអលង្ការនៃមនុស្ស យុធិឋ្ឋិរ—ពេលខ្ញុំបានសុំជ្រកកោនក្នុងព្រះអង្គនោះ ខ្ញុំក៏បានលេចចេញយ៉ាងរហ័សដូច្នេះ។
Verse 127
ततस्तस्यैव शाखायां न्यग्रोधस्य विशाम्पते । आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय वै जगत्,नरश्रेष्ठ राजन! बाहर आकर देखा तो उसी बरगदकी शाखापर उसी बाल-वेषसे सम्पूर्ण जगत्को अपने उदरमें लेकर श्रीवत्सचिह्लसे सुशोभित वह अमिततेजस्वी बालक पूर्ववत् बैठा हुआ है
បន្ទាប់មក ឱ ម្ចាស់ប្រជាជន—ឱ ខ្លាឃ្មុំក្នុងមនុស្ស—ខ្ញុំបានឃើញថា លើសាខានៃដើមន្យាគ្រន្ធ (ដើមប៉េងប៉ោះ/ដើមប៉េងប៉ោះធំ) នោះដដែល កុមារនោះនៅក្នុងរូបកាយកុមារដដែល អង្គុយដូចមុន ដោយដាក់ពិភពលោកទាំងមូលនៅក្នុងពោះរបស់គេ។
Verse 128
तेनैव बालवेषेण श्रीवत्सकृतलक्षणम् | आसीन तं॑ नरव्याप्र पश्याम्यमिततेजसम्,नरश्रेष्ठ राजन! बाहर आकर देखा तो उसी बरगदकी शाखापर उसी बाल-वेषसे सम्पूर्ण जगत्को अपने उदरमें लेकर श्रीवत्सचिह्लसे सुशोभित वह अमिततेजस्वी बालक पूर्ववत् बैठा हुआ है
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ខ្លាឃ្មុំក្នុងមនុស្ស ឱ អ្នកល្អបំផុតក្នុងមនុស្ស ឱ ព្រះមហាក្សត្រ—ពេលខ្ញុំចេញមក ខ្ញុំបានឃើញកុមារនោះដដែលម្ដងទៀត ក្នុងរូបកាយកុមារដដែល អង្គុយដូចមុនលើសាខានៃដើមប៉េងប៉ោះធំនោះ។ គេមានសញ្ញាស្រីវត្ស (Śrīvatsa) ដ៏មង្គល លេចធ្លោ ហើយភ្លឺរលោងដោយពន្លឺមិនអាចវាស់បាន; គេបង្ហាញដូចជាអ្នកដែលអាថ៌កំបាំងដាក់ពិភពលោកទាំងមូលនៅក្នុងខ្លួន—ធ្វើឲ្យដឹងថា ព្រះអាទិទេពអាចស្ថិតក្នុងរូបសាមញ្ញបំផុត ហើយការយល់ឃើញរបស់មនុស្សត្រូវបានបន្ថយមុខមាត់ចំពោះសច្ចៈកោសល្យនៃចក្រវាល។»
Verse 129
ततो मामब्रवीद् बाल: स प्रीत: प्रहसन्निव । श्रीवत्सधारी द्युतिमान् पीतवासा महाद्युति:,तब महातेजस्वी पीताम्बरधारी श्रीवत्सभूषित कान्तिमान् उस बालकने प्रसन्न होकर हँसते हुए-से मुझसे कहा--
បន្ទាប់មក កុមារនោះ—ពេញចិត្ត ហាក់ដូចជាញញឹម—បាននិយាយមកខ្ញុំ។ គេភ្លឺរលោង ពាក់ពណ៌លឿង (ពិតាម្បរ) ហើយតុបតែងដោយសញ្ញាស្រីវត្ស (Śrīvatsa) បញ្ចេញពន្លឺដ៏អស្ចារ្យ។
Verse 130
अपीदानीं शरीरेडस्मिन् मामके मुनिसत्तम | उषितस्त्व॑ सुविश्रान्तो मार्कण्डेय ब्रवीहि मे,“'मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय! क्या तुम मेरे इस शरीरमें रहकर विश्राम कर चुके? मुझे बताओ”
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ មុនិសត្តម មារកណ្ឌេយ! ឥឡូវនេះ អ្នកបានស្នាក់នៅក្នុងរាងកាយរបស់ខ្ញុំ ហើយបានសម្រាកពេញលេញហើយឬនៅ? សូមប្រាប់ខ្ញុំ»។
Verse 131
मुहूर्तादथ मे दृष्टि: प्रादुर्भूता पुनर्नवा । यया निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लब्धचेतसम्,फिर दो ही घड़ीमें मुझे एक नवीन दृष्टि प्राप्त हुई, जिससे मैं अपने-आपको मायासे मुक्त और सचेत अनुभव करने लगा
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ មិនយូរប៉ុន្មាន ការមើលឃើញដ៏ច្បាស់ថ្មីមួយបានកើតឡើងក្នុងខ្ញុំម្ដងទៀត។ ដោយវា ខ្ញុំបានឃើញខ្លួនឯងថាបានរួចផុតពីមាយា ហើយបានត្រឡប់មកស្មារតីពេញលេញ—ចិត្តបានស្ដារឡើងវិញ និងមាំមួន។
Verse 132
तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिषछ्ितौ । सुजातौ मृदुरक्ताभिरड्जुलीभिविराजितौ
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ កូនអើយ ជើងរបស់ទ្រង់—បាតជើងមានពណ៌ដូចទង់ដែង—បានដាក់យ៉ាងមាំមួន។ រូបរាងល្អ និងស្រស់ស្អាត វាបញ្ចេញពន្លឺដោយម្រាមជើងទន់ៗពណ៌ក្រហមស្រាល»។
Verse 133
दृष्टवा परिमितं तस्य प्रभावममितौजस:,उस अमित तेजस्वी शिशुका अनन्त प्रभाव देखकर मैं यत्नपूर्वक उसके समीप गया और विनीतभावसे हाथ जोड़कर सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा उस कमलनयन देवताका दर्शन किया
ដោយឃើញអានុភាពដែលទោះមានកម្រិតក៏អស្ចារ្យរបស់អង្គមានតេជៈឥតប្រមាណ ហើយបានឃើញកុមាររុងរឿងមានពន្លឺឥតទីបញ្ចប់នោះ ខ្ញុំបានចូលទៅជិតដោយប្រុងប្រយ័ត្ន។ ដោយចិត្តទាបទន់ ខ្ញុំបានប្រណម្យដៃ ហើយបានឃើញទេវតាភ្នែកដូចផ្កាឈូក—អាត្មានៃសត្វទាំងអស់—ហើយបានគោរពវត្តមានដ៏បរិសុទ្ធនោះដោយសេចក្តីស្មោះត្រង់។
Verse 134
विनयेनाञ्जलिं कृत्वा प्रयत्नेनोपगम्य ह । दृष्टो मया स भूतात्मा देवः कमललोचन:,उस अमित तेजस्वी शिशुका अनन्त प्रभाव देखकर मैं यत्नपूर्वक उसके समीप गया और विनीतभावसे हाथ जोड़कर सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा उस कमलनयन देवताका दर्शन किया
ដោយចិត្តទាបទន់ ខ្ញុំបានប្រណម្យដៃ ហើយដោយការខិតខំប្រុងប្រយ័ត្នបានចូលទៅជិតទ្រង់។ បន្ទាប់មក ខ្ញុំបានឃើញទេវតាភ្នែកដូចផ្កាឈូក—អាត្មានៃសត្វទាំងអស់—រុងរឿងដោយតេជៈឥតប្រមាណ។
Verse 135
तमहं प्राउ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमन्रुवम् । ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां मायां चैतां तवोत्तमाम्,फिर हाथ जोड़े नमस्कार करके मैंने उससे इस प्रकार कहा--देव! मैं आपको और आपकी इस उत्तम मायाको जानना चाहता हूँ
ដោយលើកដៃប្រណម្យជាការគោរព ខ្ញុំបានកោតបង្គំចំពោះព្រះអង្គ ហើយនិយាយដូច្នេះថា៖ «ឱ ព្រះដ៏ទេវៈ! ខ្ញុំប្រាថ្នាចង់ដឹងអំពីព្រះអង្គ និងអំពីមាយា (māyā) ដ៏អធិកអធមនេះ ដែលជាអំណាចរបស់ព្រះអង្គ»។
Verse 136
आस्थयेनानुप्रविष्टो5हं शरीरे भगवंस्तव । दृष्टवानखिलान् सर्वान् समस्तान् जठरे हि ते,'भगवन्! मैंने आपके मुखकी राहसे शरीरमें प्रवेश करके आपके उदरमें समस्त सांसारिक पदार्थोका अवलोकन किया है
វៃសម្បាយណៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់ដ៏ពរ! ខ្ញុំបានចូលទៅក្នុងព្រះកាយរបស់ព្រះអង្គ តាមផ្លូវមាត់ ហើយបានឃើញនៅក្នុងព្រះឧदरរបស់ព្រះអង្គ នូវលោកទាំងមូល—អ្វីៗទាំងអស់ ដោយពេញលេញ មិនខ្វះអ្វីឡើយ»។
Verse 137
तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसा: । यक्षगन्धर्वनागाश्न जगत् स्थावरजड्रमम्
វៃសម្បាយណៈបាននិយាយថា៖ «នៅក្នុងព្រះកាយដ៏ទេវៈរបស់ព្រះអង្គ មានទាំងទេវតា ទាំងដានវៈ និងរាក្សស; មានយក្ស គន្ធរវ និងនាគផងដែរ—ពិតប្រាកដណាស់ គឺលោកទាំងមូល ទាំងអចល និងអសកម្ម/អស្ចារ្យ»។
Verse 138
“देव! आपके शरीरमें देवता, दानव, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, नाग तथा समस्त स्थावर- जंगमरूप जगत् विद्यमान है ।। त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीयते । ट्रुतमन्त:शरीरे ते सततं परिवर्तिन:,'प्रभो! आपकी कृपासे आपके शरीरके भीतर निरन्तर शीघ्र गतिसे घूमते रहनेपर भी मेरी स्मरणशक्ति नष्ट नहीं हुई है
វៃសម្បាយណៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់! នៅក្នុងព្រះកាយរបស់ព្រះអង្គ មានទាំងទេវតា អសុរ/ដានវៈ យក្ស រាក្សស គន្ធរវ នាគ ហើយពិតប្រាកដណាស់ មានសកលលោកទាំងមូល ក្នុងទម្រង់ទាំងអស់—ទាំងចល និងអចល។ ហើយដោយព្រះគុណរបស់ព្រះអង្គ ឱ ព្រះដ៏ទេវៈ! ស្មារតីរបស់ខ្ញុំមិនបានរលាយបាត់ឡើយ៖ ទោះបីខ្ញុំត្រូវបាននាំឲ្យវិលវង់យ៉ាងលឿន និងជានិច្ចនៅក្នុងអន្តរភាពរបស់ព្រះអង្គក៏ដោយ ឱ ម្ចាស់! អំណាចនៃការចងចាំរបស់ខ្ញុំមិនបានបាត់បង់ទេ»។
Verse 139
निर्गतो5हमकामस्तु इच्छया ते महाप्रभो । इच्छामि पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाहमनिन्दितम्,“महाप्रभो! मैं अपनी अभिलाषा न रहनेपर भी केवल आपकी इच्छासे बाहर निकल आया हूँ। कमलनयन! आप सर्वोत्कृष्ट देवताको मैं जानना चाहता हूँ
វៃសម្បាយណៈបាននិយាយថា៖ «ឱ មហាប្រភូ! ទោះខ្ញុំមិនមានបំណងផ្ទាល់ខ្លួនក៏ដោយ ខ្ញុំបានចេញមកក្រៅ តែដោយព្រះបំណងរបស់ព្រះអង្គប៉ុណ្ណោះ។ ឱ ព្រះនេត្រដូចផ្កាឈូក! ខ្ញុំប្រាថ្នាចង់ដឹងព្រះអង្គ—ព្រះដ៏បរិសុទ្ធ មិនមានកំហុស ហើយលើសលប់ជាងទេវតាទាំងអស់»។
Verse 140
इह भूत्वा शिशु: साक्षात् कि भवानवतिष्ठते । पीत्वा जगदिदं सर्वमेतदाख्यातुमहसि,“आप इस सम्पूर्ण जगत्को पी करके यहाँ साक्षात् बालकवेषमें क्यों विराजमान हैं? यह सब बतानेकी कृपा करें
ព្រះអង្គបានបង្ហាញព្រះវត្តមាននៅទីនេះជាកុមារដោយផ្ទាល់—ហេតុអ្វីបានជាព្រះអង្គនៅស្ថិតក្នុងរូបនោះដូច្នេះ? បន្ទាប់ពីបានផឹកលេបសកលលោកទាំងមូលនេះហើយ សូមព្រះអង្គមេត្តាប្រាប់អធិប្បាយអំពីរឿងនេះផង។
Verse 141
किमर्थ च जगत् सर्व शरीरस्थं तवानघ । कियन्तं च त्वया कालमिह स्थेयमरिंदम,“अनघ! यह सारा संसार आपके शरीरमें किसलिये स्थित है? शत्रुदमन! आप कितने समयतक यहाँ इस रूपमें रहेंगे?
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ អ្នកគ្មានមន្ទិល! ហេតុអ្វីបានជាសកលលោកទាំងមូលនេះស្ថិតនៅក្នុងព្រះកាយរបស់ព្រះអង្គ? ហើយឱ អ្នកបង្ក្រាបសត្រូវ! ព្រះអង្គត្រូវស្ថិតនៅទីនេះក្នុងរូបដែលបានបង្ហាញនេះរហូតដល់ពេលណា?»
Verse 142
एतदिच्छामि देवेश श्रोतु ब्राह्मणकाम्यया । त्वत्त: कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम्,'देवेश्वर! कमलनयन! ब्राह्मणमें जो सहज जिज्ञासा होती है, उससे प्रेरित होकर मैं आपसे यह सब बातें यथाविधि विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃទេវតា! ឱ អ្នកមានព្រះនេត្រដូចស្លឹកផ្កាឈូក! ដោយសារចិត្តសួរដឹងដែលសមនឹងព្រាហ្មណ៍ ខ្ញុំប្រាថ្នាស្តាប់រឿងទាំងនេះពីព្រះអង្គ ដោយផ្ទាល់ និងដោយលម្អិត តាមពិតដូចដែលវាជា។»
Verse 143
महद्धयेतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान् प्रभो । इत्युक्त: स मया श्रीमान् देवदेवो महाद्युति: । सान्त्वयन् मामिदं वाक्यमुवाच वदतां वर:,'प्रभो! मैंने जो कुछ देखा है, यह अगाध और अचिन्त्य है।” मेरे इस प्रकार पूछनेपर वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी देवाधिदेव श्रीभगवान् मुझे सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले
«ឱ ព្រះអម្ចាស់! អ្វីដែលខ្ញុំបានឃើញ គឺធំធេង និងលើសពីការគិតគូរ។» ពេលខ្ញុំនិយាយដូច្នេះ ព្រះដ៏រុងរឿង ជាទេវាធិទេវ មានពន្លឺតេជៈដ៏មហិមា ជាអ្នកនិយាយល្អឥតខ្ចោះ បានលួងលោមខ្ញុំ ហើយមានព្រះបន្ទូលដូចតទៅនេះ។
Verse 187
इस प्रकार श्रीम्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वनें मत्स्योपाख्यानविषयक एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
ដូច្នេះ បានបញ្ចប់ជំពូកទីមួយរយប៉ែតសិបប្រាំពីរ នៃ «មត្ស្យូបាខ្យាន» (វគ្គព្រះរាជាមត្ស្យ) ដែលស្ថិតក្នុង «ម៉ារកណ្ឌេយសមាស្យាបរវន» នៃ «វនបរវ» ក្នុងមហាភារតដ៏បរិសុទ្ធ។ កថាបញ្ចប់នេះបង្ហាញថា វគ្គនិទាន-អប់រំនេះបានបញ្ចប់នៅក្នុងបរិបទនៃសៀវភៅព្រៃធំ។
Verse 188
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि अष्टाशीत्यधिकशततमो<ध्याय:
ដូច្នេះ បញ្ចប់ជំពូកទីមួយរយប៉ែតសិបប្រាំបី ក្នុង វនបវ៌ (Vana Parva) នៃ «មហាភារត» ដ៏បរិសុទ្ធ ក្នុងផ្នែកដែលគេហៅថា «មារកណ្ឌេយសមាស្យា» (សម្រង់/សង្ខេបរឿងនៃមារកណ្ឌេយ)។ នេះជាកថាបញ្ចប់ (colophon) សម្គាល់ការបិទជំពូក និងកំណត់ទីតាំងវានៅក្នុងសេចក្តីបង្រៀន និងរឿងគំរូនានានៃសៀវភៅព្រៃ ដែលប្រមូលផ្តុំដើម្បីណែនាំការប្រព្រឹត្តនៅពេលជួបវិបត្តិ។
Verse 213
आदितो मनुजव्याप्र कृत्स्नस्य जगत: क्षये । ये अन्तर्यामी आत्मा होनेसे सबको जानते हैं, परंतु इन्हें वेद भी नहीं जानते। नृपशिरोमणे! नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण जगत्का प्रलय होनेके पश्चात् इन आदिभूत परमेश्वरसे ही यह सम्पूर्ण आश्वर्यमय जगत् पुनः उत्पन्न हो जाता है
ឱ មនុស្សវីរបុរស! ព្រះអាត្មា ដែលស្ថិតនៅក្នុងទាំងអស់ (អន្តర్యាមី) ទ្រង់ជ្រាបគ្រប់សត្វទាំងអស់; ប៉ុន្តែ សូម្បីតែវេទក៏មិនអាចជ្រាបទ្រង់បានដែរ។ ឱ មកុដនៃព្រះមហាក្សត្រ! ឱ អ្នកល្អឥតខ្ចោះក្នុងមនុស្ស! បន្ទាប់ពីការលាយរលំ (ប្រល័យ) នៃលោកទាំងមូល ពិភពលោកដ៏អស្ចារ្យនេះ ក៏កើតឡើងវិញ ពីព្រះអម្ចាស់ដើមកំណើត អាទិភូត នោះតែមួយ។
Verse 236
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्व॒ ततः: परम् । तीन हजार दिव्य वर्षोका त्रेतायुग बताया जाता है, उसकी संध्या और संध्यांशके भी उतने ही (तीन-तीन) सौ दिव्य वर्ष होते हैं (इस तरह यह युग छत्तीस सौ दिव्य वर्षोंका होता है)
វៃសម្បាយនៈ បាននិយាយថា៖ ត្រេតាយុគ ត្រូវបាននិយាយថា មានរយៈពេល បីពាន់ ឆ្នាំទេវ (divine years)។ ព្រឹក (sandhyā) និងល្ងាច (sandhyāṃśa) របស់វា មានទំហំស្មើគ្នា—មួយៗ បីរយ ឆ្នាំទេវ។ ដូច្នេះ រួមទាំងរយៈពេលផ្លាស់ប្តូរទាំងពីរ យុគនោះសរុបជា បីពាន់ប្រាំមួយរយ ឆ្នាំទេវ។
Verse 246
तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्ष तथाविध: । द्वापरका मान दो हजार दिव्य वर्ष है तथा उतने ही सौ दिव्य वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके हैं (अत: सब मिलकर चौबीस सौ दिव्य वर्ष द्वापरके हैं)
វៃសម្បាយនៈ បាននិយាយថា៖ សម្រាប់ ទ្វាបរយុគ (Dvāpara-yuga) នោះផងដែរ រយៈពេលព្រឹក (sandhyā) មាន ពីររយ (ឆ្នាំទេវ) ហើយរយៈពេលល្ងាចបញ្ចប់ (sandhyāṃśa) ក៏មានទំហំដូចគ្នា។ ដូច្នេះ ទ្វាបរ មាន ពីរពាន់ ឆ្នាំទេវ ហើយបន្ថែម ពីររយ នៅដើម និង ពីររយ នៅចុង—សរុបជា ពីរពាន់បួនរយ ឆ្នាំទេវ។
Verse 283
लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलयं त॑ विदुर्बुधा: । नरश्रेष्ठ] एक हजार चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है। यह सारा जगत् ब्रह्माके दिनभर ही रहता है (और वह दिन समाप्त होते ही नष्ट हो जाता है।) इसीको विद्वान् पुरुष लोकोंका प्रलय मानते हैं
វៃសម្បាយនៈ បាននិយាយថា៖ «ឱ មនុស្សវីរបុរសដូចខ្លា! បណ្ឌិតទាំងឡាយដឹងថា នេះហើយជាការលាយរលំ (ប្រល័យ) នៃលោកទាំងអស់។ ឱ អ្នកល្អឥតខ្ចោះក្នុងមនុស្ស! ពេលដែលវដ្តចតុរយុគ មួយពាន់ បានកន្លងផុត នោះជាថ្ងៃមួយរបស់ព្រះព្រហ្មា។ ចក្រវាឡទាំងមូលនេះ មានត្រឹមរយៈពេលថ្ងៃរបស់ព្រះព្រហ្មាប៉ុណ្ណោះ; ពេលថ្ងៃនោះបញ្ចប់ វាក៏ត្រូវបំផ្លាញ។ អ្នកប្រាជ្ញទាំងឡាយហៅវាថា ‘ប្រល័យ’—ការលាយរលំជាប្រចាំនៃលោកទាំងអស់»។
Verse 316
क्षत्रधर्मेण वाप्यत्र वर्तयन्ति गते युगे । युगकी समाप्तिके समय ब्राह्मण शूद्रोंके कर्म करते हैं और शाद्र वैश्योंकी भाँति धनोपार्जन करने लगते हैं अथवा क्षत्रियोंके कर्मसे जीविका चलाने लगते हैं
វៃសម្បាយនៈ បានមានពាក្យថា៖ «នៅទីនេះ ពេលយុគមួយកន្លងផុត ហើយដល់ចុងបញ្ចប់នៃយុគ មនុស្សទាំងឡាយចាប់ផ្តើមចិញ្ចឹមជីវិតដោយយកកាតព្វកិច្ចរបស់ក្សត្រីយៈមកធ្វើ—ជាសញ្ញានៃការរលាយបាត់ និងការលាយឡំរវាងតួនាទីសង្គម និងធម៌ប្រពៃណី (វර්ណ-ធម៌) ដែលធម្មតាគ្រប់គ្រងការរស់នៅ និងការប្រព្រឹត្ត។»
Verse 463
मिथ्या च नखरोमाणि धारयन्ति तदा द्विजा: । गृहस्थलोग करके भारसे डरकर लुटेरे बन जायाँगे। ब्राह्मण मुनियों-जैसी कपटपूर्ण आकृति धारण किये वैश्यवृत्तिसे जीविका चलायेंगे और झूठे दिखावेके लिये नख तथा दाढ़ी-मूछ धारण करेंगे
វៃសម្បាយនៈ បានមានពាក្យថា៖ «នៅក្នុងយុគនោះ ពួកទ្វិជៈ (អ្នកកើតពីរដង) សូម្បីតែក្រចក និងសក់ក៏រក្សាទុកដោយល្បិចកល—រក្សាសញ្ញាខាងក្រៅតែសម្រាប់បង្ហាញ។ ដោយភ័យខ្លាចបន្ទុកជីវិតគ្រួសារ មនុស្សនឹងក្លាយជាចោរប្លន់; ពាក់រូបរាងក្លែងក្លាយដូចមុនី ហើយរស់ដោយមុខរបរជួញដូរ; ហើយដើម្បីការបង្ហាញក្លែងក្លាយ នឹងទុកក្រចក និងពុកមាត់-ចង្កា។»
Verse 1323
प्रयत्नेन मया मूर्ध्ना गृहीत्वा हभिवन्दितौ | तात! तदनन्तर मैंने कोमल और लाल रंगकी अँगुलियोंसे सुशोभित लाल-लाल तलवेवाले उस बालकके सुन्दर एवं सुप्रतिष्ठित चरणोंको प्रयत्नपूर्वक पकड़कर उन्हें अपने मस्तकसे प्रणाम किया
វៃសម្បាយនៈ បានមានពាក្យថា៖ «ដោយការខិតខំប្រឹងប្រែង ខ្ញុំបានចាប់យកព្រះបាទទាំងនោះ ហើយកោតគោរពបង្គំ។ បន្ទាប់មក ឱ ព្រះអង្គជាទីស្រឡាញ់ ខ្ញុំបានកាន់យ៉ាងគោរពនូវជើងដ៏ស្រស់ស្អាត និងតាំងល្អរបស់កុមារនោះ—តុបតែងដោយម្រាមទន់ពណ៌ក្រហម និងបាតជើងក្រហមភ្លឺ—ហើយដាក់លើក្បាលខ្ញុំ បូជាបង្គំដោយសេចក្តីគោរពជ្រាលជ្រៅ។»
Yudhiṣṭhira asks how to remain established in dharma while protecting subjects and acting in the world without deviating from svadharma; the response frames doubt itself as a risk to dharmic stability when it becomes excessive suspicion toward sound counsel.
Govern through compassion and protection as if subjects were one’s own children; correct missteps through appropriate giving; honor ancestors and deities; and maintain disciplined respect toward learned authorities, treating dharma as the ruler’s continuous inner alignment in thought, speech, and action.
Yes. The chapter explicitly frames the discourse as conveying past and future knowledge remembered from Vāyu-proclaimed tradition and r̥ṣi-praised purāṇic material, and it closes by noting the audience’s astonishment at the purāṇa-style exposition—signaling its didactic and archival intent.