Vayaviya Samhita35 Adhyayas1694 Shlokas

Purva Bhaga

Purvabhaga

Adhyayas in Purva Bhaga

Adhyaya 1

मङ्गलाचरणम्, तीर्थ-परिसरः, सूतागमनम् — Invocation, Sacred Setting, and the Arrival of Sūta

अध्याय 1 का आरम्भ व्यास के मङ्गलाचरण और शिव-स्तुति से होता है। वे शिव को सोमस्वरूप, गणों के अधिपति, पुत्रयुक्त पिता तथा प्रधान–पुरुष के स्वामी—सृष्टि, स्थिति और प्रलय के कारण—के रूप में प्रणाम करते हैं। फिर शिव के लक्षण—अतुल शक्ति, सर्वव्यापी ऐश्वर्य, स्वामित्व और विभुत्व—कहे जाते हैं और अजन्मा, नित्य, अविनाशी महादेव की शरणागति की जाती है। इसके बाद कथा-भूमि धर्मक्षेत्रों और तीर्थों में आती है—गङ्गा–कालिन्दी संगम तथा प्रयाग आदि में—जहाँ नियमपरायण ऋषि महान् सत्र करते हैं। इस सभा का समाचार पाकर व्यास-परम्परा से सम्बद्ध प्रसिद्ध सूत, जो आख्यान, काल, नीति और काव्य-वाणी में निपुण है, वहाँ पहुँचता है। ऋषिगण उसका आदर-सत्कार और विधिवत् सम्मान करते हैं; यहीं से आगे के संवाद का आरम्भ होता है।

67 verses

Adhyaya 2

परस्य दुर्‍निर्णयः—षट्कुलीयमुनिविवादः तथा ब्रह्मदर्शनार्थं मेरुप्रयाणम् | The Dispute of the Six-Lineage Sages on the Supreme and Their Journey to Brahmā at Meru

इस अध्याय में सूत कल्प-चक्र में सृष्टि-कार्य के आरम्भ का प्रसंग रखते हैं। ‘षट्कुलीय’ मुनि ‘परम्’ अर्थात् सर्वोच्च क्या है—इस पर दीर्घ विवाद करते हैं; प्रत्येक भिन्न मत रखता है, परन्तु परम तत्त्व दुर्‍निर्णेय होने से निश्चय नहीं हो पाता। तब वे समाधान हेतु देव-दानवों से स्तुत, अविनाशी विधि-निर्माता ब्रह्मा के दर्शन के लिए मेरु पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं। मेरु का शुभ शिखर देव, दानव, सिद्ध, चारण, यक्ष और गन्धर्वों से परिपूर्ण, रत्नों, उपवनों, गुहाओं और प्रपातों से अलंकृत बताया गया है। वहीं ‘ब्रह्मवन’ नाम विशाल वन, सुगन्धित निर्मल जल के सरोवर, पुष्पित वृक्ष तथा प्रबल प्राकारों वाली तेजस्वी महान नगरी का वर्णन आता है। यह दृश्य-रचना तत्त्व-निर्णय से पूर्व की भूमिका है, जो बताती है कि परम प्रश्न का समाधान पवित्र क्षेत्र में विश्व-नियन्ता के पास जाकर ही होता है।

31 verses

Adhyaya 3

सर्‍वेश्वर-परमकारण-निरूपणम् / The Supreme Lord as the Uncaused Cause

अध्याय 3 में ब्रह्मा शिव/रुद्र की परम-श्रेष्ठता का तात्त्विक निरूपण करते हैं। प्रभु का स्वरूप ऐसा है कि वाणी और मन उसे न पाकर लौट आते हैं; उस आनन्द को जानने वाला निर्भय होता है। वही एक ईश्वर जीवों के माध्यम से समस्त लोकों का शासन करता है और उसी से देवताओं सहित ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र-इन्द्र, भूत, इन्द्रियाँ तथा जगत् की प्रथम अभिव्यक्ति प्रकट होती है। वह कारणों का अधिष्ठाता और ध्यान का परम कारण है, पर स्वयं कभी किसी से उत्पन्न नहीं होता। शिव सर्वेश्वर, सर्वैश्वर्यसम्पन्न, मोक्षार्थियों के ध्येय हैं; आकाश में स्थित होकर भी सर्वत्र व्याप्त हैं। ब्रह्मा स्वीकार करते हैं कि प्रजापति का पद उन्हें शिव की कृपा और उपदेश से मिला। एक में अनेक, निष्क्रियों में क्रियाशील, एक बीज से बहुरूप—रुद्र ‘अद्वितीय’ कहे गए हैं। वे सबके हृदय में नित्य विराजमान, दूसरों को अगोचर, और सदा जगत् के धारक-नियन्ता हैं।

63 verses

Adhyaya 4

सत्रप्रवृत्तिः — वायोः आगमनं च (Commencement of the Satra and the Arrival of Vāyu)

इस अध्याय में सूत बताते हैं कि अनेक श्रेष्ठ ऋषि महादेव की आराधना करते हुए दीर्घकालीन यज्ञ-सत्र का आरम्भ करते हैं। यह सत्र अद्भुत है और सृष्टिकर्ताओं की आद्य सृजन-प्रेरणा के समान कहा गया है। बहुत-सी दक्षिणा देकर सत्र की समाप्ति होने पर पितामह ब्रह्मा की आज्ञा से वायु देव वहाँ आते हैं। वायु का तात्त्विक स्वरूप बताया गया है—वे साक्षात् जानने वाले, आज्ञा से शासन करने वाले, मरुतों से सम्बद्ध; प्राण आदि के द्वारा देह के अंगों को चलाने वाले और देहधारियों का पोषण-धारण करने वाले हैं। अणिमा आदि शक्तियाँ, जगत्-धारण का कार्य, तथा शब्द-स्पर्श, आकाश-योनि और तेज से सम्बन्ध जैसी सूक्ष्म तत्त्व-भाषा भी आती है। वायु के आश्रम में प्रवेश करते ही ऋषि ब्रह्मा के वचन स्मरण कर प्रसन्न होते हैं, उठकर प्रणाम करते हैं और उनके लिए सम्मानित आसन तैयार करते हैं—आगे के उपदेश का आधार बनता है।

24 verses

Adhyaya 5

पशुपाशपतिज्ञान-प्राप्तिः (Acquisition of Paśupati–Pāśa Knowledge)

नैमिषारण्य में सूत मुनियों की औपचारिक जिज्ञासा वायु से कराते हैं—उन्हें ईश्वरगम्य ज्ञान कैसे मिला और शैव-भाव कैसे जागा। वायु श्वेतलोहित कल्प का प्रसंग बताते हैं: सृष्टि की इच्छा से ब्रह्मा ने घोर तप किया। प्रसन्न होकर परमपिता महेश्वर कौमार रूप में ‘श्वेत’ नाम से प्रकट हुए और ब्रह्मा को साक्षात् दर्शन, परम ज्ञान तथा गायत्री प्रदान की। इस दिव्य अनुग्रह से ब्रह्मा चराचर सृष्टि में समर्थ हुए। जो अमृततुल्य उपदेश ब्रह्मा ने परमेश्वर से सुना था, वही वायु ने अपने तप से ब्रह्मा के मुख से प्राप्त किया। मुनि उस कल्याणकारी ज्ञान का स्वरूप पूछते हैं जो दृढ़ निष्ठा से परम सिद्धि देता है; वायु उसे पशुपाशपति-ज्ञान बताकर साधकों के लिए परा निष्ठा का विधान करते हैं।

64 verses

Adhyaya 6

पशु-पाश-पतिविचारः / Inquiry into Paśu, Pāśa, and Pati

इस अध्याय में ऋषि वायु से पूछते हैं कि पशु (बद्ध जीव) और पाश (बंधन-तत्त्व) का स्वरूप क्या है तथा उनका परम स्वामी पति कौन है। वायु बताते हैं कि सृष्टि के लिए चेतन, बुद्धिमत् कारण आवश्यक है; अचेतन प्रधन, परमाणु या अन्य भौतिक तत्त्व अपने-आप सुव्यवस्थित जगत की रचना नहीं कर सकते। जीव कर्ता-सा दिखता है, पर उसकी वास्तविक क्रियाशक्ति प्रभु की प्रेरणा से चलती है, जैसे अंधे का चलना। आगे कहा गया है कि पशु-पाश-पति से परे एक परम पद है; तत्त्वविद्या/ब्रह्मविद्या से उसका ज्ञान होने पर योनिमुक्ति और पुनर्जन्म से निवृत्ति होती है। भोक्ता-भोग्य-प्रेरयिता के त्रिविध विवेक से परे मोक्षार्थी के लिए और कुछ जानने योग्य नहीं रहता।

76 verses

Adhyaya 7

कालतत्त्वनिर्णयः / Doctrine of Kāla (Time) and Its Subordination to Śiva

ऋषि काल (समय) के विषय में पूछते हैं कि वही उत्पत्ति और प्रलय की सार्वभौम शर्त है, और जगत चक्र की भाँति सृष्टि-लय में निरन्तर घूमता रहता है। वे कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु (हरि), रुद्र तथा अन्य देव-असुर भी काल द्वारा स्थापित नियति का उल्लंघन नहीं कर सकते; काल ही भूत-वर्तमान-भविष्य का विभाग करता है और सब प्राणियों को ‘वृद्ध’ करता है। वे पूछते हैं—यह दिव्य काल कौन है, किसके अधीन है, और क्या कोई उससे परे है? वायु बताते हैं कि काल निमेष-काष्ठा आदि मापों से युक्त परिमेय तत्त्व है, कालात्मा है, परम माहेश्वर तेज है—नियोगरूप नियामक शक्ति जो चराचर जगत का शासन करती है। मोक्ष भी उस महाकालात्मा से सम्बद्ध अंश-प्रसव के रूप में प्रकट होता है, जैसे अग्नि से प्रेरित लोहा चल पड़ता है। निष्कर्ष स्पष्ट है—जगत काल के अधीन है, पर काल जगत के अधीन नहीं; काल शिव के अधीन है, शिव काल के नहीं। शिव का अजेय शार्व तेज काल में प्रतिष्ठित है, इसलिए काल की मर्यादा अत्यन्त दुस्तर है।

26 verses

Adhyaya 8

कालमान-निर्णयः (Determination of the Measures of Time)

इस अध्याय में काल-मान का शास्त्रीय निर्णय बताया गया है। ऋषि पूछते हैं कि आयु और संख्यारूप समय की गणना किस प्रमाण से होती है और मापे जा सकने वाले समय की अंतिम सीमा क्या है। वायु नेत्र-निमेष से ‘निमेष’ को सबसे सूक्ष्म मान बताकर क्रमशः निमेष से काष्ठा, काष्ठा से कला, कला से मुहूर्त और मुहूर्त से अहोरात्र (दिन-रात) की माप समझाते हैं। फिर मास, ऋतु और अयन का संबंध, मनुष्य-वर्ष (मानुष-अब्द) की परिभाषा तथा देव-गणना और पितृ-गणना का भेद बताते हैं। मुख्य सिद्धान्त यह है कि शास्त्रानुसार देवों का दिन-रात ऐसा है कि दक्षिणायन उनकी रात्रि और उत्तरायण उनका दिन है। इसी दिव्य मान से युग-गणना का आधार रखकर कहा गया है कि भारतवर्ष में चार युग प्रसिद्ध हैं।

30 verses

Adhyaya 9

शक्त्यादिसृष्टिनिरूपणम् / The Account of Creation Beginning with Śakti

इस अध्याय में ऋषि पूछते हैं कि परमेश्वर अपनी आज्ञा से लीला रूप में समस्त जगत की सृष्टि और संहार कैसे करते हैं, और वह आद्य तत्त्व कौन है जिससे सब फैलता और जिसमें सब लीन होता है। वायु क्रमबद्ध सृष्टि-वर्णन करते हैं—सबसे पहले शक्ति प्रकट होती है, जो ‘शान्त्यतीत’ पद से भी परे स्थित है; शक्ति-समन्वित शिव से माया और फिर अव्यक्त उत्पन्न होता है। शान्त्यतीत, शान्ति, विद्या, प्रतिष्ठा, निवृत्ति—इन पाँच ‘पदों’ को ईश्वर-प्रेरित सृष्टि-क्रम के रूप में बताया गया है; संहार इसी के उलटे क्रम से होता है। जगत पाँच ‘कलाओं’ से व्याप्त है और अव्यक्त तभी कारण-भूमि है जब उसमें आत्मा का अधिष्ठान हो। आगे तर्क दिया गया है कि न अव्यक्त अकेला कर्ता है, न आत्मा को निरपेक्ष रूप से कर्ता कहा जा सकता; प्रकृति जड़ है और पुरुष इस प्रसंग में अकर्ता-सा है, इसलिए प्रधान, परमाणु आदि जड़ कारण बुद्धिमान कारण के बिना सुव्यवस्थित जगत नहीं बना सकते। अतः सृष्टि के पीछे आवश्यक चेतन कर्ता शिव ही हैं।

24 verses

Adhyaya 10

त्रिमूर्तिसाम्यं तथा महेश्वरस्य परमार्थकारणत्वम् | Equality of the Trimūrti and Maheśvara as the Supreme Cause

इस अध्याय में वायु शैव सृष्टि-क्रम और तत्त्व-मीमांसा बताते हैं। पूर्व अव्यक्त से भगवान की आज्ञा द्वारा बुद्धि आदि क्रमशः प्रकट होते हैं; उन्हीं विकारों से रुद्र, विष्णु और पितामह (ब्रह्मा) कारण-कार्य के प्रशासक रूप में उत्पन्न होते हैं। दिव्य तत्त्व की सर्वव्यापकता, अप्रतिहत शक्ति, अनुपम ज्ञान और सिद्धियों का वर्णन कर, सृष्टि-स्थिति-प्रलय के तीनों कर्मों में महेश्वर को परम कारण और अधिपति कहा गया है। आगे एक चक्र में सर्ग, रक्षा और लय का शासन क्रमशः त्रिदेवों को सौंपकर यह भी कहा है कि वे परस्पर उत्पन्न, परस्पर पोषक और सामंजस्य से बढ़ने वाले हैं। किसी प्रसंग में एक देव की स्तुति से अन्य का ईश्वरत्व घटता नहीं—ऐसा कहकर संकीर्ण तर्क का निषेध है; जो इन देवों की निन्दा करते हैं वे आसुरी/अमंगल योनि को प्राप्त होते हैं। अंत में महेश्वर को त्रिगुणातीत, चतुर्व्यूहस्वरूप, सर्वाधार, लीला से जगत्कर्ता तथा प्रकृति-पुरुष और त्रिमूर्ति के अंतरात्मा रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

48 verses

Adhyaya 11

मन्वन्तर-कल्प-प्रश्नोत्तरम् / Discourse on Manvantaras, Kalpas, and Re-creation

इस अध्याय में ऋषि सभी मन्वन्तरों और कल्पों के भेदों का क्रमबद्ध वर्णन, विशेषतः आन्तर-सर्ग और प्रतिसर्ग, पूछते हैं। वायु ब्रह्मा के आयु-मान में परार्ध आदि का उल्लेख कर बताते हैं कि चक्र के अंत में पुनःसृष्टि होती है। वे कहते हैं कि ब्रह्मा के एक दिन में मनुओं के चक्र के अनुसार चौदह विभाग होते हैं। परन्तु कल्प और मन्वन्तर अनादि-अनन्त तथा पूर्णतः अवर्णनीय हैं, और सब कह देने पर भी श्रोताओं का फल सीमित होगा—इसलिए वे वर्तमान प्रवृत्त कल्प का संक्षेप से वर्णन करते हैं। यह वराह-कल्प है, जिसमें चौदह मनु हैं—सात स्वायम्भुव से और सात सावर्णिक से; वर्तमान में सातवें वैवस्वत मनु का शासन है। अध्याय यह भी संकेत करता है कि सृष्टि-प्रलय की रीति मन्वन्तरों में समान रूप से लौटती रहती है, और पूर्व कल्प की निवृत्ति तथा काल-वायु के प्रभाव से नए चक्र के आरम्भ का चित्र देकर आगे की विस्तृत कथा की भूमिका बाँधता है।

36 verses

Adhyaya 12

सर्गविभागवर्णनम् (Classification of Creation: the Nine Sargas and the Streams of Beings)

इस अध्याय में वायु सर्ग (सृष्टि) का तात्त्विक वर्गीकरण बताते हैं। ब्रह्मा की सृष्टि-इच्छा से तमस से उत्पन्न मोह क्रमशः तमोमोह, महामोह, तामिस्र और अन्ध रूप में प्रकट होता है, जिसे पंचविध अविद्या का स्वरूप कहा गया है। फिर सृष्टि विभिन्न स्तरों और ‘स्रोतस्’ के रूप में दिखाई देती है—पहला मुख्यम्/स्थावर जड़ व बाधित सर्ग; उसके बाद तिर्यक्स्रोतस् (पशु-सृष्टि) जिसमें भीतर कुछ प्रकाश पर बाहर आवरण और भ्रमित प्रवृत्तियाँ; ऊर्ध्वस्रोतस् (देव-सृष्टि) जो प्रसन्नता, आनन्द और सत्त्व-प्रधानता से युक्त; तथा अर्वाक्स्रोतस् (मानव-सृष्टि) जो साधक कही गई है, पर दुःख-बन्धन से अत्यन्त ग्रस्त है। साथ ही अनुग्रह-प्रकार की सृष्टि चार रूपों—विपर्यय, शक्ति, तुष्टि, सिद्धि—में गिनी गई है। अंत में नौ सर्गों की मानक गणना दी है: तीन प्राकृत (महत्, तन्मात्र/भूत, वैकारिक/ऐन्द्रियक) और पाँच वैकृत मुख्या-स्थावर से आरम्भ होकर, नवम कौमार; इस प्रकार गुण-प्रधानता के अनुसार चेतना व नैतिक क्षमता का क्रम दिखाया गया है।

40 verses

Adhyaya 13

रुद्रस्य परमात्मत्वे ब्रह्मपुत्रत्वादिसंशयप्रश्नः — Questions on Rudra’s Supremacy and His ‘Sonship’ to Brahmā

अध्याय 13 में ऋषि पहले परम भव (शिव) से सृष्टि-उत्पत्ति की पूर्व शिक्षा को स्वीकारते हैं और फिर एक सिद्धान्तगत संशय रखते हैं। रुद्र को विरूपाक्ष, शूलधर, नीललोहित, कपर्दी आदि नामों से युगान्त में ब्रह्मा-विष्णु तक का संहार करने वाला कहा गया है; पर उन्होंने यह भी सुना है कि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र एक-दूसरे के अंग से परस्पर प्रकट होते हैं। वे पूछते हैं कि गुण-प्रधान की दृष्टि से यह पारस्परिक उत्पत्ति कैसे संगत है। यदि रुद्र आदिदेव, पुरातन और योगक्षेम-प्रदाता हैं, तो अव्यक्त-जन्मा ब्रह्मा के ‘पुत्र’ कैसे कहे जाते हैं? ऋषि ब्रह्मा के उपदेश के अनुरूप तत्त्व का स्पष्ट निर्णय चाहते हैं, ताकि पुराणीय वंश-कारण की मीमांसा हो सके।

47 verses

Adhyaya 14

रुद्राविर्भावकारणम् — Causes and Pattern of Rudra’s Manifestation (Pratikalpa)

वायु रुद्र के प्रातिकल्पिक (बार-बार होने वाले) आविर्भाव का कारण बताते हैं। प्रत्येक कल्प में ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, पर जब प्रजा की वृद्धि नहीं होती तो वे शोकाकुल हो जाते हैं। ब्रह्मा के शोक-शमन और प्राणियों की समृद्धि हेतु परमेश्वर की आज्ञा से कालात्मा, रुद्रगणों के अधिपति रुद्र क्रमशः कल्पों में प्रकट होते हैं। वे महेश नीललोहित रूप में प्रादुर्भूत होकर ब्रह्मा की सहायता के लिए पुत्र-तुल्य प्रतीत होते हैं, किंतु दिव्य आधार में स्थित रहते हैं। अध्याय में रुद्र की परम सत्ता—तेजोराशि, अनादि-निधन, विभु—और पराशक्ति से उनकी एकता का वर्णन है: वे आज्ञा-चिह्न धारण करते, नियोगानुसार नाम-रूप ग्रहण करते, दिव्य कार्य करने में समर्थ और उच्च आज्ञा के पालनकर्ता हैं। फिर उनकी मूर्ति-लक्षण-परंपरा आती है—हजार सूर्यों-सी दीप्ति, चंद्र-आभूषण, सर्प-भूषण, पवित्र कटिसूत्र, कपाल-चिह्न, और गंगा-धारी जटाएँ—जिससे नीललोहित/रुद्र का ध्यान और स्मृति दृढ़ होती है।

21 verses

Adhyaya 15

अर्धनारीश्वरप्रादुर्भावः (Manifestation of Ardhanārīśvara and the Impulse for Procreative Creation)

अध्याय 15 में आदिसृष्टि का संकट बताया गया है। ब्रह्मा ने प्राणियों की रचना तो की, पर वे बढ़ते नहीं। वे मैथुनज सृष्टि आरम्भ करना चाहते हैं, किंतु ईश्वर से अभी स्त्री-तत्त्व/स्त्री-वंश का प्राकट्य न होने से असमर्थ रहते हैं। तब वे निश्चय करते हैं कि प्रजा-वृद्धि के लिए परमेश्वर का प्रसाद आवश्यक है; बिना दिव्य अनुग्रह के सृष्ट जनसमूह नहीं बढ़ सकते। ब्रह्मा परम, सूक्ष्म पराशक्ति का ध्यान करते हुए कठोर तप करते हैं—जो अनन्त, शुद्ध, निर्गुण और ईश्वर के सदा समीप कही गई है। प्रसन्न होकर शिव पुरुष-स्त्री तत्त्व की एकता-रूप अर्धनारीश्वर के रूप में प्रकट होते हैं। अध्याय का सिद्धान्त यह है कि जननशील बहुलता शिव-शक्ति ध्रुवता के प्राकट्य से ही, अद्वय परम तत्त्व में स्थित रहकर, सम्भव होती है; तप का फल केवल यांत्रिक सृष्टि नहीं, देवदर्शन है।

35 verses

Adhyaya 16

Śiva’s Boon to Viśvakarman and the Manifestation of Devī (Bhavānī/Parāśakti)

अध्याय 16 में महादेव हर स्नेहपूर्ण संबोधनों से विश्वकर्मा से कहते हैं कि प्रजा-वृद्धि और लोक-कल्याण हेतु किए गए उसके तप और निवेदन से वे प्रसन्न हैं, और उसे इच्छित वर देते हैं। इसके बाद वरदान की वाणी से आगे बढ़कर एक तत्त्व-घटना होती है—शिव अपने ही शरीर के अंश से देवी का प्राकट्य करते हैं, जिन्हें विद्वान परमात्मा (भव) की परम शक्ति कहते हैं। देवी जन्म-मृत्यु-जरा से रहित हैं; जहाँ वाणी, मन और इन्द्रियाँ लौट आती हैं, वहाँ भी वे परात्परा हैं, फिर भी अद्भुत रूप धारण कर विभूति से समस्त जगत में व्याप्त दिखाई देती हैं। इस प्रकार अध्याय शाक्त-शैव तत्त्व के साथ पुराण-कथा को जोड़कर देवी को अचिन्त्य पराशक्ति और जगत में अनुभूत होने वाली अन्तःशक्ति के रूप में स्थापित करता है।

28 verses

Adhyaya 17

मनु-शतरूपा-प्रसूतिः तथा दक्षकन्याविवाहाः (Manu–Śatarūpā, Prasūti, and the Marriages of Dakṣa’s Daughters)

इस अध्याय में सृष्टि‑वंशावली का क्रम आगे बढ़ता है। वायु बताते हैं कि प्रजापति ने ईश्वर से शाश्वती परा शक्ति प्राप्त की और मैथुन‑प्रभवा (युग्म) सृष्टि करने का संकल्प किया। स्रष्टा दो भागों में पुरुष‑स्त्री रूप से प्रकट होता है; स्त्री‑अर्ध शतरूपा कहलाती है। ब्रह्मा से विराज उत्पन्न होते हैं; पुरुष‑तत्त्व स्वायम्भुव मनु है। शतरूपा कठोर तप करके मनु को पति रूप में स्वीकार करती हैं। उनसे दो पुत्र—प्रियव्रत, उत्तानपाद—और दो कन्याएँ—आकूति, प्रसूति—जन्म लेती हैं। मनु प्रसूति का विवाह दक्ष से और आकूति का रुचि से करते हैं; आकूति से यज्ञ और दक्षिणा उत्पन्न होकर लोक‑व्यवस्था को धारण करते हैं। दक्ष की चौबीस कन्याएँ—श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, पुष्टि, तुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, सिद्धि, कीर्ति आदि—का वर्णन है। धर्म दाक्षायणियों को पत्नी रूप में ग्रहण करते हैं; ख्याति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, अनसूया, ऊर्ज़ा, स्वाहा, स्वधा आदि का भी उल्लेख है। भृगु, मरीचि, अङ्गिरा, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य, अत्रि, वसिष्ठ, पावक, पितर आदि इनके विवाह से संततियाँ चलती हैं। अध्याय बताता है कि धर्मजन्य प्रजा सुख देती है और अधर्म‑सम्बद्ध प्रजा दुःख व हिंसा का कारण बनती है।

33 verses

Adhyaya 18

दक्षस्य रुद्रनिन्दा-निमित्तकथनम् / The Cause of Dakṣa’s Censure of Rudra

अध्याय 18 में ऋषि पूछते हैं कि दक्ष की पुत्री सती (दाक्षायणी) आगे चलकर मेना के द्वारा हिमवान की पुत्री कैसे बनीं, महात्मा दक्ष ने रुद्र की निन्दा क्यों की, और चाक्षुष मन्वन्तर में भव के शाप से दक्ष का जन्म कैसे जुड़ा है। वायु बताते हैं कि दक्ष का अल्प-विवेक (लघु-चेतस) और धर्म-यज्ञ संबंधी दोष देवसमुदाय को ‘मलिन’ करता है। प्रसंग हिमालय-शिखर पर है, जहाँ देव, असुर, सिद्ध और महर्षि देवी सहित ईशान के दर्शन को आते हैं; दक्ष भी अपनी पुत्री सती और जामाता हर को देखने आता है। निर्णायक बिन्दु यह है कि दक्ष देवी के दिव्य, पुत्री-भाव से परे स्वरूप को नहीं पहचानता; यही अज्ञान वैर बनता है और विधि के साथ मिलकर उसे दीक्षा-युक्त कर्म करते हुए भी भव का यथोचित सम्मान न करने तक ले जाता है। इस प्रकार अध्याय आगे होने वाले यज्ञ-विघ्न की भूमिका रखता है—शिव की सर्वोच्चता, यज्ञ में अहंकार का संकट, और अपराध से उत्पन्न ब्रह्माण्डीय अशान्ति का कर्म-न्याय।

62 verses

Adhyaya 19

दक्षस्य यज्ञप्रवृत्तिः तथा ईश्वरवर्जितदेवसमागमः (Dakṣa’s Sacrificial Undertaking and the Devas’ Assembly without Īśvara)

अध्याय 19 में ऋषि पूछते हैं कि धर्म‑अर्थ के नाम पर यज्ञ करने वाले, पर दुरात्मा दक्ष के यज्ञ में महेश्वर ने विघ्न कैसे किया। वायु समय‑स्थान बताता है—हिमालय पर देवी के साथ भगवान के दीर्घ क्रीडावास के बाद वैवस्वत मन्वंतर आता है। तब प्राचेतस दक्ष गंगाद्वार के शुभ क्षेत्र में, हिमालय की पीठ पर, ऋषि‑सिद्धों से सेवित स्थान में अश्वमेध यज्ञ आरम्भ करता है। इन्द्र के नेतृत्व में देवगण—आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, मरुत, सोम‑आज्य‑धूम के भागी, अश्विनीकुमार, पितर, अन्य महर्षि तथा विष्णु—यज्ञभागी होकर वहाँ आते हैं। परन्तु ईश्वर (शिव) के बिना समस्त देवसमूह को देखकर दधीचि क्रोध से दक्ष को उपदेश देता है कि अयोग्य में पूजा और योग्य का अनादर महापाप का कारण है। इस प्रकार शिव‑वर्जन से यज्ञ बाह्यतः पूर्ण होकर भी भीतर से दोषयुक्त है—यही आगामी संघर्ष का मूल बताया गया है।

67 verses

Adhyaya 20

दक्षयज्ञदर्शनम् — The Vision of Dakṣa’s Great Sacrifice (and the Onset of Vīrabhadra’s Terror)

अध्याय 20 में वायु देवताओं के महासत्‍त्र का वर्णन करते हैं, जिसका नेतृत्व विष्णु करते हैं। वेदी पर दर्भ बिछा है, अग्नियाँ प्रज्वलित हैं, स्वर्ण पात्र चमक रहे हैं और ऋषि क्रमबद्ध रूप से वेद-विहित कर्म कर रहे हैं; अप्सराएँ, वेणु-वीणा का नाद और गूँजता वेदपाठ वातावरण को दिव्य बनाते हैं। तभी दक्ष के अध्वर को देखकर वीरभद्र मेघ-गर्जन समान सिंहनाद करता है और गणों का समूह उस नाद को बढ़ाकर आकाश भर देता है। भय से देवता भाग खड़े होते हैं, वस्त्र-आभूषण अस्त-व्यस्त हो जाते हैं; उन्हें लगता है मानो मेरु टूट गया या पृथ्वी फट रही हो। यह नाद घने वन में हाथियों को आतंकित करने वाले सिंह-गर्जन जैसा बताया गया है; कुछ तो भय से प्राण तक त्याग देते हैं। फिर पर्वत विदीर्ण होते हैं, पृथ्वी काँपती है, वायु चक्रवात-सी घूमती है और समुद्र मथने लगता है—यह शिव की सुधारक शक्ति के प्रकट होने और दक्षयज्ञ के आसन्न विघ्न का संकेत है।

43 verses

Adhyaya 21

भद्रस्य देवसंघेषु विक्रमः (Bhadra’s Onslaught among the Deva Hosts)

इस अध्याय में वायु द्वारा वर्णित युद्ध-प्रसंग आता है, जहाँ विष्णु और इन्द्र आदि प्रमुख देव भयभीत होकर तितर-बितर हो जाते हैं। अपने ही (पूर्व में निष्कलंक) अंगों/सामर्थ्य से देवों को पीड़ित देखकर और यह मानकर कि दण्डनीय जन बिना दण्ड के रह गए, रुद्र-क्रोध से उत्पन्न गणनायक भद्र क्रुद्ध हो उठता है। वह शर्व की शक्ति को दबाने में समर्थ त्रिशूल उठाकर, ऊँची दृष्टि और ज्वलन्त मुख से, हाथियों के बीच सिंह की भाँति देवों पर टूट पड़ता है; उसकी उग्र गति मत्त गज जैसी है और उसका प्रचण्ड कर्म मानो विशाल सरोवर को अनेक रंगों में मथ देता हो। व्याघ्रचर्म-वस्त्र धारण किए, उत्तम स्वर्ण-तारकाभूषणों से शोभित वह देव-सेनाओं में उपकारी वनाग्नि की तरह विचरता है; देव एक योद्धा को हजारों के समान देखते हैं। भद्रकाली भी रण-रोष की वृद्धि से मदोन्मत्त होकर क्रुद्ध होती है और ज्वाला उगलते त्रिशूल से देवों को बेधती है। इस प्रकार भद्र रुद्र-क्रोध का प्रत्यक्ष उद्गार बनकर रुद्र-गणों को दण्ड-शोधन की दिव्य इच्छा का विस्तार सिद्ध करता है।

41 verses

Adhyaya 22

भद्रस्य दिव्यरथारोहणं शङ्खनादश्च — Bhadra’s Divine Chariot-Ascent and the Conch-Blast

अध्याय 22 में निर्णायक युद्ध-दैवी प्रसंग आता है। आकाश में अत्यन्त तेजस्वी दिव्य रथ प्रकट होता है, वृषध्वज से चिह्नित और रत्नमय आयुध-आभूषणों से सुसज्जित। उसका सारथी ब्रह्मा बताया गया है, जिससे त्रिपुर-वध की पूर्व कथा का स्मरण होता है। शिव की आज्ञा से ब्रह्मा हरि (विष्णु) के पास जाकर वीर गणनायक भद्र को रथ पर आरूढ़ होने का आदेश देते हैं। रेभा के आश्रम के निकट भद्र का पराक्रम त्र्यम्बक शिव अम्बिका सहित देखते हैं। भद्र ब्रह्मा का सम्मान कर रथ पर चढ़ता है और उसकी लक्ष्मी बढ़ती है, जैसे पुरद्वेषी रुद्र की। अंत में दीप्त शंखनाद देवताओं को भयभीत कर उनके जठराग्नि को प्रज्वलित करता है और घोर संघर्ष व देवबल-संचालन का संकेत देता है।

72 verses

Adhyaya 23

वीरभद्रक्रोधशमनं देवस्तुतिश्च (Pacification of Vīrabhadra and the Gods’ Hymn)

इस अध्याय में दक्ष-यज्ञ के संघर्ष के बाद का दृश्य है। विष्णु आदि देवता पराजित होकर भयभीत और घायल हैं, और वीरभद्र के प्रमथ-गण उन्हें लोहे की बेड़ियों से बाँधकर रोकते हैं। तब ब्रह्मा शान्तिदूत बनकर वीरभद्र (या उसके अधीन गणपति) के पास जाकर क्रोध-शमन और देवताओं तथा अन्य प्राणियों को क्षमा देने की प्रार्थना करते हैं। ब्रह्मा के मान और निवेदन से वीरभद्र का रोष शांत होता है। अवसर पाकर देवता सिर पर अंजलि रखकर शरणागत भाव से शिव की स्तुति करते हैं—उन्हें शांत स्वरूप, यज्ञ-विध्वंसक, त्रिशूलधारी और कालाग्नि-रुद्र कहकर उनके दण्डात्मक, धर्म-रक्षक रूप को स्वीकारते हैं। भय का भक्ति में रूपांतरण, मध्यस्थता की शक्ति और शिव-नामों में निहित शक्तियों का संकेत इस अध्याय का मुख्य भाव है।

56 verses

Adhyaya 24

मन्दरगिरिवर्णनम् — Description of Mount Mandara as Śiva’s Residence (Tapas-abode)

इस अध्याय में ऋषि वायु से पूछते हैं कि देवी और गणों सहित हर (शिव) अंतर्धान होकर कहाँ गए, कहाँ निवास करते हैं और विश्राम से पहले क्या किया। वायु बताते हैं कि देवाधिदेव को प्रिय मन्दरगिरि तपस्या से जुड़ा उनका निवास है, जहाँ अद्भुत गुफाएँ हैं। पर्वत की शोभा सहस्र मुखों से भी दीर्घकाल तक अवर्णनीय कही गई है, फिर भी उसकी ऋद्धि, ईश्वर-निवास-योग्यता और देवी को प्रसन्न करने हेतु ‘अंतःपुर’ के समान रूप का वर्णन होता है। शिव–शक्ति के नित्य सान्निध्य से वहाँ की भूमि और वनस्पति जगत से श्रेष्ठ हो जाती हैं, और उसकी धाराएँ-प्रपात स्नान-पान से पवित्र पुण्य देते हैं। इस प्रकार मन्दर तप, दिव्य दाम्पत्य-सान्निध्य और प्राकृतिक मंगल का पवित्र संगम-स्थल बनकर प्रकट होता है।

58 verses

Adhyaya 25

सत्याः पुनस्तपश्चर्या — Satī’s Return to Austerity (Tapas) and Fearless Liṅga-Worship

इस अध्याय में सती शिव की प्रदक्षिणा कर विरह-वेदना को संयमित करके हिमालय में अपने पूर्व तप-स्थल पर लौटती हैं। वे हिमवत और मेना से अपना संकल्प कहकर अनुमति लेती हैं और फिर वन-आश्रम में जाकर आभूषण त्यागकर शुद्ध तपस्विनी-वेष धारण करती हैं। शिव के चरण-कमलों का निरंतर स्मरण करते हुए वे कठोर तप करती हैं; प्रकट लिंग में शिव का ध्यान कर त्रिकाल/त्रिसंध्या वन-पुष्प, फल आदि से पूजन करती हैं। तभी एक दुष्ट महावाघ्र निकट आता है, पर चित्रवत् स्तब्ध हो जाता है; सती एकाग्र भक्ति और स्वाभाविक धैर्य से निर्भय रहती हैं। अध्याय पतिव्रता-भक्ति, तप, लिंग-उपासना और एकनिष्ठ शैव-चिंतन से उत्पन्न निर्भयता का फल दिखाता है।

48 verses

Adhyaya 26

कौशिकी-गौरी तथा शार्दूलरूप-निशाचरस्य पूर्वकर्मवर्णनम् | Kauśikī-Gaurī and Brahmā’s account of the tiger-formed niśācara

इस अध्याय में वायु के कथन-क्रम में कौशिकी-गौरी देवी ब्रह्मा से उस शार्दूल (बाघ) के विषय में कहती हैं जो उनके निकट शरणागत है। देवी उसकी एकनिष्ठ भक्ति की प्रशंसा कर उसे संरक्षण देना अपना प्रिय कर्तव्य बताती हैं और संकेत करती हैं कि शंकर उसे गणेश्वर-पद देंगे तथा वह उनके गणों के साथ चले। ब्रह्मा हँसकर सावधान करते हुए उसका पूर्वकर्म बताते हैं—वह बाघ-रूप में भी दुष्ट निशाचर, कामरूपी, गो-ब्राह्मणों का हिंसक रहा है, इसलिए पापफल भोगना निश्चित है। प्रसंग करुणा में विवेक और शिव की इच्छा से सम्भव रूपान्तरण—दोनों को उजागर करता है।

29 verses

Adhyaya 27

गौरीप्रवेशः—शिवसाक्षात्कारः (Gaurī’s Entry and the Vision of Śiva)

इस अध्याय में ऋषि वायु से पूछते हैं कि हिमवान की पुत्री देवी ने गौर, तेजस्वी रूप धारण कर सुसज्जित अंतःपुर में प्रवेश करके अपने स्वामी से कैसे भेंट की, द्वार पर स्थित गणेशों ने क्या किया और उन्हें देखकर शिव ने क्या कहा। वायु इसे प्रणय से उत्पन्न ‘परम रस’ बताकर वर्णन करता है, जो कोमल हृदयों को भी मोहित कर देता है। देवी उत्सुकता और संकोच के साथ भीतर जाती हैं और आगमन की प्रतीक्षा करते शिव को देखती हैं। भीतर के गण स्नेहपूर्ण वचनों से उनका सत्कार करते हैं; देवी त्र्यम्बक को प्रणाम करती हैं। उठने से पहले ही शिव आनंद से उन्हें आलिंगन कर गोद में बैठाना चाहते हैं; देवी शय्या पर बैठती हैं, तब शिव क्रीड़ा से उन्हें अपनी गोद में उठा लेते हैं और मुस्कराकर मुख निहारते हैं। फिर शिव कोमल, छेड़छाड़ भरे संवाद में उनकी पूर्व अवस्था का स्मरण कराते हुए रूप, स्वेच्छा और मिलन-समाधान की दिव्य निकटता का संकेत देते हैं।

37 verses

Adhyaya 28

अग्नीषोमात्मकविश्ववर्णनम् / The Universe as Agni–Soma (Fire and Nectar)

इस अध्याय में ऋषि पूछते हैं कि देवी/शक्ति को ‘आज्ञा’ कैसे कहा गया और जगत को अग्नि–सोम तथा वाक्–अर्थ स्वरूप कैसे बताया गया। वायु कहते हैं—अग्नि शक्ति की रौद्री, तीव्र, तेजस्वी वृत्ति है और सोम शक्ति का शाक्त, अमृतमय, शान्तिदायक भाव। वे तेज और रस/अमृत को सभी प्राणियों में व्याप्त सूक्ष्म तत्त्व बताते हैं: तेज सूर्य/अग्नि की तरह क्रियाशील है, रस सोम्य जल की तरह पोषण देता है; इन्हीं से चर-अचर जगत टिकता है। यज्ञ-कारण से भी समझाया गया—आहुति से अन्न, वर्षा से वृद्धि; अग्नि–सोम चक्र पर लोक-स्थिति निर्भर है। अंत में ऊर्ध्वगामी अग्नि और अधोगामी सोम/अमृत की धारा का ध्रुवत्व दिखाकर, नीचे कालाग्नि और ऊपर शक्ति को परस्पर पूरक क्रियाएँ कहा गया है।

20 verses

Adhyaya 29

षडध्ववेदनम् (Ṣaḍadhva-vedanam) — The Sixfold Path: Sound, Meaning, and Tattva-Distribution

अध्याय 29 में वायु शब्द और अर्थ की अंतर्निहित एकता को शैव तत्त्वमीमांसा में स्थापित करते हैं। वे कहते हैं कि शब्द के बिना अर्थ नहीं और कोई शब्द अंततः निरर्थक नहीं; व्यवहार में शब्द सार्वभौम अर्थ-वाहक हैं। यह शब्द–अर्थ विन्यास प्रकृति का विकार है और शिव-शक्ति सहित परम शिव की ‘प्राकृती मूर्ति’ माना गया है। शब्द-विभूति स्थूल, सूक्ष्म और परा—तीन स्तरों में बताई गई है, जिसका शिखर शिव-तत्त्व में स्थित परा-शक्ति है। आगे ज्ञान-शक्ति और इच्छा-शक्ति का संबंध, शक्तितत्त्व में शक्तियों की समग्रता, तथा शुद्धाध्व से संबद्ध कुण्डलिनी-माया को मूल कारण-मैट्रिक्स कहा गया है। इसी आधार से षडध्व तीन शब्द-पथ और तीन अर्थ-पथ के रूप में फैलता है; कलाओं से व्याप्त तत्त्व-वितरण और प्रकृति के पंचविध परिवर्तन के अनुसार जीवों की भोग और लय की क्षमता उनकी शुद्धि पर निर्भर बताई गई है।

37 verses

Adhyaya 30

शिवतत्त्वे परापरभावविचारः (Inquiry into Śiva’s Principle and the Parā–Aparā Paradox)

अध्याय 30 में ऋषि कहते हैं कि शिव‑शिवा के अद्भुत कार्य इतने गूढ़ हैं कि देवता भी उन्हें ठीक से नहीं समझ पाते, इसलिए संशय उत्पन्न होता है। फिर बताया जाता है कि ब्रह्मा आदि सृष्टि‑स्थिति‑संहार के कर्ता होकर भी शिव के अनुग्रह‑निग्रह से ही कार्य करते हैं, अतः वे शिव के अधीन हैं। शिव किसी के अनुग्रह या दण्ड के विषय नहीं; उनका ऐश्वर्य पूर्णतः अनायत्त और स्वभावसिद्ध स्वातन्त्र्य है। परन्तु मूर्तिमत्त्व कारणता और परतन्त्रता का आभास देता है—यहीं दार्शनिक तनाव उठता है। शास्त्र में पर और अपर—दोनों भाव एक ही तत्त्व में कैसे संगत हों? यदि परम स्वरूप निष्फल/निष्क्रिय है तो वही सकल/प्रकट कैसे होता है? यदि शिव स्वभाव उलट दें तो नित्य‑अनित्य का भेद भी मिट जाए; इसलिए प्राकट्य अविरोधी स्वभाव के अनुसार ही है। अंत में सूत्र दिया जाता है—एक सकल, मूर्तात्मा तत्त्व है और एक निष्फल, अव्यक्त शिव; और सकल का अधिष्ठाता वही शिव है।

53 verses

Adhyaya 31

अनुग्रह-स्वातन्त्र्य-प्रमाणविचारः | Inquiry into Pramāṇa, Divine Autonomy, and Grace

इस अध्याय में वायु ऋषियों के संशय को नास्तिकता नहीं, बल्कि उचित जिज्ञासा मानकर प्रमाण-आधारित स्पष्टीकरण देते हैं, जिससे सद्भावयुक्त जनों का मोह दूर हो। वे कहते हैं कि शिव परिपूर्ण हैं, इसलिए उनके लिए कोई ‘कर्तव्य’ नहीं; फिर भी पशु–पाश से युक्त जगत ‘अनुग्रह-योग्य’ कहा गया है। समाधान स्वभाव और स्वातन्त्र्य से है—शिव की कृपा उनके अपने स्वभाव से होती है, न पात्र पर निर्भर होकर, न किसी बाह्य आदेश से। प्रभु की अनपेक्षता और अनुग्रह-योग्य जीव की परतन्त्र अवस्था का भेद बताया गया है; अनुग्रह बिना भुक्ति और मुक्ति असंभव हैं। शम्भु में अज्ञान का आधार नहीं; अज्ञान बन्धन-दृष्टि में है, और कृपा शिव के ज्ञान/आदेश से अज्ञान-निवृत्ति है। अंत में निष्कल–सकल भाव का संकेत है—शिव परमतः निष्कल हैं, पर देहधारी की भक्ति-ज्ञान हेतु मूर्त्यात्म रूप में भी ग्रहण किए जाते हैं।

100 verses

Adhyaya 32

शैवधर्मप्रशंसा तथा पञ्चविधसाधनविभागः / Praise of Śaiva Dharma and the Fivefold Classification of Practice

अध्याय 32 में ऋषि वायु (मारुत) से पूछते हैं कि कौन-सा श्रेष्ठतम अनुष्ठान मोक्ष को अपरोक्ष (प्रत्यक्ष अनुभूत) बनाता है और उसका साधन क्या है। वायु कहते हैं कि शैवधर्म ही परम धर्म और सर्वोत्तम व्रत/अनुष्ठान है, क्योंकि इसी क्षेत्र में प्रत्यक्ष-परिचित शिव स्वयं मुक्ति प्रदान करते हैं। फिर वे साधना को पाँच क्रमिक ‘पर्वों’ में बाँटते हैं—क्रिया, तप, जप, ध्यान और ज्ञान। अध्याय में परोक्ष और अपरोक्ष ज्ञान का भेद बताकर मोक्ष-कारक ज्ञान की प्रतिष्ठा की गई है। परधर्म और अपरधर्म—दोनों को श्रुति-सम्मत मानते हुए ‘धर्म’ के अर्थ में श्रुति को निर्णायक प्रमाण कहा गया है। परधर्म योग-पर्यवसान वाला, ‘श्रुति-शिरोगत’ बताया गया है; अपरधर्म अधिक सामान्य और सुलभ है। अधिकार के अनुसार परधर्म योग्य जनों के लिए, और अपरधर्म सबके लिए साधारण कहा गया है। अंत में शैवधर्म का विस्तार धर्मशास्त्र, इतिहास-पुराण तथा विशेषतः शैव आगमों के अंगों, विधियों और संस्कार/अधिकार-व्यवस्था सहित पूर्ण समर्थन से प्रतिपादित होता है।

56 verses

Adhyaya 33

पाशुपतव्रतविधिः | The Procedure of the Supreme Pāśupata Vow

अध्याय 33 में ऋषि ‘परम पाशुपत व्रत’ की विधि पूछते हैं—जिसे ब्रह्मा आदि देवों ने भी करके ‘पाशुपत’ पद पाया। वायु इसे रहस्य, पाप-नाशक और वेदसम्मत (अथर्वशिरस से सम्बद्ध) व्रत बताकर विधि आरम्भ करते हैं। पहले शुभ समय (विशेषतः चैत्र पूर्णिमा), शिव-सम्बन्धित स्थान (क्षेत्र, उपवन या शुभ-लक्षणयुक्त वन) का चयन, स्नान तथा नित्यकर्म पूर्ण करने की तैयारी कही गई है। साधक आचार्य की अनुमति लेकर विशेष पूजा करता है और शुद्धि-चिह्न रूप में श्वेत वस्त्र, श्वेत यज्ञोपवीत, श्वेत माला/लेपन धारण करता है। दर्भासन पर बैठकर दर्भ हाथ में लेकर पूर्व या उत्तर मुख तीन बार प्राणायाम, शिव-देवी का ध्यान और ‘मैं यह व्रत ग्रहण करता हूँ’ ऐसा संकल्प करके दीक्षित-सा हो जाता है। व्रत की अवधि आजीवन से बारह वर्ष तक, फिर उसके अर्ध आदि, बारह मास, एक मास, बारह दिन, छह दिन और एक दिन तक बताई गई है। अंत में अग्न्याधान तथा विरजा-होम जैसे शुद्धि-होम से व्रत का वास्तविक आरम्भ होता है, जिससे पापक्षय और शिव-समर्पण सिद्ध होता है।

98 verses

Adhyaya 34

शिशुकस्य शिवशास्त्रप्राप्तिः (Śiśuka’s Attainment of Śaiva Teaching and Grace)

अध्याय 34 में ऋषि पूछते हैं कि दूध के लिए तप करने वाला बालक शिशुक कैसे शिव-शास्त्र का प्रवर्तक बना, उसने शिव का तत्त्व कैसे पहचाना और रुद्राग्नि की श्रेष्ठ शक्ति तथा रक्षक भस्म कैसे प्राप्त की। वायु बताते हैं कि शिशुक साधारण बालक नहीं, बुद्धिमान ऋषि व्याघ्रपाद का पुत्र है; पूर्वजन्म के कारणों से सिद्ध होकर पतन के बाद मुनि-पुत्र रूप में पुनर्जन्म पाया। शिव की कृपा और शुभ भाग्य से उसकी सरल दूध-इच्छा तपस्या का द्वार बनी; फिर शंकर ने स्वयं उसे क्षीरसागर का वर और स्थायी पद दिया—नित्य ‘कुमारत्व’ तथा शिवगणों में नेतृत्व। प्रसाद से उसे ‘कौमार’ ज्ञानागम, शक्तिमय ज्ञान मिला, जिससे वह शैव सिद्धान्त का उपदेशक हुआ। माता के शोकपूर्ण दूध-संबंधी वचन से कथा आगे बढ़ती है; शेष श्लोकों में कर्म-परम्परा, दैवी अनुग्रह की विधि और रुद्राग्नि/भस्म का रक्षात्मक व दीक्षात्मक महत्त्व शैव मोक्ष-परिप्रेक्ष्य में बताया गया है।

59 verses

Adhyaya 35

उपमन्युतपः-निवारणप्रसङ्गः / Śiva restrains Upamanyu’s tapas (Śiva disguised as Indra)

अध्याय 35 में देवगण संकट से घबराकर वैकुण्ठ जाकर हरि (विष्णु) को समाचार देते हैं। विचार करके विष्णु मन्दर पर्वत पर महेश्वर के पास जाते हैं और निवेदन करते हैं कि दूध की चाह में ब्राह्मण बालक उपमन्यु अपने तपोबल से सब कुछ जला रहा है, इसे रोका जाए। महेश्वर आश्वासन देते हैं कि वे स्वयं उसके तप को संयमित करेंगे और विष्णु को अपने धाम लौटने को कहते हैं—इससे तप और उसके विश्वव्यापी परिणामों के नियमन में शिव का अधिकार प्रकट होता है। फिर शिव शक्र (इन्द्र) का वेश धारण कर श्वेत हाथी पर, देव-उपदेवों सहित तपोवन की ओर जाते हैं; छत्र-चामर आदि से इन्द्रवत् शोभित, मन्दर पर चन्द्रमा-सा तेजस्वी वर्णित हैं। यह अध्याय नियंत्रित दिव्य हस्तक्षेप की भूमिका है—छद्म रूप से जाकर तपशक्ति को सत्य, तत्त्व और उचित भक्ति की ओर मोड़ना।

65 verses