
इस अध्याय में काल-मान का शास्त्रीय निर्णय बताया गया है। ऋषि पूछते हैं कि आयु और संख्यारूप समय की गणना किस प्रमाण से होती है और मापे जा सकने वाले समय की अंतिम सीमा क्या है। वायु नेत्र-निमेष से ‘निमेष’ को सबसे सूक्ष्म मान बताकर क्रमशः निमेष से काष्ठा, काष्ठा से कला, कला से मुहूर्त और मुहूर्त से अहोरात्र (दिन-रात) की माप समझाते हैं। फिर मास, ऋतु और अयन का संबंध, मनुष्य-वर्ष (मानुष-अब्द) की परिभाषा तथा देव-गणना और पितृ-गणना का भेद बताते हैं। मुख्य सिद्धान्त यह है कि शास्त्रानुसार देवों का दिन-रात ऐसा है कि दक्षिणायन उनकी रात्रि और उत्तरायण उनका दिन है। इसी दिव्य मान से युग-गणना का आधार रखकर कहा गया है कि भारतवर्ष में चार युग प्रसिद्ध हैं।
Verse 1
ऋषय ऊचुः । केन मानेन कालेस्मिन्नायुस्संख्या प्रकल्प्यते । संख्यारूपस्य कालस्य कः पुनः परमो ऽवधिः
ऋषियों ने कहा—इस काल-प्रसंग में आयु की संख्या किस मान से निर्धारित की जाती है? और संख्या-रूप काल की परम सीमा फिर क्या है?
Verse 2
वायुरुवाच । आयुषो ऽत्र निमेषाख्यमाद्यमानं प्रचक्षते । संख्यारूपस्य कालस्य शांत्त्वतीतकलावधि
वायु ने कहा—यहाँ आयु का प्रथम माप ‘निमेष’ कहलाता है। संख्या-रूप काल का यह आरम्भिक परिमाण है, जो ‘कला’ की सीमा तक और उससे भी परे विस्तृत है।
Verse 3
अक्षिपक्ष्मपरिक्षेपो निमेषः परिकल्पितः । तादृशानां निमेषाणां काष्ठा दश च पञ्च च
पलकों का बंद होना और फिर खुलना—इसे ‘निमेष’ कहा गया है। ऐसे पंद्रह निमेष मिलकर एक ‘काष्ठा’ होते हैं।
Verse 4
काष्ठांस्त्रिंशत्कला नाम कलांस्त्रिंशन्मुहूर्तकः । मुहूर्तानामपि त्रिंशदहोरात्रं प्रचक्षते
तीस काष्ठाएँ मिलकर ‘कला’ कहलाती हैं; तीस कलाएँ एक ‘मुहूर्त’ बनाती हैं; और तीस मुहूर्तों से एक पूर्ण ‘अहोरात्र’ (दिन-रात) होता है।
Verse 5
त्रिंशत्संख्यैरहोरात्रैर्मासः पक्षद्वयात्मकः । ज्ञेयं पित्र्यमहोरात्रं मासः कृष्णसितात्मकः
तीस अहोरात्रों से एक मास बनता है, जो दो पक्षों से युक्त है। और पितरों के लिए एक अहोरात्र ही एक मास है, जो कृष्ण और शुक्ल पक्ष से बना है।
Verse 7
मासैस्तैरयनं षड्भिर्वर्षं द्वे चायनं मतम् । लौकिकेनैव मानेन अब्दो यो मानुषः स्मृतः
उन महीनों में से छह से एक अयन (अर्धवर्ष) बनता है और दो अयनों से वर्ष माना गया है; लोक-मान के अनुसार वही वर्ष ‘मानुष वर्ष’ कहलाता है।
Verse 8
एतद्दिव्यमहोरात्रमिति शास्त्रस्य निश्चयः । दक्षिणं चायनं रात्रिस्तथोदगयनं दिनम्
शास्त्र का निश्चय है कि यही दिव्य अहोरात्र है—दक्षिणायन ‘रात्रि’ है और उत्तरायण (उदगयन) ‘दिन’ है।
Verse 9
मासस्त्रिंशदहोरात्रैर्दिव्यो मानुषवत्स्मृतः । संवत्सरो ऽपि देवानां मासैर्द्वादशभिस्तथा
दिव्य मास तीस दिन-रात का माना गया है, जैसे मनुष्यों में होता है। वैसे ही देवताओं का एक वर्ष ऐसे ही बारह मासों से बनता है।
Verse 10
त्रीणि वर्षशतान्येव षष्टिवर्षयुतान्यपि । दिव्यस्संवत्सरो ज्ञेयो मानुषेण प्रकीर्तितः
तीन सौ वर्ष—और उनके साथ साठ वर्ष भी—मनुष्य-गणना के अनुसार एक दिव्य संवत्सर कहे गए हैं।
Verse 11
दिव्येनैव प्रमाणेन युगसंख्या प्रवर्तते । चत्वारि भारते वर्षे युगानि कवयो विदुः
केवल दिव्य प्रमाण से ही युगों की गणना प्रवर्तित होती है। कवि-ऋषि जानते हैं कि भारतवर्ष में चार युग हैं।
Verse 12
पूर्वं कृतयुगं नाम ततस्त्रेता विधीयते । द्वापरं च कलिश्चैव युगान्येतानि कृत्स्नशः
सबसे पहले कृत (सत्य) युग कहलाता है; उसके बाद त्रेता युग की व्यवस्था होती है। फिर द्वापर और उसके बाद कलि—यही संपूर्ण युग-चक्र है।
Verse 13
चत्वारि तु सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम् । तस्य तावच्छतीसंध्या संध्यांशश्च तथाविधः
कृत युग चार हजार वर्षों का होता है। उसकी संध्या (प्रारम्भिक प्रभात) उतने ही सैकड़ों की होती है और संध्यांश (अंतिम संध्या) भी उसी परिमाण का होता है।
Verse 14
इतरेषु ससंध्येषु ससंध्यांशेषु च त्रिषु । एकापायेन वर्तंते सहस्राणि शतानि च
अन्य संध्याकालों में तथा उन संध्याओं के तीन अंशों में भी, हजारों और सैकड़ों की गणना एक ही प्रकार की एकरूप क्षय-रीति से चलती है।
Verse 15
एतद्द्वादशसाहस्रं साधिकं च चतुर्युगम् । चतुर्युगसहस्रं यत्संकल्प इति कथ्यते
यह (मान) बारह हजार (दिव्य वर्ष) और कुछ अधिक है—यही चतुर्युग कहलाता है। ऐसे चतुर्युगों के एक हजार का समूह ‘कल्प’ कहा जाता है।
Verse 16
चतुर्युगैकसप्तत्या मनोरंतरमुच्यते । कल्पे चतुर्दशैकस्मिन्मनूनां परिवृत्तयः
चतुर्युग के इकहत्तर चक्र को ‘मन्वंतर’ कहा जाता है। एक ही कल्प में मनुओं की ऐसी चौदह क्रमिक परिक्रमाएँ (अवधियाँ) होती हैं।
Verse 17
एतेन क्रमयोगेन कल्पमन्वंतराणि च । सप्रजानि व्यतीतानि शतशो ऽथ सहस्रशः
इस काल-क्रम के अनुसार कल्प और मन्वंतर, अपनी-अपनी प्रजा सहित, सैकड़ों और फिर हजारों की संख्या में बीत चुके हैं।
Verse 18
अज्ञेयत्वाच्च सर्वेषामसंख्येयतया पुनः । शक्यो नैवानुपूर्व्याद्वै तेषां वक्तुं सुविस्तरः
वे सबके लिए अज्ञेय हैं और फिर असंख्य भी हैं; इसलिए क्रमपूर्वक उनका पूर्ण विस्तार से वर्णन करना सर्वथा संभव नहीं।
Verse 19
कल्पो नाम दिवा प्रोक्तो ब्रह्मणो ऽव्यक्तजन्मनः । कल्पानां वै सहस्रं च ब्राह्मं वर्षमिहोच्यते
‘कल्प’ अव्यक्त से उत्पन्न ब्रह्मा का एक दिन कहा गया है। और ऐसे हजार कल्प यहाँ ‘ब्राह्म-वर्ष’ कहलाते हैं।
Verse 20
वर्षाणामष्टसाहस्रं यच्च तद्ब्रह्मणो युगम् । सवनं युगसाहस्रं ब्रह्मणः पद्मजन्मनः
आठ सहस्र वर्षों का काल ही ब्रह्मा का एक युग कहा गया है। और उस पद्मजन्मा ब्रह्मा के लिए ऐसे युगों के सहस्र को ‘सवन’ कहा गया है।
Verse 21
सवनानां सहस्रं च त्रिगुणं त्रिवृतं तथा । कल्प्यते सकलः कालो ब्रह्मणः परमेष्ठिनः
सवनों के सहस्र को तीन गुणा करके और फिर त्रिविध रूप से विभक्त करके—परमेष्ठी ब्रह्मा का समस्त काल-मान कल्पित किया जाता है।
Verse 22
तस्य वै दिवसे यांति चतुर्दश पुरंदराः । शतानि मासे चत्वारि विंशत्या सहितानि च
उसके एक ही दिन में निश्चय ही चौदह पुरंदर (इन्द्र) बीत जाते हैं; और एक मास में चार सौ बीस (ऐसे इन्द्र) बीत जाते हैं।
Verse 23
अब्दे पञ्च सहस्राणि चत्वारिंशद्युतानि च । चत्वारिंशत्सहस्राणि पञ्च लक्षाणि चायुषि
एक वर्ष में पाँच सहस्र और चालीस युत (दस-हज़ारों के समूह) होते हैं; और सम्पूर्ण आयु-पर्यन्त चालीस सहस्र तथा पाँच लाख (का परिमाण) कहा गया है।
Verse 24
ब्रह्मा विष्णोर्दिने चैको विष्णू रुद्रदिने तथा । ईश्वरस्य दिने रुद्रस्सदाख्यस्य तथेश्वरः
विष्णु के दिन ब्रह्मा ही अधिदेवता रूप से ध्येय हैं, और रुद्र के दिन विष्णु। ईश्वर के दिन रुद्र ध्येय हैं, तथा सदाशिव के दिन ईश्वर ध्येय हैं।
Verse 25
साक्षाच्छिवस्य तत्संख्यस्तथा सो ऽपि सदाशिवः । चत्वारिंशत्सहस्राणि पञ्चलक्षाणि चायुषि
वही संख्या साक्षात् शिव की है; और वही (स्वयं) सदाशिव हैं। उनके आयुष्य को चालीस हजार और पाँच लाख (वर्ष) कहा गया है।
Verse 26
तस्मिन्साक्षाच्छिवेनैष कालात्मा सम्प्रवर्तते । यत्तत्सृष्टेस्समाख्यातं कालान्तरमिह द्विजाः । एतत्कालान्तरं ज्ञेयमहर्वै पारमेश्वरम् । रात्रिश्च तावती ज्ञेया परमेशस्य कृत्स्नशः । अहस्तस्य तु या सृष्टी रात्रिश्च प्रलयः स्मृतः
उस परमेश्वर में यह कालतत्त्व साक्षात् शिव के द्वारा प्रवर्तित होता है। हे द्विजो, सृष्टि के संबंध में यहाँ जो कालान्तर कहा गया है, वही परमेश्वर का ‘दिन’ जानना चाहिए। उतनी ही अवधि उसकी ‘रात्रि’ भी संपूर्णतः मानी जाए। उसका दिन सृष्टि का प्रसार है और उसकी रात्रि प्रलय कही गई है।
Verse 27
अहर्न विद्यते तस्य न रात्रिरिति धारयेत् । एषोपचारः क्रियते लोकानां हितकाम्यया
यह दृढ़ मानो कि उसके लिए न ‘दिन’ है न ‘रात’। यह कथन-प्रयोग लोक-हित की कामना से ही किया जाता है।
Verse 28
प्रजाः प्रजानां पतयो मूर्तयश्च सुरासुराः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च महाभूतानि पञ्च च
प्रजाएँ और प्रजाओं के स्वामी; विविध मूर्तियाँ; देव और असुर; इन्द्रियाँ और उनके विषय; तथा पाँच महाभूत—ये सब (उस परमेश्वर की व्यवस्था में) स्थित हैं, जहाँ शिव ही परम पति हैं।
Verse 29
तन्मात्राण्यथ भूतादिर्बुद्धिश्च सह दैवतः । अहस्तिष्ठंति सर्वाणि पारमेशस्य धीमतः
तन्मात्राएँ, भूतों का आदिकारण और बुद्धि—अपने-अपने अधिदेवताओं सहित—सब कुछ केवल परमेश्वर शिव के विवेकमय सामर्थ्य से ही स्थित और प्रवृत्त होते हैं।
Verse 30
अहरंते प्रलीयन्ते रात्र्यन्ते विश्वसंभवः । यो विश्वात्मा कर्मकालस्वभावाद्यर्थे शक्तिर्यस्य नोल्लंघनीया
दिन के अंत में ये सब लीन हो जाते हैं और रात्रि के अंत में विश्वसम्भव प्रभु फिर सृष्टि को प्रकट करते हैं। जो विश्वात्मा हैं—कर्म, काल, स्वभाव आदि के विषय में जिनकी शक्ति अतिक्रमण-अयोग्य है—वही परम शिव ज्ञेय हैं।
Verse 31
यस्यैवाज्ञाधीनमेतत्समस्तं नमस्तस्मै महते शंकराय
यह समस्त जगत् जिसकी आज्ञा के अधीन है—उस महान् शंकर को नमस्कार है; वही परम पति, सर्वाधिपति, हमारे शरण्य शिव हैं।
No single mythic episode is foregrounded; the chapter is primarily a technical, instructional discourse (Vāyu answering ṛṣis) defining time-measures and their cosmological correspondences.
It encodes a macrocosmic equivalence: the Devas’ day-night is mapped onto the sun’s half-year courses, shifting the frame from human diurnal time to cosmic/ritual time and enabling yuga computations on a divine scale.
The text highlights graded ontological standpoints—human (mānuṣa), ancestral (pitṛ), and divine (deva)—each with its own calendric equivalences, showing how cosmological order is structured through differential measures of kāla.