Adhyaya 7
Vayaviya SamhitaPurva BhagaAdhyaya 726 Verses

कालतत्त्वनिर्णयः / Doctrine of Kāla (Time) and Its Subordination to Śiva

ऋषि काल (समय) के विषय में पूछते हैं कि वही उत्पत्ति और प्रलय की सार्वभौम शर्त है, और जगत चक्र की भाँति सृष्टि-लय में निरन्तर घूमता रहता है। वे कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु (हरि), रुद्र तथा अन्य देव-असुर भी काल द्वारा स्थापित नियति का उल्लंघन नहीं कर सकते; काल ही भूत-वर्तमान-भविष्य का विभाग करता है और सब प्राणियों को ‘वृद्ध’ करता है। वे पूछते हैं—यह दिव्य काल कौन है, किसके अधीन है, और क्या कोई उससे परे है? वायु बताते हैं कि काल निमेष-काष्ठा आदि मापों से युक्त परिमेय तत्त्व है, कालात्मा है, परम माहेश्वर तेज है—नियोगरूप नियामक शक्ति जो चराचर जगत का शासन करती है। मोक्ष भी उस महाकालात्मा से सम्बद्ध अंश-प्रसव के रूप में प्रकट होता है, जैसे अग्नि से प्रेरित लोहा चल पड़ता है। निष्कर्ष स्पष्ट है—जगत काल के अधीन है, पर काल जगत के अधीन नहीं; काल शिव के अधीन है, शिव काल के नहीं। शिव का अजेय शार्व तेज काल में प्रतिष्ठित है, इसलिए काल की मर्यादा अत्यन्त दुस्तर है।

Shlokas

Verse 1

मुनय ऊचुः । कालादुत्पद्यते सर्वं कालदेव विपद्यते । न कालनिरपेक्षं हि क्वचित्किंचन विद्यते

मुनियों ने कहा—काल से ही सब उत्पन्न होता है और काल से ही नष्ट होता है; वास्तव में कहीं भी कोई वस्तु काल से स्वतंत्र नहीं है।

Verse 2

यदास्यांतर्गतं विश्वं शश्वत्संसारमण्डलम् । सर्गसंहृतिमुद्राभ्यां चक्रवत्परिवर्तते

जब यह विश्व—यह शाश्वत संसार-मण्डल—उसके भीतर स्थित रहता है, तब सृष्टि और संहार की मुद्राओं से वह चक्र की भाँति घूमता रहता है।

Verse 3

ब्रह्मा हरिश्च रुद्रश्च तथान्ये च सुरासुराः । यत्कृतां नियतिं प्राप्य प्रभवो नातिवर्तितुम्

ब्रह्मा, हरि और रुद्र तथा अन्य देव-असुर भी—उस परमेश्वर द्वारा स्थापित नियति को प्राप्त होकर, सामर्थ्यवान होते हुए भी उसका अतिक्रमण नहीं कर सकते।

Verse 4

भूतभव्यभविष्याद्यैर्विभज्य जरयन् प्रजाः । अतिप्रभुरिति स्वैरं वर्तते ऽतिभयंकरः

भूत, वर्तमान और भविष्य में बाँटकर वह प्रजाओं को क्षीण करता है। अपने को ‘अतिप्रभु’ मानकर वह स्वेच्छा से विचरता है—अत्यन्त भयङ्कर।

Verse 5

क एष भगवान् कालः कस्य वा वशवर्त्ययम् । क एवास्य वशे न स्यात्कथयैतद्विचक्षण

हे विचक्षण! यह पूज्य काल कौन है? यह किसके वश में चलता है? और कौन ऐसा है जो इसके अधीन न हो? यह बात स्पष्ट कहिए।

Verse 6

वायुरुवाच । कालकाष्ठानिमेषादिकलाकलितविग्रहम् । कालात्मेति समाख्यातं तेजो माहेश्वरं परम्

वायु बोले—जिसका प्रकट स्वरूप काल, काष्ठा, निमेष आदि समय-कलाओं से निर्मित है, वह परम माहेश्वर तेज ‘कालात्मा’ कहलाता है—काल का ही आत्मस्वरूप।

Verse 7

यदलंघ्यमशेषस्य स्थावरस्य चरस्य च । नियोगरूपमीशस्य बलं विश्वनियामकम्

ईश्वर की आज्ञा-स्वरूप वह शक्ति, जो समस्त विश्व का नियमन करती है, स्थावर और जंगम सभी प्राणियों के लिए अतिक्रमण-अयोग्य है।

Verse 8

तस्यांशांशमयी मुक्तिः कालात्मनि महात्मनि । ततो निष्क्रम्य संक्रांता विसृष्टाग्रेरिवायसी

उस महात्मा में, जो स्वयं काल-स्वरूप है, उसकी ही अंश-पर-अंशमयी मुक्ति स्थित रहती है; वहीं से वह निकलकर आगे बढ़ती है—जैसे अग्नि से छोड़ा गया लोहे का बाण।

Verse 9

तस्मात्कालवशे विश्वं न स विश्ववशे स्थितः । शिवस्य तु वशे कालो न कालस्य वशे शिवः

इसलिए विश्व काल के वश में है, पर काल विश्व के वश में नहीं। काल शिव के अधीन है, किंतु शिव कभी काल के अधीन नहीं होता।

Verse 10

यतो ऽप्रतिहतं शार्वं तेजः काले प्रतिष्ठितम् । महती तेन कालस्य मर्यादा हि दुरत्यया

क्योंकि अप्रतिहत शार्व (शिव-सम्बन्धी) तेज स्वयं काल में प्रतिष्ठित है, इसलिए काल की मर्यादा अत्यन्त विशाल है और उसका उल्लंघन नहीं हो सकता।

Verse 11

कालं प्रज्ञाविशेषेण को ऽतिवर्तितुमर्हति । कालेन तु कृतं कर्म न कश्चिदतिवर्तते

कौन अपनी विशेष बुद्धि-दीप्ति से काल को लाँघ सकता है? और काल द्वारा रचा गया कर्म—उसके नियत फल से कोई भी परे नहीं जा सकता।

Verse 12

एकच्छत्रां महीं कृत्स्नां ये पराक्रम्य शासति । ते ऽपि नैवातिवर्तंते कालवेलामिवाब्धयः

जो अपने पराक्रम से समस्त पृथ्वी को एकछत्र शासन में रखते हैं, वे भी काल की नियत सीमा को नहीं लाँघ सकते—जैसे समुद्र ज्वार-भाटे की मर्यादा नहीं तोड़ते।

Verse 13

ये निगृह्येंद्रियग्रामं जयंति सकलं जगत् । न जयंत्यपि ते कालं कालो जयति तानपि

जो इन्द्रियों के समूह को वश में करके समस्त जगत् को जीत लेते हैं, वे भी काल को नहीं जीतते; काल ही उन्हें भी जीत लेता है।

Verse 14

आयुर्वेदविदो वैद्यास्त्वनुष्ठितरसायनाः । न मृत्युमतिवर्तंते कालो हि दुरतिक्रमः

आयुर्वेद के ज्ञाता वैद्य, जो रसायन-चिकित्सा का विधिवत् अनुष्ठान करते हैं, वे भी मृत्यु को नहीं लाँघ सकते; क्योंकि काल का अतिक्रमण कठिन है।

Verse 15

श्रिया रूपेण शीलेन बलेन च कुलेन च । अन्यच्चिंतयते जंतुः कालो ऽन्यत्कुरुते बलात्

धन, रूप, शील, बल और कुल के भरोसे जीव कुछ और ही सोचता है; परन्तु काल अपने अजेय बल से कुछ और ही कर देता है।

Verse 16

अप्रियैश्च प्रियैश्चैव ह्यचिंतितगमागमैः । संयोजयति भूतानि वियोजयति चेश्वरः

अप्रिय और प्रिय—दोनों प्रकार की घटनाओं से, तथा अनपेक्षित आगमन-प्रस्थान से, ईश्वर ही प्राणियों को मिलाता भी है और अलग भी करता है।

Verse 17

यदैव दुःखितः कश्चित्तदैव सुखितः परः । दुर्विज्ञेयस्वभावस्य कालास्याहो विचित्रता

जिस क्षण कोई दुःख से पीड़ित होता है, उसी क्षण कोई दूसरा सुखी होता है। अहो! दुर्विज्ञेय स्वभाव वाले काल की कैसी विचित्रता है।

Verse 18

यो युवा स भवेद्वृद्धो यो बलीयान्स दुर्बलः । यः श्रीमान्सो ऽपि निःश्रीकः कालश्चित्रगतिर्द्विजा

जो युवा है, वही वृद्ध हो जाता है; जो बलवान है, वही दुर्बल हो जाता है; और जो श्रीमान है, वह भी निःश्री हो जाता है। हे द्विजो! काल की गति बड़ी विचित्र है।

Verse 19

नाभिजात्यं न वै शीलं न बलं न च नैपुणम् । भवेत्कार्याय पर्याप्तं कालश्च ह्यनिरोधकः

न तो कुलीनता, न सदाचार, न बल, और न ही कौशल—इनमें से कोई भी अकेला कार्य-सिद्धि के लिए पर्याप्त होता है; क्योंकि काल वास्तव में अनिरोध्य है।

Verse 20

ये सनाथाश्च दातारो गीतवाद्यैरुपस्थिताः । ये चानाथाः परान्नादाः कालस्तेषु समक्रियः

जो समर्थ और समृद्ध दाता हैं, जिनके साथ गीत-वाद्य होते हैं, और जो अनाथ होकर पराये अन्न पर जीते हैं—उन सब पर काल समान रूप से अपना प्रभाव करता है।

Verse 21

फलंत्यकाले न रसायनानि सम्यक्प्रयुक्तान्यपि चौषधानि । तान्येव कालेन समाहृतानि सिद्धिं प्रयांत्याशु सुखं दिशंति

असमय में सेवन किए गए, भली-भाँति तैयार रसायन और औषधियाँ भी फल नहीं देतीं। वही उपाय उचित काल में संचित और प्रयुक्त हों तो शीघ्र सिद्धि पाकर सुख प्रदान करते हैं।

Verse 22

नाकालतो ऽयं म्रियते जायते वा नाकालतः पुष्टिमग्र्यामुपैति । नाकालतः सुखितं दुःखितं वा नाकालिकं वस्तु समस्ति किंचित्

अकाल में न कोई मरता है, न जन्म लेता है; अकाल में कोई परम पुष्टिवृद्धि को नहीं पाता। अकाल में न सुख होता है, न दुःख—वास्तव में ‘अकालिक’ नाम की कोई वस्तु ही नहीं है।

Verse 23

कालेन शीतः प्रतिवाति वातःकालेन वृष्टिर्जलदानुपैति । कालेन चोष्मा प्रशमं प्रयाति कालेन सर्वं सफलत्वमेति

काल से ही शीतल वायु अपने समय पर बहती है; काल से ही मेघों के पीछे वर्षा आती है। काल से ही उष्णता शांत होती है; काल से ही सब कुछ अपने उचित फल को प्राप्त होता है।

Verse 24

कालश्च सर्वस्य भवस्य हेतुः कालेन सस्यानि भवंति नित्यम् । कालेन सस्यानि लयं प्रयांति कालेन संजीवति जीवलोकः

काल ही समस्त भव-परिणाम का कारण है। काल से ही अन्न-धान्य सदा उत्पन्न होते हैं; काल से ही वे लय को प्राप्त होते हैं। काल से ही जीवों का लोक संजीवित और धारण होता है।

Verse 25

इत्थं कालात्मनस्तत्त्वं यो विजानाति तत्त्वतः । कालात्मानमतिक्रम्य कालातीतं स पश्यति

इस प्रकार जो आत्म-शक्ति रूप काल के तत्त्व को यथार्थ जान लेता है, वह काल-आत्मभाव का अतिक्रमण करके कालातीत शिव को देखता है।

Verse 26

न यस्य कालो न च बंधमुक्ती न यः पुमान्न प्रकृतिर्न विश्वम् । विचित्ररूपाय शिवाय तस्मै नमःपरस्मै परमेश्वराय

उस परमेश्वर शिव को नमस्कार है—जिसके लिए न काल है, न बंधन-मुक्ति; जो न पुरुष है, न प्रकृति, न यह विश्व; और फिर भी जो विचित्र अनेक रूप धारण करता है।

Frequently Asked Questions

Rather than a single narrative event, the chapter presents a doctrinal dialogue: the sages interrogate the nature and authority of Kāla, and Vāyu answers with a theological definition culminating in Śiva’s supremacy over Time.

Kāla is treated as both measurable temporality and a metaphysical power (kālātman) that enforces niyati; the esoteric pivot is the hierarchy: Time governs the cosmos, yet Time itself is governed by Śiva’s śārva tejas.

Kāla is described through temporal units (nimeṣa, kāṣṭhā, kalā), as a universal regulatory force (niyogarūpa, viśvaniyāmaka), and as dependent upon Śiva—expressed in the maxim: 'śivasya tu vaśe kālo na kālasya vaśe śivaḥ.'