Adhyaya 28
Vayaviya SamhitaPurva BhagaAdhyaya 2820 Verses

अग्नीषोमात्मकविश्ववर्णनम् / The Universe as Agni–Soma (Fire and Nectar)

इस अध्याय में ऋषि पूछते हैं कि देवी/शक्ति को ‘आज्ञा’ कैसे कहा गया और जगत को अग्नि–सोम तथा वाक्–अर्थ स्वरूप कैसे बताया गया। वायु कहते हैं—अग्नि शक्ति की रौद्री, तीव्र, तेजस्वी वृत्ति है और सोम शक्ति का शाक्त, अमृतमय, शान्तिदायक भाव। वे तेज और रस/अमृत को सभी प्राणियों में व्याप्त सूक्ष्म तत्त्व बताते हैं: तेज सूर्य/अग्नि की तरह क्रियाशील है, रस सोम्य जल की तरह पोषण देता है; इन्हीं से चर-अचर जगत टिकता है। यज्ञ-कारण से भी समझाया गया—आहुति से अन्न, वर्षा से वृद्धि; अग्नि–सोम चक्र पर लोक-स्थिति निर्भर है। अंत में ऊर्ध्वगामी अग्नि और अधोगामी सोम/अमृत की धारा का ध्रुवत्व दिखाकर, नीचे कालाग्नि और ऊपर शक्ति को परस्पर पूरक क्रियाएँ कहा गया है।

Shlokas

Verse 1

ऋषय ऊचुः । देवीं समादधानेन देवेनेदं किमीरितम् । अग्निषोमात्मकं विश्वं वागर्थात्मकमित्यपि

ऋषियों ने कहा—देवी का प्रतिष्ठापन करते समय देव ने क्या कहा? क्या यह कि समस्त विश्व अग्नि‑सोमस्वरूप है और वाणी तथा अर्थस्वरूप भी है?

Verse 2

आज्ञैकसारमैश्वर्यमाज्ञा त्वमिति चोदितम् । तदिदं श्रोतुमिच्छामो यथावदनुपूर्वशः

आपने कहा कि ऐश्वर्य का सार केवल ‘आज्ञा’ है, और यह भी कि ‘तुम ही वह आज्ञा हो’। अतः हम इसे यथावत्, स्पष्ट और क्रमशः सुनना चाहते हैं।

Verse 3

वायुरुवाच । अग्निरित्युच्यते रौद्री घोरा या तैजसी तनुः । सोमः शाक्तो ऽमृतमयः शक्तेः शान्तिकरी तनुः

वायु ने कहा—जो रौद्री, घोर और तेजोमयी देह है, वह ‘अग्नि’ कहलाती है। और ‘सोम’ शाक्त, अमृतमय—शक्ति की शान्ति करने वाली देह है।

Verse 4

अमृतं यत्प्रतिष्ठा सा तेजो विद्या कला स्वयम् । भूतसूक्ष्मेषु सर्वेषु त एव रसतेजसी

वही प्रतिष्ठा अमृतस्वरूप है; वही स्वयं तेज, विद्या और दिव्य कला है। समस्त भूतों के सूक्ष्म रूपों में वही रस और तेज—दोनों रूपों में अंतःशक्ति होकर स्थित रहती है।

Verse 5

द्विविधा तेजसो वृत्तिसूर्यात्मा चानलात्मिका । तथैव रसवृत्तिश्च सोमात्मा च जलात्मिका

तेज तत्त्व की वृत्ति दो प्रकार की है—एक सूर्यस्वरूप और दूसरी अनलस्वरूप। इसी प्रकार रस की वृत्ति भी दो प्रकार की है—एक सोमस्वरूप और दूसरी जलस्वरूप।

Verse 6

विद्युदादिमयन्तेजो मधुरादिमयो रसः । तेजोरसविभेदैस्तु धृतमेतच्चराचरम्

तेज विद्युत् आदि रूपों से युक्त है और रस मधुर आदि भावों से युक्त है। तेज और रस के भेदों से ही यह समस्त चराचर जगत् धारण किया गया है।

Verse 7

अग्नेरमृतनिष्पत्तिरमृतेनाग्निरेधते । अत एव हि विक्रान्तमग्नीषोमं जगद्धितम्

अग्नि से अमृत की निष्पत्ति होती है और उसी अमृत से अग्नि पुष्ट होकर बढ़ती है। इसलिए अग्नि और सोम का संयुक्त तत्त्व—अग्नीषोम—पराक्रमी है और जगत्-हितकारी है।

Verse 8

हविषे सस्यसम्पत्तिर्वृष्टिः सस्याभिवृद्धये । वृष्टेरेव हविस्तस्मादग्नीषोमधृतं जगत्

हविस् से अन्न-समृद्धि होती है; अन्न की वृद्धि के लिए वर्षा होती है। और वर्षा भी हविस् से ही उत्पन्न होती है; इसलिए यह जगत् अग्नि और सोम से धारण किया गया है।

Verse 9

अग्निरूर्ध्वं ज्वलत्येष यावत्सौम्यं परामृतम् । यावदग्न्यास्पदं सौम्यममृतं च स्रवत्यधः

यह अग्नि ऊपर की ओर तब तक ज्वलित रहती है, जब तक सौम्य परम अमृत विद्यमान है। और जब तक वह सौम्य अमृत—अग्नि के आसन पर स्थित—नीचे की ओर टपकता रहता है।

Verse 10

अत एव हि कालाग्निरधस्ताच्छक्तिरूर्ध्वतः । यावदादहनं चोर्ध्वमधश्चाप्लावनं भवेत्

इसी कारण कालाग्नि नीचे है और (दिव्य) शक्ति ऊपर। जब तक ऊपर की ओर दहन और नीचे की ओर आप्लावन (प्रवाह/प्लावन) होता रहता है, तब तक यह व्यवस्था बनी रहती है।

Verse 11

आधारशक्त्यैव धृतः कालाग्निरयमूर्ध्वगः । तथैव निम्नगः सोमश्शिवशक्तिपदास्पदः

आधार-शक्ति के द्वारा ही यह ऊर्ध्वगामी कालाग्नि धारण किया गया है। उसी प्रकार अधोगामी सोम शिव-शक्ति का पद और आश्रय है, जहाँ शिव-शक्ति-तत्त्व प्रतिष्ठित होता है।

Verse 12

शिवश्चोर्ध्वमधश्शक्तिरूर्ध्वं शक्तिरधः शिवः । तदित्थं शिवशक्तिभ्यान्नाव्याप्तमिह किञ्चन

ऊपर शिव हैं और नीचे शक्ति; फिर ऊपर शक्ति है और नीचे शिव। इस प्रकार यहाँ (जगत् में) ऐसा कुछ भी नहीं जो शिव और शक्ति से व्याप्त न हो।

Verse 13

असकृच्चाग्निना दग्धं जगद्यद्भस्मसात्कृतम् । अग्नेर्वीर्यमिदं चाहुस्तद्वीर्यं भस्म यत्ततः

कहा गया है कि भस्म अग्नि का ही वीर्य है; क्योंकि जगत बार-बार अग्नि से दग्ध होकर भस्म हो जाता है, अतः जो भस्म उत्पन्न होती है वही अग्नि की शक्ति कही जाती है।

Verse 14

यश्चेत्थं भस्मसद्भावं ज्ञात्वा स्नाति च भस्मना । अग्निरित्यादिभिर्मन्त्रैर्बद्धः पाशात्प्रमुच्यते

जो इस प्रकार भस्म के सत्य स्वरूप को जानकर भस्म से स्नान करे और “अग्नि…” आदि मन्त्रों से अभिमन्त्रित होकर भस्म धारण करे, वह पाश-बन्धन से मुक्त हो जाता है।

Verse 15

अग्नेर्वीर्यं तु यद्भस्म सोमेनाप्लावितम्पुनः । अयोगयुक्त्या प्रकृतेरधिकाराय कल्पते

अग्नि का जो वीर्यरूप भस्म है, वह सोम से पुनः आर्द्र किया जाकर, यदि योग-नियम के बिना धारण किया जाए, तो वह केवल प्रकृति-क्षेत्र (सांसारिक स्तर) के लिए ही उपयुक्त होता है, परम शैव लक्ष्य के लिए नहीं।

Verse 16

योगयुक्त्या तु तद्भस्म प्लाव्यमानं समन्ततः । शाक्तेनामृतवर्षेण चाधिकारान्निवर्तयेत्

योग-युक्ति से वह पवित्र भस्म चारों ओर से परिप्लावित होकर, शक्ति-रूप अमृत-वर्षा द्वारा संसारिक अधिकारों और दावों से निवृत्त कर दे।

Verse 17

अतो मृत्युंजयायेत्थममृतप्लावनं सदा । शिवशक्त्यमृतस्पर्शे लब्धं येन कुतो मृतिः

अतः मृत्युंजय होने के लिए यह सदा उपलब्ध ‘अमृत-प्लावन’ है; शिव-शक्ति के अमृत-स्पर्श से जिसे यह प्राप्त हो, उसके लिए मृत्यु कहाँ से हो सकती है?

Verse 18

यो वेद दहनं गुह्यं प्लावनं च यथोदितम् । अग्नीषोमपदं हित्वा न स भूयो ऽभिजायते

जो शास्त्रानुसार उस गुप्त ‘दहन’ और ‘प्लावन’ को जान लेता है, और अग्नि-सोम से बँधी अवस्था (कर्मकाण्डीय द्वैत) को त्याग देता है, वह फिर जन्म नहीं लेता।

Verse 19

शिवाग्निना तनुं दग्ध्वा शक्तिसौम्या मृतेन यः । प्लावयेद्योगमार्गेण सो ऽमृतत्वाय कल्पते

जो शिव-अग्नि से देहाभिमान को दग्ध कर, फिर योगमार्ग से उसे शक्तिरूप सौम्य अमृत से प्लावित/परिपूर्ण कर देता है, वह अमृतत्व (मोक्ष) के योग्य हो जाता है।

Verse 20

हृदि कृत्वेममर्थं वै देवेन समुदाहृतम् । अग्नीषोमात्मकं विश्वं जगदित्यनुरूपतः

देव द्वारा कही गई इस बात को हृदय में धारण करके, उसके यथार्थ अर्थ के अनुसार समझना चाहिए कि समस्त विश्व—यह चराचर जगत—अग्नि और सोम-स्वरूप है।

Frequently Asked Questions

Rather than a narrative episode, the chapter is a doctrinal dialogue: the sages ask for clarification of a prior statement, and Vāyu delivers a metaphysical explanation of the cosmos as agni–soma and as vāk–artha.

Agni and soma are not merely Vedic deities but symbolic modalities of Śakti: agni is raudra tejas (transformative heat), soma is śākta amṛta (immortalizing, pacifying essence). Their interplay models both cosmology and inner spiritual energetics.

Agni manifests as upward-burning, solar/fire-like tejas; soma manifests as downward-flowing amṛta/rasa, watery nourishment. Together they sustain the carā–acarā (moving and unmoving) world through differentiated functions.