Rig Veda - Mandala 5
AtriVishnuMitra-Varuna

Mandala 5

मण्डल 5

The Family Book of Atri

ऋग्वेद का मण्डल 5 ‘कुल-ग्रन्थों’ (family books) में पाँचवाँ है और परम्परा से अत्रि-वंश (आत्रेय) को समर्पित माना जाता है; यह प्रारम्भिक ऋग्वैदिक संहिता में गृहस्थ-परम्परा/शाखा की एक सुसंगत वाणी प्रस्तुत करता है। इसके सूक्त प्रमुख देवताओं में—विशेषतः अग्नि और इन्द्र—के स्तवन में विस्तृत हैं, और साथ ही अश्विनौ, दिव्य वैद्य तथा रक्षक, के लिए प्रशस्ति-समूह का भी उल्लेखनीय संरक्षण करते हैं। यह मण्डल अपनी प्राचीन पदावली और संक्षिप्त, सूत्र-समृद्ध शैली के लिए मूल्यवान है, जिसमें पुराने वाक्य-प्रयोग और परम्परागत काव्य-रचनाएँ प्रायः सुरक्षित रहती हैं।

Suktas in Mandala 5

Sukta 1

Sukta 5.1

यह सूक्त उषा के समय अग्नि को गृहस्थ और यज्ञाग्नि के रूप में जगाता है—जिसकी जिह्वाएँ ऊँची उठती हैं और जिसकी प्रभा स्वर्ग की ओर प्रवाहित होती है। इसमें उसे प्रेरित होतृ कहा गया है, जो ऋत को धारण करता है, द्यावा‑पृथिवी का विस्तार करता है, और घृत से निरन्तर शुद्ध किया जाता है; ताकि उपासक का स्तोत्र उसी में प्रतिष्ठित होकर व्यापक, स्वर्णिम प्रकाश बन जाए।

12 mantras | Rishi: Vasiṣṭha (traditional attribution for RV 5.1) | Devata: Agni

Chandas: Triṣṭubh

Sukta 2

Sukta 5.2

यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उस गूढ़ किन्तु सदा प्रकट अग्नि की, जो गुप्त स्थान में बालक की भाँति छिपी रहती है, पर मनुष्यों के कर्म और यज्ञ में प्रत्यक्ष दिखाई देती है। इसमें अग्नि को बुद्धिमान होतृ के रूप में आवाहन किया गया है, जो (शुनःशेप की भाँति) प्राणियों को बन्धनों से मुक्त करता है और उस उपासक को, जो पवित्र आसन सजाकर आहुतियाँ अर्पित करता है, रक्षा, शान्ति और सुरक्षित निवास प्रदान करता है।

12 mantras | Rishi: Atri (traditional attribution for RV 5.2) | Devata: Agni

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 3

Sukta 5.3

यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उस बहुरूपी दिव्य शक्ति की, जो प्रज्वलित होने पर वरुण के सार्वभौम ऋत-नियम, मित्र की सामंजस्यपूर्ण मैत्री, और इन्द्र की विजयी पराक्रम-शक्ति को धारण करती है। इसमें अग्नि से प्रार्थना है कि वह उपासक को दोष-बोध/पाप, शत्रुतापूर्ण वाणी, तथा गुप्त या प्रकट हानि से बचाए; शापों को दूर करे और वसु—कल्याण व समृद्धि—की ओर यथोचित गमन (याम) को पुनः स्थापित करे।

12 mantras | Rishi: Vasiṣṭha (traditional for RV 5.3) | Devata: Agni (as embodying Varuṇa, Mitra, Indra)

Chandas: Triṣṭubh

Sukta 4

Sukta 5.4

आत्रेय परंपरा का यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उन्हें वसुपति (धनों के स्वामी) और यज्ञ पर अधिराज्य करने वाली राजसत्ता के रूप में, जिन्हें अध्वर में हर्षपूर्वक आवाहन किया जाता है। इसमें प्रार्थना है कि अग्नि वाज (विजयी ऊर्जा और समृद्धि) को प्रबल करें, मनुष्यों के संघर्षों के बीच विजय सुनिश्चित करें, और उपासक में ‘सुखद लोक-स्थान’ (स्योन लोक) के साथ व्यापक ऐश्वर्य—पुत्र, बल, गौ-धन और कल्याण—स्थापित करें।

9 mantras | Rishi: Atri (Ātreya tradition) (traditional ascription for RV 5.4) | Devata: Agni

Chandas: Trishtubh (probable; needs metrical verification)

Sukta 5

Sukta 5.5

यह सूक्त घृत से अग्नि जातवेदस् का प्रज्वलन करता है और उन्हें तेजस्वी सर्वज्ञ के रूप में स्तुत करता है, जो हवि को वहन करते हैं और यजमान के जीवन में ऋत (सही व्यवस्था) को जाग्रत करते हैं। यह ठोस आहुति-कर्म से आरम्भ होकर व्यापक ब्रह्माण्डीय सामंजस्य तक बढ़ता है—विशेषतः रात्रि और उषा के उस क्रम तक जिन्हें “ऋत की माताएँ” कहा गया है—और अंत में स्वाहा-प्रयोगों में परिणत होता है, जो आहुति को अनेक देवताओं तक और अंततः समस्त देवों तक विस्तारित करते हैं।

11 mantras | Rishi: Atri (Ātreya tradition) (RV 5.5) | Devata: Agni (Jātavedas)

Chandas: Gāyatrī

Sukta 6

Sukta 5.6

यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उन्हें सच्चा “गृह” (अस्तम्) और वह निधि बताता है, जिसकी ओर समस्त पोषण-शक्तियाँ, तीव्र ऊर्जाएँ और विजयी बल स्वभावतः प्रवाहित होते हैं। इसमें अग्नि से प्रार्थना है कि वे यज्ञ में इन शक्तियों को हाँकें और प्रज्वलित करें, तथा गायक-ऋषियों को निरन्तर वृद्धि (इष्) प्रदान करें—विशेषतः वीर-शक्ति और अश्व-सदृश वेग।

10 mantras | Devata: Agni

Sukta 7

Sukta 5.7

यह सूक्त अग्नि का आह्वान करता है—मनुष्यों के बीच उन्हें सबसे बलवान और सर्वाधिक वांछनीय दिव्य शक्ति के रूप में—और उपासकों से आग्रह करता है कि वे अपनी ‘इष्’ (अभिलाषा/प्रेरणा) और ‘स्तोम’ (स्तुति) को एकत्र कर यज्ञ को ठीक दिशा में प्रवृत्त करें। अग्नि को सर्व-स्थापक, मधुरता तथा विस्तृत समृद्धि के दाता, और वह शक्ति कहा गया है जिसके द्वारा शत्रु शक्तियाँ (दस्यु) पराजित होती हैं और सच्चे बल प्राप्त होते हैं।

10 mantras | Rishi: Vasiṣṭha (traditional; verify per anukramaṇī for RV 5.7) | Devata: Agni

Chandas: Gāyatrī/Anuṣṭubh uncertain (verse length suggests non-Triṣṭubh; requires metrical verification)

Sukta 8

Sukta 5.8

यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—ऋत के साधकों द्वारा प्रज्वलित सदा-प्राचीन अग्नि, तेजस्वी गृहपति, जो व्यवस्था स्थापित करता है और यज्ञ-पूजा को वहन करता है। इसमें अग्नि से प्रार्थना है कि वह गायकों की नम्र वंदना स्वीकार करे, उज्ज्वल समिधाओं से प्रखर होकर दहके, और अपनी बढ़ती शक्ति से मर्त्य को सांसारिक बाधाओं पर विजय दिलाए।

7 mantras | Rishi: Atri (Ātreya tradition) (traditional ascription for RV 5.8) | Devata: Agni

Chandas: Jagati (likely for RV 5.8.1–2; verify by syllable count in critical edition)

Sukta 9

Sukta 5.9

यह सूक्त अग्नि को जातवेदस्—सर्वज्ञ अग्नि—के रूप में आवाहन करता है, जो हवि को ग्रहण कर मनुष्यों के यज्ञ-पथ से उसे देवताओं तक पहुँचाते हैं। इसमें अग्नि के कल्याणकारी मार्गदर्शन और धन-प्रदायक सामर्थ्य की स्तुति है, साथ ही यह भी स्वीकार किया गया है कि वे वश में करना कठिन हैं और अनियंत्रित होने पर भस्म करने वाली शक्ति बन सकते हैं। प्रार्थना का समापन विजययुक्त समृद्धि, वृद्धि तथा संघर्षों में रक्षा की याचना से होता है।

7 mantras | Rishi: Vasiṣṭha (probable for 5.9) | Devata: Agni (Jātavedas)

Chandas: Gāyatrī/Anuṣṭubh-like short meter (uncertain from single verse; requires scan of full hymn 5.9)

Sukta 10

Sukta 5.10

यह संक्षिप्त अग्नि-सूक्त अग्नि-पुरोहित से प्रार्थना करता है कि वह “ओजिष्ठ द्युम्न”—अर्थात् सबसे प्रबल दीप्तिमान शक्ति—को यहाँ लाए, और विजय, धन तथा बल (वाज) की ओर जाने वाला खुला मार्ग प्रशस्त करे। यह उन जनों की स्तुति करता है जिनके प्रेरित वचन अग्नि को अलंकृत करते हैं और जो अंतःताप (शुष्म) के द्वारा व्यापक यश को जगाते हैं; अंत में अग्नि को अङ्गिरस् और होतृ रूप में आवाहन करता है कि वह संघर्षों के बीच सर्व-विजयी संपदा और वृद्धि प्रदान करे।

7 mantras | Devata: Agni

Sukta 11

Sukta 5.11

अग्नि को समर्पित यह संक्षिप्त सूक्त उन्हें प्रजाजनों के जाग्रत् रक्षक और वह तेजस्वी पुरोहित-शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, जो भरतों को सन्मार्ग पर ले जाती है। इसमें अग्नि की सर्वव्यापक उपस्थिति—“प्रत्येक गृह में”—पर बल दिया गया है, साथ ही उन्हें देवदूत तथा हवि-वाहक के रूप में वर्णित किया गया है। यह भी स्मरण कराता है कि अंगिरसों ने मंथन द्वारा छिपी हुई अग्नि को प्रकट कर प्राचीन काल में उसका आविष्कार किया था।

6 mantras | Devata: Agni

Sukta 12

Sukta 5.12

अग्नि को समर्पित यह संक्षिप्त त्रिष्टुभ् स्तोत्र ऋषि की “सुपरिशोधित” वाणी को आहुति के रूप में प्रस्तुत करता है और अग्नि की स्तुति सत्य-धारक, व्यापक वृषभ (वृषन्) के रूप में करता है, जो यज्ञ में ऋत की स्थापना करता और उसकी रक्षा करता है। यह पूछता है—शत्रु शक्तियों को कौन बाँधता है, असत्य से अग्नि के भाग की कौन रखवाली करता है, और “वचन” को कौन सुरक्षित रखता है—इस संकेत के साथ कि सुव्यवस्थित कर्मकाण्ड, संयमित वाणी और दैवी संरक्षण मिलकर उपासक के लिए विजय और स्थिर निवास सुनिश्चित करते हैं।

6 mantras | Rishi: Vasiṣṭha (traditional attribution for RV 5.12) | Devata: Agni

Chandas: Triṣṭubh

Sukta 13

Sukta 5.13

अत्रि का यह संक्षिप्त अग्नि-सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उसे गीत से जागृत होने वाला, चुना हुआ होतृ, जो यज्ञ को व्यापक और फलदायी बनाता है। इसमें बार-बार स्तुति (अर्च्) को प्रज्वलन, संरक्षण और “बहुरंगी” समृद्धि के समीप-आगमन से जोड़ा गया है, और अग्नि को उस केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो देवताओं को यज्ञ-विधि में एकत्र करता है।

6 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) (attribution for RV 5.13 generally) | Devata: Agni

Chandas: Gāyatrī (probable for this short 3-pāda verse)

Sukta 14

Sukta 5.14

अत्रि का यह संक्षिप्त अग्नि-सूक्त स्तुति और समिधा द्वारा अग्नि को जाग्रत होने के लिए बुलाता है, ताकि वह यजमान की आहुतियों को देवों की सभा तक पहुँचा दे। अग्नि को नवजात प्रकाश के रूप में महिमामंडित किया गया है, जो अंधकार और शत्रु शक्तियों पर विजय पाकर “गायों/किरणों”, जलों और दीप्तिमान स्वर्ग को पुनः प्राप्त करता है, और घृत, स्तोत्रों तथा सम्यक् संकल्प से बलवान होता है।

6 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) (attribution for RV 5.14 generally) | Devata: Agni

Chandas: Gāyatrī (probable)

Sukta 15

Sukta 5.15

यह संक्षिप्त अग्नि-सूक्त अग्निदेव की स्तुति करता है—उन्हें बुद्धिमान, प्राचीन ऋषि तथा धन-समृद्धि और स्थैर्य के धारक के रूप में, जो घृत से प्रज्वलित और परिशुद्ध किए जाते हैं। इसमें अग्नि को यज्ञ-चक्रों में सदा नव-नव जन्म लेने वाला, शत्रुता को दूर भगाने वाला उग्र रक्षक, और गुहा में छिपे हुए “पदचिह्न” के रूप में बताया गया है, जो महान ऐश्वर्य को जगाता है और अत्रि को अंधकार के पार ले जाता है।

5 mantras | Devata: Agni

Sukta 16

Sukta 5.16

यह संक्षिप्त वसिष्ठ-स्तुति अग्नि की प्रशंसा करती है—उज्ज्वल, निरन्तर बढ़ती ज्वाला—जिसे मनुष्य विश्वस्त मित्र और मार्गदर्शक मानकर “अग्र में” स्थापित करते हैं। इसमें अग्नि से प्रार्थना है कि वह समुदाय के लिए बल संचित करे, संघर्षों में रक्षा करे, और वाऽर्य (वांछित समृद्धि) प्रदान करे, तथा स्वस्ति (कल्याण) का सुरक्षित आधार/आश्रय स्थापित करे।

5 mantras | Devata: Agni

Sukta 17

Sukta 5.17

वसिष्ठ का यह संक्षिप्त अग्नि-सूक्त सुगठित यज्ञ के द्वारा मर्त्य उपासक को “अधिक शक्तिशाली” दिव्य सहायक के निकट ले आता है और अग्नि की स्तुति रक्षक, पथप्रदर्शक तथा वृद्धि करने वाले के रूप में करता है। अग्नि को दीप्तिमान, ब्रह्माण्डीय रूपकों में चित्रित किया गया है—ज्वाला से आवृत, प्रेरित वाणी से संचालित—और कवि उनसे प्रार्थना करता है कि वे वांछित कल्याण की रक्षा करें, कुशल-क्षेम प्रदान करें तथा संघर्षों में बल के लिए प्रज्वलित हों।

5 mantras | Rishi: Vasiṣṭha | Devata: Agni

Chandas: Triṣṭubh (likely)

Sukta 18

Sukta 5.18

यह संक्षिप्त सूक्त उषाकाल में अग्नि की स्तुति करता है—अतिथि, दिव्य अतिथि के रूप में, जिसे अग्नि और आहुति के द्वारा मनुष्य के गृह में आदरपूर्वक आमंत्रित किया जाता है। अग्नि को अमर कहा गया है जो मर्त्य आहुतियों में आनंद लेता है, रथ की भाँति अविघ्न आगे बढ़ता है, और उदार यजमानों की कीर्ति तथा समृद्धि को बढ़ाता है।

5 mantras | Rishi: Vasiṣṭha (Book 5 attribution) | Devata: Agni (as Atithi, the Guest)

Chandas: Triṣṭubh (likely)

Sukta 19

Sukta 5.19

यह संक्षिप्त अग्नि-सूक्त माता के भीतर अग्नि के गुप्त जन्म का चिंतन करता है—आवरणों में छिपी हुई और फिर विशिष्ट रूप में प्रकट। यह अग्नि की दीप्तिमान, प्राणवर्धक शक्ति की स्तुति करता है, जो जनसमुदायों और समृद्धि को बढ़ाती है; और वायु व भस्म के साथ चलती किरण/ज्वाला के रूप में उसके गतिशील क्रीड़ा-स्वभाव का स्मरण कराता है, जो कर्म के लिए अपनी शक्तियों को तीक्ष्ण करता है।

5 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) (traditional attribution for much of Mandala 5; exact verse-level attribution may vary by recension) | Devata: Agni (esoteric birth of Agni in the Mother; common Vedic theme: Agni born in waters/wood/earth)

Chandas: Tristubh (probable)

Sukta 20

Sukta 5.20

अत्रि-ऋषियों का यह संक्षिप्त अग्नि-सूक्त अग्नि का आह्वान करता है कि वे ऐसा धन प्रदान करें जो सचमुच “श्रवणीय” हो और देवताओं के अनुकूल हो। इसमें अग्नि को होतृ चुना गया है—प्राचीन, यज्ञ में अग्रणी—जो दक्ष (सम्यक कौशल/विवेक-शक्ति) को परिपक्व करते हैं और उपासक को ऋत-आधारित समृद्धि, प्रकाश (गाएँ/किरणें) तथा वीर-बल की ओर ले जाते हैं।

4 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Agni

Chandas: Gayatri (probable for RV 5.20.1; exact syllable-count not computed here)

Sukta 21

Sukta 5.21

यह संक्षिप्त अग्नि-सूक्त अग्नि का “मनुष्यवत्” (manuṣvat) आह्वान करता है और प्रार्थना करता है कि यज्ञाग्नि को विधिपूर्वक स्थापित कर प्रज्वलित किया जाए, ताकि वह देवताओं तक उपासना/हविर्भाग पहुँचा सके। अग्नि की स्तुति इस रूप में की गई है कि समस्त देवगण एकमत होकर उसे अपना दूत (dūta) चुनते हैं; और उससे निवेदन है कि वह तेजस्वी होकर प्रज्वलित हो तथा “ऋत के गर्भ” में, अर्थात् उस सुव्यवस्थित सत्य में, अपना आसन ग्रहण करे जो वृद्धि और समृद्धि को धारण करता है।

4 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Agni

Chandas: Gayatri (probable; short 3-pāda structure typical of many Agni invocations—verify in critical edition)

Sukta 22

Sukta 5.22

यह संक्षिप्त आत्रेय सूक्त अग्नि को शुद्ध करने वाली ज्वाला और यज्ञ के प्रिय होतृ के रूप में आवाहन करता है, और उनसे प्रार्थना करता है कि वे कवियों की प्रेरित वाणी को पहचानकर स्वीकार करें। इसमें अग्नि को विवेकशील मन वाले, चुने हुए दिव्य रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, तथा आत्रि-वंश को उन लोगों के रूप में उभारा गया है जो स्तोत्रों और गिराओं द्वारा अग्नि को “वर्धित” करते और अलंकृत करते हैं। इसका उद्देश्य अनुष्ठानिक और भक्तिपरक है—अग्नि की उपस्थिति को प्रज्वलित करना, उनकी सहायता सुनिश्चित करना, और उनके उज्ज्वल मार्गदर्शन में यज्ञ को निर्विघ्न आगे बढ़ाना।

4 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) (explicitly referenced atri-vat; hymn in Atri collection) | Devata: Agni

Chandas: Trishtubh (probable; verify in critical edition)

Sukta 23

Sukta 5.23

यह संक्षिप्त अग्नि-सूक्त अग्निदेव से ‘सहन्तम’—अर्थात् शत्रुबल को दबाकर आगे बढ़ने वाली, तेजस्वी और सर्वाधिक विजयी संपदा (रयि, द्युम्न) लाने की प्रार्थना करता है। इसमें अग्नि को सभी जनों द्वारा खोजे जाने वाले प्रिय होतृ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, और अंत में उपासकों के घरों में अग्नि के उज्ज्वल रूप से प्रज्वलित रहने, समृद्धि तथा रक्षा प्रदान करने की सीधी याचना की गई है।

4 mantras | Devata: Agni

Sukta 24

Sukta 5.24

यह संक्षिप्त अग्नि-सूक्त एक रक्षात्मक प्रार्थना है: कवि अग्नि से निवेदन करता है कि वे उपासकों के लिए सबसे निकट उपस्थित (अन्तम) और अडिग आश्रय/रक्षा-कवच (वरूथ्य) बनें। अग्नि को जगने, पुकार सुनने, अपनी रक्षण-शक्ति का विस्तार करने और समुदाय को शत्रुतापूर्ण अभिप्राय से बचाने के लिए आह्वान किया गया है। सूक्त का समापन पवित्र कर्म में लगे अपने साथियों के लिए अग्नि की कृपा और मंगलमय कल्याण की याचना में होता है।

4 mantras | Devata: Agni

Sukta 25

Sukta 5.25

यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—वे दिव्य सहायक हैं जो सच्चे यजमान को धन, यश और बलवान् सन्तान प्रदान करते हैं तथा उपासक की शत्रु-शक्तियों से रक्षा करते हैं। अग्नि को सत्यस्वरूप, ऋषि-प्रसूत तेज के रूप में आह्वान किया गया है, जो भक्त को वैर-भाव से परे ऐसे ‘पार उतारते’ हैं जैसे जहाज़ संकटमय जल को पार कराता है। इसका उद्देश्य यज्ञकर्म की सिद्धि और आशीर्वाद, तथा विरोध से परे सुरक्षित गमन—दोनों है।

9 mantras | Devata: Agni

Sukta 26

Sukta 5.26

यह सूक्त अग्नि का आह्वान करता है—उन्हें तेजस्वी शुद्धिकर्ता और दिव्य पुरोहित के रूप में, जिनकी “जिह्वा” हवि को वहन करती है और देवों को यज्ञ में बुलाती है। इसमें अग्नि से प्रार्थना है कि वे पवित्र बर्हिस् (यज्ञासन) पर देवताओं को विराजमान करें और सोम-पीड़न करने वाले उपासक को बल तथा वीर्यपूर्ण पराक्रम (सुवीर्य) प्रदान करें। अंत में यह निमंत्रण व्यापक होकर पूर्ण देव-सभा तक पहुँचता है—मरुत्, अश्विनौ, मित्र, वरुण और समस्त देव—जिससे एक पूर्ण, सुव्यवस्थित यज्ञ का संकेत मिलता है।

9 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) (Mandala 5 Agni hymns generally Ātreya; verify per Anukramaṇī for RV 5.26) | Devata: Agni

Chandas: Gayatri (likely for RV 5.26 opening; verify by syllable count)

Sukta 27

Sukta 5.27

यह संक्षिप्त सूक्त अग्नि को वैश्वानर—सर्वव्यापी अग्नि और प्रभुत्वशाली शक्ति—के रूप में स्तुत करता है, जो जगत में समृद्धि और ऋत (धर्म-व्यवस्था) को प्रत्यक्ष करता है। त्रि-अरुण के दान-प्रसंग के माध्यम से अग्नि की महिमा का निरूपण किया गया है, और सूक्त की सिद्धि को यज्ञीय वाणी/ऋच् (वाक्) तथा अश्वमेध-परिस्थिति से जोड़ा गया है। अंत में इन्द्र–अग्नि का संयुक्त आह्वान किया गया है कि वे क्षत्र (राजस/सार्वभौम पराक्रम) को स्थिर रखें।

6 mantras | Devata: Agni Vaiśvānara (with praise that also frames a bountiful lordly power; donor-context with Tri-aruṇa)

Sukta 28

Sukta 5.28

यह संक्षिप्त सूक्त प्रज्वलित, स्वर्ग तक पहुँचने वाली ज्वाला-रूप अग्नि की स्तुति करता है, जिसकी प्रभा पूर्व से आती उषा (प्रभात) से मिलती है, जब वह समस्त वांछनीय वरदान लेकर आती है। इसमें उषा के प्रकाश से जगत के जागरण को यज्ञ के जागरण से जोड़ा गया है और उपासकों से आग्रह किया गया है कि वे अग्नि को हव्यवाहन—देवों तक आहुतियों का सुनिश्चित वाहक—के रूप में चुनें।

6 mantras | Devata: Agni (with strong presence of Uṣas as accompanying power)

Sukta 29

Sukta 5.29

यह सूक्त इन्द्र की स्तुति करता है—उन्हें मरुतों का अडिग, सर्वज्ञ नेता बताकर—और उनकी जगत्-व्यवस्था स्थापित करने वाली शक्ति तथा सर्प (अहि), अर्थात् अवरोध के आदिरूप, पर उनके निर्णायक विजय का उत्सव मनाता है। इसमें ‘तीन’ का रूपक बार-बार आता है (अर्यमन् की विधि, दीप्तिमान लोक, धाराएँ/जल), जिसके द्वारा इन्द्र की जीत को ब्रह्माण्डीय ऋत की पुनर्स्थापना तथा जीवनदायी जल और प्रकाश के मुक्त होने के रूप में दिखाया गया है। अंत में ऋषि इन्द्र को नव-निर्मित ब्रह्मन् (स्तुतिकला) अर्पित करता है और प्रार्थना की तुलना सुगठित वस्त्र तथा सुचिन्तित, सुदृढ़ रथ से करता है।

15 mantras | Devata: Indra (with Maruts in attendance; Aryaman mentioned as principle of order)

Sukta 30

Sukta 5.30

यह सूक्त इन्द्र की स्तुति करता है—वे शीघ्र आने वाले, सोम-प्रिय वीर हैं, जो आह्वान का उत्तर देते हैं और शत्रु शक्तियों को तोड़ते हैं, विशेषतः उन दस्यु बलों को जो प्रकाश, गौ-धन और समृद्धि को रोकते हैं। इसमें प्रशंसा के साथ सजीव युद्ध-चित्रण बुना है—इन्द्र का युद्ध के लिए बढ़ना, छिपी हुई “गायों” (धन/प्रकाश) को प्रकट करना—और अंत में ऋषि ठोस प्राप्तियों तथा विजय के यज्ञीय चिह्नों का स्मरण करता है।

14 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Indra

Chandas: Trishtubh (probable)

Sukta 31

Sukta 5.31

यह सूक्त इन्द्र की स्तुति करता है—रथारूढ़, अजेय शक्ति के रूप में, जो मार्ग को प्रशस्त करता है, ‘पशुओं’ (धन और ऊर्जाओं) को सुव्यवस्थित करता है और अग्रभाग में रहकर सुरक्षित नेतृत्व देता है। इसमें अहि/वृत्र तथा शुष्ण की छलपूर्ण मायाओं पर उनकी निर्णायक विजय का स्मरण है, और यह प्रतिपादित करता है कि इन्द्र अवरोधों को तोड़ते हैं, दस्युओं को दूर भगाते हैं तथा अपने भक्तों में बल की स्थापना करते हैं। प्रार्थना का समापन रक्षात्मक आशीर्वाद से होता है: जो इन्द्र में आनन्द लेते हैं वे अहित से बचे रहें और ओजस् (जीवन-बल) से सम्पन्न हों।

12 mantras | Rishi: Atri Bhauma (Ātreya) (traditional for RV 5.31) | Devata: Indra

Chandas: Triṣṭubh (probable; confirm via metrical audit)

Sukta 32

Sukta 5.32

यह सूक्त इन्द्र की स्तुति करता है—विघ्नों के भेदक के रूप में: वह पर्वत को चीरता है, रोके गए जलों को मुक्त करता है, और उन जीवनदायी धाराओं को रोकने वाले दानव (दानव) का वध करता है। इसमें इन्द्र के अजेय वज्र-पराक्रम को एक ब्रह्माण्डीय कर्म के रूप में गाया गया है, जो ऋत (सम्यक् व्यवस्था) को पुनः स्थापित करता है और ऋषियों तथा उनके समुदाय के लिए समृद्धि का मार्ग खोलता है। अंत में स्वर चिंतनशील हो उठता है—यह प्रश्न करता है कि ब्रह्मन् (पवित्र वाणी/यज्ञकर्म) के प्रति समर्पित जन इन्द्र के उदार, ऋतु-संगत दान को रोकने का प्रयास क्यों करें।

12 mantras | Devata: Indra

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 33

Sukta 5.33

अत्रि का यह सूक्त इन्द्र की अतुलनीय शक्ति और युद्ध में विजय दिलाने वाली सहायता की स्तुति करता है, और उनसे प्रार्थना करता है कि वे “सुमति” (सद्बुद्धि/कल्याणकारी मन) जगाएँ तथा उपासकों को विजयी पराक्रम प्रदान करें। इसमें इन्द्र की सर्प-विध्वंसक सामर्थ्य और उनके कृपालु धन-दान का स्मरण है; समृद्धि को दिव्य-प्रेरित “संग्रह” के रूप में दिखाया गया है—जैसे गौएँ सुरक्षित गोठ में आकर एकत्र होती हैं।

9 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Indra

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 34

Sukta 5.34

ऋग्वेद 5.34 अत्रि-परम्परा का स्तोत्र है, जो सोम-पीषण के माध्यम से इन्द्र का आह्वान करता है और उनकी ‘अजातशत्रु’ (जिसमें वैर का जन्म नहीं) तथा ‘ब्रह्म-वाहस्’ (वाणी/ब्रह्म के वाहक) रूप में स्तुति करता है। यह अनुशासित, हवि अर्पित करने वाले सोम-पीषकों की तुलना उन लोगों से करता है जो सोम नहीं पीषते, और इन्द्र को उस शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है जो ऋत/विश्व-व्यवस्था को गतिमान करती है, अवरोधक शक्तियों को दबाती है, और यज्ञ को विजय तथा वृद्धि की ओर अग्रसर करती है।

8 mantras | Rishi: Atri (Ātreya tradition; Mandala 5 is predominantly attributed to the Atris) | Devata: Indra (with ritual actions of Soma pressing; Indra as brahma-vāhas, bearer of the Word)

Chandas: Trishtubh (likely; RV 5.34 is predominantly Triṣṭubh)

Sukta 35

Sukta 5.35

अत्रि-परंपरा का यह इन्द्र-सूक्त देव से प्रार्थना करता है कि वह अपना सर्वाधिक “प्रभावी संकल्प” (क्रतु) सक्रिय सहायता के रूप में लाए और उसे उपासकों के लिए प्रतिस्पर्धाओं तथा नित्य संघर्ष में विजयकारी शक्ति बना दे। साथ ही यह इन्द्र से निवेदन करता है कि वह शत्रुतापूर्ण, विरोधी प्रेरणाओं को दबा दे और गायक-ऋषियों के रथ—उनकी अग्रसर गति का प्रतीक—की रक्षा करे, ताकि उनका स्तवन और यश “स्वर्ग में”, अर्थात् सत्य के प्रकाशमय लोक में, प्रतिष्ठित हो।

8 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) (Mandala 5 default attribution) | Devata: Indra

Chandas: Gayatri (likely for RV 5.35.1; many short Indra verses are Gāyatrī—needs metrical confirmation)

Sukta 36

Sukta 5.36

यह सूक्त सोम-आह्वान का तात्कालिक और उत्कट निवेदन है, जिसमें कवि इन्द्र—धन के ज्ञाता और दाता—को सोम-पीषण-स्थल पर आने और भली-भाँति तैयार किए गए सोम का पान करने के लिए बुलाता है। पीषण-पाषाण, दुहा हुआ/दुग्ध-मिश्रित सोम आदि सजीव यज्ञ-चित्रों से आह्वान को तीव्र किया गया है और इन्द्र से ‘बाएँ और दाएँ’ दोनों ओर से धन-समृद्धि देने की प्रार्थना की गई है। अंत में इन्द्र की युवावस्था-जनित शक्ति तथा मरुतों के साथ उनके संबंध का स्मरण किया गया है।

6 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) (book 5 Atri corpus; verify exact rishi for RV 5.36 via Anukramaṇī) | Devata: Indra

Chandas: Jagati (likely due to longer pādas; verify)

Sukta 37

Sukta 5.37

यह संक्षिप्त इन्द्र-स्तोत्र उस यजमान की प्रशंसा करता है जो “इन्द्र के लिए सोम निचोड़ता” है। उसे सूर्य-दीप्ति के साथ अग्रसर बताया गया है, और उषाएँ उसके यज्ञ के लिए सुनिश्चित पथ खोल देती हैं। इन्द्र की विजयी रथ-शक्ति अनेक बलों को अपने चारों ओर समेट लेती है, और स्तुति यह पूर्णता का वचन देती है—शान्ति स्थिर काल में और संग्राम में विजय—उस सोम-प्रदाता को, जो सूर्य और अग्नि की कृपा प्राप्त करता है।

5 mantras | Devata: Indra (with solar/dawn imagery as supportive powers)

Chandas: Trishtubh (probable; requires metrical verification)

Sukta 38

Sukta 5.38

इन्द्र को समर्पित यह संक्षिप्त सूक्त उनकी उदारता की व्यापकता और उनकी रक्षा-शक्ति के दूरगामी प्रभाव की स्तुति करता है, तथा उपासकों के ‘द्युम्न’—दीप्तिमान बल और विजयी ऊर्जाएँ—बढ़ाने की प्रार्थना करता है। इसमें इन्द्र के प्रचण्ड पराक्रम (शुष्म) का स्मरण है, जो भक्तों के हित में स्वर्ग और चलायमान पृथ्वी-क्षेत्र—दोनों पर शासन करता है; और अंत में यह विनती करता है कि हम उनके आश्रय (शर्मन्) में सुरक्षित निवास करें, उनकी सहायता से भली-भाँति संरक्षित रहें।

5 mantras | Devata: Indra

Chandas: Gayatri (probable for RV 5.38; requires metrical verification)

Sukta 39

Sukta 5.39

इन्द्र को समर्पित अत्रि का यह संक्षिप्त सूक्त विजयी सामर्थ्य के देव से प्रार्थना करता है कि वह अपनी “दीप्त, उमड़ती” संपदा और बल को बिना कंजूसी के उँडेल दे, और “दोनों हाथों से” समृद्धि प्रदान करे। इसमें इन्द्र की प्रसिद्ध दान-इच्छा (प्रराध्यम) का प्रतिपादन है, जो अडिग को भी झुका सकती है; और अंत में अत्रिगण अपने अभिषिक्त स्तवन के आत्म-जागरूक कर्म पर पहुँचते हैं—वाणी, जो ब्रह्म-धारिणी शक्ति के रूप में दीप्त हो उठती है।

5 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Indra

Chandas: Trishtubh (probable)

Sukta 40

Sukta 5.40

यह सूक्त इन्द्र को सोम-स्वामी और परम वृत्रहन्ता के रूप में आवाहन करता है कि वे शीघ्र पिसे हुए सोम के पास आएँ और यजमान को विजयकारी बल प्रदान करें। इसके बाद प्रसिद्ध अत्रि-आख्यान का वर्णन होता है: दैत्य स्वर्भानु सूर्य को अन्धकार से ढक देता है, लोकों में भ्रम फैल जाता है, और अत्रिगण—अपनी प्रज्ञा तथा मन्त्र-शक्ति से—छिपे हुए सूर्य को पुनः प्रकट कर प्रकाश और ऋत-व्यवस्था को स्थापित करते हैं।

9 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) (Mandala 5 context; RV 5.40 also Atri-associated) | Devata: Indra (Soma-pati, Vṛtrahantama)

Chandas: Gayatri (probable refrain-like compact form; exact meter not guaranteed from provided data)

Sukta 41

Sukta 5.41

ऋग्वेद 5.41 एक व्यापक प्रार्थना है, जो ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) के रक्षक मित्र–वरुण से आरम्भ होकर यजमान की रक्षा, बल, समृद्धि और सुरक्षित गमन की याचना करती है। आगे चलकर यह सूक्त मानो ‘सर्व-शक्तियों’ का आवाहन बन जाता है—अन्य देवताओं तथा प्रकृति के रक्षकों (आपः, ओषधियाँ, द्यौः, वन, पर्वत) को भी उपचार, संरक्षण और कल्याण के लिए पुकारता है—और अंत में उपासकों पर पोषणकारी परिपूर्णता उँडेल दिए जाने की संक्षिप्त कामना के साथ समाप्त होता है।

20 mantras | Rishi: Kaṇva (Kaṇva lineage; RV 5.41 is traditionally Kaṇva hymn) | Devata: Mitra-Varuṇa

Chandas: Triṣṭubh (probable; requires metrical check)

Sukta 42

Sukta 5.42

ऋग्वेद 5.42 एक व्यापक रक्षात्मक और समृद्धि-प्रार्थना वाला सूक्त है, जो आदित्यों—विशेषतः वरुण, मित्र, भग और अदिति—के पास “शान्ति-वाहक” प्रार्थना भेजता है और ऋत (सही व्यवस्था), सुरक्षित गमन तथा कल्याण की याचना करता है। यह मरुतों और अश्विनों जैसे सहायक देव-बलों का भी आह्वान करता है कि वे शत्रुतापूर्ण शक्तियों को दूर करें और उपासक व समुदाय को धन, बल तथा “अमृत” सद्भाग्य प्रदान करें।

18 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) (common attribution for RV 5.42; medium certainty) | Devata: Varuṇa, Mitra, Bhaga, Aditi; and a fivefold priest-power (often Savitṛ/Agni as hearer in interpretive traditions)

Chandas: Jagatī (probable; verification recommended)

Sukta 43

Sukta 5.43

ऋग्वेद 5.43 में विश्वेदेवाः का व्यापक आह्वान है, जिन्हें पोषण देने वाली, आनंद-वर्धक शक्तियों के रूप में देखा गया है—जो यजमान के जीवन में समृद्धि का “दूध और मधु” उँडेलती हैं। स्तुति में प्रमुख दिव्य सहायकों (विशेषतः पूषन् और वायु, और अंत में अश्विनौ) का स्मरण करते हुए, यह सूक्त रयि (पूर्ण समृद्धि), वाज (प्रभावी बल और विजय), मार्गदर्शन, संरक्षण तथा “अमृत” सद्भाग्य की याचना करता है।

17 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) (traditional for RV 5.43) | Devata: Viśve Devāḥ / nourishing powers (often read as a broad all-gods invocation with symbolic ‘seven’ powers)

Chandas: Jagatī or Triṣṭubh (needs metrical verification; verse length suggests Jagatī tendencies)

Sukta 44

Sukta 5.44

यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उन्हें सबसे प्राचीन और सदा नूतन होने वाली पुरोहित-शक्ति के रूप में, जो बर्हिष् पर आसीन हैं, ‘सूर्य-लोकों के अन्वेषक’ हैं, और प्रेरित वाणी द्वारा ‘दुहे’ (आहूत/उद्भूत) किए जाते हैं। यह परंपरागत यज्ञ-विधि से अग्नि के आवाहन से आरम्भ होकर उन्हें तेजस्वी रक्षक के रूप में चित्रित करता है, जो छलपूर्ण शक्तियों पर विजय पाते हैं; और अंत में यह घोषणा करता है कि अग्नि जाग्रत हो उठे हैं तथा ऋक्, सामन् और सोम—तीनों—मित्र और सहवास-निवास के रूप में उन्हीं पर आकर एकत्र होते हैं।

15 mantras | Devata: Agni (probable, based on barhiṣad, svàr-vid, and milking by hymn; hymn 5.44 is classically Agni-oriented in many traditions)

Sukta 45

Sukta 5.45

अत्रि-परंपरा का यह सूक्त उषस्–सूर्य-समुच्चय की स्तुति करता है—उस तेजस्वी शक्ति की, जो अंधकार को चीरकर अस्पष्टता को खोल देती है, मनुष्यों के लिए “द्वार खोलती” है, और यजमान को स्वर्ग/प्रकाश की ओर ऊपर ले जाती है। इसमें बार-बार ‘धी’ (प्रेरित बुद्धि) को वह क्रियाशील बल माना गया है, जिसके द्वारा छिपी हुई “गाएँ/प्रकाश” मुक्त होते हैं, नवग्व अपने मार्ग/पारगमन को सिद्ध करते हैं, और उपासक को दैवी संरक्षण तथा संकट से मुक्ति प्राप्त होती है।

11 mantras | Rishi: Atri Bhauma (Mandala 5 Atri corpus; 5.45 likewise Atri tradition) | Devata: Uṣas / Sūrya complex (Dawn powers opening the way; solar aid present)

Chandas: Trishtubh

Sukta 46

Sukta 5.46

यह आत्रेय परम्परा का सूक्त यजमान की यात्रा के लिए मार्गदर्शन, संरक्षण और ऋत (सही गति/व्यवस्था) के समन्वित बलों के रूप में विश्वे देवाः का आह्वान करता है। यह एक तीव्र बिंब से आरम्भ होता है—अन्तःस्थ ‘विद्वान’ स्वयं को अश्व की भाँति जुताकर पथों पर सीधा आगे ले चलता है—फिर मरुत्, बृहस्पति, पूषन् और आदित्यों का समावेशी आह्वान करता है; और अंत में देवपत्नी (देवताओं की सहचरी देवियाँ) को जगाकर दिव्य लय/ऋत-गति को प्रवाहित करने के लिए प्रेरित करता है।

7 mantras | Rishi: Atri (Ātreya tradition) (book 5 general attribution; RV 5.46 hymn attribution follows the same family tradition) | Devata: All-gods/Guiding Intelligence (implicit); verse foregrounds the inner leader ‘vidvān’ rather than a single named deity

Chandas: Triṣṭubh (probable; verify metrically)

Sukta 47

Sukta 5.47

यह संक्षिप्त आत्रेय सूक्त एक रहस्यमयी स्त्री-स्वरूप ब्रह्माण्डीय शक्ति का आह्वान करता है—जिसे प्रायः उषस् (प्रभात) की छवि या महान मातृ-तत्त्व के रूप में समझा जाता है—जो “जागती” है और पितृों (पूर्वजों) को यज्ञ में उनके आसन पर बुलाती है। इसके बाद सूक्त संक्षिप्त ब्रह्माण्डीय पहेलियों (संख्याएँ और “प्रकाश की गौएँ”) की ओर मुड़ता है, जो जगत् की सुव्यवस्थित गर्भधारण-प्रक्रिया का वर्णन करती हैं, और अंत में मित्र–वरुण, अग्नि तथा विशाल द्यौ (विस्तीर्ण स्वर्ग) के संरक्षण में कल्याण, दृढ़ पग-स्थिरता और सुरक्षित गमन की प्रार्थना के साथ समाप्त होता है।

7 mantras | Rishi: Atri (Ātreya tradition) (book 5) | Devata: Ambiguous/poetic: a feminine power (often read as Uṣas or a maternal cosmic principle) and the Pitṛs; hymn moves into ancestral/cosmic imagery

Chandas: Triṣṭubh (probable; confirm in critical edition)

Sukta 48

Sukta 5.48

यह संक्षिप्त सूक्त एक ‘मायिनी/मायिन्’—रूप-रचयिता शक्ति—का चिंतन करता है, जो मेघ में जलों को समेटती है और विस्तृत लोक-परिसर को फैलाती है; साथ ही वज्रधारी बल का भी संकेत देता है, जो दिन और रात का क्रम स्थापित करता है। अंत में वरुण का नाम लिया गया है—सुन्दर वस्त्रधारी, चतुर्मुखी शक्ति—जिसकी व्यापकता मापी नहीं जा सकती; और उसी से भाग तथा सविता जैसे विभाजक और प्रेरक देव वांछित धन प्रदान करते हैं।

5 mantras | Devata: Unclear in isolation; verse imagery suggests a cosmic formative power spreading waters in the cloud (often linked in RV diction to Parjanya/Indra’s rain-action or to a goddess-like māyā-power).

Sukta 49

Sukta 5.49

यह संक्षिप्त सूक्त सवितृ और भग को जीवन-वर्धक धन के दिव्य वितरक के रूप में प्राप्त करने की प्रार्थना करता है, और अश्विनों को प्रतिदिन के साथी तथा सहायक के रूप में आमंत्रित करता है। आगे यह अनेक देवताओं की सामूहिक स्तुति में विस्तार पाता है, जो शुभ दिनों की रचना करते हैं और विघ्नों को दूर करते हैं; अंत में यह व्यापक पथ तथा द्यावा-पृथिवी के पोषक आश्रय के लिए प्रार्थना के साथ समाप्त होता है।

5 mantras | Devata: Savitṛ and Bhaga; also Aśvins invoked for daily companionship

Sukta 50

Sukta 5.50

यह संक्षिप्त आत्रेय सूक्त देव को ‘नेतृ’—दिव्य मार्गदर्शक—के रूप में आवाहन करता है, जो मनुष्य को सन्मार्ग पर ले चलता है और मित्रता, संरक्षण तथा रयि (द्रव्य/समृद्धि) और द्युम्न (तेजस्वी शक्ति) की वृद्धि प्रदान करता है। इसमें एक व्यक्तिगत आकांक्षा—नेतृ के सान्निध्य/संग को चुनना—के साथ एक यज्ञीय‑सामाजिक प्रार्थना भी जुड़ी है: अतिथियों का स्वागत हो, पत्नियों (सहायक सहचरी‑शक्तियों) का सम्मान हो, और पथ से वैर‑विरोध को दूर भगाया जाए। सूक्त का समापन ‘शम्’ (शांति‑आशीष) में होता है, जो रथ‑स्वामी से संबद्ध है—वही जो गति को सुरक्षित रूप से कल्याण (स्वस्ति) की ओर संचालित करता है।

5 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Deva as Netṛ (the Divine Leader/Guide) (often read as Savitṛ/Pūṣan-like guiding power; hymn context needed for precision)

Chandas: Gāyatrī/Anuṣṭubh-like brevity is possible, but Mandala 5 commonly uses Triṣṭubh; requires metrical verification

Sukta 51

Sukta 5.51

यह सूक्त अग्नि की आमंत्रणात्मक स्तुति है—उन्हें याज्ञिक पुरोहित-अग्नि के रूप में पुकारता है जो सोम-पीड़न के अवसर पर देवताओं को उपस्थित कराते हैं और हवि को विधिपूर्वक पहुँचाते हैं। इसमें बार-बार देवताओं के ‘सजूह’ (एकमत/समवेत) होने पर बल दिया गया है—मित्र-वरुण, सोम, विष्णु और विश्वे देवाः—ताकि यज्ञ एक ही, समरस कर्म बन जाए। अंत में भाव आशीर्वचनात्मक हो जाता है: सूर्य और चन्द्रमा के समान सुरक्षित, सुव्यवस्थित पथ की याचना की जाती है, और ऐसी समुदाय-व्यवस्था की भी, जो दान करे, ज्ञान रखे, और कल्याण में पुनः एकत्र हो।

12 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Agni (with the Viśve Devāḥ implied as companions)

Chandas: Gāyatrī (likely, given short three-pāda structure typical of invitations; needs counting to confirm)

Sukta 52

Sukta 5.52

यह सूक्त मरुतों—युवक तूफ़ानी देवों—का प्रबल आह्वान है। इसमें उनकी सीधी, कपट-रहित कीर्ति, गर्जन-भरी शक्ति और उन तीव्र रथों की स्तुति है जो बाधाओं को तोड़ते और समृद्धि को मुक्त करते हैं। उनसे यज्ञ में आने, गायक की यश-प्रतिष्ठा और रक्षा को दृढ़ करने, तथा राधस् (वरदान) के रूप में गौ, अश्व और विजयकारी तेज/ऊर्जा प्रदान करने की प्रार्थना की गई है। बिंब-योजना में एक ओर विश्वव्यापी तूफ़ानी क्रिया (मेघ, शिला, नदी) है, तो दूसरी ओर उपासक के भीतर उत्साह और साहस का जागरण।

15 mantras | Rishi: Śyāvāśva (as addressed; hymn in Śyāvāśva Ātreya cycle is traditional for Maruts in Mandala 5) | Devata: Maruts

Chandas: Triṣṭubh (probable; Marut hymns commonly Triṣṭubh and the verse length fits)

Sukta 53

Sukta 5.53

ऋग्वेद 5.53 मरुतों—तूफ़ानी गणों—का उग्र स्तुति-गीत है, जिसमें उनके रथों पर वेग से दौड़ने, गर्जन-भरी दीप्ति और जीवनदायी वर्षा का गुणगान किया गया है। कवि उन्हें आमंत्रित करता है कि वे नदियों और प्रदेशों को बिना बाधा पार करें, धर्मनिष्ठ नायक (सुदास) के साथ एकमत हों, और उपासक के समुदाय को रक्षा, बल तथा कल्याणकारी अनुग्रह प्रदान करें।

15 mantras | Rishi: Atri (Atraya tradition) — commonly associated with Mandala 5 hymns | Devata: Maruts

Chandas: Trishtubh (probable for RV 5.53; verse-level confirmation recommended)

Sukta 54

Sukta 5.54

ऋग्वेद 5.54 अत्रि-परम्परा का स्तोत्र है, जिसमें मरुतों का आवाहन किया गया है—वे विद्युत्-दीप्त, पर्वतों को कंपाने वाले, गर्जन-गति से अग्रसर होने वाले तूफ़ानी गण हैं, जिनकी ध्वनिमय चाल बाधाओं को हटाती और जगत् में ऊर्जा भरती है। कवि उनकी दूरगामी सामर्थ्य की स्तुति करता है—सूर्य के पथ के समान शीघ्र—और उनसे रक्षक सान्निध्य, विजयी बल, तथा शत्रु शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष में सत्य-संलग्न सहायता की याचना करता है।

15 mantras | Rishi: Atri (Ātreya tradition) (attributed for RV 5.54 as a whole) | Devata: Maruts (storm-host; dynamic powers allied to Indra)

Chandas: Trishtubh (probable for RV 5.54; verse-length and cadence align with triṣṭubh norms)

Sukta 55

Sukta 5.55

यह सूक्त मरुतों की स्तुति करता है—वे दीप्तिमान, सुसज्जित शस्त्रधारी वायु-तूफ़ानी देव हैं, जो सुयोजित अश्वों के साथ तीव्र गति से चलते हैं और जिनके रथ शुभ पथ पर अग्रसर होते हैं। उनसे प्रार्थना की जाती है कि वे वैर-भाव और हानि को दूर करें, उपासकों को ‘अधिक उत्तम’ (वस्यः) की ओर ले जाएँ, और हवि स्वीकार करें, जिससे समुदाय को समृद्धि (रयि) और कल्याण प्राप्त हो।

10 mantras | Rishi: Atri (Ātreya tradition) (traditional ascription for Mandala 5 Atri hymns; specific verse-level attribution follows the sukta) | Devata: Maruts

Chandas: Triṣṭubh (probable; refrain-like cadence appears through the sukta)

Sukta 56

Sukta 5.56

यह सूक्त इन्द्र के तूफ़ानी गण मरुतों को दीप्तिमान स्वर्ग से मानव-समुदाय में अवतरित होने के लिए आमंत्रित करता है। यहाँ अग्नि को मध्यस्थ के रूप में पुकारा गया है, जो उनके अवतरण का मार्ग प्रशस्त करता है और उनकी उपस्थिति को यज्ञ में प्रभावी बनाता है। सूक्त मरुतों की सघन एकता, तेजस्विता और अजेय अग्रगति की स्तुति करता है, और प्रार्थना करता है कि उनका आगमन यजमान के लिए समृद्धि, धर्म्य प्रेरणा तथा उदार सौभाग्य का प्रसाद मुक्त करे।

9 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) — probable for RV 5.56 | Devata: Maruts (invoked through Agni as mediator)

Chandas: Trishtubh (probable)

Sukta 57

Sukta 5.57

अत्रि का यह सूक्त मरुतों—रुद्र के पुत्र, ‘इन्द्र-सम्पन्न’—को एकरूप तेज में स्वर्ण रथों पर आने और कल्याण प्रदान करने के लिए आमंत्रित करता है। इसमें उनके दीप्तिमान, आँधी-सदृश पराक्रम और उनके उदार, निर्मल दानों की स्तुति है; उन्हें ऋत (विश्व-व्यवस्था) के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो सत्य को सुनते हैं और गायक की प्रार्थना को उन्नत करते हैं।

8 mantras | Rishi: Atri (Ātreya tradition) (traditional attribution for RV 5.57) | Devata: Maruts (as Rudrāsaḥ), with Indra-association

Chandas: Triṣṭubh (probable; requires hymn verification)

Sukta 58

Sukta 5.58

ऋग्वेद 5.58 में अत्रि मरुतों की एकीकृत वायु-सेना का प्रबल स्तवन करते हैं—सदा नव-नव, शीघ्रगामी रथारूढ़, और अमर ऋत-व्यवस्था में अधिपति। यह सूक्त उनके आवेगी पराक्रम और सत्य को सुनने वाली उनकी प्रवृत्ति का गुणगान करता है; फिर उसी शक्ति को प्रार्थना में बदल देता है—कि मरुत प्रसन्न हों, यजमान को समृद्ध करें, और ऋत के अनुरूप उपासक के भीतर की ‘विस्तीर्णता’ को बढ़ाएँ।

8 mantras | Rishi: Atri (Ātreya tradition; RV 5 attributed to the Atri family; this hymn is Marut-focused within that collection) | Devata: Marutaḥ (the Maruts, Rudra’s storm-host; here as collective force-powers)

Chandas: Triṣṭubh (11-syllable pādas typical for Marut hymns; verse structure aligns with Triṣṭubh cadence)

Sukta 59

Sukta 5.59

यह सूक्त मरुतों की स्तुति करता है—वे भयावह, गर्जनशील तूफ़ानी गण हैं, जिनके वेगपूर्ण आगमन से पृथ्वी काँप उठती है और जिनकी सुव्यवस्थित, पक्षी-सदृश उड़ान स्वर्ग की पर्वत-रेखाओं पर से होकर चलती है। इसमें उनके सौन्दर्य और युद्ध-वैभव, उनके तीव्र अश्वों, तथा उस शक्ति का गुणगान है जिससे वे पर्वत से मेघ-समूहों को ढीला कर वर्षा को मुक्त करते हैं और जीवन तथा यज्ञ के लिए विस्तृत अवकाश प्रदान करते हैं।

8 mantras | Rishi: Atri (Ātreya tradition) (traditional attribution for RV 5.59 to the Atris) | Devata: Marutaḥ (Maruts, Rudra’s storm-powers)

Chandas: Jagatī (probable for RV 5.59; verse-length suggests Jagatī/Triṣṭubh family—requires metrical verification)

Sukta 60

Sukta 5.60

यह सूक्त अग्नि का आह्वान करता है—विवेकशील, यथास्थान प्रतिष्ठित पुरोहित—जो उपासक के कर्म को ‘छाँटकर’ शुद्ध और पूर्ण करता है। तत्पश्चात वह मरुतों को यज्ञ में प्रवृत्त करता है, जो स्तुति को विजयी रथों की भाँति आगे ले जाने वाली गतिशील शक्ति हैं। यज्ञ-व्यवस्था (अग्नि) और तूफानी प्रेरणा (मरुत) के बीच संचरित होते हुए, यह अंततः संयुक्त सोमपान पर समाप्त होता है: अग्नि-वैश्वानर मरुत-गण के साथ दीप्तिमान पूर्व-स्वर्ग में हर्षित होता है, और समृद्धि, सम्यक् प्रेरणा तथा सफल आहुति को सुनिश्चित करता है।

8 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) (traditional for RV 5.60) | Devata: Agni (primary), with Maruts invoked in the hymn’s movement

Chandas: Triṣṭubh (probable; requires metrical verification)

Sukta 61

Sukta 5.61

यह सूक्त मरुतों को एक वीर-समूह के रूप में संबोधित करता है, जो दूरतम प्रदेशों से आते हैं; उनकी पहचान पूछी जाती है और उनकी रक्षक उपस्थिति का आह्वान किया जाता है। इसमें उनकी तीव्र, आँधी-सदृश शक्ति का स्तवन है, तथा उनकी वह क्षमता भी कि वे प्रचुरता (गोधन, बल, और पोषण की “धाराएँ”) प्रदान करें। उन्हें ऐसे सहायक मित्रों के रूप में स्मरण किया गया है जो गायक को बाधाओं के पार ले जाने में समर्थ हैं। अंत में स्वर व्यापक वैदिक प्रतीक की ओर संकेत करता है—उदार रथ-पथ का उन दीप्त “गायों” (किरणें/सम्पदा) के साथ चलना—जिससे मरुतों के दान को विश्व-व्यवस्था में प्रतिष्ठित किया जाता है।

19 mantras | Rishi: Śyāvāśva Ātreya (traditional for RV 5.61) | Devata: Maruts (likely continuation of Marut context from 5.60; ‘naraḥ’ commonly fits Maruts as heroic troop)

Chandas: Anuṣṭubh (probable; short verse)

Sukta 62

Sukta 5.62

यह सूक्त मित्र और वरुण की स्तुति करता है—ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) के युगल धारक—जिनकी सार्वभौम सत्ता सूर्य की गति और लोकों के निर्दोष शासन में सर्वाधिक स्पष्ट दिखाई देती है। इसमें उनसे प्रार्थना की गई है कि वे उपासक की अखण्ड रक्षा करें, प्रेरित बुद्धि का विस्तार करें, और अपने न्यायपूर्ण, दीप्तिमान शासन से विजय तथा कल्याण प्रदान करें।

9 mantras | Devata: Mitra-Varuṇa (dual); with Sūrya as cosmological locus

Sukta 63

Sukta 5.63

यह सूक्त मित्र और वरुण की स्तुति करता है—वे ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) के सतर्क रक्षक हैं, परम स्वर्ग में सिंहासनासीन होकर सत्य-धर्म और पवित्र विधानों को स्थिर रखते हैं। उनके शासन को दृश्य ब्रह्माण्डीय प्रक्रियाओं से जोड़ा गया है—विशेषतः सूर्य की गति और वर्षा के प्रेषण से—जिससे यह प्रकट होता है कि दिव्य व्यवस्था उनके अनुगृहीत जनों के लिए पोषण, समृद्धि और नैतिक स्थैर्य बन जाती है।

7 mantras | Rishi: Vasiṣṭha | Devata: Mitra-Varuṇa

Chandas: Triṣṭubh

Sukta 64

Sukta 5.64

यह संक्षिप्त सूक्त मित्र और वरुण—दोनों को एक साथ—रक्षक अधिराजों के रूप में आवाहन करता है, जो उपासक को बाड़े की सीमा की भाँति चारों ओर से घेरकर स्वर्ग के विस्तृत प्रकाश में जीवन की रक्षा करते हैं। उनसे प्रार्थना है कि वे सुविन्यस्त स्तुति को स्वीकार करें और आहुति-अग्नि के प्रज्वलन पर निचोड़े हुए सोम के पास शीघ्र आएँ, यजमानों और गायक-ऋषियों पर अनुग्रह बढ़ाएँ। समग्रतः यह ऋत (cosmic order), सामाजिक सौहार्द और यज्ञ की तात्कालिकता को जोड़कर संरक्षण और धर्मपूर्वक निवास की संक्षिप्त प्रार्थना बन जाता है।

7 mantras | Rishi: Vasiṣṭha | Devata: Varuṇa and Mitra (invoked together)

Chandas: Gāyatrī (opening style suggests shorter meter; exact metrical classification may vary by recension—commonly treated as gāyatrī-type in such openings)

Sukta 65

Sukta 5.65

मित्र–वरुण को समर्पित यह संक्षिप्त सूक्त ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) को धारण करने वाले आदित्यों से प्रेरित वाणी और उचित मार्गदर्शन की याचना करता है। यह संकट से बाहर निकालने हेतु मित्र की ‘विस्तृत पथ’ खोलने वाली शक्ति की स्तुति करता है और दिव्य युगल से प्रार्थना करता है कि वे एक होकर जनों का नेतृत्व करें, तथा ऋषियों और यजमानों को सुरक्षित परिधि के भीतर संरक्षण दें।

6 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Mitra–Varuṇa

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 66

Sukta 5.66

अत्रि का यह संक्षिप्त सूक्त मित्र–वरुण का आह्वान करता है, जिसमें विशेष रूप से वरुण को ‘ऋत-पेशस्’—जिसका स्वरूप/वस्त्र ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) है—के रूप में उभारा गया है। यह नश्वर उपासक को उनकी दूरदर्शी मार्गदर्शक दृष्टि के प्रति जाग्रत होने, विधिपूर्वक अर्पण करने और संरक्षण, स्पष्टता तथा अंतःस्वराज्य (स्वराज्य) की ओर अग्रसर होने का आग्रह करता है। सूक्त के पदों में यह युगल कवि-सदृश द्रष्टा के रूप में स्तुत है, जो अपने केतु (दीप्त चिन्ह) से जनों को प्रकाश देते हैं और अद्भुत शक्तियों द्वारा दक्ष और ऋत को धारण/स्थापित रखते हैं।

6 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Mitra–Varuṇa with emphasis on Varuṇa as ṛta-peśas

Chandas: Triṣṭubh (probable; needs verification)

Sukta 67

Sukta 5.67

यह संक्षिप्त सूक्त आदित्यों—विशेषतः वरुण, मित्र और अर्यमन्—की स्तुति करता है, जो सर्वज्ञ हैं और ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) के धारक हैं; जिनका व्यापक विधान सच्चा क्षत्र (सार्वभौम अधिकार) और संरक्षण प्रदान करता है। इसमें उनके स्थिर व्रत (नियत नियम) के अनुसार अविचल गमन और नश्वर मनुष्यों को अनिष्ट से बचाने की उनकी शक्ति का वर्णन है, तथा अत्रि ऋषि की प्रेरित मति (अंतःप्रज्ञा) उपासना में उनकी ओर प्रवृत्त होती है।

5 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Ādityas—Varuṇa, Mitra, Aryaman

Chandas: Triṣṭubh (probable; needs verification)

Sukta 68

Sukta 5.68

यह संक्षिप्त सूक्त मित्र और वरुण की स्तुति करता है—वे महान सार्वभौम अधिपति (महि-क्षत्रौ) हैं, जो ऋत, अर्थात् व्यापक ब्रह्माण्डीय सत्य-व्यवस्था, को धारण और सुरक्षित रखते हैं। इसमें उनसे प्रार्थना की गई है कि वे उपासकों को लौकिक तथा दिव्य—दोनों प्रकार की समृद्धि से समर्थ करें; और उनके कार्यों का चित्रण वर्षा, प्रवाहित जलधाराओं तथा पोषण के रूप में किया गया है, जो परिपूर्णता के लिए एक “विशाल आधार” रचते हैं।

5 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Mitra-Varuṇa

Chandas: Gāyatrī (probable for this short verse; verify metrical count in editions)

Sukta 69

Sukta 5.69

अत्रि का यह संक्षिप्त सूक्त मित्र और वरुण की स्तुति करता है—वे आदित्य हैं जो तीन प्रकाशमान लोकों को धारण करते हैं और अटल ब्रह्माण्डीय व्रतों (व्रतानि) का पालन कराते हैं। उनसे प्रार्थना है कि वे दिव्य धर्म की रक्षा करें, शासन और समुदाय से कुटिल या भ्रान्त परामर्श को दूर करें, तथा परिवार और संतति के लिए कल्याण, समृद्धि (रायि) और शान्ति प्रदान करें।

4 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Mitra-Varuṇa

Chandas: Triṣṭubh (likely; long verse with multiple pādas—verify)

Sukta 70

Sukta 5.70

यह संक्षिप्त अनुष्टुभ् सूक्त मित्र–वरुण का आह्वान करता है कि वे निकट उपस्थित सहायक बनकर अपनी ऋतपूर्ण, दीप्तिमयी सुमति से उपासक को घावों, कष्टों और अंतःकरण की बाधाओं के पार ले जाएँ। इसमें रक्षा, प्रभावी परिरक्षण-शक्ति तथा दस्यु-बलों (तमस्, अव्यवस्था) पर विजय की याचना है, और अंत में देह व प्राण-शक्ति में किसी भी हानिकारक यक्ष-पीड़ा से बचाए रखने की प्रार्थना की गई है।

4 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Mitra-Varuṇa

Chandas: Anuṣṭubh (shorter 8-syllable cadence; hymn 5.70 is characteristically compact)

Sukta 71

Sukta 5.71

यह संक्षिप्त गायत्री स्तुति मित्र और वरुण को यज्ञ के समीप आने का आह्वान करती है—ऐसे रक्षक रूप में जो हिंसक/आघातक शक्तियों को दूर भगाते हैं और अध्वर के ऋत-पथ को स्थिर रखते हैं। उन्हें सर्वज्ञ अधिपति-सम्राट के रूप में स्तुत किया गया है और उपासक की धीः (अन्तर्दृष्टि) को विस्तृत तथा अचल करने की प्रार्थना की गई है। स्तुति का समापन स्पष्ट सोम-आमन्त्रण में होता है: दिव्य युगल निकट आए और सोमपान करे, जिससे भीतर का अनुशासन और आनन्द प्रतिष्ठित हो।

3 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Mitra-Varuṇa

Chandas: Gāyatrī (3×8 syllables typical of brief invitatory verses)

Sukta 72

Sukta 5.72

यह संक्षिप्त त्रिष्टुभ् सूक्त अत्रि (आत्रेय) के पूर्वोदाहरण के साथ मित्र और वरुण का आह्वान करता है, उन्हें यज्ञ में ‘बर्हिस् पर आसीन’ होकर सोम का पान करने के लिए आमंत्रित करता है। यह उनके व्रत (बद्ध विधान) और धर्म के द्वारा स्थिर, अडिग शासन की स्तुति करता है, और उनसे शान्ति को दृढ़ करने, विघ्नकारी शक्तियों को संयमित करने तथा यजमान के अभिलषित कल्याण (इष्टि) हेतु यज्ञ में प्रसन्न होने की प्रार्थना करता है।

3 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) explicitly referenced (atrivat) | Devata: Mitra-Varuṇa

Chandas: Triṣṭubh

Sukta 73

Sukta 5.73

यह सूक्त अश्विनों (नासत्यौ) को अत्यन्त तात्कालिक आमन्त्रण देता है कि वे जिस किसी लोक में अभी निवास करते हों—दूर, निकट या अन्तरिक्ष में—वहाँ से शीघ्र आकर उपासकों को प्रचुर और त्वरित सहायता प्रदान करें। इसमें प्रेरित ऋषियों (विशेषतः अत्रि) तथा ‘घर्म’ (उष्ण, प्रकाशमान अर्पण) के साथ उनके घनिष्ठ सम्बन्ध का स्मरण किया गया है, और उनके रथ-सदृश वेग से आगमन तथा रोग-निवारक कल्याणकारी कृपा की स्तुति की गई है। अन्तिम मन्त्र में इस स्तोत्र को ही सावधानी से गढ़ी हुई वाणी के रूप में प्रस्तुत किया गया है—एक विस्तृत होता हुआ नमस्कार, जो शान्ति और वृद्धि का हेतु बने।

10 mantras | Devata: Aśvins (Nā́satyā)

Sukta 74

Sukta 5.74

यह सूक्त अत्रि की उषाकालीन, अत्यन्त तात्कालिक पुकार है—अश्विनौ (नासत्यौ) से कि वे शीघ्रगामी युगल वैद्य उसकी वाणी सुनें और रक्षक सहायता तथा समृद्धि लेकर उपस्थित हों। इसमें उनके स्थिर, सदा-सज्जित सान्निध्य, स्तुति पर तत्पर प्रत्युत्तर, और आह्वान स्वीकार करने पर बल, भोग-आनन्द और आधार-समर्थन जैसे वरदानों के प्रत्यक्ष ‘उंडेले’ जाने का वर्णन है।

10 mantras | Rishi: Atri | Devata: Aśvinau (Nā́satyā)

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 75

Sukta 5.75

यह सूक्त उषाकाल में अश्विनौ (नासत्य) का आवाहन है। इसमें उनके प्रिय, धन-सम्पदा लाने वाले रथ को यज्ञ में आने के लिए बुलाया गया है और कवि की “मधुर/मधु-भरी” पुकार सुनने की प्रार्थना की गई है। इसमें उनके प्रसिद्ध उद्धार और पुनर्स्थापन के कार्य (जैसे च्यवन) का स्मरण करते हुए अश्विनों को शीघ्रगामी वैद्य और रक्षक बताया गया है, जो प्रथम प्रकाश के साथ आते हैं और उपासक के लिए बल, समृद्धि तथा ऋत (धर्म-व्यवस्था) को नवजीवन देते हैं।

9 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) (traditional for RV 5.75) | Devata: Aśvinau (Nāsatyā)

Chandas: Triṣṭubh (common for 5.75; verify by metrical count in critical edition)

Sukta 76

Sukta 5.76

यह संक्षिप्त अश्विन-स्तोत्र उषा-प्रकाश में अग्नि के प्रकट होने और देवाभिमुख, प्रेरित वाणी के उदय से आरम्भ होता है; फिर वह अश्विनों से आग्रह करता है कि वे अपने रथ को तैयार किए गए घर्म (उष्ण, स्फूर्तिदायक पेय) की ओर मोड़ें। यह युगल वैद्यों को संधि-कालों—प्रातः, मध्याह्न, दिन और रात्रि—सब में आने का आह्वान करता है, ताकि आनन्ददायक पेय और उनकी रक्षा कभी न घटे। अंत में प्रार्थना है कि उनके “सदा-नव” सहायक बल के साथ हम समरस होकर चलें और धन, वीर्य/वीर-बल तथा स्थायी कल्याण प्राप्त करें।

5 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) tradition (probable for this Aśvin hymn cluster) | Devata: Aśvinau (primary); Agni and Uṣas as opening powers

Chandas: Jagatī (probable; needs confirmation)

Sukta 77

Sukta 5.77

यह संक्षिप्त अश्विन-स्तोत्र उषाकालीन आह्वान है, जिसमें उपासकों से कहा गया है कि वे प्रभात होते ही सबसे पहले जुड़वाँ अश्विनों का आह्वान करें, ताकि वे शीघ्र आकर सोमपान करें, इससे पहले कि शत्रु, “लोभी” शक्तियाँ यज्ञकर्म में बाधा डालें। इसमें उनके तेजस्वी रथ की प्रशंसा है और उस सहायता की भी, जो मन के समान शीघ्र, वायु के समान वेगवान होकर भक्त को संकट के पार पहुँचा देती है। अंत में सदा-नवीन रक्षा, समृद्धि (रयि), वीरबल और दीर्घकालीन शुभ-भाग्य के लिए प्रार्थना की गई है।

5 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) tradition (probable) | Devata: Aśvinau

Chandas: Triṣṭubh (probable; needs confirmation)

Sukta 78

Sukta 5.78

यह सूक्त शीघ्रगामी दिव्य वैद्य अश्विनौ (नासत्यौ) का अत्यन्त तात्कालिक आह्वान है कि वे सोम-यज्ञ में तुरंत आएँ और विमुख न हों। इसका मुख्य विषय प्रसूति में रक्षा और सफल प्रसव है—गर्भाशय/योनि का उचित समय पर खुलना, तथा माता और शिशु का जीवित, सुरक्षित और अहिंसित बाहर आना। स्मृत उद्धार-प्रसंग (सप्तवध्रि) का उल्लेख अश्विनों की उपचार-शक्ति और रक्षक-स्वभाव को और दृढ़ करता है।

9 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) | Devata: Ashvins (Nāsatyā)

Chandas: Gāyatrī (probable; short refrain-like structure; verify against metrical count)

Sukta 79

Sukta 5.79

यह सूक्त उषस् (प्रभात) का सीधा और आत्मीय आह्वान है कि वह यजमानों/यज्ञकर्त्ताओं को जगाए और उन्हें समृद्धि (रायी), बल तथा सम्यक् कर्म-प्रवृत्ति की ओर ले चले। उषा की स्तुति सदा-नवीन, अपने प्रकाश में अच्युत और अविचल रूप में की गई है; वह गायक-ऋषियों और दानदाताओं को वीर-यश, शीघ्र शक्तियाँ तथा प्रेरित वाणी प्रदान करने वाली कही गई है।

10 mantras | Rishi: Syāvāśva Ātreya (traditionally for RV 5.79, Uṣas-hymns of Book 5) | Devata: Uṣas (Dawn)

Chandas: Jagatī (refrain-like address; hymn commonly classified in jagatī/tṛṣṭubh domain—verify per pada count in critical edition)

Sukta 80

Sukta 5.80

ऋग्वेद 5.80 उषस् (प्रभात) का स्तोत्र है, जिसमें अत्रि-परम्परा के ऋषि उषा को व्यापक, अरुण-दीप्त शक्ति के रूप में स्तुत करते हैं, जो ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) के अनुसार जगत् को प्रकट करती है। यह सूक्त प्रकाश के क्रमबद्ध उद्घाटन, उसकी ऐसी मार्गदर्शक गति का उत्सव मनाता है जो “दिशाओं को विचलित नहीं करती”, तथा उसके बार-बार लौट आने का, जो जीवन, कर्म और आध्यात्मिक आकांक्षा को नवीनीकृत करता है।

6 mantras | Rishi: Atri (Ātreya tradition) (traditional attribution for RV 5.80) | Devata: Uṣas (Dawn)

Chandas: Jagatī (probable for many verses in RV 5.80; exact metrical scan may vary by pada)

Sukta 81

Sukta 5.81

सवितृ को समर्पित यह संक्षिप्त सूक्त उस दिव्य प्रेरक की स्तुति करता है जो ऋषियों के मन और प्रज्ञा को “जोतता” है, यज्ञ की शक्तियों को उचित क्रम में स्थापित करता है, और अपनी अग्रसर गति में समस्त देवों को चलायमान करता है। सवितृ को लोकों का मापक तथा वह सार्वभौम अधिपति कहा गया है जो समस्त ‘भव’ (होते जाने) में व्याप्त है, और कर्म के आन्तरिक तथा बाह्य प्रवर्तक के रूप में प्राणियों का सुरक्षित मार्गदर्शन करता है। अंत में सूक्त सवितृ को ‘प्रसव’ (प्रेरणा/प्रवर्तन) का एकमात्र स्वामी ठहराता है और उसके गमन में उसे पूषन्—मार्गदर्शक पोषक—के रूप में पहचानकर स्तोम स्वीकार करने के लिए आमंत्रित करता है।

5 mantras | Rishi: Atri (Ātreya tradition) (traditional attribution for RV 5.81) | Devata: Savitar (Savitṛ)

Chandas: Jagatī (common for RV 5.81; exact scan may vary)

Sukta 82

Sukta 5.82

यह सूक्त दिव्य प्रेरक सवितृ से प्रार्थना करता है कि वे श्रेष्ठतम पोषण, सम्यक् गति और मंगलमय भाग्य प्रदान करें; और भग को सवितृ की ‘वितरण’ तथा ‘सौभाग्य’ देने वाली शक्ति के रूप में आवाहन किया गया है। इसमें याचना है कि सब प्रकार की कुटिल दिशाएँ/दुरित (दुरितानि) दूर हटा दिए जाएँ और जो वास्तव में कल्याणकारी (भद्र) है, वही उपासकों में प्रेरित होकर प्रविष्ट हो। सूक्त सवितृ की स्तुति उस विश्व-शक्ति के रूप में भी करता है जो समस्त प्राणियों और जन्मों को प्रकट करती है तथा प्रेरित वाणी के द्वारा उन्हें ‘श्रवणीय’—अर्थात् सुना हुआ—बनाती है।

6 mantras | Devata: Savitṛ (with Bhaga invoked as his power of felicity/distribution)

Sukta 83

Sukta 5.83

यह सूक्त वैदिक वर्षा-शक्ति पर्जन्य का उत्कट आह्वान है कि वह गर्जना करे, जलधाराएँ मुक्त करे और पृथ्वी को गर्भवती करे, जिससे औषधियाँ और अन्न उत्पन्न हों। इसमें वर्षा को जीवन-बीज के रूप में चित्रित किया गया है, जो वनस्पतियों और मिट्टी में स्थापित होता है; साथ ही सूखे और बाँझपन के पार सुरक्षित गमन, रक्षा और उर्वरता की प्रार्थना की गई है।

10 mantras | Devata: Parjanya

Sukta 84

Sukta 5.84

यह संक्षिप्त आत्रेय सूक्त एक तीव्र, विचरने वाली शक्ति को संबोधित करता है, जिसे रात्रिकालीन स्तुतियों द्वारा पुकारा जाता है। उसकी प्रशंसा इस रूप में की गई है कि वह हिनहिनाते युद्ध-अश्व की भाँति परिपूर्णता और बल को आगे बढ़ाती है। यह मंत्र एक सजीव आवाहन है—चलती हुई दीप्ति/आँधी-ऊर्जा (जिसे ‘अर्जुनी’ नाम या विशेषण से कहा गया है) को बुलाता है कि वह यजमान के लिए तेज, वेग और विजयी समृद्धि प्रकट करे।

1 mantras | Rishi: Atri (probable for nearby hymns in Mandala 5; exact attribution for 5.84 requires hymn-level confirmation) | Devata: Uncertain from isolated verse; likely a roaming luminous/storm-related power (possibly Vāta/Marut-associated or a named feminine/epithet ‘Arjunī’)

Chandas: Gāyatrī (verse appears shorter; likely gāyatrī-like rather than triṣṭubh)

Sukta 85

Sukta 5.85

यह सूक्त वरुण की स्तुति करता है—उन्हें ऋत (ब्रह्माण्डीय और नैतिक व्यवस्था) का सार्वभौम धारक बताया गया है, जो स्वर्ग और पृथ्वी को मापकर स्थिर करते हैं और सूर्य के पथों की स्थापना करते हैं। स्तुति विस्मय से वरुण की व्यापक ‘माया’ (व्यवस्था-स्थापन की प्रभावी शक्ति) का वर्णन करती हुई आगे चलकर प्रायश्चित्त-भाव की प्रार्थना बन जाती है कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सभी दोष ढीले पड़े बंधनों की तरह शिथिल होकर छूट जाएँ, ताकि उपासक फिर से देव-अनुग्रह और कृपा में लौट सके।

8 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) (Mandala 5 attribution; hymn-level confirmation recommended) | Devata: Varuṇa

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 86

Sukta 5.86

यह संक्षिप्त इन्द्र–अग्नि सूक्त इन्द्र और अग्नि का संयुक्त आह्वान करता है—वे युगल शक्तियाँ जो बल और धर्मयुक्त कर्म के संघर्षों में नश्वर मनुष्य को संभालती हैं। उनसे प्रार्थना है कि वे भीतर और बाहर की बाधाओं को तोड़ें, गति के “रथों” का मार्गदर्शन करें, और विधिपूर्वक अर्पित हवि के द्वारा गायक-ऋत्विजों के लिए व्यापक यश, धन तथा पोषण देने वाली स्थायी अन्न-समृद्धि स्थापित करें।

6 mantras | Rishi: Atri (Ātreya) (Indrāgnī hymns in Maṇḍala 5 are within Atri collection) | Devata: Indra-Agni (dual deity)

Chandas: Gāyatrī (3 pādas of 8 syllables; typical for compact dual-invocations)

Sukta 87

Sukta 5.87

यह सूक्त पर्वतों से उत्पन्न तूफ़ानी गण मरुतों का आह्वान करता है—उन्हें अनुशासित, यज्ञ-योग्य दल के रूप में, जिनकी गर्जन-शक्ति तेज, रक्षा और विजयकारी गति प्रदान करती है। इसमें उनकी गतिशील सामर्थ्य को विष्णु के व्यापक, अग्रगामी पद-प्रसार से जोड़ा गया है, और मरुतों से प्रार्थना की गई है कि वे पुकार सुनें, यज्ञ-विधि की रक्षा करें, तथा उपासक को शत्रुतापूर्ण निषेध के विरुद्ध अजेय बनाएं।

9 mantras | Devata: Maruts (with Vishnu as associated power)

Chandas: Trishtubh (likely; typical for Marut hymns—needs syllable verification)

Frequently Asked Questions

Mandala 5 belongs to the family-book layer (Mandalas 2–7) and is traditionally attributed to Atri and his descendants (Atrides), whose school preserved and transmitted these hymns.

It is often noted for an archaic register: conservative vocabulary, inherited formulae, and compact, dense poetic constructions typical of early Rigvedic family collections.

Agni and Indra dominate as in much of the Rigveda, but Mandala 5 is especially remembered for a strong presence of Ashvin hymns, alongside notable praises to Uṣas, the Maruts, and the Ādityas.

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