Rig Veda Sukta 74
Mandala 5Sukta 7410 Mantras

Sukta 74

Sukta 5.74

Rishi

Atri

Devata

Aśvinau (Nā́satyā)

Chandas

Triṣṭubh (probable)

यह सूक्त अत्रि की उषाकालीन, अत्यन्त तात्कालिक पुकार है—अश्विनौ (नासत्यौ) से कि वे शीघ्रगामी युगल वैद्य उसकी वाणी सुनें और रक्षक सहायता तथा समृद्धि लेकर उपस्थित हों। इसमें उनके स्थिर, सदा-सज्जित सान्निध्य, स्तुति पर तत्पर प्रत्युत्तर, और आह्वान स्वीकार करने पर बल, भोग-आनन्द और आधार-समर्थन जैसे वरदानों के प्रत्यक्ष ‘उंडेले’ जाने का वर्णन है।

Mantras

Mantra 1

कूष्ठो देवावश्विनाद्या दिवो मनावसू । तच्छ्रवथो वृषण्वसू अत्रिर्वामा विवासति ॥

आज हे दिव्य अश्विनौ—हे दिवोन्मन के निधि-स्वरूप मनावसू—तुम दोनों का स्थान दृढ़ है। हे वृषण्वसू, बल-विभूति के दाता, उस पुकार को सुनो; अत्रि तुम्हारी ओर यज्ञ-स्तुति प्रज्वलित करता है।

Mantra 2

कुह त्या कुह नु श्रुता दिवि देवा नासत्या । कस्मिन्ना यतथो जने को वां नदीनां सचा ॥

कहाँ हो तुम दोनों, अब कहाँ सुने जाते हो, हे दिव्य नासत्यौ, स्वर्ग में? किस जन के पास तुम जाते हो? कौन तुम्हारे साथ नदियों-सी बहती धाराओं (जीवन और चेतना की) के संग चलता है?

Mantra 3

कं याथः कं ह गच्छथः कमच्छा युञ्जाथे रथम् । कस्य ब्रह्माणि रण्यथो वयं वामुश्मसीष्टये ॥

किसके पास तुम जाते हो, किसके लिए सचमुच यात्रा करते हो; किसकी ओर तुम अपना रथ जोतते हो? किसके ब्रह्म (मंत्र-स्तुतियों) में तुम आनंद लेते हो? हम यज्ञ की सिद्धि और अंतः-आहुति की पूर्ति के लिए तुम दोनों की कामना करते हैं।

Mantra 4

पौरं चिद्ध्युदप्रुतं पौर पौराय जिन्वथः । यदीं गृभीततातये सिंहमिव द्रुहस्पदे ॥

हे पूर (नगर) के स्वामी! जो नगर-जीवन में बँधा हुआ है, वह चाहे प्रवाह में डूबा हो, तुम उसे उसके सह-नागरिक के लिए भी बल देते हो। जब वह शत्रु-आक्रमण के लिए पकड़ा जाता है, तब तुम उसे द्रोही के पग-फंदे से सिंह की भाँति छुड़ा देते हो।

Mantra 5

प्र च्यवानाज्जुजुरुषो वव्रिमत्कं न मुञ्चथः । युवा यदी कृथः पुनरा काममृण्वे वध्वः ॥

च्यवान, जो जरा से क्षीण हो गया था, उससे तुमने आवरण-चर्म को वस्त्र की भाँति उतारकर नहीं छोड़ा; बल्कि जब तुमने उसे फिर से युवा किया, तब वधू की कामना भी नव्य रूप से पूर्ण हुई।

Mantra 6

अस्ति हि वामिह स्तोता स्मसि वां संदृशि श्रिये । नू श्रुतं म आ गतमवोभिर्वाजिनीवसू ॥

यहाँ निश्चय ही तुम्हारा स्तोता है; दर्शन और श्री के लिए हम तुम्हारे ही हैं। अब मेरी पुकार सुनकर, हे वाजिनीवसू (बल-समृद्ध स्वामी), अपने सहायों सहित मेरे पास आओ।

Mantra 7

को वामद्य पुरूणामा वव्ने मर्त्यानाम् । को विप्रो विप्रवाहसा को यज्ञैर्वाजिनीवसू ॥

आज असंख्य मर्त्यों में से कौन तुम्हें (अश्विनौ) जीतकर/प्राप्त कर सका है? हे विप्र-वाहसौ (विप्रों को वहन करने वाले), कौन-सा विप्र तुम्हें आकर्षित कर लाया है? हे वाजिनीवसू (बल-समृद्धि के स्वामी), कौन यज्ञों द्वारा तुम्हें अपना कर सका है?

Mantra 8

आ वां रथो रथानां येष्ठो यात्वश्विना । पुरू चिदस्मयुस्तिर आङ्गूषो मर्त्येष्वा ॥

हे अश्विनौ, रथों में श्रेष्ठ तुम्हारा रथ यहाँ आए। तुम्हें खोजता हुआ, अनेक-स्वर वाला स्तोत्र-गान भी पार उतरकर मर्त्यों के बीच यहाँ पहुँचे।

Mantra 9

शमू षु वां मधूयुवास्माकमस्तु चर्कृतिः । अर्वाचीना विचेतसा विभिः श्येनेव दीयतम् ॥

हे मधु-युवा अश्विनौ, हमारी शान्ति और पूर्णता के लिए तुम्हारी चर्कृति (सक्रिय सहायता) हो। व्यापक विवेक वाले, हमारी ओर उन्मुख होकर, अपनी शक्तियों सहित श्येन (बाज़) की निश्चल अवतरण-वेग की भाँति शीघ्र आओ।

Mantra 10

अश्विना यद्ध कर्हि चिच्छुश्रूयातमिमं हवम् । वस्वीरू षु वां भुजः पृञ्चन्ति सु वां पृचः ॥

हे अश्विनौ, जब भी तुम सचमुच इस हमारे आह्वान को सुनते हो, तब तुम्हारे समृद्ध भोग-वैभव और तृप्ति देने वाली शक्तियाँ प्रचुरता से उँडेलती हैं; तुम्हारे आधार-बल हमारे साथ मिलकर हमारी वृद्धि करते हैं।

Frequently Asked Questions

The hymn praises the Aśvinau (Nā́satyā), the divine twin healers and rescuers who are especially invoked at dawn.

He asks them to hear his invocation and come quickly with protective help—bringing strength, wellbeing, supportive power, and prosperity for increase.

It is best suited to dawn worship and early-morning rites, when the Aśvins are traditionally invited to arrive and bless the sacrificer with renewal and aid.

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