
Sukta 5.79
Syāvāśva Ātreya (traditionally for RV 5.79, Uṣas-hymns of Book 5)
Uṣas (Dawn)
Jagatī (refrain-like address; hymn commonly classified in jagatī/tṛṣṭubh domain—verify per pada count in critical edition)
यह सूक्त उषस् (प्रभात) का सीधा और आत्मीय आह्वान है कि वह यजमानों/यज्ञकर्त्ताओं को जगाए और उन्हें समृद्धि (रायी), बल तथा सम्यक् कर्म-प्रवृत्ति की ओर ले चले। उषा की स्तुति सदा-नवीन, अपने प्रकाश में अच्युत और अविचल रूप में की गई है; वह गायक-ऋषियों और दानदाताओं को वीर-यश, शीघ्र शक्तियाँ तथा प्रेरित वाणी प्रदान करने वाली कही गई है।
Mantra 1
महे नो अद्य बोधयोषो राये दिवित्मती । यथा चिन्नो अबोधयः सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते ॥
हे उषस्, महान् और दिव्य-दीप्तिमती, आज हमें महा-रयि (समृद्धि) की ओर जगाओ। जैसे पहले भी तुमने हमें जगाया था, वैसे ही फिर जगाओ—हे सत्यश्रवसि, सत्ययशस्विनी, वाय्ये (प्राण-गति में चलने वाली), सुजाते, अश्वसूनृते (अश्व-बल और शुभ वाणी देने वाली)।
Mantra 2
या सुनीथे शौचद्रथे व्यौच्छो दुहितर्दिवः । सा व्युच्छ सहीयसि सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते ॥
हे दिवः दुहितर् (उषस्), जो सुनीथ (सुपथ) पर, शुचद्रथ (उज्ज्वल रथ) पर प्रकट हुई हो—अब तू प्रकाशित हो; तू और भी अधिक समर्थ बन। हे सत्यश्रवसि, वाय्ये (प्राण-तत्त्व में गतिशीला), सुजाते—अश्वसूनृते (शीघ्र बल और मंगल-वाणी देने वाली)!
Mantra 3
सा नो अद्याभरद्वसुर्व्युच्छा दुहितर्दिवः । यो व्यौच्छः सहीयसि सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते ॥
वह आज हमारे लिए वसु (समृद्धि) ले आए; हे दिवः दुहितर्, व्युच्छ—प्रकाशित हो। जो व्यौच्छः (उदित हुई) और सहीयसि (बल में बढ़ती) है—हे सत्यश्रवसि, वाय्ये, सुजाते—अश्वसूनृते!
Mantra 4
अभि ये त्वा विभावरि स्तोमैर्गृणन्ति वह्नयः । मघैर्मघोनि सुश्रियो दामन्वन्तः सुरातयः सुजाते अश्वसूनृते ॥
हे विभावरि (दीप्तिमती उषस्), जो वह्नयः (अग्नि-वाहक, तेजस्वी) स्तोमों से तेरा गुणगान करते हैं—वे सुश्रियो (सुशोभित) होकर बढ़ते हैं। हे मघोनि (दानवती) उषा, मघैः (दानों) से वे विस्तार पाते हैं; दामन्वन्तः (उचित बंधनों/नियमों से युक्त), सुरातयः (सत्-दान में समृद्ध) होते हैं—हे सुजाते, अश्वसूनृते!
Mantra 5
यच्चिद्धि ते गणा इमे छदयन्ति मघत्तये । परि चिद्वष्टयो दधुर्ददतो राधो अह्रयं सुजाते अश्वसूनृते ॥
हे सुजाते, अश्वसूनृते! यद्यपि ये ते गण (समूह) दान-समृद्धि के हेतु तुझे मानो आच्छादित कर देते हैं, तथापि कामना करने वाले तेरे अक्षय, अह्रय (अथक) राधस्—पूर्णता के दान—को चारों ओर स्थापित करते हैं।
Mantra 6
ऐषु धा वीरवद्यश उषो मघोनि सूरिषु । ये नो राधांस्यह्रया मघवानो अरासत सुजाते अश्वसूनृते ॥
हे मघोनि उषस्! इन सूरीषु (प्रकाशमान नायकों) के बीच यहाँ वीर-धारिणी यश-श्री को स्थापित कर—उन मघवानों ने हमें अह्रय राधांसि (अक्षय समृद्धियाँ) प्रदान की हैं—हे सुजाते, अश्वसूनृते!
Mantra 7
तेभ्यो द्युम्नं बृहद्यश उषो मघोन्या वह । ये नो राधांस्यश्व्या गव्या भजन्त सूरयः सुजाते अश्वसूनृते ॥
हे मघोन्या उषस्! उन्हें द्युम्न (दीप्तिमय सामर्थ्य) और बृहद् यश लेकर जा—उन सूरेयों को, जो हमारे साथ अश्व्य और गव्य राधांसि (वेग-शक्तियों और प्रकाश-गौओं की समृद्धियाँ) बाँटते हैं—हे सुजाते, अश्वसूनृते!
Mantra 8
उत नो गोमतीरिष आ वहा दुहितर्दिवः । साकं सूर्यस्य रश्मिभिः शुक्रैः शोचद्भिरर्चिभिः सुजाते अश्वसूनृते ॥
और हे दिवः-दुहिता उषा, हमारे लिए गोमयी (किरण-समृद्ध) प्रेरणाएँ यहाँ ले आ—सूर्य की श्वेत, दहकती अर्चियों वाले रश्मियों के साथ; हे सुजाते, अश्व-बल देने वाली, सूनृता (मंगल-वाणी) प्रदान करने वाली।
Mantra 9
व्युच्छा दुहितर्दिवो मा चिरं तनुथा अपः । नेत्त्वा स्तेनं यथा रिपुं तपाति सूरो अर्चिषा सुजाते अश्वसूनृते ॥
हे दिवः-दुहिता, व्युच्छ—प्रकाशित हो; विलंब के जलों को बहुत देर तक न फैलाना। ऐसा न हो कि सूर्य अपनी अर्चि से तुझे वैसे तपाए जैसे वह चोर, शत्रु को जलाता है; हे सुजाते, अश्व-बल देने वाली, सूनृता प्रदान करने वाली।
Mantra 10
एतावद्वेदुषस्त्वं भूयो वा दातुमर्हसि । या स्तोतृभ्यो विभावर्युच्छन्ती न प्रमीयसे सुजाते अश्वसूनृते ॥
हे उषा, इतना तो तू जानती है; फिर भी तू और अधिक देने योग्य है। क्योंकि हे विभावरि, स्तोताओं के लिए उदित होती हुई तू न तो क्षीण होती है, न घटती है; हे सुजाते, अश्व-बल देने वाली, सूनृता प्रदान करने वाली।
Uṣas is Dawn, praised as a radiant goddess who awakens people, reveals the world with light, and grants prosperity, fame, and strength to the worshippers.
It asks Dawn to awaken the community and to bestow plenitude (wealth and well-being), heroic vigor, good reputation, and inspired speech for the singers and patrons.
Because Dawn returns every day with fresh light; the verse uses this daily renewal to express that her gifts and support for the singers are inexhaustible.
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