Opening the text

Sukta 5.65
Atri (Ātreya)
Mitra–Varuṇa
Triṣṭubh (probable)
मित्र–वरुण को समर्पित यह संक्षिप्त सूक्त ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) को धारण करने वाले आदित्यों से प्रेरित वाणी और उचित मार्गदर्शन की याचना करता है। यह संकट से बाहर निकालने हेतु मित्र की ‘विस्तृत पथ’ खोलने वाली शक्ति की स्तुति करता है और दिव्य युगल से प्रार्थना करता है कि वे एक होकर जनों का नेतृत्व करें, तथा ऋषियों और यजमानों को सुरक्षित परिधि के भीतर संरक्षण दें।
Mantra 1
यश्चिकेत स सुक्रतुर्देवत्रा स ब्रवीतु नः । वरुणो यस्य दर्शतो मित्रो वा वनते गिरः ॥
जो सचमुच जानता है, वही सुक्रतु (उज्ज्वल संकल्प/शुद्ध बुद्धि वाला) देव-मार्ग से हमें कहे। जिसकी दृष्टि वरुण है, या मित्र जो हमारी गिरः (प्रेरित वाणी) को जीत लेता है।
Mantra 2
ता हि श्रेष्ठवर्चसा राजाना दीर्घश्रुत्तमा । ता सत्पती ऋतावृध ऋतावाना जनेजने ॥
वे दोनों—श्रेष्ठ तेजः-वैभव वाले राजा, दूर तक सुनने वाले—वे दोनों सत्य के स्वामी, ऋत के वर्धक, और हर-हर जन में ऋत के धारक हैं।
Mantra 3
ता वामियानोऽवसे पूर्वा उप ब्रुवे सचा । स्वश्वासः सु चेतुना वाजाँ अभि प्र दावने ॥
हे दोनों! सहायता की कामना से मैं तुम्हें—प्राचीन, प्रथम-उत्पन्न शक्तियों के समान—सखा-भाव से निकट होकर पुकारता हूँ। सु-अश्वों और उज्ज्वल चेतना के साथ, बल-समृद्धि के दानों की ओर अग्रसर हो।
Mantra 4
मित्रो अंहोश्चिदादुरु क्षयाय गातुं वनते । मित्रस्य हि प्रतूर्वतः सुमतिरस्ति विधतः ॥
मित्र, संकट से भी, निवास के लिए विस्तृत मार्ग जीत लेता है। क्योंकि प्रतिरोध को परास्त करने वाले मित्र के पास, विधाता-सेवक के लिए सुमति विद्यमान है।
Mantra 5
वयं मित्रस्यावसि स्याम सप्रथस्तमे । अनेहसस्त्वोतयः सत्रा वरुणशेषसः ॥
हम मित्र के अवस् (रक्षक अनुग्रह) में रहें—उसकी सर्वाधिक विस्तृत सहायता में। हे वरुण-शेषस (वरुण की रक्षाशक्ति से कुछ भी अधूरा न छोड़ने वाले), तुम्हारी अविराम, अनथक उतियाँ (सहायताएँ) सदा हमारे साथ रहें।
Mantra 6
युवं मित्रेमं जनं यतथः सं च नयथः । मा मघोनः परि ख्यतं मो अस्माकमृषीणां गोपीथे न उरुष्यतम् ॥
हे मित्र-वरुण, तुम दोनों इस जन को यथावत् साधते हो और इसे एकत्र गति में ले जाते हो। हे मघोनः (समृद्धि देने वाले), हमसे दूर न रहो; हमारे ऋषियों की गोपीथ (रक्षा-आश्रय) में हमारी रक्षा करो, और हमें विस्तृत तथा सुरक्षित करो।
They are paired Āditya deities who uphold ṛta (order). Mitra emphasizes harmony and right relationship, while Varuṇa safeguards truth and moral law with far-seeing vigilance.
It asks for inspired, truthful speech, for a wide safe passage out of distress, for the people to be led in unity, and for protection of the seers and their supporters.
It is a Vedic image for an open, safe way forward—removal of constriction (fear, trouble, obstacles) and the granting of secure space for stable living and right action.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Rig Veda in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.