
Sukta 5.81
Atri (Ātreya tradition) (traditional attribution for RV 5.81)
Savitar (Savitṛ)
Jagatī (common for RV 5.81; exact scan may vary)
सवितृ को समर्पित यह संक्षिप्त सूक्त उस दिव्य प्रेरक की स्तुति करता है जो ऋषियों के मन और प्रज्ञा को “जोतता” है, यज्ञ की शक्तियों को उचित क्रम में स्थापित करता है, और अपनी अग्रसर गति में समस्त देवों को चलायमान करता है। सवितृ को लोकों का मापक तथा वह सार्वभौम अधिपति कहा गया है जो समस्त ‘भव’ (होते जाने) में व्याप्त है, और कर्म के आन्तरिक तथा बाह्य प्रवर्तक के रूप में प्राणियों का सुरक्षित मार्गदर्शन करता है। अंत में सूक्त सवितृ को ‘प्रसव’ (प्रेरणा/प्रवर्तन) का एकमात्र स्वामी ठहराता है और उसके गमन में उसे पूषन्—मार्गदर्शक पोषक—के रूप में पहचानकर स्तोम स्वीकार करने के लिए आमंत्रित करता है।
Mantra 1
युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः । वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः ॥
वे मन को युग्मित करते हैं, और धियों (विचार-शक्तियों) को भी युग्मित करते हैं—विप्र, उस विप्र के; बृहद् (विस्तीर्ण) के, सर्वज्ञ-दर्शी। कर्म-विधान को जानने वाला एक (ऋत्विज्) होत्र-शक्तियों को यथाविधि विस्तार देता है; देव सविता की परिष्टुति (परितः स्तुति) निश्चय ही महान् है।
Mantra 2
विश्वा रूपाणि प्रति मुञ्चते कविः प्रासावीद्भद्रं द्विपदे चतुष्पदे । वि नाकमख्यत्सविता वरेण्योऽनु प्रयाणमुषसो वि राजति ॥
कवि (ऋषि) समस्त रूपों को प्रकट होने हेतु मुक्त करता है; उसने द्विपद और चतुष्पद के लिए कल्याण को प्रवर्तित किया। वरेण्य सविता ने नभ (स्वर्ग) को दृश्य किया; उषा के प्रस्थान के अनुगमन में वह राजस तेज से प्रकाशित होता है।
Mantra 3
यस्य प्रयाणमन्वन्य इद्ययुर्देवा देवस्य महिमानमोजसा । यः पार्थिवानि विममे स एतशो रजांसि देवः सविता महित्वना ॥
जिसके अग्रगमन के अनुगमन में अन्य देव भी बलपूर्वक देव के महिमान् की ओर गतिमान होते हैं—जिसने पार्थिव लोकों को मापा; वही देव सविता, अपने शीघ्र अश्वों सहित, अपनी विशाल महिमा से रजांसि (अन्तरिक्ष-प्रदेशों) को मापता है।
Mantra 4
उत यासि सवितस्त्रीणि रोचनोत सूर्यस्य रश्मिभिः समुच्यसि । उत रात्रीमुभयतः परीयस उत मित्रो भवसि देव धर्मभिः ॥
और हे सवितृ, तुम तीनों रोचन—तीनों प्रकाशमय लोकों—से होकर चलते हो; और सूर्य की रश्मियों के साथ समुच्चित हो जाते हो। और तुम रात्रि के दोनों ओर परिक्रमा करते हो; और हे देव, अपने धर्मों (देव-धर्म) के द्वारा तुम मित्र बनते हो—ऋत के अनुरूप सामंजस्य स्थापित करते हुए।
Mantra 5
उतेशिषे प्रसवस्य त्वमेक इदुत पूषा भवसि देव यामभिः । उतेदं विश्वं भुवनं वि राजसि श्यावाश्वस्ते सवित स्तोममानशे ॥
और प्रसव—प्रेरक प्रवर्तन—का स्वामी तुम अकेले ही हो; और हे देव, अपने यामों (गमन-पथों) में तुम पूषन्—पालक-मार्गदर्शक—बनते हो। और इस समस्त भुवन—समूचे जगत्—पर तुम व्यापक रूप से विराजते हो; हे श्यावाश्व सवितृ, हमारे स्तोम—स्तुति-गान—को स्वीकार करो, उसका आस्वादन करो।
Savitṛ is the divine Impeller who awakens and sets all activity in motion. In this hymn he also measures the worlds and guides beings safely along their paths.
It means disciplining and aligning attention (mind) and insight (thought) so the prayer and the ritual proceed in the right order. The hymn treats this inner yoking as Savitṛ’s gift and action.
Because Savitṛ’s impulsion is not only cosmic power but also practical guidance. When he leads beings in their goings (journeys and life-paths), he functions as Pūṣan—the protector and nourisher who brings safely to the goal.
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