Rig Veda Sukta 4
Mandala 5Sukta 49 Mantras

Sukta 4

Sukta 5.4

Rishi

Atri (Ātreya tradition) (traditional ascription for RV 5.4)

Devata

Agni

Chandas

Trishtubh (probable; needs metrical verification)

आत्रेय परंपरा का यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उन्हें वसुपति (धनों के स्वामी) और यज्ञ पर अधिराज्य करने वाली राजसत्ता के रूप में, जिन्हें अध्वर में हर्षपूर्वक आवाहन किया जाता है। इसमें प्रार्थना है कि अग्नि वाज (विजयी ऊर्जा और समृद्धि) को प्रबल करें, मनुष्यों के संघर्षों के बीच विजय सुनिश्चित करें, और उपासक में ‘सुखद लोक-स्थान’ (स्योन लोक) के साथ व्यापक ऐश्वर्य—पुत्र, बल, गौ-धन और कल्याण—स्थापित करें।

Recitation with translationRig Veda 5.4

Mantras

Mantra 1

त्वामग्ने वसुपतिं वसूनामभि प्र मन्दे अध्वरेषु राजन् । त्वया वाजं वाजयन्तो जयेमाभि ष्याम पृत्सुतीर्मर्त्यानाम् ॥

हे अग्ने, वसुओं के स्वामी, मैं अध्वर-यज्ञों में, हे राजन्, आनंदपूर्वक तुम्हारा आह्वान करता हूँ। तुम्हारे द्वारा, वाज (बल-सम्पन्नता) को बढ़ाते हुए, हम विजय पाएं; मर्त्यों के संग्राम-आघातों में हम अधिजयी बनें।

Mantra 4

जुषस्वाग्न इळया सजोषा यतमानो रश्मिभिः सूर्यस्य । जुषस्व नः समिधं जातवेद आ च देवान्हविरद्याय वक्षि ॥

हे अग्ने, इळा के साथ एकरस होकर स्वीकार करो—सूर्य की किरणों के साथ प्रयत्नशील होकर। हे जातवेद, हमारी समिधा स्वीकार करो; और आज हमारे हवि-भक्षण हेतु देवों को यहाँ, हमारे कर्म में, ले आओ।

Mantra 5

जुष्टो दमूना अतिथिर्दुरोण इमं नो यज्ञमुप याहि विद्वान् । विश्वा अग्ने अभियुजो विहत्या शत्रूयतामा भरा भोजनानि ॥

हे अग्ने! गृह में प्रतिष्ठित, प्रसन्न, और सब जानने वाले अतिथि होकर—इस हमारे यज्ञ के निकट आओ। जो शत्रुता से हम पर आक्रमण करते हैं, उन सबको परास्त करके हमारे लिए भोग्य अन्न-रस, पोषण और समृद्धियाँ ले आओ।

Mantra 6

वधेन दस्युं प्र हि चातयस्व वयः कृण्वानस्तन्वे स्वायै । पिपर्षि यत्सहसस्पुत्र देवान्त्सो अग्ने पाहि नृतम वाजे अस्मान् ॥

अपने वध-बल से दस्यु को—जो भीतर भी बाधा बनकर उठता है—हटा और चूर कर; हमारी अपनी देह-धारण के लिए विस्तृत अवकाश और मुक्त गमन बना। हे सहस के पुत्र! क्योंकि तू देवों को धारण करता है, इसलिए हे अग्ने—नरों में श्रेष्ठ नेता—बल-समृद्धि में हमारी रक्षा कर।

Mantra 7

वयं ते अग्न उक्थैर्विधेम वयं हव्यैः पावक भद्रशोचे । अस्मे रयिं विश्ववारं समिन्वास्मे विश्वानि द्रविणानि धेहि ॥

हे अग्ने! हम उक्थों से तेरी उपासना करते हैं; हे पावक, शुभ-ज्वाला वाले! हम हवियों से तेरी सेवा करते हैं। हमारे भीतर सर्ववांछनीय रयि को बढ़ा; हमारे भीतर सत्य की समस्त द्रविण—सब धन-सम्पदा—स्थापित कर।

Mantra 8

अस्माकमग्ने अध्वरं जुषस्व सहसः सूनो त्रिषधस्थ हव्यम् । वयं देवेषु सुकृतः स्याम शर्मणा नस्त्रिवरूथेन पाहि ॥

हे अग्नि, हमारा अध्वर (यज्ञ-पथ) स्वीकार करो; हे सहसः-सूनो, त्रिषधस्थ (त्रिधाम-आसीन), इस हवि को ग्रहण करो। हम देवों के बीच सुकृत (सत्कर्म करने वाले) हों; अपने शर्म (शान्ति/आश्रय) से, और अपने त्रिवरूथ (तीनfold रक्षक आवरण) से हमारी रक्षा करो।

Mantra 9

विश्वानि नो दुर्गहा जातवेदः सिन्धुं न नावा दुरिताति पर्षि । अग्ने अत्रिवन्नमसा गृणानोऽस्माकं बोध्यविता तनूनाम् ॥

हे जातवेदस्, हमारे सब दुर्गह (कठिन) मार्गों को—नाव की भाँति सिन्धु पार कराती हुई—हमें दुर्गत/दुरित से पार पहुँचा दो। हे अग्नि, अत्रिवत् नमस्कार से स्तुत होते हुए, हमारे तनूनाम् (देहधारियों) के अविता (रक्षक) बनकर जाग्रत हो।

Mantra 10

यस्त्वा हृदा कीरिणा मन्यमानोऽमर्त्यं मर्त्यो जोहवीमि । जातवेदो यशो अस्मासु धेहि प्रजाभिरग्ने अमृतत्वमश्याम् ॥

जो मर्त्य, हृदय से और कीरि (गान-वाणी) से, तुम्हें अमर्त्य मानकर पुकारता है—मैं उस मर्त्य की ओर से तुम्हें जोहविमी (आह्वान करता) हूँ। हे जातवेदस्, हमारे भीतर यशस् (तेज/कीर्ति) धारण कराओ; और हे अग्नि, प्रजाभिः (संतति-शक्तियों सहित) हम अमृतत्व को प्राप्त करें।

Mantra 11

यस्मै त्वं सुकृते जातवेद उ लोकमग्ने कृणवः स्योनम् । अश्विनं स पुत्रिणं वीरवन्तं गोमन्तं रयिं नशते स्वस्ति ॥

जिसके लिए, हे जातवेदस् अग्नि, तुम सुकृत (पुण्यकर्मी) को सुस्थिर, सुखद लोक-आश्रय बनाते हो—वह स्वस्ति में अश्विन-तुल्य वेग, पुत्र-सम्पदा, वीर-बल, गो-सम्पदा और रयि (समृद्धि) को प्राप्त करता है।

Frequently Asked Questions

It praises Agni as the ruling power of sacrifice and asks him to bring victory-energy (vāja), prosperity (rayi), and protection, so the worshipper can thrive with well-being (svasti).

“Vasupati” means “lord of treasures.” The hymn treats Agni as the power that governs and distributes riches—both material wealth and inner strength—through the sacrificial order.

It means a pleasant, secure “space” or “world-room.” The idea is that Agni establishes a safe and auspicious condition of life for the person who performs good actions and worships rightly.

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