Rig Veda - Mandala 4
VamadevaRitaRibhus

Mandala 4

मण्डल 4

The Family Book of Vamadeva

ऋग्वेद का चतुर्थ मण्डल एक ‘कुल-ग्रन्थ’ (गोत्र-मण्डल) है, जिसका मुख्य श्रेय वामदेव (गौतम) परम्परा को दिया जाता है। इसमें विधिवत यज्ञीय स्तुति के साथ-साथ प्रकृति के सजीव चित्र और अन्तर्मुखी, चिन्तनशील धर्म-मीमांसा का सुन्दर संयोग मिलता है। इसके सूक्त सार्वजनिक अनुष्ठान-परिसरों—विशेषतः सोम-याग और अग्नि-उपासना—और प्रेरणा (धी), सत्य/ऋत (ऋत) तथा देवताओं की गुप्त कार्य-प्रणाली पर गहन मनन के बीच आवागमन करते हैं। इन्द्र और अग्नि यहाँ प्रधान हैं; फिर भी यह मण्डल उषा, तूफान/मरुत् और प्रवहमान जल-धाराओं के वर्णन में अपनी काव्य-कला तथा नैतिक-विश्व-व्यवस्था की सूक्ष्म झलक के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

Suktas in Mandala 4

Sukta 1

Sukta 4.1

ऋग्वेद 4.1 अग्नि का आह्वान है—देवताओं द्वारा सर्वसम्मति से स्थापित मार्गदर्शक (अरति) के रूप में और उस अमर शक्ति के रूप में जिसे मर्त्य जीवन के भीतर जाग्रत किया जाना है। यह सूक्त एक ओर सृष्टि-उत्पत्ति की मिथकीय छवियों—मध्य-आकाश के गुप्त गर्भ में छिपे अग्नि—और दूसरी ओर यज्ञीय व्यवहार की दृष्टि—अग्नि को सार्वभौम अतिथि मानकर, जो सभी उपासकों के लिए रक्षा, स्पष्टता और अनुग्रह का मध्यस्थ है—के बीच संचरित होता है।

20 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama | Devata: Agni (with an implicit horizon of the Devas acting through Agni)

Chandas: Trishtubh (probable for RV 4.1; verify per pada count in critical edition)

Sukta 2

Sukta 4.2

ऋग्वेद 4.2 वामदेव का अग्नि-स्तुतिगान है, जिसमें अग्नि को मर्त्यों के भीतर स्थित अमर—होतृ, द्रष्टा ऋषि और देवों के बीच सक्रिय शक्ति—के रूप में कहा गया है, जो यज्ञ और प्रेरणा द्वारा मानव जीवन में ऋत (सत्य-व्यवस्था) की स्थापना करता है। स्तोत्र अग्नि से प्रार्थना करता है कि वह तेजस्वी बुद्धि प्रज्वलित करे, सही विवेक को भ्रमित और कुटिल प्रवृत्तियों से अलग करे, और ऐसी व्यापक, बहुरूपी समृद्धि प्रदान करे जो आने वाली संतति का आधार बने। अंत में कवि वाणी-रूप अर्पण करता है और अग्नि से आह्वान करता है कि वह प्रज्वलित होकर ‘महाधन’—अधिक पूर्ण कल्याण—प्रदान करे।

20 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional attribution for RV 4.2) | Devata: Agni

Chandas: Triṣṭubh (probable for RV 4.2; this verse conforms to Triṣṭubh cadence)

Sukta 3

Sukta 4.3

यह सूक्त अग्नि को यज्ञ का राजा और दोनों लोकों में व्याप्त सच्चा होतृ कहकर आह्वान करता है—रुद्र-सदृश तेज से युक्त, उग्र, शुद्धिकर्ता और कर्मकाण्ड में अधिराज। इसमें अग्नि की ऋत-प्रेरित शक्ति की स्तुति है, जो कच्चे को पका (आमा→पक्व) कर देती है, गुप्त को प्रत्यक्ष बनाती है, और उपासक को गुप्त ‘नीथानि’ (मार्गदर्शक पथों) से आगे ले जाती है। अंत में द्रष्टा अग्नि-विद् के योग्य, रची हुई अंतर्निहित (निण्या) वाणियाँ—गूढ़ वचन और प्रेरित स्तुति—अर्पित करता है।

16 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional attribution for Mandala 4) | Devata: Agni (with Rudra-epithet/force invoked as king and hotṛ)

Chandas: Triṣṭubh (probable for RV 4.3; verse-length and cadence fit the dominant meter of this section)

Sukta 4

Sukta 4.4

ऋग्वेद 4.4 में अग्नि का प्रबल आह्वान है कि वे अपनी दहकती शक्ति का विस्तार करें, राजकीय सेना की भाँति आगे बढ़ें, और शत्रु राक्षसों तथा हानि पहुँचाने वाले अंधकार के सभी रूपों का संहार करें। कवि-पुरोहित वामदेव बार-बार स्तुति और समिधा से अग्नि को “माँजते” और प्रज्वलित करते हैं, उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे इस स्तोत्र को स्वीकार करें, उपासकों को छल और निंदा से बचाएँ, और दिनों-दिन उनके क्षत्र (अधिकार, प्रभावी बल) को स्थिर रखें।

15 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (attributed for RV 4.4) | Devata: Agni

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 5

Sukta 4.5

अग्नि वैश्वानर को समर्पित यह सूक्त पूछता है कि यजमान और ऋत्विज् उस महान् तेजस्वी अग्नि को विधिपूर्वक कैसे अर्पण करें, जो बाधा को चीरकर मार्ग खोल देता है। अग्नि की स्तुति गुफा में छिपे हुए “वाक्/वचन” के प्रकाशक के रूप में और किरणों (दृष्टि) के परम पद के रक्षक के रूप में की गई है; अंत में उसका दीप्तिमान मुख गृह के भीतर—यज्ञ-गृह और अंतःकरण—में प्रज्वलित होता हुआ सजीव रूप से चित्रित है। समग्रतः यह सूक्त आवाहन और प्रशंसा से आगे बढ़कर प्रकाशन के सिद्धान्त तक पहुँचता है—अग्नि वह शक्ति है जो गुप्त सत्य और प्रकाश को प्रकट कर देती है।

15 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional attribution for RV 4.5) | Devata: Agni Vaiśvānara

Chandas: Trishtubh (probable; verify in critical edition)

Sukta 6

Sukta 4.6

यह सूक्त अग्नि का आवाहन करता है—उन्हें सीधा, जाग्रत होतृ मानकर, जो यज्ञ में देवताओं को प्रतिष्ठित करते हैं और मनुष्य की अभिप्रेरणा (मनमन) को विवेकयुक्त बुद्धि (मनीषा) से आगे बढ़ाते हैं। वामदेव अग्नि की मंगलमय, स्वयंज्योति दृष्टि की स्तुति करते हैं, जो अंधकार को भेदती है और उपासक को अपवित्रता तथा क्षय से रक्षित करती है। अंत में, अग्नि के प्रज्वलित होने पर ब्रह्मन् (पवित्र वाणी) का निर्माण होता है, और उपासक पुरोहितीय अग्नि के सम्मुख श्रद्धापूर्वक आसन ग्रहण करते हैं।

11 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama | Devata: Agni

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 7

Sukta 4.7

ऋग्वेद 4.7 अग्नि-स्तुति है, जो यज्ञाग्नि की आदिम “स्थापना” और भृगुओं द्वारा उसके पुनः-खोजे जाने/पुनः-प्रज्वलित किए जाने का स्मरण कराती है, जिससे वह प्रत्येक कुल के लिए प्रकाशमान हो। इसमें अग्नि की प्रशंसा होतृ के रूप में तथा ऋत (ब्रह्माण्डीय सत्य/व्यवस्था) के वहनकर्ता के रूप में की गई है—जो वायु और तीव्र अश्व की भाँति प्रबल वेग से चलकर देवताओं तक हवि पहुँचाते हैं और मनुष्यों के लिए समृद्धि लौटाकर लाते हैं।

8 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for RV 4.7) | Devata: Agni

Chandas: Triṣṭubh (probable; verify in critical edition)

Sukta 8

Sukta 4.8

यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उन्हें दिव्य दूत और सर्वोच्च पुरोहित (होतृ) के रूप में, जो हवि को देवताओं तक पहुँचाते हैं और स्वर्ग का मार्ग खोलते हैं। इसमें उनकी सर्वज्ञता, अमरत्व और बाधाओं को भेद देने वाली तीव्र शक्ति का गुणगान है, तथा प्रेरित वाणी से उन्हें यज्ञ हेतु प्रज्वलित कर अलंकृत करने का आग्रह किया गया है।

7 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for RV 4.8) | Devata: Agni

Chandas: Gāyatrī (probable for RV 4.8.1; short 3-pāda structure suggests Gāyatrī-family; needs metrical verification)

Sukta 9

Sukta 4.9

यह सूक्त अग्नि का आह्वान करता है—उस महान, कृपालु सान्निध्य का, जो देव-खोजी समुदाय के पास आता है और यज्ञ में सम्यक् संयोग स्थापित करने हेतु पवित्र कुश पर आसन ग्रहण करता है। अग्नि की स्तुति यज्ञ-विधि के प्रभावी प्रवक्ता के रूप में की गई है—जो मनुष्यों की आहुतियों को सचमुच देवताओं तक पहुँचाता है—और उस रक्षक के रूप में भी, जो उपासक को चारों ओर से घेरकर हानि के विरुद्ध अजेय रक्षा प्रदान करता है।

6 mantras | Devata: Agni

Sukta 10

Sukta 4.10

यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उन्हें सही संकल्प (क्रतु) की तीव्र, हृदय-स्पर्शी शक्ति के रूप में, जो प्रेरित पुरुषार्थ और दैवी प्रेरणा से उपासक को समृद्ध करती है। अग्नि को सर्वदा उपस्थित द्रष्टा कहा गया है—दिन-रात प्रकाशमान—जो सौन्दर्य, सामंजस्य और वृद्धि लाते हैं, तथा मनुष्यों और देव-समूह के बीच मैत्रीपूर्ण, भ्रातृभाव का बन्धन स्थापित करते हैं। इस सूक्त का उद्देश्य अग्नि के दीप्त मार्गदर्शन और रक्षक सान्निध्य का आवाहन करना है, ताकि यजमान का गृह और उसका आन्तरिक ‘नाभि-केन्द्र’ पोषण और बल का स्थिर स्रोत बन जाए।

7 mantras | Devata: Agni

Sukta 11

Sukta 4.11

अग्नि को समर्पित यह छह-ऋचा सूक्त उनकी दीप्तिमान उपस्थिति की स्तुति करता है—दिन में सूर्य-सदृश और रात्रि में भी अविनाशी—और उन्हें पोषण व संरक्षण करने वाली प्रत्यक्ष शक्ति के रूप में आवाहन करता है। इसमें अग्नि को विजयकारी बल, समृद्धि और शीघ्र ऊर्जा का स्रोत कहा गया है, और अंत में पाप, हानि तथा कुटिल/विपरीत अभिप्राय को दूर भगाकर कल्याण (स्वस्ति) सुनिश्चित करने की रक्षात्मक प्रार्थना की गई है।

6 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional attribution for RV 4.11) | Devata: Agni

Chandas: Jagati or Trishtubh (uncertain from single verse; confirm by metrical scan of the whole sukta)

Sukta 12

Sukta 4.12

अग्नि जातवेदस् को समर्पित यह छह-ऋचा सूक्त अग्नि-तत्त्व की स्तुति करता है—उसे चेतन ज्ञाता मानता है, जो यथाविधि प्रज्वलित होने और नियमित आहुतियों से यजमान को बल देता है। स्तुति से आगे बढ़कर यह स्वीकार और विमोचन की ओर मुड़ता है: कवि प्रार्थना करता है कि ‘अजाग्रत’ समझ से हुए अपराधों को अग्नि क्षमा करें, भ्रान्ति के बन्धनों को ढीला करें, और उपासक को संकुचन से पार ले जाकर अधिक पूर्ण जीवन और विजय तक पहुँचाएँ।

6 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama | Devata: Agni (Jātavedas)

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 13

Sukta 4.13

यह संक्षिप्त सूक्त उषा के समय अग्नि के प्रज्वलन को प्रकाश के ब्रह्माण्डीय उदय से जोड़ता है: उषा मार्ग खोलती है, सूर्य उदित होता है, और सुव्यवस्थित गृह्य यज्ञ में अश्विनों का आह्वान किया जाता है। यह उज्ज्वल प्रभात-चित्रों से आगे बढ़कर स्वर्ग के अदृश्य आधार पर चिंतनात्मक विस्मय जगाता है—ऋत उस गुप्त नियम के रूप में, जिसके द्वारा लोक गिरते नहीं। इसका प्रयोजन यज्ञीय भी है (प्रातःकालीन हवि-आहुति का आरम्भ) और दार्शनिक भी (जगत् को धारण करने वाले क्रम के प्रति अंतर्दृष्टि जगाना)।

5 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama | Devata: Agni with Dawn/Sun and invocation to the Aśvins

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 14

Sukta 4.14

यह संक्षिप्त सूक्त अग्नि की प्रज्वलित दीप्ति को उषस् (प्रभात) के प्रथम अनावरण से जोड़ता है और प्रातःकाल को प्रकाश, ऋत (व्यवस्था) तथा जाग्रत गति के समन्वित प्राकट्य के रूप में चित्रित करता है। तत्पश्चात यह अश्विनौ (नासत्यौ) को प्रत्यक्ष आमंत्रण देता है कि वे उषाकाल में शीघ्र यज्ञ में आएँ और मधुर-रसयुक्त सोम का आस्वादन करें। इसका उद्देश्य देवताओं की समयोचित उपस्थिति, सुरक्षित गमन (सुविता) तथा उपासकों के लिए स्फूर्तिदायक बल प्राप्त करना है।

4 mantras | Devata: Agni in relation to Uṣas; invocation to the Aśvins (Nāsatyā)

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 15

Sukta 4.15

यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उसे प्रेरित पुरोहित के रूप में, जो हवि के चारों ओर ‘परिक्रमा’ करता हुआ उसे शुद्ध और परिपूर्ण बनाता है तथा यजमान को रत्न-धन से पुरस्कृत करता है। इसमें अग्नि के नित्य प्रज्वलन और परिष्कार का वर्णन है—वेगवान अश्व के समान और स्वर्ग का अरुण बालक—जिससे अग्नि दीप्तिमान, सुगठित शक्ति बनकर देवों तक आहुतियाँ पहुँचाती है और यज्ञकर्म को स्थिर रखती है।

10 mantras | Devata: Agni

Chandas: Gāyatrī (probable; short 3-pāda form typical of gāyatrī-like verses)

Sukta 16

Sukta 4.16

यह सूक्त सोम-आह्वान का प्रबल स्तोत्र है, जिसमें इन्द्र (मघवान्, हरिवान्) को उनके कपिश अश्वों सहित शीघ्र आने और सु-निष्पीडित सोमरस को ग्रहण करने के लिए बुलाया गया है, ताकि वे रक्षक-सहचर के रूप में निकट आएँ। इसमें इन्द्र के वीर वेग—उनका रथ, उनके सहायक और दूर-दूर तक फैली विजय—की प्रशंसा करते हुए उनसे प्रार्थना है कि वे गायक की प्रेरणा और समृद्धि को उफनती नदियों की भाँति ‘फुलाएँ’। सूक्त का समापन ‘नव ब्रह्म’ (नया स्तोत्र) के अर्पण और इस प्रार्थना से होता है कि हम सदा इन्द्र के रथ और मैत्री के योग्य बने रहें।

21 mantras | Devata: Indra

Sukta 17

Sukta 4.17

वामदेव रचित यह त्रिष्टुभ् सूक्त इन्द्र की स्तुति करता है—उन्हें परम बल-धारी मानते हुए, जिनकी राजसत्ता को द्यावा-पृथिवी स्वीकार करती हैं। इसमें वृत्र-वध की आदर्श विजय का स्मरण है, जब उन्होंने रोकी हुई नदियों को मुक्त किया। इन्द्र को प्राचीन दाता के रूप में भी सराहा गया है, जो गौ, स्वर्ण और अश्व-शक्ति को जीतकर अपने मित्रों/सहायकों में धन बाँटते हैं। अंत में कवि एक नवीन ब्रह्मन् (प्रेरित वाणी/सूत्र) प्रस्तुत कर इन्द्र से प्रार्थना करता है कि वे गायक की प्रेरणा को बाढ़-सी नदियों की तरह बढ़ाएँ और उपासकों को विजयकारी कर्म में प्रतिष्ठित करें।

21 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama | Devata: Indra

Chandas: Triṣṭubh

Sukta 18

Sukta 4.18

ऋग्वेद 4.18 एक नाटकीय, सृष्टि-प्रसंग और वीर-गाथात्मक सूक्त है, जिसका केंद्र इन्द्र का रहस्यमय जन्म और अवरोध-भंजक के रूप में उसका तात्कालिक भाग्य है। तनावपूर्ण, संवाद-सा वर्णन (माता/शिशु, आपः—जल, और समुदाय की घोषणाएँ) के माध्यम से यह इन्द्र पर लगाए गए दोष का प्रतिवाद करता है, उसके वृत्र-वध और नदियों के मुक्त होने का स्मरण कराता है, और अंत में संकट तथा पुनर्प्राप्ति का एक तीखा मानवीय स्वर रखता है—जहाँ श्येन मधु (मधुर सार) लेकर आता है।

13 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for RV 4.18) | Devata: Indra (narrative/cosmogonic framing in the hymn; often interpreted as Indra’s birth episode)

Chandas: Triṣṭubh

Sukta 19

Sukta 4.19

इन्द्र को समर्पित यह सूक्त उन्हें देवों द्वारा वृत्र-वध के लिए अद्वितीय रूप से चुना गया वीर-नायक घोषित करता है—जो द्यावा-पृथिवी का विस्तार करते हैं और जगत में मुक्त गमन को पुनः स्थापित करते हैं। इसमें उनके विश्वव्यापी कर्मों का स्मरण है—उफनते जल को थामना, नदियों को पारगम्य बनाना, और शीघ्र तथा विस्तृत मार्ग खोलना—और साथ ही ऐसी नूतन स्तुति का आह्वान है जो कवि की प्रेरित वाणी को और बढ़ाए। अंत में इन्द्र के लिए एक नया ‘ब्रह्मन्’ (पवित्र सूत्र/वचन) अर्पित किया जाता है, ताकि गायक उनके विजयी अग्रगमन में सहभागी हों।

11 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (Mandala 4 core attribution) | Devata: Indra

Chandas: Trishtubh

Sukta 20

Sukta 4.20

वामदेव का यह त्रिष्टुभ् स्तोत्र इन्द्र को “दूर और निकट” से आने का आह्वान करता है—उस निश्चय रक्षक के रूप में जो युद्धों के घमासान में विजयी होता है और शत्रुबलों को दूर करता है। यह इन्द्र की प्राचीन, पर्वत-सी शक्ति और उसके दृढ़ वज्र की स्तुति करता है; फिर उससे प्रार्थना करता है कि वह गायक की इष् (प्रेरणा/समृद्धि) को वैसे ही बढ़ाए जैसे नदियाँ उफनती हैं, और नव-रचित ब्रह्मन् (प्रेरित वाणी/सूक्ति) को स्वीकार करे।

11 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for RV 4.20) | Devata: Indra

Chandas: Trishtubh (probable; verify metrically)

Sukta 21

Sukta 4.21

यह सूक्त इन्द्र का आह्वान है कि वे समीप आएँ, उपासकों के साथ साझा यज्ञ-समारोह (सधमाद) में आसन ग्रहण करें, और उनकी शक्ति, प्रभुत्व तथा विजयी अधिपत्य को बढ़ाएँ। इसमें बाह्य यज्ञ-चित्र—सोम-पीषण, मार्गों और होतृ-अग्नि—को ‘धिषणा’ (प्रेरित बुद्धि) की आन्तरिक मनोभूमि से जोड़ा गया है, जो ‘गो’ (प्रकाश/गाएँ) का अन्वेषण करती है और इन्द्र के वेगवान प्रेरणावेग को उफनती नदियों के समान ग्रहण करती है।

11 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional) | Devata: Indra

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 22

Sukta 4.22

वामदेव का यह सूक्त इन्द्र की स्तुति करता है—उन्हें उस महाबली सिद्धिकर्ता के रूप में जो प्रार्थना, सोम और स्तोत्र स्वीकार कर उपासक के अभिलाषित प्रयोजनों को सामर्थ्यपूर्वक सिद्ध करते हैं। इसमें इन्द्र की उमड़ती वीर्य-शक्ति और लोक-व्यवस्था स्थापित करने वाली प्रेरणा का स्मरण है—वृषभ के थन से दुग्ध-धारा की भाँति समृद्धि उँडेलना और नदियों को प्रवाहित करना—और यह याचना है कि इन्द्र की कृपा से कवि की धिषणा और कार्य-सामर्थ्य नदियों की तरह बढ़ें।

11 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama | Devata: Indra

Chandas: Triṣṭubh (probable; confirm in critical edition)

Sukta 23

Sukta 4.23

यह त्रिष्टुभ् सूक्त इन्द्र की सदा-नवीन महिमा के रहस्य को टटोलता है—कि वह सोम से कैसे बढ़ता है, किसके लिए यज्ञ स्वीकार करता है, और गायक-ऋषियों के बीच किन-किन रूपों से प्रकट होता है। प्रश्नों, स्तुति और उफनती शक्ति तथा दीप्तिमान मुक्त-प्रकाश की उपमाओं के माध्यम से यह आगे बढ़ता है और अंत में रचा हुआ “नया ब्रह्म” (नव स्तोत्र) बनकर इन्द्र से कवि के लिए प्रेरणा और विजय बढ़ाने की याचना करता है।

11 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional attribution for RV 4.23) | Devata: Indra (implied by Soma-drinking and growth; hymn continues questioning his modes)

Chandas: Triṣṭubh

Sukta 24

Sukta 4.24

यह सूक्त इन्द्र—“बल के पुत्र”—को निर्दोष स्तुति द्वारा यजमानों की ओर उन्मुख होने के लिए बुलाता है, और गायक को धन, गौएँ तथा दमनकारी बन्धनों के निवारण का वर देने की प्रार्थना करता है। इसमें इन्द्र के दानों को यथोचित यज्ञकर्म (सोम-पीड़न, अन्न-भोजन की तैयारी) और प्रेरित वाणी से जोड़ा गया है; अंत में “नव ब्रह्म” (नवीन पवित्र वचन) के रूप में ऐसी समृद्धि माँगी जाती है जो नदियों की भाँति बढ़े, और इन्द्र की रथ-शक्ति के साथ स्थिर सख्य बना रहे।

10 mantras | Devata: Indra

Chandas: Triṣṭubh (probable; verse-level verification needed)

Sukta 25

Sukta 4.25

यह सूक्त योग्य उपासक को प्रज्वलित अग्नि और निचोड़े हुए सोम के माध्यम से इन्द्र की मित्रता चुनने का निमंत्रण देता है, और पूछता है कि कौन उस “ऐसी सहायता” की खोज करेगा जो पार ले जाती है। यह इन्द्र-सम्बद्ध पुरुष की प्रशंसा करता है—अजेय, और व्यापक शान्ति में सुरक्षित—और अंत में घोषित करता है कि सब प्रकार के लोग—निकट और दूर, बसे हुए और यात्रा करने वाले, युद्ध करने वाले और प्रयत्नशील—बल और विजय के लिए इन्द्र का आह्वान करते हैं।

8 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for RV 4.25) | Devata: Indra (with Agni as ritual locus; Soma as offering-power)

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 26

Sukta 4.26

ऋग्वेद 4.26 एक अत्यन्त प्रभावशाली आत्म-प्रकटीकरण (अहम्) वाला सूक्त है, जिसमें ऋषि “मैं हूँ” की वाणी में बोलते हुए आदर्श शक्तियों और पुराख्यात पात्रों से अपनी तादात्म्य-घोषणा करते हैं—मानो इन्द्र की ही चेतना उनके माध्यम से वाणी बनकर प्रकट हो रही हो। इसके बाद सूक्त श्येन (बाज़) की पौराणिक उड़ान की ओर मुड़ता है, जो मनु के लिए सोम लाता है—यह दिव्य आनन्द-रस के विजयी अपहरण तथा शत्रु शक्तियों के परित्याग/निष्कासन का प्रतीक है। इस सूक्त का प्रयोजन इन्द्र/सोम-शक्ति की स्तुति के साथ-साथ ऋषि की प्रेरित पहचान की घोषणा करना है, जो उस दिव्य विजय में सहभागी बनती है।

7 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (RV 4.26 is traditionally his) | Devata: Indra (hymn context), with a strong self-revelatory (aham) voice; sometimes read as the seer speaking with divine identification

Chandas: Triṣṭubh

Sukta 27

Sukta 4.27

यह संक्षिप्त किन्तु तीव्र सूक्त वामदेव की आत्म-संदर्भित वाणी में है, जहाँ रहस्यमय आत्मकथा सोम–श्येन-पुराकथा से मिल जाती है। ऋषि गर्भ से ही देवताओं के जन्म-रहस्य को जानने का दावा करता है और लोहे के दुर्गों को भेदकर बाज़/श्येन की भाँति मुक्त हो उठता है। फिर कथा कृष्टानु नामक रक्षक के पार सोम के जोखिमभरे अपहरण/आनयन की ओर मुड़ती है और अंततः सोम यज्ञ में उपलब्ध होकर इन्द्र के लिए उन्मादक, बलवर्धक पान बन जाता है। सूक्त का प्रयोजन सोम-प्राप्ति को पवित्र ठहराना और प्रेरित ज्ञान को मुक्तिदायक, स्वर्ग-प्राप्य शक्ति के रूप में घोषित करना है।

5 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for RV 4.27) | Devata: Soma/Śyena narrative (self-referential ṛṣi voice; also linked to Indra-Soma complex)

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 28

Sukta 4.28

यह संक्षिप्त सूक्त सोम के साथ घनिष्ठ संयोग में इन्द्र की स्तुति करता है और उस प्रसिद्ध विजय का स्मरण कराता है जिसमें वृत्र-रूप अवरोध का वध होता है तथा मनु और मानवजाति के लिए सात नदियाँ—जीवनदायिनी जलधाराएँ—मुक्त की जाती हैं। इसमें सोम की प्रेरक, उन्मेषकारी शक्ति को इन्द्र के निर्णायक पराक्रम से जोड़ा गया है: दोनों मिलकर मुहरबन्द को खोलते हैं, शत्रु प्रतिरोधों को हटाते हैं और ‘गौ-क्षेत्र’—दीप्त ज्ञान और समृद्धि—का विस्तार करते हैं। उद्देश्य यह है कि यज्ञ में उसी संयुक्त शक्ति का आवाहन हो, ताकि बाह्य और अन्तः—दोनों प्रकार के अवरुद्ध मार्ग खुलें और ऋत का सही पथ सुगम हो जाए।

5 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for RV 4.28) | Devata: Indra-Soma (Indra empowered by Soma)

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 29

Sukta 4.29

यह संक्षिप्त इन्द्र-स्तोत्र देवता को—दूर से भी—अनेक सोम-निष्पीडनों की ओर शीघ्र आने का तात्कालिक निमंत्रण देता है, जहाँ कपिश अश्वों और गायकों की प्रेरित स्तुति से वह हर्षित हो। कवि प्रार्थना करता है कि इन्द्र को यह आह्वान “सुनाया” जाए, और फिर वह उफनती शक्ति के साथ उठकर सिद्धि प्रदान करे—विजय-बल (वाज), सुरक्षित तीर्थ/पार (सुतीर्थ) और निर्भयता। अंत में सामूहिक कामना है: इन्द्र की रक्षा में गायक सच्चे द्रष्टा बनें और उसकी उदार दानशीलता से स्वर्ग के विस्तृत धन में सहभागी हों।

5 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for Mandala 4); specific hymn attribution not provided in input | Devata: Indra

Chandas: Trishtubh (probable; requires scan)

Sukta 30

Sukta 4.30

यह सूक्त इन्द्र की प्रबल स्तुति है—उन्हें अद्वितीय वृत्रहन् कहा गया है, जो सब से महान, युद्ध में अजेय और शत्रु-दुर्गों (जैसे शुष्ण के गढ़) को निर्णायक रूप से भेदने वाले हैं। उपासक की रक्षा, बल और समृद्धि के लिए इन्द्र के विजयी कर्मों का स्मरण किया गया है। अंत में आशीर्वचन का स्वर है, जिसमें सहायक सौभाग्य-प्रदाताओं (आदित्यों) से बार-बार ‘इष्ट’ वरदान देने की प्रार्थना की जाती है।

24 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for Mandala 4); specific hymn attribution not provided in input | Devata: Indra

Chandas: Anuṣṭubh-like cadence possible; exact meter requires scan (shorter pādas suggest non-Trishtubh)

Sukta 31

Sukta 4.31

यह सूक्त इन्द्र के प्रति एक खोजपूर्ण आह्वान है—उन्हें सदा-वर्धमान मित्र (सखा, सदावृधः) कहकर पूछा गया है कि वे किस प्रकाशमय सहायता और किस सर्वाधिक प्रभावी शची (शक्ति/कौशल) से उपासकों को चुनकर उनका सहारा बनेंगे। इसमें सोम-निचोड़ने वाले और संयमित साधक के प्रति इन्द्र की शीघ्र उदारता की स्तुति है, और अंत में समृद्धि, रक्षा तथा चिरस्थायी यश की याचना की गई है—बीच में संक्षेप से सूर्य की ओर भी मुड़ता है, जो प्रत्यक्ष शक्ति होकर ऊपर से यश और प्रकाश “उँडेलता” है।

15 mantras | Devata: Indra (implied by śacī, maghavan context in the hymn)

Sukta 32

Sukta 4.32

यह सूक्त इन्द्र वृत्रहन् का अत्यन्त तात्कालिक और आत्मीय आह्वान है—उनसे यजमान के ‘भाग’ पर आने, हवि स्वीकार करने और अपनी प्रचण्ड सहायता से रक्षा करने की प्रार्थना करता है। यह भी प्रतिपादित करता है कि यद्यपि इन्द्र सर्वव्यापी शक्ति हैं और समस्त प्राणियों में समान रूप से विभक्त हैं, फिर भी कवि उन्हें इस यज्ञकर्म में व्यक्तिगत रूप से बुलाता है, विजय, बल और ऋजु-गामी (सन्मार्गगामी) गति की कामना करते हुए।

24 mantras | Devata: Indra

Chandas: Triṣṭubh (likely for RV 4.32; verse fits 11-syllable cadence)

Sukta 33

Sukta 4.33

यह सूक्त ऋभुओं—ऋभु, विभ्वा और वाज—का आवाहन करता है, जो दिव्य शिल्पी हैं; वे तीव्र प्रेरणा से प्रेरित होकर रूपों को परिपूर्ण करते हैं और देवों तथा मनुष्यों के लिए समृद्धि का विस्तार करते हैं। इसमें उनके सत्य-वचन, स्वधा (उनके अंतर्निहित नियम) के पालन, और उनके अद्भुत कर्मों की स्तुति है, जिन्हें त्वष्टृ भी मान्यता देता है। अंत में यजमान के लिए तृतीय सोम-प्रसव में “वसूनि” (सच्चे धन) स्थापित करने की प्रार्थना की गई है।

11 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (attributed for Mandala 4; hymn to the Rbhus) | Devata: Rbhus (R̥bhus: Ṛbhu, Vibhvā, Vāja) as powers of divine craftsmanship and perfection

Chandas: Triṣṭubh (probable for RV 4.33; verse-level confirmation may vary by recension)

Sukta 34

Sukta 4.34

यह सूक्त ऋभुओं—ऋभु, विभ्वन् और वाज—को यज्ञ में आमंत्रित करता है, उनसे प्रार्थना करता है कि वे इन्द्र के साथ आएँ और सोम-रूप “मधु” का पान करें, तथा अपनी प्रसिद्ध शिल्प-शक्ति और नवनीकरण की सामर्थ्य को इस अनुष्ठान में प्रवाहित करें। यह उनके आह्वान पर अचूक प्रत्युत्तर की स्तुति करता है और इन्द्र तथा सहायक शक्तियों के साथ उनके संयुक्त उल्लास द्वारा “रत्न-धेय” (रत्न/वरदानों की स्थापना) की याचना करता है।

11 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama | Devata: Rbhus (Ṛbhu, Vibhvan, Vāja) with Indra as companion power

Chandas: Trishtubh

Sukta 35

Sukta 4.35

यह सूक्त दिव्य शिल्पी-ऋषि ऋभुओं—जो अपनी पूर्ण कौशल-निपुणता के लिए प्रसिद्ध हैं—को सोम-पीड़न में आने और इन्द्र के साथ यज्ञ-आहुति के धन में सहभागी होने का आमंत्रण देता है। इसमें उनके अद्भुत कर्मों (माता-पिता का नव-यौवन/नवीकरण, देवताओं के पान-पात्र का निर्माण, और इन्द्र के शीघ्र हरित/ताम्र अश्वों का निर्माण) का स्मरण कर उनके तृतीय सवन पर अधिकार और उसकी उन्मत्त शक्ति का औचित्य स्थापित किया गया है।

9 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for RV 4.35) | Devata: Ṛbhus (with Indra as associated power)

Chandas: Triṣṭubh (probable; needs metrical verification)

Sukta 36

Sukta 4.36

यह सूक्त दिव्य शिल्पी-भ्राताओं—ऋभुओं—की स्तुति करता है और उनके अद्भुत कृत्यों (जैसे स्वयं चलने वाला, तीन पहियों वाला रथ) को उस शक्ति के चिह्न के रूप में गाता है जो द्यावा-पृथिवी को विस्तृत करती और धारण करती है। इसमें उनकी परिपक्व कारीगरी (तक्षणा) को समृद्धि, यश और विजयी परिपूर्णता के जन्म से जोड़ा गया है, और अंत में एक आत्मीय प्रार्थना है—“यहीं और अभी” हमारे लिए संतान, धन और ऐसा वीर-यश गढ़ो जो उच्चतर चेतना को जगाए।

9 mantras | Rishi: Rbhus (or poet addressing them within the Rbhu cycle of Book 4) | Devata: Rbhus

Chandas: Trishtubh (probable)

Sukta 37

Sukta 4.37

यह सूक्त ऋभुओं—विशेषतः वाज और ऋभुक्षन्—उन दिव्य शिल्पियों को आमंत्रित करता है जो यज्ञकर्म का नवीनीकरण और परिष्कार करते हैं, कि वे “देवमार्गों” से आकर मनुष्यों के कुलों में यज्ञ को फिर से स्थापित करें। उनसे रयि (सम्पूर्णता, धन, आध्यात्मिक समृद्धि) और विजयी वाज (जयकारी शक्ति) लाने की प्रार्थना की गई है, और उनकी सहायता को इन्द्र के पराक्रम तथा अश्विनों की शीघ्र सहायता से जोड़ा गया है। समग्र उद्देश्य अनुष्ठानिक नवीनीकरण है—यज्ञ को शुभ दिनों में सुचारु, आनन्ददायक और फलदायी बनाना।

8 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional attribution for Maṇḍala 4; hymn to the Rbhus/associated powers) | Devata: Rbhus (esp. Vāja, Ṛbhukṣaṇa) as divine artisans; invoked also as devāḥ (luminous powers)

Chandas: Triṣṭubh (probable for RV 4.37; 11-syllable cadence typical of the hymn)

Sukta 38

Sukta 4.38

यह सूक्त रथों के अग्रभाग में दौड़ती, विजयी और तीव्र शक्ति (दधिक्राः/दधिक्रावन्) का स्तवन करता है, जो प्रवाहित किरणों-सी धूल उड़ा कर विजय और आनंद प्रदान करती है। यह तेजस्वी सत्ता जनों के लिए बल और विस्तार देने वाली कही गई है, और उससे प्रार्थना की जाती है कि वह कवि के वचनों को “मधु” (प्रेरणा, माधुर्य, सफलता) से परिपूर्ण करे। इसमें युद्ध-वेग, सौर दीप्ति और यज्ञ की मंगलता—तीनों का रूपक एक ही उपकारी उपस्थिति में एकत्र हो जाता है।

10 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for RV 4.38) | Devata: Aśvins (Nāsatyā) as divine benefactors (dual 'vām')

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 39

Sukta 4.39

यह छह-ऋचा का सूक्त दधिक्रावन्—शीघ्र, विजयी अश्व-शक्ति—की स्तुति करता है और प्रार्थना करता है कि उसकी गति तथा विजय-वेग गायक को संकटों और कठिन पारगमन-स्थलों के पार ले जाएँ। उषाएँ (उषस्) जाग्रत करने वाली के रूप में आहूत हैं, जो उपासक को उचित गमन/सही प्रवृत्ति में जगाती हैं। स्तुति आगे बढ़कर रक्षा और कल्याण की प्रार्थना बन जाती है, जिसमें संक्षेप में सहायक देवों (मरुत्, मित्र–वरुण, अग्नि, इन्द्र) का आवाहन कर ‘स्वस्ति’ (समग्र कुशलता) की सुरक्षा माँगी जाती है। अंत में रूपान्तरण का स्वर है: दधिक्रावन् से निवेदन है कि वह चेतना के ‘अग्र’ को सुगन्धित/दीप्त करे और जीवन-शक्तियों को सीमित करने वाले पारों के पार आगे ले जाए।

6 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for many hymns in Maṇḍala 4; this Dadhikrā praise belongs to the same family collection) | Devata: Dadhikrā with support of Uṣas (Dawns) as awakeners

Chandas: Triṣṭubh

Sukta 40

Sukta 4.40

यह संक्षिप्त सूक्त दधिक्रावन् का स्तवन करता है—उस तीव्र, विजयी शक्ति का, जिसे प्रायः दिव्य अश्व या सौर-पक्षी-शक्ति के रूप में देखा जाता है—और गायक को उषाओं तथा सहायक देवशक्तियों (आपः, अग्नि, सूर्य, बृहस्पति, अङ्गिरस) के साथ आगे बढ़ने को प्रेरित करता है। इसमें उसकी वेगशीलता, वायु-सदृश गति और रक्षक सामर्थ्य का गुणगान है, और अंत में “हंस” के अनेक लोकों में आसीन होने वाले गूढ़ प्रतीकात्मक मंत्र द्वारा देवता की पहचान स्वयं ऋत (ब्रह्माण्डीय सत्य/व्यवस्था) से कर दी जाती है।

5 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama | Devata: Dadhikrāvan (primary); associated powers: Uṣas, Apas, Agni, Sūrya, Bṛhaspati, Angirasa

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 41

Sukta 4.41

यह सूक्त युगल देवता इन्द्र और वरुण का आह्वान करता है कि वे कवि की श्रद्धापूर्ण आहुति स्वीकार करें और ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) से अनुशासित विजयी बल की स्थापना करें। इसमें प्रार्थना है कि वे दोनों भीतर और बाहर की हानियों—दुर्भावना, हिंस्र/शिकारी शत्रुता और छलपूर्ण भय—को कुचल दें, तथा अश्व-शक्ति, रथ-शक्ति और निरन्तर वृद्धि के रूप में स्थिर समृद्धि प्रदान करें।

7 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (Maṇḍala 4 context) | Devata: Indra-Varuṇa (paired powers: forceful victory + vast law/purity)

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 42

Sukta 4.42

ऋग्वेद 4.42 एक प्रभावशाली आत्म-घोषणात्मक सूक्त है, जिसमें काव्य-वाणी वरुण के राजत्व के अधिकार से बोलती है—ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था), सार्वभौम प्रभुता और सर्वव्यापी संरक्षण को धारण करने वाली। यह सूक्त शक्ति-क्षेत्र में इन्द्र को भी सम्मिलित करता है, जहाँ वरुण के नैतिक-राजकीय शासन की तुलना और पूरकता इन्द्र की विजयी शक्ति से की जाती है, जो नदियों को मुक्त करती है। इसका प्रयोजन दैवी वैधता की पुष्टि करना तथा यजमानों के लिए स्थायी समृद्धि (रायी), रक्षा और अच्युत/अक्षय प्रचुरता सुनिश्चित करना है।

6 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (hymn RV 4.42 traditionally associated with Vāmadeva; dialogic/self-declaratory style) | Devata: Varuṇa (self-proclamation; royal aspect)

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 43

Sukta 4.43

वामदेव का यह सूक्त अश्विनौ—दिव्य युगल वैद्य और शीघ्र उद्धारक—को पुकारता है कि वे कवि के “दैवी वचन” को सुनें और स्वीकार करें, और आह्वान होने पर अपने निकटतम पथ से आएँ। उनके आगमन के आश्चर्य और अतुलनीय तेज का वर्णन करते हुए, यह बार-बार गायक और उसके जनों के लिए उनकी व्यापक रक्षा, मधुर सहायक कृपा और जीवनदायी अनुग्रह की याचना करता है।

7 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (Mandala 4 core attribution) | Devata: Aśvinau (hymn 4.43 is to the Aśvins); this opening verse seeks the right divine hearer/acceptor

Chandas: Triṣṭubh (probable for RV 4.43; confirmation requires scan)

Sukta 44

Sukta 4.44

वामदेव का यह संक्षिप्त अश्विन-स्तोत्र जुड़वाँ अश्वारूढ़ देवों का आह्वान करता है कि वे अपने विस्तृत वेग से दौड़ते, स्वर्ण रथ—“किरणों का संगम-स्थान”—पर शीघ्र आएँ और यज्ञ में सम्मिलित हों। कवि उनसे मधुर मधु-रसयुक्त सोम पान करने, उपासक को धन और प्राण-शक्ति प्रदान करने, तथा जहाँ-जहाँ वे दोनों साथ पाए जाएँ वहाँ अपनी कृपालु अनुकम्पा से गायक की रक्षा करने की प्रार्थना करता है।

7 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama | Devata: Aśvinau

Chandas: Jagatī or Triṣṭubh (uncertain from single verse; requires scan)

Sukta 45

Sukta 4.45

यह सूक्त अश्विनों की स्तुति करता है—वे तेजस्वी, शीघ्र आने वाले दिव्य जुड़वाँ हैं, जिनका स्वर्ग-गामी रथ उषा की किरण-सा उठता है और बिना विलंब सोम-पीड़नों तक पहुँचता है। युग्म अश्वों, स्वर्ण-पंखी हंसों और मधुमक्खियों जैसे सजीव बिंबों के द्वारा उन्हें यज्ञ में आमंत्रित किया गया है, और उनकी जीवनदायिनी, रोगहर, तथा आनंद-प्रद उपस्थिति का गुणगान किया गया है। कवि का उद्देश्य यजमान और यज्ञ के लिए उनकी त्वरित आगमन-प्राप्ति और कल्याणकारी सहायता सुनिश्चित करना है।

7 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama | Devata: Aśvinau (context of adjacent hymns; this sukta continues Aśvin imagery)

Chandas: Jagatī or Triṣṭubh (verse appears longer; exact meter requires scansion—left as probable)

Sukta 46

Sukta 4.46

यह संक्षिप्त गायत्री-छन्द का सूक्त सोम-आह्वान है, जिसमें वायु—अक्सर इन्द्र के साथ—को निचोड़े हुए सोम के पास शीघ्र आने और सबसे पहले पान करने के लिए बुलाया गया है। इसमें उनके दीप्तिमान रथ की स्तुति की गई है और प्रार्थना की गई है कि उनका आगमन यज्ञ को प्रवृत्त करे, विमोचन प्रदान करे तथा सोम-आनन्द का अविघ्न उपभोग कराए।

7 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional attribution for Maṇḍala 4) | Devata: Vāyu

Chandas: Gāyatrī (8+8+8; typical for short Soma-invitations; verify in critical edition)

Sukta 47

Sukta 4.47

यह संक्षिप्त सूक्त वेगवान्, दीप्तिमान् वायु के लिए तात्कालिक सोम-आह्वान है—उनसे प्रार्थना है कि वे अपने नियुत्-अश्वों से युक्त होकर आएँ और सोम का प्रथम भाग पान करें। फिर यह इन्द्र–वायु का संयुक्त आह्वान बन जाता है कि वे एक ही रथ पर आरूढ़ होकर आएँ, रक्षा और बल प्रदान करें, और उपासकों को उनकी अत्यन्त वांछित, युक्त शक्तियाँ दृढ़तापूर्वक प्रदान करें।

4 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional attribution for RV 4) | Devata: Vāyu (with Soma-invitation motif)

Chandas: Jagatī (probable; RV 4 commonly uses Jagatī/Triṣṭubh in such invocations—requires pad-count confirmation)

Sukta 48

Sukta 4.48

यह संक्षिप्त सूक्त वेगवान् वायु को सोम-पीषण के यज्ञ में आमंत्रित करता है, बार-बार उसे अपने दीप्तिमान रथ पर आकर नव-निष्पन्न सोम का पान करने के लिए पुकारता है। यह यथोचित ऋत्विक-व्यवस्था (होत्रा) को दैवी प्राण-शक्ति के आगमन से जोड़ता है और वायु से यजमान के लिए समृद्धि, बल तथा विस्तृत ऐश्वर्य लाने की प्रार्थना करता है।

5 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for RV 4.48) | Devata: Vāyu

Chandas: Triṣṭubh/Jagatī (probable; refrain-like structure suggests fixed meter—requires confirmation)

Sukta 49

Sukta 4.49

यह संक्षिप्त सूक्त युगल शक्तियों—इन्द्र और बृहस्पति—को आह्वान करता है कि वे अर्पित हवि और सोम को ग्रहण करें, और यजमान के उक्थ (गंभीर स्तुति) तथा मद (आनन्द/उत्साह) से प्रसन्न हों। इसमें प्रार्थना है कि यह दिव्य युगल दाता के गृह में प्रतिष्ठित हो और ‘रयि’—समृद्धि तथा विजयकारी वृद्धि—का विस्तृत, भरपूर दान करे, जो अश्वों, प्रचुरता और ‘शतगुण’ विस्तार के रूप में प्रकट हो।

6 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for RV 4.49) | Devata: Indra-Bṛhaspati (dual)

Chandas: Triṣṭubh (probable; requires confirmation)

Sukta 50

Sukta 4.50

ऋग्वेद 4.50 बृहस्पति के लिए त्रिष्टुभ छन्द का सूक्त है। उन्हें पवित्र वाणी और पुरोहित-शक्ति के स्वामी के रूप में पुकारा गया है—समुदाय की “नींव” के रक्षक और शत्रुतापूर्ण आक्रमणों व बाधाओं को परास्त करने वाली शक्ति के रूप में। सूक्त उनकी विजयी सामर्थ्य की स्तुति करता है, उनसे ऋत (सही व्यवस्था) की जननी-गर्भ की रक्षा करने की प्रार्थना करता है, और अंत में इन्द्र के साथ बृहस्पति से वृद्धि, सुमति-युक्त मार्गदर्शन तथा विपत्तियों के दमन की संयुक्त याचना करता है।

10 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for Mandala 4; hymn 4.50 addressed to Bṛhaspati) | Devata: Bṛhaspati

Chandas: Tr̥ṣṭubh (likely; confirmable from full hymn prosody)

Sukta 51

Sukta 4.51

यह सूक्त उषस् (प्रभात) की स्तुति करता है—उस प्रचुर प्रकाश की, जो अंधकार से क्रमबद्ध विवेक के साथ उदित होकर मानव जीवन और पवित्र कर्म के लिए एक “पथ” खोलता है। इसमें आश्चर्य व्यक्त किया गया है कि उषाएँ, समान रूप और अजर होते हुए भी, प्रतिदिन नई प्रकाश-प्रकटीकरण की भाँति आती हैं; और अंत में यज्ञ-चिह्न के द्वारा द्यावा-पृथिवी से प्राप्त यश और स्थैर्य के लिए प्रार्थना की गई है।

11 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for RV 4.51) | Devata: Uṣas (Dawn)

Chandas: Triṣṭubh

Sukta 52

Sukta 4.52

यह सूक्त उषस् (प्रभात) की स्तुति करता है—स्वर्ग की तेजस्विनी पुत्री, जो उपासक के सम्मुख प्रकट होकर अपनी बहन रात्रि को घेरकर दूर करती है। कवि उषा से प्रार्थना करता है कि वह अपनी किरणों से लोकों का विस्तार करे, शुभ कर्म-प्रवृत्ति को जगाए, और द्वेष तथा फूट डालने वाली शक्तियों को हटा दे, ताकि यजमान सत्यपूर्ण स्तुति के द्वारा स्वीकार किया जाए।

7 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama | Devata: Uṣas

Chandas: Gāyatrī (3×8 syllables)

Sukta 53

Sukta 4.53

यह सूक्त सवितृ का आह्वान करता है—उस जाग्रतकर्ता का, जिसकी अग्रसर ज्योतियाँ उपासक को संरक्षण, ऋत (सही व्यवस्था) और अंतःप्रकाश में उठाती हैं। इसमें उनके अजेय शासन की स्तुति है जो विश्व-नियमों को धारण करता है, उनके प्रसारित भुजाओं की जो समस्त प्राणियों को संभालती हैं; और दिन-रात्रि तथा ऋतुओं के चक्र के माध्यम से निवास-समृद्धि, पोषण, संतान और धन-वृद्धि की याचना की गई है।

7 mantras | Devata: Savitṛ (Savitar)

Sukta 54

Sukta 4.54

यह संक्षिप्त सूक्त सवितृ की स्तुति करता है—उस दिव्य प्रेरक की, जो उपासना को जगाता है, धन-रत्नों का विभाजन करता है और उपासक में श्रेष्ठ ‘द्रविण’ (द्रव्य, शक्ति, समृद्धि) की स्थापना करता है। इसमें सवितृ की सत्य प्रेरणा की अपरिमेय व्यापकता पर बल है—पृथ्वी के विस्तार से लेकर स्वर्ग की ऊँचाई तक। अंत में सवितृ की दिन में तीन बार होने वाली शुभ-प्रेरणाओं के द्वारा रक्षा और शांति के लिए देवताओं के व्यापक मंडल का आह्वान किया गया है।

6 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional attribution for Mandala 4; hymn 4.54 commonly ascribed to Vāmadeva) | Devata: Savitṛ (solar impeller; Āditya-like power of arousing and directing)

Chandas: Triṣṭubh (probable; RV 4.54 is predominantly Triṣṭubh in tradition—verify at pada-count level for critical editions)

Sukta 55

Sukta 4.55

यह सूक्त वसु-शक्तियों, द्यावापृथिवी (स्वर्ग और पृथ्वी), अदिति तथा आदित्यों—विशेषतः वरुण और मित्र—से सामूहिक प्रार्थना है कि वे उपासक की रक्षा करें और यज्ञ के भीतर “वरिवस्” (मुक्त अवकाश, निर्बाध कल्याण) का विस्तार करें। यह दमनकारी मानवीय शक्तियों के विरुद्ध सच्चे संरक्षण के बारे में तीव्र प्रश्नों से आरम्भ होकर, विश्व-शक्तियों के अपने लक्ष्य की ओर प्रवाहित होने के एक ब्रह्माण्डीय दर्शन तक बढ़ता है, और अंत में कल्याणकारी दिव्य शक्तियों का संक्षिप्त आह्वान करता है कि वे समृद्धि और प्रचुरता प्रदान करें।

10 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for much of Mandala 4; hymn 4.55 often attributed within Vāmadeva cycle—verify per Anukramaṇī) | Devata: Multi-deity: Vasus, Dyāvāpṛthivī, Aditi, Varuṇa, Mitra (collective appeal)

Chandas: Triṣṭubh (probable)

Sukta 56

Sukta 4.56

यह सूक्त द्यावापृथिवी (स्वर्ग और पृथ्वी) की स्तुति करता है—उन्हें आद्य, विशाल माता‑पिता के रूप में, जो अंतरिक्ष का विस्तार करते हैं, ऋत (विश्व‑व्यवस्था) को धारण करते हैं और यज्ञ को तेजस्वी बनाते हैं। वामदेव उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे शुद्ध स्तुतियों से प्रकाशमान हों, व्यापक संरक्षण प्रदान करें, और यज्ञ के चारों ओर आसीन हों, ताकि उपासक धर्म्य/सम्यक् पथ पर स्थिर रह सके।

7 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for Mandala 4) | Devata: Dyāvāpṛthivī (Heaven and Earth)

Chandas: Trishtubh (probable; verify)

Sukta 57

Sukta 4.57

यह सूक्त खेत के स्वामी ‘क्षेत्रस्य पति’ के प्रति कृषि और ब्रह्माण्डीय उर्वरता की प्रार्थना है। इसमें खेती में विजय, गौ-धन तथा अश्वों की समृद्धि, और पोषण के निरन्तर बढ़ते रहने की कामना की गई है। आगे यह शुना-सीरा (मंगलमय समृद्धि और हल-शक्ति) का आवाहन करता है और पर्जन्य की वर्षा को बुलाता है कि पृथ्वी मधुर, फलवती और मानव-परिश्रम तथा आन्तरिक विकास को सहारा देने वाली बने।

8 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional for 4.57) | Devata: Kṣetrasya Pati (Lord of the Field); allied with agricultural/cosmic fertility powers

Chandas: Gāyatrī (probable for several verses in 4.57; requires full scan)

Sukta 58

Sukta 4.58

ऋग्वेद 4.58 घृत (स्पष्ट मक्खन) को दीप्तिमान सोम-तत्त्व के रूप में प्रस्तुत करने वाला एक रहस्यात्मक सूक्त है—मानो वह मधुर तरंग बनकर ब्रह्माण्डीय समुद्र से उठता है और सूक्ष्म पेषण तथा आन्तरिक शुद्धि के द्वारा “अमरत्व” में परिणत हो जाता है। यह सूक्त यज्ञीय आहुति को एक गूढ़ अध्यात्म-मीमांसा से जोड़ता है—घृत देवताओं की जिह्वा और अमृत का नाभि-स्थान है—जिससे बाह्य अर्पण, भीतर प्रवाहित होने वाली परिशुद्ध चेतना की धारा का प्रतिबिम्ब बन जाता है।

11 mantras | Rishi: Vāmadeva Gautama (traditional attribution for RV 4.58) | Devata: Ghṛta / Soma-essence (with a mystic-theological focus rather than a single anthropomorphic deity)

Chandas: Triṣṭubh

Frequently Asked Questions

Mandalas 2–7 are “Family Books” because their hymns are largely preserved under particular seer lineages. Mandala 4 is chiefly attributed to Vāmadeva of the Gautama family, giving it a relatively unified style and theological voice.

Mandala 4 centers on Indra’s heroic power and Agni’s priestly mediation, framed by soma ritual performance. It also stands out for lyrical nature description and reflective language about dhī (inspired insight) and ṛta (cosmic order), including hymns that feel personally visionary.

The Ṛbhus are divine craftsmen associated with renewal, perfected form, and the multiplication of prosperity. In Mandala 4 they exemplify how welcoming skilled, divine agency into the soma sacrifice is believed to restore and enhance life, wealth, and ritual success.

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