Rig Veda Sukta 58
Mandala 5Sukta 588 Mantras

Sukta 58

Sukta 5.58

Rishi

Atri (Ātreya tradition; RV 5 attributed to the Atri family; this hymn is Marut-focused within that collection)

Devata

Marutaḥ (the Maruts, Rudra’s storm-host; here as collective force-powers)

Chandas

Triṣṭubh (11-syllable pādas typical for Marut hymns; verse structure aligns with Triṣṭubh cadence)

ऋग्वेद 5.58 में अत्रि मरुतों की एकीकृत वायु-सेना का प्रबल स्तवन करते हैं—सदा नव-नव, शीघ्रगामी रथारूढ़, और अमर ऋत-व्यवस्था में अधिपति। यह सूक्त उनके आवेगी पराक्रम और सत्य को सुनने वाली उनकी प्रवृत्ति का गुणगान करता है; फिर उसी शक्ति को प्रार्थना में बदल देता है—कि मरुत प्रसन्न हों, यजमान को समृद्ध करें, और ऋत के अनुरूप उपासक के भीतर की ‘विस्तीर्णता’ को बढ़ाएँ।

Mantras

Mantra 1

तमु नूनं तविषीमन्तमेषां स्तुषे गणं मारुतं नव्यसीनाम् । य आश्वश्वा अमवद्वहन्त उतेशिरे अमृतस्य स्वराजः ॥

अब मैं उनके उस मरुत-गण की स्तुति करता हूँ—बल से परिपूर्ण, कर्मों में सदा नवीन। जो तीव्र अश्वों पर आत्मबल (अमवद्) को वहन करते हैं, और अमृत (अमर) सत्ता में स्वराज्—स्वयं-राजा—भी हैं।

Mantra 2

त्वेषं गणं तवसं खादिहस्तं धुनिव्रतं मायिनं दातिवारम् । मयोभुवो ये अमिता महित्वा वन्दस्व विप्र तुविराधसो नॄन् ॥

हे विप्र, उस प्रज्वलित गण को वन्दन कर—अत्यन्त बलवान, हाथों में आयुध धारण किए, जिसका व्रत बाधाओं को धुनना है; कर्म में मायावी, दान में उदार। वे मयोभू (आनन्द-प्रदाता) हैं, महत्त्व में अमित; विशाल दानवाले वे नृ (वीर) हैं।

Mantra 3

आ वो यन्तूदवाहासो अद्य वृष्टिं ये विश्वे मरुतो जुनन्ति । अयं यो अग्निर्मरुतः समिद्ध एतं जुषध्वं कवयो युवानः ॥

हे उदवाहासो (जल-वाहक), आज हमारे पास आओ—तुम सब मरुत वर्षा को आगे बढ़ाते हो। यह अग्नि यहाँ, हे मरुतो, प्रज्वलित है; इसे स्वीकार करो, इसमें रमण करो—हे कवयो, हे युवा जन।

Mantra 4

यूयं राजानमिर्यं जनाय विभ्वतष्टं जनयथा यजत्राः । युष्मदेति मुष्टिहा बाहुजूतो युष्मत्सदश्वो मरुतः सुवीरः ॥

हे यजत्र (पूज्य) जनो, तुम जन के लिए एक इर्य (प्रयत्न-योग्य) राजा को जन्म देते हो—विभ्वतष्ट (सर्व-रचयिता शक्ति) द्वारा गढ़ा हुआ। तुमसे ही मुष्टिहा (मुट्ठी से प्रहार करने वाला), बाहुजूत (बलिष्ठ भुजाओं से प्रेरित) उत्पन्न होता है; तुमसे ही सु-अश्व (उत्तम अश्वों वाला) सुवीर (सच्चे वीर्य से सम्पन्न) वीर, हे मरुतो, प्रकट होता है।

Mantra 5

अरा इवेदचरमा अहेव प्रप्र जायन्ते अकवा महोभिः । पृश्नेः पुत्रा उपमासो रभिष्ठाः स्वया मत्या मरुतः सं मिमिक्षुः ॥

अरे के तीलों (स्पोक) की भाँति वे सचमुच अच्युत, अथक हैं; सर्पों की भाँति वे बार-बार जन्म लेते हैं—अपने महान् पराक्रमों से, निर्बल नहीं। पृश्नि के पुत्र, अनुपम, अत्यन्त वेगवान—अपने ही संकल्प से वे मरुत एक ही शक्ति में परस्पर मिल गए हैं।

Mantra 6

यत्प्रायासिष्ट पृषतीभिरश्वैर्वीळुपविभिर्मरुतो रथेभिः । क्षोदन्त आपो रिणते वनान्यवोस्रियो वृषभः क्रन्दतु द्यौः ॥

जब, हे मरुतो, तुम चितकबरे अश्वों के साथ, दृढ़-परिधि रथों के साथ प्रस्थान करते हो, तब जल मथित हो उठते हैं; वन गुंजायमान होकर काँपने लगते हैं। नीचे की ओर दीप्तिमान धाराएँ बहती हैं; वृषभ गर्जता है—स्वयं द्यौ (आकाश) प्रतिध्वनित हो उठता है।

Mantra 7

प्रथिष्ट यामन्पृथिवी चिदेषां भर्तेव गर्भं स्वमिच्छवो धुः । वातान्ह्यश्वान्धुर्यायुयुज्रे वर्षं स्वेदं चक्रिरे रुद्रियासः ॥

उनकी गति अत्यन्त दृढ़ है; उनके दबाव से पृथ्वी भी—मानो पति अपनी ही गर्भ-धारणा को वहन करे—झुककर सह लेती है। वे रुद्रिय, रथ-धुरे पर वायुओं को अश्वों की भाँति जुतते हैं; वे वर्षा और श्रम-स्वेद रचते हैं—प्रकृति को विवश कर देने वाली शक्ति के चिह्न।

Mantra 8

हये नरो मरुतो मृळता नस्तुवीमघासो अमृता ऋतज्ञाः । सत्यश्रुतः कवयो युवानो बृहद्गिरयो बृहदुक्षमाणाः ॥

हे नर-स्वरूप मरुतो, हे तुवीमघ (महादानी), अमृत, ऋत-ज्ञ! हम पर कृपा करो। सत्य के श्रवणकर्ता, युवा कवि, बृहद्-गिर (महान् घोष) वाले—तुम जो बृहद् को उँडेलते/उत्सर्जित करते हो—तुम्हारी विशाल वाणी और प्रचुर प्रवाह हमारे भीतर उस महान् चेतना (बृहद्) को बढ़ाए।

Frequently Asked Questions

They are a collective host of storm-deities—youthful, radiant, and powerful—often linked with Rudra and called the sons of Pr̥śni. In this hymn they act as many powers moving as one force.

It praises their strength and truth-alignment, then asks them to be gracious (mṛḷatā), protect the worshipper, and grant increase—both as outer abundance (like rain and wealth) and as inner ‘vastness’ of consciousness.

The Maruts are called ṛta-knowers (ṛtajñāḥ), meaning their power is not mere violence but ordered energy. The hymn suggests their gifts and protection come when human effort and speech align with truth (satya) and cosmic rightness (ṛta).

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