Rig Veda Sukta 67
Mandala 5Sukta 675 Mantras

Sukta 67

Sukta 5.67

Rishi

Atri (Ātreya)

Devata

Ādityas—Varuṇa, Mitra, Aryaman

Chandas

Triṣṭubh (probable; needs verification)

यह संक्षिप्त सूक्त आदित्यों—विशेषतः वरुण, मित्र और अर्यमन्—की स्तुति करता है, जो सर्वज्ञ हैं और ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) के धारक हैं; जिनका व्यापक विधान सच्चा क्षत्र (सार्वभौम अधिकार) और संरक्षण प्रदान करता है। इसमें उनके स्थिर व्रत (नियत नियम) के अनुसार अविचल गमन और नश्वर मनुष्यों को अनिष्ट से बचाने की उनकी शक्ति का वर्णन है, तथा अत्रि ऋषि की प्रेरित मति (अंतःप्रज्ञा) उपासना में उनकी ओर प्रवृत्त होती है।

Mantras

Mantra 1

बळित्था देव निष्कृतमादित्या यजतं बृहत् । वरुण मित्रार्यमन्वर्षिष्ठं क्षत्रमाशाथे ॥

निश्चय ही, हे देव! हे आदित्यगण, आपने एक विशाल और यज्ञ्य (पूज्य) विधान रचा है। हे वरुण, मित्र, अर्यमन्—आप अत्यन्त प्रचुर, सर्वोच्च क्षत्र (राजसत्ता) को प्राप्त होते हैं।

Mantra 2

आ यद्योनिं हिरण्ययं वरुण मित्र सदथः । धर्तारा चर्षणीनां यन्तं सुम्नं रिशादसा ॥

जब तुम स्वर्णिम योनि (हिरण्य-योनि) में अपना आसन ग्रहण करते हो, हे वरुण और मित्र—जन-जन के धारक—तब तुम कल्याण की प्रवहमान धारा को चलाते हो, हे रिषादस (हानि-भक्षक)।

Mantra 3

विश्वे हि विश्ववेदसो वरुणो मित्रो अर्यमा । व्रता पदेव सश्चिरे पान्ति मर्त्यं रिषः ॥

क्योंकि ये सब ही विश्ववेदस्—सर्वज्ञ शक्तियाँ—वरुण, मित्र, अर्यमन् हैं। वे व्रतों में, मानो पगडंडी पर, चलते हैं; वे मर्त्य को रिष (हानि) से बचाते हैं, उसे ऋत के सन्मार्ग में सुरक्षित रखते हैं।

Mantra 4

ते हि सत्या ऋतस्पृश ऋतावानो जनेजने । सुनीथासः सुदानवोंऽहोश्चिदुरुचक्रयः ॥

वे ही सत्य हैं, ऋत-स्पृश—ऋत को स्पर्श करने वाले; वे जन-जन में ऋतावान् हैं। सुनीथ—सद्-नेतृत्व—और सुदान—उदार दान—से वे संकट में भी हमारे पथ-चक्र को विस्तृत कर देते हैं।

Mantra 5

को नु वां मित्रास्तुतो वरुणो वा तनूनाम् । तत्सु वामेषते मतिरत्रिभ्य एषते मतिः ॥

अब तुम दोनों में से—मित्र या वरुण—कौन है जो हमारे तनु-धर्म (देहधारण के कर्म) में स्तुत्य न हो? इसलिए निश्चय ही तुम्हारी ओर यह मति (चेतना-प्रेरणा) धावती है; अत्रियों की यह अभिलाषी मति तुम्हारी ओर ही धावती है।

Frequently Asked Questions

The hymn praises the Ādityas—especially Varuṇa, Mitra, and Aryaman—seen as divine powers who uphold truth, law, and right social order.

It says that the Ādityas maintain a vast cosmic ordinance (ṛta) through their fixed laws (vrata), giving rightful sovereignty and protecting human beings from harm and moral deviation.

Here kṣatra means legitimate, stabilizing authority that comes from alignment with cosmic and moral law—power that protects and orders life rather than dominating it.

Read Rig Veda in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App