
Sukta 5.78
Atri (Ātreya)
Ashvins (Nāsatyā)
Gāyatrī (probable; short refrain-like structure; verify against metrical count)
यह सूक्त शीघ्रगामी दिव्य वैद्य अश्विनौ (नासत्यौ) का अत्यन्त तात्कालिक आह्वान है कि वे सोम-यज्ञ में तुरंत आएँ और विमुख न हों। इसका मुख्य विषय प्रसूति में रक्षा और सफल प्रसव है—गर्भाशय/योनि का उचित समय पर खुलना, तथा माता और शिशु का जीवित, सुरक्षित और अहिंसित बाहर आना। स्मृत उद्धार-प्रसंग (सप्तवध्रि) का उल्लेख अश्विनों की उपचार-शक्ति और रक्षक-स्वभाव को और दृढ़ करता है।
Mantra 1
अश्विनावेह गच्छतं नासत्या मा वि वेनतम् । हंसाविव पततमा सुताँ उप ॥
हे अश्विनौ, यहाँ आओ; हे नासत्यौ, मुँह न मोड़ो। उड़ते हुए दो हंसों की भाँति, हमारे इन निचोड़े हुए सुत सोम के पास शीघ्र उतर आओ।
Mantra 2
अश्विना हरिणाविव गौराविवानु यवसम् । हंसाविव पततमा सुताँ उप ॥
हे अश्विनौ! हरिणों के समान दो अश्वों की भाँति, उज्ज्वल वृषभों के समान चरागाह (यवस) के पीछे-पीछे, और हंसों की भाँति उड़ते हुए—हमारे लिए निचोड़े हुए सोम (सुत) के समीप आओ।
Mantra 3
अश्विना वाजिनीवसू जुषेथां यज्ञमिष्टये । हंसाविव पततमा सुताँ उप ॥
हे अश्विनौ, वाजिनीवसू—बल-समृद्धि के स्वामी! इष्टि की सिद्धि के लिए इस यज्ञ को स्वीकार करो, उसका आस्वाद लो; और हंसों की भाँति उड़ते हुए हमारे भीतर के निचोड़े हुए सोम (सुत) के समीप आओ।
Mantra 4
अत्रिर्यद्वामवरोहन्नृबीसमजोहवीन्नाधमानेव योषा । श्येनस्य चिज्जवसा नूतनेनागच्छतमश्विना शंतमेन ॥
जब अत्रि संकट में गिर पड़ा, तब उसने मनुष्यों के बीच तुम्हें पुकारा—प्रसव-वेदना से कराहती स्त्री की भाँति; तब बाज की भी नई-सी वेगवत्ता से, हे अश्विनौ, अपने परम शान्तिदायक सामर्थ्य के साथ यहाँ आओ।
Mantra 5
वि जिहीष्व वनस्पते योनिः सूष्यन्त्या इव । श्रुतं मे अश्विना हवं सप्तवध्रिं च मुञ्चतम् ॥
हे वनस्पते, तू फाड़ दे—खोल दे; जैसे प्रसव-काल पका हो, वैसे ही योनि मुक्त हो जाए। हे अश्विनौ, मेरी पुकार सुनो और सप्तवध्रि को भी छुड़ा दो।
Mantra 6
भीताय नाधमानाय ऋषये सप्तवध्रये । मायाभिरश्विना युवं वृक्षं सं च वि चाचथः ॥
भयभीत, कराहते ऋषि सप्तवध्रि के लिए—हे अश्विनौ—तुम दोनों अपनी मायाओं (दिव्य शक्तियों) से वृक्ष को जोड़ते और अलग करते हुए चीर देते हो, ताकि वह मुक्त हो सके।
Mantra 7
यथा वातः पुष्करिणीं समिङ्गयति सर्वतः । एवा ते गर्भ एजतु निरैतु दशमास्यः ॥
जैसे वायु कमलिनी (पुष्करिणी) को चारों ओर से हिला देता है, वैसे ही तेरा गर्भ स्पंदित हो; हे दशमासी, वह बाहर निकलकर प्रकट हो जाए।
Mantra 8
यथा वातो यथा वनं यथा समुद्र एजति । एवा त्वं दशमास्य सहावेहि जरायुणा ॥
जैसे वायु चलती है, जैसे वन डोलता है, जैसे समुद्र तरंगित होता है—वैसे ही, हे दस-मासीय (गर्भस्थ) शिशु, जरा॒यु (जीवन-झिल्ली) सहित नीचे उतरकर बाहर आ।
Mantra 9
दश मासाञ्छशयानः कुमारो अधि मातरि । निरैतु जीवो अक्षतो जीवो जीवन्त्या अधि ॥
दस मास तक शयित होकर, माता के भीतर स्थित यह कुमार—वह जीवित, अक्षत (अक्षुण्ण) होकर बाहर निकले; जीवित माता के ऊपर (उसके साथ) जीवित रहे।
The hymn praises the Aśvins (also called Nāsatyā), twin divine horsemen known in the Veda as swift healers and rescuers who respond quickly to prayers.
Its main purpose is protection and healing, with a strong focus on safe childbirth—asking that the womb open at the right time and that both mother and child remain alive and unharmed.
Saptavadhri is recalled as an example of the Aśvins’ power to free and save. By naming a past rescue, the hymn strengthens confidence that they will grant timely help again.
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