
Sukta 5.47
Atri (Ātreya tradition) (book 5)
Ambiguous/poetic: a feminine power (often read as Uṣas or a maternal cosmic principle) and the Pitṛs; hymn moves into ancestral/cosmic imagery
Triṣṭubh (probable; confirm in critical edition)
यह संक्षिप्त आत्रेय सूक्त एक रहस्यमयी स्त्री-स्वरूप ब्रह्माण्डीय शक्ति का आह्वान करता है—जिसे प्रायः उषस् (प्रभात) की छवि या महान मातृ-तत्त्व के रूप में समझा जाता है—जो “जागती” है और पितृों (पूर्वजों) को यज्ञ में उनके आसन पर बुलाती है। इसके बाद सूक्त संक्षिप्त ब्रह्माण्डीय पहेलियों (संख्याएँ और “प्रकाश की गौएँ”) की ओर मुड़ता है, जो जगत् की सुव्यवस्थित गर्भधारण-प्रक्रिया का वर्णन करती हैं, और अंत में मित्र–वरुण, अग्नि तथा विशाल द्यौ (विस्तीर्ण स्वर्ग) के संरक्षण में कल्याण, दृढ़ पग-स्थिरता और सुरक्षित गमन की प्रार्थना के साथ समाप्त होता है।
Mantra 1
प्रयुञ्जती दिव एति ब्रुवाणा मही माता दुहितुर्बोधयन्ती । आविवासन्ती युवतिर्मनीषा पितृभ्य आ सदने जोहुवाना ॥
वह स्वयं को युक्त करती हुई, दिव्य प्रकाश-लोक से चलती है, वाणी करती हुई; महती माता अपनी पुत्री को जगाती है। प्रेरित मनः की युवती, नमस्कार करती हुई, पितृगणों को उनके सदन में बुलाती है—अन्तःस्थ यज्ञ-ऋत को स्थिर करने हेतु पूर्वज-शक्तियों का आह्वान करती है।
Mantra 2
अजिरासस्तदप ईयमाना आतस्थिवांसो अमृतस्य नाभिम् । अनन्तास उरवो विश्वतः सीं परि द्यावापृथिवी यन्ति पन्थाः ॥
वे अति-शीघ्रगामी, उस लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं; उन्होंने अमृत के नाभि-स्थल पर अपना स्थान ग्रहण किया है। अनन्त और विशाल, पन्थाएँ सर्वत्र चलती हैं—द्यावा-पृथिवी को परितः घेरे हुए; वही व्यापक ऋत-व्यवस्था में गमन के मार्ग हैं।
Mantra 3
उक्षा समुद्रो अरुषः सुपर्णः पूर्वस्य योनिं पितुरा विवेश । मध्ये दिवो निहितः पृश्निरश्मा वि चक्रमे रजसस्पात्यन्तौ ॥
वृषभ—समुद्र-स्वरूप, अरुण, सुपर्ण—पूर्वज पिता के प्राचीन योनि में प्रवेश करता है। दिवः के मध्य में पृष्णि-अश्मा (चित्तीदार शिला) निहित है; वह घूमती-चलती है, रजस्-प्रदेश के दोनों अन्तों की रक्षा करती हुई—सीमाएँ थामे रखती है, ताकि ऋत-धर्म स्थिर रहे।
Mantra 4
चत्वार ईं बिभ्रति क्षेमयन्तो दश गर्भं चरसे धापयन्ते । त्रिधातवः परमा अस्य गावो दिवश्चरन्ति परि सद्यो अन्तान् ॥
चार (शक्तियाँ) उसे धारण करती हैं, क्षेम (कल्याण) प्रदान करती हुई; दस उसके चलायमान जीवन हेतु गर्भ को पोषित करती हैं। त्रिधातु उसकी परम ज्योतिमयी गौएँ हैं; वे स्वर्ग में विचरती हुई, शीघ्र ही सीमाओं को चारों ओर से घेर लेती हैं।
Mantra 5
इदं वपुर्निवचनं जनासश्चरन्ति यन्नद्यस्तस्थुरापः । द्वे यदीं बिभृतो मातुरन्ये इहेह जाते यम्या सबन्धू ॥
यह रूप, यह गहन निवचन—इसके भीतर जन चलते-फिरते हैं; नदियाँ जलरूप होकर स्थिर हुईं। जब दो उसे माता से धारण करते हैं, तब अन्य यहाँ-यहाँ जन्म लेते हैं—यम्या, सहबन्धु (जुड़वाँ-सम्बन्धी) होकर।
Mantra 6
वि तन्वते धियो अस्मा अपांसि वस्त्रा पुत्राय मातरो वयन्ति । उपप्रक्षे वृषणो मोदमाना दिवस्पथा वध्वो यन्त्यच्छ ॥
उसके लिए धियाँ फैलती हैं और कर्म बुने जाते हैं; माताएँ पुत्र के लिए वस्त्र बुनती हैं। वृषण (वीर्यवान) के समीप वे हर्षित होती हैं; दिवः-पथ से वधुएँ उसकी ओर जाती हैं।
Mantra 7
तदस्तु मित्रावरुणा तदग्ने शं योरस्मभ्यमिदमस्तु शस्तम् । अशीमहि गाधमुत प्रतिष्ठां नमो दिवे बृहते सादनाय ॥
हे मित्र-वरुण, वह (कल्याण) सिद्ध हो; हे अग्नि, वह भी सिद्ध हो। यह हमारे लिए शान्ति और आनन्द का कारण बने—यह स्तुत्य और प्रशंसनीय हो। हम दृढ़ आधार और सुरक्षित गमन-मार्ग की कामना करते हैं। सत्य के महान आसन, उस विशाल दिव्य लोक को नमस्कार।
A luminous feminine power sets the rite in motion—coming from heaven, awakening, and calling the Pitṛs to their seat.
The hymn deepens into symbolic cosmology: ordered supports and nurturers ‘carry’ and ‘feed’ an embryo of becoming, while rays/‘cows of light’ circulate through heaven to define boundaries.
The riddle resolves into a vision of secured formation—creation protected and completed by measured powers moving swiftly through the heavenly expanse.
A direct benediction: may Mitra–Varuṇa and Agni fulfill peace and well-being; may we gain safe passage and firm foundation—homage to the Vast Heaven, the great seat of truth/order.
प्रयुञ्जती दिव एति ब्रुवाणा मही माता दुहितुर्बोधयन्ती । आविवासन्ती युवतिर्मनीषा पितृभ्य आ सदने जोहुवाना ॥चत्वार ईं बिभ्रति क्षेमयन्तो दश गर्भं चरसे धापयन्ते । त्रिधातवः परमा अस्य गावो दिवश्चरन्ति परि सद्यो अन्तान् ॥śaṃ yor asmabhyam idam astu śastam
The hymn is intentionally poetic: it centers on a feminine awakening power (often interpreted as Uṣas/Dawn or a great Mother principle) and explicitly invokes the Pitṛs (ancestors). It ends by addressing Mitra–Varuṇa and Agni, with homage to the Vast Heaven.
Calling the Pitṛs to the “sadana” means inviting ancestral support and continuity into the ritual space—linking the living sacrificer to lineage, protection, and inherited order (ṛta).
They are symbolic cosmology. The verse compresses creation into measured powers: supporters and nurturers of an ‘embryo’ of becoming, and luminous ‘cows’ (rays/knowledges) moving through heaven to complete and protect the world’s formation.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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