
Sukta 5.11
Agni
अग्नि को समर्पित यह संक्षिप्त सूक्त उन्हें प्रजाजनों के जाग्रत् रक्षक और वह तेजस्वी पुरोहित-शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, जो भरतों को सन्मार्ग पर ले जाती है। इसमें अग्नि की सर्वव्यापक उपस्थिति—“प्रत्येक गृह में”—पर बल दिया गया है, साथ ही उन्हें देवदूत तथा हवि-वाहक के रूप में वर्णित किया गया है। यह भी स्मरण कराता है कि अंगिरसों ने मंथन द्वारा छिपी हुई अग्नि को प्रकट कर प्राचीन काल में उसका आविष्कार किया था।
Mantra 1
जनस्य गोपा अजनिष्ट जागृविरग्निः सुदक्षः सुविताय नव्यसे । घृतप्रतीको बृहता दिविस्पृशा द्युमद्वि भाति भरतेभ्यः शुचिः ॥
जन-समुदाय का गोपा (रक्षक) जन्म लेता है—अग्नि, जाग्रत, सु-दक्ष (पूर्ण-कुशल)—नवीन और नित्य-नूतन सुवित (सद्गति) के लिए। घृत-प्रतीक, महान, द्युलोक-स्पर्शी, वह द्युमान होकर दीप्त होता है—भरतों के लिए शुचि (पवित्र) रूप में।
Mantra 2
यज्ञस्य केतुं प्रथमं पुरोहितमग्निं नरस्त्रिषधस्थे समीधिरे । इन्द्रेण देवैः सरथं स बर्हिषि सीदन्नि होता यजथाय सुक्रतुः ॥
मनुष्यों ने यज्ञ के केतु—प्रथम चिह्न—और अग्रणी पुरोहित अग्नि को, त्रिषधस्थ (तीन आसनों/लोकों) में, समिधा से प्रज्वलित किया। इन्द्र और देवों के साथ एक ही रथ-बल में चलकर वह बर्हिष् पर आसीन होता है; होता होकर यजथा (यजन-कर्म) के लिए बैठता है—शुक्रतु (उज्ज्वल संकल्प/दीप्त बुद्धि) वाला।
Mantra 3
असम्मृष्टो जायसे मात्रोः शुचिर्मन्द्रः कविरुदतिष्ठो विवस्वतः । घृतेन त्वावर्धयन्नग्न आहुत धूमस्ते केतुरभवद्दिवि श्रितः ॥
असमृष्ट—अमिश्रित, अकलुष—तू माता से जन्म लेता है; शुचि, मन्द्र (आनन्ददायक प्रेरक) और कवि। विवस्वत् से तू उठ खड़ा होता है। घृत से तुझे बढ़ाते हुए, हे अग्नि, आहुति दिए जाने पर तेरा धूम्र केतु बन जाता है—दिवि श्रित, स्वर्ग में प्रतिष्ठित।
Mantra 4
अग्निर्नो यज्ञमुप वेतु साधुयाग्निं नरो वि भरन्ते गृहेगृहे । अग्निर्दूतो अभवद्धव्यवाहनोऽग्निं वृणाना वृणते कविक्रतुम् ॥
अग्नि हमारे यज्ञ के पास सुमार्ग से आए। नर (मनुष्य) घर-घर में अग्नि को धारण करते हैं। अग्नि दूत बना, हव्यवाहन—आहुति का वाहक; अग्नि को चुनते हुए वे कविक्रतु को चुनते हैं—कवि की क्रतु, कर्म-ज्ञ बुद्धि।
Mantra 5
तुभ्येदमग्ने मधुमत्तमं वचस्तुभ्यं मनीषा इयमस्तु शं हृदे । त्वां गिरः सिन्धुमिवावनीर्महीरा पृणन्ति शवसा वर्धयन्ति च ॥
हे अग्नि, यह परम मधुर वाणी तेरे ही लिए है; यह मेरी मनीषा (अन्तःप्रज्ञा) तेरे ही लिए हो—हृदय को शान्ति देने वाली। जैसे महान नदियाँ समुद्र को भर देती हैं, वैसे ही स्तुतियाँ तुझे भर देती हैं; वे अपने तेज/शवस् से तुझे बढ़ाती हैं और तेरा विस्तार करती हैं।
Mantra 6
त्वामग्ने अङ्गिरसो गुहा हितमन्वविन्दञ्छिश्रियाणं वनेवने । स जायसे मथ्यमानः सहो महत्त्वामाहुः सहसस्पुत्रमङ्गिरः ॥
हे अग्नि, अङ्गिरसों ने तुझे गुहा में निहित—गुप्त—पाया, वन-वन में आश्रित। तू मथन से जन्म लेता है—महान सहस् (बल) वाला; हे अङ्गिर, लोग तुझे ‘सहस् का पुत्र’ कहते हैं।
It presents Agni as the community’s protector and the guiding power of the sacrifice—radiant, wakeful, and skilled—who carries offerings to the gods and leads people on the right path.
Because fire is both a household reality and a sacred presence: Agni is invoked wherever the domestic fire is tended, making everyday life and ritual part of one sacred order.
It means Agni embodies a seer-like intelligence and effective will—the power to know the right way to act and to make the sacrifice succeed.
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