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Sukta 5.73
Aśvins (Nā́satyā)
यह सूक्त अश्विनों (नासत्यौ) को अत्यन्त तात्कालिक आमन्त्रण देता है कि वे जिस किसी लोक में अभी निवास करते हों—दूर, निकट या अन्तरिक्ष में—वहाँ से शीघ्र आकर उपासकों को प्रचुर और त्वरित सहायता प्रदान करें। इसमें प्रेरित ऋषियों (विशेषतः अत्रि) तथा ‘घर्म’ (उष्ण, प्रकाशमान अर्पण) के साथ उनके घनिष्ठ सम्बन्ध का स्मरण किया गया है, और उनके रथ-सदृश वेग से आगमन तथा रोग-निवारक कल्याणकारी कृपा की स्तुति की गई है। अन्तिम मन्त्र में इस स्तोत्र को ही सावधानी से गढ़ी हुई वाणी के रूप में प्रस्तुत किया गया है—एक विस्तृत होता हुआ नमस्कार, जो शान्ति और वृद्धि का हेतु बने।
Mantra 1
यदद्य स्थः परावति यदर्वावत्यश्विना । यद्वा पुरू पुरुभुजा यदन्तरिक्ष आ गतम् ॥
हे अश्विनौ! आज जहाँ तुम स्थित हो—चाहे परावत में, चाहे अरावत में; अथवा हे पुरुभुजा, बहुतों के बीच—या अन्तरिक्ष में—वहीं से हमारे पास आओ।
Mantra 2
इह त्या पुरुभूतमा पुरू दंसांसि बिभ्रता । वरस्या याम्यध्रिगू हुवे तुविष्टमा भुजे ॥
यहीं मैं तुम्हें पुकारता हूँ—हे बहुरूप-भूततम, जो अनेक दंस (कौशल-शक्तियाँ) धारण करते हो। परम कल्याण की कामना से मैं तुम्हारी ओर बढ़ता हूँ, हे अध्रिगू (अविचल/असंकोची) जनो; हे तुविष्टतम (अतिशय पराक्रमी) जनो, तुम्हारे बल और आनन्द के भोग/विभाग के लिए मैं तुम्हें आह्वान करता हूँ।
Mantra 3
ईर्मान्यद्वपुषे वपुश्चक्रं रथस्य येमथुः । पर्यन्या नाहुषा युगा मह्ना रजांसि दीयथः ॥
एक रूप तुमने सौन्दर्य के लिए ठहराया, और एक अन्य रूप भी; रथ के चक्र को तुमने स्थिर किया। हे नाहुष-वंशजों, अन्य युग (जुए) के युग्म से, अपनी महिमा से तुम रजांसि—लोकों/प्रदेशों—को पार करते हुए विचरते हो।
Mantra 4
तदू षु वामेना कृतं विश्वा यद्वामनु ष्टवे । नाना जातावरेपसा समस्मे बन्धुमेयथुः ॥
यह सब निश्चय ही तुम्हारे द्वारा किया गया है, जब-जब कोई स्तुति के साथ तुम्हारा अनुसरण करता है। भिन्न-भिन्न प्रकार से जन्मे हुए भी, हे अरेपस (निर्दोष) जनो, तुम हम तक बन्धु-भाव से आते हो—मानव साधक से अंतरंग बन्धन जोड़ते हुए।
Mantra 5
आ यद्वां सूर्या रथं तिष्ठद्रघुष्यदं सदा । परि वामरुषा वयो घृणा वरन्त आतपः ॥
जब सूर्याः तुम्हारे रथ पर आरूढ़ होती है—जो सदा वेग से चलने वाला है—तब तुम्हारे चारों ओर जीवन-शक्ति के अरुण अश्व परिक्रमा करते हैं; और घृणा (दीप्ति) तथा आतप (ताप) तुम्हें घेर लेते हैं—तुम्हारे आगमन के साथ जागती हुई ज्योति का यह शुभ लक्षण है।
Mantra 6
युवोरत्रिश्चिकेतति नरा सुम्नेन चेतसा । घर्मं यद्वामरेपसं नासत्यास्ना भुरण्यति ॥
हे नर-वीर नासत्यौ! सुम्न (कल्याण-प्रसाद) और चेतसा (जाग्रत चित्त) से अत्रि तुम्हें पहचानता है। जब वह अपने मुख में अरेपस (निर्दोष) घर्म—तुम्हारा उष्ण, दीप्तिमान अर्पण—धारण करता है, तब वह उसे लेकर भुरण्यति—शीघ्र सिद्धि की शक्ति बनकर दौड़ पड़ता है।
Mantra 7
उग्रो वां ककुहो ययिः शृण्वे यामेषु संतनिः । यद्वां दंसोभिरश्विनात्रिर्नराववर्तति ॥
तुम्हारा उग्र ककुह (शिखर-नाद) और तुम्हारी ययि (शीघ्र गति) प्रबल है; यात्राओं में तुम्हारी सहायता की संतनि (निरंतर धारा) सुनाई देती है। जब अत्रि, हे अश्विनौ नरौ, तुम्हारे दंसोभिः (अद्भुत कर्मों) से बार-बार तुम्हारी ओर आवर्तति—फिर-फिर मुड़ता है—तब तुम प्रभावी गति से उत्तर देते हो।
Mantra 8
मध्व ऊ षु मधूयुवा रुद्रा सिषक्ति पिप्युषी । यत्समुद्राति पर्षथः पक्वाः पृक्षो भरन्त वाम् ॥
हे मधु-युवा रुद्रों! मधुर मधु-रस निश्चय ही तुमसे लिपटता है—समृद्ध और निरन्तर बढ़ने वाला। जब तुम समुद्र-सी गहराइयों को पार करते हो, तब पके हुए सोम-रस के पान तुम्हारे लिए पोषण लाते हैं; परिपक्व शक्तियाँ तुम्हारा पूर्ण भाग वहन करती हैं।
Mantra 9
सत्यमिद्वा उ अश्विना युवामाहुर्मयोभुवा । ता यामन्यामहूतमा यामन्ना मृळयत्तमा ॥
हे अश्विनौ! सत्य ही है कि तुम दोनों को ‘मयोभू’—आनन्द और कल्याण के दाता—कहा जाता है। यात्रा के हर चरण में तुम सबसे शीघ्र पुकारे जाते हो; हर चरण में तुम ही करुणा और आरोग्य बरसाने में सर्वाधिक समर्थ हो।
Mantra 10
इमा ब्रह्माणि वर्धनाश्विभ्यां सन्तु शंतमा । या तक्षाम रथाँ इवावोचाम बृहन्नमः ॥
ये वृद्धि को बढ़ाने वाले ब्रह्म (मंत्र) अश्विनों के लिए अत्यन्त शान्तिदायक हों। जैसे कारीगर रथ गढ़ता है, वैसे ही हमने वाणी को गढ़ा है; हम विशाल और विस्तृत नमस्कार का उच्चारण करते हैं।
The Aśvins (also called Nāsatyā) are divine twin helpers known for swift arrival, healing, rescue, and bringing timely benefits, especially around dawn and life’s transitions.
The hymn asks the Aśvins to come quickly from wherever they are and to grant protection, wellbeing, and effective help to the worshippers through the power of praise and offering.
Atri represents awakened seer-knowledge that recognizes the Aśvins’ grace. The “gharma” (warm, luminous offering) symbolizes a potent ritual gift through which their swift fulfilment and healing power are invoked.
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