Rig Veda Sukta 75
Mandala 5Sukta 759 Mantras

Sukta 75

Sukta 5.75

Rishi

Atri (Ātreya) (traditional for RV 5.75)

Devata

Aśvinau (Nāsatyā)

Chandas

Triṣṭubh (common for 5.75; verify by metrical count in critical edition)

यह सूक्त उषाकाल में अश्विनौ (नासत्य) का आवाहन है। इसमें उनके प्रिय, धन-सम्पदा लाने वाले रथ को यज्ञ में आने के लिए बुलाया गया है और कवि की “मधुर/मधु-भरी” पुकार सुनने की प्रार्थना की गई है। इसमें उनके प्रसिद्ध उद्धार और पुनर्स्थापन के कार्य (जैसे च्यवन) का स्मरण करते हुए अश्विनों को शीघ्रगामी वैद्य और रक्षक बताया गया है, जो प्रथम प्रकाश के साथ आते हैं और उपासक के लिए बल, समृद्धि तथा ऋत (धर्म-व्यवस्था) को नवजीवन देते हैं।

Mantras

Mantra 1

प्रति प्रियतमं रथं वृषणं वसुवाहनम् । स्तोता वामश्विनावृषिः स्तोमेन प्रति भूषति माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥

तुम्हारे अति प्रिय रथ की ओर—बलवान, वसु-वाहक—हे अश्विनौ, स्तुति करने वाला ऋषि स्तोत्र से अपनी अर्पणा को अलंकृत करता है। मेरे मधुर, आनंद-वह आह्वान को सुनो।

Mantra 2

अत्यायातमश्विना तिरो विश्वा अहं सना । दस्रा हिरण्यवर्तनी सुषुम्ना सिन्धुवाहसा माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥

अश्विनौ, शीघ्र आओ—सब बाधाओं के पार—जैसा मैं प्राचीन काल से पुकारता आया हूँ। हे दस्रौ, स्वर्ण-पथ वाले, सुसुम्ना और सिन्धु-वाहक, मेरे मधुर आह्वान को सुनो।

Mantra 3

आ नो रत्नानि बिभ्रतावश्विना गच्छतं युवम् । रुद्रा हिरण्यवर्तनी जुषाणा वाजिनीवसू माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥

हे अश्विनौ, अपने रत्न-धनों को धारण करते हुए तुम हमारे पास आओ। हे रुद्र-स्वरूप, स्वर्ण-पथों वाले, हमारे हवि को स्वीकार करने वाले, हे वाजिनीवसू (बल-समृद्धि के स्वामी)—मेरी मधुमयी पुकार सुनो।

Mantra 4

सुष्टुभो वां वृषण्वसू रथे वाणीच्याहिता । उत वां ककुहो मृगः पृक्षः कृणोति वापुषो माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥

हे वृषण्वसू (बल और समृद्धि के स्वामी), तुम्हारे सु-स्तुत (सुंदर स्तुतियाँ) तुम्हारे रथ पर वाणी के रूप में स्थापित हैं। और तुम्हारे लिए वह उच्च-शिखर, वेगवान मृग-सा (अश्व) दीप्तिमान रूप रचता है—मेरी मधुमयी पुकार सुनो।

Mantra 5

बोधिन्मनसा रथ्येषिरा हवनश्रुता । विभिश्च्यवानमश्विना नि याथो अद्वयाविनं माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥

जाग्रत्-मन से, रथ-पथ पर शीघ्रगामी, हवन-श्रुता (आह्वान सुनने वाले) हे अश्विनौ—तुम अपनी शक्तियों से च्यवान, उस अद्वयाविन् (अविभाज्य) को ठीक-ठाक स्थापित करते हो। मेरी मधुमयी पुकार सुनो।

Mantra 6

आ वां नरा मनोयुजोऽश्वासः प्रुषितप्सवः । वयो वहन्तु पीतये सह सुम्नेभिरश्विना माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥

हे नरा अश्विनौ! मनो-युक्त, प्रुषित (ओस/रस) से टपकते, वेगवान अश्व तुम्हें पीने (सोमपान) के लिए, सुम्नों (कल्याणकारी अनुग्रहों) सहित, शीघ्र ले आएँ। हे अश्विनौ! मेरा यह माध्वी (मधुर/मधु-युक्त) हव (आह्वान) सुनो।

Mantra 7

अश्विनावेह गच्छतं नासत्या मा वि वेनतम् । तिरश्चिदर्यया परि वर्तिर्यातमदाभ्या माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥

हे अश्विनौ, हे नासत्यौ! इधर आओ; हमसे विमुख न होओ। यद्यपि मार्ग तिरछा हो और शत्रु-चेष्टाओं से चारों ओर घिरा हो, तब भी, हे अदाभ्य (अजेय) जनो, आओ—मेरा यह माध्वी हव सुनो।

Mantra 8

अस्मिन्यज्ञे अदाभ्या जरितारं शुभस्पती । अवस्युमश्विना युवं गृणन्तमुप भूषथो माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥

इस यज्ञ में, हे अदाभ्य (अजेय) जनो, हे शुभस्पती (शोभा/तेज के स्वामी)! तुम दोनों अश्विनौ, जो तुम्हारी शरण चाहता है और स्तुति गाता है, उस जरितार (गायक/स्तुतिकर्ता) के निकट आकर उसे पुष्ट करो। मेरा यह माध्वी हव सुनो।

Mantra 9

अभूदुषा रुशत्पशुराग्निरधाय्यृत्वियः । अयोजि वां वृषण्वसू रथो दस्रावमर्त्यो माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥

उषा उदित हुई—दीप्तिमान, प्रकाश के चमकते पशुओं (किरण-गण) सहित; और ऋत्विय (ऋतु-सम्यक) अग्नि भीतर प्रज्वलित की गई। हे वृषण्वसू अश्विनौ—बलवान् और समृद्ध—हे दस्रा, अमर्त्य—तुम दोनों के लिए रथ जोता गया है; मधुमय आनन्द सहित आओ; मेरे यथोचित उच्चरित हवन को सुनो।

Frequently Asked Questions

They are the twin divine helpers of the Rig Veda—swift, youthful chariot-riders linked with dawn—famous for healing, rescue, and restoring strength and well-being.

The phrase emphasizes a sweet, pleasing invocation meant to draw the Aśvins quickly to the rite; it also suggests a blessing-bringing speech that delights the gods and benefits the worshiper.

Cyavāna is remembered as someone the Aśvins “set right” or renewed; mentioning him highlights their power to restore youth, health, and wholeness—what the sacrificer seeks in the present.

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