Rig Veda Sukta 34
Mandala 5Sukta 348 Mantras

Sukta 34

Sukta 5.34

Rishi

Atri (Ātreya tradition; Mandala 5 is predominantly attributed to the Atris)

Devata

Indra (with ritual actions of Soma pressing; Indra as brahma-vāhas, bearer of the Word)

Chandas

Trishtubh (likely; RV 5.34 is predominantly Triṣṭubh)

ऋग्वेद 5.34 अत्रि-परम्परा का स्तोत्र है, जो सोम-पीषण के माध्यम से इन्द्र का आह्वान करता है और उनकी ‘अजातशत्रु’ (जिसमें वैर का जन्म नहीं) तथा ‘ब्रह्म-वाहस्’ (वाणी/ब्रह्म के वाहक) रूप में स्तुति करता है। यह अनुशासित, हवि अर्पित करने वाले सोम-पीषकों की तुलना उन लोगों से करता है जो सोम नहीं पीषते, और इन्द्र को उस शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है जो ऋत/विश्व-व्यवस्था को गतिमान करती है, अवरोधक शक्तियों को दबाती है, और यज्ञ को विजय तथा वृद्धि की ओर अग्रसर करती है।

Sanskrit recitationRig Veda 5.34

Mantras

Mantra 1

अजातशत्रुमजरा स्वर्वत्यनु स्वधामिता दस्ममीयते । सुनोतन पचत ब्रह्मवाहसे पुरुष्टुताय प्रतरं दधातन ॥

हे अजातशत्रु, अजर, स्वर्वती (स्वर्ग-प्रकाशसम्पन्न) अद्भुत-कर्ता! स्वधा के अनुक्रम में, स्वधामि-ता (स्वधारूप विधान) के अनुसार अग्रसर हो। ब्रह्म-वाहसे, पुरुष्टुत (बहु-स्तुत) के लिए सोम को सुनोतन, हवि को पचोत; और उसके लिए और भी शीघ्र अग्रगति का वेग स्थापित करो।

Mantra 2

आ यः सोमेन जठरमपिप्रतामन्दत मघवा मध्वो अन्धसः । यदीं मृगाय हन्तवे महावधः सहस्रभृष्टिमुशना वधं यमत् ॥

जो सोम के साथ अपने जठर को भरकर मधु-रस के अन्धस् से आनन्दित हुआ—वह दानी (मघवा); जब उसने प्रतिरोधी ‘मृग’ को मारने हेतु सहस्र-धार (सहस्रभृष्टि) महावध शस्त्र चाहा, तब उशना ऋषि ने उसके लिए वह वध-शक्ति नियत कर दी।

Mantra 4

यस्यावधीत्पितरं यस्य मातरं यस्य शक्रो भ्रातरं नात ईषते । वेतीद्वस्य प्रयता यतंकरो न किल्बिषादीषते वस्व आकरः ॥

जिसने पिता को और जिसने माता को भी गिरा दिया, जिसके सामने भाई भी प्रतिरोध में नहीं ठहरता—वही इस (वीर) की आगे धकेली हुई शक्तियों को जानता है। जो प्रयत्न को संयमित और युक्त करता है, वह कल्मष/दोष-आरोप से नहीं डरता; वह वसु (समृद्धि) का आकर, निधि-स्थान बन जाता है।

Mantra 5

न पञ्चभिर्दशभिर्वष्ट्यारभं नासुन्वता सचते पुष्यता चन । जिनाति वेदमुया हन्ति वा धुनिरा देवयुं भजति गोमति व्रजे ॥

वह न पाँच से, न दस से—केवल पकड़-भर की चाह नहीं करता; वह असुन्वत (जो सोम न दबाते) के साथ नहीं जुड़ता, न ही बाह्य समृद्धि वालों के साथ भी। वह विद्या से जीतता है—अथवा उसी धुनि (प्रेरक-वेग) से मार गिराता है; और देवयु (देव-आकांक्षी) को गोमति (दीप्तिमान/गोधनयुक्त) व्रज में गौओं का भाग देता है।

Mantra 6

वित्वक्षणः समृतौ चक्रमासजोऽसुन्वतो विषुणः सुन्वतो वृधः । इन्द्रो विश्वस्य दमिता विभीषणो यथावशं नयति दासमार्यः ॥

वित्वक्षण (भेदन-चातुर्य) से उसने ऋतुओं के संयोग में चक्र को चलाया; असुन्वत से पृथक्, सुन्वत का वर्धक। इन्द्र—समस्त का दमिता, अपने तेज में भीषण—दास (अन्ध/सेवक-स्वभाव) को जैसे चाहे वैसे वश में ले जाता है; और आर्य (उद्यमी-श्रेष्ठ) शक्ति आगे बढ़ती है।

Mantra 7

समीं पणेरजति भोजनं मुषे वि दाशुषे भजति सूनरं वसु । दुर्गे चन ध्रियते विश्व आ पुरु जनो यो अस्य तविषीमचुक्रुधत् ॥

वह पाणि से साधक के लिए संचित भोग-धन को छीनकर दूर कर देता है; और जो दान देता है, उसे वह तेजस्वी, सुदृढ़ वसु (सम्पदा) बाँटता है। दुर्गम मार्गों में भी समस्त जन-समूह टिकाया जाता है—वही, जिसने उसकी तविषी (प्रचण्ड शक्ति) के विरुद्ध क्रोध नहीं किया।

Mantra 8

सं यज्जनौ सुधनौ विश्वशर्धसाववेदिन्द्रो मघवा गोषु शुभ्रिषु । युजं ह्यन्यमकृत प्रवेपन्युदीं गव्यं सृजते सत्वभिर्धुनिः ॥

जब दानी इन्द्र ने, विश्व-शर्धस् (सर्वव्यापी सेनाओं) सहित, चमकती गौओं (किरणों) के बीच दो सुसंचित जनों को पाया, तब उसने एक को दूसरे का युग्म (सह-योक) बना दिया। वह धुनि (हिलाने-डुलाने वाला), अपने सत्वों (शक्तियों) से, उज्ज्वल गौ-धन को ऊपर की ओर मुक्त कर देता है।

Mantra 9

सहस्रसामाग्निवेशिं गृणीषे शत्रिमग्न उपमां केतुमर्यः । तस्मा आपः संयतः पीपयन्त तस्मिन्क्षत्रममवत्त्वेषमस्तु ॥

मैं सहस्र-गान करने वाले अग्निवेशि की स्तुति करता हूँ—हे अग्नि, शत्रु-विजयी, आर्य साधक का अनुपम केतु (ध्वज-चिह्न)। उसके लिए संहत जल-धाराएँ परिपूर्णता से बढ़ें; उसमें क्षत्र (राजस-बल) अमवत्त्व (प्रबलता) में तेजस्वी हो।

Frequently Asked Questions

It is a Soma-ritual hymn calling Indra to the offering, praising him as the power that turns mantra and sacrifice into victory, strength, and right order.

Because the hymn ties spiritual and social success to disciplined ritual effort: those who press and offer are strengthened, while neglect of the offering represents inertia or refusal of sacred order.

It presents Indra as the bearer and carrier of brahman—i.e., the inspired Word/mantra—so the hymn suggests that true speech and right offering become effective power through him.

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