Chaturtha Pada
The Narration of the Brāhma Purāṇa’s Account (Brāhma Purāṇānukramaṇikā)
कुमार के पूर्व उपदेश से प्रसन्न नारद श्रेष्ठ पौराणिक कथा माँगते हैं—पुराणों का वर्गीकरण, विभाग, श्लोक-परिमाण, वर्णाश्रम-आचार, व्रत और वंश-चरित। सनत्कुमार बताते हैं कि पुराण-समूह अनेक कल्पों में विस्तृत है और नारद को सनातन के पास भेजते हैं। सनातन नारायण का ध्यान कर नारद की एकाग्र भक्ति की प्रशंसा करते हुए ब्रह्मा का मरीचि को दिया प्राचीन उपदेश सुनाते हैं—प्रत्येक कल्प में आरम्भ में एक विशाल पुराण था, जिससे सब शास्त्र फैले; हरि प्रत्येक द्वापर में व्यास रूप से प्रकट होकर उसे चार लाख श्लोकों में स्थिर कर अठारह पुराणों में विभाजित करते हैं। फिर ब्राह्म पुराण की अनुक्रमणिका दी जाती है—दो भाग, देव-प्रजापति, सूर्य व वंश, राम-कृष्ण कथाएँ, द्वीप-वर्ष, स्वर्ग-पाताल-नरक, तीर्थ-विधि, श्राद्ध व यमलोक, युगधर्म, प्रलय, योग-सांख्य, ब्रह्मवाद; तथा लिखने/दान करने और सुनने/पाठ करने के फल।
The Description of the Index (Anukramaṇikā) of the Padma Purāṇa
इस अध्याय में ब्रह्मा पद्मपुराण की अनुक्रमणिका बताते हैं—पाप-नाशक, पाँच खण्डों में विभक्त, सृष्टि-क्रम से पुलस्त्य द्वारा भीष्म को उपदिष्ट, और कथाओं, इतिहासों व व्रत-नियमों से धर्मसमृद्ध। वे पुष्कर-माहात्म्य, ब्रह्मयज्ञ-विधि, वेद-पाठ के चिह्न, दान-व्रत, पार्वती-विवाह, तारक-वृत्तान्त, गो-महिमा और दैत्य-वध आदि विषय गिनाकर सृष्टि-खण्ड (ग्रह-पूजा व दान सहित) का संकेत करते हैं। फिर भूमि-खण्ड में शिवशर्म, सुव्रत, वृत्र, पृथु, नहुष, ययाति, गुरु-तीर्थ, अशोकसुन्दरी, हुण्ड आदि कथाओं की कड़ी, साथ ही लोक-रचना, पृथ्वी-विन्यास और नर्मदा, कुरुक्षेत्र, यमुना, काशी, गया, प्रयाग आदि तीर्थों का विस्तृत वर्णन बताते हैं। आगे वर्णाश्रम-कर्मयोग, समुद्र-मन्थन, ऊर्ज्जा के पाँच दिन, राम का अश्वमेध व राज्याभिषेक, जगन्नाथ व वृन्दावन, कृष्ण-लीला, माधव-स्नान-फल, शिव-भक्ति (भस्म, शिव-गीता) तथा उत्तर-खण्ड में एकादशी-समूह, महाद्वादशी, कार्तिक-व्रत, माघ-स्नान, विष्णु-धर्म, विष्णु-सहस्रनाम, अवतार-कथाएँ, रामनाम-शत और गीता/भागवत-प्रशंसा आती है। अंत में फलश्रुति—अनुक्रमणिका का श्रवण-पाठ पद्मपुराण-श्रवण के समान पुण्य देता है; ज्येष्ठ पूर्णिमा को लिखित पुराण का दान वैष्णव-पद प्रदान करता है।
The Outline (Anukramaṇī) of the Viṣṇu Purāṇa
इस अध्याय में ब्रह्मा महावैष्णव विष्णु-पुराण की अनुक्रमणी बताते हैं—उसका विस्तार और पाप-नाशक महिमा। फिर उसके छह अंश गिनाए जाते हैं: (1) सृष्टि, देवोत्पत्ति, समुद्र-मंथन, दक्ष से वंशावलियाँ; ध्रुव, पृथु, प्रचेतस, प्रह्लाद, प्रियव्रत-वंश तथा द्वीप-वर््ष आदि भूगोल। (2) पाताल-लोक व नरक, सात स्वर्ग, सूर्य-चन्द्र ज्योतिष, वारों के गुण; भरत का मोक्षोपदेश और निदाघ–ऋभु संवाद। (3) मन्वन्तर, व्यासावतार, नरक-मोचन कर्म, सगर–और्व धर्म-उपदेश, श्राद्ध-विधि, वर्णाश्रम-धर्म, सदाचार और माया-जन्य मोह। (4) सूर्यवंश-चन्द्रवंश के राज-चरित। (5) कृष्णावतार की जिज्ञासा, गोकुल से मथुरा-द्वारका तक की लीलाएँ, दैत्य-वध, विवाह और अष्टावक्र कथा। (6) कलियुग-आचार, चार प्रकार के प्रलय, खाण्डिक्य का ब्रह्मज्ञान; तथा विष्णुधर्मोत्तर के धर्म-वचन—व्रत, यम-नियम, धर्म-शास्त्र/अर्थ-शास्त्र, वेदान्त, ज्योतिष, स्तोत्र और मनु। अंत में फलश्रुति—पढ़ने, सुनने, लिखने, दान व उपदेश से पुण्य और विष्णुधाम-प्राप्ति।
The Outline (Anukramaṇī) of the Vāyavīya (Vāyu) Purāṇa
ब्रह्मा एक ब्राह्मण से वायवीय (वायु) पुराण की प्रशंसा करते हैं और कहते हैं कि यह रुद्र के परम धाम की प्राप्ति का साधन है। वे इसका विस्तार 24,000 श्लोक बताते हैं और श्वेतकल्प में वायु द्वारा धर्मोपदेश का प्रसंग कहते हैं। यह पुराण दो भागों में, पञ्चलक्षण-परंपरा के अनुसार सर्ग से लेकर मन्वंतर-वंशों तथा गयासुर-वध के विस्तृत वर्णन तक सर्वांगपूर्ण है। इसमें मास-महात्म्य (विशेषतः माघ), दान-धर्म, राज-धर्म, लोकों में प्राणियों के भेद, तथा व्रत-नियमों के पूर्वविभाग भी बताए गए हैं। उत्तरभाग में शिव-संहिता के अनुरूप नर्मदा-तीर्थ-महात्म्य है—तटों पर शिव की व्यापकता, नर्मदा-जल का ब्रह्मस्वरूप और मोक्षदायकत्व, तथा रेवाशक्ति रूप में अवतरण। 35 संगमों और असंख्य तीर्थों की गणना के बाद श्रावणी में गुड़-धेनु दान व पाठ-विधि बताकर फलश्रुति दी गई है—चौदह इंद्रों तक रुद्रलोक की प्राप्ति और केवल अनुक्रमाṇी सुनने से भी पूर्ण पुराण-श्रवण का पुण्य।
The Exposition of the Index (Anukramaṇī) of the Śrīmad Bhāgavata
ब्रह्मा मरीचि को वेदव्यासकृत श्रीमद्भागवत पुराण की संक्षिप्त अनुक्रमणी सुनाते हैं—इसे वेदतुल्य (ब्रह्मसम्मित), 18,000 श्लोकों वाला और बारह स्कन्धों में विभक्त बताते हैं। फिर प्रत्येक स्कन्ध के प्रमुख प्रसंग और सिद्धान्त बताते हैं: सूत की सभा तथा व्यास–पाण्डव–परीक्षित की रूपरेखा; द्विविध सृष्टि और भगवान के कर्म; विदुर–मैत्रेय संवाद व कपिल सांख्य; ध्रुव, पृथु, प्राचीनबर्हि; लोकवर्णन, नरक, अजामिल, दक्षयज्ञ; वृत्रासुर व मरुत; प्रह्लाद और वर्णाश्रम; मन्वन्तर, गजेन्द्र, समुद्रमन्थन, बलि; अवतार तथा सूर्य-चन्द्र वंश; कृष्ण की व्रज-लीला; मथुरा–द्वारका, भूभारहरण व निरोध; उद्धव-उपदेश, यादव-विनाश, कलि-लक्षण और परीक्षित-मोक्ष; वेद-शाखा-संग्रह, मार्कण्डेय तप, सूर्य-प्रादुर्भाव, सात्वत सिद्धान्त; अंत में पुराण-गणना। अध्याय के अंत में श्रवण-पाठ-प्रवचन के फल बताए जाते हैं और प्रौष्टपदी पूर्णिमा को स्वर्ण-सिंह-चिह्न सहित ग्रंथ का दान भागवत ब्राह्मण को करने की विधि कही जाती है।
Anukramaṇī (Synoptic Table of Contents) of the Śrī Bṛhannāradīya Purāṇa
इस अध्याय में श्रीब्रह्मा एक ब्राह्मण से बृहन्नारदीय पुराण का विस्तार (२५,००० श्लोक, बृहत्कल्प-परम्परा) बताकर उसकी अनुक्रमणी देते हैं। सूत–शौनक संवाद-परम्परा और संक्षिप्त सृष्टिवर्णन, प्रथम पाद में सनक का उपदेश, द्वितीय पाद ‘मोक्षधर्म’, वेदाङ्ग-विषय तथा सनन्दन द्वारा नारद को शुकदेव के जन्म की कथा कही गई है। महातन्त्र-भाग में जीव-बन्धन से मुक्ति, मन्त्र-शुद्धि, दीक्षा, मन्त्र-निर्गमन, पूजाविधि और गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव, शक्ति के लिए प्रयोग, कवच, नाम-सहस्र, स्तोत्र आदि का संकलन है। तृतीय खण्ड में सनत्कुमार पुराण-लक्षण, प्रमाण, दान और मासानुसार तिथि-निर्णय बताते हैं। चतुर्थ पाद में सनातन प्रतिपदा-व्रतों से आरम्भ कर एकादशी-व्रत तक ले जाते हैं, मन्धाता–वसिष्ठ, रुक्माङ्गद, मोहिनी के शाप-उद्धार आदि कथाओं से पुष्टि करते हैं। गंगा, गया, काशी, पुरुषोत्तम, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, बदरी, कामाक्षा, प्रभास, पुष्कर, गौतम-तीर्थ, वेदपाद-स्तुति, गोकर्ण, सेतु, नर्मदा, अवन्ती, मथुरा, वृन्दावन आदि के तीर्थ-माहात्म्य और यात्रा-विधि का संकेत है। अंत में श्रवण-फल और सात गायों तथा बाण-तूणीर के दान का फल—मोक्ष/स्वर्ग-प्राप्ति—कहा गया है।
The Anukramaṇī (Summary/Index) of the Mārkaṇḍeya Purāṇa
इस अध्याय में श्री ब्रह्मा मार्कण्डेय पुराण की अनुक्रमणी बताते हैं—उसकी प्रसिद्ध ९,००० श्लोक-परिमिति, पक्षी-रूप में धर्मोपदेश, और कथाखण्डों का क्रम। जैमिनि द्वारा निवेदित मार्कण्डेय का प्रश्न, पक्षी-धर्म व उत्पत्ति, पूर्वजन्म-कथाएँ, सूर्य का अद्भुत परिवर्तन, बलराम की तीर्थयात्रा, द्रौपदी के पुत्र, हरिश्चन्द्र, आडीबक युद्ध, पिता–पुत्र प्रसंग, दत्तात्रेय, हैहय-आख्यान, मदालका व अलर्क, नौ प्रकार की सृष्टि (कल्पान्त-काल, यक्ष-सृष्टि, रुद्र-उद्भव सृष्टि), द्वीप-आचार व यात्राएँ, मन्वन्तर-कथाएँ; आठवें विभाग में दुर्गा-कथा; वैदिक तेज से प्रणव की उत्पत्ति; मार्तण्ड का जन्म-माहात्म्य; वैवस्वत मनु की वंशावली; वत्सप्री, खनित्र, अविक्षि व किमिच्छा-व्रत, नरिष्यन्त, इक्ष्वाकु, नल, रामचन्द्र, कुश-वंश; चन्द्रवंश, पुरूरवा, नहुष, ययाति, यदुवंश; श्रीकृष्ण की बाल-लीलाएँ, मथुरा-इतिहास, द्वारका, अवतार-सम्बन्धी प्रसंग; तथा संक्षिप्त सांख्य और प्रकट जगत की असत्ता का उपदेश। अंत में फलश्रुति—भक्ति से श्रवण/पाठ कराने पर परम सिद्धि; कार्त्तिक में ग्रन्थ लिखकर सुवर्ण-हाथी सहित दान देने से ब्रह्मलोक; और अनुक्रमणी सुनने मात्र से भी इच्छित फल।
The Exposition of the Table of Contents (Anukramaṇī) of the Agni Purāṇa
इस अध्याय में श्री ब्रह्मा ईशान-कल्प में परंपरागत, अग्नि द्वारा वसिष्ठ को उपदिष्ट आग्नेय/अग्नि पुराण की सुव्यवस्थित अनुक्रमणी बताते हैं। वे इसका परिमाण 15,000 श्लोक कहते हैं और पाठक तथा श्रोता—दोनों के लिए इसे परम पावन बताते हैं। फिर विषय-सूची में अवतार-कथाएँ, सृष्टि-वर्णन, वैष्णव-पूजा, अग्निकर्म, मंत्र-मुद्रा-विचार, दीक्षा-अभिषेक, मंडल-रचना, शुद्धि, पवित्र-प्रतिष्ठा, मंदिर-नियम, मूर्ति-लक्षण, न्यास, प्रतिष्ठा व मंदिर-निर्माण, विनायक व कुब्जिका-उपासना, कोटि-होम, मन्वंतर, आश्रम-धर्म (ब्रह्मचर्य आदि), श्राद्ध, ग्रह-यज्ञ, प्रायश्चित्त, तिथि-वार-नक्षत्र व मास-व्रत, दीप-दान, व्यूह-पूजा, नरक-वर्णन, नाड़ी-चक्र व संध्या-विधि, गायत्री-अर्थ, लिंग-स्तोत्र, राजाभिषेक-मंत्र व राजधर्म, स्वप्न-शकुन, रत्न-दीक्षा व रत्न-शास्त्र, राम-नीति, धनुर्वेद, व्यवहार, देवासुर-विमर्द, आयुर्वेद व पशु-चिकित्सा सहित शांति-कर्म, छंद, साहित्य, कोश, प्रलय-तत्त्व, देह-विचार, योग और श्रवण से ब्रह्म-ज्ञान-फल तक का व्यापक निरूपण आता है। अंत में मार्गशीर्ष में स्वर्ण-लेखनी सहित ग्रंथ-दान और तिल-धेनु-दान का विधान कर लौकिक-पारलौकिक फल की पुष्टि की जाती है।
The Exposition of the Contents (Anukramaṇī) of the Bhaviṣya Purāṇa
ब्रह्मा भविष्य पुराण को सिद्धि देने वाला बताकर उसकी परंपरा बताते हैं—ब्रह्मा से स्वायम्भुव मनु तक, जिन्होंने सभी पुरुषार्थों के साधन रूप धर्म के विषय में पूछा। आगे व्यास धर्म-संग्रह को संकलित कर पाँच भागों में बाँटते हैं; आरम्भ में ब्राह्म पर्व और अधोर-कल्प की कथाएँ आती हैं। यह सूत–शौनक संवाद-धारा में स्थित, सर्ग आदि पुराण-लक्षणों से युक्त, शास्त्र-सार तथा पुस्तक/ताड़पत्र-लेखन के संकेतों सहित कहा गया है। इसमें संस्कारों का वर्णन, पक्ष-तिथि से जुड़े अनेक कल्पों की गणना, शेष कल्पों का वैष्णव पर्व में समावेश तथा शैव-सौर परंपराओं में क्रम-भेद बताया गया है। पाँचवाँ भाग ‘प्रतिसर्ग’ संक्षेप से उपसंहार करता है। गुणों के अनुसार देवताओं की क्रमिक ‘समता’ बताकर, पुष्य नक्षत्र में पुराण की प्रतिलिपि बनाकर गुड़-धेनु आदि दानों सहित दान, पाठक व ग्रंथ-पूजन, उपवास और श्रवण-पाठ का विधान है—जिससे पाप-नाश, भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
The Exposition of the Table of Contents of the Brahmavaivarta Purāṇa
ब्रह्मा अपने ‘बालक’ श्रोता से इस अनुक्रमणिका-क्रम में दसवें पुराण—ब्रह्मवैवर्त पुराण—का परिचय देते हैं, जो वेद के अर्थ और वेद-मार्ग का मार्गदर्शक है। यह रथन्तर-कल्प से सम्बद्ध, शत-कोटि पुराण-परम्परा में संक्षिप्त, और व्यास द्वारा चार खण्डों—ब्रह्मखण्ड, प्रकृतिखण्ड, विघ्नेशखण्ड, कृष्णखण्ड—में 18,000 श्लोकों सहित, सूत–ऋषि संवाद के रूप में व्यवस्थित बताया गया है। कथा-सार में सृष्टि, नारद-ब्रह्मा विवाद, शिवलोक-प्राप्ति व शिव-सम्बन्धी ज्ञान, सावर्णि की पुण्य-यात्रा, फिर प्रकृति के अंश/कलाएँ और कर्मकाण्ड की सामग्री का वर्णन आता है। विघ्नेश खण्ड में गणेश-जन्म का प्रश्न, व्रत और संघर्ष (जमदग्न्य आदि सहित) हैं। कृष्ण खण्ड में श्रीकृष्ण का जन्म, गोकुल-लीलाएँ, राधा-गोपियों संग रास, मथुरा की घटनाएँ, संस्कार, सान्दीपनि के आश्रम में अध्ययन, शत्रु-वध और द्वारका-गमन का सार है। अंत में फलश्रुति—पढ़ने, सुनने, लिखने, दान करने और अनुक्रमणिका सुनने मात्र से भी श्रीकृष्ण की कृपा से मोक्ष मिलता है।
The Exposition of the Anukramaṇī (Index/Summary) of the Liṅga Purāṇa
ब्रह्मा लिङ्गपुराण का परिचय शैव पुराण के रूप में देते हैं, जो श्रवण और पाठ से भुक्ति तथा मुक्ति प्रदान करता है। अग्निरूप लिङ्ग में स्थित शिव को इसका प्रकाशक कहा गया है और कथा-ढाँचा अग्नि-कल्प पर आधारित बताया गया है। व्यासकृत, दो भागों में विन्यस्त, लगभग 11,000 श्लोकों वाला यह पुराण हर की महिमा को प्रधान मानता है। फिर विषय-सूची क्रम से आती है—आरम्भिक प्रश्न, संक्षिप्त आदिसृष्टि, योगोपदेश, कल्प-वर्णन, लिङ्ग व अम्बा का प्राकट्य, सनत्कुमार संवाद, दधीचि, युगधर्म, भुवनकोश, सूर्य-चन्द्र वंश, विस्तृत सृष्टि, त्रिपुर प्रसंग, लिङ्ग-प्रतिष्ठा, पशु-पाश से विमोचन, शिव-व्रत, आचार, प्रायश्चित्त, अरिष्ट-लक्षण व शान्ति, काशी व श्रीशैल, अन्धक, वराह-नरसिंह, जलन्धर-वध, शिव-सहस्रनाम, दक्षयज्ञ-विध्वंस, काम-दहन और पार्वती-विवाह। अंत में फलश्रुति—फाल्गुन पूर्णिमा को तिल-धेनु सहित लिखित प्रति का दान महापुण्य देता है; श्रवण-पाठ पाप नष्ट कर शिवलोक और शिव-सायुज्य प्रदान करते हैं।
The Description of the Anukramaṇikā (Chapter-wise Summary) of the Varāha Purāṇa
इस अध्याय में ब्रह्मा वराहपुराण की अनुक्रमणिका-सार देता है—24,000 श्लोक, दो खंड। आरम्भ में भूमी–वराह संवाद और व्यास को नारायणावतार बताया गया है। रम्भा, दुर्जय, श्वेत आदि आख्यान-चक्र, यम से जुड़ा मुनिपुत्र प्रसंग, तथा गौरी-प्रादुर्भाव, विनायक, नाग, गण, कुबेर/धनद, आदित्य आदि विषय आते हैं। श्राद्ध-विधि, पर्व-अनुष्ठान, गो-दान, व्रत, तीर्थ-यात्रा और 32 अपराधों के प्रायश्चित्त का उपदेश है; मथुरा और पाप-नाशक गोकर्ण की विशेष महिमा कही गई है। उत्तर खंड में पुलस्त्य–कुरु संवाद द्वारा पुष्कर सहित तीर्थ-माहात्म्य और उत्सव-विधान वर्णित है। अंत में श्रवण/पठन/लेखन का फल—विष्णु-भक्ति की वृद्धि और वैष्णव-गति; साथ ही स्वर्ण-गरुड़, तिल-धेनु तथा चैत्र मास में ब्राह्मण को दान का विधान है।
The Description of the Skanda Purāṇa’s Anukramaṇī (Index/Summary)
ब्रह्मा मरीचि को स्कन्दपुराण की अनुक्रमणी सुनाते हैं—उसका विशाल विस्तार, व्यास द्वारा निचोड़ा गया सार, और सात खण्डों का विभाजन। माहेश्वर-खण्ड में शिव-कथाओं की परम्परा—दक्ष-यज्ञ का विध्वंस, लिङ्ग-पूजा, समुद्र-मन्थन, स्कन्द का जन्म, तारकासुर-वध तथा लोक-वर्णन। वैष्णव-खण्ड में अवतार-कथाएँ, भक्ति-साधना, और व्रत-कल्प का विस्तार—कार्तिक, माघ, एकादशी, उत्सव-विधि, तथा मथुरा/अयोध्या के माहात्म्य। ब्रह्म-खण्ड में सेतु व धर्मारण्य, वर्णाश्रम-धर्म, दान, चातुर्मास्य, मन्त्र-योग और शैव-व्रत—शिवरात्रि, प्रदोष। काशी-खण्ड में वाराणसी की पवित्र भूगोल-रचना और आचार-नियम; अवन्ति-खण्ड में उज्जयिनी-महाकालवन के तीर्थ व प्रायश्चित्त; नागर-खण्ड में हरिश्चन्द्र-विश्वामित्र-त्रिशंकु की कथाएँ और क्षेत्रीय तीर्थ; प्राभासिक-खण्ड में प्रभास तथा द्वारका-गोमती की तीर्थयात्रा-परम्परा का समापन। अंत में शिव-स्तुति करने वाली इस अनुक्रमणी को लिखने और दान करने के पुण्य की प्रशंसा है।
The Anukramaṇikā (Contents-Outline) of the Vāmana Purāṇa
ब्रह्मा वामनपुराण की अनुक्रामणिका बताते हैं—यह 10,000 श्लोकों का त्रिविक्रम-प्रधान ग्रंथ है, विभागों और दो भागों में व्यवस्थित। इसमें पुराण-विषयक प्रश्न, ब्रह्मा के सिर का छेदन और कपाल-दोष से मुक्ति, दक्ष-यज्ञ का विघ्न, शिव का काल-स्वरूप और काम-दहन, प्रह्लाद–नारायण तथा देव–असुर संघर्ष, सुकेशी–अर्क प्रसंग, भुवन-भूगोल, काम्य-व्रत, और देवी दुर्गा का पावन आख्यान आते हैं। आगे तपती, कुरुक्षेत्र, सत्या-माहात्म्य, पार्वती का जन्म, तप और विवाह, गौरी/कौशिकी, कुमार, अंधक-वध और गणों में उसका लय, मरुतों का जन्म, बलि के पराक्रम, लक्ष्मी-कथाएँ, प्रह्लाद-तीर्थ, धुन्धु, प्रेत-उपाख्यान, नक्षत्र-पुरुष और श्रीदाम का वर्णन है। उत्तर के बृहद्-वामन भाग में चार संहिताएँ—माहेश्वरी, भागवती, सौरि, गाणेश्वरी—प्रत्येक में हजार-हजार विषय; कृष्ण-भक्तों की महिमा, देवी द्वारा खाट का उद्धार, सूर्य का पाप-नाशक माहात्म्य और गणेश के चरित हैं। अंत में परंपरा (पुलस्त्य→नारद→व्यास→रोमहर्षण) और फलश्रुति—पाठ, श्रवण, लेखन, दान (विशेषतः शरद्-विषुव पर), घृत-धेनु आदि दान से विष्णु के परम धाम की प्राप्ति।
Kūrmāpurāṇa-Anukramaṇikā (Index/Summary of the Kūrma Purāṇa)
ब्रह्मा मरीचि को लक्ष्मी-कल्प के बाद आने वाले, हरि के कूर्मावतार-केन्द्रित कूर्मपुराण का क्रमबद्ध सार सुनाते हैं। यह चार भागों में 17,000 श्लोकों का ग्रंथ है, जो कथाओं के माध्यम से चार पुरुषार्थ सिखाता है—लक्ष्मी–इन्द्रद्युम्न संवाद और कूर्म से जुड़े ऋषियों के प्रसंग सहित। इसमें वर्ण–आश्रम आचार, सृष्टि-उत्पत्ति, काल-गणना व प्रलय तथा सर्वव्यापी प्रभु की स्तुति, और शिव-प्रधान विषय—शंकर-कथा, पार्वती-सहस्रनाम, योग—का उल्लेख है। भृगु, स्वायंभुव मनु, कश्यप, आत्रेय की वंशावलियाँ, दक्ष-यज्ञ का विध्वंस व पुनः सृष्टि, श्रीकृष्ण-चरित, युग-धर्म, व्यास–जैमिनि संवाद, वाराणसी-प्रयाग आदि तीर्थ-भूगोल और वेद-शाखाओं का निरूपण भी बताया गया है। ऐश्वर्य-गीता, व्यास-गीता, तीर्थ-माहात्म्य, ब्राह्मीया संहिता रूप प्रतिसर्ग, तथा भागवती संहिता में वर्णों की जीविका (शंकरज के पंच-पाद विवेचन सहित), सौर उपदेश और वैष्णवी चतुर्थी-व्रत का वर्णन है। अंत में फलश्रुति और दान-विधि—अयन पर स्वर्ण कूर्म-चिह्न सहित ग्रंथ की प्रति लिखकर दान देने से परम सिद्धि—कहा गया है।
Matsya-purāṇa Anukramaṇikā (Synopsis / Table of Contents)
इस अध्याय में ब्रह्मा मत्स्यपुराण की संक्षिप्त अनुक्रामणिका बताते हैं—मनु‑मत्स्य संवाद, ब्रह्माण्ड‑सृष्टि, ब्रह्मा, देव, असुर और मरुतों की उत्पत्ति, मन्वन्तर‑युग व्यवस्था तथा युगानुसार धर्म। वंशावलियाँ और पितृ‑परम्परा श्राद्ध‑काल सहित, तथा प्रमुख आख्यान—तारक, पार्वती का तप‑विवाह, स्कन्द का जन्म‑विजय, नरसिंह, वराह, वामन और अन्धक। वाराणसी, नर्मदा, प्रयाग आदि तीर्थों की महिमा; व्रत‑कल्प (विविध द्वादशी, सप्तमी, शयन, नक्षत्र‑व्रत), दान (मेरु‑दान, कृष्णाजिन‑दान), ग्रह‑शान्ति और ग्रहण‑अभिषेक। वास्तु‑शास्त्र, मूर्ति‑मन्दिर/मण्डप के भेद, भविष्य के राजा, महा‑दान और कल्प‑चक्र भी वर्णित हैं। अंत में फलश्रुति तथा विषुव पर सुवर्ण‑मत्स्य और गौ सहित ग्रन्थ‑दान का विधान है, जिससे हरि‑धाम की प्राप्ति कही गई है।
The Description of the Index/Summary of the Garuḍa (Purāṇa)
ब्रह्मा मरीचि से गरुड़पुराण की शुभ अनुक्रमणिका कहते हैं—यह भगवान का गरुड़ (तार्क्ष्य) को उपदेश है, जिसका विस्तार 19,000 श्लोक बताया गया है। इसमें विषय-क्रम आता है: सृष्टि-वर्णन; सूर्यादि देवताओं की पूजा-पद्धतियाँ, दीक्षा, श्राद्ध, व्यूह-पूजा, वैष्णव पंजर-स्तोत्र, योग और विष्णु-सहस्रनाम; शिव, गणेश, गोपाल, श्रीधर आदि की उपासना; न्यास-संध्या, दुर्गा-देवपूजा, पवित्रारोपण, प्रतिमा-ध्यान; वास्तु व मंदिर-लक्षण, प्रतिष्ठा-विधि; दान-प्रायश्चित्त; लोक-नरक-वर्णन; ज्योतिष, सामुद्रिक, स्वर, रत्न-शास्त्र; तीर्थ-माहात्म्य (विशेषतः गया); मन्वंतर, पितृ-धर्म, वर्णाश्रम-कर्तव्य, शौच, ग्रह-यज्ञ, नीति-शास्त्र, वंश व अवतार, आयुर्वेद, व्याकरण व वेदांग, तथा युग-संक्रांति-व्रत। आगे प्रेतकल्प में योगियों को धर्म-उपदेश, मृत्यु-पश्चात मंत्र-दान, यममार्ग, प्रेत-लक्षण व दुःख, पिंडीकरण, अंत्येष्टि का अधिकार-काल, नारायणबलि, वृषोत्सर्ग, कर्म-विपाक, लोक-विन्यास, प्रलय और श्रवण-पाठ-दान के फल बताए गए हैं।
The Description of the Brahmāṇḍa Purāṇa’s Table of Contents (Anukramaṇī)
बृहन्नारदीय पुराण के पूर्वभाग में ब्रह्मा मरीचि से ब्रह्माण्ड पुराण का विस्तार और विभाग बताते हैं। वे चार पाद—प्रक्रीया, अनुषंग, उपोद्घात, उपसंहार—को पूर्व, मध्य और उत्तर भागों में रखकर विषय-सूची देते हैं। इसमें कर्म-धर्म, नैमिषारण्य की कथा, हिरण्यगर्भ और सृष्टि-रचना, कल्प-मन्वंतर, मानस-सृष्टि, रुद्र-जन्म, महादेव के प्राकट्य, ऋषियों की उत्पत्ति; भुवनकोश (भारत आदि, सप्तद्वीप, पाताल व ऊर्ध्वलोक), ग्रह-गति, सूर्य-रचना; युग-धर्म और युगांत; वैदिक विपत्तियाँ, स्वायंभुव आदि मनु, पृथ्वी-दोहन; वैवस्वत मनु में राजर्षि वंश (इक्ष्वाकु, अत्रि-वंश, ययाति, यदु, कार्तवीर्य, परशुराम, वृष्णि, सगर), देवासुर संग्राम, श्रीकृष्णावतार, स्तोत्र और बलि-वंश; कलियुग के लिए भविष्य-विषय; फिर प्रलय, काल-मान, चौदह लोक, नरक, मनोमय नगरी, प्रकृति-लय, शैव पुराण का संकेत, गुणानुसार गति, तथा अन्वय-व्यतिरेक से ब्रह्म का निर्देश आता है। अंत में पुराण-परंपरा, श्रवण-पाठ-लेखन का फल और दान/उपदेश के आचार-नियम बताए गए हैं।
The Exposition of the Pratipadā Vrata for the Twelve Months
नारद जी तिथियों का क्रमबद्ध विवरण माँगते हैं ताकि व्रत का निर्णय स्पष्ट हो। सनातन जी प्रतिपदा से तिथि-क्रम आरम्भ कर कहते हैं कि सही तिथि-क्रम का पालन ही सिद्धि देता है। चैत्र में सूर्योदय के समय सृष्टि-आरम्भ से प्रतिपदा की प्रतिष्ठा बताकर प्रतिपदा के मुख्य कर्म ‘पूर्वविद्धा’ रूप से करने का निर्देश है। अशुद्धि, अमंगल और कलिदोष-नाश हेतु महाशान्ति, फिर ब्रह्मा-पूजन (पाद्य-अर्घ्य, पुष्प, धूप, वस्त्र, आभूषण, नैवेद्य), उसके बाद होम और ब्राह्मण-तृप्ति तथा देवताओं की क्रमशः पूजा कही गई है। ओंकार और पवित्र जल से अभिमंत्रित वस्त्र व स्वर्ण-दान अनिवार्य है; दक्षिणा सहित समापन से सौरि-व्रत तथा उसी तिथि का विद्या-व्रत भी सिद्ध होता है। कृष्ण-प्रोक्त ‘तिलक’ विधि (करवीर पुष्प, सात अंकुरित धान्य, फल, क्षमा-मंत्र) का वर्णन है। भाद्रपद शुक्ल प्रतिपदा का व्रत लक्ष्मी-बुद्धि देने वाला, सोमवार से आरम्भ कर साढ़े तीन महीने, कार्तिक में उपवास-पूजन और वायन-दान सहित बताया गया है। शिव के लिए मौन-व्रत (16 उपचार, कलश पर स्वर्ण-शिव, गोदान), अशोक-व्रत, नवरात्र (घट-स्थापना, अंकुर, देवी-माहात्म्य पाठ, कुमारी-पूजन), गोवर्धन पर विष्णु का अन्नकूट, मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष का धन-व्रत, आगे सूर्य/अग्नि/शिव के कर्म, और वैशाख में विष्णु-पूजा से सायुज्य-प्राप्ति कही गई है। अंत में सभी प्रतिपदा-व्रतों के लिए ब्रह्मचर्य और हविष्य-अन्न का नियम दोहराया गया है।
The Second Twelve-Month Vrata: Dvitīyā Observances and Their Fruits
सनातन एक ब्राह्मण को द्वितीया-तिथि पर आधारित “दूसरी” बारह-मासिक व्रत-श्रृंखला बताते हैं। चैत्र शुक्ल द्वितीया से साधक शक्ति-सहित ब्रह्मा की हवि और सुगंधों से पूजा कर काम-पूर्ति और ब्रह्म-प्राप्ति का संकल्प करता है। फिर मासानुसार विधियाँ आती हैं—वैशाख में ब्रह्मा का विष्णु-रूप सात धान्यों सहित (राधा), ज्येष्ठ में सूर्य/भास्कर-पूजा से सूर्यलोक, आषाढ़ में राम–सुभद्रा रथयात्रा-महोत्सव, नभस में विश्वकर्मा/प्रजापति की “स्वपिती/अशोक-शयन” पूजा और गृह-रक्षा प्रार्थना, भाद्रपद में इन्द्र-रूप पूजा व अर्धचन्द्र-नैवेद्य, आश्विन में अक्षय दान का महत्त्व, ऊर्ज में यम–यमुना ‘यमा’ व्रत में बहन का सम्मान व भोजन। मार्गशीर्ष द्वितीया पर पितृ-श्राद्ध, पौष में गो-शृंग से संस्कारित स्नान व चन्द्र-अर्घ्य, माघ में लाल पुष्प, गौ और स्वर्ण प्रतिमा सहित सूर्य/प्रजापति-पूजा, फाल्गुन में श्वेत सुगंधित पुष्पों व साष्टांग प्रणाम से शिव-पूजा। कृष्णपक्ष द्वितीयाओं पर भी विस्तार है; मास-रूप धारण करने वाले अग्नि को मूल द्वितीया-देवता मानकर ब्रह्मचर्य-नियम को कर्म-सिद्धि से जोड़ा गया है।
The Account of the Third-day Vow Observed through the Twelve Months (Tṛtīyā-vrata)
इस अध्याय में सनातन नारद को चन्द्र तिथि तृतीया से जुड़े व्रतों का उपदेश देते हैं, विशेषकर स्त्रियों के सौभाग्य, संतान और गृह-कल्याण हेतु। आरम्भ में चैत्र शुक्ल तृतीया का गौरी-व्रत बताया है—गौरी को पति सहित धातु/मिट्टी की युगल प्रतिमा बनाकर दूर्वा व आभूषणों से पूजन, उपवास, रात्रि-जागरण, गुरु को दान और अंत में विसर्जन। फिर 12 वर्षों तक दीर्घ-पालन और समापन दान (धेनुद्वादश-संकल्प) का विधान है। आगे अक्षया (राधा) तृतीया में किए कर्म को अक्षय फलदायी कहा गया; तिथि-काल को युग-आरम्भ से जोड़कर विष्णु-श्री पूजन, गंगा-स्नान, अक्षत का प्रयोग और ब्राह्मण-भोजन बताया है। इसके बाद मासानुसार रम्भा-व्रत (ज्येष्ठ), आषाढ़ में केशव-लक्ष्मी पूजन, भाद्रपद में स्वर्ण-गौरी (16 वर्ष) का उद्यापन—होम व वायन-वितरण सहित—हारितालिका, हस्त नक्षत्र वाली हस्त-गौरी, कोटीश्वरी/लक्षेश्वरी (4 वर्ष; एक लाख अन्न व दूध की प्रतिमा), ईषा-महागौरी (5 वर्ष; पाँच सुवासिनियों व कलशादि का पूजन) तथा विष्णु-गौरी, हर-गौरी, ब्रह्म-गौरी, सौभाग्य-सुन्दरी आदि युगल व्रत आते हैं। अंत में तृतीया-व्रत की सामान्य रीति—देवी-पूजन, ब्राह्मण-सम्मान, दान, होम और विसर्जन—स्थिर की गई है।
The Explanation of the Twelve-Month Caturthī Vrata
इस अध्याय में सनातन एक ब्राह्मण को चंद्र-वर्ष भर की चतुर्थी-उपासना का विधान बताते हैं और उसे मनोकामना-पूर्ति करने वाला व्रत-कल्प कहते हैं। चैत्र की चतुर्थी में वासुदेव-स्वरूप गणेश की पूजा से आरम्भ कर, आगे के महीनों को वैष्णव व्यूहों से जोड़ते हैं—वैशाख में संकर्षण (शंख-दान), ज्येष्ठ में प्रद्युम्न (फल-मूल), आषाढ़ में अनिरुद्ध (संन्यासियों को लौकी/कुम्भी-भाण्ड) —और बारह वर्ष के चक्र तथा उद्यापन का वर्णन करते हैं। फिर विशेष व्रत आते हैं: ज्येष्ठ का सती-व्रत, आषाढ़ की रथन्तर-कल्प-संबद्ध चतुर्थी, श्रावण का जाति-चन्द्रोदय (पूर्ण ध्यान-प्रतिमा-वर्णन सहित, केवल मोदक-आहार), तथा दूर्वा-गणपति (यंत्र/रेखा, लाल उपहार, पाँच पवित्र पत्ते, दीर्घकाल गुरु-सेवा)। भाद्रपद में बहुलाधेनु-दान से गोलोक-फल, और सिद्ध-विनायक व्रत में 21 पत्तों से 21 नामों का पूजन, स्वर्ण-विनायक प्रतिमा-दान और पाँच वर्ष का अनुष्ठान बताया गया है। चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन निषिद्ध है और प्रायश्चित्त का पुराण-मंत्र दिया गया है। कपर्दीश (ईष) पूजा, स्त्रियों का करका-व्रत (कार्तिक कृष्ण-पक्ष), ऊर्ज शुक्ल-पक्ष का नाग-व्रत विष-रक्षा हेतु, चार वर्ष का क्रमिक नियम (होम सहित) और 16 नामों की गणेश-स्तुति (वर-व्रत के तुल्य) भी वर्णित हैं। पौष में मोदक-दक्षिणा, माघ कृष्ण में संकष्ट-व्रत (चन्द्रोदय पर पूजा व चन्द्र को अर्घ्य), माघ शुक्ल में गौरी-व्रत (ढुण्ढि/कुण्डा/ललिता/शान्ति नामों से) और फाल्गुन में ढुण्ढिराज-पूजा; साथ ही रविवार/मंगलवार की चतुर्थी के विशेष फल और सभी चतुर्थियों में विघ्नेश-भक्ति की सार्वभौमिकता का उपसंहार है।
The exposition of the Pañcamī vow to be observed in the twelve months
सनातन नारद को बारह महीनों में पञ्चमी-व्रतों का क्रमबद्ध विधान बताते हैं। चैत्र शुक्ल पञ्चमी को मत्स्य-जयन्ती व श्रीपञ्चमी—लक्ष्मी-पूजन, सुगन्धित द्रव्य और पायस-नैवेद्य। फिर पृथ्वी, चन्द्र और हयग्रीव व्रतों का उल्लेख; वैशाख में शेष/अनन्त-पूजा, ज्येष्ठ में पितृ-तर्पण व ब्राह्मण-भोजन। आषाढ़ के वायु-व्रत में पंचवर्ण ध्वज, लोकपाल-पूजा, याम-उपवास और स्वप्न-परीक्षा; अशुभ संकेत हों तो शिव-उपवास बढ़ाकर आठ ब्राह्मणों को भोजन। श्रावण कृष्ण पञ्चमी के अन्नाव्रत में अन्न-निर्माण व प्रोक्षण, पितृ-ऋषि-पूजन, याचकों को अन्नदान, प्रदोष में लिङ्ग-पूजा व पञ्चाक्षरी-जप, धान्य-वृद्धि की प्रार्थना; श्रावण शुक्ल पञ्चमी में इन्द्राणी-पूजा और धन-दान। भाद्रपद में नागों को दूध-आहुति तथा सप्तर्षि-व्रत (सात वर्ष)—मृत्तिका वेदी, अर्घ्य, अकृष्ट धान्य, स्वर्ण-प्रतिमाएँ, पञ्चामृत-स्नान, होम, गुरु-ब्राह्मण-सत्कार; फल दिव्य विमान-प्राप्ति। आगे आश्विन में उपाङ्ग-ललिता, कार्तिक में जयाव्रत (स्नान से पाप-नाश), मार्गशीर्ष में निर्भयता हेतु नाग-पूजा, पौष में विष्णु-पूजा। अंत में कहा है—हर मास की दोनों पञ्चमियों पर पितृ व नाग-पूजन कल्याणकारी है।
The Exposition of the Ṣaṣṭhī-vrata Observed Through the Twelve Months
सनातन नारद को बारह महीनों के अनुसार षष्ठी-व्रतों का विधान बताते हैं। चैत्र शुक्ल षष्ठी को कुमार-व्रत में षण्मुख/स्कन्द की पूजा से अभीष्ट सिद्धि और सद्गुणी संतान मिलती है; ज्येष्ठ में सूर्य-पूजन से मातृ-सुख; आषाढ़ में स्कन्द-व्रत से वंश-वृद्धि; श्रावण में शरजन्मा की सोलह उपचारों से आराधना। भाद्रपद कृष्ण षष्ठी का ललिता-व्रत स्त्रियों हेतु विस्तार से—प्रातः स्नान, श्वेत वस्त्र, संगम-तट की रेती पर पूजन, बाँस के पात्र में पिण्ड-रचना, पुष्प-सूची, 108 व 28 की गणना से जप, निर्दिष्ट तीर्थों पर प्रार्थना, बहु नैवेद्य, दीप-धूप, तथा रात्रि-जागरण (निद्रा निषिद्ध); फिर दान, ब्राह्मण/कन्या-भोजन और सुहागिनों का सम्मान। आश्विन शुक्ल षष्ठी में कात्यायनी-पूजा से पति व पुत्र-प्राप्ति; अन्य महीनों में चन्दना, वरुणा आदि नामक षष्ठियाँ तथा सूर्य/विष्णु/वरुण/पशुपति-पूजन, और अंत में शिवलोक-प्राप्ति फल कहा गया है।
The Exposition of the Saptamī Vow Observed Across Twelve Months (Saptamī-vrata-prakāśana)
सनातन नारद को बताते हैं कि सप्तमी सूर्य-तिथि है, जो सूर्योपासना और मासानुसार व्रतों के लिए श्रेष्ठ है। चैत्र शुक्ल सप्तमी में शुद्ध वेदी पर बाहर स्नान, अष्टदल कमल-मण्डल, मध्य में विभाव की स्थापना, दिशाओं में युग्म-देवगण (गन्धर्व, राक्षस, नाग/काद्रवेय, यातुधान, ऋषि) तथा ईशान में ग्रह-स्थापन का विधान है। फिर षोडशोपचार पूजा, 800 घृताहुतियों का होम, सूर्य को 64 तथा अन्य देवों को भी नियत आहुतियाँ, दक्षिणा—फलस्वरूप सुख और देहान्त के बाद ‘सूर्यमण्डल के मार्ग’ से परमधाम-प्राप्ति कही गई है। आगे प्रत्येक मास की सप्तमी पर अलग व्रत: वैशाख में गङ्गा-व्रत (हजार कलश), कमल-व्रत (सूक्ष्म स्वर्णकमल, कपिला-दान, उपवास), निम्बपत्र-व्रत (मन्त्र व मौन), शर्करा-सप्तमी, ज्येष्ठ में इन्द्र का सूर्यरूप जन्म, आषाढ़ में विवस्वान्-प्रादुर्भाव, श्रावण में अव्यङ्ग-व्रत व हस्त-नक्षत्र-फल, भाद्र में अमुक्ताभरण व सोमांश-महेश-पूजा, फल-सप्तमी (फल-नैवेद्य, रक्षा-सूत्र), आश्विन में शुभ-सप्तमी व पञ्चगव्य, कार्तिक में शाक-व्रत, मार्गशीर्ष में मित्र-व्रत (विष्णु का दाहिना नेत्र मित्र), पौष में अभय-व्रत (त्रिसन्ध्या-पूजा, मोदक-दान), माघ कृष्ण में सर्वाप्ति (स्वर्ण सूर्यचक्र, जागरण), अचल/त्रिलोचन-जयन्ती व रथ-सप्तमी (रथ-दान), भास्करी सप्तमी (प्रातः स्नान, अर्क/बदरी-पत्र), पुत्र-सप्तमी, तथा फाल्गुन में अर्कपुट/त्रिवर्गदा। निष्कर्ष: हर मास की सप्तमी पर भास्कर-पूजा स्वयं ही इच्छित फल देने वाली है।
द्वादशमासेषु अष्टमी-व्रत-कथनम् (Account of the Aṣṭamī Vow Across the Twelve Months)
इस अध्याय में सनातन एक ब्राह्मण को बारह महीनों में आने वाली अष्टमी-व्रत-परम्परा बताते हैं। चैत्र शुक्लाष्टमी को भवानी का जन्मोत्सव—प्रदक्षिणा, यात्रा, दर्शन और अशोक-बुद (अशोकाष्टमी/महाष्टमी) का विधान। वैशाख-ज्येष्ठ में उपवास तथा अपराजिता और शिव/देवी-रूपों की पूजा; आषाढ़ में रात्रि-जलस्नान, अभिषेक, ब्राह्मण-भोजन और स्वर्ण-दक्षिणा सहित विस्तृत कर्म। भाद्रपद में संतान-वर्धक व्रत, ‘दशाफल’ नाम दस-दिवसीय कृष्ण-व्रत—108 आहुतियों का होम, तुलसी-पत्र-पूजन, पूरिका-नैवेद्य, गुरु-दान और दीर्घ साधना; फिर पूर्ण कृष्ण-जन्माष्टमी-विधि—मण्डप/मण्डल/कलश, मध्यरात्रि अभिषेक, नैवेद्य, जागरण, प्रतिमा-दान और स्वर्ण-धेनु-दान। आगे राधा-व्रत, दूर्वाष्टमी (संतान-मंत्र), सोलह-दिवसीय महालक्ष्मी-व्रत—सोलह-गाँठ डोरक, उद्यापन, चन्द्र-अर्घ्य और षोडशोपचार। अंत में दुर्गा-महाष्टमी, करक-व्रत, गोपाष्टमी, अनघा-विधान, कालभैरव-उपवास, अष्टका-श्राद्ध व शिव-पूजन, भद्रकाली/भीष्म-तर्पण, भीमा व शिव-शिवा-पूजन, तथा शीतला-अष्टमी के मंत्र-स्वरूप आदि बताकर हर महीने शिव-शिवा की अष्टमी-पूजा का सामान्य नियम दिया गया है।
The Narration of the Navamī Vow Observed Across the Twelve Months
सनातन नारद और ब्राह्मण-सभा को बारहों महीनों में होने वाले नवमी-व्रतों का विधान बताते हैं। चैत्र शुक्ल नवमी श्रीराम-नवमी है—उपवास या मध्याह्न-उत्सव के बाद एकभुक्त, मधुर अन्न से ब्राह्मण-भोजन और गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, वस्त्र, आभूषण आदि दान; इससे पाप-नाश और विष्णुलोक-प्राप्ति होती है। आगे शाक्त परंपरा में मातृ-व्रत (भैरव-संबंध), चौंसठ योगिनियों व भद्रकाली की पूजा, कमल-पत्रों से चण्डिका-पूजन कहा गया है। फिर ज्येष्ठ में उमा-व्रत, रात्रि में ऐरावत पर श्वेत इन्द्र का ध्यान कर पूजा; श्रावण में कौमारी-रूप चण्डिका की आराधना (रात्रि-भोजन या पक्ष-उपवास), भाद्रपद में दुर्गा की नन्दा-नवमी। आश्विन की महापूर्वा में शमी-पूजन, रात्रि में आयुध-चिह्नों की वंदना, भद्रकाली को बलि और दक्षिणा से समापन। कार्तिक की अक्षया-नवमी में अश्वत्थ-मूल तर्पण व सूर्य को अर्घ्य; आगे मार्गशीर्ष में नन्दिनी, पौष में महामाया, माघ में महानन्दा, फाल्गुन में आनन्दा—अक्षय पुण्य और मनोकामना-सिद्धि का फल बताया गया है।
Daśamī-vrata: Observances for the Bright Tenth Day Through the Twelve Months
इस अध्याय में सनातन नारद को शुक्ल दशमी के व्रतों का मासानुसार विधान बताते हैं। चैत्र में धर्मराज (यम) की ऋतु-उपहारों से पूजा, उपवास, ब्राह्मण-भोजन और निश्चित दक्षिणा से दिव्य बंधुत्व मिलता है। माधव में श्वेत सुगंधित पुष्पों से विष्णु-पूजन और अधिक प्रदक्षिणा से वैष्णव-लोक की प्राप्ति होती है। ज्येष्ठ में गंगा-अवतरण और दाशहरा के ‘दशयोग’ का महात्म्य—नक्षत्र, वार, करण, योग और राशि-स्थिति सहित; स्नान से हरिधाम मिलता है। आषाढ़ में स्नान-जप-होम-दान से स्वर्गफल, श्रावण में उपवास सहित शिव-पूजा और दान, भाद्रपद में दशावतार-व्रत में तर्पण तथा दस स्वर्ण अवतार-प्रतिमाओं का दान बताया गया है। आश्विन में विजयादशमी पर गोमय-चक्रवाल बनाकर राम और भ्राताओं की पूजा, गृहस्थों की सहभागिता, विजय व धन-लाभ होता है। कार्तिक में सार्वभौम-व्रत—मध्यरात्रि दिग्बलि, अष्टदल मंडल, दिक्पालों व अनंत के मंत्रों से पाप-नाश, ब्राह्मण-पूजा से राजसदृश पुण्य। आगे मार्गशीर्ष में आरोग्यक, पौष में विश्वेदेव-पूजा केशव के दस रूपों सहित, माघ में देवांगिरस-पूजा, और अंत में चौदह यमों की पूजा, तर्पण व सूर्य-अर्घ्य से समृद्धि और विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
The Account of the Ekādaśī Vow Observed Throughout the Twelve Months
सनातन नारद को एकादशी-व्रत की मानक विधि बताते हैं—पुष्पों से सुसज्जित मण्डप बनाना, नियमपूर्वक स्नान, मंत्रों से विष्णु-पूजन, होम, प्रदक्षिणा, स्तोत्र-पाठ, संगीत, साष्टांग प्रणाम, जयघोष और रात्रि-जागरण। फिर बारहों महीनों की एकादशियों तथा द्वादशी-पारण का क्रम आता है—प्रायः षोडशोपचार-पूजा, ब्राह्मण-भोजन और दक्षिणा-दान; फल रूप में पाप-नाश, समृद्धि, संतान और वैकुण्ठ-प्राप्ति कही गई है। वरूथिनी में सुवर्ण-अन्न-गोदान आदि का विशेष, निर्जला का पुण्य चौबीस एकादशियों के तुल्य, योगिनी की दान-महिमा, शयनी में प्रतिष्ठा व पुरुषसूक्त-पूजा से चातुर्मास्य-प्रवेश, और प्रबोधिनी में वेद-मंत्रों सहित ‘जागरण’ तथा उत्सव-उपहार वर्णित हैं। अंत में दशमी–एकादशी–द्वादशी के तीन दिन के नियम—भोजन-न्यूनता, पात्र/आहार-निषेध, सत्य-अहिंसा-शुद्धि, निंदा व विषयासक्ति-त्याग—निश्चित किए गए हैं।
The Exposition of the Dvādaśī Vow for the Twelve Months (Dvādaśī-vrata-nirṇaya and Mahā-dvādaśī Lakṣaṇas)
इस अध्याय में सनातन नारद को द्वादशी-प्रधान व्रतों का विधान बताते हैं। चैत्र शुक्ल द्वादशी के मदन-व्रत में शुद्ध घट-स्थापन (चावल, फल, गन्ना, श्वेत वस्त्र, चंदन), अच्युत-पूजन, उपवास, अगले दिन ब्राह्मण-भोजन व दक्षिणा, और वर्ष-समापन पर शय्या, गौ, स्वर्ण तथा कामदेव-प्रतिमा का दान कहा गया है। फिर भार्तृ-द्वादशिका में श्रीहरि को श्री सहित शय्या पर पूजकर रात्रि-जागरण, गीत-नृत्य, और स्वर्ण हरि-प्रतिमा व शय्या-दान से दाम्पत्य-स्थैर्य का फल बताया है। आगे मासानुसार विष्णु के रूप (माधव, त्रिविक्रम, श्रीधर, वामन, पद्मनाभ, दामोदर आदि), नियत भोजन, प्रायः बारह ब्राह्मण, पात्र-वस्त्र तथा स्वर्ण-रजत दक्षिणा का निर्देश है। कार्तिक की गोवत्स-द्वादशी में गाय-बछड़े की पूजा, सुरभी-अर्घ्य मंत्र और दुग्ध-वर्जन आता है। नीराजन-व्रत महाशान्ति रूप में हरि को दीप-आरती तथा सूर्य, शिव, मातृगण, पितृ, नाग आदि की क्रमिक पूजा, गो-सम्पदा व राजचिह्नों सहित वर्णित है। साध्य-व्रत और द्वादश-आदित्य व्रत में बारह नाम/रूप, स्वर्ण प्रतिमाओं से उद्यापन व ब्राह्मण-तर्पण, सूर्यलोक-भोग से ब्रह्म-प्राप्ति तक फल कहा है। अखण्ड-व्रत में जनार्दन की स्वर्ण प्रतिमा और बारह मास रात्रि-भोजन; रूप-व्रत में 108 गोमय-पिण्ड, द्वादशाक्षरी मंत्र से होम और गुरु को प्रतिमा-दान। सुजन्म-द्वादशी में मासिक दान (घी, अन्न, तिल, स्वर्ण-रजत, वस्त्र, चंदन) और अंत में स्वर्ण सूर्य-प्रतिमा। अंत में महा-द्वादशियों (त्रिस्पृशा, उन्मीलिनी, वंजुली, पक्षवर्धिनी, जया, विजया, जयन्ती, अपराजिता) के लक्षण, तिथि-संयोग में एकादशी से द्वादशी पर उपवास-स्थानांतरण, तथा एकादशी-द्वादशी को आजीवन नियम बताया गया है।
The Narration of the Trayodaśī Vow Observed Throughout the Twelve Months
सनातन नारद को त्रयोदशी-व्रत का मासानुसार विधान बताते हैं। चैत्र/मधु शुक्ल त्रयोदशी को मदन/अनंग (कामदेव) की पूजा—चंदन से रूप-निर्माण, पुष्प-धनुष-बाण का चित्रण, मध्याह्न पूजन, वसंत व शिव-नामों से मंत्र-नमस्कार और ब्राह्मण-दंपति का सम्मान—से आरंभ होता है। फिर वर्षभर कामदेव के विविध नाम, भोग-उपहार, दान (विशेषतः बकरियों का दान) और नदी-स्नान से पुण्य-फल का वर्णन है। महा वारुणी (वारुणी में शनि-योग) और महामहा (शतभिषा नक्षत्र, शनिवार, फाल्गुन शुक्ल पक्ष) जैसे शुभ-काल-वर्धक बताए गए हैं। आगे राधा-मास का कामदेव-व्रत, ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी का दौर्भाग्य-शमन (सूर्य-संबंधी पुष्प व प्रार्थनाएँ), उमा–महेश्वर प्रतिष्ठा का बहुदिन व्रत और पाँच-वर्षीय चक्र, श्रावण का रति–काम व्रत (14 वर्ष पूर्णाहुति, प्रतिमा व गो-दान), भाद्रपद का गोत्रिरात्र लक्ष्मी–नारायण व्रत (पंचामृत व गो-दान मंत्र), तथा ईष/आश्विन का अशोक-व्रत (स्त्रियों को वैधव्य से रक्षा) वर्णित है। कार्तिक त्रयोदशी प्रदोष में दीप-दान प्रमुख है और अंत में शिव-शतनाम स्तुति आती है। फिर मार्गशीर्ष में अनंग-पूजा, पौष में हरि को घृत-पात्र दान, माघ में तीन दिन स्नान-व्रत, फाल्गुन में कुबेर-पूजा व स्वर्ण-प्रतिमा दान; इनसे समृद्धि, संरक्षण और अंततः शिव-धाम की प्राप्ति बताई गई है।
The Description of the Caturdaśī Vrata Observed throughout the Twelve Months
इस अध्याय में सनातन नारद को बारह महीनों में विभिन्न देवताओं के लिए चतुर्दशी-व्रतों का क्रम बताते हैं। आरम्भ में शिव-चतुर्दशी का विधान है—सुगन्धित द्रव्यों व बिल्वपत्रों से पूजन, उपवास/एकभुक्त, मातृ-पूजन, और अगले दिन ब्राह्मण को मंत्र-प्रदान सहित व्रत-समापन। फिर नृसिंह-चतुर्दशी में षोडशोपचार और पंचामृत-अभिषेक, ओंकारेश्वर तीर्थ का माहात्म्य, लिंग-व्रत (आटे के लिंग सहित), रुद्र-व्रत में पंचाग्नि तप और सुवर्ण-धेनु दान, ऋतु अनुसार पुष्पार्पण तथा भाद्रपद में देवी को पवित्र-आरोपण वर्णित है। अनन्त-व्रत का विस्तृत वर्णन है—एकभुक्त होकर गेहूँ का नैवेद्य, स्त्री-पुरुष के अनुसार चौदह-गाँठ का डोरा बाँधना, चौदह वर्ष तक अनुष्ठान और उद्यापन में सर्वतोभद्र मण्डल, कलश, अनन्त-प्रतिमा, सहायक देव-पूजन, होम और बहु-दानों का विधान। कदली-व्रत में कदली-वन में रम्भा-पूजन और कन्या/सुमंगली-भोजन आता है। साथ ही कुछ मृत्यु-प्रकारों के लिए श्राद्ध, धर्म-यम सम्बन्धी दान व दीप-क्रिया (विशेषतः कार्तिक), मणिकर्णिका में पाशुपत प्रसंग, ब्रह्मकूर्च (पंचगव्य), पाषाण-व्रत, विरूपाक्ष-व्रत, माघ में यम-तर्पण, और अंत में कृष्ण चतुर्दशी की महाशिवरात्रि तथा चौदह कलशों सहित सामान्य उद्यापन-विधि बताई गई है।
Pūrṇimā Pūrṇa-vratas: Dharmarāja-vrata, Vaṭa-Sāvitrī-vrata, and Gopadma-vrata
सनातन नारद को क्रमशः आने वाली पूर्णिमाओं से जुड़े ‘पूर्ण-व्रत’ बताते हैं। चैत्र पूर्णिमा को मन्वन्तर-चक्र की संधि मानकर सोम की तृप्ति हेतु पके अन्न से मिश्रित जल सहित कलश-दान कहा गया है। वैशाख पूर्णिमा सर्वफलदायिनी है—ब्राह्मणों को दिया दान उसी रूप में फल देता है; इसमें धर्मराज-व्रत में पका भोजन, जल-कलश और गो-सम दान, विशेषतः खुर-सींग सहित कृष्णाजिन, तिल, वस्त्र और सुवर्ण सहित विद्वान द्विज को आदरपूर्वक अर्पित करने का विधान है। आगे अतिशय पुण्य-फल—सप्तद्वीपवती पृथ्वी-दान तुल्य फल और सुवर्णयुक्त जल-कलश से शोक-नाश—कहा गया है। ज्येष्ठ पूर्णिमा पर स्त्रियों के लिए वट-सावित्री व्रत: उपवास, वट-वृक्ष को जल देना, मौली/जनेऊ बाँधना, 108 प्रदक्षिणा, अखण्ड सौभाग्य की प्रार्थना, सुहागिनों को भोजन, और अगले दिन भोजन कर सौभाग्य-प्राप्ति। आषाढ़ पूर्णिमा में गोपद्म-व्रत: श्री और गरुड़ सहित चतुर्भुज स्वर्ण हरि का ध्यान-पूजन, पुरुषसूक्त-पाठ, गुरु-पूजन और ब्राह्मण-भोजन; विष्णु-कृपा से इह-पर दोनों में इच्छित सिद्धि।
The Description of the Glory of the Purāṇa (Purāṇa-Māhātmya)
सूत बताते हैं कि सनकादि कुमार नारद के प्रश्न का सम्मान कर शिवलोक जाते हैं, शिव-आगम का सार पाकर ‘जीवित तीर्थ’ की तरह विचरते रहते हैं। नारद उनसे साक्षात्कृत ज्ञान लेकर ब्रह्मा को निवेदित करते हैं और कैलास पहुँचते हैं। कैलास की दिव्य शोभा—वनस्पति, पक्षी, सिद्ध, अप्सराएँ और अलकनन्दा—का काव्यमय वर्णन होता है; फिर नारद कपर्दी/विरूपाक्ष/चन्द्रशेखर को योगियों के मध्य विराजमान देखते हैं। शिव प्रेम से स्वागत करते हैं; नारद पशु–पाश से मुक्त करने वाले शाम्भव ज्ञान की याचना करते हैं और शिव अष्टाङ्ग-योग का उपदेश देते हैं। आगे नारद नारायण के पास जाकर पुराण-माहात्म्य सुनते हैं—वेदतुल्य प्रामाण्य, मंदिरों व विद्वत्सभाओं में श्रवण-पाठ का फल, मथुरा, प्रयाग, सेतु, कांची, पुष्कर आदि तीर्थयात्रा का पुण्य, तथा वक्ता का सम्मान दान, होम और ब्राह्मण-भोजन से। अंत में नारायण को परम घोषित कर नारद-पुराण को पुराणों में श्रेष्ठ कहा जाता है और यज्ञ-सत्र की कथा में सूत व्यास के पास लौटते हैं।