Adhyaya 105
Purva BhagaFourth QuarterAdhyaya 10523 Verses

The Anukramaṇikā (Contents-Outline) of the Vāmana Purāṇa

ब्रह्मा वामनपुराण की अनुक्रामणिका बताते हैं—यह 10,000 श्लोकों का त्रिविक्रम-प्रधान ग्रंथ है, विभागों और दो भागों में व्यवस्थित। इसमें पुराण-विषयक प्रश्न, ब्रह्मा के सिर का छेदन और कपाल-दोष से मुक्ति, दक्ष-यज्ञ का विघ्न, शिव का काल-स्वरूप और काम-दहन, प्रह्लाद–नारायण तथा देव–असुर संघर्ष, सुकेशी–अर्क प्रसंग, भुवन-भूगोल, काम्य-व्रत, और देवी दुर्गा का पावन आख्यान आते हैं। आगे तपती, कुरुक्षेत्र, सत्या-माहात्म्य, पार्वती का जन्म, तप और विवाह, गौरी/कौशिकी, कुमार, अंधक-वध और गणों में उसका लय, मरुतों का जन्म, बलि के पराक्रम, लक्ष्मी-कथाएँ, प्रह्लाद-तीर्थ, धुन्धु, प्रेत-उपाख्यान, नक्षत्र-पुरुष और श्रीदाम का वर्णन है। उत्तर के बृहद्-वामन भाग में चार संहिताएँ—माहेश्वरी, भागवती, सौरि, गाणेश्वरी—प्रत्येक में हजार-हजार विषय; कृष्ण-भक्तों की महिमा, देवी द्वारा खाट का उद्धार, सूर्य का पाप-नाशक माहात्म्य और गणेश के चरित हैं। अंत में परंपरा (पुलस्त्य→नारद→व्यास→रोमहर्षण) और फलश्रुति—पाठ, श्रवण, लेखन, दान (विशेषतः शरद्-विषुव पर), घृत-धेनु आदि दान से विष्णु के परम धाम की प्राप्ति।

Shlokas

Verse 1

ब्रह्मोवाच । शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणं वामनाभिधम् । त्रिविक्रमचरित्राढ्यं दशसाहस्रसंख्यकम् ॥ १ ॥

ब्रह्मा बोले—वत्स, सुनो; मैं वामन-नामक पुराण का वर्णन करूँगा, जो त्रिविक्रम के चरित्र से समृद्ध है और दस हज़ार श्लोकों का है।

Verse 2

कूर्मकल्पसमाख्यानं वर्गत्रयकथानम् । भागद्वयसमायुक्तं वक्तृश्रोतृशुभावहम् ॥ २ ॥

उसमें कूर्म-कल्प का आख्यान है, कथा तीन वर्गों में विन्यस्त है; वह दो भागों से युक्त है और वक्ता तथा श्रोता—दोनों के लिए शुभदायक है।

Verse 3

पुराणप्रश्नः प्रथमं ब्रह्मशीर्षच्छिदा ततः । कपालमोचनाख्यानं दक्षयज्ञविहिंसनम् ॥ ३ ॥

पहले पुराण-विषयक प्रश्न आता है; फिर ब्रह्मा के शिर का छेदन; उसके बाद कपाल-मोचन का आख्यान; और दक्ष के यज्ञ के विध्वंस का वृत्तांत।

Verse 4

हरस्य कालरूपाख्या कामस्य दहनं ततः । प्रह्लादनारायणयोर्युद्धं देवासुराहवः ॥ ४ ॥

फिर हर (शिव) का कालरूप से प्रसिद्ध वर्णन, और उसके बाद काम का दहन; प्रह्लाद और नारायण का संग्राम, तथा देवों और असुरों का महायुद्ध।

Verse 5

सुकेश्यर्कसमाख्यानं ततो भुवनकोशकम् । ततः काम्यव्रताख्यानं श्रीदुर्गाचरितं ततः ॥ ५ ॥

इसके बाद सुकेशी और अर्क का आख्यान, फिर भुवन-कोश (लोक-व्यवस्था) का वर्णन; उसके बाद काम्य-व्रतों का प्रसंग, और फिर श्रीदुर्गा का पावन चरित।

Verse 6

तपतीचरितं पश्चात्कुरुक्षेत्रस्य वर्णनम् । सत्यामाहात्म्यमतुलं पार्वतीजन्मकीर्तनम् ॥ ६ ॥

इसके बाद तपती का चरित, फिर कुरुक्षेत्र का वर्णन; सत्याः का अतुल माहात्म्य तथा पार्वती-जन्म का कीर्तन कहा जाता है।

Verse 7

तपस्तस्या विवाहश्च गौर्युपाख्यानकं ततः । ततः कौशिक्युपाख्यानं कुमारचरितं ततः ॥ ७ ॥

फिर उसके तप और विवाह का वर्णन; उसके बाद गौरी-उपाख्यान; फिर कौशिकी-उपाख्यान और फिर कुमार (कार्त्तिकेय) का चरित कहा जाता है।

Verse 8

ततोऽन्धकवधाख्यानंसाध्योपाख्यानकंततः । जाबालिचरितं पश्चादरजायाः कथाद्भुता ॥ ८ ॥

फिर अंधक-वध का आख्यान; उसके बाद साध्यों से सम्बन्धित उपाख्यान; फिर जाबालि का चरित और अंत में अरजा की अद्भुत कथा कही जाती है।

Verse 9

अंधकेशरयोर्युद्धं गणत्वं चांधकस्य च । मरुतां जन्मकथनं बलेश्च चरितं ततः ॥ ९ ॥

फिर अंधक और ईश्वर (शिव) का युद्ध, तथा अंधक का गणत्व; मरुतों के जन्म का कथन और उसके बाद बल के चरित का वर्णन होता है।

Verse 10

ततस्तु लक्ष्म्याश्चरितं त्रैविक्रममतः परम् । प्रह्लादतीर्थयात्रायां प्रोच्यंतेऽथ कथाः शुभाः ॥ १० ॥

फिर लक्ष्मी के चरित का वर्णन, और उसके बाद त्रैविक्रम (वामन-त्रिविक्रम) का प्रसंग; तत्पश्चात प्रह्लाद-तीर्थयात्रा में शुभ कथाएँ कही जाती हैं।

Verse 11

ततश्च धुन्धु चरितं प्रेतोपाख्यानकं ततः । नक्षत्रपुरुषाख्यानं श्रीदामचरितं ततः ॥ ११ ॥

तत्पश्चात् धुन्धु का चरित आता है; फिर प्रेत-उपाख्यान। उसके बाद नक्षत्र-पुरुष की कथा, और फिर श्रीदाम का चरित वर्णित है।

Verse 12

त्रिविक्रमचरित्रांते ब्रह्मप्रोक्तः स्तवोत्तमः । प्रह्लादबलिसंवादे सुतले हरिशंसनम् ॥ १२ ॥

त्रिविक्रम-चरित्र के अंत में ब्रह्मा द्वारा कहा गया सर्वोत्तम स्तोत्र है; और प्रह्लाद-बलि संवाद में, सुतल लोक में, हरि की महिमा का वर्णन है।

Verse 13

इत्येष पूर्वभागोऽस्य पुराणस्य तवोदितः । शृण्णतोऽस्योत्तरं भागं बृहद्वामनसंज्ञकम् ॥ १३ ॥

इस प्रकार इस पुराण का पूर्वभाग तुम्हें कहा गया। अब इसके उत्तरभाग को सुनो, जो ‘बृहद्-वामन’ नाम से प्रसिद्ध है।

Verse 14

माहेश्वरी भागवती सौरी गाणेश्वरी तथा । चतस्रः संहिताश्चात्र पृथक् साहस्रसंख्यया ॥ १४ ॥

यहाँ चार संहिताएँ हैं—माहेश्वरी, भागवती, सौरी और गाणेश्वरी—और प्रत्येक पृथक् रूप से सहस्र संख्या (हज़ार) की है।

Verse 15

माहेश्वर्यां तु कृष्णस्य तद्भक्तानां च कीर्तनम् । भागवत्यां जगन्मातुखतारकथाद्भुता ॥ १५ ॥

माहेश्वरी में श्रीकृष्ण तथा उनके भक्तों का कीर्तन है; और भागवती में जगन्माता द्वारा खाट का तारक-रूप से उद्धार करने की अद्भुत कथा है।

Verse 16

सौर्यां सूर्यस्य महिमा गदितः पापनाशनः । गाणेश्वर्यां गणेशस्य चरितं च महेशितुः ॥ १६ ॥

सौर्य-खण्ड में पापों का नाश करने वाली सूर्यदेव की महिमा कही गई है; और गाणेश्वरी-खण्ड में महेश्वर-स्वरूप श्रीगणेश के चरित्र का वर्णन है।

Verse 17

इत्येतद्वामनं नाम पुराणं सुविचित्रकम् । पुलस्त्येन समाख्यातं नारदाय महात्मने ॥ १७ ॥

इस प्रकार ‘वामन’ नामक यह अत्यन्त विचित्र और रमणीय पुराण महात्मा पुलस्त्य ने महात्मा नारद को सुनाया।

Verse 18

ततो नारदतः प्राप्तं व्यासेन सुमहात्मना । व्यासात्तु लब्धवांश्चैतत् तच्छिष्यो रोमहर्षणः ॥ १८ ॥

फिर महात्मा व्यास ने इसे नारद से प्राप्त किया; और व्यास से उनके शिष्य रोमहर्षण ने इसी पुराण को पाया।

Verse 19

स चाख्यास्यति विप्रेभ्यो नैमिषीयेभ्य एव च । एवं परंपराप्राप्तं पुराणं वामनं शुभम् ॥ १९ ॥

और वही इसे ब्राह्मण ऋषियों को—विशेषतः नैमिषारण्य में एकत्रित जनों को—सुनाएगा। इस प्रकार परम्परा से प्राप्त यह शुभ वामन पुराण है।

Verse 20

ये पठंति च शृण्वंति तेऽपि यांति परां गतिम् । लिखित्वैतत्पुराणं तु यः शरद्विषुवेऽर्पयेत् ॥ २० ॥

जो इसे पढ़ते हैं और जो इसे सुनते हैं—वे भी परम गति को प्राप्त होते हैं। और जो इस पुराण को लिखवाकर शरद्-विषुव के दिन दान करता है, वह भी वही परम कल्याण पाता है।

Verse 21

विप्राय वेदविदुषे घृतधेनुसमन्वितम् । स समुद्धृत्य नरकान्नयेत्स्वर्गं पितॄन्स्वकान् ॥ २१ ॥

जो वेद-विद् ब्राह्मण को घृतधेनु सहित दान देता है, वह दाता अपने पितरों को नरक से उबारकर स्वर्ग में ले जाता है।

Verse 22

देहांते भुक्तभोगोऽसौ याति विष्णोः परं पदम् ॥ २१ ॥

देहांत में, भोगों के फल भोगकर, वह विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है।

Verse 23

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे वामनपुराणानुक्रमणीवर्णनं नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥

इस प्रकार श्रीबृहन्नारदीयपुराण के पूर्वभाग, बृहदुपाख्यान के चतुर्थ पाद में “वामनपुराण की अनुक्रमणिका-वर्णन” नामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

An anukramaṇikā functions as a scholastic table-of-contents: it preserves the internal architecture of a Purāṇa, aids memorization and citation, and frames diverse myths, vratas, tīrthas, and hymns as an ordered curriculum culminating in phalaśruti and mokṣa-oriented reception.

Māheśvarī (glorification of Kṛṣṇa and His devotees), Bhāgavatī (the World-Mother’s deliverance of Khāṭa), Saurī/Saurya (Sun’s sin-destroying greatness), and Gāṇeśvarī (deeds of Gaṇeśa).

Hearing and reciting the Purāṇa, having it written and gifted (notably on the autumnal equinox), and performing dāna such as gifting a properly endowed ‘ghee-cow’ to a Veda-knowing Brāhmaṇa—linked with ancestral uplift and final attainment of Viṣṇu’s abode.