
सनातन नारद को क्रमशः आने वाली पूर्णिमाओं से जुड़े ‘पूर्ण-व्रत’ बताते हैं। चैत्र पूर्णिमा को मन्वन्तर-चक्र की संधि मानकर सोम की तृप्ति हेतु पके अन्न से मिश्रित जल सहित कलश-दान कहा गया है। वैशाख पूर्णिमा सर्वफलदायिनी है—ब्राह्मणों को दिया दान उसी रूप में फल देता है; इसमें धर्मराज-व्रत में पका भोजन, जल-कलश और गो-सम दान, विशेषतः खुर-सींग सहित कृष्णाजिन, तिल, वस्त्र और सुवर्ण सहित विद्वान द्विज को आदरपूर्वक अर्पित करने का विधान है। आगे अतिशय पुण्य-फल—सप्तद्वीपवती पृथ्वी-दान तुल्य फल और सुवर्णयुक्त जल-कलश से शोक-नाश—कहा गया है। ज्येष्ठ पूर्णिमा पर स्त्रियों के लिए वट-सावित्री व्रत: उपवास, वट-वृक्ष को जल देना, मौली/जनेऊ बाँधना, 108 प्रदक्षिणा, अखण्ड सौभाग्य की प्रार्थना, सुहागिनों को भोजन, और अगले दिन भोजन कर सौभाग्य-प्राप्ति। आषाढ़ पूर्णिमा में गोपद्म-व्रत: श्री और गरुड़ सहित चतुर्भुज स्वर्ण हरि का ध्यान-पूजन, पुरुषसूक्त-पाठ, गुरु-पूजन और ब्राह्मण-भोजन; विष्णु-कृपा से इह-पर दोनों में इच्छित सिद्धि।
Verse 1
सनातन उवाच । अथ नारद वक्ष्यामि श्रृणु पूर्णाव्रतानि ते । यानि कृत्वा नरो नारी प्राप्नुयात्सुखसंततिम् ॥ १ ॥
सनातन बोले—हे नारद! अब मैं तुम्हें पूर्ण-व्रतों का वर्णन करता हूँ, सुनो। जिन्हें करके पुरुष और स्त्री निरंतर सुख-समृद्धि को प्राप्त होते हैं।
Verse 2
चैत्रपूर्णा तु विप्रेंद्र मन्वादिः समुदाहृता । अस्यां सान्नोदकं कुंभं प्रदद्यात्सोमतुष्टये ॥ २ ॥
हे विप्रेंद्र! चैत्र की पूर्णिमा को मन्वंतर-आरंभ कहा गया है। उस दिन सोमदेव की तुष्टि हेतु पका अन्न मिला जल से भरा कलश दान करना चाहिए।
Verse 3
वैशाख्यामपि पूर्णायां दानं सर्वस्य सर्वदम् । यद्यद्द्रव्यं ददेद्विप्रे तत्तदाप्नोति निश्चितम् ॥ ३ ॥
वैशाख की पूर्णिमा में भी दान सबके लिए सब फल देने वाला है। जो-जो द्रव्य विप्र को दिया जाता है, उसका फल वही निश्चित रूप से प्राप्त होता है।
Verse 4
धर्मराजव्रतं चात्र कथितं तन्निशामय । श्रृतान्नमुदकुंभं च वैशाख्यां वै द्विजोत्तमे ॥ ४ ॥
यहाँ धर्मराज-व्रत भी कहा गया है, उसे सुनो। और हे द्विजोत्तम! वैशाख में पका अन्न तथा जल-कलश (का दान) भी विधान है।
Verse 5
दद्याद्गोदानफलदं धर्मराजस्य तुष्टये । अत्र कृष्णाजिनं दद्यात्सखुरं च सश्रृङ्गकम् ॥ ५ ॥
धर्मराज को प्रसन्न करने हेतु गोदान के फल देने वाला दान करना चाहिए। इस विधि में खुरों और सींगों सहित कृष्णाजिन (काले मृग की खाल) अर्पित करे।
Verse 6
तिलैः सहसमाच्छाद्य वस्त्रैर्हेम्ना द्विजातये । यस्तु कृष्णाजिनं दद्यात्सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ॥ ६ ॥
जो तिल सहित, वस्त्र और स्वर्ण के साथ, विधिपूर्वक सत्कार करके द्विज (ब्राह्मण) को कृष्णाजिन दान देता है, वह महान पुण्य का भागी होता है।
Verse 7
सर्वशास्त्रविदे सप्तद्वीपभूमिप्रदः स वै । मोदते विष्णु लोके हि यावच्चन्द्रार्कतारकम् ॥ ७ ॥
जो समस्त शास्त्रों में निपुण को सप्तद्वीप सहित पृथ्वी का दान करता है, वह चन्द्र-सूर्य-तारों के रहने तक विष्णुलोक में आनंदित रहता है।
Verse 8
कुंभान्स्वच्छजलैः पूर्णान्हिरण्येन समन्वितान् । यः प्रदद्याद्द्विजाग्र्येभ्यः स न शोचति कर्हिचित् ॥ ८ ॥
जो स्वच्छ जल से भरे हुए घड़े, स्वर्ण सहित, श्रेष्ठ द्विजों (विद्वान ब्राह्मणों) को दान देता है, वह कभी भी शोक नहीं करता।
Verse 9
अथ ज्येष्ठस्य पूर्णायां वटसावित्रिकं व्रतम् । सोपवासा वटं सिंचेत्सलिलैरमृतोपमैः ॥ ९ ॥
अब ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को वट-सावित्री व्रत करना चाहिए। उपवास करके वटवृक्ष को अमृत-तुल्य जल से सींचे।
Verse 10
सूत्रेण वेष्टयेच्चैव सशताष्टप्रदक्षिणम् । ततः संप्रार्थयेद्दैवीं सावित्रीं सुपतिव्रताम् ॥ १० ॥
उसे पवित्र सूत्र से लपेटकर एक सौ आठ प्रदक्षिणाएँ करे। फिर परम पतिव्रता देवी सावित्री से भक्तिभाव से प्रार्थना करे।
Verse 11
जगत्पूज्ये जगन्मातः सावित्रि पतिदैवते । पत्या सहावियोगं मे वटस्थे कुरु ते नमः ॥ ११ ॥
हे जगत्-पूज्या, जगन्माता, पति को ही देव मानने वाली सावित्री! इस वटवृक्ष के पास मेरे लिए पति-वियोग न हो—आपको नमस्कार है।
Verse 12
इति सप्रार्थ्य या नारी भोजयित्वा परेऽहनि । सुवासिनीः स्वयं भुंज्यात्सा स्यात्सौभाग्यभागिनी ॥ १२ ॥
इस प्रकार प्रार्थना करके जो नारी अगले दिन सुहागिन स्त्रियों को भोजन कराकर फिर स्वयं भोजन करती है, वह सौभाग्य की भागिनी होती है।
Verse 13
आषाढस्य तु पूर्णायां गोपद्मव्रतमुच्यते । चतुर्भुजं महाकायं जांबूनदसमप्रभम् ॥ १३ ॥
आषाढ़ की पूर्णिमा को ‘गोपद्म-व्रत’ कहा गया है। उसमें भगवान हरि का ध्यान चार भुजाओं वाले, विशाल रूप और जाम्बूनद-स्वर्ण समान तेजस्वी रूप में करे।
Verse 14
शंखचक्रगदापद्मरमागरुडशोभितम् । सेवितं मुनिभिर्देवैर्यक्षगंधर्वकिन्नरैः ॥ १४ ॥
शंख, चक्र, गदा और पद्म से युक्त, श्री (लक्ष्मी) और गरुड़ से सुशोभित—उसकी मुनि, देव, यक्ष, गंधर्व और किन्नर सेवा-पूजा करते हैं।
Verse 15
एवंविधं हरिं तत्र स्नात्वा पूजां समाचरेत् । पौरुषेणैव सूक्तेन गंधाद्यैरुपचारकैः ॥ १५ ॥
इस प्रकार विधिपूर्वक वहाँ श्रीहरि को स्नान कराकर, पुरुषसूक्त का पाठ करते हुए, गंध आदि उपचारों से उनकी यथावत् पूजा करे।
Verse 16
आचार्यं वस्त्रभूषाद्यैस्तोषयेत्स्निग्धमानसः । भोजयेन्मिष्टपक्वान्नैर्द्विजानन्यांश्च शक्तितः ॥ १६ ॥
स्नेहपूर्ण मन से आचार्य को वस्त्र, भूषण आदि देकर प्रसन्न करे; और अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों तथा अन्य जनों को मीठे और पके हुए अन्न से भोजन कराए।
Verse 17
एवं कृत्वा व्रतं विप्र प्रसादात्कमलापतेः । ऐहिकामुष्मिकान्कामांल्लभते नात्र संशयः ॥ १७ ॥
हे विप्र! इस प्रकार व्रत करने पर कमलापति (श्रीविष्णु) की कृपा से मनुष्य इस लोक और परलोक के इच्छित फल प्राप्त करता है—इसमें संदेह नहीं।
The chapter uses Caitra pūrṇimā as a cosmological time-marker to sacralize the calendar, linking household dāna (water-pot with water and cooked food) to Soma’s satisfaction and to the idea of renewing auspicious continuity at a cycle-threshold.
The rite specifies cow-equivalent merit through a kṛṣṇājina (black antelope skin) offered intact (with hooves and horns), augmented by sesame, garments, and gold, and framed by honoring a learned twice-born—highlighting both ritual correctness and the dharma-legal logic of substitutionary merit.
It is explicitly oriented to saubhāgya—unbroken marital auspiciousness—expressed through fasting, banyan worship, 108 circumambulations, and a prayer to Sāvitrī for never being separated from one’s husband, followed by feeding married women.
It combines Purāṇic iconography (four-armed Hari with Śrī and Garuḍa, conch-disc-mace-lotus) with a Vedic hymn (Puruṣa Sūkta) and standard completion practices (guru-honor and brāhmaṇa-feeding), presenting devotion as textually anchored and ritually enacted.