Adhyaya 95
Purva BhagaFourth QuarterAdhyaya 9521 Verses

The Outline (Anukramaṇī) of the Vāyavīya (Vāyu) Purāṇa

ब्रह्मा एक ब्राह्मण से वायवीय (वायु) पुराण की प्रशंसा करते हैं और कहते हैं कि यह रुद्र के परम धाम की प्राप्ति का साधन है। वे इसका विस्तार 24,000 श्लोक बताते हैं और श्वेतकल्प में वायु द्वारा धर्मोपदेश का प्रसंग कहते हैं। यह पुराण दो भागों में, पञ्चलक्षण-परंपरा के अनुसार सर्ग से लेकर मन्वंतर-वंशों तथा गयासुर-वध के विस्तृत वर्णन तक सर्वांगपूर्ण है। इसमें मास-महात्म्य (विशेषतः माघ), दान-धर्म, राज-धर्म, लोकों में प्राणियों के भेद, तथा व्रत-नियमों के पूर्वविभाग भी बताए गए हैं। उत्तरभाग में शिव-संहिता के अनुरूप नर्मदा-तीर्थ-महात्म्य है—तटों पर शिव की व्यापकता, नर्मदा-जल का ब्रह्मस्वरूप और मोक्षदायकत्व, तथा रेवाशक्ति रूप में अवतरण। 35 संगमों और असंख्य तीर्थों की गणना के बाद श्रावणी में गुड़-धेनु दान व पाठ-विधि बताकर फलश्रुति दी गई है—चौदह इंद्रों तक रुद्रलोक की प्राप्ति और केवल अनुक्रमाṇी सुनने से भी पूर्ण पुराण-श्रवण का पुण्य।

Shlokas

Verse 1

ब्रह्मोवाच । श्रृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पुराणं वायवीयकम् । यस्मिञ्च्छ्रुते लभद्धाम रुद्रस्य परमात्मनः ॥ १ ॥

ब्रह्मा बोले—हे विप्र! सुनो, मैं वायवीय पुराण का वर्णन करूँगा; जिसके श्रवण से परमात्मा रुद्र का परम धाम प्राप्त होता है।

Verse 2

चतुर्विंशतिसाहस्रं तत्पुराणं प्रकीर्तितम् । श्वेतकल्पप्रसंगेन धर्मानत्राह मारुतः ॥ २ ॥

उस पुराण को चौबीस हजार श्लोकों वाला कहा गया है। यहाँ श्वेतकल्प के प्रसंग में मारुत (वायु) ने धर्म के तत्त्वों का वर्णन किया है।

Verse 3

तद्बायवीयनुदितं भागद्वयसमन्वितम् । सर्गादिलक्षणं यत्र प्रोक्तं विप्र सविस्तरम् ॥ ३ ॥

हे विप्र! वायवीय परम्परा में कहा गया वह पुराण दो भागों से युक्त है, जिसमें सर्ग आदि लक्षणों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

Verse 4

मन्वंतरेषु वंशाश्च राज्ञां ये यत्र कीर्तिताः । गयासुरस्य हननं विस्तराद्यत्र कीर्तितम् ॥ ४ ॥

विभिन्न मन्वन्तरों में जहाँ-जहाँ राजाओं के वंशों का कीर्तन हुआ है, वहाँ-वहाँ उनका वर्णन मिलता है; और वहीं गयासुर दैत्य के वध का विस्तृत आख्यान भी कहा गया है।

Verse 5

मासानां चैव माहात्म्यं माघस्योक्तं फलाधिकम् । दानधर्मा राजधर्मा विस्तरेणोदिता स्तथा ॥ ५ ॥

मासों का माहात्म्य भी कहा गया है, विशेषकर माघ मास का श्रेष्ठ फल देने वाला महत्त्व; तथा दान-धर्म और राज-धर्म भी विस्तार से प्रतिपादित किए गए हैं।

Verse 6

भूपातालककुब्व्योमचारिणां यत्र निर्णयः । व्रतादीनां च पूर्वोऽयं विभागः समुदाहृतः ॥ ६ ॥

यहाँ पृथ्वी, पाताल, दिशाओं और आकाश में विचरण करने वालों का निर्णय (विवेचन) किया गया है; और व्रत आदि अनुष्ठानों का पूर्ववर्ती विभाग भी यथोचित रूप से बताया गया है।

Verse 7

उत्तरे तस्य भागेतु नर्मदातीर्थवर्णनम् । शिवस्य संहितोक्ता वै विस्तरेण मुनीश्वर ॥ ७ ॥

उसके उत्तर भाग में नर्मदा के तीर्थों का वर्णन है; हे मुनीश्वर, शिव-संहिता में जैसा कहा गया है, वैसा ही वहाँ विस्तार से निरूपित किया गया है।

Verse 8

यो देवः सर्वदेवानां दुर्विज्ञेयः सनातनः । स तु सर्वात्मना यस्यास्तीरे तिष्ठति संततम् ॥ ८ ॥

जो सनातन देव समस्त देवताओं के लिए भी दुर्विज्ञेय है, वही सर्वात्मभाव से उस (तीर्थ) के तट पर निरन्तर निवास करता है।

Verse 9

इदं ब्रह्मा हारीरिदं साक्षाच्चेदं परो हरः । इदं ब्रह्म निराकारं कैवल्यं नर्मदाजलम् ॥ ९ ॥

यह ब्रह्मा है, यही हरि है; यह साक्षात् परम हर (शिव) है। यह निराकार ब्रह्म है; यही कैवल्य—नर्मदा का पावन जल है।

Verse 10

ध्रुवं लोकहितार्थाय शिवेन स्वशरीरतः । शक्तिः कापि सरिदृपा रेवेयमवतारिता ॥ १० ॥

निश्चय ही लोक-हित के लिए शिव ने अपने ही शरीर से एक दिव्य शक्ति को नदी-रूप में अवतरित किया—वही यह रेवा है।

Verse 11

ये वसंत्युत्तरे कूले रुद्रस्यानुचरा हि ते । वसंति याम्यतीरे ये लोकं ते यांति वैष्णवम् ॥ ११ ॥

जो उत्तरी तट पर निवास करते हैं, वे रुद्र के अनुचर हैं; और जो दक्षिणी तट पर रहते हैं, वे वैष्णव लोक को प्राप्त होते हैं।

Verse 12

ॐकारेश्वरमारभ्ययावत्पश्चिमसागरः । संगमाः पंच च त्रिंशन्नदीनां पापनाशनी ॥ १२ ॥

ॐकारेश्वर से लेकर पश्चिम सागर तक नदियों के पैंतीस संगम हैं—जो पापों का नाश करने वाले हैं।

Verse 13

दशैकमुत्तरे तीरे त्रयोविंशतिर्दक्षिणे । पंचत्रिंशत्तमः प्रोक्तो रेवासागरसगमः ॥ १३ ॥

उत्तरी तट पर ग्यारह (तीर्थ) हैं और दक्षिण तट पर तेईस; पैंतीसवाँ कहा गया है—जहाँ रेवा सागर से मिलती है।

Verse 14

संगमैः सहितान्येव रेवातीरद्वयेऽपि च । चतुःशतानि तीर्थानि प्रसिद्धानि च संति हि ॥ १४ ॥

पवित्र संगमों सहित, रेवा (नर्मदा) के दोनों तटों पर भी निश्चय ही चार सौ प्रसिद्ध तीर्थ विद्यमान हैं।

Verse 15

षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यो मुनीश्वर । संति चान्यानि रेवायास्तीरयुग्मे पदे पदे ॥ १५ ॥

हे मुनीश्वर! साठ हजार तीर्थ और साठ करोड़ मुनि हैं; और इनके अतिरिक्त रेवा (नर्मदा) के दोनों तटों पर पद-पद पर अन्य पवित्र स्थान भी हैं।

Verse 16

संहितेयं महापुण्या शिवस्य परमात्मनः । नर्मदाचरितं यत्र वायुना परिकीर्तितम् ॥ १६ ॥

यह संहिता महापुण्यदायिनी है, परमात्मा शिव की है; इसमें वायु द्वारा नर्मदा का पवित्र चरित विस्तार से कीर्तित है।

Verse 17

लिखित्वेदं पुराणं तु गुडधेनुसमन्वितम् । श्रावण्यां यो ददेद्भक्त्या ब्राह्मणाय कुटुंबिने ॥ १७ ॥

जो इस पुराण को लिखवाकर, गुड़-धेनु के साथ, श्रावणी (श्रावण-पूर्णिमा) को भक्तिपूर्वक गृहस्थ ब्राह्मण को दान देता है—(वह महान पुण्य का भागी होता है)।

Verse 18

रुद्रलोके वसेत्सोऽपि यावदिंद्राश्चतुर्द्दश । यः श्रावयेद्वा श्रृणुयाद्वायवीयमिदं नरः ॥ १८ ॥

जो मनुष्य इस वायवीय (पुराण-भाग) का पाठ कराए या स्वयं सुने, वह चौदह इन्द्रों के काल तक रुद्रलोक में वास करता है।

Verse 19

नियमेन हविष्याशी स रुद्रो नात्र संशयः । यश्चानुक्रमणीमेतां श्रृणोति श्रावयेत्तथा ॥ १९ ॥

जो नियमपूर्वक हविष्य-भोजन करता है, वह मानो रुद्रस्वरूप हो जाता है—इसमें संदेह नहीं। और जो इस अनुक्रमणी को सुनता या दूसरों को सुनवाता है, वह भी पुण्य पाता है॥

Verse 20

सोऽपि सर्वपुराणस्य फलं श्रवणजं लभेत् ॥ २० ॥

वह भी समस्त पुराण के श्रवण से उत्पन्न फल—अर्थात् उसका पुण्य—प्राप्त कर लेता है॥

Verse 21

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे वायुपुराणानुक्रमणीनिरूपणं नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५ ॥

इस प्रकार श्रीबृहन्नारदीयपुराण के पूर्वभाग, बृहदुपाख्यान के चतुर्थ पाद में ‘वायुपुराण-अनुक्रमणी-निरूपण’ नामक पंचानवे अध्याय की समाप्ति हुई॥

Frequently Asked Questions

The chapter uses a mokṣa-dharma register to sacralize the tīrtha: the river is presented as Śiva’s descended śakti and simultaneously as the locus of the all-pervading Supreme Self, allowing devotional theism (Śiva-tattva) and nondual liberation language (nirguṇa brahman; mokṣa) to converge in the experience of Narmadā-water.

It links three practices: (1) śravaṇa/paṭhana (hearing and recitation) of Purāṇic dharma, (2) dāna and vrata-kalpa observances (notably Śrāvaṇī gifting of the written text with an allied ‘jaggery-cow’), and (3) tīrtha-yātrā centered on the Narmadā’s banks and saṅgamas—each framed as a means to sin-destruction and ascent to Rudra-loka.