Adhyaya 117
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द्वादशमासेषु अष्टमी-व्रत-कथनम् (Account of the Aṣṭamī Vow Across the Twelve Months)

इस अध्याय में सनातन एक ब्राह्मण को बारह महीनों में आने वाली अष्टमी-व्रत-परम्परा बताते हैं। चैत्र शुक्लाष्टमी को भवानी का जन्मोत्सव—प्रदक्षिणा, यात्रा, दर्शन और अशोक-बुद (अशोकाष्टमी/महाष्टमी) का विधान। वैशाख-ज्येष्ठ में उपवास तथा अपराजिता और शिव/देवी-रूपों की पूजा; आषाढ़ में रात्रि-जलस्नान, अभिषेक, ब्राह्मण-भोजन और स्वर्ण-दक्षिणा सहित विस्तृत कर्म। भाद्रपद में संतान-वर्धक व्रत, ‘दशाफल’ नाम दस-दिवसीय कृष्ण-व्रत—108 आहुतियों का होम, तुलसी-पत्र-पूजन, पूरिका-नैवेद्य, गुरु-दान और दीर्घ साधना; फिर पूर्ण कृष्ण-जन्माष्टमी-विधि—मण्डप/मण्डल/कलश, मध्यरात्रि अभिषेक, नैवेद्य, जागरण, प्रतिमा-दान और स्वर्ण-धेनु-दान। आगे राधा-व्रत, दूर्वाष्टमी (संतान-मंत्र), सोलह-दिवसीय महालक्ष्मी-व्रत—सोलह-गाँठ डोरक, उद्यापन, चन्द्र-अर्घ्य और षोडशोपचार। अंत में दुर्गा-महाष्टमी, करक-व्रत, गोपाष्टमी, अनघा-विधान, कालभैरव-उपवास, अष्टका-श्राद्ध व शिव-पूजन, भद्रकाली/भीष्म-तर्पण, भीमा व शिव-शिवा-पूजन, तथा शीतला-अष्टमी के मंत्र-स्वरूप आदि बताकर हर महीने शिव-शिवा की अष्टमी-पूजा का सामान्य नियम दिया गया है।

Shlokas

Verse 1

सनातन उवाच । शुक्लाष्टम्यां चैत्रमासे भवान्याः प्रोच्यते जनिः । प्रदक्षिणशतं कृत्वा कार्यो यात्रामहोत्सवः ॥ १ ॥

सनातन बोले—चैत्र मास की शुक्ल अष्टमी को भवानी का जन्म-उत्सव कहा जाता है। सौ प्रदक्षिणा करके देवता की यात्रा का महोत्सव करना चाहिए।

Verse 2

दर्शनं जगदम्बायाः सर्वानंदप्रदं नृणाम् । अत्रैवाशो ककलिकाप्राशनं समुदाहृतम् ॥ २ ॥

जगदम्बा का दर्शन मनुष्यों को सर्वानन्द प्रदान करता है। यहीं ‘ककलिका-प्राशन’ नामक विधि-आचार भी कहा गया है।

Verse 3

अशोककलिकाश्चाष्टौ ये पिबंति पुनर्वसौ । चैत्रे मासि सिताष्टम्यां न ते शोकमवाप्नुयुः ॥ ३ ॥

जो चैत्र मास की शुक्ल अष्टमी को पुनर्वसु नक्षत्र में अशोक के आठ कलियों का पान करते हैं, वे कभी शोक को प्राप्त नहीं होते।

Verse 4

महाष्टमीति च प्रोक्ता देव्याः पूजाविधानतः । वैशाखस्य सिताष्टम्यां समुपोष्यात्र वारिणा ॥ ४ ॥

देवी-पूजन की विधि के अनुसार यह व्रत ‘महाष्टमी’ कहलाता है। वैशाख मास की शुक्ल अष्टमी को यहाँ विधिपूर्वक उपवास करके केवल जल पर रहना चाहिए।

Verse 5

स्नात्वापराजितां देवीं मांसीबालकवारिभिः । स्नापयित्वार्च्य गन्धाद्यैर्नैवेद्यं शर्करामयम् ॥ ५ ॥

स्नान करके अपराजिता देवी को मांसी और बालक से सुवासित जल से स्नान कराए; फिर गंध आदि से पूजन करके शर्करामय नैवेद्य अर्पित करे।

Verse 6

कुमारीर्भोजयेच्चापि नवम्यां पारणाग्रतः । ज्योतिर्मयविमानेन भ्राजमानो यथा रविः ॥ ६ ॥

नवमी को पारणा से पहले कन्याओं को भोजन कराए; तब वह सूर्य के समान तेजस्वी होकर ज्योतिर्मय विमान से शोभायमान होता है।

Verse 7

लोकेषु विचरेद्विप्र देव्याश्चैव प्रसादतः । कृष्णाष्टम्यां ज्येष्ठमासे पूजयित्वा त्रिलोचनम् ॥ ७ ॥

हे विप्र! देवी की प्रसन्नता से वह लोकों में विचरण करता है, जब ज्येष्ठ मास की कृष्ण अष्टमी को त्रिलोचन (शिव) की पूजा कर लेता है।

Verse 8

शिवलोके वसेत्कल्पं सर्वदेवनमस्कृतः । ज्येष्ठशुक्ले तथाष्टम्यां यो देवीं पूजयेन्नरः ॥ ८ ॥

जो मनुष्य ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को देवी की भक्ति से पूजा करता है, वह सब देवताओं द्वारा सम्मानित होकर शिवलोक में एक कल्प तक निवास करता है।

Verse 9

स विमानेन चरति गन्धर्वाप्सरसां गणैः । शुक्लाष्टम्यां तथाऽषाढे स्नात्वा चैव निशांबुना ॥ ९ ॥

वह आषाढ़ मास की शुक्ल अष्टमी को रात्रि के जल से स्नान करके गन्धर्वों और अप्सराओं के समूहों सहित दिव्य विमान में विचरता है।

Verse 10

तेनैव स्नापयेद्देवीं पूजयेच्च विधानतः । ततः शुद्धजलैः स्नाप्य विलिंपेत्सेंदुचंदनैः ॥ १० ॥

उसी (पवित्र द्रव्य) से देवी को स्नान कराए और विधिपूर्वक पूजा करे। फिर शुद्ध जल से स्नान कराकर चन्द्रमा-सी शीतल चन्दन-लेप करे।

Verse 11

नैवेद्यं शर्करोपेतं दत्वाऽचमनमर्पयेत् । भोजयित्वा ततो विप्रान्दत्वा स्वर्णं च दक्षिणाम् ॥ ११ ॥

शर्करा सहित नैवेद्य अर्पित करके आचमन हेतु जल समर्पित करे। फिर ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा रूप में स्वर्ण दे।

Verse 12

विसृज्य च ततः पश्चात्स्वयं भुंजीत वाग्यतः । एतद्व्रतं नरः कृत्वा देवीलोकमवाप्नुयात् ॥ १२ ॥

फिर (निर्धारित दान/विसर्जन) करके, वाणी को संयमित रखते हुए स्वयं भोजन करे। इस प्रकार यह व्रत करने वाला मनुष्य देवी-लोक को प्राप्त होता है।

Verse 13

नभःशुक्लेतथाष्टम्यां देवीमिष्ट्वा विधानतः । क्षीरेण स्नापयित्वा च मिष्टान्नं विनिवेदयेत् ॥ १३ ॥

नभस मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को विधि-विधान से देवी की पूजा करके, उन्हें दूध से स्नान कराए और फिर मिष्टान्न का नैवेद्य अर्पित करे।

Verse 14

ततो द्विजान् भोजयित्वा परेऽह्नि स्वयमप्युत । भुक्त्वा समापयेदद्व्रतं संततिवर्धनम् ॥ १४ ॥

फिर अगले दिन द्विजों (ब्राह्मणों) को भोजन कराकर, स्वयं भी भोजन करे; इस प्रकार संतति-वर्धक इस व्रत का विधिपूर्वक समापन करे।

Verse 15

नभोमासे सिताष्टम्यां दशाफलमिति व्रतम् । उपवासं तु संकल्प्य स्नात्वा कृत्वा च नैत्यिकम् ॥ १५ ॥

नभोमास की शुक्ल अष्टमी को ‘दशाफल’ नामक व्रत है। उपवास का संकल्प करके स्नान करे और नित्यकर्म संपन्न करे।

Verse 16

तुलस्याः कृष्णावर्णाया दलैर्दशभिरर्चयेत् । कृष्णं विष्णुं तथाऽनन्तं गोविन्दं गरुडध्वजम् ॥ १६ ॥

श्यामवर्ण तुलसी के दस पत्तों से (भगवान का) अर्चन करे—कृष्ण, विष्णु, अनन्त, गोविन्द और गरुड़ध्वज के रूप में।

Verse 17

दामोदरं हृषीकेशं पद्मनाभं हरिं प्रभुम् । एतैश्च नामभिर्नित्यं कृष्णदेवं समर्चयेत् ॥ १७ ॥

दामोदर, हृषीकेश, पद्मनाभ, हरि, प्रभु—इन दिव्य नामों से नित्य भगवान श्रीकृष्ण का निरंतर पूजन करे।

Verse 18

नमस्कारं ततः कुर्यात्प्रदक्षिणसमन्वितम् । एवं दशदिनं कुर्याद्व्रतानामुत्तमं व्रतम् ॥ १८ ॥

तत्पश्चात प्रदक्षिणा सहित नमस्कार करे। इसी प्रकार दस दिनों तक यह व्रत करे—यह व्रतों में सर्वोत्तम व्रत है।

Verse 19

आदौ मध्ये तथा चांते होमं कुर्याद्विधानतः । कृष्णमंत्रेण जुहुयाच्चरुणाऽष्टोत्तरं शतम् ॥ १९ ॥

आरम्भ में, मध्य में तथा अंत में विधिपूर्वक होम करे। कृष्ण-मंत्र से चरु की आहुति एक सौ आठ बार दे।

Verse 20

होमांते विधिना सम्यगाचार्य्यं पूजयेत्सुधीः । सौवर्णे ताम्रपात्रे वा मृन्मये वेणुपात्रके ॥ २० ॥

हवन के अंत में बुद्धिमान व्यक्ति विधिपूर्वक आचार्य का सम्यक् पूजन करे—स्वर्ण पात्र में, या ताम्र पात्र में, या मिट्टी के पात्र में, अथवा बाँस के पात्र में।

Verse 21

तुलसीदलं सुवर्णेन कारयित्वा सुलक्षणम् । हैमीं च प्रतिमां कृत्वा पूजयित्वा विधानतः ॥ २१ ॥

सुवर्ण से सुलक्षण तुलसीदल बनवाकर, तथा स्वर्ण की प्रतिमा भी बनाकर, विधिपूर्वक उसका पूजन करे।

Verse 22

निधाय प्रतिमां पात्रे ह्याचार्याय निवेदयेत् । दातव्या गौः सवत्सा च वस्त्रालंकारभूषिता ॥ २२ ॥

प्रतिमा को पात्र में रखकर आचार्य को विधिवत् निवेदित करे। वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित बछड़े सहित गौ भी दान दे।

Verse 23

दशाहं कृष्णदेवाय पूरिका दश चार्पयेत् । ताश्च दद्याद्विधिज्ञाय स्वयं वा भक्षयेद्व्रती ॥ २३ ॥

दस दिनों तक श्रीकृष्णदेव को प्रतिदिन दस पूरियाँ अर्पित करे। वे पूरियाँ विधि-ज्ञ ब्राह्मण को दे, अथवा व्रतधारी भक्त स्वयं प्रसाद रूप से ग्रहण करे।

Verse 24

शयनं च प्रदातव्यं यथाशक्ति द्विजोत्तम । दशमेऽह्नि ततो मूर्तिं सद्रव्यां गुरवेऽर्पयेत् ॥ २४ ॥

हे द्विजोत्तम! यथाशक्ति शय्या का दान भी करना चाहिए। फिर दसवें दिन गुरु को उचित द्रव्य सहित एक मूर्ति अर्पित करे।

Verse 25

व्रतांते दशविप्रेभ्यः प्रत्येकं दश पूरिकाः । दद्यादेव दशाब्दं तु कृत्वा व्रतमनुत्तमम् ॥ २५ ॥

व्रत के अंत में दस ब्राह्मणों को—प्रत्येक को दस पूरियाँ—दान करे। यह अनुत्तम व्रत करके, वास्तव में दस वर्षों तक ऐसा ही करे।

Verse 26

उपोष्य विधिना भूयात्सर्वकामसमन्वितः । अंते कृष्णस्य सायुज्यं लभते नात्र संशयः ॥ २६ ॥

विधिपूर्वक उपवास का पालन करने से मनुष्य समस्त कामनाओं की सिद्धि से युक्त होता है; और अंत में श्रीकृष्ण का सायुज्य प्राप्त करता है—इसमें संशय नहीं।

Verse 27

कृष्णजन्माष्टमी चेयं स्मृता पापहरा नृणाम् । केवलेनोपवासेन तस्मिञ्जन्मदिने हरेः ॥ २७ ॥

यह कृष्ण-जन्माष्टमी मनुष्यों के पापों का नाश करने वाली स्मरण की गई है। हरि के उस जन्मदिन पर केवल उपवास करने से भी पाप नष्ट हो जाता है।

Verse 28

सप्तजन्मकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः । उपवासी तिलैः स्नातो नद्यादौ विमले जले ॥ २८ ॥

इसमें संदेह नहीं कि सात जन्मों में किए हुए पापों से मुक्ति होती है। उपवास करके, तिल सहित नदी आदि के निर्मल जल में स्नान करने वाला शुद्धि को प्राप्त होता है।

Verse 29

सुदेशे मंडपे क्लृप्ते मंडलं रचयेत्सुधीः । तन्मध्ये कलशं स्थाप्य ताम्रजं वापि मृन्मयम् ॥ २९ ॥

उचित देश में मण्डप तैयार करके बुद्धिमान साधक मण्डल रचे। उसके मध्य में कलश स्थापित करे—चाहे ताँबे का हो या मिट्टी का।

Verse 30

तस्योपरि न्यसेत्पात्रं ताम्रं तस्योपरि स्थिताम् । हैमीं वस्त्रयुगाच्छन्नां कृष्णस्य प्रतिमां शुभम् ॥ ३० ॥

उस कलश के ऊपर ताँबे का पात्र रखे; और उसके ऊपर शुभ कृष्ण-प्रतिमा स्थापित करे—स्वर्णमयी, और दो वस्त्रों से आच्छादित।

Verse 31

पाद्याद्यैरुपचारैस्तु पूजयेत्स्निग्धमानसः । देवकीं वसुदेवं च यशोदां नंदमेव च ॥ ३१ ॥

स्नेह-भक्ति से द्रवित मन वाला साधक पाद्य आदि उपचारों से पूजन करे; देवकी-वसुदेव तथा यशोदा और नन्द का भी सम्मानपूर्वक पूजन करे।

Verse 32

व्रजं गोपांस्तथा गोपीर्गाश्च दिक्षु समर्चयेत् । तत आरार्तिकं कृत्वा क्षमाप्यानम्य भक्तितः ॥ ३२ ॥

व्रजधाम, गोपों, गोपियों और गौओं का सभी दिशाओं में विधिपूर्वक पूजन करे। फिर आरती करके, क्षमा याचना करे और भक्ति से प्रणाम करे।

Verse 33

तिष्ठेत्तथैवार्द्धरात्रे पुनः संस्नापयेद्धरिम् । पंचामृतैः शुद्धजलैर्गंधाद्यैः पूजयेत्पुनः ॥ ३३ ॥

उसी विधि से अर्धरात्रि में फिर श्रीहरि को स्नान कराए। पंचामृत और शुद्ध जल से, चंदन आदि उपहारों सहित पुनः पूजा करे॥

Verse 34

धान्याकं च यवानीं च शुंठीं खंडं च नारद । साज्यं रौप्ये धृतं पात्रे नैवेद्यं विनिवेदयेत् ॥ ३४ ॥

हे नारद! धनिया, अजवाइन, सोंठ, खांड और घी—घी को चाँदी के पात्र में रखकर—नैवेद्य रूप में विधिपूर्वक अर्पित करे॥

Verse 35

पुनरारार्तिकं कृत्वा दशधा रूपधारिणम् । विचिंतयन्मृगांकाय दद्यादर्घ्यं समुद्यते ॥ ३५ ॥

फिर से आरती करके, मृगचिह्नधारी चंद्रमा को दस रूप धारण करने वाला मानकर ध्यान करता हुआ, उठकर अर्घ्य अर्पित करे॥

Verse 36

ततः क्षमाप्य देवेशं रात्रिखंडं नयेद्व्रती । पौराणिकैः स्तोत्रपाठैर्गीतवाद्यैरनेकधा ॥ ३६ ॥

फिर देवेश से क्षमा माँगकर व्रती रात्रि-काल को बिताए—पुराण-पाठ, स्तोत्र-पाठ, तथा भजन-कीर्तन और वाद्य-सेवा आदि अनेक प्रकार से॥

Verse 37

ततः प्रभाते विप्रग्र्यान्भोजयेन्मधुरान्नकैः । दत्वा च दक्षिणां तेभ्यो विसृजेत्तुष्टमानसः ॥ ३७ ॥

फिर प्रभात में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को मधुर अन्न से भोजन कराए। उन्हें दक्षिणा देकर, संतुष्ट मन से आदरपूर्वक विदा करे॥

Verse 38

ततस्तां प्रतिमां विष्णोः स्वर्णधेनुधरान्विताम् । गुरवे दक्षिणां दत्वा विसृज्याश्रीत च स्वयम् ॥ ३८ ॥

तब वह विष्णु की उस प्रतिमा को स्वर्ण-धेनु के दान सहित अर्पित करे; गुरु को दक्षिणा देकर विधिपूर्वक कर्म का विसर्जन करे और अंत में स्वयं श्रीविष्णु की शरण ले।

Verse 39

दारापत्यसुहृद्भृत्यरेवं कृत्वा व्रत नरः । साक्षाद्गोकमाप्नोति विमानवरमास्थितः ॥ ३९ ॥

जो पुरुष पत्नी, पुत्र, मित्र और सेवकों सहित इस प्रकार व्रत करता है, वह उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर साक्षात् गोकुल-लोक को प्राप्त होता है।

Verse 40

नैतेन सदृशं चान्यद्व्रतमस्ति जगत्त्रये । कृतेन येन लभ्येत कोट्यैकादशकं फलम् ॥ ४० ॥

तीनों लोकों में इस व्रत के समान कोई दूसरा व्रत नहीं है; इसे करने से ग्यारह कोटि के तुल्य फल प्राप्त होता है।

Verse 41

शुक्लाष्टम्यां नभस्यस्य कुर्याद्राधाव्रतं नरः । पूर्ववद्राधिकां हैमीं कलशस्थां प्रपूजयेत् ॥ ४१ ॥

नभस्य (भाद्रपद) मास की शुक्ल अष्टमी को मनुष्य राधा-व्रत करे; पूर्ववत् कलश पर स्थापित स्वर्णमयी राधिका की विधिपूर्वक पूजा करे।

Verse 42

मध्याह्ने पूजयित्वेनामेकभक्तं समापयेत् । शक्तो भक्तश्चोपवासं परेऽह्नि विधिना ततः ॥ ४२ ॥

मध्याह्न में पूजा करके अंत में एकभक्त (एक बार भोजन) से व्रत का समापन करे; फिर समर्थ भक्त अगले दिन विधिपूर्वक उपवास करे।

Verse 43

सुवासिनीर्भोजयित्वा गुरवे प्रतिमार्पणम् । कृत्वा स्वयं च भुंजीतं व्रतमेवं समापयेत् ॥ ४३ ॥

सौभाग्यवती स्त्रियों को भोजन कराकर और गुरु को प्रतिमा अर्पित करके, फिर स्वयं भोजन करे; इस प्रकार व्रत का समापन करे।

Verse 44

व्रतेनानेन विप्रर्षे कृतेन विधिना व्रती । रहस्यं गोष्ठजं लब्ध्वा राधापरिकरे वसेत् ॥ ४४ ॥

हे विप्रश्रेष्ठ! जो व्रती इस व्रत को विधिपूर्वक करता है, वह गोकुल से उत्पन्न गोपनीय रहस्य को पाकर राधा के परिकरों के बीच वास करता है।

Verse 45

दूर्वाष्टमीव्रतं चात्र कथितं तच्च मे श्रृणु । शुचौ देशे प्रजातायां द्वर्वायां द्विजसत्तम ॥ ४५ ॥

यहाँ दूर्वाष्टमी-व्रत कहा गया है; अब उसे मुझसे सुनो, हे द्विजश्रेष्ठ—शुद्ध स्थान में उगी पवित्र दूर्वा के साथ (यह व्रत किया जाता है)।

Verse 46

स्थाप्य लिंगं ततो गंधैः पुष्पैर्धूपैश्च दीपकैः । नैवेद्यैरर्चयेद्भक्त्या दध्यक्षतफलादिभिः ॥ ४६ ॥

लिंग की स्थापना करके, फिर गंध, पुष्प, धूप और दीप से, तथा दही, अक्षत, फल आदि नैवेद्य से भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करे।

Verse 47

अर्घ्यं प्रदद्यात्पूजांते मंत्राभ्यां सुसमाहितः । त्वं दूर्वेऽमृतजन्माऽसि सुरासुरनमस्कृते ॥ ४७ ॥

पूजा के अंत में, मन को एकाग्र करके, इन दो मंत्रों से अर्घ्य दे—“हे दूर्वे! तुम अमृत से उत्पन्न हो; देव और असुर दोनों तुम्हें नमस्कार करते हैं।”

Verse 48

सौभाग्यं संततिं देहि सर्वकार्यकरी भव । यथा शाखा प्रशाखाभिर्विस्तृताऽसि महीतले ॥ ४८ ॥

मुझे सौभाग्य और संतान प्रदान करो; मेरे सभी कार्यों को सिद्ध करने वाली बनो—जैसे वृक्ष की शाखा-प्रशाखाएँ पृथ्वी पर दूर तक फैलती हैं।

Verse 49

तथा विस्तृतसंतानं देहि मेऽप्यजरामरम् । ततः प्रदक्षिणीकृत्य विप्रान्संभोज्य तत्र वै ॥ ४९ ॥

उसी प्रकार मुझे भी विस्तृत संतान प्रदान करो—ऐसी वंश-परंपरा जो जरा-मरण से न कटे। फिर प्रदक्षिणा करके वहाँ ब्राह्मणों को भोजन कराए।

Verse 50

भुक्त्वा स्वयं गृहं गच्छेदत्वा विप्रेषु दक्षिणाम् । फलानि च प्रशस्तानि मिष्टानि सुरभीणि च ॥ ५० ॥

स्वयं भोजन करके घर जाए, और ब्राह्मणों को दक्षिणा दे—साथ ही उत्तम फल भी दे जो मधुर और सुगंधित हों।

Verse 51

एवं पुण्या पापहरा नृणा दूर्वाष्टमी द्विज । चतुर्णामपि वर्णानां स्त्रीजनानां विशेषतः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार, हे द्विज, दूर्वाष्टमी का व्रत अत्यंत पुण्यदायक और पापहर है। यह चारों वर्णों के लिए कल्याणकारी है, और विशेषतः स्त्रियों के लिए।

Verse 52

या न पूजयते दूर्वा नारी मोहाद्यथाविधि । जन्मानि त्रीणि वैधव्यं लभते सा न संशयः ॥ ५२ ॥

जो स्त्री मोहवश विधिपूर्वक दूर्वा की पूजा नहीं करती, वह निःसंदेह तीन जन्मों तक वैधव्य को प्राप्त होती है।

Verse 53

यदा ज्येष्ठर्क्षसंयुक्ता भवेच्जैवाष्टभी द्विज । ज्येष्ठा नाम्नी तु सा ज्ञेया पूजिता पापनाशिनी ॥ ५३ ॥

हे द्विज! जब अष्टमी तिथि ज्येष्ठा नक्षत्र से युक्त हो, तब वह ‘ज्येष्ठा’ नाम से जानी जाती है; उसकी पूजा करने से पापों का नाश होता है।

Verse 54

अथैनां तु समारभ्य व्रतं षोडशवासरम् । महालक्ष्म्याः समुद्दिष्टं सर्वसंपद्विवर्धनम् ॥ ५४ ॥

फिर इस व्रत का आरम्भ करके सोलह दिनों तक इसका अनुष्ठान करे। यह महालक्ष्मी के लिए विहित है और समस्त संपदा व सौभाग्य को बढ़ाने वाला है।

Verse 55

करिष्येऽहं महालक्ष्मीव्रतं ते त्वत्परायणः । तदविघ्नेन मे यातु समाप्तिं त्वत्प्रसादतः ॥ ५५ ॥

हे महालक्ष्मी! मैं तुम्हारा ही आश्रित होकर तुम्हारे महालक्ष्मी-व्रत का अनुष्ठान करूँगा। तुम्हारी कृपा से यह मेरे लिए बिना विघ्न के पूर्ण हो।

Verse 56

इत्युच्चार्य ततो बद्धा डोरक दक्षिणे करे । षोडशग्रंथिसहितं गुणैः षोडशभिर्युतम् ॥ ५६ ॥

ऐसा उच्चारण करके फिर दाहिने हाथ में डोरक बाँधे—जिसमें सोलह गाँठें हों और जो सोलह शुभ गुणों से युक्त हो।

Verse 57

ततोऽन्वहं महालक्ष्मीं गंधाद्यैरर्च्चयेद्व्रती । यावत्कृष्णाष्टमी तत्र चरेदुद्यापनं सुधीः ॥ ५७ ॥

इसके बाद व्रती प्रतिदिन गंध आदि से महालक्ष्मी की पूजा करे। जब कृष्ण पक्ष की अष्टमी आए, तब बुद्धिमान व्यक्ति उस व्रत का उद्यापन (समापन-विधि) करे।

Verse 58

वस्त्रमंडपिकां कृत्वा सर्वतोभद्रमंडले । कलशं सुप्रतिष्ठाप्य दीपमुद्द्योतयेत्ततः ॥ ५८ ॥

सर्वतोभद्र-मंडल पर वस्त्र-मंडप बनाकर कलश को भली-भाँति प्रतिष्ठित करे, फिर उसके बाद दीप प्रज्वलित करे।

Verse 59

उत्तार्य डोरकं बाहोः कुंभस्याधो निवेदयेत् । चतस्रः प्रतिमाः कृत्वा सौवर्णीस्तत्स्वरूपिणीः ॥ ५९ ॥

भुजा से डोरक (ताबीज/रक्षा-सूत्र) उतारकर कुंभ के नीचे निवेदित करे। फिर उसी स्वरूप की चार स्वर्ण-प्रतिमाएँ बनाकर समर्पित करे।

Verse 60

स्नपनं कारयेत्तासाः जलैः पञ्चामृतैस्तथा । उपचारैः षोडशभिः पूजयित्वा विधानतः ॥ ६० ॥

उनका स्नपन जल तथा पंचामृत से कराए। फिर विधानानुसार षोडशोपचारों से पूजन करके कर्म पूर्ण करे।

Verse 61

जागरस्तत्र कर्तव्यो गीतवादित्रनिः स्वनैः । ततो निशीथे संप्राप्तेऽभ्युदितेऽमृतदीधितौ ॥ ६१ ॥

वहाँ गीत और वाद्यों के मधुर निनाद के साथ जागरण करना चाहिए। फिर जब निशीथ (मध्यरात्रि) आए और अमृत-सी किरणों वाला चंद्र उदित हो, तब विधि आगे बढ़े।

Verse 62

दत्वार्घ्यं बंधनं द्रव्यैः श्रीखंडाद्यैर्विधानतः । चंद्रमण्डलसंस्थायै महालक्ष्यै प्रदापयेत् ॥ ६२ ॥

अर्घ्य अर्पित करके, श्रीखंड आदि द्रव्यों से विधानानुसार बंधन (बंधन-दान) दे; और चंद्र-मंडल में स्थित महालक्ष्मी को उसे समर्पित करे।

Verse 63

क्षीरोदार्णवसंभूत महालक्ष्मीसहोदर । पीयूषधाम रोहिण्याः सहिताऽर्घ्यं गृहाण मे ॥ ६३ ॥

हे क्षीरसागर-सम्भव, हे महालक्ष्मी के सहोदर, हे अमृत-धाम! रोहिणी सहित मेरा यह अर्घ्य स्वीकार कीजिए।

Verse 64

क्षीरोदार्णवसम्भूते कमले कमलालये । विष्णुवक्षस्थलस्थे मे सर्वकामप्रदा भव ॥ ६४ ॥

हे क्षीरसागर-सम्भूता कमला, हे कमलालये, हे विष्णु-वक्षस्थल-स्थिते! मेरे लिए सर्वकाम-प्रदा बनिए।

Verse 65

एकनाथे जगन्नाथे जमदग्निप्रियेऽव्यये । रेणुके त्राहि मां देवि राममातः शिवं कुरु ॥ ६५ ॥

हे रेणुका देवी! आप एकमात्र शरण, जगन्नाथा, जमदग्नि-प्रिया, अव्यया हैं—मुझे बचाइए। हे राममाता! मेरे लिए कल्याण कीजिए।

Verse 66

मंत्रैरेतैर्महालक्ष्मीं प्रार्थ्य श्रोत्रिययोषितः । सम्यक्संपूज्य ताः सम्यग्गंधयावककज्जलैः ॥ ६६ ॥

इन मंत्रों से महालक्ष्मी की प्रार्थना करके, श्रोत्रिय ब्राह्मण-गृहों की स्त्रियों का यथाविधि सम्मान-पूजन करे और उन्हें सुगंध, यावक-लेप तथा काजल से उचित रूप से अलंकृत करे।

Verse 67

संभोज्य जुहुयादग्नौ बिल्वपद्मकपायसैः । तदलाभे घृतैर्विप्र गृहेभ्यः समिधस्तिलान् ॥ ६७ ॥

आमंत्रितों को भोजन कराकर, अग्नि में बिल्व और पद्मक से बने पायस की आहुति दे। यदि वह न मिले तो, हे विप्र, अपने घर से समिधा और तिल लाकर घृत से आहुति दे।

Verse 68

मृत्युंजयाय च परं सर्वरोगप्रशांतये । चंदनं तालपत्रं च पुष्पमालां तथाऽक्षतान् ॥ ६८ ॥

समस्त रोगों की पूर्ण शान्ति हेतु परम मृत्युञ्जय को चन्दन, तालपत्र, पुष्पमाला तथा अक्षत अर्पित करे।

Verse 69

दुर्वां कौसुम्भसूत्रं च युगं श्रीफलमेव वा । भक्ष्याणि च नवे शूर्पे प्रतिद्रव्यं तु षोडश ॥ ६९ ॥

दूर्वा, कुसुम्भ-रंग का सूत, जुआ (युग) अथवा श्रीफल (नारियल) और नये शूर्प में रखे भक्ष्य—प्रत्येक द्रव्य के सोलह-सोलह अर्पित करे।

Verse 70

समाच्छाद्यान्यशूर्पेण व्रती दद्यात्समन्त्रकम् । क्षीरोदार्णवसंभूता लक्ष्मीश्चन्द्रसहोदरा ॥ ७० ॥

दूसरे शूर्प से ढँककर व्रती मन्त्र सहित अर्पण करे—“क्षीरसागर से उत्पन्न लक्ष्मी, चन्द्रमा की सहोदरा।”

Verse 71

व्रतेनानेन संतुष्टा भवताद्विष्णुवल्लभा । चेतस्रः प्रतिमास्तास्तु श्रोत्रियेभ्यः समर्पयेत् ॥ ७१ ॥

इस व्रत से विष्णु-वल्लभा देवी प्रसन्न हों। तत्पश्चात् उन चार प्रतिमाओं को श्रोत्रिय ब्राह्मणों को समर्पित करे।

Verse 72

ततस्तु चतुरो विप्रान् षोडशापि सुवासिनीः । मिष्टान्नेनाशयित्वा तु विसृजेत्ताः सदक्षिणाः ॥ ७२ ॥

तदनन्तर चार विप्रों तथा सोलह सुवासिनियों को मिष्टान्न से भोजन कराकर तृप्त करे और दक्षिणा सहित आदरपूर्वक विदा करे।

Verse 73

समाप्तिनियमः पश्चाद्भुञ्जीतेष्टैः समन्वितः । एतद्व्रतं महालक्ष्म्याः कृत्वा विप्र विधानतः ॥ ७३ ॥

समापन-नियमों को पूर्ण करके, फिर इच्छित (अनुमत) आहार ग्रहण करे। हे ब्राह्मण, विधि के अनुसार महालक्ष्मी का यह व्रत करने से फल प्राप्त होता है।

Verse 74

भुक्त्वेष्टानैहिकान् कामांल्लक्ष्मीलोके वसेच्चिरम् । एषाऽशोकाष्टमी चोक्ता यस्यां पूर्णं रमाव्रतम् ॥ ७४ ॥

इच्छित लौकिक कामनाओं का भोग करके, वह लक्ष्मी-लोक में दीर्घकाल तक निवास करता है। यह ‘अशोकाष्टमी’ कही गई है, जिसमें रमा (लक्ष्मी) का व्रत पूर्ण होता है।

Verse 75

अत्राशोकस्य पूजा स्यादेकभक्तं तथा स्मृतम् । कृत्वाऽशोकव्रतं नारी ह्यशोका शोकजन्मनि ॥ ७५ ॥

यहाँ अशोक की पूजा करनी चाहिए और ‘एकभक्त’ (एक बार भोजन) का विधान भी स्मृत है। अशोक-व्रत करने वाली नारी शोक-युक्त जन्म में भी निश्चय ही ‘अशोका’—शोक-रहित—हो जाती है।

Verse 76

यत्र कुत्रापि संजाता नात्र कार्या विचारणा । आश्विने शुक्लपक्षे तु प्रोक्ता विप्र महाष्टमी ॥ ७६ ॥

यह जहाँ कहीं भी पड़े, उसके विषय में फिर विचार करने की आवश्यकता नहीं। हे ब्राह्मण, आश्विन के शुक्लपक्ष में वही ‘महाष्टमी’ कही गई है।

Verse 77

तत्र दुर्गाचनं प्रोक्तं सव्रैरप्युपचारकैः । उपवासं चैकभक्तं महाष्टम्यां विधाय तु ॥ ७७ ॥

वहाँ देवी दुर्गा का पूजन कहा गया है, समस्त उपचारों और अर्घ्यादि सेवाओं सहित। और महाष्टमी के दिन उपवास करके ‘एकभक्त’ का पालन कर, फिर विधि में प्रवृत्त हो।

Verse 78

सर्वतो विभवं प्राप्य मोदते देववच्चिरम् । ऊर्ज्जे कृष्णादिकेऽष्टम्यां करकाख्यं व्रतं स्मृतम् ॥ ७८ ॥

चारों ओर से वैभव प्राप्त करके मनुष्य देवताओं की भाँति दीर्घकाल तक आनंदित रहता है। ऊर्ज (कार्तिक) मास में कृष्णपक्ष की अष्टमी को ‘करक-व्रत’ स्मरणीय है।

Verse 79

तत्रोमासहितः शंभुः पूजनीयः प्रयत्नतः । चंद्रोदयेऽर्घदानं च विधेयं व्रतिभिः सदा ॥ ७९ ॥

वहाँ उमा सहित शंभु (शिव) की यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए। और चंद्र उदय होने पर व्रती को सदा अर्घ्यदान करना चाहिए।

Verse 80

पुत्रं सर्वगुणोपेतमिच्छद्भिर्विविधं सुखम् । गोपाष्टमीति संप्रोक्ता कार्तिके धवले दले ॥ ८० ॥

जो सर्वगुण-संपन्न पुत्र और विविध सुख चाहते हैं, उन्हें कार्तिक मास के शुक्लपक्ष में ‘गोपाष्टमी’ नामक व्रत करना चाहिए।

Verse 81

तत्रकुर्याद्गवां पूजां गोग्रासं गोप्रदक्षिणाम् । गवानुगमनं दानं वांछन्सर्वाश्च संपदः ॥ ८१ ॥

उस अवसर पर गौओं की पूजा, उन्हें एक ग्रास चारा देना और उनकी प्रदक्षिणा करनी चाहिए। जो समस्त संपदाएँ चाहता हो, वह गौओं के पीछे श्रद्धापूर्वक चले और दान भी करे।

Verse 82

कृष्णाष्टम्यां मार्गशीर्षे मिथुनं दर्भनिर्मितम् । अनघां चानघां तत्र बहुपुत्रसमन्वितम् ॥ ८२ ॥

मार्गशीर्ष मास की कृष्णपक्ष अष्टमी को दर्भ से निर्मित युगल बनाना चाहिए; और वहाँ ‘अनघा’ तथा ‘अनघ’ को—बहुपुत्र-प्रदायक रूप में—स्थापित करना चाहिए।

Verse 83

स्थापयित्वा शुभे देशे गोमयेनोपलेपिते । पूजयेद्गन्धपुष्पाद्यैरुपचारैः पृथग्विधैः ॥ ८३ ॥

गोबर से लिपे हुए शुभ स्थान में प्रतिष्ठा करके, धूप-गंध, पुष्प आदि नाना प्रकार के पृथक् उपचरों से पूजन करे।

Verse 84

संभोज्य द्विजदांपत्यं विसृजेल्लब्धदक्षिणम् । व्रतमेतन्नरः कृत्वा नारी वा विधिपूर्वकम् ॥ ८४ ॥

ब्राह्मण दंपति को भोजन कराकर, दक्षिणा प्राप्त कर चुके उन्हें सम्मानपूर्वक विदा करे। यह व्रत विधिपूर्वक करके—पुरुष हो या स्त्री—सम्यक् पूर्ण होता है।

Verse 85

पुत्रं सल्लक्षणोपेतं लभते नात्र संशयः ॥ ८५ ॥

वह शुभ लक्षणों और सद्गुणों से युक्त पुत्र प्राप्त करता है—इसमें कोई संशय नहीं।

Verse 86

मार्गाशीर्षसिताष्टम्यां कालभैरवसन्निधौ । उपोष्य जागरं कृत्वा महापापैः प्रमुच्यते ॥ ८६ ॥

मार्गशीर्ष मास की शुक्ल अष्टमी को कालभैरव के सान्निध्य में उपवास करके जागरण करने वाला महापापों से मुक्त हो जाता है।

Verse 87

यत्किंचिदशुभं कर्म कृतं मानुषजन्मनि । तत्सर्वं विलयं याति कालभैरवदर्शनात् ॥ ८७ ॥

मनुष्य जन्म में किया हुआ जो कुछ भी अशुभ कर्म है, वह सब कालभैरव के दर्शन मात्र से विलीन होकर नष्ट हो जाता है।

Verse 88

अथ पौषसिताष्टम्यां श्राद्धमष्टकसंज्ञितम् । पितॄणां तृप्तिदं वर्षं कुलसन्ततिवर्द्धनम् ॥ ८८ ॥

अब पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को ‘अष्टका’ नामक श्राद्ध करना चाहिए। यह पितरों को पूरे वर्ष तृप्ति देता है और कुल-संतति की वृद्धि करता है।

Verse 89

शुक्लाष्टम्यां तु पौषस्य शिवं सम्पूज्य भक्तितः । भुक्तिमुक्तिमवाप्नोति भक्तिमेकां समाचरन् ॥ ८९ ॥

पौष मास की शुक्ल अष्टमी को जो भक्तिभाव से शिव की विधिवत् पूजा करता है, वह एकाग्र भक्ति का आचरण करते हुए भोग और मोक्ष—दोनों को प्राप्त करता है।

Verse 90

कृष्णाष्टम्यां तु माघस्य भद्रकालीं समर्चयेत् । भक्तितो वैरिवृन्दघ्नीं सर्वकामप्रदायिनीम् ॥ ९० ॥

माघ मास की कृष्ण अष्टमी को भक्ति से भद्रकाली की आराधना करनी चाहिए—वह शत्रुओं के समूह का नाश करने वाली और समस्त कामनाएँ देने वाली है।

Verse 91

माघमासे सिताष्टम्यां भीष्मं संतर्पयद्द्विज । संततिं त्वव्यवच्छिन्नामिच्छंश्चाप्यपराजयम् ॥ ९१ ॥

हे द्विज! माघ मास की शुक्ल अष्टमी को भीष्म का तर्पण करना चाहिए—अविच्छिन्न संतति और अपराजय (अजेयता) की इच्छा रखने वाला।

Verse 92

फाल्गुने त्वसिताष्टम्यां भीमां देवीं समर्चयेत् । तत्र व्रतपरो विप्र सर्वकामसमृद्धये ॥ ९२ ॥

फाल्गुन मास की कृष्ण अष्टमी को भीमा देवी की श्रद्धापूर्वक पूजा करनी चाहिए। हे विप्र! वहाँ व्रत में तत्पर रहने से समस्त कामनाओं की पूर्ण समृद्धि प्राप्त होती है।

Verse 93

शुक्लाष्टम्यां फाल्गुनस्य शिवं चापि शिवां द्विज । गंधाद्यैः सम्यगभ्यर्च्य सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ॥ ९३ ॥

हे द्विज! फाल्गुन मास की शुक्ल अष्टमी को गंध आदि से विधिपूर्वक शिव और शिवा का पूजन करने से साधक सर्व सिद्धियों का स्वामी होता है।

Verse 94

फाल्गुनापरपक्षे तु शीतलामष्टमीदिने । पूजयेत्सर्ववपक्कानैः सप्तम्यां विधिवत्कृतैः ॥ ९४ ॥

फाल्गुन के कृष्ण पक्ष में शीतला-अष्टमी के दिन, सप्तमी को विधिपूर्वक पकाए गए समस्त पके अन्न-नैवेद्यों से (देवी) शीतला का पूजन करना चाहिए।

Verse 95

शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता । शीतले त्वं जगद्वात्री शीतलायै नमोनमः ॥ ९५ ॥

हे शीतले! तुम जगत की माता हो; हे शीतले! तुम जगत के पिता हो। हे शीतले! तुम जगत की धात्री-पोषिका हो—शीतला को बारंबार नमस्कार।

Verse 96

वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगंबराम् । मार्जनी कलशोपेतां विस्फोटकविनाशिनीम् ॥ ९६ ॥

मैं देवी शीतला को वंदन करता हूँ—जो गदहे पर विराजमान, दिगंबरा, झाड़ू और कलश धारण करने वाली, तथा विस्फोटक (चेचक आदि) रोगों का विनाश करने वाली हैं।

Verse 97

शीतले शीतले चेत्थं ये जपंति जले ल्थिताः । तेषां तु शीतला देवी स्याद्विस्फोटकशांतिदा ॥ ९७ ॥

जो जल में खड़े होकर ‘शीतले, शीतले’ इस प्रकार जप करते हैं, उनके लिए देवी शीतला विस्फोटक (चेचकादि) रोगों की शांति देने वाली बनती हैं।

Verse 98

इत्येवं शीतलामन्त्रैर्यः समर्चयते द्विज । तस्य वर्षं भवेच्छांतिः शीतलायाः प्रसादतः ॥ ९८ ॥

हे द्विज! जो इस प्रकार शीतला के मन्त्रों से विधिपूर्वक उनकी आराधना करता है, शीतला की कृपा से उसके लिए पूरे वर्ष शान्ति और उपशमन बना रहता है।

Verse 99

सर्वमासोभये पक्षे विधिवच्चाष्टमीदिने । शिवां वापिशिवं प्रार्च्यलभते वांछितं फलम् ॥ ९९ ॥

प्रत्येक मास में, दोनों पक्षों की अष्टमी तिथि को, जो विधिपूर्वक देवी शिवा या भगवान शिव की पूजा करता है, वह इच्छित फल प्राप्त करता है।

Verse 100

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासस्थिताष्टमीव्रतकथनं नाम सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११७ ॥

इस प्रकार श्रीबृहन्नारदीयपुराण के पूर्वभाग के बृहदुपाख्यान के चतुर्थ पाद में ‘द्वादश मासों में स्थित अष्टमी-व्रत का कथन’ नामक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

Because the chapter frames Aṣṭamī as a recurring sacred time-slot whose fruit is shaped by iṣṭa-devatā orientation: Devī, Śiva, Viṣṇu/Kṛṣṇa, Rādhā, and even Pitṛ-related rites (Aṣṭakā-śrāddha). The tithi provides the ritual ‘container,’ while mantras, naivedya, and udyāpana determine the specific theological ‘content’ and phala.

It specifies a full ceremonial architecture: maṇḍapa and maṇḍala construction, kalaśa and image placement, worship of Kṛṣṇa’s parental figures and Vraja community, midnight abhiṣeka with pañcāmṛta and pure water, defined naivedya items, night vigil through recitation and music, dawn feeding with dakṣiṇā, and final gifting of the image with a golden cow—presented as unrivaled among vows.