Mantra-shastra
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Mantra-shastra

Tantra & Sacred Formulae

The science of mantras, tantric rituals, yantra construction, and esoteric practices for spiritual attainment and protection.

Adhyayas in Mantra-shastra

Adhyaya 301

Chapter 301 — सूर्यार्चनं (Sūryārcana) / Sun-worship (closing colophon only)

यह अंश पूर्व इकाई के समापन-कोलोफ़ोन को सुरक्षित रखता है, जिसमें अध्याय 301 का नाम ‘सूर्यार्चन’ (सूर्य-पूजा) बताया गया है। आग्नेय परंपरा में सूर्य-उपासना ऋत/धर्म और कर्म-सिद्धि के बीच सेतु है; सूर्य को काल-नियन्ता, प्राणशक्ति और विवेक-प्रकाश का दाता मानकर आवाहन किया जाता है। यह संक्रमण साधक को अगले अध्याय के अधिक तकनीकी मन्त्र-प्रयोग, होम आदि के लिए शुद्धि, अधिकार और ऊर्जात्मक समंजन प्रदान करता है; पुराण का संकेत है कि भक्ति और तान्त्रिक कर्म-विज्ञान अलग नहीं, बल्कि भक्ति ही उसका आधार है।

26 verses

Adhyaya 302

Worship by Limb-Syllables (Aṅgākṣara-arcana)

अग्निदेव तंत्रप्रधान उपदेश में पहले शुभ मुहूर्त बताते हैं—चंद्रमा जन्म-नक्षत्र में, सूर्य सप्तम राशि में, पूषन्/पुष्य का समय, और आगे बढ़ने से पहले ग्रहण के ‘ग्रास’ (परिमाण/अवस्था) की जाँच। फिर देह के अशुभ लक्षणों को आयु-क्षय के संकेत कहकर मंत्रों द्वारा रक्षा और भक्ति-प्रयोग का विधान करते हैं। क्रुद्धोल्का, महोल्का, वीरो्ल्का आदि उग्र शक्तियों हेतु शिखा-मंत्र, तथा वैष्णव अष्टाक्षरी मंत्र का उँगलियों के संधि-स्थानों पर क्रमबद्ध न्यास बताया गया है। साधक हृदय, मुख, नेत्र, शिर, पाद, तालु, गुह्य और हस्तों में वर्ण-बीजों का न्यास कर वही न्यास देवता में भी करता है, जिससे आत्मा और इष्टदेव की तादात्म्यता स्थापित हो। आगे मंडल/कमल-स्थापन में धर्म-श्रृंखला और गुण-शक्ति-समूहों को कमल-प्रदेशों में, सूर्य-चंद्र-दाहिनी नामक त्रिवृत्त तक स्थापित किया जाता है। अंत में योगपीठ पर हरि का आवाहन कर मूलमंत्र से पंचोपचार पूजा, दिशाओं में वासुदेवादि रूप, आयुध-चिह्नों का दिक्-विन्यास, तथा गरुड़, विश्वक्सेन, सोमेश और इंद्र-परिवार सहित आवरण-पूजा करके पूर्ण विधि से सर्वसिद्धि का फल कहा गया है।

16 verses

Adhyaya 303

Chapter 303: Mantras for Worship Beginning with the Five-syllable (Pañcākṣara) — पञ्चाक्षरादिपूजामन्त्राः

अग्नि पञ्चाक्षर मंत्र पर आधारित शैव तांत्रिक पूजा‑दीक्षा की विधि बताते हैं, जहाँ मंत्र को ब्रह्माण्ड‑तत्त्व और साधना‑पद्धति दोनों रूप में रखा गया है। पहले शिव को परब्रह्म का ज्ञानस्वरूप, हृदयस्थ बताया गया और मंत्राक्षरों का पंचमहाभूत, प्राण, इन्द्रियाँ तथा देह‑क्षेत्र से संबंध, साथ ही अष्टाक्षर‑पर्यवसान समझाया गया। फिर दीक्षा‑स्थल की शुद्धि, चरु‑पाक और उसका त्रिविध विभाग, निद्रा‑नियम व प्रातः‑निवेदन, बार‑बार मण्डल‑पूजा, मृल्लेप, अघमर्षण सहित तीर्थ‑स्नान, प्राणायाम, आत्मशुद्धि और न्यास का विधान आता है। ध्यान में अक्षर रंगयुक्त अंग बनते हैं; शक्तियाँ कमल‑दल व कर्णिका में स्थापित होती हैं; शिव स्फटिक‑श्वेत, चतुर्भुज, पंचवक्त्र रूप में, पंचब्रह्म (तत्पुरुष आदि) दिशान्यास सहित आवाहित होते हैं। आगे दीक्षा‑क्रम—अधिवास, गव्यपञ्चक, नेत्र‑बंधन, प्रवेश, तत्त्व‑संहार कर परम में लय और सृष्टि‑मार्ग से पुनः सृजन, प्रदक्षिणा, पुष्प‑पात से नाम/आसन‑निर्णय, शिवाग्नि‑उत्पत्ति, निर्दिष्ट मंत्रों से होम‑संख्या, पूर्णाहुति व अस्त्र‑आहुतियाँ, प्रायश्चित्त, कुम्भ‑पूजा, अभिषेक, समय‑व्रत और गुरु‑पूजन; तथा यही विधि विष्णु आदि देवताओं पर भी लागू कही गई है।

41 verses

Adhyaya 304

Mantras for Worship Beginning with the Five-Syllabled (Mantra) — Concluding Colophon (Chapter 304 end)

यह खंड मुख्यतः अपने समापन-कोलोफ़ोन द्वारा प्रस्तुत है, जिसमें पञ्चाक्षरी (पाँच अक्षरों वाले) मंत्र से आरम्भ होने वाले पूजा-मंत्रों पर आधारित मन्त्र-शास्त्र विभाग की समाप्ति सूचित होती है। अग्नि–वसिष्ठ की शिक्षण-परम्परा में ऐसे अध्याय ‘अनुष्ठान-प्रौद्योगिकी’ की तरह हैं—वे बताते हैं कि पूजा में मंत्र का प्रयोग कैसे हो, जप का क्रम क्या हो, और शुद्ध शब्द-रूप धर्म के साधन कैसे बनते हैं। भीतर के श्लोक यहाँ उपलब्ध न हों, फिर भी इसकी संरचनात्मक भूमिका स्पष्ट है—यह अध्याय सामान्य मंत्र-पूजा-विधियों से आगे, अगले अध्याय की विशेष नाम-लितुर्गी की ओर सेतु बनता है, जहाँ देव-नामों को क्षेत्र/तीर्थ की पवित्र भूगोल-व्यवस्था से जोड़ा जाता है। इस प्रकार कथा-प्रवाह मंत्र को सार्वत्रिक उपासना-उपकरण से आगे, स्थान-संवेदी साधना बनाकर तीर्थयात्रा, अर्पण और स्मरण को परस्पर पुष्ट करते हुए पुण्य और अंतःशुद्धि की दिशा में ले जाता है।

17 verses

Adhyaya 305

Chapter 305 — Narasiṃha and Related Mantras (नारसिंहादिमन्त्राः)

अग्निदेव पूर्व के वैष्णव नाम-जप से आगे बढ़कर मन्त्र-शास्त्र (तन्त्र) का बलवान् और रक्षात्मक विभाग बताते हैं। वे पहले शत्रु/क्षुद्र कर्म—स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन, उत्सादन, भ्रम, मारण और व्याधि—का वर्गीकरण कर उनके ‘मोक्ष’ अर्थात् शमन/उपशमन का भी आश्वासन देते हैं, जिससे प्रयोग के साथ नियंत्रण का भाव प्रकट होता है। फिर श्मशान में रात्रि-जप द्वारा भ्रमोत्पादन, प्रतिमा-विधान (प्रतिमा-भेदन) से मारण, तथा चूर्ण-क्षेप से उत्सादन की विधियाँ आती हैं। इसके बाद सुदर्शन-चक्र आधारित रक्षा-प्रणाली—न्यास, आयुधधारी देव-ध्यान, चक्र-यन्त्र में रंग-विन्यास, कुम्भ-स्थापन और 1008 आहुतियों सहित नियत द्रव्यों का होम—वर्णित है। अंत में ‘ॐ क्षौं…’ नरसिंह मन्त्र राक्षसी पीड़ाएँ, ज्वर, ग्रह-बाधा, विष और रोगों का नाश करने वाला अग्नितेजस्वी प्रतिकारक रूप प्रस्तुत करता है।

18 verses

Adhyaya 306

Chapter 306 — त्रैलोक्यमोहनमन्त्राः (Mantras for Enchanting the Three Worlds)

भगवान अग्नि त्रैलोक्य-मोहन मन्त्र का उपदेश करते हैं, जो चारों पुरुषार्थों में सिद्धि देने वाला कहा गया है। फिर तांत्रिक साधना-क्रम बताया गया है—पूर्वपूजा, निश्चित जप-कोटा, अभिषेक, निर्दिष्ट द्रव्यों व संख्या सहित होम, ब्राह्मण-भोजन तथा आचार्य का सम्मान। आगे देह-शुद्धि और आन्तरिक विधि—पद्मासन, देह-शोषण/निग्रह, सुदर्शन-दिग्बन्धन न्यास, बीज-ध्यान से मल-निष्कासन, सुषुम्ना में अमृत-धारा का भाव, प्राणायाम और शरीर में शक्ति-न्यास। विष्णु (काम/स्मर-भाव सहित), लक्ष्मी, गरुड़ तथा आयुधों की स्थापना और अलग-अलग अस्त्र-मन्त्रों से पूजा आती है। अंत में “ॐ श्रीं क्रीं ह्रीं हूं…” मुख्य मन्त्र, तर्पण-विधि, दीर्घायु हेतु उच्च जप-होम लक्ष्य, और राज्य व दीर्घ जीवन के लिए वराह-प्रयोग का परिशिष्ट—मन्त्र-शास्त्र को अन्तःशुद्धि व फल-प्राप्ति दोनों रूपों में दिखाता है।

26 verses

Adhyaya 307

Trailokya-mohinī Śrī-Lakṣmī-ādi-pūjā and Durgā-yoga (Protective and Siddhi Rites)

भगवान अग्नि वसिष्ठ को त्रैलोक्य-मोहिनी श्री (लक्ष्मी) के समृद्धि-प्रयोगों के साथ दुर्गा-योग के रक्षात्मक व विजय-साधन बतलाते हैं। आरम्भ में लक्ष्मी-मंत्र-श्रृंखला और नौ अङ्ग-मंत्रों का न्यास, कमल-बीज की माला से एक से तीन लाख जप का विधान है। फिर श्री/विष्णु-मन्दिर में धन-प्रद पूजा, खदिर-अग्नि में घृत-युक्त चावल का होम, बिल्व-आधारित आहुतियाँ, तथा ग्रह-शान्ति और राज-अनुग्रह/वश्यता हेतु सरसों-जल अभिषेक आदि शान्ति-प्रायश्चित्त बताए गए हैं। आगे शक्र के चार-द्वार वाले भवन का ध्यान, द्वार-रक्षिका श्री-दूतियाँ, और अष्टदल कमल पर चार व्यूह (वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध) का विन्यास, अंत में कमल-कर्णिका में लक्ष्मी का रूप-ध्यान आता है। आहार व तिथि-नियम, तथा बिल्व, घी, कमल, पायस आदि अर्पण-सामग्री दी गई है। तत्पश्चात दुर्गा का ‘हृदय’ मंत्र साङ्ग, पत्र-आधारित पूजा, आयुध-देवताओं को अर्पण, और वशीकरण, जय, शान्ति, काम, पुष्टि हेतु होम-विकल्प; अंत में रणभूमि में विजय-आवाहन का विधान है।

23 verses

Adhyaya 308

Chapter 308 — Worship of Tvaritā (त्वरितापूजा)

पूर्व अध्याय में त्रैलोक्य-मोहिनी लक्ष्मी तथा सम्बद्ध पूजन का वर्णन समाप्त कर अग्निदेव तुरंत त्वरिता-उपासना का उपदेश देते हैं। वे भुक्ति और मुक्ति दोनों के लिए प्रेरक आज्ञा-सूत्रों सहित मंत्राङ्ग बताते हैं। फिर शिर से पाद तक अङ्ग-न्यास और मंत्र-न्यास, तथा अंत में व्यापक न्यास कराया जाता है। ध्यान में त्वरिता को किरात/शबरी-भाव वाली, त्रिनेत्री, श्यामवर्णा, वनमालाधारिणी, मयूरपिच्छ-चिह्नयुक्त, सिंहासनस्थ, वर और अभय देने वाली रूप में देखा जाता है। आगे अष्टविध पीठ/पद्म-पूजा में पत्तों पर अङ्ग-गायत्रियों का विन्यास, अग्रभाग व द्वार-स्तम्भों पर शक्तियों की स्थापना और बाह्य रक्षक-परिवार का विधान है। अंत में योनिरूप कुण्ड में द्रव्य-विशेष से होम के भेद बताकर सिद्धियाँ—समृद्धि, रक्षा, लोक-प्रसाद, संतान, तथा शत्रु-कर्म—निर्दिष्ट हैं; साथ ही अधिक जप, मण्डल-पूजा और दीक्षा-संबद्ध दान, पंचगव्य व चरु-विधि का निर्देश है।

17 verses

Adhyaya 309

Tvaritā-pūjā (The Worship of Tvaritā) — Transition Verse and Context

यह अध्याय समापन और संक्रमण के रूप में तांत्रिक परिप्रेक्ष्य स्थापित करता है। अग्नि, वसिष्ठ से, पूर्व विषय से आगे बढ़कर त्वरिता-देवी की उपासना का संकेत देते हैं। यहाँ पूजा केवल भक्ति नहीं, बल्कि प्रकट विज्ञान-सदृश मंत्रशास्त्र है—सिद्धि हेतु तैयार ‘पुर/दुर्ग’ जैसे सुरक्षित स्थान और रजो-लिखित (रेखांकन द्वारा अंकित) प्रतिरूप की अपेक्षा बताई गई है। आग्नेयपुराण की विश्वकोशीय शैली में अग्नि आगामी विद्या के फल को भुक्ति (लौकिक प्रयोजन-सिद्धि) और मुक्ति (मोक्षोन्मुखता) दोनों रूपों में घोषित करते हैं। यह अध्याय दहलीज़ की तरह है—साधना का नाम, उसका फल, और वज्राकुला-रूपिणी देवी की मंत्र-पूजा पहचान को आगे के निर्देशों का आधार बनाता है।

41 verses

Adhyaya 310

Tvaritā-mūla-mantra and Related Details (Dīkṣā, Maṇḍala, Nyāsa, Japa, Homa, Siddhi, Mokṣa)

भगवान् अग्नि त्वरीता-केन्द्रित तन्त्र-क्रम बताते हैं—सिंह–वज्रकुल के कमल-यन्त्र में न्यास से तैयारी, फिर मण्डल-रचना: नौ भागों का विभाजन, दिशाओं में ग्राह्य/अग्राह्य कोष्ठक, बाह्य रेखा-समूह, वज्र-वक्रता और मध्य में तेजस्वी कमल। आगे स्थापना-पूजन: बीजाक्षरों का दक्षिणावर्त क्रम, विद्याङ्गों का दलों व केन्द्र में विन्यास, दिगस्त्र-रक्षा तथा बाह्य गर्भ-मण्डल में लोकपाल-न्यास। जप-संख्या, अङ्ग-प्रमाण और होम-क्रम निश्चित हैं; पूर्णाहुति दीक्षा-मुद्रा है जिससे शिष्य दीक्षित होता है। भुक्ति हेतु जय, राज्य, निधि, सिद्धि आदि फल कहे गए हैं; साथ ही मोक्ष-पथ—कर्मबन्धनरहित होम, सदाशिव-स्थिति और ‘जल का जल में लय’ जैसी अनावृत्ति-मुक्ति। अंत में अभिषेक, कुमारि-पूजा, दक्षिणा तथा द्वूती-मन्त्र से द्वार, एकान्त वृक्ष, श्मशान आदि रात्रि/सीमा-विधियाँ सर्वसिद्धि के लिए बताई गई हैं।

36 verses

Adhyaya 311

The Root-Mantra of Tvaritā (Tvaritā-mūla-mantra)

यह अध्याय त्वरिता के मूल-मंत्र के उपदेश का उपसंहार और संक्रमण-कोलॉफन है, जो आगे त्वरिता-विद्या की अधिक तकनीकी व्याख्या की ओर संकेत करता है। आग्नेय परंपरा में मूल-मंत्र को बीज-प्रामाण्य माना गया है, जिससे आगे के अनुष्ठान-प्रयोग और यंत्र/चक्र-विन्यास विकसित होते हैं। विस्तृत पद्धति से ठीक पहले यह समापन पुराणीय शिक्षण-रीति को दिखाता है—पहले मंत्र को प्रकट नाभि के रूप में स्थापित किया जाता है, फिर नियत क्रम, न्यास और यंत्र-चक्र-निर्माण द्वारा उसे क्रियात्मक शाखाओं में फैलाया जाता है। अध्याय का उद्देश्य परंपरा-प्रामाण्य और पाठ-सातत्य को दृढ़ करना है, ताकि साधक-विद्वान अगले अध्याय को अलग-अलग मंत्र नहीं, बल्कि शास्त्रीय अनुशासन के अधीन धर्म-काम-अर्थ फल देने वाली व्यवस्थित तांत्रिक तकनीक के रूप में पढ़े।

25 verses

Adhyaya 312

Chapter 312 — Various Mantras (नानामन्त्राः)

इस अध्याय में भगवान् अग्नि विनायक (गणेश) की पूजा से आरम्भ कर संक्षिप्त मन्त्र-शास्त्र क्रम बताते हैं—आधार-शक्ति व कमल-रचना के न्यास, “हूँ फट्” वाला कवच, तथा दिशानुसार नामों सहित विघ्नेश का बाह्य-आन्तरिक आवाहन। फिर त्रिपुरा-उपासना आती है, जहाँ भैरव/वटुक आदि सहचर-नाम-श्रृंखलाएँ, बीज (ऐं, क्षें, ह्रीं) और अभय, पुस्तक, वरद, माला आदि रूप-चिह्न दिए गए हैं। जाल-विन्यास, हृदयादि-न्यास और कामक (इच्छापूर्ति) सिद्धि-समापन का विधान बताया गया है। आगे उच्छाटन हेतु निर्दिष्ट यन्त्र, श्मशान-सामग्री और सूत्र-बन्धन का प्रयोग, युद्ध में रक्षा/विजय मन्त्र, तथा समृद्धि, सूर्य और श्री-आह्वान वर्णित हैं। आयु-वृद्धि, निर्भयता, शान्ति और वशीकरण के उपाय—तिलक/अंजन, स्पर्श, तिल-होम, अभिमन्त्रित भोजन—भी बताए गए हैं। अंत में नित्यक्लिन्ना का मूल-मन्त्र, षडङ्ग, लाल त्रिकोण-ध्यान, दिग्-स्थापन, काम के पाँच प्रकार के चिन्तन, पूर्ण मातृका-पाठ और आधार-शक्ति/कमल/सिंहासन सहित हृदय-स्थापन से समापन होता है।

28 verses

Adhyaya 313

Tvaritājñānam (Knowledge of Tvaritā, the Swift Goddess) — Agni Purana, Adhyāya 314 (as introduced after 313)

अग्निदेव पूर्व में बताए मंत्र-संग्रह से आगे बढ़कर त्वरिता देवी के तांत्रिक-आचार का क्रम बताते हैं। बीज-समृद्ध त्वरिता-मंत्र, न्यास-पूजा, दो-भुजा और अष्ट-भुजा ध्यान, आधार-शक्ति की स्थापना, कमलासन, सिंहवाहन तथा हृदयादि अंग-न्यास का विधान आता है। दिशाओं में मण्डल-क्रम से गायत्री और विविध स्त्री-शक्तियों की पूजा, मध्य-स्थापनाएँ और द्वारपाल—जया, विजया, किंकर—का निर्देश है। अनन्त, कुलिका, वासुकि, शंखपाल, तक्षक, महापद्म, कर्कोट, पद्म/पद्मा आदि नागराजों को नाम-व्याहृति सहित आहुति दी जाती है। आगे 81 पदों वाले निग्रह-चक्र का लेखन, लिखने की सामग्री और साध्य-नाम रखने का स्थान; फिर उग्र-रक्षा व मारणोन्मुख प्रयोग, काली/कालरात्रि तत्त्व, यम-सीमा की कल्पना, गूढ़ रक्षोच्चार, स्याही-विधि, श्मशान/चौराहे जैसे सीमांत स्थानों में लेखन, तथा कुंभ के नीचे, वल्मीके, विभीतक वृक्ष आदि में स्थापना बताई गई है। शुभ द्रव्यों से अनुग्रह-चक्र, रुद्र/विद्या के वर्ण-क्रम-जाल से प्रत्यङ्गिरा-रूप, और 64 पदों का संयुक्त निग्रह–अनुग्रह चक्र भी वर्णित है। अंत में ‘क्रीं सः हूं’ अमृती/विद्या-बीज, त्रि-ह्रीं आवरण, और ताबीज-धारण व कान में जप जैसे उपायों से शत्रु-निवारण व विषाद-हरण को धर्म-नियम के साथ कहा गया है।

23 verses

Adhyaya 314

Adhyaya 314 — Tvaritājñāna (Immediate/Quick Knowledge) (Colophon/Transition)

यह अध्याय यहाँ केवल अपने समापन-कोलोफ़न के रूप में प्रस्तुत है, जो ‘त्वरिताज्ञान’ नामक विद्या-खण्ड की पूर्णता बताता है। आग्नेय परंपरा में यह कोलोफ़न एक संरचनात्मक संधि है—एक विद्या-मॉड्यूल को बंद कर तुरंत अगले तकनीकी क्रम की ओर ले जाता है। मन्त्र-शास्त्र (तंत्र) काण्ड में ऐसे संक्रमण पाठ्यक्रम-क्रम को सूचित करते हैं; त्वरित ज्ञान आगे चलकर मंत्र-प्रयोग-विधियों में प्रवृत्त करता है। कथानक वही रहता है—भगवान अग्नि उपदेशक और वसिष्ठ ग्रहणकर्ता—जिससे स्पष्ट है कि ‘शीघ्र उपाय’ भी धर्मसम्मत शिक्षण का अंग हैं, स्वतंत्र जादुई नुस्खे नहीं।

14 verses

Adhyaya 315

Chapter 315: नानामन्त्राः (Various Mantras)

मन्त्र-शास्त्र के क्रम में इस अध्याय में अग्निदेव बीजाक्षरों और ‘फट्’ आदि आदेशात्मक अंत वाले प्रयोग-मन्त्र बताते हैं। ‘हूँ’ से आरम्भ, ‘खेच्छे’ पद से अलंकृत और तीव्र समाप्ति वाले मन्त्र-निर्माण का विधान दिया गया है। फिर ‘सर्वकर्मसाधिनी’ विद्या का फल—विष तथा सम्बद्ध पीड़ाओं का शमन, और घातक विष या प्रहार से मरणासन्न व्यक्ति को पुनर्जीवित करने की क्षमता—वर्णित है। अन्य लघु मन्त्र विष व शत्रु-दमन, पापजन्य रोग-विजय, विघ्न व दुष्ट शक्तियों की निवृत्ति हेतु बताए गए हैं; वशीकरण-प्रयोग भी आता है। अंत में ‘कुब्जिका-विद्या’ को सर्वसिद्धिदायिनी रूप में विस्तार से प्रस्तुत कर, ईश द्वारा स्कन्द को उपदिष्ट मन्त्र-परम्परा के आगे के उपदेश का संकेत किया गया है।

5 verses

Adhyaya 316

Derivation (Uddhāra) of the Sakalādi Mantra (सकलादिमन्त्रोद्धारः)

इस अध्याय में उद्धृत आरम्भ में ईश्वर-रूप से भगवान अग्नि सकलादि/प्रासाद-मन्त्र-प्रणाली के ‘उद्धार’ और प्रयोग की तान्त्रिक रूपरेखा बताते हैं। अ से क्ष तक वर्ण-श्रृंखला (क-वर्ग आदि) को देव-रूपों और कर्म-उपयोगों से जोड़कर पहले सकल, निष्कल और शून्य—इन तत्त्व-स्थितियों का विवेचन किया गया है। आगे देवता-नाम-गणना, क्ष का नरसिंह-स्वरूप, विश्वरूप की प्रमाण-संगति आदि संकेत देकर ईशान, तत्पुरुष, अघोर/दक्षिण, वामदेव, सद्योजात—पञ्चवक्त्रों के अनुसार न्यास-स्थानों का निर्देश है। हृदय, शिरस्, शिखा, नेत्र, अस्त्र—इन अंग-मन्त्रों तथा उनके अन्त्य-उच्चार ‘नमः, स्वाहा, वौषट्, हूँ, फट्’ का विधान आता है। अंत में ‘सर्व-कर्म-कर’ प्रासाद-मन्त्र को सर्व-रितु-सिद्धिदायक कहा गया है; साथ ही सकल प्रासाद और निष्कल सदाशिव-विन्यास का भेद, शून्य-छाया से आवरण, तथा विद्येश्वर-अष्टक की वर्गीकरण-परम्परा में इन मन्त्र-समूहों का स्थान स्थापित किया गया है।

34 verses

Adhyaya 317

सकलादिमन्त्रोद्धारः (Sakalādi-mantra-uddhāra) — Chapter Colophon/Transition

यह खंड मुख्यतः उपसंहार-रूप है। यह ‘सकलादि-मन्त्रोद्धार’ नामक पूर्व अध्याय की समाप्ति का संकेत देता है और अग्नि-पुराण के मन्त्र-शास्त्र क्रम में मन्त्र-उद्धार तथा वर्ण/ध्वनि और विधि-विश्लेषण को एक औपचारिक शास्त्रीय अनुशासन के रूप में स्थापित करता है। आगे यह गण-पूजा की ओर संक्रमण कराता है, जहाँ मन्त्र-प्रयोग से रक्षात्मक उपासना और विघ्न-निवारण किया जाता है। व्यापक पुराणीय शिक्षण-परिप्रेक्ष्य में शुद्ध मन्त्र-व्यवहार को धर्मकर्म और सिद्धि-साधना हेतु आवश्यक, पर अंततः सदाचार, साधना और शुद्ध अभिप्राय के अधीन बताया गया है।

21 verses

Adhyaya 318

वागीश्वरीपूजा (Worship of Vāgīśvarī)

अग्नि देव मंत्र-शास्त्र के उपदेश-क्रम में वसिष्ठ को वागीश्वरी (सरस्वती-रूप) की पूजा सिखाते हैं—उसका मण्डल, ध्यान-विधि, समय, मंत्र-रचना और वर्ण-वर्गों का विधान सहित। आरम्भ में स्थिर, प्रकाशमय ध्यान से ईश्वर की अंतःप्रतिष्ठा और पवित्र अक्षरों का गोपनीय, सुरक्षित संप्रेषण बताया गया है। वागीश्वरी को पचास वर्णों की वर्णमाला-माला से विभूषित, त्रिनेत्री, वर-अभय-मुद्रा सहित, जपमाला और पुस्तक धारण किए हुए ध्याया जाता है। मुख्य साधना वर्णमाला-जप है—‘अ’ से ‘क्ष’ तक अक्षरों को शिरोभाग से कंधों तक उतरते और देह में मानवाकार ध्वनि-धारा की तरह प्रवेश करते हुए कल्पना कर एक लाख जप। दीक्षा में गुरु कमल-मण्डल बनाकर सूर्य-चन्द्र-स्थापन, मार्ग, द्वार, कोने की पट्टियाँ और रंग-नियम निर्धारित करता है; कमल-खंडों में देवियाँ/शक्तियाँ स्थापित होती हैं—मध्य में सरस्वती, साथ में वागीशी, हृल्लेखा, चित्रवागीशी, गायत्री, शांकरी, मति, धृति तथा ह्रीं-बीज रूप। घृताहुतियों से साधक को संस्कृत-प्राकृत काव्य-प्रभुत्व, काव्यशास्त्र और संबद्ध विद्याओं में दक्षता प्राप्त होती है—यह अध्याय साधना और सांस्कृतिक-बौद्धिक सिद्धि का संगम दिखाता है।

10 verses

Adhyaya 319

वागीश्वरीपूजा (The Worship of Vāgīśvarī)

यह अध्याय मन्त्र-शास्त्र के एक केंद्रित अनुष्ठान-खंड का समापन करता है—वागीश्वरी (वाणी, विद्या और मन्त्र-शक्ति से सम्बद्ध शक्ति-स्वरूप) की पूजा। अग्नि-पुराण की विश्वकोशीय शिक्षापद्धति में यह उपासना पूर्व-विद्या के रूप में साधक की वाङ्मय-शक्ति को स्थिर करती, स्मरण को तीक्ष्ण बनाती और तकनीकी विधियों का शुद्ध संप्रेषण समर्थ करती है। क्रम स्पष्ट है—पहले मन्त्र और उसके अधिष्ठात्री शक्ति का अधिकार, फिर आगे मण्डल-विधि (रेखाचित्र/यन्त्र-निर्माण) जैसे सूक्ष्म विषय। इसलिए वागीश्वरी-पूजा भक्तिमय भी है और साधनात्मक भी—धर्मसम्मत वाणी, सही लिटर्जिकल कर्म, तथा आगे आने वाले वास्तु-आगमिक मण्डलों में मापन, न्यास और मन्त्र-लेखन की शुद्धता का आधार बनती है।

48 verses

Adhyaya 320

Aghīrāstra-ādi-Śānti-kalpaḥ (Rite for Pacification of Aghora-Astra and Other Weapons)

इस अध्याय में भगवान् अग्नि (ईश्वर) कर्मारम्भ से पहले युद्धात्मक व ब्रह्माण्डीय शक्तियों को विधिपूर्वक समन्वित कर रक्षाविधान बताते हैं। सर्वकर्म-सिद्धिदायक ‘अस्त्र-याग’ में मण्डल के मध्य शिव का अस्त्र स्थापित कर, पूर्व से दिशानुसार वज्र आदि अस्त्रों का विन्यास किया जाता है। इसी प्रकार ग्रह-पूजा में मध्य में सूर्य और पूर्व-स्थान से क्रमशः अन्य ग्रह रखे जाते हैं, जिससे शुभ फल हेतु ग्रह-सामंजस्य बनता है। मुख्य उपदेश अघोर-अस्त्र की जप-होम द्वारा ‘अस्त्र-शान्ति’ है, जो ग्रह-दोष, रोग, मारी, शत्रु-बल तथा विनायक-सम्बन्धी विघ्नों को शांत करती है। लक्ष/अयुत/सहस्र की गणनाएँ और तिल, घृत, गुग्गुलु, दूर्वा, अक्षत, जवा आदि द्रव्य उल्का, भूकम्प, वन-प्रवेश, रक्त-सा वृक्ष-रस, ऋतु-विपरीत फलन, महामारी, हाथियों के विकार, गर्भपात और यात्रा-शकुन जैसे निमित्तों के अनुसार बताए गए हैं। अंत में न्यास और पंचवक्त्र देवता का ध्यान कर विजय व परम सिद्धि प्राप्त होती है।

15 verses

Adhyaya 321

Pāśupata-Śānti (पाशुपतशान्तिः)

अघोर आदि अस्त्रों की पूर्व शान्ति-कल्प के बाद यह अध्याय पाशुपत-शान्ति का विधान बताता है। भगवान पाशुपत शस्त्र-मन्त्र पर आधारित शान्तिकर्म में जप और प्रारम्भिक प्रयोग सिखाते हैं। मन्त्र का क्रम विशेष है—‘पादतः-पूर्व’ (पैरों/प्रारम्भिक न्यास से) विघ्न-नाश, मानो दिशानुसार न्यास-प्रयोग। फिर सूर्य, चन्द्र और विघ्नेश्वर आदि अस्त्र-आह्वान ‘फट्’ सहित, तथा ‘मोहित करो, छिपाओ, उखाड़ो, भयभीत करो, जिलाओ, दूर भगाओ, अरिष्ट नष्ट करो’ जैसे आदेशात्मक क्रियापद आते हैं। एक जप से बाधा कटती है; सौ जप से अपशकुन शांत होकर युद्ध में विजय मिलती है। घी और गुग्गुलु की आहुति वाला होम कठिन कार्य भी सिद्ध करता है; शस्त्र-पाशुपत के पाठ से पूर्ण शान्ति होती है।

3 verses

Adhyaya 322

The Six Limbs (Ṣaḍaṅga) of the Aghora-Astra (अघोरास्त्राणि षडङ्गानि)

यह अध्याय पाशुपत-शान्ति के प्रसंग से आगे बढ़कर अघोरास्त्र के षडङ्गों का तकनीकी विवेचन करता है, जिन्हें जप, होम, न्यास और कवच द्वारा क्रियान्वित किया जाता है। ईश्वर हंस-आधारित संक्षिप्त मंत्र-प्रयोग से मृत्यु और रोग-निग्रह का उपदेश देते हैं तथा शान्ति-पुष्टि हेतु दूर्वा से विशाल आहुतियों का विधान करते हैं। आगे मोहनी, जृम्भणी, वशीकरण, अन्तर्धान आदि अपसारी/आकर्षक विद्याओं का क्रमबद्ध संग्रह, चोर-शत्रु-ग्रहपीड़ा-निवारण, क्षेत्रपाल-बलि और प्रत्यावर्तन-प्रयोग बताए गए हैं। मंत्र से चावल धोना, द्वार-जप, धूपन-योग, तिलक-लेप, विवाद-जय, आकर्षण, धन-समृद्धि और संतान-उपाय जैसे लोक-प्रयोजन भी सम्मिलित हैं। अंत में शैव सिद्धान्त स्पष्ट होता है—ईशान तथा पञ्चब्रह्म (सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष, ईशान) के अङ्ग-विन्यास और विस्तृत कवच द्वारा सदाशिव-केंद्रित रक्षण-शक्ति, भोग और मोक्ष दोनों का फल देने वाली बताई गई है।

21 verses

Adhyaya 323

Chapter 323 — The Six-Limbed Aghora Astras (षडङ्गान्यघोरस्त्राणि)

यह अध्याय षडङ्गयुक्त अघोरास्त्र-मंत्र का संक्षिप्त, तकनीकी सूत्र देकर समाप्त होता है, जिसका प्रयोग बलपूर्वक रक्षात्मक निराकरण हेतु किया जाता है। आग्नेय मंत्र-शास्त्र परंपरा में ‘अस्त्र’ को विधिपूर्वक जाग्रत किया गया कर्म-साधन माना गया है, जिसकी प्रभावशीलता शुद्ध उच्चारण, संकल्प और अङ्ग/न्यास-रचना में सही विन्यास पर निर्भर है। रुद्र-शांति से ठीक पहले इसका स्थान एक शिक्षात्मक क्रम बनाता है—पहले संकट-निवारक तीक्ष्ण अपोत्प्रासक मंत्र-प्रौद्योगिकी, फिर शांति, पुनर्स्थापन और स्थिरीकरण के कर्म। इस प्रकार अध्याय आक्रामक संरक्षण से सामंजस्यकारी उपचार तक सेतु बनकर, शुद्धि, सुरक्षा और आध्यात्मिक तैयारी की धर्मिक निरंतरता में मंत्र-क्रियाओं का समन्वय दिखाता है।

13 verses

Adhyaya 324

Rudra-śānti (रुद्रशान्ति)

इस अध्याय में रुद्र-शान्ति से सम्बद्ध कर्म-तत्त्व का खण्ड पूर्ण होता है। इसमें उग्र रुद्र-शक्ति को शुभ संतुलन के साथ समन्वित करने वाली शान्ति-परम्परा बताई गई है। अग्नि पुराण के मन्त्र-शास्त्र प्रसंग में यह शान्ति-विधान भक्ति और विधि—दोनों का सेतु है: साधक रुद्र को केवल स्तुति-देवता नहीं, बल्कि सही रीति से किए गए अनुष्ठानों द्वारा सामंजस्य में लाने योग्य शक्ति मानकर उपासना करता है। अध्याय का स्थान संकेत देता है कि शमन व स्थिरीकरण (शान्ति) के बाद अगले अध्यायों में अधिक सूक्ष्म तान्त्रिक प्रक्रिया और मन्त्र-निर्माण/इंजीनियरिंग की ओर संक्रमण होगा। अग्नेय विद्या की विश्वकोशीय दृष्टि में शान्ति अलग-थलग पुण्यकर्म नहीं, बल्कि मन्त्र-सिद्धि की आधार-क्रिया है, जो साधक, यज्ञ-स्थल और सूक्ष्म वातावरण को आगे के नियमों—काल-निर्णय, तत्त्व-संबंध और परम्परा-चिह्न—के लिए तैयार करती है।

23 verses

Adhyaya 325

Worship of Gaurī and Others (Gauryādi-pūjā) — Mantra, Maṇḍala, Mudrā, Homa, and Mṛtyuñjaya Kalaśa-Rite

इस अध्याय में उमा़/गौरी-पूजा को भुक्ति और मुक्ति देने वाली पूर्ण साधना-प्रणाली बताया गया है—मंत्र-ध्यान, मण्डल-रचना, मुद्राएँ और होम सहित। बीज-मंत्र निर्माण, वर्ण/जाति-वर्गीकरण और षडङ्ग-संबंध के संकेत दिए गए हैं। प्रणव से आसन-स्थापन, हृदय-आधारित मूर्ति-न्यास, पूजन-सामग्री तथा स्वर्ण, रजत, काष्ठ, शिला आदि माध्यमों में प्रतिमा-पूजा का विधान है। अव्यक्त को मध्य/कोनों में रखकर पाँच पिण्डों की व्यवस्था और दिशात्मक/चक्रानुक्रम से देवताओं का क्रम मण्डल की पूजा-भूगोल रचता है। तारा की विविध मूर्तिरूप-कल्पनाएँ (भुजाएँ, वाहन, हस्त-आयुध) और संकेत/हस्त-प्रयोग बताए गए हैं; अंत में पद्म, टिङ्ग, आवाहनी, शक्ति/योनि आदि मुद्राओं का वर्गीकरण तथा मापयुक्त वर्गाकार मण्डल, विस्तार और द्वारों का वर्णन है। लाल पुष्प-समर्पण, उत्तराभिमुख होम, पूर्णाहुति, बलि, कुमारियों को भोजन और नैवेद्य-वितरण जैसी आचार-नीति भी है। बड़े जप से वाक्-सिद्धि का फल कहा गया है। अंत में स्वास्थ्य, दीर्घायु और अकाल-मृत्यु से रक्षा हेतु मृत्युञ्जय कलश-पूजा और होम, द्रव्य तथा मंत्र-संख्या का विशेष विधान दिया गया है।

26 verses

Adhyaya 326

Chapter 326 — देवालयमाहात्म्यम् (The Glory of Temples)

मन्त्र-शास्त्र के क्रम में यह अध्याय व्रत-समापन से आगे बढ़कर देवालय-संस्कृति की पवित्र अर्थव्यवस्था का वर्णन करता है। रक्षा और समृद्धि हेतु धागे, माला, ताबीज आदि साधनों का विधान है; जप-नियमों में मानसिक जप, मेरु-दाने का नियम और माला गिरने पर प्रायश्चित्त बताया गया है। घण्टा-ध्वनि को समस्त वाद्यों का सार मानकर घर, मंदिर और लिंग की शुद्धि के लिए पवित्र द्रव्यों का निर्देश दिया गया है। मंत्र-उपदेश में ‘नमः शिवाय’ के पंचाक्षर/षडाक्षर रूप और अंततः ‘ॐ नमः शिवाय’ को लिंग-पूजा का परम मंत्र कहा गया है, जो करुणा-मूल होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देता है। आगे देवालय व लिंग-प्रतिष्ठा को सर्वोच्च पुण्य-कारक बताकर यज्ञ, तप, दान, तीर्थ और वेदाध्ययन के फलों की वृद्धि कही गई है; भक्ति प्रधान हो तो छोटी-बड़ी भेंट समान फल देती है। अंत में टिकाऊ पदार्थों से देवालय-निर्माण के क्रमिक महाफल और न्यूनतम निर्माण-कार्य से भी बड़े आध्यात्मिक लाभ का प्रतिपादन है।

19 verses

Adhyaya 327

Chapter 327 — छन्दःसारः (Chandas-sāra: The Essence of Metres)

इस अध्याय में मंदिर-पूजा और मंत्र-प्रयोग से आगे बढ़कर श्रुति की रक्षा करने वाले भाषाविज्ञान—छन्दःशास्त्र—का सार बताया गया है। अग्नि पिङ्गल-परम्परा के अनुसार मात्राओं, लघु-गुरु और गण-पद्धति (त्रिक) से छन्द-रचना की विधि समझाते हैं। वेद-शास्त्र के शुद्ध पाठ हेतु अपवाद-नियम भी दिए हैं—पादान्त में लघु को गुरु मानना, संयुक्त व्यंजन, विसर्ग, अनुस्वार तथा जिह्वामूलीय-उपध्मानीय ध्वनियों से गुरुता उत्पन्न होना। ध्वनि के इन नियमों को स्थापित कर अध्याय बताता है कि तकनीकी शास्त्र भी पवित्र आधार हैं; सही उच्चारण मंत्र-फल, पाठ-निष्ठा और कर्मकाण्ड-परम्परा की निरन्तरता की रक्षा करता है।

3 verses