Adhyaya 327
Mantra-shastraAdhyaya 3273 Verses

Adhyaya 327

Chapter 327 — छन्दःसारः (Chandas-sāra: The Essence of Metres)

इस अध्याय में मंदिर-पूजा और मंत्र-प्रयोग से आगे बढ़कर श्रुति की रक्षा करने वाले भाषाविज्ञान—छन्दःशास्त्र—का सार बताया गया है। अग्नि पिङ्गल-परम्परा के अनुसार मात्राओं, लघु-गुरु और गण-पद्धति (त्रिक) से छन्द-रचना की विधि समझाते हैं। वेद-शास्त्र के शुद्ध पाठ हेतु अपवाद-नियम भी दिए हैं—पादान्त में लघु को गुरु मानना, संयुक्त व्यंजन, विसर्ग, अनुस्वार तथा जिह्वामूलीय-उपध्मानीय ध्वनियों से गुरुता उत्पन्न होना। ध्वनि के इन नियमों को स्थापित कर अध्याय बताता है कि तकनीकी शास्त्र भी पवित्र आधार हैं; सही उच्चारण मंत्र-फल, पाठ-निष्ठा और कर्मकाण्ड-परम्परा की निरन्तरता की रक्षा करता है।

Shlokas

Verse 1

इत्य् आग्नेये महापुराणे देवालयमाहत्म्यादिर्नाम षड्विंशत्यधिकत्रिशततमो ऽध्यायः अथ सप्तविंशत्यधिकत्रिशततमो ऽध्यायः छन्दःसारः अग्निर् उवाच छन्दो वक्ष्ये मूलजैस्तैः पिङ्गलोक्तं यथाक्रमम् सर्वादिमध्यान्तगणौ म्लौ द्वौ जौ स्तौ त्रिकौ गणाः

इस प्रकार आग्नेय महापुराण में ‘देवालय‑माहात्म्य आदि’ नामक ३२६वाँ अध्याय समाप्त हुआ। अब ३२७वाँ अध्याय ‘छन्दःसार’ आरम्भ होता है। अग्नि बोले—मैं पिङ्गल के उपदेशानुसार मूल अक्षर‑गणों से छन्दों का क्रमशः वर्णन करूँगा। गण ये हैं—म और ल; ज के दो भेद; स और त; तथा क के तीन भेद।

Verse 2

धनस्यान्नाथमेकन्त्विति ख ह्रस्वो गुरुर्वा पादान्ते पूर्वो योगाद् विसर्गतः अनुस्वाराद्व्यञ्जनात् स्थात् जिह्वामूलीयतस् तथा

‘धनस्यान् नाथम्’ तथा ‘एकन्त्विति‑ख’ आदि प्रयोगों में पाद के अन्त में ह्रस्व अक्षर भी विकल्प से गुरु माना जा सकता है। पूर्ववर्ती अक्षर संयोग, विसर्ग (ः), अनुस्वार (ं), व्यंजन के कारण, तथा जिह्वामूलीय के कारण भी गुरु हो जाता है।

Verse 3

उपाध्मानीयतो दीर्घो गुरुर्ग्लौ नौ गणाविह वसवोष्टौ च चत्वारो वेदादित्यादिलोपतः

उपध्मानीय (ओष्ठ्य वर्णों से पूर्व विशेष विसर्ग) के कारण दीर्घ स्वर को गुरु (भारी) माना जाता है। यहाँ गणों के नाम ‘ग्लौ’ और ‘नौ’ हैं। वसु आठ हैं, ओष्ठ दो हैं और दिशाएँ चार हैं—‘वेद’ और ‘आदित्य’ आदि शब्दों के आद्याक्षर-लोप से यह संकेत किया गया है।

Frequently Asked Questions

A Piṅgala-style prosody framework: gaṇa classification and operational rules that convert syllable weight via pāda-end position, consonant clusters, visarga/anusvāra, and special visarga allophones.

By ensuring metrical and phonetic correctness, it protects the integrity of mantra and śāstra recitation—supporting ritual efficacy, accurate transmission of Agneya Vidya, and disciplined speech as a dharmic practice.